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Full text of "Chandogya Upanishad Gita Press Gorakhpur"

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क ~ 


१/ 

















पकाशक--गोविन्दभवन-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर 
(2 


सं १९९३ से २०५० तक 


३२ „००० 
सं० २०५२. आटठवोँ संस्करण 


॥ +©000 


योग ३७,०० © 


मूल्य- पचास रुपये 





= 
मद्रक गीताप्रेस, गौरखपुर- २७ ३००५ 
दूरभाष -- ३३४७२१९ 


भीहरिः 
प्रस्तावना 


छान्दोग्योपनिषद्‌ सामवेदीय तलवकार बराद्यणकेः अन्तगेत है । 
केनोपनिषद्‌ भी तर्वकारशाखाकी ही दै । इसलिये इन दोर्नोका 
यक ही शान्तिप्राड ड । यह उपनिषद्‌ बइत ही महच्वपूणं दै । इसको 
वर्णन्डी अत्यन्त ऋमवद्ध ओर युक्तियुक्तं है । इसमे तचक्ञान ओर 
तदुपयोगी कभ तथा उपासनाओंका बड़ा विशद ओर विस्वत 
द्णन है । यद्यपि आजकल ोपनिषद कमे ओर उपासनाका भायः 
सर्वथा छोष हो जानक कारण उनके स्वरूप ओर रटस्यका यथावत्‌ 
हान इने-गिने प्रकाण्ड पण्डित ओर विचारकोको दी दै, तथापि 
इससे कोई संदेह नदीं कि उनके मूलम जो भाव ओर उदेदय निहित 
ह उसी आघारपर उनसे परवतो स्मतं कमे पवं पोराणिक सर 
तान्त्रिक उपालना्का आविर्भाव इमा हे । 


अद्धैतवेदाभ्तकी श्क्रियाके अलुखार जीव भविद्याकी तीन 
शक्तियोसे आचरत दै, उह मर, विक्षेप ओर आवरण कटते द । 
इने मक अर्थात्‌ अन्तःकरणकरे मलिन संस्कारजनित दोषोकी 
निवृत्ति निष्काम कर्मसे दोती दै, विक्षेप अर्थात्‌ चित्तचाञ्चस्यका 
नाङ्वा उपासनासे दोता है ओर यावरण अर्थात्‌ स्वरूपविस्खति या 
अह्ञानका नादा ज्ञानसे होता हे! इस भकार चित्तके इन चिविघ 
दोषोके लिये ये अरग-अकग तीन ओषधिं ह । इन तीरनोके दाय 
तीन ही भ्रकारकी गतिर्या दतो द । सकामकर्मा रोग धूममागेसे 
स्वगौदि ोकोको प्रास्त दोकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः जन्म रेते है। 
निष्कामकर्मी ओर उपासक अर्चिरादि मागंसे अपने उपास्यदेवके 
लोकै जाकर अपने अधिकारादुखार सारोक्य, सामीप्य, सारूष्य । 
या सायुज्य मुक्ति पा करते ह । इन दोना गतियो का इस उपनिषद्‌- 
कं पांचवें अध्यायमै विष्टादरूपसे वर्णन किया गया हे । इन दोनोँखे 
अरग जो तच्क्चानी होते है उनके प्राणोका उत्कमण ( रोकान्तरमे 
गमन.) नदीं होता; उनकं शरीर य्ह अपने-अपने तर्वोम लीन 
हो जाते दै मौर उन्हे यहाँ ही कैवल्यपद्‌ प्रत दोता दै । 


[१ सिद्धान्तके ई 
अद्धेतसिद्धान्तके अनुसार मोक्षका साक्षात्‌ साघन ज्ञान ही दे, 
इख विषयमै (ऋते श्चानान्न मुक्तिः ज्ञानादेव तु कैवस्यम्‌' “भथ 


( ४ ) 


येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षव्यलोका अवसितः “सवे पते पुण्य- 
छोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेतिः आदि वहुत-सी श्रुतियाँ प्रमाण 

। निष्काम कमं जर उपासना मल ओर विक्षेपकी निच्र्ति करके 
शानद्वारा मुक्ति देते दै । क्षानसे ही आत्मसाक्षात्कार दोता हे ओर 
फिर उसकी दष्टिम संसार ओर संसारवन्धनका अत्यन्ताभाव होकर 
सर्व अरोषः विरोष-शून्य पक अखण्ड चिदानन्दधन सन्ता ही रह 
जाती हे । इस प्रकार जव उसकी द्म पपञ्च दौ नदीं रहता, तव 
अपना पञ्चकोशात्मक शरीर ओर उसके स्थिति या विनाश दी 
कहां रद सकते है तथा उसके लिये जोचन्मुक्ति ओर विदेदमुक्तिका 
मी प्न नदीं रहता; वह तो नित्य सक्त ही है। उसके इख 
वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण अन्य लोग उसमे जीवन्मुक्ति 
ओर विदेहमुक्तिका आरोप करते ठँ; वद मुक दोता नीं, मुक्त 


क्ञान ही है तथापि ज्ञानप्रा्तिका अधिकार प्रदान कृरनेवारे दोनेकं 
कारण कमं ओर उपासना भी उसदं साधन अवश्य हें । इस शाखामे 
कमनिरूपण पले किया जा का है; अब आस्मज्ञानका निरूपण 
करना हे, इसलिये यद उपनिषद्‌ आरम्भ की गयो दै । इसमे भी 
तरवञानम उपयोगी दोनेक कारण पहले भिन्न-भिन्न उपासना्ओंका 
जिनमे पके पांच अध्यायो मघानतया उपासना्ओंका वर्णन हं 
ओर अन्तिम तीन अघ्यार्योमे श्ञानका । 

सम उपासना ओर ज्ञान दोनों दी विषर्योका वड़ा खुन्द्र 
विवेचन हे । .उन्ह खगमतासे समञ्चानेके ख्ये जगद-जगह कई 
आख्यायिकां भी दी गयी हे, जिनसे उन विषयों हेदयंगम होने 
सदायता मिलनेकं अतिरिक्त कर भकारकी रिक्षा भो मिरतो हे । 
प्रथम अभ्यायमं इभ्यग्राममे रहनेवाले उषस्तिको कथा हे । उषस्ति 


पड़ा कि उन्दे कई दिनोतक निराहार रहना पड़ा । जव प्राणसंकरः 
उपस्थित हआ, तव उन्ोने पक दाथीवानसे जाकर ङ्ङ अन्न मोंगा। 

९ ०क पास ऊ उडद थे; परन्तु वेरच्छिष्ट य, इसलिये उन्हे देनेम 
उसे हिचक दुर । परन्तु उषस्तिने उर्दीको मोँगकर अपने प्रार्णोकौ 


( ५) 
शा कौ । जब वद उच्छिष्ट जक भी देने खगा तो उरे “यदं 
उच्छिष्ट & पेखा ककर निषेधं कर दिथा। इसपर जब 
दाथीवानने शङ्का की कि क्या जूठे उड़द खानेसे उच्छिष्ट-भोजनका 
दोष नदीं हभा ? तो वे बोटे- 
(न वा अलीविष्यमिमानखादन्‌.“““कामो मे उदपानमू' 

घर्थात्‌ इन्हे ल्लाये विना म जीवित नीं रह सक्ता था, जल 
तो सुतर इच्छाजुसार स्त्र मिल सकता है। इस भकार उच्छिष्ट 
जलक्रे लिये निषेध करके उन्दने यद मादौ उपस्थित करः दिया 
कि मयुष्य आचारसम्बन्धो नियर्मोकी उपेक्षा भी तभी कर सकता 
& जब कि उसके विना भाणरश्ताका कोर दूखण उपाय दी न दो। 


पथम अच्यायसरै जो शिलकः, वैकितायन ओर भ्रवादणका 
संवाद्‌ दे तथा पञ्चम अध्यायमे जो उदएलकके साथ भ्राचोनशालादि 
पंच महषियोँने राजा अश्वपतिके पास जाकर वैश्वानर आत्माके 
विषयत जिक्नासा की डे, उन दोनों प्रसं गोसे यद बात स्पष्ट होती 
है कि सनातन शिष्टाचारे अदुखार उपदेश देनका अधिकार 
ब्राहमर्णोको दी दे; परन्तु यदि कोड उच्छृष्ट विद्या किसी अन्य 
द्विजातिके पासदोतोभी ली जा सकती दे । किसी मो कदथाण- 
कारिणी विद्याको ब्रहण करनेके लिये मलुष्यको कितने त्याग, तप, 
खेवा, सत्य ओर विनय आदिक आवदयकृता हे-यद बात कड 
आख्यायिकां प्रददीत की गयी है । राजा जानश्चतिने संवशे- 
विद्याकी भिक ल्ियि गाडीवाले रेक्वका तिरस्कार सहा ओर 
उन्हें बहुत-सा धन, राज्य एवं अपनी कन्या देकर मी उख विद्याको 
अ्रदण किया । इन्द्रे आत्मविद्ाकी भ्ासिके ल्य पक सो पक 
चषेतक ब्रह्मचयेवबतका पारन किया, सत्यकाम जाबालने जब 
अपने गुड हारिद्रुमत गोतमसरे उपनयनके व्यि प्राथंनाकी ओर 
उन्दने उसका गोज पृछा तो उसने उस विषयमे अपने अश्ञानका 
कारण स्पष्ट श्दोम कट दिथा; उसके श्स स्पष्ट कथने दी 
जाचार्यको निश्चय द्यो गया कि यह ब्राह्मण ही है मोर उर्ोन उसे 
दीश्चा दे दी । फिर सत्यकामने गुरुसेवाके पमावसे ही ब्रह्मविद्या 
प्रत्त कर री । सत्यकाम आचाय हारिद्रमतके पास विद्याध्ययनके 
क्थ गया था; भाचायैने उसका उपनयन कर उसे चार सौ गो 
देकर आक्षा दी कि र्हं जंगम छे जाओ; जवतक इनकी संख्या 


( & ) 


वदृंकर पक सल्ल न टो जाय तवतक भत कोटना । बालक 
सत्यकामने शुख्जीके इस आदेशका ध्राणपणस पालन किया ओर 
केवर गोचारणद्धारा दी उसे गुसरृपासे जह्यज्ञान प्राक्त हो गया । 
जिस समय वह गोर्ओंको केकर गुरुजीके पास आया उस समय 
उखके तेजको देखकर उनः भी कहना पडा- 


श्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु ववानुराशास' 


ह सोम्य ! त्‌ ब्रह्मवेत्ता-सा जान पड़ता ह, तुचे किसने 
उपदेशच दिया है इसी प्रकार सत्यकामके शिष्य उपकोसरको 
मी श्रियमालुसषर अधचिहोत्र करते-करते ही शुरङपासे ब्हावियाकी 
सि हो गयी । इन चषटान्तोका माराय यही है कि जिस पुरषका 
जिख समय जो कर्तव्य है उसे उस सभय सवंथा उसीको यथावत्‌ 
रूपसे पालन करना चादिये । अपने क्त॑न्यका यथोचित रीतिसे 
पारन करना ही कर्याणकारक हे । 


सतम जध्यायमे सनत्कुमार ओर नार दका संवाद्‌ है। देवर्षि 
नारदजी आ्मक्ञानको जि्ासासखे खनछकुमारजीकी शरणमे जाते 

। खनलकमारजी पृते दहै तुम सुञचे यह वतलाभो कि कौन-कौन 
विद्याष्‌ जानते हो ? उससे आगे तँ उपदेश करूगा ।' नारदजी 
कहते हभ ऋग्वेद, यजुवद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराण- 
रूप पञ्चम वेदः व्याकरण, ्रादकट्प, गणित, उत्पातक्ञान, निधि- 
राख, तकरा नीतिशाखन, निरुक्त, शिक्षा, भ्रूततन्त, धनुवेद्‌, 
उयोतिष, गाख्ड ओर संगोतविद्यया-ये सव जानता हं ।' ` इतनी 
विया जाननेपर भी नारद्जीको रन्ति नही हे; शान्ति मिके 
कैसे ? किसी राजाको राज्य, वैभव, खी, पु ओर सम्मानादि 
सभी भ्रात 26 परन्तु उसके शरीरम भयंकर पीड़ाहोतो वह सारा 
वैभव भौ उस शान्ति नहीं दे सकता ? इसी ` भकार संसारका 


ः गवानका साक्षात्कार किये 
दःस छरकारा पाना आका्चको चमङ़के समान ख्पेट खेनेकी 
तरह असम्मव टै-- 


यदा चमेवदाकाशं वे्टविष्यन्ति मानवाः । 
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविप्यति ॥ 


( ७ ) 
सीसे नारदजो कते दै - 
सो ह मगो मन्त्रविदेवास्मि ना्मविच्छुतः हयव मे भगवदूटशेभ्य- 
स्तरति शोकमात्मदिदिति सो हं भगवः सोचामि तंमा भगवाञ्छोकस्य 
पार तारयतु । ( ७।१।२ ) 


प्भगवन्‌ ! म केवल शाखक् ह, मारमन्ञ नहीं हं । मैने आपजेसो- 
से सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर छेता हे ओर सुद शोक 
है, इसलिये भगवान्‌ सुञ्चे शोकसे पार करं । इससे थह निश्चय 
हता है कि कवल शाखन्ञानसे संखतिचक्ररूप शोकससुद्रको पार 
नटीं किया जा सकता; इसकं चियि तो अनुभवको आवद्यकता हे। 
जब सर्व॑तन्तरस्वतन्त्र, अशेषविद्यामहाणेव देवषि नारदको भी उनको 
विद्या शन्ति प्रदान नदीं कर सकी तो दम-जेसे साधारण जीर्बोकी 
तो बात दीक्षया हे? 


इख रकार दम देखते द कि इख उपनिषद्‌ बहुत-से उपयोगी 
विषय ह । प्राचीन कालसे दी इखका बहुत मान रहा दे । वेदान्त 
सूर्मि जिन तियो पर विचार किया गया दै उनमै सवसं अधिक 
दसी उपनिषद्की देँ । इसका क्ञानकाण्ड तो जिक्ञास्ुओकी अक्षय 
निधि दे । जो “तच्वमसिः महावाक्य अद्धेतसस्ध्दायमे बह्यात्मेक्य- 
बोधका प्रधान साधन माना जाता हे वह भी इसीके छठे अभ्यायम 
आया दे । वदँ आरणिने भिन्न-मिन्न दृष्टान्त देकर नो बार इसी 
वाकयसे अपने पुत्र च्वेतकेतुको आरमतस्वका उपदेश किया हे। 


ओपनिषद्‌-दशन द सम्यण्द शन हे । इससे भवमयका निराख 
होकर आत्यम्तिक आनन्दकी भ्रासि होती दे । इस ष्टिको भास्‌ कर 
लेना हो मानव-जोवनका प्रधान उदय ह--यदी परम पुरुषाथे हे । 
इसे पाये विना जीवन व्यथं दै, इसे न पा सकना ही सबसे बड़ी 


हानि हे; यदी बात केन-भरति भी कदती है 


इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । ( २।५ ) 


अतः इस दष्िको श्रा करनेके छिये भ्त्येक पुरुषको भ्राणपणसे 
ययतन करना चाद्ये । भगवान्‌ हमे इसे पास करनेकी योग्यता द्‌ । 


| अयुवादक- 





~ ~ कनद कन नन ¬ = - (^ ~ 
काकाः ` नररा 


भीदरिः 


विषय-सूची ` 
विष्य 
१. शान्तिपाठ 


प्रथम अध्याय 
प्रथम लम्ड 
२. सम्बन्ध-माष्य 
३. उद्रीयदष्टिसे ओंकारकी उपासना 
४. उदरी यका रखलमत्व । < 
५. उद्रीयोपाखनान्तर्गत ऋक्‌ , साम ओर उद्रीयका निर्ण 
६. ओंकारं संखष्ट मिथुनके समागमका फट न 
७. उद्गीयदष्टसे ओंकारकी उपाखना करनेा फठ 
८. ओंकारकी समृद्धिरुणवत्ता 
९. ओ कारी स्तुति < 
१०. उद्गीयवियाके जानने ओर न जाननेकाखेके कर्मा मेद 
दवितीय खण्ड 
१9. पराणोपाखनाकी उक्कृषटता सूचित करनेवाटी आख्यायिका 
१२. घाणादिका सदोषत्व ^^ 
१३. मुख्य प्राणद्रारा अबुरोंका पराभव 
१४. प्राणोपासकका महत्व 
१५ भराणको आङ्गिरस संशा होनेमे हेवु 
१६. प्राणकी बदस्मति संखा होनेमे देत 
१७. प्राणकी आयास्य संशा होनेमे देव॒ 


१८. प्राणदष्टिसे ओंकारोपासनाका फडः ०० 


पृष्ठ 
२५ 


४७ 
४९ 
५४ 
9 
५९ 
६१ 
६१ 
६२ 


र न किर च 


( ‰ ) 


त्रतीय खण्ड 
१९. आदित्यदष्टिसे उदगीयोपासना = 
२०. सूं ओर प्राणकी समानता तया प्राणदश्टसे उद्गीथोपासना 
२१. व्यानटदष्टिसे उद्गीथोपासना [न 


२२. व्यानप्रयुक्त दोनेसे वाक , ऋक्‌ › साम ओर उद्गीथकी समानता &९ 


२३. उद्‌गीथाश्चरोमे प्राणादि 
२४. उदुगीथाक्षरोमे चुलोकादि तथा सामवेदादि दृष्टि 
२५९. सकामोपासनाका क्रम 
चतुथं खण्ड 
२६ उदुगीयसंहक ओंकारोपासनासे सम्बद्ध आख्यायिका “““" 
२७. ओंकारका उपयोग गोर महत्व ` = 
२८. ओंकारोपासनाका फक 
पश्चम खण्ड 
२९. ओंकार, उद्गीथ ओर आदित्यका अभेद 
३०. रर्मिदटिसे आदित्यकी व्यस्तोपासनाका विधान ओर फक 
३१. मुख्य प्राणदष्टिसे उद्‌गीथोपासना क 
३२. प्राणभेददष्टिसे मुख्य प्राणकी व्यस्तोपाखनाका विधान ओर फलक 
३३. प्रणव ओर उदूगीयका अभेद्‌ + 
षष्ठ खण्ड 
३४. अनेक प्रकार कौ आधिदेविक उद्गी थोपासनार्े 
सप्तम खण्ड 
३५. अध्यात्म-उद्‌गी योपासना 
३६. आदित्यान्तगंत ओर नेत्रान्तगत पुरषो की एकता 
३७. इनकी अभेददृष्टिसे उपासनाका फक 
अष्टम खण्ड 
३८. उदूगीयोपाखनाकी उक्कृष्टता-प्रद्रिीत करनेके छथि शिलकः, 
दाह्य ओर प्रवाइणका संबाद " 
नवम स्रण्ड 
३९. शिकककी उक्ति--आका ही सबका आश्रय ह 


३1 
६५ 
६७ 
७२ 
७३ 
७७ 


० 
८१ 


-* १०३ 


` १०६ 


र) 


४०. आकाशसंश्क उद्गी थकी उत्कृष्टता ओर उखकी उपासनाका फल ११८ 


द्म खण्ड 
४१. उषस्तिका आख्यान 9 
४८२. राजये उषस्ति ओर छविजोका संबाद र 


१ 
०००४ १२८ ~ 





( १० ) 
एकादश्न खण्ड 
४३. राजा ओर उषस्तिका संवाद 
४४. उषस्तिके प्रति प्रस्तोताका प्रशन 


४५. उषस्तिका उत्तर-ग्रस्तावानुगत देवता प्राण है 
४६. उद्गाताका प्रन 


४७. उषस्तिका उत्तर--उद्गीयानुगत देवता आदित्य है “.- 


४८. प्रतिहतांका प्रन 
४९. उषस्तिका उत्तर--प्रतिहारानुगत देवता अन्न है 
दरादद्य खण्ड 
५०. शओोवसामसम्बन्धी उपाख्यान 
५१. कुत्तोद्रारा किया हुआ हिंकार ` 
श्रयोद्श्च खण्ड 
२" सामाबयवभूत स्तोमाक्षरसम्बन्धिनी उपासना 
५३. स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपाखनाओंका फल 


द्वितीय अष्याय 


५५ 


„9 


ग्रथम खण्ड 
५४. साधुदृष्टिसे समस्त सामोपाखना 
दितीय खण्ड 
५५५. लोकविषयक पाच प्रकारकी सामोपाखना 


+£. आङृत्तिकाछिक अधोमुख कोको पञ्चविघ सामोपासखना 


त्रतीय खण्ड 

५७. बृष्टिविषयक पाच प्रकारकी सामोपासना 
चतुथं खण्ड 

4८. जलबिषयक पोच प्रकारकी सामोपाखना 
पञ्चम सखण्ड 

५९. ऋुतुविषयक पोच प्रकारकी -सामोपासना 
षृष्ठ खण्ड 

६०. पञ्युविषयक पच प्रकारकी सामोपासना 
सप्तम खण्ड 


89. प्राणविषयक पांच पक्तारकी सामोपाखना *“ 


मष्टम खण्ड 


&२. वाणीविषयकं ससि सामोपासना ०५५ 


॥ २) 
` १३३ 
ˆ १३३ 
` १३५ 
९.१४ 
“ १३६ 
` १३६ 


ˆ“ १३८ 
ˆ १४२ 


` १४४ 
“ १४७ 


७१ १ ४ ९ 


“" १५४ 
००४ १ ९4। ९, ७ 


` १५९ 


"“" १६१ 


` १६३ 


` १६५ 


` १६७ 


“ १७० 


भा 


( ११ ) 
नवम खण्ड 
६३. आदित्यविषयिणी सात प्रकारकी सामोपाखना 
दश्नम खण्ड 
६४. सूद्युसे अतीत ससतविघ सामकी उपाखना 
एकादश खण्ड 
&"4. गायत्रखामकी उपाखना 
द्रादश्च खण्ड 
६६. रथन्तरखामकी उपासना 
च्रयोदश्च खण्ड 
६७. वामदेन्यसामकी उपाखना # 4 
चतुर्दा खण्ड 
६८. बृहत्छामकी उपाखना 
पञ्चद्श्च खण्ड 
६९. वरैरूपसामकी उपासना 
षोडश खण्ड 
७०, तैराजसामकी उपासना 
सप्तदश सखण्ड 
७१. शक्वरीसामकी उपासना 
अष्टादश लण्ड 
७२. रेवतीखामकी उपाखना ् 
एकोनविंश खण्ड 
७३. यश्ायज्ञीयसामकी उपासना ९ 
कि खण्ड 
७४. राजनसामकी उपासना 
एकर्विंश्च खण्ड 
७५५. स्वविषयकं सामकी उपासना - ०० 
७६. स्वविषयकं सामकी उपासनाका उत्कं ५ = 
द्वाविंश खण्ड 
७७. विनर्दिगुणविशिष्ट सामकी उपासना °> 
७८. स्तवनके समय ध्यानका प्रकार ००० 
७९. स्वरादि वर्णोकी देवात्मकता ० 
८०. वर्णोकि उच्वारणकालमें चिन्तनीय च ०० 


१७३ 


१८१ 


१८७ 


१८९ 


१९१ 


१९२ 
१९४ 
१९६ 
१९८ 
१९९ 
२०० 
२०२ 


र्‌ 
२०६ 


२०८ 
२१० 
२१० 
२१२ 





( १९६ ) 
श्रयोक्ि खण्ड 


८१. तीन घमस्कन्ध 
८२. चयीविदया ओर व्याहृतिर्योकी उत्पत्ति 
८३. ओंकारकी उत्पत्ति 
चतुरविद्च सण्ड 
८४. सवननके अधिकारी देवता 
<+. साम आदिको जाननेवाला ही यञ्च कर सकता है 
८६. प्रातःसवने वश्ुदेवतासम्बन्धी सामगान 
८७. मध्याहख्वनमें सद्रसम्बन्धी सामगान 


८८, तृतीय सवनम आदित्य ओर विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान 


ठतीय अध्याय 
म्रथमं खण्ड 


८९. मधुविद्या 

९०. आदित्यादिमें मधु आदि दृष्टि 

९१. आदित्यकी पूर्ेदिक्छम्बन्धिनी किरणो मधुनाढ्यादि दष्ट 
द्वितीय खण्ड 


९२. आदित्यकी दक्षिणदिक्सम्बन्षिनी किरणोंमे मधुनाङ्यादि दृष्टि 


तृतीय खण्ड 


९३. आदिव्यकी पश्चिमदिक्घम्बन्विनी किरणो मघुनाब्यादि दृष्टि 


चतुथं खण्ड 

१४. आदित्यकी उत्तरदिक्खम्बन्धिनी किरणोमिं मधुनाल्यादि दृष्टि 
पच्चम खण्ड 

९५. आदित्यकी ऊष्व॑दिक्सम्बन्धिनी किरणोमिं मधुनाल्यादि दष्ट 
षष्ठ खण्ड 

५६. वसुरओंके जीवनाश्रयभूत प्रथमः अमतकी उपासना ˆ“ 
सप्तम खण्ड 

९७. सद्रोके जीवनाश्रयभूत द्वितीय अधृतकी उपासना `“ 
अष्टम खण्ड 

९८. आदित्योकि जीवनाभयभूत तृतीय अभूतकी उपासना.“ 
नवम खण्ड 

९९. मरुद्‌गणके जीवनाश्रयभूत चतुरं अमृतकी उपासना 
दाम खण्ड 

१००. खार्योके जीवनाशयभूत पञ्चम अमतकी उपासना ---- 


२१४ 
२३० 
२३१ 


२३३ 
२३४ 
२३५ 
२३८ 
२३९ 


२४२ 
२४३ 
र 


२४९ 
२५१ 
२५२ 
२५५४ 
२५७ 
२६२ 
२९४ - | 
२६८ 


२७० 





( १३ ) 


एव्दञ्च खण्ड 

१०१. भोग-क्चयके अनन्तर खबका उपसंहार हो जानेपर 

आदित्यरूप ब्रह्म की स्वस्वरूपर्मे स्थिति 

१०२. त्रह्मढोकके विषयमे विद्वानका अनुभव 

१०३. मधुविद्राका फठ्‌ 

१०४; लभ्पदायपरम्परा 
द्राद्श्च चण्ड 

१०५५. गायत्रीद्वारा ब्रह्मकी उपासना & 

१०६. कार्यब्रह्म जौर शुद्धवह्मका मेद 

१०७. भूताकाश्च, देहाका् ओर हृदयाकाश्चका अमेद्‌ 
श्रयोदस्च खण्ड 

१०८. हृदयान्तग॑व पूव॑सुषिभूत प्राणकी उपासना 

१०९. दृद्यान्तग॑त दश्चिणयुषिभूत व्यानकी उपासना ¬ 

९५०. हृदयान्तर्गत पश्रिमसुषिभूत अपानकी उपासना 

१११. इदयान्तरगत उष्ठरसुषिभूत समानकी उपासना 

१२, इदयान्तगंव ऊष्व॑सुषिभूत उदानकी उपासना 

११३. उपयुक्त प्राणादि द्वारपार्खोकी उपाखनाका फक ` 


११४. इदयस्थित मुख्य ब्रह्मकी उपासना ९०० 
११५. हृद्यस्थित परम ज्योतिका अनुमापक लिङ्ख न 
४ 
चतुदश खण्ड 


( शाण्डिल्यविद्या ) 
११६. सर्वदृष्टिसे ब्रह्मोपासना 
११७. समग्र ब्रह्मे आरोपित गुण ^< 
११८. बह्म छोरे-से-छोटः भर बदे-से-वडा हे क 
११९. इदयस्थित ब्रह्म ओर परत्रह्मकी एकता 
प्चदन्न खण्ड 
१२०. विराय्कोशोपाखना 
षोड खण्ड 
१२१. मात्मयश्ञोपासना (2 
सप्तदश्च खण्ड 
१२२. अ्चयादि फर देनेवाटी आत्मयज्ञोगसना 
अष्टादश खण्ड 
१२३, मन आदि दृष्टस अध्यात्म ओर अ!षिदेविकं श्रहोपाखना 


२७२ 
२७२ 
२७४ 
२७५ 


२७८ 
२८४ 
२८५५ 


२८९ 
२९१ 
२९२ 
२९४ 
२९५ 
२९६ 
२९८ 
२९९ 


३०३ 
२०६ 
२११ 
२१२ 


३१६ 


२३२३ 


२३० 


११३८ 


( १४ ) 


एकोनविंश सण्ड 
१२४. भादित्य मोर अण्डटष्टिसे अभ्यारम एवं आषिदैविक उपाखना-^. ३४४ 
चतुथं अध्याय 
म्रथम खण्ड 
१२५. राना जानभुति ओर रैक्वका उपाख्यान “ = ३५२ 
दवितीय खण्ड ° 
१२६. रेक्वके ग्रति लानभुतिकी उपखत्ति ““ “३६३ 
ततीय खण्ड 
१२७. शक्वद्वारा संव्गवियाका उपदेश न १९ 
१२८. संवर्गकी स्तुतिके स्थि मस्यायिका ०० ३७२ 
चतुथं खण्ड 
१२९. सत्यकामका ब्रह्मचयं-पाठन ओर वनम लाकर गौ चराना “~ ३८० 
पत्म लण्ड 
१३०. इषमदवारा सत्यकामको ह्मे प्रथम पादका उपदेश. ~ ३८६ 
षष्ठ सण्ड । 
१३१. अग्निद्धारा ब्र्मके द्वितीय पादका उपदेश ~ 
सप्तम खण्ड 
१२२. हंसद्टारा ब्रह्मके तृतीय पादका उपदेश न ~“ ३९२ 
अष्टम खण्ड 
| १३२. मद्रुदरारा ब्रहमके चदं पादका उपदेश ० „० 
नवम खण्ड 
। १३४. सत्यकामका आचायकुढमे परहुचकर आचायदारा पुन 
उपदेश प्रहरण करना ३९७ 
द्श्चम खण्ड 
१३५. उपकोसलके प्रति अगनिद्रारा नक्षविद्याका उपदेश "^° "न 
एकादश्च खण्ड 
१३६. गा्हपत्याग्निविद्या न्न 
द्वादग्न खण्ड 
१३७. अन्वाहार्यपचनाग्निविद्या क 





४१२ 





१३८. 


११९. 


4.४९, 


१४९. 
१४२. 


१४३. 
१४४. 
१४८९. 


१४६. 
१४७. 


१.४८. 


१४९. 
१५०. 


१५९१. 
१५२. 


१५५३. 


१५४. 
१५५. 
१५६. 


१५७. 


१५८. 


१५९९. 
१६४६०, 


( ५ ) 
च्रयोदश्च खण्ड 
आहवनीयाग्निविद्या भस 


चतुदश खण्ड 
आचा्य॑का आगमन 
आचाय ओर उपकोसलका संवाद 
प्चदश्च खण्ड 
आचा्यका उपदेश-नेत्रस्थित पुरूषकी उपासना“. 
ब्रह्मवे्ताकी गति ४ 
षोडश्च खण्ड 
यश्ञोपासना 
रक्षके मोनमज्गसे यशकी हानि 
ब्ह्माके मौनपाटनसे यशकी प्रतिष्ठा 
सप्तदश्च खण्ड 
यश्च दोषके प्रायश्चितरूपसे व्याहतिरयांकी उपासना" 
विद्धान्‌ बरह्माकी विशिष्टता 5 


पचम अन्याय 

प्रथम खण्ड 
ख्येषठभेष्ठादिुणोपासना 
इन्दरिर्योका विवाद 
प्रनापतिका निणेय 
वागिन्द्रियकी परीश्चा 
चक्षुकी परीश्चा 
ओ्रकी परीक्षा 
मनकी परीश्चा 
प्राणकी परीश्चा ओर विजय 
इ्धिर्योद्वारा प्राणकी स्वति 


द्वितीय खण्ड 
प्राणका अननिरदेश 
प्राणका वखनिर्देश 
प्राणविद्यादी स्तुति ए 


॥ 811 


४१६ 
४१७ 


४२० 


४२३ 


४२८ 
४३० 
४३२ 


" ४३४ 
४३८ 


४४ 
४४४ 


४४८ 
४४९ 
४४९ 


४/९. 


४५२ 


४६९० 
४६३ 
१११०. ॥ 1 ६४ 


( १६ ) 
ततीय खण्ड 
१६१. पाञ्चाछोकी सभामें श्वेतकेतु 
१६२. प्रवाहणके प्रश्न ००५ 
१६३. प्रवाहणसे पराभूत श्वेतकेठका अपने पिताके पास आना 
१६४. पिता-पुत्रका प्रवाहणके पास आना 
१६५५. प्रवाहणका वरप्रदान 
चतुर्थं खण्ड 
१६६ पञम प्रशनकां उत्तर 
१६७. लोकरूपा अग्निविद्या 
पञ्चम खण्ड 
१8८. पर्जन्यरूपा अग्निविद्या ~“ ~ 
षष्ठ खण्ड 
१६९. प्रथिवीरूपा अग्निविद्या 
सप्तम खण्ड 
१७०. पुरषरूपा अग्निविद्या 
` अष्टम खण्ड 
१७१. खीरूपा अग्निविद्या 
नवम्‌ खण्ड 
१७२. परञ्चम आहूति पुरषत्वको प्रा हूए आपकी गति 
द्म खण्ड 
१७३. प्रथम प्रदनका उत्तर ~ 
१७४. तृतीय प्ररनका उत्तर ग 
८ देवयान ओर धूमयानका व्यावत॑नस्थान ) 
१७५५. द्वितीय प्ररनका उत्तर 9 
८ पुनरावतैनका क्रम ) 
१७६. अनुशयी जीर्वोकी कर्मानुरूप 


१७७. चतुथ प्रदनका उत्तर ०० 


( अशखरीय प्वृत्तिवालोकी गति ) 
१७८. पांच पतित 
१७९. पञ्चाग्निवियाका महत्व 


४७२ 
४७३ 
४७५ 
७७ 
४७९ 


४८१ 
४८३ 


४८७ 
४८९ 
४९१ 
४९३ 
४९६ 


८१९०० 
५१०९ 


५१४ 


५२९ 
५२१ 


५३४ 
५३५ 


( १७ ) 


एकादश्च चण्ड 

१८०. जौपमन्यव आदिका आत्ममीमांसाविषयक्‌ प्रस्ताव ~" ५५३६ 

१८१, ओपमन्यवादिका उदाठकके पास आना = " ५३८ 

१८२. उद््‌ाठकका ओपमन्यवादिके सहित अश्वपतिके पाख आना “““ ५५३९ 

१८२. अश्वपतिद्वारा शरुनिर्योका स्वागत ~ ४० 

१८४. अङ्वपतिके प्रति मुनिर्योकी प्राथ॑ना = . ^ ५४२ 

१८५. राजाके प्रति मूनिरयोकी उपस्ति ~ ` “~ (५४8 
द्रादश्च खण्ड 

१८६. अश्वपति ओर ओपमन्यवका संवाद - = ५४५ 
त्रयोदश्च खण्ड 

१८७. अश्वपति ओर सत्ययशका संवाद ~ "५४९ 
चुं खण्ड 

१८८. अश्वपति ओर इनद्रयुम्नका संवाद ( ५ 0 
पञ्चदश सण्ड 

१८९. अश्वपति ओर जनका संवाद "५५३ 
षोढङ्गा खण्ड 

१९०. अरवपति ओर बुडिकका सवाद्‌ न 
सप्तदश खण्ड 

१९१. अश्वपति ओर उदाककका संवाद न 
अष्टादश्च खण्ड 

१९२. अरवपतिका उपदेश वैश्वानरी खमस्तोपाखनाका फ ˆ“ ५५९ 

१९३. बैदवानरका साङ्गोपाङ्ग स्वस्प == “~ ५६१ 
एकोन्विस खण्ड 

१९४. भोजनकी अग्नहोत्रत्सिद्धिके टये श्राणाय स्वाश' इख पदी 

आहुतिका वणन -“ ५६३ 

विंश खण्ड 

१९५. “न्यानाय स्वाहाः इस दूखरी आइतिका व्ण "न 
एकविं खण्ड 


१९६. अपानाय स्वाहा, इल तीसरी आहतिका वणेन “” `" ५९९ 








(न) 
द्वावि्च खण्ड 


१९७. समानाय स्वाहा' इस चौथी आहुतिका वर्णन 
। श्रयोविशि खण्ड 


१९८. उदानाय स्वाहाः इस पांचवीं आहुतिका वर्णन “““ 


चतुविंश खण्ड 
१९९. अविद्वान्‌के हवनका स्वरूप 
२००. विद्वान्‌के वनका फल 


षष्ट अध्यायं 
प्रथम खण्ड 
२०१. आरूणिका अपने पुत्र श्वेतकेत॒के प्रति उपदेश 
द्वितीय खण्ड 
२०२. अन्य पक्के खण्डनपूंक जगत्‌की सदरपताका समर्थन 
4 ततीय खण्ड 
२०३. खष्टिका क्रम 
चतुथं खण्ड 
२०४. एकके ज्ञानसे सबका लान 
पश्चम खण्ड 
२०५५. अनन आदिके त्रिविध परिणाम 
षष्ठ खण्ड 
२०९. अन आदिका सूक्ष्म भाग ही मन आदि होता 8.5 
सप्तम खण्ड 
२०८. षोडशकठाविशिष्ट पुरषका उपदेदय 
अष्टम खण्ड 
२०७. सुषुप्तिकाटमें जीवकी स्थितिका उपदेश भध 
नवम खण्ड 
२०९. सुषुप्तिमे सत्‌ की प्रापिका शान न दोनेमे मघु- 
मक्ियोंका दष्टन्त ~+ ^“ 
दश्चम खण्ड 
२१०. नदौके द्टान्तदवारा उपदेशा 
एकादग्र खण्ड ` 
२११. इष्षके ट्टान्तद्वारा उपदेश 
¦ द्वादश्च खण्ड 
२१२. न्यग्रो्फठके इष्न्तद्वारा उपदेश द 


६७ 


५१६८ 


५६९ 


५६९ 


"७३ 


८२ 


६०४ 


६१३. 


६२३ 


६२९ 
६३२ 


६४० 


६६२ 


६६८ 


६७९१ 


६७8६ 


(^) 


श्रयोदश्च खण्ड 
२११, कवणके दष्टान्तद्वारा उपदेश 
चतुर्दश खण्ड 


२१४. अन्यत्रसे लाये हु पुरूषके इष्टान्तद्वारा उपदे "““ 


पञ्चदश खण्ड 
२१५. ममू पुरुषके दष्टान्तद्वारा उपदेश्च 
षोडश्च खण्ड 
२१६. चोरके तप्त परदयुग्रहणके दन्तद्वारा उपदेश 
सष्मं अध्याय 
प्रथम खण्ड 
२१७. नारदके प्रति सनत्कुमारका उपदेश 
दवितीय खण्ड 
२१८. नामकी अपेश्चा वाककी महत्ता 
ततीय खण्ड 
२१९. वाककी अपेक्षा मनकी भेता 
चतुथं खण्ड 
२२०. मनसे संकल्पकी भर्ता र 
पञ्चम खण्ड 
२२१. संकृत्पकी अपेश्चा चित्तकी प्रघानता = 
षष्ठ खण्ड 
२२२. चित्तकी अपेश्चा ध्यानका महत्व कः 
सप्तम खण्ड 


२२३. ध्यानसे विज्ञानकी महत्ता 
अष्टम खण्ड 


२२४. विज्ञानसे बकी भेता 
नवम खण्ड 
२२५. बरकी अपेक्षा अननकी प्रषानता 
दश्चम खण्ड 
२२६. अन्नकी अपेक्चा जठका महत्व 
एकादश्च खण्ड 
२२७. जककी अपेक्षा तेजकी प्रधानता > 
द्रादश्च खण्ड 
२२८. तेजसे आकाशकी प्रधानता + 


+ । ०१९९९ 


६८० 


६८५ 


६९४ 


६९८ 


७१० 


७२१ 


७४ 


७२७ 


७१४ 


७३८ 
७४२ 
७४५५ 


७४९ 


७९२ 








८ + 


त्रयोदश्च खण्ड 

२२९. आकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्व 
चतुदश खण्ड 

२३०. स्मरणसे आशाकी महत्ता 
पञ्चदश्र खण्ड 

२२१. आशासे प्राणका प्राधान्य 
षोडश खण्ड 

२३२. सत्य ही जानने योग्य है 
पप्तदश्च खण्ड 

२२२. विज्ञान दी जानने योग्य है 
अष्टादश खण्ड 

२२३४. मति ही जानने योग्य है 
एकोनक्ि खण्ड 

२२३५. श्रद्धा ही जानने योग्य है 
विश्च खण्ड 

२३६. निष्ठा दी जानने योग्य है 
एकर्विश्च खण्ड 

२३७. कति दी जानने योग्य है 
द्वा्िश्च खण्ड 

२३८. सुख ही जानने योग्य हे 
त्रयो खण्ड 

२३९. भूमा टी जानने योग्य है 
चतुविंश खण्ड 

२४०. भूमाके स्वरूपका प्रतिपादन 

पव्चविशच खण्ड 

२४१. सर्वत्र भूमा ही है 
षटि खण्ड 

२४२. इख प्रकार नाननेवाटेके छथि फलका उपदेश 

अष्टम अध्याय 

म्रथम खण्ड 

२४३. दहरःपुण्डरीकमे ब्रह्मकी उपासना 


२४४. पुण्यकरम॑फर्लेका अनित्यत्व ् 


७६१ 


७६४ 


७६७ 


७७४ 


७७६ 


७७९ 


७८० 


७८१ 


७८२ 


७८३ 


७८५ 


७८६ 


७९२ 


७९८ 


८०२ 
८१९ 


। 1 0 


२४५. दहर-ब्रद्मकी उपासनाका फक = 
२४६. 
२४७. 
२४८. 
२४९. 


२५०. 


२५१. 


२५२. 


२५२. 


२८५४. 


२५५. 


२.५६. 


२५७. 


२८ 


( २१ ) 
द्वितीय खण्ड 


त्रतीय खण्ड 
असत्यसे आङ सत्यकी उपासना ओर नामाक्चरोपासना 
चतुथं खण्ड 
सेवुरूप आत्माकी उपासना 
पञ्चम खण्ड 
यज्ञादिमें ब्रह्मचर्यादिदृष्टि 
षष्ठ खण्ड 
हृद्यनाडी ओर सूर्यरदिमरूप माग॑की उपासना 
सप्तम खण्ड 
आत्मतच्वका अनुसंधान करनेके ल्यि इन्द्र ओर विरोचनका 
प्रजापतिके पास जाना ४५ पः 
अष्टम खण्ड 
इनदर तथा विरोचनका जठके शकोरेम अपना प्रतिबिम्ब देखना.“ 
नवम खण्ड 


इन्द्रका पुनः प्रजापतिके पास आना 
दश्चम खण्ड 

इन्द्रके प्रति स्वप्नपुरुषका उपदेश = 
एकादञ्च खण्ड 

सुषुप्त पुखुषका उपदेश = तः 
दरादञ्च खण्ड 

मरत्य॑शारीर आदिका उपदेश मि (८ 
श्रयो . खण्ड 

“श्यामाच्छबलम्‌ः इस मन्तरका उपदेश ~~ 
चतुदश सखण्ड 

कारणरूपसे आकासं क नद्मका उपदेश क 
पञ्चदश खण्ड 

. ओंत्मज्ञानकी परम्परा, नियम ओर फलका बणंन ˆ“ ^“ 


द 


८२१ 


८२६ 


८२६ 


८४२ 


प्म 


८६५ 


८७६ 


८८७ 


८९४ 


९०१ 


९२७ 


९२३९ 


९४ 








केशाः कञ्जालिकासाभाः 
कमन्जाम्बुनगोकसः । 

विविगोपतयो ददुः 
करकारिपिनाकिनिः ॥ 
















भाष्यकार भगवान्‌ शङ्कर 


छ 


ॐ 


तत्वद्‌ब्रह्मणे नमः 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


मन्त्रा, शाङ्करमाष्य जर माष्या्थंस्हित 


--~ वनय 


सच्चिदानन्दसान्दराय स्वातीताय साक्षिण । 
नमः श्रीदेशिकन्द्राय शिवायाशिवघातिने॥ 


क 
शान्तिपाट 
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणशवकषुः श्रोत्रमथो बल 
मिन्द्रियाणि च सर्वाणि । स्व॑ ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराया मा 
मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि 
निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ 
ॐ शान्तिः! शान्तिः ॥| शान्तिः | 


मेरे [हाथ-पोव आदि] अङ्ग सब प्रकारे पुष्ट हो, वाणी, पाण, नेव 
जीर श्रोत्र पुष्ट हो तथा सम्पण इन्दयो बर भाप कर । उपनिषदुम भति 
पादित ब्रह्म ही सब कुछ दे । मे ब्रह्मका निराकरण (याग). 









प्रथम अध्याय 


[कौ क री 


गथक खणड 


अक 


सम्बन्ध-भाष्य 


ओमित्येतदक्षरमित्यादय्टा- | 
ष्यायी छान्दोग्योपनिषत्‌ । 
बस्याः सक्षपतोऽ्थजिहासुभ्य 
ऋनुविवरणमस्पग्रनथमिदमा- 
रम्यते । 

तत्र सम्बन्धः-समस्तं कर्मा 


धिगबं प्राणादि- 

देवताविज्ञानसित- 
म्चिरादिमार्गेण बद्मप्रतिपत्ति- 
कारणम्‌ । केवर च धूमादिमा- 


प्रयोजनम्‌ 


गेण चन्दरलोकप्रतिपत्िकारणम्‌। | चन्दरोकक़ी 
जो इन दोनों मगेसि पतितएवं स्वभावा- 


स्वभावम्वृ्तानां च मार्गदय- 


परिभ्रष्टानां कष्टाधोगतिरुक्ता । 


'ओमित्येतदक्षरम्‌ः इत्यादि मन्त्रसे 
आरम्भ होनेवाला यह आट अध्यार्योका 
भ्रन्थ छान्दोग्य उपनिषद्‌ है । उसका 
जथ जाननेकी इच्छावालेके किये इस 
छोटे-से म्रन्थके रूपमे उसकी सरह 
व्याख्या सक्षेपसे आरभ्भ की जाती है। 

वहां [ कर्मकाण्डके साथ ] इसका 
सम्बन्ध इस प्रकार है-[ विहित घौर 
निषिद्ध रूपसे ] जाने हए समस्त 
कमक प्राणादि देवताओंके विज्ञान- 
पूवंकअनुष्ठान करनेपर वह रचि भादि 

दिवयान) मागंके द्वारा ब्र्मरोकक्णी 
भा्तिका कारण होता है तथा केवर 
(उपासनारहितं) कमे धूमादि मार्गते 
प्रातिका हेतु होता है। 


यसार भवतत होनेवाले होते है उनकी 
कष्टमयी अधोगति बतलायी गयी है । 


ण्ड 1 


शाङ्लमाष्याथ 


£ 


७ 


9 9 2 9 9 9 = क = 9 3 क 3 9 = 


ज चोभयोमागंयोरन्यतर- 
स्मि्रपि मागं आत्यन्तिकी 
पुरुषार्थसिद्धिरित्यतः कम॑निर- 
वक्षमदरेतात्मविक्तानं संसार- 


नतित्रयहैतपमर्देन वक्त व्यमित्यु- 
षनिषदारभ्यते । 


न चादेतात्मविज्ञानादन्यत्रा- 
त्यन्तिकी निःश्ेय- 
मोष्चसाषगत्वम्‌ स॒प्रा्िः । वक्ष्यति 
हि-अथ येऽन्यथातो विद्रन्य- 


ानस्येव 


शजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति । 


( छा० उ० ७। २५।२) 
विपयंये च “स स्वराड्भवति" 
(छा० उ० ७।२५।२ ) इति । 


तथा देतविषयानृतामिसंधस्य 
वन्धनं तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे 
बन्धदाहभावः संसारदुःखप्राधि- 


रेत्युक्त्वादेतात्मसत्याभिसंध- 


इन दोनों मागेमिंसे किसी भी एक 
मार्गपर रहनेते आत्यन्तिक पुरुषा्थ॑कौ 
सिद्धि नहीं हो खकती । अतः संसार- 
की [उपर्युक्त] त्रिविध गतिर्योके हितु- 
मूत कर्मका निराकरण करते हूए 
कर्मकी अयेक्षासे रहित शदरैत-भाल- 
जञानका प्रतिपादन करना है; इरी 
उदश्वसे इस डपनिषदा भारम्ब 
करिया जाता है । 

उद्वैतातमविज्ञानके बिना ओर 
किसी प्रकार आत्यन्तिक कल्याणकी 
प्राति नहीं हो सकती । लैसा कि 
भागे करटैगे भी-“जो रोग इष 
(भद्रैतासन्ञान) से विपरीत जानते है, 
वे अन्यराज (अनात्माके भीन) होते 
ओर क्षीण होनेवाठे लोकम जते 
ह ।” किंतु इससे विपरीत आत्म 
ज्ञान होनेपर [ श्रुति कहती है कि] 
“वह्‌ स्वराट्‌ होता है १ 


इस प्रकार त्पे इए प्रञ्ुको 
अहण करनेसे चोरके जल्ने भौर 
बन्धनम पड़नेके समान द्वेतविषय- 
रूप मिथ्याम अभिनिवेश्च रखनेवाठे 
पुरुषका बन्धन होता दहै तया 
उसे संसारिक दुःखोकी भराति 
होती दहै--यह बताकर भरति 


२८ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय १ 


स्यातस्करस्येव तप्तपरसुग्रहणे 
बन्धदाहाभावः संसारदुःखनि- 


वृ्तिमक्षिथेति । 
अत॒ एव न करमसहमावि- 
क्मशचय- बद्वेतात्मद्दोनम्‌ । 
निराकरणम्‌ क्रियाकारकफलभे- 
दोपमर्देन ““सत्‌'"'एकमेवाद्वि- 
तीयम्‌"! (छा० उ० ६।२। १) 
“आत्मेवेदं सवम्‌" (खा० उ० 
७।२५।२ ) इत्येवमादिवाक्य- 
जनितस्य बाधकप्रत्ययानुप- 

` पत्तेः । कर्मविधिग्रत्यय इति 
चेत्‌ ! न, कठमोक्टस्वमाव- 
विक्तानवतस्तजनितकर्मफलरा- 
गद्धेषादिदोषवतश्च कर्मविधा- 
नात्‌ । 
विधानादद्रेतजञानबतोऽपि कमे 
तिच्‌! 


यद्वत आत्मारूप परम सव्ये प्रतीति 
रखनेवाटे पुरुषको, जो पुरुष घोर 
नदी है उसके तप्त परञ्च महण करने- 
पर॒ दाह ओर बन्धन न होनेके 
समान, संसार-दुःखकी निवृ्ि 
ओर मोक्षकी प्राति बतलवेगी । 


इसीसे [ अर्थात्‌ कर्मं ओर ज्ञान 
दोनों विरुद्ध॒फल्वले रै-रेसा 
निश्चय होनेके कारण दी] उद्वैतास- 
दशन कर्मके साथ होनेवाला नही 
है। कथोकि क्रिया, कारक ओर 
फर्छप मेदका वाध करके सत्‌ 
[ ब्रह्म ] एक ओर अद्वितीय है" 
“यह सव॒ आत्मा ही हैः इत्यादि 
प्रकारके वाक्योसे उदत्न होनेवाछे 
अद्वैत आलसमज्ञानका कोई बाधक 
मल्यय होना सम्भव नहीं है । यदि 
कहो किं क्मविधिविषयक ज्ञान ही 
[ उसका बाधक ] है तो एेसा 
होना भी सम्भव नहीं है, क्योकि 
जो जपनेको स्वभावसे ही कर्ता 
भोक्तारूप जानता है ओर उससे 
होनेवाटे कर्मकर्म रागदवषप 
दोसे युक्त है, उसीके ल्यि करम- 
का विधान क्रिया गया है । 
शङ्का-जो सम्पूणं बेदार्थको जानने- 
ण हे स्यि कर्मका विधान 
1 गवादे; इसण्यि अद्रैतातमज्ञानी- 
कोभीतो करम करना ही चाहिये ? 


खण्ड १] 


श्ाङ्र्भाच्याथं 


2९ 


न; कर्माधिकृतविषयस्य कत- 
भोक्तादिज्ञानस्य स्वाभाविकस्य 


“सत्‌ एकमेवाद्वितीयम्‌! ध 
"आत्मैवेदं सवम्‌" इत्यनेनोप- 


मदितत्वात्‌ । तस्मादविधादि- 
दोषवत एव कर्माणि विधीयन्ते 


नादेतक्तानवतः । अत एव हि 
वक्ष्यति-““सवं एते पुण्यलोका 


भवन्ति ह्मसंस्थोऽस्रतत्वमेति"" 


( जछ° उ० २।२३। १) 
इदि । 
=, (~ न्दे विद्याप्रकरणे 
तत्रेतस्मिनदतविद्याप्रकरणे- 


प्रकरणप्रति- ऽभ्युद्यसाधनान्यु- 


पायनिस्पणम्‌ पासनान्युच्यन्ते । 
कैवल्यसंनिकृष्टफलानि चादेता- 


दीषद्विकृतव्रह्मविषयाणि मनो- 
मयःप्राणशरीर इत्यादीनि, करम- 
सम्द्धिफलानि च कर्माङ्गसम्ब- 


न्धीनि । रहस्यसामाल्यान्मनो- 
 इृत्तिसामान्याच; यथाद्ेतन्ञानं । 


समाधान-न्हीं, क्योकि कके 
अधिकारीसे सम्बन्ध ॒रखनेवाख 
कवरल-भोकतृ त्वादि रूप स्वाभाविक 
विज्ञान “सत्‌ [ ब्रहम ] एक ओर 
अद्वितीय हे” “यह सव आत्मा हो 
हे'" इत्यादि वाक्योसे बाधित हो 
जाता है । इसल्यि कर्मोका विधान 
अविद्यादि दोषवान्‌ पुरषके स्यि ही 
किया गया है, अद्ैतासन्ञानीके स्यि 
नहीं किया गया । इसीर्यि श्रति 
आगे कटैगी-“ये सव [कर्मकाण्डी] 
पण्यलो्कोको प्राप्त होते है तथा 
ब्रह्मनिष्ठ [परमहंस] अमतत (मोक्ष) 
को प्राप्त होता हे |" 
वहो इस अद्रैतदिदाविषयक 
प्रकरणम अभ्युदयको साधनमूता 
उपासनाएं बतलथी जाती है, जिन- 
का फलु कैवल्यमोक्षका समीपवतीं 
हे ओर जो अद्रेत्रहमकी अपेक्षा 
मनोमधः प्राणहयरीरः, इत्यादि 
वाक्योके अनुसार कुछ विकारको 
प्रप्त हुए ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवारी 
है । वे उपासना कमङ्गसे सम्बद्ध है 
ओर करमपरकी समृद्धि ही उनका फल 
हे । करयोकि रप्यमे [ अर्थात्‌ उप- 
निषद्‌ शब्दसे ज्ञातव्य होनेमे ] तथा 
मनोवरत्तिरूप होनेमे उन (आसज्ञान 
ओर उपासनाओं ) में समानता है 
[इसीसे वे उपासना आत्विदयाके 
प्रकरणम रक्खी गयी है ] । जिस 





| 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय १ 


ऋ 
९ 


मनोवृत्तिमात्रं तथान्यान्यपयुपा- | भकार अदवतजञान मनोदृपिमात्र ह 


सनानि मनोबृ्तिरूपाणीत्यस्ति 
हि सामान्यम्‌ । कस्तदयदेतन्ञान- 
स्योपासनानां च विशेषः ! 
उच्यते-- 


स्वाभाविकस्यात्मन्यक्रिये- 
शनोपाखनबो-ऽभ्यारोपितस्य कर््रा- 
वि्ेषः दिकारकक्रियाएल- 
भेदविज्ञानस्य निवतंकमदेतवि- 
ज्ञानम्‌, रज्ज्वादाविव सर्पाद्य- 
ध्यारोपलक्षणज्ञानस्य रज्ज्वादि 
स्वरूपनिश्वयः प्रकाशनिमित्तः । 
उपासनं त॒ यथाजाखरसमथितं 
किञ्चिदालम्बनगुपादाय तस्मिन्‌ 
समानचित्तवृत्तिसंतानकरणं त- 


ल (~ 


दिरक्षणम्रत्ययानन्तरितमिति ` 
विषः । 


तान्येतान्युपासनानि स्न- 
धुद्धिकरत्वेन वस्तुतच्चावभास- 
कत्वादद्ेतत्तानोपकारकाण्याल- 
म्बनविषयत्वात्सुसाध्यानि चेति 


- पूर्युपन्यस्यन्ते । तत्र क्माम्या- है 


उसी प्रकार अन्य उपासनाएे भी 
मनोषृत्तिूप ही है--यही उन दोनो. 
की समानता है । तो फिर बद्रेतञ्चान 
भर उपासना्भोमं अन्तर क्या षै ! 
स्लो बतसया जाता - 
भदरेतामञ्ान अक्रिय आत्म 
स्वमावसे ही रोपित कर्ता भादि 
कारकः,क्रिया भौर ॒फरके मेदज्ञान- 
की निवृत्ति करनेवाखा ठै, जिस प्रकार 
फ प्रकशके कारण होनेवाख रज्जु 
आदिक स्वषूपका निश्चय रज्जु भादि- 
म आरोपित सर्पादिके ज्ञानको निवृत्त 
करदेता है। रितु उपासना तो 
किं्ी शखोक्त आरम्बनको ग्रहण 
फर उसमे विन[तीय प्रतीतिसे 
अग्यवदहित सदश चित्तपृत्तिका 
परबाह करना है- यही इन दोनोमे 
अन्तर है । 
वे ये उपासना चित्त्ुद्धि 
करनेवाली होनेसे बस्तुतस्वकी 
भकारिका होनेके कारण अद्वैत- 
नमे उपकारिणी रै तथा आलम्बन- 
यक्त होनेके करण घुगमतासे 
सम्पन्न की जा सकती है-इसीरिये 
इनका पहङे निरूपण किया जाता 
। वहं [ साघारण पुर्पमिं ] 


सस्य॒दृदीकृतत्वात्कमंपरित्या- 


गेनोपासन एव दुःखं चेतः- 
त 0 (~ माङ्गवि 

समपंणं कतुमिति कर्माङ्गविषय- 

तावदादावुपासनष्ुषन्य- 


मेव 
स्यते- 


कमभ्यासकी इढ़ता होनेके कारण 
कर्मका परित्भाग करके उपासनारमे 
ही चित्तको लगाना त्यन्त कठिन 
षै । इसीसे सवते पढे कम्ग- 
सम्बन्धिनौ उपासनाका दी उन्टेल 
किया जाता है-- 


उद्गीथदष्टिसे जोकारकी उपासना 
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति 
हयद्गायति तस्योपग्याख्यानम्‌ ॥ १ ॥ 
ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इसफी उपा्चना करनी चाहिये । ॐ 
पेसा [उच्चारण करके यज्ञमे उद्गाता] उद्गान ( उच्चस्वरसे सामगान ) 
करता है । उस ८ उदूगीथोपसना) की ही व्याख्या की जाती ह ॥१॥ 


ओमित्येतदक्षरमुद्रीथयुपासी- 
त॒ । ओमित्येतदक्षरं परमा- 
त्मनोऽभिधानं नेदिष्ठम्‌ । 
तस्मिन्हि प्रयुज्यमाने स 
प्रसीदति ग्रियनामग्रहण इव 
लोकः । तदिहेतिपरं प्रयुक्त 


मभिभायकत्वाद्ष्यातितं 


उद्गीथशब्दवाच्य “ॐ इस 
अक्षरी उपासना करे-ॐ यह 
अक्षर परमात्माका सबसे समीपवर्ती 
८ प्रियतम ) नाम हे । उसका प्रयोग 
(उच्चारण) किया जानेपर वह प्रसन्न 
होता हे,निस प्रकार कि साधारण रोग 
अपनाप्रिय नाम उच्चारण करनेपर 
प्रसन्न होते है । वह ओंकार यहाँ 
( इस मन्त्रम ) इतिपरक ८ जिसके 
आगे इति शब्द्‌ है; एेसा ) प्रयुक्त 
हा है । अर्थात्‌ परमाताका भभि- 


धायक होनेके कारण इतिशब्दद्वारा 


गब्दस्वरूपमाध्रं प्रतीयते । 
चाचादिवत्परस्यारमनः 


व्यावर्तत ८ प्रथक्‌ निर्दिष्ट ) होकर 
वह केवर शब्दस्वरूपसे प्रतीत 
होता हे ओर इस प्रकार वह मूरति 


| 
| 


| ३२ 
प्रतीक सम्पद्यते । एवं नामत्वेन 
म्रतीकत्वेन च परमात्मोपासन- 


साधनं श्रेष्टमिति सववेदान्तेष्व 
वगतम्‌ । जपकर्मस्वाध्याया- 
न्तेषु च बहुशः प्रयोगास्र- 
सिद्धमस्य श्रेष्चम्‌ । 
अतस्तदेतदक्षरं वर्णात्मक- 
मदरीथमक्त्यवयवत्वादुद्रीथ- 
शब्दवाच्यमुपासीत । क्माङ्गा- 
वयवभूत॒ अकारे परमात्म- 
प्रतीके दृटामैकाग्ररक्षणां 


मतिं संतटुयात्‌ । स्वयमेव 


 भरुतिरोङ्कारस्योद्रःथशब्दवाच्य- 
त्वे देतुमाद- ओमिति दद्रा 


यति । ओभित्यारम्य हि 


यस्मादुद्रायत्यत उद्धीथ ओङ्कार 
इत्यर्थः | 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अन्याय १ 


~अ 
आदिके समान परमात्ाका प्रतीकं 


टी सिद्ध होता है । इस तश नाम 
ओर प्रतीकरूपसे वह परमालाकष 
उपासनाका उत्तम साधन दै-पसा 
सम्पूणं बेदान्त-मरन्थोमिं विदित है । 
जप, कर्म ओर स्वाध्यायके आदि 
एवं अन्तम इसका बहुधा प्रयोग 
होनेके कारण # इसकी श्रेष्ठता 
प्रसिद्ध हे। 

अतः वह यह षर्णह्धप अक्षर 
उदूगीथमक्तिका अवयव होनिके 
कारण “उद्गीथः शब्दवाच्य दै, 
इसकी उपासना करे । अर्थात्‌ 
[ उद्गीथ- ] कर्मके अङ्गमूत ओर 
परमात्माके ' प्रतीकस्वरूप ओंकारे 
पु्दर॒एकाप्रतारूप बुद्धिको भवि- 
च्छिन्न भावसे संयुक्त करे । ओंकारके 
उद्गीथः शब्दवाच्य होनेमे श्रुति 
स्वयं ही हेतु वतलाती है-ॐ ठेसा 
कहकर -उदगान करता है-क्योकिं 
उद्गाता ॐ इस अक्षरसे आरम्भ 
करके उद्गान करता हे, इसल्थि 


ओंकार न | शार वीय ह) हे। 
® जेसा किं भगवानने मी कदा दै-- 


तस्मादोमिव्युदादहृत्य 


` यज्ञदानतपःक्रियाः । 


्रवतन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌ ॥ ( गीता १७ । २४ ) 
` इसलिि वेदमन्वंका उच्चारण करनेवाठे भध पुरुषोकौ शालविधिसे नियत 


यज्ञ, दान ओर तपल्प क्रियाएे खदा "ॐ इस परमात्माके नामको उच्चारण 


करके दी आरम्भ होती रे |? 


¶ सामवेदीय स्तोत्रविशेषका नाम उद्गी यभक्तिः 
ह । इसलिये इसे उद्गीय कदा गया ह । 


है । ओंकार उसका धशा 


ख्ड १ | श्ञाङ्करभाष्या्थं । 
ॐ 2 9 क ॐ > ॐ ॐ क ॐ > ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ. ॐ 9 
तस्योपव्याख्यानम्‌-तस्याक्षर- | [ यहो ] उसका उपन्याख्यान 
आरम्भ किया जाता है-उस अक्षरकी 

स्योपव्यारयानमेवमुपासनमेवं- | सम्यग्‌ व्याख्या कौ जाती है । स 
प्रकार उसकी उपासना होती दै, यह 

विभूत्येवंलमित्यादिकथनयुप- | उक विमूति दे ओर्‌ बह फक ई 
इत्यादि प्रकारका जो कथन दै,` 

व्याख्यानम्‌ उसे उपव्याख्यान कते ह । यँ 

, श्षतैत शृति ्रवर्तते' ८ आरम्भ किया नाता दै ) 


बाक्यरेषः ॥ १ ॥ यह्‌ क्रियापद वाक्यशेष है ॥ १ ॥ 








उद्रीथका रसतमत्व 
एषां भूतानां एथिवी रसः एथिव्या आपो रसः। 
अपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो 
वाच ऋस यः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः॥२॥ 


इन [ चराचर ] प्राणियोका परथिवी रस ( उत्पत्ति, स्थिति ओर 
रुयका स्थान ) द । एरथिवीका रस जक दै, जलका रस॒ ओषधिं है, 
ओषधियोंका रस पुरुष दै, पुरुषका रस वाक्‌ दै, वाकका रस ऋक्‌ हे, 
छक्का रस साम है भौर सामका रस उद्गीथ हे ॥ २॥ 


एषां चराचराणां भूतानां | इन चराचर मर्तोका परथिवी रख 
. | गति-परायण अर्थात्‌ आश्रय `हे । 

परथिवी ए गतिः ६५. एथिवीका रस आप्‌(जक) है, क्योकि 
म्भः । पृथिव्या अपो रसोऽपस | परथिवी जरम ही ओतपोत कै, 
हि ओता च प्रोता च पृथिवी, | सख्यि वह एथिवीका रस दै । 
अतस्ता रसः प्रथिव्याः । अपा- | मका रस॒ ओषधियां है, कयाकि 
मोषधयो रसः, अष्परिणामत्वा नातिवा व श 

:\ ~ 


उन ( ओषध्यो ) का रसं 
दोषधीनाम्‌ । तासां पुरुषो रसः, ह, क्योकि पुरुष नरदेह ) न 


अननपरिणामत्वासुरुपस्य | | ह परिणाम ह । 


३४ 
9 ¬-ऋ 


[ अध्याय १ 


तस्यापि पुरुषस्य वाग्रसः, | उस पुरुषका भी रस वाक्‌ है| 


पुरुषावयवाना हि वाक्सारिषठा, 
अतो वाक्‌ पुरुषस्य रस उच्यते । 
तस्या अपि वाच ऋग्रसः सार 


तरा। ऋचः साम रसः सार- 
तरम्‌ । तस्यापि साम्न उद्रीथः 


प्रकृतत्वादोकारः सारतरः ॥२॥ 
एवम्‌- .. 


पुरुषके अवयरवोमे वाक ही सवसे 
अधिक सार वस्तु है, इसलिये वाक्‌ 
पुरुषका रस कही नाती है । उस 
वाणीका भी उससे अधिक सारभूत 
ऋक्‌ ही रस है, ऋका रस 
साम हे नो उससे भी अधिक सारतर 
वस्तु ह तथा उक्त सामका भी रस 
उद्गीथ (ॐध्कार) हे । यँ उदुगीथ 
राब्दसे ओंकार ही लेना चादिये; 
क्योकि उसीका प्रकरण है, यह 


सामसे भी सारतर है ॥ २॥ 
| इस प्रकार ~ 


स पष रसान! रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो | 


यदुद्गीथः ॥ ३ ॥ 


यह जो उद्गीथ है वह सम्पूणं रसेमिं रसतम, उक्कृष्ट, परमात्माश्न 
प्रतीक होने योग्य ओर एथिवी [ आदि रसोमे ] आवो है ॥ २ ॥ 


वह यह उद्गीथसंज्क ओंकार । 
भूत आदिके उत्तरोत्तर रसम अतिशय 
रस अर्थात्‌ रसतम है, परमात्माका , 
प्रतीकं होनेके कारण परम (उट । 
है, पराध हे--अरथं कहते है स्थानकरो , 
जो पर होते हुए अधं भी हो उसका । 


स॒ एष उद्वीथाख्य ॐकारो 
भूतादीनामुत्तरोत्तररसानामति- 
शयेन रसो रसतमः परमः 
प्रमात्मप्रतीकल्वात्‌ । परारध्यः- 
अधं स्थानं परं च तदर्ध 
च प्राधं तदतति परार्ध्यः 
परमात्मस्थानाहः परमात्मबद्पा- 
स्यत्वादित्यभिप्रायः । अष्टमः 
पृथिव्यादिरससंख्यायां यदुद्रीथो 
य उद्रीथः ॥ २ ॥ 


नाम पराध हे, उसके योग्य होनेसे यद 
पराध्यषे;तासयं यह है कि परमातमा 
के समान उपासनीय होनेके कारण 
यह परमात्मा आलम्बन होने योग्य 
हे । तथा यह्‌ जो उदुगीथ है पथिवी 


आदि ररसोकी गणनामे आखव हे॥३॥ 


| 





खब्ड १] छाङ्करभाष्याथं ३९ 
८-9-89 
उद््गीोपासनान्तगत ऋक्‌, साम ओर उद्गीथक्षा बिणय 


वाच ऋग्रस इत्यक्तम्‌-- वाणीका रस क्‌ दै-सा 
कटा गया-- । 

कतमा कतमक्रतमत्कतमत्साम कतमः कतम 

उदृगीथ इति विस््ठं भवति ॥ ४ ॥ 

` अव यह विचार किया जाता दै कि कौन-कौन-सा ऋक्‌ है, कौन- 

ङोन-सा साम है ओर कौन-कौन-सा उदूमीथ है £ ॥ ४ ॥ । 

सा कतमा छक्‌ ! कतम- | कौनसी वह क्‌ हे, कोन-सा 

सत्याम! कतमो वा स उद्धीथः १ | बह साम दै ओर कौनसा ब 

तीया उदूगीथ दै! कतमा-कतमा' (कौन- 

कतमा कतमेति वीप्सादराथा । | दोन) यह द्विरुक्त दरक स्थि । . 

शङ्का-“वा बहूनां जातिपरिपरभे 

इतमच्‌, # (५ । ३।९३. ) इस 

पाणिनीय सुत्रके अनुसार अनेक 

जातिके छोरगमिंसे किसी एक जातिका 

बहुलम्‌ , कथं डतमच्योगः १ | निश्चय कटनेके लियि प्रभ होनेपर 

८इतमच्‌' प्रत्ययका प्रयोग इष्ट माना. .. 

गया दै, तु यहाँ छग्जातिकी बहु- 

ठता सम्भव नहीं है, फिर (उतमचः 

भ्रत्ययका प्रयोग कैसे किया गया ! 


ननु "वा बहूनां जातिपरििने 


डतमच्‌ ।' न त्र ऋग्जातिः , 


[9 
क इस सूत्रका तात्पर्यं यह है कि जहां विभिन्न जातिरयोकरे अनेक पदार्थं 


होते है बहो किसी एक जातिके पदार्थ॑का निश्चय करनेके लिये प्रभ्र उपस्थित 
होनेपर “डतमच्‌” प्रत्ययका प्रयोग किया जाता है । जिस प्रकार कट आदि 
बूत सी वेदशाखा है, उनका स्वाध्याय करनेवाटे द्विज लोगोकी जाति उन्दी 
श्ाखाओंके नामसे प्रसिद्ध हुदै रै । उनमेसे कठ जातिका निश्चय करनेके लिये 
ही "कतमः कठः एेखा प्रश्न किया जा खकता है । परंतु यर्ा तो ्रुगवेद्‌ एक 


शी जाति दै, फिर उसमे “उतमच प्रत्यया भयोग कैसे शो खकता र { 


छाः उ २- 


नैष दोषः; जातौ परिप्ररनो 
जातिपरिप्ररन इत्येतस्मिन्विग्रह 


जाताव्रण््यक्तीनां बहुत्योपपत्तेः। 


न॒ त॒ जतिः पसिद्न इति 
विगृह्यते । 
ननु जातेः परिप्रश्न इत्य- 


स्मि विग्रहे कतमः कट इत्या- 
चयुदाहरणयुपपन्नम्‌, जातो परि- 


प्रन इत्यत्र तु न युज्यते । 
तत्रापि . कटादिजातावेव 


व्यक्तिबहुत्वाभिप्रायेण परिपररन 


इत्यदोषः । यदि जातेः परििरनः 


स्यात्कतमा कतमर्भित्यादावुप- 
संख्यानं कतंब्यं स्यात्‌ । विमृष्टं 


मवति विमदः कृतो भवति |४।॥ 


1 ~ 


| रहन माना जाय तो _कोन-कौन्‌ 


| ३६ ऊॐन्दोग्योपनिषद्‌ [ 
| 3 
|| १ 


न 9 "~ ~+ 
@ तात्पयं यह है कि यदि यक्षं नस्ति 


समाधान-यह कोई दोष नदीं है 
करयोकि "जातिपरिपश्न इस पदा 
(जाति परिप्रश्नः सा विग्रह करने- 
पर्‌ ऋक्‌ जाति ऋक्‌ व्यक्तो 
(विभिन्न चार्थो) कौ अनेकता तो 
सम्भव है ही; यहाँ 'जातिका परि 
म्रः एेसा किप्रह नहीं किया नावा। 
राङ्ा-क्रितु (नातिका परिश्ः 
एसा विग्रह करनेपर ही कतमः कटः” 
(भपमे कटशालावास्र कौन ई ? ) 
इत्यादि उदाहरण सम्भव हो सकता 
दे, जातिमे परिमरश्ष' रेसा विग्रह 
होनेपर यह उदाहरण नक्ष दिवा 
जा प्षकता । 
समाधान-वहोँ मी कटादि जातिमे 
ही व्यक्ति्योकी बहुरुताके अभिप्रायसे 
पेसा प्रभ किया गवा है-यह मान 
रेनेसे कोर दोष नहीं आता । यदि 
यह प्रभ (ऋगादि-) जातिसे सम्बन्धं 
रखता तो पूर्वोक्त सू्तसे कौन-कौन 
ऋक्‌ हे' इत्यादि उदाहरण सिद्ध न 
होनेके कारण उसके ल्थि किसी प्रथक्‌ 
सूत्रफा विधान क्रिया जाता। # [अथ 
यह्‌] विग्रष्ट होता है अर्थात्‌ इसका 
विचार किया जाता है ॥ ॥ 


= 
भरन न मानकर जातिसम्बन्धी 


नक्‌ हं १ यह प्रश्न असंगत हो जाता है; 


क्योकि श्रुक्‌ एक जाति है, उसमे रहनेवारे 


वाटे भिन्न-भिन्न मन्नोकी ए्रथक्‌-षथक्‌ 


जाति नदी है । अतः यं ऋक्त्वजातिविरिष्ट मन्बरूप ग्यक्ति्योके विषयमे ही 


। घ्न किया गया ह, एेखा मानना चाहिये | ` 


+ 


खण्ड १] शाङकराभाष्यारथं ३ 


आल ह 2 ~ आ ॐ > 2 > ॐ ॐ थ 
विम हि कृते सति प्रति- | इस प्रकार विचार करने 
ही यह प्रतिवचन ८ उत्तर ) खूप 
वचनोक्तिरुपपनना-- उक्ति संगत हो सकती है कि- 
वागेव. प्राणः सामोमित्येतदक्षरसुदमीथः । 
तदवा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्चकं. च साम च ॥५॥ 
वाक्‌ ही ऋक्‌, पराण साम है जर ॐ यह्‌ अकषर उद्गीथ दे। 
ये नो ऋक्‌ जोर सामरूप वाक्‌ भौर प्राण है, परस्पर मिथुन (जोड) है ॥५॥ 
बरोबर. प्राणः साम. ओमि- | , वाणी दी ऋक. दै, प्राण साम 
है तथा ॐ यह अक्षर उद्गीथ है । 
त्येतदक्षरमुद्ीथ इति । वाग | स्स प्रकार वाक्‌ ओर ऋककी एकता 
होनेषर भी [तीरे मन्त्रम बताये 
चोरेकत्वेऽपि नष्टमत्वन्याघातः, | हुए उद्‌गीथके] अष्टमतवका व्याधात्‌ 
६ _ | नहीं होता, क्योकि यह पूर्व वाक्यसे 
पूवेस्माद्वाक्यान्तरत्वात्‌; आप्त | भिन्न. वचन त 'ओमित्येतदक्षर- 
मुदुगीथः यह वचन ओंकारके व्याि- 
गुणसिद्धये हि ओमित्येतदक्षर- | गुणकी सिद्धिके णिये प्रयुक्त हुआ दे 
[ओर दवितीय मन्त्र उसके रसंतम- 
ुद्रीथ इति । तवका प्रतिपादन करनेके स्यि दै] । 
वाक्माणादृक्सामयोनी इति | वाक ओर प्राण कमः ऋक. 
९ ओर सामके कारण ह । इसल्मि 
वागेवक प्राणः सामेतयुच्यते । | वाक ही चछक्‌ दै ओर साम भाण है- 
देसा कहा जाता है । क्रमशः ऋक्‌ 
ओर सामके कारणरूप वाक 
यहे हि समासानां सेषं | नोर , भाम हण , कलस 
सम्पण छक. ओर सम्पूणे सामा 
च साम्नामवरोभः इतः स्यात्‌ । । अन्तमा हो ज्ञाता है, तथा 


यथाक्रमभृकक्ठामयोन्यो्वाक्प्राण- 


२८ 


ध्यानां सव॑क्मणामवरोधः 
कृतः स्यात्‌ । तदवरोधे च सर्वे 
कामा अवरुद्धाः स्युः । ओमि- 
सेतदक्षरमुद्ीथ इति भक्त्या- 
शङ्का निवत्यते । 


तदा एतदिति मिथुनं निदिं 
र्यते किं तन्मिथुनम्‌ ? इत्याह- 


यद्वाक्च प्राणश्च सर्वक््सामि- 
कारणभूतो मिथुनम्‌ । ऋक्च 


साम चेति ऋक्सामकारणात्र- 
क्सामब्दोक्तावित्य्थः ।-न तु 
स्वातन्त्येण ऋक्च साम च मिथु- 
नम्‌। अन्यथा हि वाक्च प्राणे 
त्येकं मिथुनगक्साम चापरं मिथु- 
नमितिदे मिथुने स्याताम्‌। तथा 
.चतद्वैतन्मिथुनमित्येकवचननि- 

देशोऽ्नुपपन्नः स्यात्‌ । तस्मादू- 
क्सामयोन्योर्वाकप्राणयोरेव मिथु- 
नत्वम्‌ ॥ ५ ॥ 


ॐ दव धकार समं जमनम तस्ति त्न इस प्रकार सम्पूणं कामना्ो 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 
सवक. सामावरोधे चक्समसा- ` 
| अन्तभवि 


[ अध्याय 
> >< >>> 
सम्पूणं सामका 
होनेपर ऋक्‌ ओर 
सामसे सिद्ध होनेवाटे सम्पूरणं करमो 
का अन्तर्माव हो जातादहै, ओर 
उनका अन्तभवि होनेपर समस्त काम- 
नाण उनके अन्तत हो नाती है ।# 
“उद्गीथः रब्दसे सम्पूर्ण उदृगीथ- 
भक्तिन ठे री जाय, इस आशङ्का 
को ओम्‌ यह अक्षर ही उद्गीथद, 
एेसा कहकर निवृत्त किया जाता है। 

तद्रा एतत्‌ः इत्यादि वाक्ये 
मिथुनका निदंश किया जाता है । वह 
मिथुन कौन हे १ यह बतलाते है 
यह जो सम्पूणं ऋक्‌. ओर सामके 
कारणमूत वाक्‌ ओर प्राण है 
मिथुन है । क्‌ च साम च, इसमे 
इकः ओर सामके कारण ही चक्‌ 
जर सामशब्दोसे कटे गये है । चक्‌ 
ओर साम स्वतन्त्रतासे मिथुन नहीं 
है नदी तो वाक्‌ ओर प्राण यह्‌ एक 
मिथुन तथा ऋक्‌ जीर साम-यह 
दूसरा मिथुन इस भरकार दो मिथुन 
होते; ओर देषा होनेप्र “तद्रा 
एतन्मधुनम्‌" इसः वाक्यभे जो 
एकवचनका निर्देश किया गया है, 
वह असंगत हो जाता । अतः छक 
सामके कारणभूत वाक्‌ ओर 
भाण द्वी मिथुन है ॥ ५ ॥ ` 


सभ्ूणं ऋक्‌ ओर 


ग पराति 
व्यापिशगविरिष्ट दय सिद्ध होत्रा हे | "घडा जारण दोनेवाडा ओंकार 


न= --------- ---------- -- 


खण्ड १ | 


५ 
लाङ्रभाष्याथ 2३९ 


ओ में संसृष्ट मिथुनके समागमका फट 


तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिननक्षरे 


स<खजञ्यते 


यदा वै मिथुनो समागच्छत आपयतो वें ताव- 


न्योन्यस्य कामम्‌ ॥ ६ ॥ 


वह॒ यह मिथुन ॐ इस अक्षरम संखष्ट होता है । जिस सुमय 
मिथुन ८ मिथुनके अवयव ) परस्पर मिरुूते है उस समय वे एक-दूसरेकी 
कामना्ओंको प्राप्त करानेवाले होते दै ॥ ६ ॥ 


तदेतदेवलक्षणं मिथुनमोमि- 


 त्येतसिमिन्नक्षरे संचज्यते। एवं 


सर्वकामावाचिगुणविशिष्टं मिथुन- 


मकारे संसृष्टं विद्यत इत्योका- 


रस्य सवंकामावासिगुणवन्चं 


प्रसिद्धम्‌| वाड्मयत्वमोकारस्य 


प्राणनिष्पाद्यत्वं च मिथुनेन 
संसूष्टत्वम्‌ । 

मिथुनस्य कामापयितृत्वं प्र- 
सिद्धमिति दृष्टान्त उच्यते-यथा 
लोके मिथुनो मिथुनावयवो स्री- 
पुंसौ यदा समागच्छतो ग्राम्य 
धर्मतया संयुज्येयातां तदापयतः 
प्रापयतोऽन्योन्यस्येतरेतरस्य तौ 
कामम्‌ । तथा च स्वात्माचु- 


विटेन मिथुनेन सरवकामाि- 


वह यह एसे रक्षणवाखा मिथुन 
ॐ इस अक्षरम संयुक्त होता हे । 
इस प्रकार सम्पूणं कामनाओंकी 
प्रापिषूप गुणसे युक्त मिथुन ओंकार- 
मे संयुक्त रहता है, इसल्यि ओकार- 
का सम्पूर्णं॑कामनाओंकी प्रापतिरूप 
गुणसे युक्त होना सिद्ध होता हे । 
ओंकार वाडमय हे ओर प्राणसे 
ही निष्पत्न होनेवाखा है--यही 
उसका मिथुनसे संयुक्त होना हे । 

कामनार्ओंको भराति करा देना यह 
मिथुनका प्रसिद्ध ध्म है-इस विषयमे 
दृष्टान्त बताया जाता है- जिस 
प्रकार रोकमें मिथुन यानी मिथुनके 
अवयवमूत सरी ओर पुरुष परस्पर 
मिरुते है--आम्यव्यवहार(रति) के 
स्यि आपसम संसगं करते दै, उस 
समय वे एक दूसरेकी कामना पूणं 
कर देते है । इसी प्रकार अपनेसे 
अनुपरविष्ट मिथुनके द्वारा ओंकारका 


४० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अभ्याय १ 
< << < ऋऋ > 
गुणवत्वमोकारस्य सिद्धमित्य- ! सम्पूणं कामनार्ओकी प्रािद्प गुणसे 
यक्त होना सिद्ध होता है--यह 
इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥ 

---अन वद ्-9-- 


उद्रीथटषटिसे ओकारकी उपास्तना करनेका एल 
तदुपासकोऽप्युद्राता तद्धर्मा | उस (ओंकार) का उपास 
। उदुगाता भी उसीके समान धर्मस युक्त 
भवतीत्याह-- । होता दै, यह बतलाया नाता है- 


आपयिता ह वे कामानां भवति य एतदेवं 
विद्रानक्षरमुदगीथमुपास्ते ।॥ ७ ॥ 


जो विद्रान्‌ ( उपासक ) इस प्रकार इस उद्गीथरूप अक्षरकी उपा- 
सना करता हे, बह सम्पूणं कामनाओोंकी प्राति करानेवाला होता हे ॥७॥ 


आपयिता ह॒वै कामानां यजमानकौ कामनाओंको प्राप्त 

करा देनेवाख होता है। तात्पय॑ 

यह है किजो इस प्रकार इस 

मेवमा्षियुणवदुद्रीथरपास्ते त- | आपिगुणवान्‌ अक्षर उदृगीथकी 

£ | < उपासना करता है उसे यह पूर्वोक्त 
थोक्तं न > / ८-५ 

स्वतद्थाक्त फलमित्यथः । तं | फर परा होता हे, जैसा कि 


यथा यथोपासते तदेव भवति, “उसकी जिस-जिस प्रकार उपासना 
करता दे वैसादही हो नाता है" 
(म० जरा° २०) इति श्रुतेः ।॥७॥। । इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ ७ ॥ 


भ 


ओकारकी समृदधिगुणवत्ता 





भिप्रायः ॥ ६ ॥ 


यजमानस्य भवति । य एतदक्षरं 


८ मकार सयदि गुणवाद 
समृडगुणनां भकारः, कथम्‌ है, सो किस त वाद्य भी 


न~ ~ 


खण्ड १1 ्ाङ्रमाष्याथे ४९ 


तद्रा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि कि चानुजानास्योमि- 
त्येव तदाह एषा एव सखद्धिय॑दनुज्ञा । समधयिता 
ह वे कामानां भवति य एतदेवं विद्रानक्षरमुद्गीथ- 


मुपास्ते ॥ < ॥ 


वह यह ओंकार ही अनुज्ञा ( अनुमतिपूचक ) क्षर दै । [मनुष्य] 


किसको जो कुछ अनुमति देता है तो ए 
मह अनुज्ञा ही समृद्ध है। नोः 
उदुगीथ जक्षरकी उपासना करता द, बह निश्चय ही 


मृद्ध करनेवारा होता है ॥ ८ ॥ 
तद्रा एतखकृतमनुराक्षरम- 


नु्ञा च साक्षर च तत्‌ । अलुक 


, चानुमतिरोङकार इत्यथः । कथ- 
अलुकता१ इत्याह भ्रुतिरेव यद्वि 
दवि च यत्कि च रोके ज्ञानं धनं 
वानुजानाति विद्रान्धनी वा 
तत्रानुमति ङुषन्नोमित्येव तदाह । 


तथा च वेदे-(्रयन्िशदित्यो- 
मिति होवाच" (° उ० २। 
९।१) इत्यादि । तथा च 
लोकेऽपि तवेदं धनं गृह्णामीद्युक्त 
ओमित्येवाह । 


( हो) रेसा दी कहता है । 


इस प्रकार जाननेबाखा पुरुष हस 


सम्पूणं कामनार्थोको 


वह यह ओंकार ही, जिसका भ्रक- 
रण चर रदा है, अनुज्ञा्षर है । जो 
अनुज्ञा हो ओर अक्षर भी हो उसे 
अनुनञक्षर कहते है । अनुज्ञा अनुमति. 
का नाम दै, अर्थात्‌ ॐकार अनुज्ञा 
हे । वह अनुज्ञा किस प्रकार ै १ 
सो स्वयं श्रुति दी बतसखती है-- 
लोकम कोई विद्वान्‌ या घनी पुरुष 
निस किसी ज्ञान अथवा धनके स्यि 
अनुमति देता है तो उस सम्बन्धे 
अपनी अनुमति देते हुए वह ॐ” 
फसा ही कहता हे । तथा वेदम भी 
“तेतीस रेसा कहनेपर [ शाकल्यने ] 
ॐ ठेसा कहा" # इत्यादि उदा- 
हरण है ओर रोकमे भी म तेरा 
यह धन लेता ईह ेसा कडनेषर 
ॐ (ह) एसा दी कडते है । 





® शाकृल्यनामक एक बराह्मणे. याशबल्क्यसे पूछा कि कितने देवता हँ १ 
उसके उ्वरमे माञ्जवल्क्यने क्टा-“ततीसः । तब शाकल्यने “ॐ पेखा कफर 


अपनी सनुमति प्रकट की । 


( बृहदारण्जकोपनिषद्‌ ) 


४२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अर्ध्याथं १ 
= 5 2 > ~> > > < -<>ऋ--< <-> ह. 4 
अत एषा उ एवेषव समृद्धि- | ` अतः "एवा उ एक अर्थात्‌ यही 
ध समृद्धि है। जो कि अनुज्ञा कहलती 
यदनुज्ञा; यानुज्ञा स समरद्धिस्त- | दै । जो अनुज्ञ है वही समृद्धि दै, 
क्योकि अनुज्ञा समृद्धमृरुक़ होती 
"मूरत्वादनुज्ञायाः । सख्द्धो | है । समृद्ध पुरुष ही ॐ एसी 
अनुज्ञा देता है । अतः तात्पथं यह है 
चोमित्यनुनञां ददाति । तस्मात्‌ | कि ओंकार सभृद्धि गुणवाद । नो 
। ^ | फला जाननेवाढा परुष इस उदूगीथ 
सभृद्धिगुणवानोङ्कार इत्यथः । | जक्षरकी उपासना करता है, ` बह 
समद्धिगुणयुक्त वस्तुका उपासक 
समृद्धिगुणोपास॒कत्वात्तद्र्मा सन्‌ | दोनेके कारण उसके ही समान 
समधेयता ह वे कामानां यज- | भर्मवाला होकर अपने यजमानकी 
मानस्य भवति य एतदेवं | कामना्ओंको समृद्ध ८ पूणं ) करने- 
विद्रानक्षरथुदरीथयुपास्त इत्यादि | वाला होता दै-ङ्यादि पूर्ववत्‌ 
पूर्ववत्‌ ॥ ८ ॥ जानना चाहिये ॥ ८ ॥ 
ओकारकी स्तुति 
अथेदानीमक्षरं स्तोत्युपास्य- | इसके बाद अब श्रुति उस अक्षर 
उतपन्न {४ ख्य 
त्वात्मरोचनार्थम्‌ | उसकी स्तुति करती हे, क्योकि 
॥ ) ०. वह उपास्य हे । कैसे स्तुति करती 
तनयं द [ यह बतति है ]-- 
तेनेयं जयी विद्या वर्तत ओमित्याश्रावयत्यो- 
मिति शसत्योमितयुद्गायत्येतस्येवाक्षरस्यापचित्यै 
` महिम्ना प्न ॥ ९॥ 
„ -उस जक्षरसं ही यह [ऋगवेदादिरूप] जयीविदया प्र 
ॐ देसा कहकर दी [ अध्वर्युं ] नो कम करता च , ् 
कहकर दी होता शंसन करता षै तथा ॐ ठेसा कहकर दौ उद्गाता 
उद्गान करता दै ।, इस अक्ष [ परमात्मा ] की पूनाके कथि ही 
[ सम्पूणं वैदिक कर्म है ] तथा इसीकी महिमा ओर रस ( बीहि-यवादि 
हवि ) के द्वारा [ सव कम॑ भ्दृ् होते दै ] ॥ ९ ॥ 


खण्ड १] काङ्रभाष्याथं ४३ 

तेनाक्षरेण प्रकृतेनेयम्ण्वेदा- | उस प्रक्रत अक्षरसे दी यह 
त्रयीविद्या अर्थात्‌ 
तरयीवि्यासे विधान क्रिया हुआ करम 
रतत होता है, कर्कि आश्रावण 
आदि कर्मोद्भारा स्वयं त्रयीविद्या ही 
प्रवृत्त नहीं हुआ करती । हां, यह 
परसिद्ध दही दहै कि कमम इस प्रकार 
प्रवृत्त हुआ करता है । किंस प्रकार 
[ सो बतछते है-- ] ॐ एसा 
कृकर [अध्वयुं } आश्रावण करता 
हे, ॐ एसा कहकर [होता] शंसन 
करता है ओर ॐ णेसा कहकर 
[उद्‌ग।ता] उदूगान करता है । इस 
प्रकार आश्रावणओआदि तीनों कमेकि 
समाहारषूप लिङ्ग# (रक्षण)से जाना 
जाता है कि यह सोमयागका वणनहै। 

तथा वह॒ क्म भी इस अक्षरकी 
| ही अपचिति-पूनके च्यि हे, 
क्योकि वह परमामाका प्रतीक हे, 
अतः उसकी पूना परमाताकी ही 
पूना हे; जैसा कि “अपने करमसे 
उसका पूजन करके मनुष्य सिद्धि 
काम करता है” इस स्प्रतिसे सिद्ध 
होता है । 

















दिलक्षणा त्रयीविद्या त्रयी- 


[ 6 ~ क 9 


विन्राविहितं कर्मेत्यथः । न दि 


(~ (0 


तरयीविवेवाश्रावणादिभिवतंते । 
कमं तु तथा प्रवतंत इति प्रसि- 
द्म्‌। कथम्‌ १ ओमित्याश्रावयत्यो+ 
मिति शंसत्योमिद्युदगायतीति 


लिङ्गाच्च सोमयाग इति गम्यते । 
तच्च ॒कमेंतस्येवाक्षरस्यापचि- 


त्यै पूजार्थम्‌ । परमात्मग्रतीकं 


दि तत्‌ । तदपचितिः परमात्मन्‌ 
(0 
एव सा । “.स्वकमणा तमभ्यच्यं 


सिद्धि विन्दति मानवः" (गीता 

१८ । ४६) इति स्प्रतेः । 
कि चैतस्यैवाक्षरस्य महिम्ना | तथा इस अक्षरकी महिमा- 
महरवेन ऋचविग्यजमानादि- | महत्व. यानी ऋलिन्‌ एवं यजमान 
® अष्वयं होता ओर उद्राता--इन तीनोके जच क्त संर ज्वाता- सन तीनोकि करमाका समादयर दर्शपूर्णमास 


आदिमे सम्भव नहीं ै। अयिशेम आदि यज्ञौमे ही जो सोमयागसंस्थाके 
अन्तर्गत र॑ उसकी सम्भावना है । अतः. यहो उक्त तीनों कार्योके समाहाररूप 
छग ( लक्षण ) से यह सूचित होता है कि यहां ॐ्कारसे आरम्म होनेवाे 
त्रयीवि्या-विदहित कम॑-सोमयागका ही बणन है । 


७४ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अच्याय १ 
प्राणेरित्य्थः । तथेतस्येवाक्षरस्य | आदिक पराणोसे दी तथा इस अक्षरे 
रस-- ब्रीहि-यवादिरससे निष्प 
रसेन व्रीहियवादिरसनिशर॑तेन | हुए हविष्यसे ह [तैदिककम सम्प 
होते है] । [तो क्यावे प्राण ओर 
इविषेत्यथः; यागहोमा्क्षरेण | हवि उद अक्षरके विकार & ! 
इसपर कहते रै-] वे याग. 
क्रियते । तच्वादित्ययुपतिष्ठते । | होमादि इस अक्षरके उच्चारणपू वंक ही 
किये नते है | वे कर्म आदिल्यको 
ततो वृष्टथादिक्रमेण ब्राणोऽन्नं | प्रा होते है । फिर उससे बृष्टि 
आदि क्रमसे प्राण जौर अन्नकी 
च जायते । प्राणेरमनेन च यज्ञ- | उत्पत्ति होती है तथा पराण ओर 
उन्नसे यज्ञका अनुष्ठान क्रिया जाता 
स्तायते । अत उच्यते अक्ष- | ३। इसीर्यि इस अक्षरकी महिमासे 
रस्य महिम्ना रसेन" इति ॥९॥ | जर रसस एेसा कहा गया है ॥९॥ 


उद्गीथविवाके जानने ओर न जाननेवाठेके कर्मकरा मेद 
तव्राक्षरविज्ञानवतः कमं कतं- । पेसी अवस्थामे नते असर 
विज्ञान है उसीको कर्म करना 
चादिये--इस अवस्थामे श्रुति 
आक्षेप करती हे-- 

तेनोभो कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद्‌ । 
नाना तु विया चाविद्या च यदेव विद्यया करोति 
श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेत- 
मा भवति ॥१०॥ ॑ 

इस (अक्षर) को इस 

ववो हो क अन हे र ध 
दोनों भिजत [परदे] ह । ो मं [वष 


युक्त होकर किया जाता है वही प्रबरुतर्‌ होता हे, इस मरकर निश्चय ही 
यष्ट सन इस अक्षरकी ही व्याख्या हे ॥ १० ॥ 











व्यमिति स्थितमाक्षिपति - 


खण्ड १ | 


शाकरमाष्याथं 


४५ 


तेनाक्षरेणोभौ यश्चेतदक्षरमेवं 
व्याख्यातं वेद यथ कर्ममात्र- 
विदक्षरयाथात्म्यं न वैद तावुभौ 
कुरुतः कर्म । तयो कर्मसाम- 
थ्यदिव फं स्याक्कि तत्रा्षर- 
पाथातम्यविज्ञानेनेति । दुष्टं हि 
लोकै हरीतकीं भक्षयतोस्तद्रसा- 
भिङ्धेतरयोविरेवनम्‌ । नेवम्‌ , 
यस्माक्नानातु विद्या चाविध्याच 
भिमे हि विद्याविद्ये । त॒ शब्दः 


पक्षव्याघृत्यथंः । 
न ओंकारस्य कर्माङ्त्वमाश्र- 


विज्ञानमेव रसतमापिस्दधिगुण- 
वद्विज्ञानम्‌, षि तिं १ ततोऽ 


भ्यधिकम्‌ । तस्मात्तदङ्गाधिक्या- 
त्फलाधिक्यं युक्तमित्यभिप्रायः। 
दृष्टं हि रोके वणिक्छबरयोः 


उस अक्षरके द्वारा दोनों दी 
प्रकारके रोग क्म करते है; [कोन- - 
कौन १] ८१) जो इस अक्षरको 
जैसी कि ऊपर ष्याष्या की गयी दहै 
उसौ प्रकार जानते है; बौर (२) 
लो केवरु कर्मो ही जनते है, 
अक्षरे मथाथं स्वरूपको नहीं 
जानते, वे दोनों दही कर्मानुष्ठान 
करते ६ । [ भव यदि को कटे 
कि] उने कर्मके सामथ्यंसेः ही 
फलकी प्रापि हो जायगी, भक्षरफे 
याथास्यको जाननेकी क्या भावहम- 
कृता है, क्योकि शोकम हरौतकौ 
(हर) के रसको जाननेवले ओर न 
जाननेवाले इन दोनोको दी हरीतकौ 
खनेसे दस्त होते देखे गये ईै- 
तो रेसा कहना दीक नर्ही, क्योकि 
विद्या भौर अविघा इन दोनो भेद 
है- विदा ओर अविद्या दोनों ही 
मिन्न-मिन्न है 1 (तु, शब्द्‌ पक्षी 
व्यावृत्ति करनेके स्यि है । 

ओंकार रसतम तथा आपि ओर 
समृद्धि इन गुणेसि युक्त है पेसा 
जानना उसे केवर कमङ्गिमात्र 
जाननेके ही तुल्य नदी है, तो 
फिर कैसा है १ उससे सब प्रकार 
बदा हु हे । अतः अभिप्राय यह 
हे कि कमङ्गज्ञानसे उक्कृष्ट होनेके 
कारण उसके फलकी उक्कृष्टता भी 
उचित दी, है । रोके यह देखा ही 
गया है कि व्यापारी ओर भीक 


४६ छान्दोग्योपनिषद्‌ 


> >~ ~> ऋ 


[ अध्याय १ 


पश्ररागादिमणिविक्रये वणिजो । इन दोनोंमेसे व्यापरीको पद्मरागादि 


विज्ञानाधिक्याकलाधिक्यम्‌ 
तस्माद्यदेव विद्यया विज्ञानेन 
युक्तः सन्‌ करोति करम श्रद्धया 
भरदधानश्च सनुपनिपदा योगेन 
ुक्तवेत्यथः, तदेव कर्म वीरय- 
वत्तरमविद्रतकर्मणोऽधिकफलं 
भवतीति । विद्रककर्मणो वीरय 
वत्तरत्ववचनादविदुपोऽपि कर्म 
बीयंवदेव भवतीत्यभिप्रायः । 
न॒चाविदुषः कर्मण्यनधि- 
कारः। ओपरत्ये काण्डेऽविदुषा- 
मप्याचिज्यदशेनात्‌। रसतमा्ष- 
समद्धियुणवदक्षरमित्येकणपास- 
नम्‌ मध्ये भ्रयल्ान्तराद्रंनात्‌। 
अनेके विशेषणेरनेकधोपास्य- 


लात्‌ खन्यतस्यैव ढ़तस्योदीथा देखा गय।। अनेकों विरोषणो द्वाराजनेक ` 
ख्यस्याक्षरस्योपव्याख्यानं भवति 


॥ १० ॥ 


मणिर्योक्ी विक्रीका अधिकृ ज्ञान 
होनेके कारण अधिक फट होता 
है। अतः विया अर्थात्‌ विज्ञाने 
युक्त होकर श्रद्धासे यानी श्रद्वु 
होकर ओर उपनिषद्‌ अर्थात्‌ योगसे 
यक्त होकर जो कर्म करता है वही 
भवरत होता है--अविद्रानूके 
कसे अधिक फल देनेवाला होता 
हे । विद्वानूका कर्म प्रवर्त्‌ बत- 
साया गया है, इससे यह अभिप्राय 
सूचित होता है कि अविद्रानूका 


| भी कमं प्रवर तो होता ही है। 


अविद्रानूका कर्मभे अधिकार न 
हो- रेस बातभी नहीं है; क्योकि 
ओपस्यकाण्डमे (इसभध्यायके दशम 
सण्डमे) अविद्व्नोको भी ऋतिककर्म 
करते देखा जाता है । वह्‌ अक्षर 
रसतम तथा आति ओर समद्धि 
गणोसे युक्त है- एेसी एकं उपासना 
दै, क्योकि इसका निरूपण करते 
समय वीचमे कोई ओर भयल नहीं 


भकारसे उपास्य होनेके कारण निश्चय 
ही यह्‌ सन इस उद्गीथसं्क प्रकृत 


५ 


1 नकष (उशी ही व्याख्या हे॥१०॥ 
इ तच्छान्दोम्योपनिषदि प्रथमाध्याये भथम खण्डमाष्यं र" + 
+ = सण्डभाष्यं सम्पणम्‌ ॥ १॥ 


न 


दितधियः कण्डं 


पराणोपात्तनाकी उक्तषटता सूचित करनेवाली आस्यापिक्र 


देवासुरा ह वे यत्र संयेतिर उभये, प्राजापत्या- 
स्तद्ध॒ देवा उदृगीथमाजदररनेनेनानभिभविष्याम 


इति ॥ १ ॥ 


भ्रसिद्ध दै, [पूर्वकार्यं] प्रनापतिके पुत्र देवता जर अघर किषी 
कारणव परस्पर युद्ध करने रगे । उनमेसे देवताओनि यह सोचकर्‌ कि, 
इसके द्वारा इनका पराभव करगे, उदुगीथका अनुष्ठान क्वि ॥ १ ॥ 


देवासुरा देवाश्रासुराश्च । देवा 
आख्यायिकां दीव्यतेद्मोतिनार्थस्य 
निव॑चनम्‌ शास्रोद्धासिता इन्द्रिय- 
वृत्तयः । ॑ असुरास्तद्विपरीताः 
स्वेष्वेवासुषु विष्वग्विषयासु 
प्राणनक्रियासु रमणात्स्वाभावि- 


क्यस्तमआत्मिका इन्द्रियव्ृत्तय 
एव । ह वा इति पूव्रत्तोद्धासको 
निपातौ । यत्र॒ यस्मिनिमित्त 
इतरेत्रविषुयापहारलक्षणे संे- 


देवाघुरा-देवता ओर असुर- 
गण । देवः शब्द चयोतनाथंक दिव्‌ 
धातुसे सिद्ध हआ है । इसका 
अभिप्राय शाखारोकिंत इन्द्रिय 
वत्तरयाँ हँ । तथा उप्ते विपरीत, 
जो अपने दी अघुञं ( प्राणो ) मेँ 
यानी विविध विषयों जानेवारी 
प्राणनक्रियाओमिं ८ जीवनोपयोगी 
प्राणव्यापारोमे) ही रमण करनेवारी 
होनेके कारण स्वभावसे दी तमो- 
मयी ईन्दियवृततिया दै, वे ही 
‹अघुर' कदरतीदै । € ओर थवः 
ये पूवेदृतान्तको सूचित करनेवलि 
निपात है । यत्र जिस निमित्तसे 
अर्थात्‌ रक-द्सरेके विषर्योके अप- 


(८ 
47 


७८ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ मध्वाय १ 


तिरे । संपूवस्य यतते: सङ्ग्रा 
माथंत्वमिति सडग्रामं कृतवन्त 


इत्यथः । 
शास्मीयप्रकाशबृष्यभिभवनाय 

प्रवृत्ताः स्वाभाविक्यस्तमोरूपा 

इन्द्रियवृत्तयोऽसुराः। तथा तदि- 


शाञ्जाथंविषयिवेक- 


ज्योतिरात्मानो देवाः स्वाभावि- 
कतमोरूपासुराभिभवनाय प्रवृत्ता 
त 
ग्राम इव सवेप्राणिषु प्रतिदेहं 
देवासुरसड्ग्रामोऽनादिकाग्रवृत् 
इत्यभिप्रायः । स इह शरुत्याख्या- 
यिकारूपेण धर्माधर्मोतपत्तिविवेक 
विज्ञानाय कथ्यते प्राणविशुद्धि- 
विन्ञानविधिपरतया । 


अत॒ उभयेऽपि देवासुराः 


परीताः 


इत्यन्योन्याभिभवोद्धवरूप श 


प्रनापतेरपत्यानीति प्राजापत्याः। 


प्रजापतिःकमंजञानाधिृतः पुरुषः 


~ 


हरणरूप जिस किसी निमित्ते 
संयत हुए । शम्‌ उपसगपू 
त्‌, घातुका अथं संम्राम होनेके 
कारण इसका अभिप्राय “उन्होने 
संम्राम फिया-रेसा समक्षना चाहिये। 

शाखोय प्रकाशावृकत्तिका पराभव 
करनेके रिये प्रवृत्त ह स्वभावसे ही 
तमोरूपा इन्द्रियवृचियाँ अघुर है । 
तथा उनके विपरीत शाज्ञाथविषयक 
विवेकज्योतिःस्वरूप देवगण स्वा- 
भाविक तमोखूप अपुरोका पराभव 
करनेके खयि प्रु है । इस प्रकार 
परस्परकी बृतिर्योके अभिमव- 
उञ्चवरूप संप्रामके समान यह 
देवामुर-संग्राम अनादिकार्सै 
सम्पणे प्राणियों प्रसेक देहे 
होता मा रहा 2ै- एेसा इसङ्ा 
जमिप्राय है । यहाँ शति रमाधम- 
की उत्पत्तिके विवेकका बोध करानेके 
ल्वि प्ाणोकी . विञुदधके विज्ञानका 


विधान करते हुए आख्यायिका- 
रूपसे उसीका वर्णन कर रही है | 


इसीसे ये देवता ओर भुर 

दोनो भजापतिके पतर है इसख्यि' 
प्राजापत्य, ““पुरुष ही उक्थ है, यही 
महान्‌ पजापति है" इस अन्य तिके 
अलसा भजापति, करम र डान 





खण्ड २] - शाङ्करमाष्याथे ७९ 


“पुरुष एवोक्थमयमेव महान्प्रजा- | ८ उपासना ) के अधिकारी पुर्पका 
पतिः? ति शरत्यन्तरात्‌। तस्य दि | नाम है [ ब्र्माका नहीं ] । उक्षीकौ 
्षासीय ओर स्वाभाविक-ये परस्पर- 
ब्ाञ्ीयाः स्वाभाविक्यश्च करण- | विरुद रइन्दरियवृतिया संतानकै 
वृत्तयो विरुद्धा अपत्यानीव, तदु- | षमान है, क्योकि इनका आविर्भाव 
तत्ततो त्र्षापकपंलक्षणनिभितत | उक्तम निमित्तके 
| कारण दहोनेवले उस संग्राममे 
इ देवा पद्रीथष्रीथमक्लयुपल- | देवताओंने उदृगीथका यानौ उद्गीथः 
ं भक्तिसे उपरक्षित उद्गातके कका 
क्षितमोदत्रं कममाजहुराहतवन्तः। | आहरण-- अनुष्ठान किया । अकेले 
| उसीका अनुष्ठान होना असम्भव 
होनेके कारण उन्होने ज्योतिष्टोम 
ज्जयोतिषटोमाद्याहृतवन्त इत्यभि- | आदििका अनुष्ठान किया प्सा 
= इसका अभिप्राय हे । उन्होने उसका 
प्रायः । तक्किमथंमाजहः १ इत्यु- अनुष्ठान किपल्यि किया १ बह 
च्यते--अनेन करमणेनानसुरान- | बतखया नाता है-इस कम॑से 
भिभविष्याम इत्येवममिप्रायाः श १ 


सन्तः ॥ १ ॥ उदगीथक्षा अनुष्ठान किया ] ॥१॥ 


तस्यापि केवलस्याहरणासभवा- 


~€ न्ट ग~ 
प्राणादिका सदोषत्व 


यदा च तदु रीं कर्माजिदी- | निस समय उन्दने उस उदूगीय- 
४ कमंका अनुष्ठान करना चाहा उस्‌ 
षवस्तदा- समय-- 


1 





५० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय १ 
= ऋ > > > ऋ ऋ > > > > ॐ > >> ~ > > > >> + 


ते ह॒ नासिक्यं प्राणसुदृगीथसुपासांचक्रिरे । 
त हासुराः पाप्म्ना विविधुस्तस्मात्तनोभयं जिघति 
सुरभि च दुगेन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥ 


उन्हनि नासिकार्म रहनेवारे प्राणके रूपमे उदूगौभकी उपासना 
कौ । किन्तु अमुरोने उसे पापसे विद्ध कर दिया । हइसीसे वह्‌ सुगन्ध 
ओर दुगन्ध दोनोको संधा दै, क्योकि वह्‌ पापस विषा हुमा ३ ॥२॥ 


ते हदेवा नासिक्यं नासिकायां | प्षिद्ध है, उन देवतानि 


भवं॒प्राणं चेतनावन्तं प्राणं | गसिक्य--नासिकार्ेरदने वारे पाग 
यानी चेतनावान्‌ प्रणिन्दियकी, जो 
माणयुहीधकरताघुद्तारुद्रीथ- | उदूगीथकर्त -उद्गाता है, उदुगीथ- 
भक्तयोासांचक्रिरे कृतवन्त | भक्तिसे उपासना की, तालं यह है 
कि उद्गीथसंज्क ओंकार अक्षरकी 
नासिका्मे रहनेवले प्राणके रूपम 
हीधार्यम्षरमोङ्ारघुपासांच- | उपासना की। इस भकार भरत ज्थ- 
का परित्याग ओर अग्रटृत अर्थका 
तरिर हयः । एवं हि महृताथ- | हण नही करना पा; कयो 
परित्यागोऽअ्ृतार्थोपादानं च न | ससयेतयैवदरत्यः इस शरतिवचन- 
कृतं स्यात्‌ । खन्वेतस्येवाकषरस्य' | के अनुसार यरो उपास्यरूपसे 
इत्योङ्ारो ्यषास्यतया ्रकृतः। | ओंकारका ही भकरण है । 
नन्‌ द्वीथोपरुकषितं कर्माहृत- | शंका-किति ठुमने तो कहा था 
कि उन्होने “उद्गीथः शब्दस उप- 


चन्त इत्यवोचः, इदानीमेव कथं | धित कर्मा जतुषठान किया | 


| ओोङ्कारमुपासां- | अव पसा व्यो कते हो कि उद्गीय- 
नासिक्यप्राणदष् संक ओंकार अक्षरकी ही नासिकमें 


इत्यथः। नासिक्यप्राणदृ्टयो- 


खण्ड २ | 


नैव दोषः; उदीथकमेण्येव 


` हि तत्कत॑प्राणदेवतादृष्टयोद्वीथ- 
 भक्तथवयवशनोङ्कार उपास्यत्वेन 


विवक्षितो न स्वतन्त्रः । अतस्ताद- 
येन कर्माहतवन्त इति युक्त- 


मेवोक्तम्‌ । 
तमेवं देवैचैतथदरातारं शस- 


शः स्वाभाविकतम आत्मानो 


ज्योतीरूपं नासिक्यं प्राणं देवं 
स्वोत्थेन पाप्मना ध्मासङ्करूपेण 


` विविधुविद्धबन्तः संसगं छृतवन्त 


इत्यर्थः । स हि नासिक्यः प्राणः 


` कल्याणगन्धग्रहणामिमानासङ्गा- 


भिभूतविवेकविकानो बभूव । स 


` तेन दोषेण पाप्मसंसगी बभूव 1 
` तदिदक्तमसुराः पाप्मना बि- 
. विधुरिति। 


यस्मादासुरेण पाप्मना विद्ध- 


` स्तस्मात्तेन पाप्मना प्रेरितो घ्राणः 


प्राणो दुर्गन्धग्राहकः प्राणिनाम्‌ । 
अतस्तेनोभयं जिघ्रति रोकः 


शाङ्करभाष्यं स ५१ 


~> => >> >< > > ऋः > > = = ~ 
समाधान-यद कोई दोष नही 


है, क्योकि यहाँ उदुगीथ कर्मं ही 
उसका कर्त जो प्राणदेवता है 
उसीक्री दृष्टिसे उद्गीथभक्तिका 
अवयवभूत ओंकार उपास्यरूपसे 
विवक्षित है- स्वतन्त्र ओंकार 
नहीं । अतः उसीके स्यि उद्गाताके 
कका अनुष्टान क्िया-एेसा जोः 
कदा है वह उचित दी है । 
देवताओंसे इस प्रकार वरण किये 
हुए उस उद्गाता ज्योतिः स्वह 
नासिकास्थित प्राणदेवको स्वभावसे 
ही तमोमय अघुरोनि अधमे ओर 
आसक्तिरूप अपने पापसे बेध दिया; 
अर्थात्‌ उससे संयुक्त कर दिया । 
वह जो नासिकाम्थित प्राणं है उसमे 
पुण्य गन्धको भ्रहण करनेके अभिमान 
जर आसक्तिरूप दोष आ जानेसे 
उसके विवेक ओर विज्ञानका अभाव 
हो गया । उस दोषके कारण वह 
पापसे संसर्गं रखनेवासं हो गया । 
इसीसे यह कहा है कि अघुरोनि 
उसे पापसे विद्ध कर दिया । 
क्योकि प्राण आयुर पापसे विद्ध 
ह इसख्यि उस पापसे प्ररि हुमा 
ही वह प्राणिर्योका घ्राणसंज्ञक शाण 


दुर्गन्धको अहण करनेवाला है। 
इसीसे रोक सुगन्धि जर दुगंन्षि 


५२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अभ्याय १ 
सुरभि च दुगन्धि च पाप्मना | दोनेहीको धता है, क्योकि ग 
पापसे विधा हआ हे । जिम्‌ प्रकार 
ह्येष यस्माद्वि ्ः । उभयग्रहणम- | “जिसकी द्रवासक एवं पुरोडाशासक 
दोनों हवि्ोँ दूषित हो जार (कह 
इन्द्र देवताके स्यि पाच सकर 
मात अपण करे)" शु ५ 
तिमाच्छति' = पद्‌ विवक्षित नहीं हे; उसी प्रकार 
च्छति | यहाँ भी (भयः पदका ग्रहण म 
तिरूपं जिघ्रति" | इट नहं है ।*# [बृहदारण्यक-श्रुति 
ˆ यदेवेदमप्र जप्रति'' | भी] 4 पकरणमे यही ना 
¦ गयाहे कि “जो इस प्रतिकूल गन्धको 





विवक्षितम्‌, "यस्योभयं हविरा- 


( ० उ० १।३।३) इति | सषता हे ।” [इससे भी यही सिद्ध ¦ 


होता है कि यहाँ उभयः शब्दको 


समानग्रकरणशरतेः ॥ २ ॥ रहण करना उचित नही ह] ॥२॥ 
अथ ह्‌ वाचमुद्गीथमुपासां चक्रिरे ¦ ताश्टासुराः 
पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति सव्यं चान्तं 


च पाप्मना द्येषा विद्धा ॥ ३ ॥ 

फिर उन्होने वाणीके रूपमे उद्गीयकी उपासना की । वितु 
अघो उसे पापसे विद्ध करदिया । इसीसे कोक उसके द्वारा सत्य भीर 
मिथ्या दोनों बोलता दै, क्योकि बह पापते विधी ह्रे है ॥२३॥ 


अथ ह चलरद्गीथसुपासांचकिरे । तद्धासुराः 
पाप्मना = विविधुस्तस्मात्तेनोभयं पश्यति द्रानीयं 
चादरानीयं च पाप्मना दयेतद्विद्धम्‌ ॥ ४ ॥ 


9. वासक वा परेगमार कज त पक्र किसी एक पकारकी हवि मी उरि जद भादि 
के स्पशंसे दूषित हो जाय तो उसके यि प्रायश्चितकी आवश्यकता होती हे, फिर 
उ नाश्य दोनो विय भित दोनेषर `या व्यवस्था कयो ताय 
गयी । अवश्य ह बां "दोनो" (उभयम्‌) पद्‌ अनावश्यक या अविवक्षित है । 

% कर्योकि पापसे विदध होनेके कारण ठोक दुग॑न्धको ग्रहण दे ।' 
केबड़ इतना ही कहना उचित है । ५१ 


य 


वाता 


क्षण्ड 2 ] शाङ्कराच्याथे ७३ 
ऋऋ अआ अअ 


फिर उन्होने चश्ुके पमे उदुगीथकी उपासना की । अदुरोने 
उसे भी पापसे विद्ध कर दिया । इसीसे कोक उससे देखनेयोग्य ओर 
न देखनेयोग्य दोनों प्रकारके पदार्भीको देवता डै, कर्योकिं वह 
( चकचु-इन्दिय ) पायसे षा हुमा दे ॥ ४॥ 


अथ ह श्रोत्रमुद्गीथसुपांसांचकरिरे । तद्धासुराः 
पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभय* श्रणोति श्रवणीयं 
खाश्रवणीयं च पाप्मना ह्य तदिद्धम्‌ ॥ ^ ॥ 
फिर उन्होने श्रोतरके रूपमे उद्गीथकी उपासना की । अघुरोनि 
उसे भी पापस वेध दिया । इसीसे रोक उससे सुननेयोम्य ओर न 
घुननेयोभ्य दोनों प्रकारौ वर्तको नता हे, क्योकि वह ( श्रोत्ेन्दिय ) 
पापसे विधा हुभा ह ॥ ५ ॥ 


अथ हइ मन उद्गीथमुपासा चक्रिरे । तद्धासुराः 
पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभय^ संकस्पयते संकस्य- 
नीयं चासंकटपनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम्‌ ॥ ६ ॥ 


फिर उन्होने मनके रूपमे उदुगीथकी उपासना कौ । असुरौने उसे 
भी पापे वेध दिया। इसीसे उसके द्वारा रोक संकल्प करनेयोगय ओर 
संकल्प न करनेयोग्य दोनोहीका संकल्प करता है, कोक बहं 
पापे विधा हु है ॥ ६ ॥ 


मृख्यप्राणस्योपास्यत्वाय तः | सु्य प्राणको उपास्य सिद्ध करने- 
श , „ 1 के स्यि उसकी विद्युद्धताका अनुभव 
दिशुद्धतवालुमवार्थोऽयं विचारः चिनार 

९ | करानेके ्रयोजनसे श्रतिने इस विचारः 


तया प्रवतितः। अतश्वक्षरादि- | का आरम्भ का | अतः च्च आदि 


५४ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अल्याय १ 


` देवताः क्रमेण विचार्मासुरेण | देवता घुर पापसे विद्ध है इस 
पाप्मना विद्धा इत्यपोद्यन्ते । | प्रकार करमशः विचार करके उनका 

। अपवाद किया जाता है । रोषसब भी 
इसीके समानं । इसी प्रकार उन्होनि 
चकुः श्रोत्रं भन इत्यादि । वाक्‌ , चश्च, श्रोत्र ओर मन आदिक 
। भी [ पापसे विद्ध कर दिया ] “इस 

अनुक्ता अप्यन्यास्त्वग्रसनादि- | प्रकार. निश्चय ही ये देवता पापस 
संयुक्त है" इस अन्य श्रुतिके अनुसार, 
यहाँ जिनका नाम नहीं स्या गया 
देवताः पाप्ममिः'”(ग०उ०१।३। , दै, उन लक्‌ एवं रसना आदि जन्य 
| देवताओंको भी पसे दही पापविद्ध 

& ) इति भरुत्यन्तरात्‌॥ ३-६। | समञ्लना चाहिये ॥ २३-& ॥ 


ख्य ्राणदवारा असुरोका पराभव 
आसुरेण विद्धताद्घ्राणादि- | अआघुर पापसे विद्ध होनेके कारण 
देवता अपोद्य-- घ्राणादि देवताभोका त्याग कर-- 
अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तसुद्‌गीथमुपासां 
चक्रिरे । तरहासुरा ऋत्वा विदध्वंसर्यथादमानमा- 
खणस्घत्वा विध्व<सेत ॥ ७ ॥ 
फिर यह जो परसिद्ध सु्य प्राण दै उसीके रूपमे उद्गीथकी उपासना 
( ॥ उस (प्राणके) समीप पुचकर अघुरगण इस प्रकार विध्वस्त हो गये 
जञेसे दुभ पापाणके पास पर्हैचकर मिद्धीका ठेखा नष्ट हो जाता हे ॥७॥ 
अथानन्तर्‌ य एवायं सिद्धो | जथ-इसके पात्‌ जो कि यह 
यखे भवो मुख्यः प्राणस्तयुद्धीथ- | पसिद्ध॒सख्य- सुखम नेवा 
| भाण है उसीके ख्पमें उदूगीथकी 
उपासना कौ । अुरगण पूर्ववत्‌ 


समानमन्यत्‌ । अथ ह वाचं 


देवता द्रष्टव्याः “एवम खल्वेता 





भुपासां चक्रिरे । तं हासुराः पूरव- 


| 
॥ 


| 
। 
| 


। 


खण्ड २ 1 
8-89-8 + > 


बदुत्वा प्राप्य बिदध्व॑सुर्विनशः, 


अभिप्रायमात्रेण, अकरत्बा किं 
चिदपि प्राणस्य । 

कथं विनष्टाः १ इत्यत्र दृषटान्त- 
माह-यथा लोकेऽमानमाखणं 
--न शक्यते खनितुं इदा- 
लादिभिरपि, टङ्कच्छेत्तं न 
शक्योऽखणः, अखण एव 


आखणस्तमृत्वा सामभ्याघ्नोषटः 
पांसुपिण्डः श्रुत्यन्तराचार्मनि 


क्षिप्तोऽदममेदनाभिग्रायेण तस्या- 
इमनः किंचिदप्यङत्वा स्वयं वि- 


वध्येत विदीर्येतेवं विदष्व॑सुरि- 
(५ ° (~ = [क 

व्यथः । एवं धि शु दोऽसुररधपित- 

त्वात्‌ प्राण इति ॥ ७ ॥ 


शाङ्करमाष्याथं ५५ 


उसे प्राप्त होते ही- प्राणका कुछ 
भी न निगाडकर केवरु उसे विद्ध 
कृरनेका संकल्प करके दी विध्वस्त 
हो गये । 

वे किस प्रकार नष्ट हो गये 
इसमे दृष्टान्त कहते दै-- जिस 
प्रकार रोकमे आखण-पाषाणको 
प्राप होकर- जिसे कुदालादिसे भी 
न खोदा ना सके तथा नो ोकिर्योपि 
भीचिन्निन किया जु सके उसे 
'अखणः कहते है, “अखणः ही 
“आखण"(अमेदय)कहा गयाहै उसीको 
प्रा होकर अर्थात्‌ पाषाणकौ ओर 
उसे फोडनेके अभिपरायसे फेंका हुआ 
लोष्ट-पांघुपिण्ड यानी मिद्रीका ठेस 
उस पत्थरका कुछ भी न बिगाड़ 
कर्‌ स्वयं नष्ट॒हो जाता है उसी 
प्रकार बे अघुर भी विनष्ट हो गये। 
इस्‌ प्रकार अघुरोसे पराभूत न होनेके 
कारण मुख्य प्राण शुद्ध रहा- यद्‌ 
इसका तात्पयं है । यहाँ प्रकरणके 
सामथ्यंसे ओर दूसरी शरुतिके अनुसार 


“लोष्टशब्द अध्याहत किया गयाहे।७। 


-“- स्वश 


श्राणोपासकका महत्त 


एवंविदः प्राणात्मभूतस्येदं 


फटलमाह- 


.इस प्रकार जाननेवाे प्राणास- 
मूत व्यक्तिके शये श्रुति यह फल 


५६ छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ सभ्याय ! 


एवं यथाद्मानमाखणश्रताविध्व सत एवैव 
स विध्वंसते य एवंविदि पापं कामयते यश्ेनमभिः 


दासति स एषोऽदमाखणः 


॥ € ॥ 


जिस प्रकार [ मिद्रीका ठेखा ] दुर्भ पाषाणको प्रात होकर विनष्ट 
हो जाता है उसी प्रकार वह व्यक्ति नाशको प्राप्त हो नाता नो इ 
प्रकार जाननेवाटे पुरुषके प्रति पापाचरणकी कामना करता दहै अथव 
खो इसको कोसता या मारता दै; क्योकि यह प्राणोपासक अभे 


पाषाण ही दे ॥ ८ ॥ 
यथारमानमिति, एष एव 


दृष्टान्तः; एवं हैव स विध्वंसते 
विनश्यति; कोऽसौ १ इत्याह-य 
एवंविदि यथोक्तप्राणविदि पापं 
तदनं कतुं कामयत इच्छति 
यश्चाप्येनमभिदासति हिनस्ति 
भ्राणविदं प्रत्याक्रोशताडनादि 
रुङ्क्ते सोऽप्येवमेव विध्व॑सत 
इत्यथेः । यस्मात्स एष प्राणवित्‌ 


प्राणभूतत्वाद्इ्माखण इवादमा- 
खणोऽधर्षणीय इत्यर्थः । 


जसि प्रकार पाषाणको प्रप्त 
होकर इत्यादि- यही इसमें दृष्टान्त 
है। उसी प्रकार निश्चय दही वह 


न्टहोनाता दै; कौन नष्टे | 


नाता है? सो बतरते हैन 
इस प्रकार पूर्वोक्तं प्राणको जानने- 
वाले उपासकके प्रति उसके अयोग्य 
पापाचरण करनेकी कमना-इच्छा 
करता है; तथा जो इसका हनन 
करता है- इस प्राणवेत्ताके प्रति 
गाी-गरोज एवं ताडनादिका प्रयोग 
करता है वह भी इसी प्रकार नष्ट 
हो जाता है--यह इसका अमिपराय 
हेः क्योकि बह भाणवेतता भाणस्वल्प 
हानेके कारण दुर्भ पाषाणके समान 
इच पाषाण अर्थातु दुर्ध हे । 


` ` "= "वा क 2 क~, _ 


खण्डं 2 | 
ननु नासिक्योऽपि प्राणो वा- 
य्वात्मा यथा शरखूयस्तत्र नासि- 
क्यः त्राणः पाप्मना बिद्धः प्राण 
एब सन्न युखूयः कथम्‌ ! 
चैष दोषः; नासिक्यस्तु स्थान- 
करणवैशुण्याद्विदधो बास्वात्मापि 
सन्‌ यस्त॒ तदसंभवात्‌ 
स्थानदेवताबलीयस्त्वा्न विद्ध 
इति युक्तम्‌ । यथा बास्याद्‌ यः 
रिक्षावसपुरुषाभ्रयाः कायविरोषं 
र्वन्ति नान्यदस्तगतास्तदरद्दोष- 
बटूप्राणसचिवत्वादिदधा प्राण- 


देवता न युख्यः ॥ ८ ॥ 


शाङ्करभाष्य ५७ 


हंका-जैसा किं मुख्य प्राण 
ह उसी प्रकार नासिकास्थित्‌ प्राण 
भी तो वायुख्प दी है; कितु प्राण- 
हप होते हए भी केवर नासिका- 
गत प्राण ही पापते विद्ध दै, स॒ख्य 
प्राण नहीं दै सो कैसे 

समाधान~-यह कोई दोष नर्ही 
है । नासिकामें रहनेवाखा प्राण तो 
वायुहूप दोनेपर भी स्थानावच्छिनन 
इन्द्रिये दोषके कारण अघुरोद्रारा 
पापसे विद्ध हो गया दै; किंतु सख्य 
प्राण आाश्रयदोषकी असम्भवताके 
कारण तथा स्थानदेवतासे प्रबूत 
होनेके कारण पापसे विद्ध नही 


हुजा-यह उचित ही दै । जिस. 


प्रकार बसूढा मादि ओनार घुशि- 
कषित पुरषके हाथमे रहनेषर विशेष 
का्य॑करते है, रितु दूसरेके 
हाथमे पड़नेषर वैसा नदी करते, 
उसी प्रकार दोषयुक्त प्राणका साथी 
होनेके कारण प्राणदेवता पापसे 
विद्ध है भौर सुख्य प्राण पापविदध 
नहीं है ॥ ८॥ 


र्ण - 


यस्मान्न विद्धोऽसुरयस्त- | 


स्मात्‌-- 


क्योकि मुख्य प्राण अघुरोद्रारां . 
। पापविद्ध नदी हआ, इसव्यि-- ` 


"न" 


षष 


ऊन्दोग्योपनिषह्‌ 


[ सण्याय १ 


> ‰< ‰ $ # # < ‰ < < £ ८ ‰ < # # ८ # ‰ # ¬< 
नै वेतेन सुरभि न दुगन्धि  विजानाव्यपहतपापी 
ह्यं ष तेन यदश्चाति यस्पिबति तैनेतरान्प्राणानवति। 


एतमु एवान्ततोऽविच्वोर्छामति वयाद द्‌ात्येवान्तत 


इति ॥ ९ ॥ 


रोक इस ( मुख्य प्राण ) के द्वारा न सुगन्धको जानता है ओर 
न दुगंन्धको ही जानता दै; क्योकि यह पापे परामूत नहीं है । अतः 
यह जो कुछ खाता या पीता दहै उससे अन्य प्रार्णोका ८ इन्दरयोक्ना ) | 
पोषण करता है । अन्तम ईस मुख्य प्राणको प्राप्त न होनेके कारण ही 
[ घ्राणादि प्राणसमूह ] उक्तमण करता दहै ओर इसीसे अन्तमे पुष 


मुख फाड़ देता हे ॥ ९ ॥ 
नैवैतेन सुरभि दुर्गन्धि वा 


विजानाति प्णेनैव तदुभयं 
विजानाति रोकः । अतश्च 
पाप्मकार्यादशंनादपहतपाप्माप- 
हतो विनारितोऽपनीतः पाप्मा 
यस्मात्सोऽयमपहतपाप्मा शेष 
विशुद्ध इत्यथः । 
यस्माचात्मभरयः कल्याणा 
द्ासद्गवस्वादुघ्राणादयो न 
` तथात्मंभरियख्यः, कि तहिं १ 
सर्वाः कथम्‌ १ इत्युच्यते-तेन 
ख्येन यदश्नाति यद्यिबति 


लोक इस मुख्य प्राणके द्वारा १ 
छगन्धको जानता है ओर न दुगन्ष- । 
को ही, इन दोनोको वह प्राणके 
द्वारा दी जानता है । अतः पापका | 
कायन देखे जानेके कारण यह 
अपहतपाप्मा हे-- जिससे पप ¦ 
अपहत-विनारित अर्थात्‌ दूर $ 
दिया गया है वह यह मुख्य प्रण 
जपहतपाप्मा अर्थात्‌ विद्युद्ध है। 

क्योकि प्राणादि इन्द्रियां अपने । 

कल्याणे आसक्त होनेके 

कारण अपना ही पोषण करनेवाली ` 

(य 1 व स उस प 

षण } 
व 

समीका दितकारी दे । किस प्रकार! 


ताया जाता ईै--उस मुख्य 


ण्ड 2 | 


शाङ्करभाष्य 


५९ 


लोकस्तेनारितेन पीतेन चेतरान्‌ 


त्राणादीनवति पारयति । तेन 
(^~ 9 (~ 4 (९ त्य थं अ 
हि तेषां स्थितिभेवतीत्यथ;। अतः 
सर्वमरिः प्राणोऽतो विबुद्धः । 
कथं पुन्॑ख्यारितषीताभ्यां 
स्थितिरेषां गम्यते १ इत्युच्यते- 
एतं ख्यं प्राणम्‌, ुख्यत्राणस्य 
वृत्तिमन्नपाने इत्यथः, अन्ततोऽ- 
न्ते मरणकालेऽविचखालभ्ध्वोत्ा- 
मति घ्राणादिग्राणसमदाय 
इत्यर्थः । अप्राणो हि न शक्रो- 
त्यरितु पातुं वा । तेन तदोत्ा- 
न्तिः प्रसिद्धा घ्राणादिकलापस्य। 
दृश्यते द्युतकरान्तौ प्राणस्याशि- 
शिषा । अतो व्याददात्येवास्य- 


। . विदारणं करोतीत्यथः। ¦ 


| 
| 
। 


साभ उतरान्तस्य लिङ्गम्‌ ॥९॥ 


प्राणके द्वारा लेग नो कु खाते- 
पीते है उस खाये-पीयेसे वह मुख्य 
प्राण घ्राणादि दृस्रे प्रर्णोका पोषण 
करता डे, क्योकि उसीसे उन सव्‌- 
करी स्थिति होती हे । इसलियि सुय 
प्राण सभीका पोषण करनेवाखा दै, 
अतः वह विशुद्ध है । 

रितु मुख्य प्राणाद्वारा खाये-पीये 
पदार्थेसि अन्य प्रर्णोकी स्थिति किस 
प्रकार जानी जाती दै १ सो बत- 
कते है-इस सख्य प्राणको अर्थात्‌ 
इस मुख्य प्राणकी वृत्तिरूप अम- 
पानको न पाकर दी अन्त समय 
मरण-कार्मे प्राणादि इन्द्रिय 
समुदाय उक्तमण करता है, कर्योकि 
पराणहीन पुरुष खाने या पीनेमे 
समर्थं नहीं होता । इसीसे उस 
समय घ्राणादि इन्द्रिय-समुदाय- 
की उक्रान्ति प्रसिद्ध दै। उक्र 
मणके समय प्राणकी भोजन 
करनेकी इच्छा स्पष्ट देखी जाती 
है । इसीसे उस समय वह सुख 
ना देता हे । यही उक्तमण करने- 
वाटे प्राणादिको अन्नादि प्राप्त न 
दोनेका चिह हे ॥ ९ ॥ 


म्रणकी आ ङ्गरत संज्ञा हेम हेतु 
त हा्गिरा उदीथमुपासांचक्र एतमु एवा- 
द्विरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसः ॥ १० ॥ 








&० 


छान्दोग्योपनिषष््‌ 


[ अष्याय। 


अङ्धिरा ऋषिने इस [सुख्य प्राण] के ही रूपमे उदुगीथकी उप 
कौ भ । अतः इस प्राणको हौ आङ्गिरस मानते है, कयो यह समू 


जङ्खोका रस है ॥ १०॥ 
तं हाद्धिरास्तं अख्यं प्राणं 
हाङ्गिरा हत्येवंगुणयुद्रीथयुपासां- 
चक्र उपासनं कृतवान्यको दाल्भ्य 
इति वक्ष्यमाणेन संबध्यते । तभा 
बृहस्पतिरिति, आयास्य इति 
चोपासां चक्रं बक इत्येवं संबन्धं 
कृतवन्तः केचित्‌; "एतमु एवा- 
ङ्िरसं बृहस्पतिमायास्यं प्राणं 
मन्यन्ते" इति वचनात्‌ । 
भवत्येवं यथाभरुतासंभवे संभवति 
तु यथाश्रुतम्‌, ऋषिचोदनाया- 
मपि भुत्यन्तरवत्‌; “(तस्माच्छ 
तचिन इत्याचक्षत एतमेव सन्त- 
मृषिमपि' । तथा माध्यमो ग॒- 
त्समदो विश्वामित्रो बामदेवोऽ- 
व्रिरित्यादीन्‌ ऋषीनेव प्राणमा- 
पादयति तिः । तथेतानपय न्‌ 
प्राणोपासकानङविरोबदस्पत्याया- 


स्यान्प्राण करोत्यभेदविज्ञानाय ह 


^तं हा्गिराःः अर्थात्‌ अङ्गि 
फेसे गुणवाले इस मुख्य प्राणश 
उदृगीथकी दारभ्य वकने उपमा 
की-ईइस प्रकार इसका आगेसे समब 
है । तथा किसी-क्रिसीने दर्भप 
वकने वृहस्पति ओर आयास्यगुणवाे 
प्राणरूप उदृगीथकी उपासना कौ 
इस तरह इसका सम्बन्ध रग | 
है; क्योकि यह इस प्राणको ही 
आ्विरस ब्रहस्पति ओर आया 
मानते दैः एेसा वचन है । , 

ठीक दै, यदि यथाश्रुत भयं 
८ श्रृतिका सरलार्थ ) सम्भव न ही 
तो रेखा [ दृरान्वथी ] भर्थंभैौ 
च्या जा सकता है । कंतु यहां तौ 
अतः क्षि होनेपर भी शते 
भाणको) शतर्चिन' रसा कहकः 
पुकारते है” इस न्य श्रु तिके अनु- 
सार ऋषियोका प्रतिपादन करने 
भढृत्त यथाश्रुत अर्थं भी सम्भव 
ही । इसी प्रकार श्रुति माध्यम, 
गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव भैर 
अत्रि आदि ऋषियोको ही प्राणमाक 
शी भराति कराती षै; रेस ही प्राण 
; प्राण ही माता 


ता 
ईइत्यादिके समान अङ्गिरा, 


खण्ड २ ] श्ाङ्रभाष्याथं ६१ 
--१--- > > > >- -- ऋ > 
श्राणो ह पिता त्राणो माता' | बृहस्पति जौर आयास्य-इन प्राणो- 


व पासक छषियोको भी श्रुति अमेद्‌- 
इत्यादिवच्च । तस्माद्‌ विज्ञानके यि प्राप बनाती दै। 


नाम आण एव सन्नात्मानमङ्गि- | भतः इसका तासयं यह हे कि 
अङ्खिरा नामक ऋषिने प्राणस्वरूप 
रसं प्राणमुद्रीथशरुपासांचक्र इत्ये- | होकर दी अङ्गिरस आत्मा प्राणरूप 
उदुगौथकी उपासना की; क्योकि प्राण 
होनेके कारण यह अङ्गका रस है, 
सनरसस्तेनासाबाङ्खिरसः।।१०॥ | इसस्यि आङ्गिरस दै ॥१०॥ 
श्राणकरी वृहस्पति संज्ञा होनेमं हेत 
तेन त९ह बरहस्पतिरुद्गीथमुपासांचक्र एतमु एव 
बृहस्पति मन्यन्ते वाग्वि बृहती तस्या एष पतिः॥११॥ 
इसीसे बृहस्पतिने उस प्ाणके रूपमे उदुगीथकी उपासना कौ । 
रोग इस प्राणको ही बृहस्पति मानते दै; वथोकि वाक्‌ ही बृहती है 
ओर यह उसका एति हे ॥ ११ ॥ 
। तथा वाचो बृहत्याः पतिस्ते- | तथा यह वाक. यानौ इहतीका 
नासौ बृहस्पतिः ॥ ११ ॥ । पति दै, इसस्य बृहस्पति है।॥११॥ 


तत्‌ । यद्यस्मात्सोऽङ्गानां प्राणः 


श्राणकी जायास्य स्ना होनेमें हेतु 
तेन तर्हायास्य उद्गीथमुपारसाचक्र एतमु एवा- 
यास्यं मन्यन्त आस्यायदयते ॥ १२ ॥ 


इसीसे आयास्यने इस प्राणके खपे ही उदुगीथकी उपासना की । = 
। रोग इस प्राणको ही आयास्य मानते है; क्योकि यह आस्य ८ मुख ) € 
। से निकिर्ता है ॥ १२॥ ह ` 


५. 





६२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय ! 
तथा यथ्रसमादास्यादयते | तथा क्योकि यह जस्य (सस 
4 से निकलता है, इसलिये आयाघ् 

निगच्छति तेनायास्य छरषिःप्राण | जहपिने प्राणरूप होकर ही [इष 

प्राणमय उदूगीथकी उपासना की ] 
एव सननित्यथंः । तथान्योऽपयु- | यद इसका तार्य हे । अर्थात्‌ भन 
पासक आत्मानमेवाङ्किसादि- । उपसकको भी अङ्गिरस दि 
गुणोसि युक्त आतमस्वरूप प्रणत 
गुणं प्राणयुद्रीथ्ुपासीतेत्य्थः | रूपमे ही उदुगीथकी उपासना कपी 
॥ १२॥ चाहिये ॥१२॥ 


~ © ‡--- 


तेन तह बको दारभ्य षिद्ाचकार। स ह नैमिरो- 
यानामुद्गाता वभूव स ह स्मेभ्यःकामानागायति॥१३॥ 


अतः द्ल्भके पुत्र वकने | पू्वोक्तरूपसे ] उसे जाना । [ अर्थात्‌ 
ूोकत मकरारते प्राणमय उदृगीधकी उपासना की । | वह नैमिषारष्यम 
यज्ञकरनेवारोका उद्गाता हुभा ओर उसने उनकी कामनापूर्तिके लिये 
उद्गान किया ॥ १३ ॥ । 

न केवलमङ्गिरः्रमृतय उपा- |. केवर अङ्गिरा आदिने ही प्रण- 
सांचक्रिरेः तं ह वको नामे | रूप उदुगीथकरी उपासना नही की 
दल्भस्यापत्यं दाल्भ्यो विदा- १ द्ट्भके पुत्र बकने भी उसे 

लि न सं ति पवः 
चकार यथा दशितं प्राणं विज्ञात [ इसी भकार ] जाना था अर्थात्‌ पू 


ध „` | भवरचित प्राणका ज्ञान प्रात कि 
वान्‌ । बिदित्वा च स ह नेमि- | था । इस परार उसे जानकर वह 


शीयानां सत्रिणायद्राता वभूव । | नैमिषारण्ये यज्ञ॒ करनेवाोका 

स च प्राणविक्ञानसामथ्यदिभ्यो प आ तथा इस प्राणःविज्ञान- 
| के सामर्थ्य 

नेमिरीयेभ्यः कामानागायति से ही उसने उन नैमिज्ञीय 


1 याक्तकंकी कामनार्थोका [ उनकी 
स्मदागातवान्किलेत्य्थः | १३॥ तिके स्थि] जागान किया ॥१३॥ 


4 
+ © 


| विद्ान्यथोक्तयुण 


३ 
न~~ ~ ~ ------ 


खण्ड २ ] 


श्ाङ्रभाष्याथ 


६३ 


नि 71 
ग्राणह्टिसे जोकारोपास्तनाक्रा फठ 


आगाता ह वे कामानां भवति य एतदेवं 
विद्रानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम्‌ ॥ १४ ॥ 
इते हस प्रकार जाननेवाख जो विद्वान्‌ इस उदगीथसंज्ञक भक्षर 
[ओंकार] की इस प्रकार उपासना करता है, वह कामनार्जोका आगान 
करनेवासा होता ह- एेसी यह जध्यास उपासना दै ॥ १४॥ 


तथा अन्योऽप्युद्राता आगाता 
ह वै कामानां भवति य एवं 


प्राणमन्षर- 


दूगीथशुपास्ते । तस्येतद्‌ दष्ट 
फलपुक्तम्‌, ब्राणात्मभावस्त्वदृषं 
‹ हवो भूता देवानप्येति" इति 
ुत्यन्तरात्सद्धमेवेत्यमिप्रायः 1 
इत्यभ्यात्ममेतदात्मविषयुद्गी- 
भोपासनमिः्युक्तोपसंहारोऽधिदे- 
बतोदूगीथोपासने 
बुदधिसमाधाना्थंः ॥ १४ ॥ 


ब्ष्यमाणे 


इसे ईस प्रकार जाननेवाखा जो 
विद्रान्‌ इस उद्गीथसंजञक अक्षरकी 
उपर्युक्त गुणविषशिष्ट॒प्राणूपसे 
उपासना करता है, वह अन्य उद्गाता 
भी कामनार्ओका आगान करनेवाखा 
हो जाता है । यह उसका दृष्ट फर 
बतलाया गया है । “देवता होकर ही 
देवताओंको प्राप्त होता दहै” इस 
अन्य श्रुतिके अनुसार प्राणस्वरूपता- 
की प्रापिषूप अदृष्ट फर. तो सिदध 
ही है- यह इसका अभिप्राय हे । 
हत्यध्यासम्‌-- यह उद्गीथोपासना 
आत्मविषयिणी है- इस प्रकार जो 
पर्वक्तं कथनका उपसंहार क्या 
गया है बह आगे कीं जानेवारी 
अधिंदैवत उदगीथोपासनामे बुद्धिको 
समाहित करनेके स्थि रे ॥१४॥ 


"~ 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्थमाष्याये 
द्वितीयसण्डमाष्यं सम्पूणम्‌ ॥२॥ 

--4+-क््9्--- 


5 
च 
॥ 


॥ 


# 


१ 


॥ 


तृतीय खल 





मादित्यर्िसे उद्गीथोपत्तना 
अथाधिदेवतं य एवासौ तपति तमुद्मी 
पासीतोयन्वा पष प्रजाभ्य उदृगाथति । उयस्ः 
मोभयभपहन्त्यपहन्ता ह वे भयस्य तमसो भवति 


य एवंषेद्‌॥ १॥ 


इसके अनन्तर अपिदैवत उपासना वर्णन किया जाता है- गे 


कि वह [ आदित्य ] तपता है 


› उसके रूपमे उद्गौथक्की उपासना करनी 


चाहिये । यह उदित होकर परनाओंके चयि उद्गान करता है, उदिति 
होकर अन्धकार ओर भयका नादा करता है । जो इस मकार इसकी 
जानता [इसकी उपासना करता] है वह निश्वय ही अन्धकार ओर भयका 


नाश कनेवाखा होता है ।॥ १ ॥ 
अथानन्तरमधिदेवतं देवताविष- 


 यथुद्गीथोपासनं प्रस्तुत मित्यर्थ; | देवताकिषयक 


अनेकभोपास्यत्वादुद्गीथस्य । य 


ए्वासावादित्यस्तपति तथुद्गीथ- | नो 


इपासीतादित्यदृषटथोदूगीथुपा- 
सीतेत्यथः। तद्गीथमित्युद्गी- 
थशब्दोऽक्षरवाची सन्कथमादित्ये 
वतंते १ इत्युच्यते _ 


क ~ ण्‌ 


इसके अनन्तर अधिदैवत अर्थात्‌ 
उद्गीथोपासनाका 
आरम्भक्रिया जाता है, क्योकि उद्‌- 
गीथञनेक परक्रारसे उपासनीय है । 
यह आदित्य तपता है, उस 
उद्गीथक्री उपासना करे; 


अर्थात्‌ आदितय-दष्टिसे उदूगीथकी 


उपासना करे । (तयुद्गीथम्‌ः इसमे 
उद्गीथः शब्द अक्षरवाचक होता 


इञा किंस प्रकार आदिलयमे संगतं 
होता दै 


£ यह्‌ बतलाया जाता दै- 


| 


1 


खण्ड २ ] शाङ्करमाष्याथ ६५ 





उद्यन्युद्रच्छन्वा एष प्रजाभ्यः 

रजार्थद्रायति प्रजानामननोत्प- 

स्यरथम्‌ । न ह्यनु ति तस्मिन्‌ 

। व्रीह्यादेर्निष्पत्तिः स्यादत उद्राय- 

तीवोद्वायति,यथेबोद्वातानाथंम्‌। 
अत उद्गीथः सवितेत्यथंः । 


कि चोद्यननशं तमस्तज्जं च 
भयं प्राणिनामपहन्ति तमेवंगुणं 
सवितारं यो वेद सोऽपहन्ता 
नाशयिता ह वै भयस्य जन्ममर- 
णादिलक्षणस्य आत्मनस्तमसश्च 
तत्कारणस्य अज्ञानलक्षणस्य 
भूवति ॥ १ ॥ 


यह [आदिव्य] उदित होता हुजा 
--ऊपरकी ओर जाता हुआ प्रजाके 
ल्यि- प्रजाओंके अन्नकी उतयत्तिके 


स्यि उद्गान करता दै, क्योकि ` 


उसके उदिति न होनेपर त्रीहि 
आदिकी निष्पत्ति नहीं हो सकती; 
अतः जिस प्रकार उद्गाता 
अन्नके छ्य उदूगान करता है, 
उसी प्रकार वह उद्गान करनेके 
समान उद्गान करता है । भतः बुं 
उदूगीथ है-यह इसका तातपयं है । 

इसके सिवा, वह उदित होकर 
रात्रिके अन्धकार ओर उससे होने- 
वाठे प्राणिर्योके भयका भी नाञ्च 
करता है । जो इस प्रकारके गुणसे 
युक्त सविताकी उपासना करता हे, 
वह जन्म-मरणादिरूप आत्माके भय 
ओर अन्धकारका अर्थात्‌ उसके 
कारणमूत अज्ञानका नाश करनेवास 
होता दै ॥ १॥ 


. ~ ग्भ 


सूयं ओर प्राणकी समानता तथा प्राणदषटिसे.उद्रीथोपासना 


यथपि स्थानमेदातप्राणादित्यौ 


यद्यपि स्थानमेदके कारण प्राण 
ओर मादित्य मिन्न-से दिखायी देते 


मिनाविब रु्येते तथापि न स | है, तथापि वह उनका ताचतिकं भेद 


तच््रभेदस्तयोः, कथम्‌ ! 


| किस प्रकार ! [यह 
बतडाते है- | 


` ६६ छान्दोग्योपनिषद्‌ 


समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसे | 


[ अध्याय ! 


स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति परत्थास्वर इत्यप 
तस्माद्रा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥ 


यह प्राण] भौर [सूरय] परस्पर समान ही है । यह प्राण उष्ण है ` 


ओर वह सू्यं॑भी उष्ण है । इस | प्राण ] को तरः एसा कहते है 
ओर उस [ सूं ] को स्वरः एवं परतयस्वर रेल कहते है । अतः इ 


समान उ एव तुल्य एव 
प्राणः सवित्रा गुणतः, सविता 
च प्राणेन । यस्माहुष्णो्यं प्राण 
उष्ण्रासौ सविता कविं च स्वर 
इतीमं प्राणमाचक्षते कथयन्ति, 
तथा स्वर इति प्रत्यास्वर इति 
चु सवितारम्‌ । यस्माताण 
स्वरत्येव न पनतः प्रत्या 


गच्छति, सविता. त्वस्तमित्वा 


इनरप्यदन्यहनि प्रत्यागच्छति; 
अत, भरत्यास्वरः । अस्माद्गुणतो 
नामतश्च समानावितरेतरं प्राणा- 
दिन्यौ । अतः तच्वामेदादेतं 
ग्राणमिममसुं चादित्युद्रीथमर- 


पासीत ॥ २।। 


। भ्रणं। बौर उष सूर्य] रूपसे उद्गीथकी उपासना करे ॥ २ ॥ 


गुणृष्िसे प्राण सुर्के स्च ही 
है तथा सूयं प्राणके सच्श है 


क्योकि यह प्राण उष्ण है बीर दहं । 


को 
सूय भी उष्ण है तथा इस प्राणं 
स्वरः देसा कहकर पुकारते ह ओर 
उस सू्को भी श्वरः एवं श्रवः 


स्वर' एेसा कहते दै, क्योकि प्राण 


तो केवरु स्वरण (गमन) ही करता 


है-मरनेके पश्चात्‌ वह पनः 
रता नही; कितु सूरय भतिदन 
अस्तमित हो-होकर छोट आता दै, 


इसज्यि वह भरयास्वर है । इ 
भकार गुण ओर नामसे भी ये प्राण 
ओर भादित्य एक-दूसरेके तुल्य ही 


ई । अतः तत्त्वतः शमेद्‌ होनेके ` 


द्गी थक्ी 
जकार ) उपासना करे ॥ २ ॥ 


==; 9 ~= 


रण इस प्राण भौर उस सूवरपते 
( उदूगीथावयवमूत _ 


। 


खाण्ड च ] शादङकस्ाष्याथ ॐ 
3 -- त त त ऋ ~ 
व्यानदष्टिसे उद्गीथोपासना 


अथ खलु व्यानमेवोदगीथमुपासीत यद्र प्राणिति 
स राणो यदपानिति सोऽपानः । अथ यः प्राणापां 
नयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः स वाक्‌ । तस्माद्‌- 
प्राणन्ननपानन्वाचमभिग्याहरति ॥ ३॥ 
तदनन्तर दुसरे भकारसे [ अध्यातमोपासना कटी जाती है-- 1 
व्यानदृष्टिसे ही उद्गीथकी उपासना करे । पुरुष जो प्राणन करता है 
, (सुल या नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकाल्ता हे ) बह भाण. है जीर 
ज्ञो अपधास ठेता र ८( वायुको भीतरकी ओर सीचता ह ) वह अपान 
हे । तथा प्राण ओर अपानकी जो सन्धि है वही व्यान हे। जो व्यान 
` हे वही वाङ्‌ है । इसीसे पल्ष प्राण ओर अपान क्रिया न करते हुए ही 
. वाणी बोरूता है ॥ ३ ॥ | 
अथ खल्विति प्रकारान्तरेणो- । “अथ खल"--अव भ्कारान्तरसे 


उदूगीथकी उपासना कही जाती है । 
पासनयुद्रीथस्योच्यते, व्यानमेव | प्राणका ही वृत्तिविशेष जो आगे कदे 


जानिवारे रक्षणोसे युक्त व्यान है, ` 


वक्ष्यमाणलक्षणं प्राणस्येव वृत्ति- 


विशेषुद्गीथमुपासीत । अधुना 


तस्य तन्त्रं निरूप्यते-यद्र पुरुषः 
. प्राणिति युखनासिकाम्यां वायु 
बहि्िःसारयति, स प्राणाख्यो 


बायोरदत्तिविरोषः, य दपानित्यप- 


उसके रूपमे उद्गीथकी उपासना 
करे 1 अब. उसके तत्त्वका निरूपण 
किया जाता दै। पुरुष जो प्राणन करता 
षै -मर्थात्‌ सुख ओर नासिका्रार 
वायुको बाहर निकार्ताः दै, वह 
वायुका प्राण नामकं दृिविरोष दै; 
तथा वह जो अपास करता हे, ` 


अर्थात्‌ उन ( मुख भर नासिका ) 


श्वसिति ताम्यामेवान्तराकष॑ति | के ही द्वारा वायुको भीतर सीचता 
वायुं सोऽपानोऽपानाख्या इत्तिः। | £ वह उसद़ी अपानसंशक वृति दै। 


का ॐ डे -- 


६८ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अन्याय १ 


ततः किम्‌{दत्युच्यते-अथ य उक्त- 
लक्षणयोः ्ाणापानयोःसन्थस्त। 
योरन्तरा वृत्तिविशेषः, स | ; 
यः सांस्यादिशासप्रसिदधः श्रुत्या 
विशेषनिरूपणामासौ व्यान 
इत्यमिप्रायः । 
कस्मात्पुनः प्राणापानौ हित्वा 
महतायासेन व्यानस्यैवोपासन- 
मुच्यते १ बीयंवत्करमैतुत्ात्‌ । 
कथं वीर्यवत्करमहेतुतवमित्याह 
यो व्यानः सा वाक्‌व्यानकाय. 
त्वादयाचः । यस्मादयाननिर्वत्या 
पानव्यापाराबडूवंन्वाचमभिव्याई 
रत्युच्चारयति लोकः ॥ २ ॥ 


इससे क्या सिद्ध हुभा £ यह बत- 
खया जाता ै-उन उपर्युक्त लक्षण- 
वेलि प्राण भौर भपानक्ी जो सनि 
है-उनके बीचका जो वृत्तिविशेष 


है, वह व्यान है ।श्रतदवारा विरेष- 
रूपसे निरूपण किये जनेके कारण 
यहां वह व्यान भमिप्रेत नहीं है बो 
साख्यादि शालमे प्रसिद्ध [ सर्व 
देहव्यापौ ] व्यान है सा इसका 
ताप्यं है । 


कितु प्राण जौर अपानक्ो छोह- 
कर अत्यन्त परिधमसे भ्यानक्ी ही 
उपासनाका निरूपण क्यो किया गया! 
एेसा प्रर होनेपर कहते है- 
क्योकि यह वीर्यवान्‌ कर्मकी निष्पत्ति- 
का कारण हे । यह वीर्यवान्‌ कर्मकी 
सिद्धिका कारण कैसे है ? इसपर 
कते ह -जो व्यान है, वही वाणी 
हे, क्योकषि वाणी व्यानका ही कायं 
हे । बाणी व्यानसे निष्प होनेवाढी 
है, इसस्यि रोक माणन शौर अपानन 
अर्थात्‌ भाण जीर अपानकी किया 
न करता हुमा वाणीका अभिव्या- 
दरण--उचचारण करता दै ॥ २ ॥ 


ककय 


श्चण्ड ये ] शाङ्करभाष्यं ६९ 
व्यानग्रयुक्त ह्ेनेसे वाक्‌, ऋक्‌ , साम ओर उद्रीथकी समानता 


या, वाक्सक्तस्माद भाण नपानन्नूचमभिव्या- 
हरति यक्तत्साम तस्माद प्राणन्ननपानन्ताम्‌ गायति 
यत्साम स उद्धीथस्तस्मादभ्राणन्ननपानच्ु 
द्रायति ॥ ४॥ | 
जो वाक है वही ऋक दै । उसीसे पुरुष भाण ओर्‌ अपानकी क्रिया 
न करता हुभा ऋकका उचारण कता ह । नो क्‌ है वही साम हे । 
इसीसे प्राण ओर अपानकी क्रिया न करता हा सामगान करता है । 
लो साम है वही उदगीथ है। इसीसे प्राण ओर अपानक क्रिया न 
करता हुभ उदुगान करता है ॥ ४ ॥ 


तथा वाग्विशेषामूचम्‌, ऋक्स- इसी प्रकार वागिशेष ऋक्‌, 
8 चोरी -छकस्थित साम जीर सामके अवय॒व- 
` स्थं च साम, सामावयवं चोदधौ- | मूत उदुगीथको भी पुरुष प्राण ओर 


पानन््यानेनैव अपानकी क्रिया न करता हुआ 
चम्‌ केवर व्यानसे दी सम्पन्न करता 


निर्वसयतीत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ / दै--यहं उसका अभिप्राय हैः ॥४॥ 


न केबलं बागाद्यमिव्याहरण-। केवर वाणी आदिका उच्चारण 
मेव-- ही नही-- 
अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथामग्नेम- 
न्थनमाजेः सरणं ढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपा- 
स्तानि करोत्येतस्य हेतो्व्यानमेवोदीथमुपा- 
सीत ॥ ५॥ 
इसके सिवा जो ओर भी वीयैयक्त कमं है; जेसे-अग्निका मन्थन; 


किसी सीमातक दोना तथा युद घनुषको खीचना--इन सब कर्मोको 
भी पुरुष प्राण ओर अपानकी किया न॒ करता हुआ ही करता है। इस 
कारण व्यानदष्टिसे ही उदगीथकी उपासना करनी चाहिये ॥ ५ ॥ 


७० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ ल्य १ 

अतोऽस्मादन्यान्यपि यानि, इसके सिवा नो दूसरे भी अधिक 
बीयंवन्ति कर्माणि = भयलसे निष्पत होनेवि वीरय 
निवै््यानि-यथागनेर्मन्धनम्‌ , छ द जते ममक म्यन, 
अनेर्मर्ादाया सरणं धावनम्‌ सीमातके दौड़ना ओर युद 


8 धनुषक्रो सीचना--उरनह भी पुष 
दृढस्य धनुष आयमनमाकप॑णम्‌- | प्राण जीर अपानको क्रिया न करते 


अप्राणन्ननपानंस्तानि करोति । | हए ही करता है । 
अतो विशिष्टो व्यानः प्राणा- | अतः प्ाणादिषृत्तियोकी ओेक्षा 


त - | व्यान विशिष्ट है; ओर राजाकी 
दङतिभ्यः । बिषिष्टस्योपासनं उपासनाके समान फर्वती होनेके 
ज्यायः य कारण विरिष्टी उपासना भी 
एतस्य हेतोरेतस्मात्कारणादूव्या उतर दे । स हेतुत मर्था 

इस कारणसे व्यानरूपसे दी उदगीथ- 
नमेबो दवीथमुपासीत, नान्यद्‌- | की उपासना श 
रर म॑वीरयवत्तरतव #यं ` | वायुकी अन्य वृत्तियों 
क क्‌ ˆ || नहीं । कर्मको भविक परवल बनाना 
फलम्‌ ॥ ५ ॥ ही उसक्रा फर है ॥ ५ ॥ . 
(= 


उद्गीधाक्षरोमे प्राणारिदशि 


, अथ खद्धद्रीथाक्षराण्युपासीतो हीय इति घ्राण 
एवोत्प्राणेन द्यत्तष्ठति वाग्गीर्वाचो ह गिर इत्या- 
चक्षतेऽन्नं थमन्ने हीद<ल्व< ` स्थितम्‌ ॥ ६ ॥ 

इसके पश्चात्‌ ` उद्गीयाकषरोकी उद्गीथः उस नामके अक्षरोकी, 
उपासना करनी चाहिये--उद्गीथ' इत शब्दे भाण ही ७त्‌' है, करयो 


प्ाणसे ही = हैः वाणी ही भोः है, वर्योकि वाणीको “गिरां कहते 
ह तथा जन ही थः है बयो अन्नम दी यह सब स्थित हे ॥ ६ ॥ 


खण्ड ३] क्राङ्रमाष्याथ ७१ 
अथाधुना खलूद्वोथाक्षराण्यु- इसके पश्चात्‌ अव उदुगीथके 
अक्षरोकी उपासना करनी चादिये । 

पासीत भक्तथक्षराणि मा | उदूगीथ, शब्दे उदूगीयमक्तिक 
नियतो विधिनि _ | अक्षर न सम्ञ ल्यि जायं इसलिये 
नित्यतो -उद्रीथइति, उद्गीथः यह विशेषण ल्गाते दै । 
तात्पर्य यह दहै किं उद्गीथ' ईस 
नामके अक्षरोकी उपासना करे; 
माक्षरोषासनेऽपि नामवत एवो- | क्योकि अमुक मिश्र फसा कहनेसे 
. | ज्ञेसे उस नामवाले व्यक्ति-विरोषका 

पासनं कृतं भवेदगुकमिश्रा इति | बोध होता दे, उसी भकार नामके 
अक्षरोकी उपासना करनेसे भी 

यद्वत्‌ । नामीकी ही उपासना छी जाती दे । 


उद्गीथनामाक्षराणीत्य्थः। ना- 


्राणएव उत्‌, उदित्यस्मिननकषरे | परण दी 'उद' हे, अर्थात्‌ उत्‌! 
प्राणदः । कथं प्राणस्योच्व- इस अक्षरम भाणदषटि करनी चादि । 
मित्याह-प्राणेन दयततष्ठति सर्वो माण सस भकार द दे सो 
ॐ बतकते है- सथ रोग प्राणसे ही 


ऽप्ाणस्यावसाददशं नात्‌; अतो- | उठते है, क्योकि प्ाणटदीनकौ शिथि- 


ऽदः प्राणस्य च सामान्यम्‌ || र्ता देसी गवी ह; अतः उत्‌ ओर 

प पराणकी समानता स्पष्ट ही है । 

बाग्गीः,बाचो ह गिर इत्याः 1 वाक्‌ “गी, हे; क्योकि शिष्ट रोग 

शिष्टाः । तथानं थम्‌, अनन हीदं | वाक्छ्ो 1 ४.६ म है 

सर्वस्थितमतो तथा अन्न थ' हं, ही 

सवेस्थितभतोसत्यभ्स्य यह सब स्थित दै; अतः अन्न ओर 
च सामान्यम्‌ ॥ & ॥ थ अक्षरकी समानता हे ॥ ६ ॥ 





७९ उन्दोग्योपनिषष्‌ [ अभ्याथ १ 
>< < € € € < € < ऋ < < ऋ ऋ < € ऋ € € ऋ ऋ "< ऋ< > >< ऋ 
उहीथाक्षरोमे चुटोक्ञादि तथा सामकेदादिदशि 
व्रयाणां शरुयक्तानि सामा- | इन तीनेकी समानता ्रूतिने 
न्यानि तानि तेनायुरूपेण शेषे- | बतकायी है । उन्दीके अनुसार्‌ शेष 
ष्वपि द्रष्टन्यानि- स्थानम भी समक्षनी चाहिये-- 
योरेवोदन्तरिक्षं गी; परथिवी थमादित्य एवोदायु- 
गरग्नस्थे सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गी ऋगवेदस्थं 
दग्धेऽस्मे वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति 
य॒ एतान्येवं विदवालुद्गीथाक्षरावयुपास्त उद्गीथ 
इति॥ ७ ॥ 
धौ ही उत्‌" है, अन्तरि “गी हैः जोर परथिवी “य ह । आदिल 
दी उत्‌ है, वायु भी, है जोर अग्नि “थः है । सामवेद ही “उत्‌? है 
यजुवद शी" है ओर ऋग्वेद “थ | इन अक्षरोको इस प्रकार जानने- 
बाला जो विद्वान्‌ “उद्गीथः इस भकार इन उदूगीथाक्षरोकी उपासना 
करता हे उसके ल्य वाणी, जो [ऋवेदादि] वाकूका दोह है, उसका 
दोहन करती है तथा बह अन्नवान्‌ ओर अत्नका भोक्ता होता हे ॥ ७ ॥ 
चौरेव उत्‌, उच्चैःस्थानात्‌ |, ऊचे स्थानवाखा होनेके कारण 
| युरोक ही उत्‌ ठै, रोको 
अन्तरि गीगिरणान्रोकानाम्‌ । | गिरण करे (निणलने) सं अन्तर 
शी" है ओर. भाणिका स्थान 
पएथिवीथं पराणिस्थानात्‌। होनेके करण प्रथिवी थः है । ऊँचा 


इ होनेके कारण आदित्य ही “उत्‌? ह, 
एव उत्‌; ऊभ्वत्वात्‌ । बायुगीर- अग्नि आदिको न 


गन्यादीनां गिरणात्‌ । अग्निस्थं ह है जर यज्ञसम्बन्धी 
र्वान्‌ ( आश्रय ) होनेसे 

यज्करमाबस्थानात्‌। सामवेद एव ९4 ६ रा स्वगंमे स्तुत 
स्वमससततत्ात्‌।यजुदो कारण सामवेद ही उत्‌, 
उत्‌, 1 । यजु ह यजुर्वेद शी? द क्योकि 


ण्ड | 


शाङ्ूरभाष्यारथं 


७३ 


गीर्यजुबां प्रत्तस्य हविषो देवता- 
नां गिरणात्‌ । ऋ्वेदस्थम्‌, 
ऋछच्यध्यूटत्वात्साम्नः । 
उदूगीथाक्षरोपासनफर्मधु- 
नोच्यते- दग्धे दोग््यसमे 
साधकाय । कासा! वाक्‌, 
इत्यादयो वाचो दोहः । 
ऋग्वेदादिशब्दसाध्यं फएलमित्य- 
भिप्रायः, तद्वाचो दोहस्तं 
खयमेव वाग्दोग्ष्यात्मानमेव 
दोग्धि । किं चान्नवान्प्रभूता- 
पनोऽ्नादशच दीपता्निभवति य 
एतानि यथोक्तान्येवं यथोक्त- 


गुणान्युद्गीथाक्षराणि विद्वान्स 
नुपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥ ^ 


यनुर्वदिथोके दिये हुए विकर देवता- 
लोग निगर्ते है तथा ऋगवेद 
हे; वर्थोकि ऋकमे ही साम 
अधिष्ठित हे । 


अव उदृगीथक्षरोको उपास्ननाका 
फर बतलाया जाता है-हस साधक- 
के स्यि दोहन करती दै, कौन ? 
वाक्‌, किक दोहन करती दहै ? 
दोहक, वह दोह क्या है १ इसपर 
कहते है-नो वाणीका दोह दै; 
अभिप्राय यह है कि जो छग्वेदादि 
शब्दसे साध्य फर दै, वह वाणीका 
दोह दहे, उसे वाणी स्वयं ही दुहती 
है । अपनेदीको दुहती है । यदी 
नदी वह अन्नवान्‌-बहुत-से अन्न- 
वाला ओर अन्नका] भोक्ता भो हो 
जाता ह, उसकी नटरामि उदीप 
रहती है, जो इन उपयुक्त उद्वीथा- 
क्षरोकी इन्दं उपयुक्त गुणोसे विशिष्ट 
जानकर, “उद्गीथः इस खूपसे उपा- 
सना करता हे ॥ ७ ॥ 


- ® अक्क -- 
सकामोपासनाका कम 


अथ खल्वाशीःसम॒द्धिरुपसरणानीदयुपासीतं 


येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत्‌ ॥ < ॥ 
अव निश्चय दी कामनाओंकी समृद्धि [ के साधनका वर्णेन क्या 
जाता है-] अपने उपगन्तव्य ८ ध्येयो ) को इस प्रकार उपासना 


~ 


॥ + 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ ष्याय १ 


< 96 95 < ऋ ष ¬ ८ ---2-8-5--हण् >< 88 -8€ 


ऋतः 
करे- निस सामके द्वारा उदृगाताको स्तुति करना हो उस सामका 
[ उसकी उत्पत्ति आदिक क्रमसे ] चिन्तन करे ॥ ८ ॥ 


अथ खल्विदानीमाशीः समू- 

(~ (~ (~ 0 
द्विराक्षिषः कामस्य समरद्धियथा 
भवेत्तुच्यत इति वाक्यशेषः । 
उपस्रणान्युपसतंव्यान्युपगन्त- 
व्यानि ध्येयानीत्य्थः; कथम्‌ ! 
इत्युपासीत--ष्व्रुपासीत ; 
तद्यथा-येन साम्ना येन साम्‌- 
विशेषेण स्तोष्यन्स्तुतिं करिष्यन्‌ 
स्याद्भवेदुद्गाता तत्सामोपधावे- 


दुपसरेचिन्तयेदुत्पत्यादिभिः।८॥ 


इसके अनन्तर अब निश्वय दही 
भशीःसमृद्धि- जिस प्रकार आशीः 
अर्थात्‌ कामनाकी समृद्धि होगी वह 
वतलायी जानी है, इस प्रकार इस 
वाक्यको पूर्तिं करनी चादिबे । उप- 
सरण--उपसर्तग्य-उपगन्तन्य अर्थात्‌ 
ध्येय--इनकी क्रिस प्रकार उपासना 
करनी चाहिये ? इनको उपासना इस 
प्रकार करे; यथा- जिस सामते 
अर्थात्‌ जिस सामविरोषसे उद्गाता- 
को स्तुति करनी ओ उस सामका 
उसकी उत्पत्ति आदिके क्रमसे उप- 
धावन-उपसरण अर्थात्‌ चिन्तन 


करे ॥ ८ ॥ 


यस्याखचि तार्चं यदर्थेयं तपिं या देवता- 


मभिष्टोष्यन्स्यात्ता 


ऋषिवास हो उस ऋषिका तथा 
उस देवताका चिन्तन करे ॥ ९ | 


यस्यामृचि तत्साम तां चर्च 


युपधाविदेवतादिभिः । यदायं | हो 


साम तं चर्षिम्‌। यां देवतामभि- (8 
्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत्‌ | बौर जिस देवता 


॥ ९ ॥ 


देवतामुपधावेत्‌ ॥ ९ ॥ 
[ चह साम ] जिस छचामे [ । 


प्रतिष्ठित हो ] उस ऋचाका, निक्ष 


जिस देवताकी स्तुति करटनेवाखा हो 
। 


वहं साम जि चाम अधिष्ठित 
उस ऋचाका उसके देवतादिके 
करे । तथा वह साम 
1 हदो उत ऋषिका 
की स्तुति करनेवाला 


ः शे ग देवताका भी चिन्तन करे॥९॥ 


खण्ड २] दाङ्कर्माष्या ७५ 
ऋ ऋ € ऋ ऋ 8 ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ‰ ॐ ऋ ऋ + # # ++ »< 


येनच्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन 
स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्त्स्तोममुपधावेत्‌॥ १० ॥ 


वह निस छन्दके दवारा स्तुति करनेवाखा हो उस छन्दका उपषावन्‌ करे 
तथा जिस स्तोमसे स्तुति करनेवाला शे उस स्तोमका चिन्तन करे ॥१०॥ 


येनच्छन्दसा गायत्यादिना | वह निस गायत्री भादि छन्दसे स्तुति 
उपा करनेवाला हो उस छन्दका उपधावन 

लाच सयात क्रे तथा निस स्तोमसे स्तुति करने- 
वेत्‌ । येन स्तोमेन स्तोष्य- | बाला हो उप स्तोमका चिन्तन करे । 
माणः स्यात्‌, स्तोमाङ्गफलस्य | स्तोमकरमका अङ्गमूत एक कर्को 


कर्वमामिलादातनेपदं स्तोष्य- | ्ा दनेवाड होनेसे यहाँ शोष्य 


माण इति, तं स्तोमगुपधा- | माण" _ ६ पदमे आलनेपदका 
भेत्‌ ॥ १० ॥ प्रयोग किया गया है* ॥१०॥ 


~~: ० ~ 


यां दिङमभिष्टोष्यन्स्यात्ता दिशमुपधावेत्‌ ॥ ११ ॥ 
जिस दिशाकी स्तुति कटेवाख हौ उस ॒दिशाका चिन्तन 
क्रे ॥ ११ ॥ 


` यां दिक्ञमभिषटोष्यन्स्यात्तां (क १ 1 ८ पा 

नातिन सतुति करनेवाख हो उस दिशाक्ा 

दिकगुपधावेदधिष्ठात्रादिभिः | उसके अषिष्ठाता देवता आदिक 
॥ ११ ॥ हित चिन्तन करे ॥ ११॥ 


--; ॐ $= 
‰ क्योकि शवरितजितः कतरभिप्राय क्रियाफठे' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार 
निस क्रियाका फर कर्ताको प्रास होनेवाङा होता है उसमें आत्मनेपदका प्रयोग 
आ करता हे । 





७६ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अण्याय १ 


आत्मानमन्तत उपसत्य स्तुवीत कामं भ्यायन्नपर 
मत्तोऽभ्यारो ह यदस्मे स कामः सष्येत यत्कामः 
स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १२ ॥ 


अन्तम अपने स्वरूपका चिन्तन कर अपनी कामनाका चिन्तन करते 
हुए भप्रमत्त होकर स्ति करे । जिस फलकी इच्छासे युक्त होकर वह 
स्तुति करता है वही फर तत्कारु समृद्धिको प्राप होता है ॥ १२ ॥ 


आतमानयुद्राता खं रूपं गोत्र- 
नामादिभिः सामादीन्क्रमेण स्वं 
चाटमानमन्ततोऽन्त उपसत्य 
स्तुवीत । कामं ध्याय प्रमत्तः 
स्वरोष्पव्यञ्जनादिभ्यः प्रमादम- 
बर्वन्‌। ततोऽभ्याशः क्षिप्रमेव ह 
यत्रास्मा एवंषिदे स॒ कामः 
समृध्येत समृद्धि गच्छेत्‌ । कोऽ 
सो १ यत्कामो यः कामोऽस्य 
सोऽयं यत्कामः सन्‌ स्तुवीतेति 


उदुगाताको चादिये कि गोत्र भौर 
नामादिके सहित अपना-अपने 
स्वरूपका चिन्तन करता हुभा 
अर्थात्‌ सामादि क्रमसे अन्तम अपना 
स्मरण करता हुभा स्तुति करे । 
[ किस प्रकार स्तुति करे १ ] फल- 
का चिन्तन करता हुशा अप्रमत्त 
होकर अर्थात्‌ स्वर, ऊभ्म एवं 
व्यज्ञनादि वर्णोचारणमे प्रमाद न 
करता हा [ स्तुति करे ] । इस 
प्रकार जाननेवाठे उस उपासककी 
जो कामना होती है वह शीघ्रदही 
समृद्ध ( फर्वती ) दो जाती है । 
वह कामना कौन-सी है? वह 
उपासक यत्काम अर्थात्‌ जिस 
कामनावाख होकर स्तुति करता 
हे । [ श्रृतिमे ] "यत्कामः स्तुवीतः 
इन पर्दोका दो गार प्रयोग दरक 


दिरुक्तिरादराथा ॥ १२ ॥ ख्यिदहै॥ १२॥ 
--ः: ‰ :- 
इतिच्छान्दोम्योपनिषदि प्रथमाध्याये तृतीयसखण्डमाष्य सम्पूणंम्‌ ॥ ३॥ 


"वीक 


(न ४ 


चतुर्थं सकणड 


उद्गीथसंजञक ओंक्रारोपारनासे सम्बद्ध आस्यायिक्ना 


ओमित्येतदक्रमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति 
तस्योपठयाख्यानम्‌ ॥ १ ॥ 


“ॐ यह जक्षर उद्गीथ है--इस प्रकार इसकी उपासना करे । 
“ॐ रेता [ उच्चारण करके यज्ञम उद्गाता ] उद्गान कर्तां & । उस 
८ उदगीथोपासना ) की ही व्याख्या कौ जाती है ॥ १ ॥ 


ओभित्येतदित्यादिग्रकृतस्या- | पूर््रस्तावित लोका अक्षका 
ही “ओमिव्येतत्‌ इत्यादि वाक्यदवारा 

क्षरस्य पुनरु पादानगु्रीथाक्षरा- | इसरिे ग्रहण किया गया है जिससे 
बीचमे “उद्गीथः शब्दके अक्षरोकौ 
उपासनासे व्यवहित हो जानेके 
कारण अन्यत्र प्रसङ्ग न हो जाय । 
उस पूरपरस्तावित अक्षरके ही अग्रत 
रस्यायृताभयगुणिकिषटस्यो- | ओर गमय _शुणविचिष्ट सवसो 
उपासनाका विधान करना है-इसीके 

यासनं बिधातव्यमित्यारम्भः । | ल्थि [आगे भ्रन्थ] जार दय 
जाता है । जोमित्यादि मन्त्री 
ओमित्यादिन्याखूयातम्‌ ।।१॥ । व्याए्या पके फी ब घुकी है ॥१॥ 


प 9 [अ 


चुपासनान्तरितवादन्यत् प्सञञ| 


मा भूदित्येवमर्थम्‌ ्रकृतस्येवा- 


७८ छान्दोग्योवनिषद्‌ [ अच्वाय १ 


देवा वे श्रत्योबिभ्यतच्लथीं विद्यां षाविङाश्स्त 
छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिरच्छादय<स्तच्छन्दसां छन्द्‌- 
स्त्वम्‌ ॥ २ ॥ 


[ एकं बार ] मू्युसे भय मानते हुए देउता्ओंने त्रयीवियारम प्रे 
किंया । उन्होने अपनेको छन्दसे आच्छादित कर ल्या । देवतार्ओन जो 
उनके द्वारा अपनेको आच्छादित किया वही छन्दोका छन्दपन है । 
[ अर्थात्‌ देवताओंको आच्छादित करनेके कारण ही मन्त्रौका नाम 
छन्द हुआ दै ] ॥ २ ॥ 


देवा वै मृत्योर्मारकाद्बिभ्यतः | प्रसिद्ध देवतार्थोने मारक मृयते 
कं कृतवन्तः ? इत्युच्यते-त्रयीं | भय मानते हुए 1 ८ # 
~. _ < ~ _ | बतराया जाता है- उन्होने त्र 
विद्यां 4 0 विया केदारा प्रतिपादित 
विषवन्तो वेदिकं कमं प्रारव्ध- | कमे पवेश क्रिया । अर्थात्‌ वैदिक 
वन्त॒ इत्यथः, तन्मृत्योख्धाणं | करमको ही मृयते बचनेका साधन 
मन्यमानाः । किं च ते कर्मण्य- | समञ्चकर उन्होने उसीका आरम्भ 


दोभि्नो कर दिया । तथा कमम जिनका 
, विनषु्तन्दोमिमनेनपहो- विनियोग नही है उन छन्दो-मन्त्रो- , 
मादि डबेन्त आत्मानं कर्मन्त- | से जप एवं होमादि करते हुए 


रष्वच्छादयंद्मदितवन्तः । य. | उन्दनि. अपनेको कर्मन्तरोमिं 

यसदभिमेरन्मदवसलत । १ | भाच्छादित कर दिया । क्योकि 
~ | उन्होने अपनेको इन मन्त्रि 
स्माच्छन्दसां मन्त्राणां छदना- आच्छादित कर दिया था, इसलियि 


त छादन करनके कारण ही छन्दा यानी 
च्छन्दस्त्वं प्रसिद्धमेव ॥ २ ॥ मनका छन्दपन प्रसिद्ध ही है ॥२॥ 


~ 0 २ 


खण्ड ४ | 


~~ (>< < > क = च > ग्् 


शाद्करभाष्याथं ७९ 
~ ¬ ¬> > >> ॐ ऋ >> > 


तालु तत्र श्दयर्यथा मस्स्यमुदके 


परिपदयेदेवं 


पर्यपदरयदचि साग्नि यजुषि । ते नु विदितो्वा ऋचः 
सास्नो यजुषः स्वरमेव प्राविदान्‌ ॥ ३ ॥ 


जिस प्रकार [मकरा] जलम मछलियोंको देख ता है, उसी प्रकौर 
ऋक्‌ , साम ओर यजुःसम्बन्धी करममिं रुगे हुए उन देवतार्ओको मयने 
देख छया 1 इस बातको नान लेनेपर उन देवतानि ऋक्‌+साम ओर यजुः 
सम्बन्धौ कमस निकृत्त होकर स्वर (ॐ इस अक्षर) मं ही प्रवेश किया॥३॥ 


तांस्तत्र देवान्कर्मपरान्ृत्युय- 
था लोके सत्स्यघातको मत्स्य- 
युदके नातिगम्भीरे परिपश्येद- 
डिशोदकसरावोपायसाध्यं मन्य- 
मानः,एवं पर्यपरयददृष्टवान्मृतयुः; 
कर्मक्षयोपायेन साध्यान्देवान्मेन 
इत्यर्थः । कासौ देवान्दद्!इत्यु- 
च्यते- ऋचि साम्नि यजुषि । 
ऋग्यजुःसामसम्बन्धिकरममणीत्य- 
थैः । तेलु देवा वैदिकेन 
कर्मणा संस्कृताः शुद्धात्मानः 
सन्तो मूत्योरिचिकीषितं विदित- 
वन्तः । विदित्वा च त ऊर्व 
व्यादृत्ता; करमभ्य छचः साम्नो 


निस प्रकार रोक बंसी ख्गाने 
ओर जरू उरीचने आदि उपार्योसे 
मछरियोको पकड़ा जा सकता हे, 
यह जाननेवाका मेरा उन्दं कम गहरे 
जलम देख लेता है उसी प्रकार मृद्युने 
कर्मपरायण देवता्ओको वहाँ [ छि 
हुए] देख ल्या, अर्थात्‌ मूल्युने यह 
समञ्ञ लिया किं देवतार्ओंको कम॑ 
्षयद्प उपायके द्वारा अपने अधीन 
किया जा सकता है । उसने देव- 
ताओंको कहो देखा £ यदह बतराया 
जाता दे- ऋक्‌ , साम ओर यजु 
अर्थात्‌ छक , यजुः जोर साम- 
सम्बन्धी कर्मे । वैदिक कर्मानुष्ठानके 
कारण शुद्धचित्त इए उन देवताओंने 
“मृसयु क्या करना चाहता है ® यह 
जान ख्या । यह जानकर वे छक; 


साम ओर यजुःसे अर्थात्‌ ऋक्‌ +यजुः . . 


ओर सामसम्बन्धी कमंसे निषृत् 


|. 
॥#. 


८@ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय १ 


यजुष ऋग्यजुःसामसबदात्कमं 
णोऽभ्युत्थायेत्यथः। तेन कमणा 
मृत्युभयापगमं प्रति निराश्षास्त- 


दपास्यामूवाभयगुणसमक्षरं स्वरं 


स्वरशब्दितं प्राविशन्नेव प्रविष्ट 
बन्तः; उभकारोपासनपराः 
संवृत्ताः । एवशब्दोऽवधारणार्थः 
सन्सयुच्चयग्रतिषेधार्थः । तदुषा- 
सनपराः संवृत्ता इत्यथः ॥२॥ 





होकर ऊपरकी ओर उठे । उष 
कर्मसे मृद्युके भयकी निवृतिके प्रति 
निरा होनेके कारण वे उसे शोदृ- 
कर भमत ओर शमय गुणविशिष् 
भक्षर॒ यानी स्बरर्भे--स्वरसंज्क 
अक्षरे ही प्रविष्ट हो गये अर्थात्‌ , 
ओंकारोपासनाम तत्पर हो गये । 
यहां "एवः शब्द भवधारणके स्यि 
होकर [ पूवं स्थानोकि साथ स्वरके ] 


¡ समुष्चयका प्रतिषेध करनेके रयि 


है । तात्य यह है कि वे उसीकी 
उपासनामें तत्पर हो गये ॥ २ ॥ 


~~~ 9 <-- 


ओकारका उपयोग ओर महत्व 


कथं पुनः स्वरशब्दवाच्यत्व- 
मक्षरस्य १ इत्युच्यते-- 
सामेवं 
विदय 


जिस समय [ उपासक अध्य्‌ 
समय वह ॐ एसा 


कितु वह॒ अक्षर स्वरः शब्दका 
वाच्याथं किस प्रकार है १ यह 


वतलया जाता दै-- 
य॒दा वा ऋचमाप्नोव्योमित्येवातिस्वरत्येवश 
यजुरेष उ स्वरो यदेतद््षरमेतद्मृतमभयं त 
देवा अमृता अभया अभवन्‌ ॥ ४ ॥ 


न ---- - 


©. 
खण्ड ४ | शाङ्कस्भाष्याथ ८१ 
4 ~> >~ ॐ 


यदा बा ऋचमाप्नोत्योमित्य- | निस समय [ उपासक । ऋकको 
्रप्तकरता है उस समय वह ॐ 


बातिसखरत्येवं सामेवं यजुः। एष | देसा कहकर हौ ऋं आद्रे 
उचारण करता दहै। इसी प्रकार 
उ स्वरः । कोऽसौ १ यदेतदक्रमे- | वह साम॒ भौर भजुको ५ 
करता है । यदी स्वर दै; वह स्वर 
तदभृतमभयम्‌ , तत्प्रविश्य यथा- | कौन हे १ यह जो अक्षर है, यह 
अमूत ओर अभयद्ूप दहै, उसमे 
गुणमेबाखता अभयाशाभवन्‌ | प्रविष्ट होकर उसीके गुणके समान 
देवगण भी अमृत जर अभय हो 
देवाः ॥ ४ ॥ गये ये॥४॥ 
व्क 


ओक्रारोपसनाका फल 

स य एतदेवं विद्वानक्षरं भ्रणोत्येतदेवाश्चर£ स्वरः 
मघ्रतमभयं प्रविराति तस्परविदय यदश्ता देवास्तदभ्रतो 
भवति ॥ ५॥ | 

वह्‌, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला होकर इस अक्षरकी स्तुति 
(उपासना) करता षै, इस जमृत जर अभयरूप अक्रमे ही प्रवेश कर 
जाता है तथा इसमे प्रविष्ट होकर लिस प्रकार देवगण अमर्‌ हो गये 
ये, उसी प्रकार अमर हो जाता है ॥ ५\, ॥ 


स योऽन्योऽपि देववदेवैतदक्ष- ¦ उन देवताओंके समान ही जो 
दूसरा उपासक भी इस अक्षरको इसी 

रमेवममृतमभयगुणं विद्वा्प्रणौ- । प्रकार अमूत ओर अभयगुणसे विरिष्टं 
जानता हभ उसकी स्त॒तिकरता दै- 

ति स्तौति-उपासनमेवात्र स्त॒ति-। यहाँ स्तुतिका शमिभाय उपासना 


र छान्दोग्योपनिषद्‌ [ भष्याय ! 
व > 9 > 9 ® 9 3 ध 99 9 क @ < ४ ॐ > 5 
रमिगप्रेता--स॒तथेवैतदेवाकषरं ही हे वह उसी पकार (उन्‌ 


देवताओंके ही समान ) इस॒ अप्त 
स्वरममृतमभयं प्रविशति । ओर अमयह्प अक्षरम ही प्रि 

' हो जाता हे । 

ल प्रवि- 

वलस्य च रजं अति तथा उसमें प्रविष्ट होनेपर, निष 
शनामिव राज्तोऽन्तरङ्गबदिरङ्ग- | प्रकार राजङरमे पवेश करेवा 
कोई राजाके अन्तरङ्ग रहते है ओर 
कोई ब हिरज्ग रहते है, इस प्रका 
बरिरङ्गताग परग्रह्मके अन्तरङ्ग-बदिरङ्गताका भेद 
षः; कि तदहि ! नदी रहता । तो फिर क्या रहता 
यदमृता देवा येना्रतत्वेन यद- | ६ ? जिस अयृतत्वसे देवगण अमर 
वा व हो गये थे उसी अमृतत्वसे विशिष्ट 
ता अभूवस्तेनैवाखृतत्वेन वि- | होकर यह भी उनी समान अमर 
मवति न न्यूनता हो जाता है । इसके अमृतत्वे न 


तो न्यूनता रहती है ओरन 
नाप्यधिकतामृतत्व इत्यर्थः ||५। अधिकता ही ॥ ५ ॥ 


तावन्न परस्य ब्रह्मणोऽन्तरङ्ज- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषवि पथमाध्याये 
चतुथखण्डभाष्यं सम्पूणेम्‌ ॥४॥ 





न 


कड्चम कण्ड्‌ 


ओकार, उ द्रीथ जौर अारित्यका अमेद 

प्राणादित्यदृ्िनिशिष्ट्ोद्वीथ- । पूर्वोक्त माण ओर भावित 
विशिष्ट उदृगीथोपासनाका दही 
स्योपासनरक्तमेवान्‌च प्रणवोद्री-| अनुवाद्‌ ( पुनरुल्टेख ) कर प्रणव 
जर उदुगीथकी, एकता करते हए 
थयोरेकत्वं कृत्वा तस्मिन्प्राण- | अंब उसी सङ्गमे भाण ओर 
, | रदिभयोके मदरूप गुणसे युक्त 
रिममेदगुणविरिष्टदृष्टथाक्च- | दृष्टस उस अक्षरकी ( उदूगीथाबय- 
वभूत ओंकारकौ ) भनेक पूत्ररूप 
रस्योपासनमनेकपुत्रफरमिदानीं | फल्वारी उपासना निरूपण 
करना है-ईसीख्यि [ आगेका 
व्यमित्यारम्यते-- मन्य ] आरम्म किया जाता है-- 
अथ खलु य उद्वीथः स प्रणवो यः प्रणवः स 
उदृगीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ ` एष भ्रणव 

ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १॥ ` 


निश्चय ही जो उद्गीथ है वही प्रणव दै जर जो पणव हे बहौ 
उदूगीथ दै । इस प्रसार यह आदित्य ही उदूगीथ है, यही णव 


हे, क्योकि यह ८ आदित्य ) ॐ एसा उथारण करता हआ हौ गमन ' 


करता दै ॥ १॥ 


अथं खलु य उद्रीथः स प्रणवो , निश्चय हो जो. उद्गीथ है ही 


बदुबुचानाम्‌, यश्च॒ प्रणव- | ऋवे पणव, तया उनका 1 





स्तेषां स एव छान्दोग्य उद्वीथ- 
शब्द्वाच्यः। असो वा आदित्य 
उद्वीथ एष प्रणवः । प्रणवरब्द्‌- 
वाच्योऽपि स एव बदृचानां 
नान्यः | 

उव्गीथ आदित्यः, कथम्‌ ? 


उद्वीथाख्यमक्षरमोमित्येतदेष हि 
बस्मात्स्वरनुचारयन्ननेकाथत्वा- 


दरातूनाम्‌ , अथवा स्वरन्गच्छ- 
मेति; अतोऽसायुद्रीथः सविता 


॥ १॥ 


` पृत्र है रेस कौषीतकि 
[ मादित्यसे ] भेदरूपसे 
त्र हग । यह अषिदवत उपासना 


क - 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


कर्‌ 


[ ण्याय ! 
3 
जो प्रणव है वही छन्दोग्य-उप- 
निषदूमं “उद्गीथः शब्दसे कका गवा 

। यह आदिल ही उद्गीथ है 
यही प्रणव है; अर्थात्‌ ऋमेदियोक 
यदो भ्रणवशब्दवाच्य भी वष्ट ह 
कों जौर नष है । 

आदित्य उद्गीथ है-सो कैसे ? 
क्योकि यह उदगीथसंजञक जक्षरको 
ॐ इस प्रकार स्वरन्‌-उचारण 
करते हुए जाता है [ यपि श्र 
आक्षेप, इस धातुसूत्रके अनुसार 
(स्वरन्‌, का अर्थं आक्षेप या गमन 
करते हुए होना चाहिये तथापि 
घातुर्ओके अनेक अर्थ होते है [इप- 

स्वरन्‌ का अर्थं “उच्चारण 
करते हुए" भी होता है] जथवां स्वरन्‌ 
यानी चलनेवाला सूयं [ प्रार्णोकी 


मदृप्तिके पति ॐ इस प्रकार अनुज्ञा 
करता हा | जाता हे । अतः यह 
सविता उद्गीथ ही ह ॥ १ ॥ 


9 -- ६ 
रस्मिरष्टसे आदित्यकी व्यस्तोपासनाका विधान ओर फट 


गानं किया था; इसीसे मेरि तू एक ही 
अपने 


पत्रसे एहा । भतः तू रदिमर्योका 
१ इससे निश्वय ही तिरे बहुत-से 


॥ २॥ 


~~ 


खण्ड ५] शाहृरमाष्याथं ८५ 


-तमेतश्च एवाहमभ्यगासि- | ननिश्वय इसीका मने आमिुल्य 


गीत _ | ( प्रमुखता ) से गान्‌ किया आ; 
षमाभिधरुख्मेन गीतवानस्म्या न न 


दित्यरहस्यभेदं कृत्वा ध्यानं | रदिमयोका अमेद करके ध्यान किया 
कृतवानस्मीत्यर्थः । तेन | थ । इसी कारणते मेरे तू एक ही 
~ | पुत्र दै रसा कौषीतकि -कुषी- 

त ५ तके पुत्र कोषीतकिने अपने पुत्रसे 
पुत्र इति ह॒ कोषीतकरिः डुषीत- | का । भतः तृ सूर्य ओर रम्यका 
कस्यापत्यं कौषीतकिः पुत्रथुवा- | मेदपू्क (१ ध 
दिवं कर्तृपद तत्वं कारण प 

चोक्तवान्‌ । अतो ८०८८ (ह्‌ ( (सा कल्लर ¦ 
च भेदेन त्वं पर्यावतयात्पर्या- | क्रियाकं स्थानने प्यवर्तयः यह 
वर्तयेत्यथेः, त्वं योगात्‌ । एवं | मध्यमपुरुषो क्रिया समन्ञनी 
बहवो वेते र चाहिये । ईसं प्रकार [ उपासना 
ब्‌ न तव पुत्रा भावन्य- |करनेसे) तेरे बहुत-से पुत्र उवन् होगे। 
न्तीत्यधिदवतम्‌ ॥ २ ॥ यह अषिदैवत उपासना है ॥ २ ॥ 





मुख्यश्राणदष्टिसे उद्गीथोपास्ना 


अथाभ्यात्म य पवाय सुर्य भ्राणस्तमुद्धीथमुषा- 
सीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥ 


इसके आगे अध्यात्म उपासना दै- यह जो स॒ख्य प्राण दै उसीके 
रूपमे उदुगीथकी उपासना करे, क्योकि यह {ॐ इस भकार अनुज्ञ 
करता हुभा गमन करता दै ॥ २ ॥ 


अथानन्तरमध्यात्मश्ुच्यते । { इसके भगे भध्यात उपासना 
य एवायं युख्यः प्राणस्तथुद्रीथ- | कदी जाती दै - य जो सुल्य प्राण 


<& छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अभ्याय 


ऋ ऋ >< >< > ऋ ऋऋ > 
युपासीतेत्यादि पूववत्‌ । तथो- | दै,उसीकी दष्टे उटूगीथकी उपना 
करे-इसं प्रकार पूर्ववत्‌ समङ्चना 

मिति शेष प्राणोऽपि स्वरननेत्यो- चाहिये । तथा यह्‌ प्राण भी ॐ 


वि इस प्रकार कहता हुआ भर्थात्‌ 
मिति नुत्ता इुवंनिव वागा- वागादिकी प्रवृतिके स्यि & 
इस प्रकार अनुज्ञा करता हुभ-पा 
गमन करता हे । मरणकाले मलने- 
वाटे पुरुषके समीप रहनेवारे रोग 
| प्राणका ॐ” उच्चारण करना नही 
प्राणस्योकरणं शृण्वन्तीति । | खनते [ इसीर्यि “अनुज्ञा करता 

हुजा-साः कहा हे ] । इसी सादय 
एतत्सामान्यादादिव्येऽप्योकरण- | के कारण आदित्यम भी ओंकारो. 


¦ रारण केवर अनुज्ञामात्र समञ्चना 
मनु्ञामत्रे द्रष्टव्यम्‌ ॥ ३ ॥ | चाहिये ॥ ३ ॥ 


दिप्रवृत्यथमेतीत्य्थः । न हि 


मरणकाले पुमूर्षोः समीपस्थाः 





-‡+ 


प्राणमेददष्टिसे मुख्य प्राण्गी व्यरतोपासनाका विधान ओर फल 


पपतम एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेको- 
ऽसति ह कोषीतकिः पुत्रमुवाच श्राणास्वं भूमान- 


मभिगायताद्वहवो वे मे भविष्यन्तीति ॥ % ॥ 


भने परुलतासे केवर इसीका ( स॒ख्य प्राणहीका 
ढं ) गान छया 
था, इसल्यि मेरे तू छकेला दही उतर हआ" ेसा कौषीतक्रिने अपने 


पुत्रसे कहा अतः तु भेर बहतसे पत्र होगि, इस अ 
विशिष्ट प्राणोका भुसतासे गान फर ॥ 9 ॥ ह 


= | _ पय पवाहमम्यगातिषय 
४ ब । अबलो बागादीन्‌ इत्यादि वाक्यका अर्थं पूववत्‌ ही 


खण्ड ५] जाङ्रमाष्यार्थं ८७ 
---2------ < ऋ > ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ क ॐ क 4 


ख्यं च प्राणं भेदगुणविशिष्ट- | समञ्चना चाहिये । अतः तू वागादि 
_ | ओर सख्य प्राण इनकी दृष्टिसे 
युद्रीथं परयन्भूमान मनसाभ- उद्गीथको मेदगुणविशिष्ठ देखता 
हुभाः उसक। मनसे बहत्वरूपसे 
अमिगान अर्थात्‌ पूर्ववत्‌ आवतंन कर । 
बहवो ममे मम पुत्रा भविष्य- तात्य यह है कि भेरे बहुत-से पुत्र 
होगे एेसे अमिप्रायसे युक्त होकर 

न्तीत्येवममिग्रायः सन्नित्यथः । | [ उसकी उपासना कर ] । 


© ¢ ५ 
मायतात्‌ पूवंवदावतयेत्यथेः । 


प्राणादित्येकल्वो द्वीथदृषटेरेक- ! एकपुत्रपरापिरप कल्के दोषसे 
ुत्रलफलदोपेणापोदितत्वाद्र- | भाण ओर आदिल्यके एकत्वद्प 
उदूगीथदृषटिकी निन्दा की जानेके 

रिमिप्राणभेददषटेः कतंव्यता | कारण इस खण्ठमे अनेक पक्रहप 
श फलकी प्राप्िके लिये ररिमि जीर 
चोधतेऽस्मिन्काण्डे बहुपुत् | प्राण इनकी मद्ड्टकना भतिपादन 


फरुत्वाथम्‌ ॥ ४ ॥ क्रिया गया हे ॥ ४॥ 


प्रणव ओर ऊद्गीथक्रा अभेद 
अथ खट य उद्वीथः स प्रणवो यः प्रणवः स 
उद्रीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुदरीतमनुसमाहरती- 
त्यनु समाहरतीति ॥ ५ ॥ 


निश्चय ही जो उदूगीथ दै, वही प्रणव है तथा जो प्रणव हे, 
वही उद्गीथ दै--इस भकार [उपरसना करके] उद्गाता होताके केम 
कयि हुए उद्गानसम्बन्पी दोषका अनुसन्धान ( संशोधन ) करता है, 
अनुसन्धान करता दै ॥ ५ ॥ 


अथ खलु य इद्रीथ इत्यादि | अथ खु य॒ उद्गीथः स्यादि 
प्रणवो द्ीथेकत्वदशेनयुक्तं तस्ये- | वायसे प्रणव जोर उद्गीथकी एता. 


का प्रतिपादन किया गया है| 
तत्फल्श्न्यते--दहोदषदनाद्धोता | उसीका यह फल बतल्मया जाता 


यत्रस्थ बंसति तर्स्थानं दोत्‌- है तृषदनात्‌--नहं पः 
होकर होता शंसन क्म करता है 
बदनं हौतरात्रमंणः सम्यकप्रयु- | उस स्थानका नाम होवृषदन दै, 
[ उससे ] अर्थात्‌ सम्यक्‌ प्रकारे 
अनुष्ठान किये इए होताके करमसे-- 
क्योकि केव्‌ देशमात्रसे किमी 
फलको प्राति नहीं हो सकती । क्या 
देवापि दुरुद्ीतं दषटयुदीतयुद्रानं | होता है £ उद्गाताद्ारा जो दुरु 
द्गीत-दोषयुक्त उद्गान किया होता 
हतयुहाना स्वकमणि क्षतं कृत- | दे जर्थत्‌ जपने कर्मत कोई दोप 
= _ ९, - किया होता है उसका वह (उद्गाता) 
४ समाहार भर्थात्‌ अनुसन्धान (दुधार) 
इत्यथः । चिकरित्सयेव धातुवै- | कर देता दै, जिस मकार कि चिकि 
त्सद्वारा धातुर्भोकी विषमता 
षम्यसमीकरणमिति ॥ ५ ॥ | ठीक कर दिया जाता है ॥ ५॥ 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि रथमाभ्याये 
प्चमसण्डभाष्यं सस्पणम्‌ ॥ ५ ॥ 


क्तादित्यथः । न हि देशमात्रा्‌ 


फलमाहतं शक्यम्‌ । किं तत्‌ ! 





| + 


कष्ठ कण्ड्‌ 
- ० -+- 
अनेक ६ प्रकारकती आधिदैविक उद्गीथोपाक्तनाएं 
अथेदाचीं सबफलसंपर्यथ- | +भव समस्त फर्की प्रा्िके 
लिये श्रुति उदूगीथसम्बन्धिनी मन्य 
रस्य उपासनान्तरं निभिः परकारकी उपासनार्ओका विधान 


त्स्यते-- करना चाहती हे । 
इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यास्च्यध्यूढ<साम्‌ तस्मा- 
हच्यध्यूढश्साम मीयत इयमेव साग्नरमस्तत्साम्‌ ॥९॥ 
यह्‌ ( परथिवी ) ही क्‌ है ओर ग्नि साम हे | कह यह 
[ अग्निसकञक ] साम इस कमे अधिष्ठित दै । अतः छक अधिष्ठित 
सामका ही गान किया जाता है । यह प्रथिवी ही (साः दै ओर अनि 


जमः दै; इल प्रकार ये [ दोनों मिखकृर । साम्‌ है ॥१॥ 


` यह प्रथिवी ही ऋक्‌ है, अर्थात्‌ 
क , _ | छक एथिवीदषटि करनौ चाहिये । 
पृथिवीदृष्टः कार्या । तथाग्निः | तथा जम साम दे, साममे जग्नष्टि 
करनी चाये । प्रथिवी ओर अग्नि 


इयमेव पृथिवी ऋक्‌ ऋचि 


भ्न्यगनिदष्टिः ं र ह 
साम, सान ऋक्‌ एवं साम किंस प्रकार है १ सो 


(~ ¢ 
पृथिव्यगन्योक्रक्सामत्वम्‌ ! 
इत्युच्यते-तदेतत्तदेतद्गन्याख्यं 
सामैतस्यां पृथिव्यागृच्यध्यूढम्‌- 


धिगतयुपरिमावेन स्थितमित्यथ, 


वतलाया जाता है-- यह जो भग्नि- 
संज्ञक साम है,रस एथिवीसंजञक क्‌ ` 
म अध्यूढ--अधिगत अर्थात्‌ उपरि 
मावसे स्थित है, जिसभक्ञार कि साम 





क यतक युत्रादिप्रातिरूप एकदेशीय फल्वाली उपा्नाओंका वणन 


किया गया है । 


९० 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


| मभ्याय 


ऋचीव साम । तस्मादत एव 
कारणादुच्यष्युटमेव साम गीयत 
इदानीमपि सामगैः | 

यथा च ऋषसामनी नात्यन्तं 
भिने अन्योन्यं तथेतौ प्रथि- 
व्यभ्री। कथम्‌ ? इयमेव प्रथिवी 


सा सामनामार्धशब्दवाच्या | ्‌ 


राधंशब्दवाच्योऽग्ररमस्तदेततथ- 
थिव्यगनिदयं सामेकशब्दाभिधेय- 
त्वमापन्नं साम । तस्मान्नान्योन्यं 
भिनें पृरथिव्यग्निदयं नित्यसंश्छि- 
टमक्सामनी इव । तस्माच प्रथि- 
व्यन्योऋकसामत्वमितयर्थः । 
सामाक्षरयोः एथिव्यम्निदृष्टि- 


ऋकू अधिष्ठित रहता है । अत 
इस समय भी सामगान करनेवारे 
्विोद्वारा कमे अधिष्ठित सामङ्च 
ही गान किया जाता है | 

जिस प्रकार ऋक्‌ ओर साम 
परस्पर अत्यन्त भिन्न नहीं है, उसी 
प्रकार ये प्रथिवी ओर अगिभी 
अव्यन्त भिन्न नहीं है । यह किप 
प्रकार ? [ सो बतखते है -- ] यह 
प्रथिवी ही सा साम, नामके जाघे 
रा्दद्वारा प्रतिपा है तथा उसके 
अन्य नामां “अम, शब्दका वाच्य 
अग्नि अमः है । इस प्रकार साम' 
इस एक शब्दके वाच्यत्वको प्राप्त इए 
वे हीये प्रथिवी जौर अग्नि दनं 
साम कहे नाते है । अतः ऋक्‌ ओर 
सामके समान सर्वदा मिले.जनुे 
रहनेके कारण ये प्रथिवी ओर 
अग्नि एक-दूसरेसे भिन्न नहीं है । 
भाव यह कि ईइसीसे ए्थिवी जर 
अननक ऋक्‌ एवं साम कहा गया 
हे । किन्दी-किन्दीका मत कि 
-साम' शब्दके अकषरोमे एथिवी ओर 
अग्निद्टिका विधान करनेके लिमि 
दी (इयमेव सा अगनिरमः देता 
उपदेश किया गया है ॥ १ ॥ 


9 २ 


खण्ड, ६ 1 शाङ्करभाष्यं ९१ 
अन्तरिक्चमेवर्ग्वायुः साम तदे तदेतस्यासुच्यण्युढ९ 
लाम । तस्माद च्यध्यूढरसाम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा 


वायुरमस्तत्साम ॥ २ ॥ 
अन्तरिक्ष ही रक्‌ हे ओर वायु साम दै। वह यह साम इष 
कमे अधिष्ठित दे; अतः कमे अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता 
हे । अन्तरिक्ष ही “सा' है भौर वायु "अमः है । इस प्रकार ये { दोनों 
मिरुकर ] साम है ॥ २ ॥ 
द्यौ रेवर्गादित्यः साम ॒तदेतदेतस्याखरच्यध्यूढः 
साम । तस्माद च्यध्यूढश्साम गीयते। यो रेव सादित्योऽ- 


भस्वत्साम ॥ ३॥ 
धौ ही ऋक्‌ है ओर आदित्य साम ह । वह यह [ भादित्यरूप | 
साम इस [ चौरूप ] ऋक अधिष्ठित है जतः चछकू्म. अधिष्ठित सामका 
ही गान किया जाता है। चौ दही शा है ओर आदित्य “अम है । 
इस प्रकार ये [ दोनों मिङकर ] साम दै ॥ ३॥ 
अन्तरिक्मेवर्गवायुः सामेत्या- | अन्तरिक्ष ही ऋक्‌ है जोर वायु 


ई साम है इत्यादि पूर्ववत्‌ स्मक्चना 
दि पूववत्‌ ॥ २-३२ ॥ चाहिये ॥ २-२ ॥ 


--* ° {- 


नक्षत्राण्येवक्चन्द्रमाः साम॒ तदेतदेतस्याखच्य- 
ध्युढश्साम । तस्माद च्यध्यूढःसाम गीयते । नक्षत्रा 
तयेव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम ॥ ४ ॥ 

नक्षत्र ही चक्‌ है ओर चन्द्रमा साम हे । वह यह [ चन्द्रमारूप |] 
साम इस [ नकषत्रहप ] कम अधिष्ठित दै । अतः च्छक जधिषठित 
सामका ही गान. किया जाता दै। नक्षत्र दी शा है ओर चन्दमा 
(जमः हे, इव भरकर ये [ दोनों मिर्कर ] साम टै ॥ ४ ॥ 


नक्षत्राणामपिपतिशन्द्रमा चन्द्रमा नक्ष्नोका अधिपति ह 
अतः स साम ॥ ४॥ इसख्यि [ नक्रोके ऋका 
होनेपर ] वह साम है ॥ ४॥ 

यं य की 

अथ यदेतदादित्यस्य शुक्टं भाः सैवर्गय यन्नीलं 

परः कर्णं तत्साम तदेतदे तस्याग्र च्यष्युढश्साम । 

तस्माहच्यभ्यूढ<साम गीयते ॥ ५ ॥ 

तथा यह जो आदिव्यक शुङ्ज्योति है वही ऋक्‌ है जीर उसे 

जो नीरुवणं जव्यन्त इयामता दिलायी देती है वह साम है। वह यह 

[ नीरणेरूप ] साम इस [ शृ्धज्योतीरूप ] ऋकूमे अधिष्ठित दै । 
भतः ऋक्‌मं अधिष्ठित सामक ही गान क्रया जता दहे ॥ ५॥ 

अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं | तथा यषहट॒जो आदिव्यकीौ शु 

भाः शुक्ला दीप्तिः सेव्‌ । अथ | मरभा- शुक दीति है दही छद्‌ 

यदादित्ये नीलं परः छृष्णं | है । तथा आदित्यम बो नीरं 

परोऽतिशयेन काष्ण्यं तत्साम, | जयन्त इयामता दै बह साम दै 


< र) किन्तु वह तो एकमात्र समाहित 
तद्ध कान्तसमादितदृषेदुश्यते दिवा प्रो ही दिखायी देती 
॥ ५ ॥ है॥ ५॥ 


अथ यदे वेतदादित्यस्य शक्टं भाः तैव साथ 
यन्नीटं परः कृष्णं य एषोऽन्तरादित्ये 
दिरणनयः पुरूषो दइ्यते हिरण यरमशररहिरण्यकेदा आर- 
णखात्सवं पव सुवर्णः ॥ ६ ॥ 


जया य्‌ जो मादिका शुक परकाश दै बही (सा दै ओर ज नीरवर्णं 
अयन्त इ्यामता है वहो अमः है, ये ही दोनों मिरुकर साम है । तथा यह 


खण्ड £ ] 


शा ङ्कुरभाष्याथ 


शद 


जो आदयमण्डठके अन्तर्गत घुवर्णमय-सा पुरुप दिखायी देत। हं, जो 
वर्णके समान इमश्रर्मोवाङा (दादी -म्िवास) ओर स्वणंसदक्ष केशवा 
दै तथा जो नखपयन्त सारा-का-सारा घुवण-सा ही है ॥ ६॥ 


ते एवैते माः शुक्लृष्णत्वे 
सा चाम साम। अथय 
एषोऽन्तरादित्य आदित्यस्यान्त- 
भ्ये दिरण्मयो दिरण्मय इव 


हिरण्मयः । न हि सुवण॑विकार- 


त्वं देवस्य संभवति ऋक्सामगे- | 


ष्णत्वापहतपाप्मत्वासंभवात्‌ । न 
दि सोवर्णेऽ्चेतने पाप्मादिप्रापि- 
रस्ति येन प्रतिषिध्येत । चाषे 
चाग्रहणात्‌ । अतो लु सोपम एव 


हिरण्मयशब्दो ज्योतिर्मय इत्य- 


वे ही ये श्चुक्छत्व एवं ृष्णत्वरूप 
प्रकाश्च क्रमशः साः ओर “अमः 
होनेके कारण साम ई । तथा यह 
जो आदिल्यके अन्तर्गत--आदिल्य- 
के मध्यमे दिरण्मय--युवणमयके 
सच्श होनेके कारण घुवर्णमय 
[ साक्षात्‌ वणका नहीं / क्योकि 
सरयदेवका घुवर्णके विकाररूप होना, 
सम्भव नहीं है; [ विकारखप होनेपर | 
उनका ऋक एवं सामरूप प॑ोवाला 
तथा निष्पापहोना सम्भव न होगा; 
को करि घुवर्णमय अचेतन पदार्थोमिं 
तो पाप आदिकी सम्भावना ही नही 
है, जिसके कारण उनका प्रतिषेष 
किया जाय । इसके सिवा, नेत्रस्य 
उपास्य पुरुषमे सुवणंविकारत्वका 
अहण भी नहीं किया जाता । ईइस- 


| स्यि यह दिरण्मय शब्द लपोपम 


ही है# अतः इसका अर्थं ज्योतिमय 
है | भगेके दिरण्मयादि श्दोका 
अर्थं भी इसीके समान र्गाना 


थ । उत्तरेष्वपि समाना योजना॥ चाहिये । 


` 
@ अर्थात्‌ हके आगे उपमावाचक इव' शब्दका कोप हुआ है । 


__ 


९७ 
पुरुषः पुरि शयनात्पूरयति 


बा स्वेनात्मना जगदिति, 


दुश्यते निवचचकषुभिः समाहित- 


चेतोमित्रयचर्यादिसाधनपिपषैः। 
तेजस्विनोऽपि उमभरुकेरादयः 
कृष्णाः स्युरित्यतो विशिनष्टि- 
दिरण्यर्मभर्दिरण्यकेश इति । 
ज्योतियान्येवास्य इ्मभूणि के- 
ाद्चेत्यथेः । आग्रणखास्रणसो 
नखाग्रं नखाग्रेण सह सर्वैः सुवर्ण 
इव भारूप इत्यथः ॥ ६ ॥ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ मध्याय १ 


> ऋज 
[ एसा जो हिरण्मय ] पुल, 
[ रारीरखप ] पुरम श्चयन करनेके 
कारण अथवा अपनेद्रारा सारे नगत्‌- 
को पूणे करता है इसि यह 
पुरुष कहलाता दै, जिनकी इन्दा 
याह्य विषयोँसे निषत्त हो गयी है 
उन समाहित चित्त ओर ब्रह्मचर्यादि 
साधनवान्‌ पुर्षोको दिखायी देता 
है- तेजस्वी होनेपर भी उसके 
दादी-्मूढ आदितो कलि ही होगे, 
अतः श्रुति उसको विरोषता बतलाती 
दे जो घुनहरी मश ओर घुनहडे 
केर्चोवाखा है; भर्थात्‌ इसके दाी- 
मूड ओर केश भी ज्योतिर्मय ही 
है । तायं यह हेः कि यह नल- 
पयंन्त॒ अर्थात्‌ नखाग्रसे लेकर 
सारा-का-सारा सुवर्णके समान 
प्रकाशस्वरूप ही दहै ॥ ६ ॥ 


` "स ०--- 


तस्य यथा कप्यासं युण्डरीकमेवमक्षिणी तस्यो- 
दिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह 
वे स्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद्‌ ॥ ७ ॥ 


उसके दोनों नेत्र बन्द्रके नैटनेके 
वणवाल पुण्डरीकं (कमर) के समान ह | 
करयोकि वह सम्पूणं पापस ऊपर गया हु है 
हे वह निश्चय ही सम्पूण पापस उपर उठ ज। 


स्थान (गुदा) के सदश्च अरण 
उसका “उतः पसा नाम है, 
\ जो इस प्रकार जानता 
ता हे ॥ ७ ॥ 


खण्ड दे } 
= (७ ५८ 
तस्यैवं सर्वतः सुवणवणंस्याप्य- 
ह्णोर्विकषेषः । कथम्‌ { तस्य 
यथा कपेमकंटस्यासः कप्यासः, 


आसेरपवेशना्थस्य करणे घन्‌, 


कपिपृषठान्तो येनोपविति । 
कप्यासं इव पुण्डरीकमत्यन्त- 


तेजस्वि, एवमस्ब देवस्या- 


क्षिणी । उपमितोपमानतान्न 


हीनोपमा । 
तस्यैवंगुणविरिष्टस्य गोण- 
मिदं नामोदिति। कथं गौणत्वम्‌! 
स एष देवः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः 
पाप्मना सह ततकायभय इत्यथं। 
(व आत्मापदरतपाप्मा' इत्यादि 
वक्ष्यति । उदित उद्‌ इत उद्वत 
इत्यर्थः, अतोऽसाघ्ुमामा । 


तमेवंयुणसंपन्नयुलामानं यथोक्तेन 


प्रकारेण यो वेद सोऽप्येवमेबो- 


€ 
चाङ्करमाष्याथ ॥ 
~अ 2 >-9- >- <-> >< < <~ 


इस प्रकार - सब ओरसे सुवणं- 
होनेपर भी उसके नेत्रम एक 
विरोषता है । किंस प्रकार £ उस 
देवके, जैसा किं कप्यास होता है 
उसके सरा लाल पुण्डरीक (कमरे 
समान अलयन्त तेजस्वी नेत्रे । कपि- 
मर्कट ( वंदर ) के आसिका नाम 
कष्यास दै, उपवेशन (ढे) अथके 
वाचक आसुः धातुसे करणमे 'घम्‌' 
पर्यय होनेपरं “आसः शब्द सिद्ध 
दोता ह । अतः कप्यासः का अथं 
वानरकी पीठका अन्तिम भाग (गुदा › 
है, जिससे कि वह वैठता । 
[यहो पुण्डरीकः को कप्यास' से 
उपमित किया गया दै जौर नेर्तरोको 
पुण्डरीककी उपमा दी गी है; इस 
प्रकार] उपमितोपमान होनेके कारण 
यह हीनोपमा नदीं हे । 

देसे गुणवाटे उस आदिवयान्तगंत 
पुरुषका “उतः यह गौण नाम हे। 
इसकी गौणता किप प्रकार टै 
वृह यह देव सम्पूणं पर्पोसे अर्थात्‌ 
पापोसहित उनके कार्योसे उदित 
अर्थात्‌ ऊपर गया हुआ दै, इसलि 
वृह “उतः नामवाख ह । जैसा कि 
“लो आत्मा पापसे हट हुआ है 


| इत्यादिरूपसे श्रुति आगे कहेगी । 


एसे गुणसे युक्त उस ˆउत्‌' नामवाले 
पुरुषको जो पूर्वोक्त भ्रकारसे जानता 
है बह भी. इसी प्रकार सूरण 


" 


९६ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ सभ्याय १ 


देतयुद्रच्छति सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः। | पपेंसे ऊपर उट जाता हे । ह ओर 
हे वा इत्यवधारणार्थो निपातौ | वै'मे निश्वया्थक निपात है- अर्थ्‌ 
उदेत्यवेत्यथंः । ७ | ऊपर उठ ही जाता है ॥ ७ ॥ 
तस्योद्गीतवं देवस्यादित्या- | आदित्यादिके समान उस [ उत्‌- 
संज्ञकं | देवका उदूगीथत्व कहना 
दीनामिव विवक्षितत्वादाह-- ` इष्ट होनेके कारण श्रुति कहती ै- 
तस्यक्चं साम च गेष्णो तस्मादु ्वीथस्तस्माच्चे- 


वोद्वातेतस्य हि गाता । स एष ये चामुष्मात्पराओो 
ोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदेवतम्‌ ॥ < ॥ 


उस देवके छक ओर साम--ये दोनों पक्ष है ¦ इसीसे वह देव 
उद्गीथरूप है, ओर इसीसे [ इसका गान करनेवास ] उद्गाता 
कंटछाता दे, क्योकि बह इस (उत्‌) छा ही गान करनेवारा होता है। 
बह यह उत्‌ नामक देव जो इस ८ आदित्यरोक ) से उपरके लोक दै 
ओर जो देवतार्ओंको कामना है, उनका शासन करता है । यहं 
अधिदेवत उदूगीथोपासना दै॥ ८ ॥ 


तस्यक्चे साम॒ च गोष्णो |. उत देवके चऋक्‌ बोर साम 


| ॥ गेष्य हे जथति पूर्वोक्त एथिवी जौर 
परथिल्यायक्तलक्षणे पवेणी । | अग्नि आदि उसके दोनों पष है, 


र क्योकि वह देव सर्वखूप है । वह 
सर्वात्मा दिं देवः। परापरलोकं | परोक ओर इहसोकसम्बन्धी काम- 


नार्भोका शासन करेवा है; अतः 

काभेरितत्वादुपपद्ते पृथिव्य | उसका प्रथिवी ओर अग्न आदिषूप 
५. | ऋक्‌ओर साममय पसि युक्त होना 

ग्न्यादुक्सामगेष्णत्वम्‌ , सवेयो- स ही हे । तथा सनका फारण 


मी [ उसका ऋछक्‌-सामद्प 
नित्वाच 1. परकषोवाखा होना उचित है] । 








खण्ड द | ज्ाङ्करथाष्या्थे ९७ 


इस प्रकारं क्योकि वह उत्‌ 
नामवाख है तथा ऋक्‌ ओर साम 
मगेष्णश्च तस्मादेक्सामगेष्णत्व- | उसके पक्ष है, इसलियि ऋक्‌.साम- 
ख्प पक्षोवार होनेसे उसमें प्राप्त 

परोक्षेण | उदगीथलका परोक्षखूपसे प्रतिपादन 
हो जाता दै; क्योंकि वह देव परोक्ष 
परोक्षप्रियत्वादेवस्य, तस्मादु रीथ] भिये । इपर्यि वह उद्गीथ है 
ठेसा कहा । इसी देसे, क्योकि 

इति । तस्मास्वेव हेतोरुदं गाय- [यज्ञम उद्गान करनेवाला] उत्का 


= गान करता है इसल्यि वह उद्गाता 
तीतयुता।तस्ादभेतस्व यथो कहता है । इस प्रकार कर्योकि वह 


्तस्योन्नाम्नो गातासावतो युक्तो-। उपयुक्त उत्‌ नामक देवका गान 
करता है इसल्यि उद्गाताका उद्गाता 


यत एवगनामा चसाब्रक्सा- 


प्राप्ठमुद्रीथत्वमुच्यते 


द्रातेति.नामप्रसिद्विरुद्रातः। | रेखा नाम परसिद्ध होना उचित ही है। 
स एष देव उ्नामा ये चारुः | वही यह उत्‌ नामक देव इस 
१ ध आदित्यलोकसे परे जानेके कारण जो 


ष्मादादित्यात्पराश्चः प्ररागश्च- 
नादर्ध्वा लोकास्तेषां लोकानां 


चेष्टे न केवलमीशित्त्वमेव च- 
शब्दाद्भारयति च, “स दाधार 
पृथिवीं च्ायुतेमाम्‌' (यजु ० २५। 
१० ) इत्यादिमन्त्रवर्णात्‌ । किं 
च देवकामानामीष्ट॒इत्येतदधि- 
देवतं देवताविषयं देवस्योदरी- 


पराड्‌ यानी परकै लोक दहै उन 
लोर्कोका ईश्वर (शासक) है । वह 
केवल शासनकर्ता ही नही है चच 
शब्दसे यह मी सिद्ध होता हे कि वहं 
उनका धारण भी करता है; जैसा 
कि “उसने इस प्र्वीकरो ओर चुलोक- 
को धारण किया" इत्यादि मन््रवण॑से 
सिद्ध होता है । यही ` नहो, वह 
देवताओंकी कामना्ओंका भी शासक 
है-इस प्रकार यह उस देवका- 
उदूगीथका अधिंदैवत-देवता विषयक 


थस्य स्वसूपयुक्तम्‌ ॥ ८ ॥ | स्वरूप कहा गया ॥ ८ ॥ 
इतिच्छान्दोम्योपनिषदि प्रथमाध्याये षष्ठखण्डमाष्यं सस्पणेम्‌॥ ६ ॥ 


भृतिचे भरमाणित डोती हे । 


खयः कर्ड 


अध्यात्म-उद्गीथोपासना 
अथाध्यास्मं वागेवकर्प्राणः साम तदेतदे तस्यामूच्य 


"बरूढर<साम तस्माहच्यध्यूढ<साम गीयते । वागेव सा 
प्राणोऽमस्तत्साम ॥ १ ॥ 


इससे अगे अध्यास उपासना है- बाणी हौ छक है ओर प्राण 
साम हे ।; इस प्रकार इस [ वाकल्प ] ष्छकमे [ प्राणङ्ूप ] पाम 
` अधिष्ठित है । अतः कम अिषठित सामक ही गान किया जाता है। 


वाक्‌ ही सा हे ओर प्राण अम, है । इस भकार ये [ दोनों मिल्क | 
साम है॥ १॥ | 


अथापुनाष्यात्मगुच्यते- वा- आधिदैविक उपासनाके पश्त्‌ 


र अव अध्यात्म उपासनाका वणन क्रिया 
-वक््राणः साम, अरोपरि- | जाता हे- नीचे-ऊपर स्थान होने- 
8: भ तुल्य होनेके कारण वाक्‌ ही 
स्थानत्वसामान्यात्‌ । प्राणो ऋक्‌ दे ओर पराण साम हे । वधुके 
< सहित घ्राणिन्द्िय दी यहाँ प्राण का 
ाणुच्यते सह वायुना । वागेव | गया है । वाक्‌ ही “साः है ओर 


म इत्यादि र भाण -अमः हे इत्यादि कथन पूर्ववत्‌ 
सा प्रागाऽम इत्यादि पूववत्‌ ॥१॥|| समञ्लना चाहिये ॥ १ ॥ 


[वि रि 0 = 
चत्तुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्याखच्यध्यूढ साम. 
` तस्माद च्यध्यूढ<साम गीयते । चक्षुरेव सात्मामस्त- 
 त्साम॥२॥ 


(~ 


शः ७] शाङ्करभाष्याथं ९९ 


२ 
चक्षु ही छक है ओर जाला साम ह । इस प्रकार इस [चक्षुरूप्‌] 
ऋक यह [आातमारूप्‌] साम जमिष्ठित है । इसख्यि ऋकर्मे अधिष्ठित 
्ामका ही गान क्रिया जाता हे । चश्च ही सा" है लौर आत्मा अमः 
है । इस प्रकार ये [दोनों भिल्कर्‌] साम है ॥ २ ॥ 
चुरेव क्‌, आत्मा साम, | च्च ही चक्‌ है जौर आत्मा साम 
आसेतिच्छा ततस्यला- है। यं "आत्वा, शब्दसे छायात्माका 
प र रहण है; कर्योकिं वही नेत्रम स्थित 


होनेके कारण साम दै ॥ २॥ 


---: ® :- 


शरोत्रमेवङ््मनः साम॒ तदेतदेतस्यामच्यचवूढ ताम्‌ 
तस्मादच्यध्यूढः्साम गीयते । श्रोत्रमेव सा मनोऽ- 
मस्तस्साम ॥ ३ ॥ । 
श्रोत्र ही ऋक्‌ है जीर मन साम है । इस मकार ईस [श्ोत्रर्प)] 
च्छक यह [ मनरूप | साम अधिष्ठित है । णतः छक अधिष्ठित सामा 
ही गानक्रिया नाता है । धोत्र ही सा षै जौर मन “अम' है । इस 





त्साम ॥ २॥ 


` प्रकार ये [ दोनों मिखकर ] साम है॥२॥ 


ोतरमषङर्मनः साम्‌, श्ोत्रस्या- |. भरोत दी ऋक है ओर मन साम 
दै, ्रोत्रका अधिष्ठाता होनेकते कारण 


धिष्ठातृत्वान्मनसः सामत्वम्‌।। २॥ मनकी सामरूपता है ॥ ३ ॥ 


----न्क्-- 
अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवगेथ यन्नीलं परः 
छृष्णं तत्साम । तदेतदेतस्या्च्यध्यूढ<साम । तस्मा 
च्यध्यूढश्साम मीयते। अथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्छं भाः 
सेव साथ यन्नीलं परः ष्णं तदमस्तत्साम ॥४॥ 


छाः उ - 


१०० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अभ्याय १ 


>< ८-8-90 ऋ ~ > ~ 
तथा यह नो ओंखोका शुक्र प्रकाश है वह ऋक्‌ है भौर नो 
नीलवण अलन्त उयामता दै वह साम दै । इस प्रकार इस | शुक्ट 
परकाशखूप ] ऋकर्मे यदह [ नीलवण अत्यन्त इयामतारूप ]. साम 
अधिष्ठित है । अतः ऋक अषिष्ठित सामका ही गान किया नाता 
है । तथा यह जो नेत्रका क्छ प्रकार है वहो ्ा' दै ओर नो 
नीरुवणं परम श्यामता है वही “भमः है । इस प्रकार ये ` | दोनो 
मिर्कर ] साम है ॥ ४॥ 


अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः | तथा यह जो नेतरोका शुक्छ पकाश 

सेवक । अथ यत्रीलं परः कृष्ण- | दै वही छक दै गौर नो तू 

~ समान दक्शक्तिका अधिष्ठानम 

मादित्य इव दु नीरुवणे अतिशय इयामत्व टै वह 
तत्साप्र ॥ ४ ॥ साम है॥ ४॥ 


णि - वि 
आदिव्यान्तगंत ओौर नेत्रान्तरत पूरूषोक्ी एकता 


अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो ददयते सेवक्त॑त्ताम 
तदुक्थं तयजुस्तदूवरह्म । तस्थतस्य तदेव रूपं यदमुष्य 
रूपं यावसुष्य गेष्णो तो गेष्णो यन्नाम तन्नाम ॥५॥ 


तथा यह नो नेत्रकि मध्यम पुरुष दिखायी देता है बही छक 
दे, वही साम दे, वही उक्थ ह, बही यजुः है ओर वही बरहम ( वेद ) 
दै । उस इस पुरुषका वही रूप दै जो उस ( आदि्ान्तर्गत पुरुष ) 
का रूप है। जो उसके पक्ष है वही इसके पृ है, जो उसका नाम द 
वही इका नाम दै ॥ ५, ॥ ॥ 


आण्ड ७1 

अथय एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो 
दुरयते, पूर्ववत्‌ । सैवग्यात्मं 
वामाद्या पृथिव्याथा चाधि- 
देवतम्‌ । प्रसिद्धा च ऋक्पाद्‌- 
ब्रद्ाक्षरात्मिका तथा साम । 
उक्थसादचर्यादया स्तोत्रं साम 
ऋक्‌ शचणुक्थादन्यत्‌ । तथा 
यजुःस्वाहास्वधावषडादि स्मेव 
बाग्यनुस्तर्स एव; सर्वात्मक- 
त्वात्सर्वयोनित्वाचेति ्यबोचाम। 


ऋगादिप्रकरणात्तद्भब्ेति त्रयो 
वेदाः । 


तस्यैतस्य चाज्ञस्य 
परुषस्य तदेव रूपमतिदिरयते । 
किं तत्‌ १यदगुष्यादित्यपुरुषस्य । 
हिरण्मय इत्यादि यदधिदेवत- 
यक्तम्‌ । यावष्ष्य गेष्णौ पणी 
तावेवास्यापि चाषस्य गेष्णो । 
यच्चाधुष्य नामोदित्युद्रीथ इति 
च तदेवास्य नाम । 


४ १०१ 


शाङ्करभाष्य 
४-४८-9 8-82-89 9995-9 80 5 ~ = 9-95-55 85 8 98 


तथा यह्‌ जो नेत्रोकि मध्यमे 
पुरुष ॒दिखरायी देत ईै-इस 
वाक्यका तायं पूर्ववत्‌ समश्चना 
चाहिये । वही वागादि अध्या 
जीर ए्थिवी भादि अधिदैवत क्‌ 
ह, जिसके पाद नियत ॒अक्षरोसे 
वैधे होते है वह ऋक्‌ तो प्रसिद्ध 
ही है--तथा वही समद । 
अथवा [ इन ऋक्‌ जर साम, 
शब्दोका अर्थं इस प्रकार समन्नना 
चाहिये-- ] उक्थक्रा सहचारी 
होनेसे स्तोत्र दौ साम दै ओर 
उक्थसे भिन्न जो शस्त्र (मन्तरविरोष) 
है वे दी ऋङ्‌ है; तथा स्वाहा, स्वधा 
जर वषट्‌ आदि सम्पूणं वाक्य ही 
यजुः है । सर्वातक ओर सवका 
कारण दोनेके कारण बह यजुः 
स्वयं पुरुष ही है--एेसा हम पहले 
ह चुके रै । यहाँ ऋगादिकरा प्रकरण 
होनेसे'वही बरहमहै'इस वाक्यम [नह्म- 
शब्दसे] तीनों वेद समञ्षने चाहिये । 

उस इस नेत्रस्य पुरुषका वही 
खूप बतलाया जाता है । वह्‌ रूप 
क्या है १ जो खूप उस आदिव्या- 
न्तग॑त पुरुषका था, जिसका कि 
हिरण्मय आदि अषिदेवतरूपसे 
वर्णेन किया गया था। जो उस 
८ आदिपुरुष ) के प्कषथेवे दी 
इस नेतरा्त्मत पुर्षके भी पक्ष है। 
जो उसके “उत्‌,अथवाउद्गीय'आदि 


नामथे, वेदी इसके मी नाम दै । ` १ 


र 


+ 


"क अ 


१०२ छान्वोम्योपनिषद्‌ [ अन्याय १. 

ऋ 2 9८ ८ 3-2-9८ 8-8-5८ ट >. 9 >< 9 9 8 -४ ४ € ; 

स्थानभेदाद्रपगुणनामातिदे- | यदि कहो कि आश्यका मेद 

होनेसे, [ आदित्यान्तग॑त पुरुषके ] 

शादीरितृत्वविषयभेदन्यपदेशा- | रूप, गुण ओर नामका ( बा्ुष 

पुरुषमे ) अतिदेश्च" होनेसे तथा 

च्चादित्यचाकुषयोर्भेद इति चेत्‌ १ | ईरित्ल ( शासन ) के विषो 

"= मेद बतलये जनेके कारण आदिल 

न; अघरुनानेनेवेत्येकस्योभया- | जर नेत्रान्त्गत पुर्षोका मेद ै- 

तो एसा कहना ठीक ४. # 

तेः एसा माननेपर [ भन्त्र ७ ओर ८ 

ह ५५ | “अमुना “अनेनैव इन शब्दोसे 

| एक्के ही द्वारा दोनी 
भाति श्रम्भव नहीं होगी । 

यदि कहो कि वह उन दोनो 

दो रूपसे प्राप्त होता है, जेष फि 

““वह एकरूप होता ह, वह तीन 

रूप होता है" इत्यादि रूपे श्रुति 

कदेगी भौ- तो यह भी ठीक नहीं; 

क्योकि निरवयव होनेके कारण एक 

ही चेतनक्षा दो रूप होना सम्भव 













द्विधाभावेनोपपद्चत इति 
चेत्‌, वक्ष्यति हि “व एकधा 
भवति त्रिधा भवति" इत्यादि, 
` .न, सेतनस्पैकस्य॒ निरबयव- 
त्वाद्‌ द्विपामावानुपपत्तेः। तस्मा 





 दष्यात्माधिदेवतयोरेक त्वमेव । १ 4. 
यतु स्पायतिदेशषो भेदकारण- भौर तुमने नो रूणदिके अतिदेशो 
मबोचो न तद्भेदाबगमाय । कारण बतल्मया,सो वह 
किति? स्थानभेदाद २ उनका भद सूचित करनेके लि नहींै। 

भाद्‌ भेदाङ्का | तो बह किरि हैध्वह तो,ञश्रम- 


| ` |श्भेद्‌ दोनेसे कदी उनके मेदी 
मा वमथम्‌ ॥ ५ ॥ जाशङ्वा न हो जाय-ईसल्थिदै॥५॥ 


थ 
१. अन्यके घर्मोको अन्ये ख्णाना । 


खण्ड ७ ] शाङ्करमाष्याथे १०३ 
४-3-89 8 < ऋ --8- ऋ 


स एष ये चेतस्मादर्वा्चो लोकास्तेषां चेष्ट 
मनुष्यकामानां चेति । तव्य इमे वीणायां गायन्त्यतं 


ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः ॥ & ॥ 

वह यह ८ चा्चुष पुरुष ) नो इस ( अध्यास आत्मा ) से नीचेके 
लोक है उनका तथा मानवीय कामना्ओंक। शासन करता है । जत 
जो ये लोक वीणामे गान करते र वे उसीका गान करते है इसीसे वे 
घनवान्‌ होते हैँ ॥ ६ ॥ 

स एष चान्ञुषः पुरुषो ये| वह यह चा्ुष पुरुष जो इस 
चेतस्मादाध्यात्मिकादात्मनोऽ- | आध्यासिक जत्मासे नीचेके लोक 
बाश्चोऽ्वाग्गता लोकास्तेषां चेष्टे | है, उनका तथा मनुष्यसम्बन्धी 
मनुप्यसंबन्धिनां च॒ कामा- | कामनारओका ईडन ८ शासन ) 
नाम्‌ । तत्तस्मा्य इमे बीणायां | करता है । भतः नो ये गायक्र 
गायन्ति गायकास्त॒ एतमेव | रोग॒वीणामे गान करते है वे 





गायन्ति । यस्मादीश्वरं | उसीका गान करते ह । इस प्रकार 
गायन्ति तस्मात्ते धनसनयो | क्योकि वे ईशवरका ही गान करते 
धनलाभयुक्ता धनवन्त | दै, इसख्यि वे धनलभयुक्त 
इत्यथः ॥ & ॥ अर्थात्‌ धनवान्‌ होते टै ॥ ६ ॥ 


इनकी अमेददटसे उपासनाका फल 
अथ य एतदेवं विद्वान्साम गायत्युभो स 
गायति सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात्पराचा 


खोकास्ताशश्वाप्नोति देवकामार् ॥ ७ ॥ 
तथा जो इस प्रकार [ चाक्षुष ओर आदित्य दोनो परर्पोकी एकता] 
जानेवाला पुरुष सामगान करता है इह॒ [ च्चुष ओरं आदित्य | 





। तथा 


दोनोँका ही 


ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 
वह इसके ही द्वारा जो इ ८ आदि. 


तयरोक ) से उपरके ङोक टै ओर जो देवताओके भोग दै, उन भ्रा 


करता हे ॥ ७ ॥ 

अथ य एतदेवं विद्रान्य- 
थोक्तं देवभुद्रीथं वबिद्रान्साम 
गायत्युभो स॒ गायति चाह्ुष- 
माद्यं च । तस्यैवंविदः 
फलघच्यते- सोऽघुनैवादित्येन 
स॒ एष ये चाधुष्मात्पराश्चो 
लोकास्तांश्वामरोति आदित्या- 
न्तगेतदेवो भूतेत्य्थो देवका- 
मांश्च ॥ ७ ॥ 


हस उपर्युक्त देवको बो इस 
प्रकार जाननेवाला पुरुष सामगान 
करता है बह चा्चुष ओर भादि 
दोनों ही पुर््षोको गाता है । इस 
प्रकार जाननेवाले उस उपाघकको 
जो फर मिरुता है वह बतखया 
जाता है-- वह यह उपासक इस 
आदित्यके द्वारा ही जो इते उपरके 
रोक है उन्हे पराप्त होता है । तासय॑ 
यह है कि आदित्यान्तर्गत देवप 
होकर वह इन्द ओर देवतामकि 
भोरगोको पराप्त करता है ॥ ७ ॥ 


ˆ =भ्व्छुतकठ 
अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाओ्चो खोकास्तासश्वाप्नोति 


कंते 


विद्वान्साम गायति साम 
तथा इसीके द्वारा जो 


मलुष्यकामा<श्च तस्मादु हेवंविदुद्वाता नुयात्‌ ॥ ८ ॥ 


दयेव कामागानस्येष्टे थ एवं 
गायति ॥ ९ ॥ 


रसे नीचेके रोक है उन्द ओर भनुष्य- 
0 कामनाओंको माप्त करता है । अतः इस भकार जाननेवाला- 
उदगाता [यजमानसे इस प्रकार 


कामनार्ओका आगान कर” 


समथ दता है, जो क़ि इस प्रकार 
है, सामगान करता है ॥ ९ ॥ 


1 कदे ॥ ८॥ % तेरे स्थि किन शष्ट 
क्योकि यह उद्गाता कामनाजोके आगानमें 
र जाननेवाखा होकर सामगान करता 


( ~ 


त्वण्ड ७ † 


रै 
हाङ्करभाष्याथं १०७५ 


अथानेनैव वचाल्तषेणेव ये 
चैतस्मादर्वाश्चो रोकास्तां धा- 
नोति मदष्यकामांशच चाज्चुषो 
भूतवेत्य्थः । तस्मादु हैवंवि- 
दुद्धातां ब्रयाद्यजमानं कम्ष्टं ते 
तव काममागायानीति । एष 
हि यस्मादुद्धाता कामागान- 
स्यो द्रानेन कामं संपादयितु- 
मीषटे समर्थं इत्यथः । कोऽसौ ! 
य॒ एवं विद्वान्साम गायति 
साम गायति । दविरुक्तिरुपासन- 
समाप्त्या ॥ ८-९ ॥ 


तथा इस चाक्षुष पुरूषके द्वारा 
ही, नो इससे नीचेके रोक है उन 
मनुष्यसम्बन्धी भोगको वह प्रप्त 
करता है । अभिप्राय यह कि चाक्षुष 
पस्ष होकर ही उन सनको प्राप्त 
करता है । अतः इसत भकार जानने- 
वाल उद्गाता यनमानसे कहे ढि , 
मै तेरे स्यि किन इष्ट कामना्ो- 
का आगान कष ¢ क्योकि यह 
उद्गाता ₹ष्टकामनासम्बन्धी भागान- 
के उद्गानसे उन कामना्भको सम्पन्न 
करनेमे समथं होता दै । वह उद्गाता 
कोन हे ! जो इस प्रकार जानने- 
वाला होकर साम गान करता है, पाम 
गान करता है । यह द्विरुक्ति उपा- 
सनाकी समाघिके स्यि ह ॥८-९॥ 





इतिच्छान्दोम्योपनिंषदि प्रथमाध्याये 
सप्तमखण्डमाध्यं सम्पणेम्‌ ॥ ७ ॥ 





इष्ण खण्ड 


उदूगीथोपास्ननाक्नी उक्कष्टता प्रदर्शित करनेके ल्यि 
शिलक, दात्भ्य ओर प्रवाहणका संवाद 


अनेकेधोपास्यत्वादक्षरस्य प्र- | उद्गीथं ्ञक अक्षर (ओंकार) के 
भनेक प्रकारसे उपासनीय होनेके 
कारान्तरेण परोवरीयस्त्वगुण- | कारण श्रुति मकारान्तरसे उसकी उ्- 
रोत्तर उल्कृष्ट गुणविशिष्टं फख्वार 
फलमुपासनान्तरमानिनाय । | एक अन्य उपाक्तना प्रस्तुत करती दै । 
यहाँ जो इतिहास दिया जाता है वह 

इतिशसस्तु सुखावबोधनार्थः । | सररुतासे समक्षनेके ल्यि ्ै । 


अयो होदरीथे कुशखा बभूवुः शिरुकः शााव- 
्यश्रैकितायनो दार्भ्य.परवादणो जेवछिरिति ते होचु- 
सदये वै छृशखाः स्मो हन्तोद्रीये कथां वदाम इति ॥१॥. 


कते है, शाखवानका एन शिरुक, चिकितायनका पुत्र दारभ्य 
ओर जीवला पत भरवाहण-ये तीनों उदूगीयविधामे कुश ये। उन्होने 
स्प कदा -- 'इमोग उद्गीयवियामे निपुण हे, अतः यदि आपरोगोंकी 
अनुमति हो तो उदूगीथके विषयमे परस्पर वार्ताखप करं" ॥ १॥ 


त्यचजिसंरूपाकाः; ह इत्यै- | त्रयः- तन सल ८५६ 
तिद्या्थः, ` उद्वीथ उद्रीथज्ञानं निपात इतिहासको सूचित करनेके 


| स्यि ह, उदुगीथ्मे थविद्या (1 
भ्रति इशला निपुणा बभूवुः । | ङश निपुण 2 बद 


खण्ड ८] 


शाङरमाष्यां १०७ 


-3-9 ~ 9-4-96 8-9८-56 ~~ 9-95-39 5 8855 = 


करिमधिदेशे काठे च निमित्ते 
वा समेतानाभित्यभिप्रायः । न 
हि सर्वस्मिञ्ञगति त्रयाणामेव 
कोशरयुद्रीथादिविक्ाने । श्रुय- 
न्ते द्युपस्तिजानश्रुतिकेकेयप्रभृत- 
यः सवंलकल्पाः । 

के ते त्रयः? इत्याद- 
शचिङको नामतः शाखावतोऽपत्यं 
ज्ञाङावत्यः चिकितायनस्या- 
पत्यं चैकितायनः, दल्भगोत्रो 
दाल्भ्यो दथागरुष्यायणो बा। 
प्रवाहणो नामतो जीवलस्या- 
पत्यं जेविरित्येते त्रयः । 

ते होचुरन्योन्यश्द्रीये वै 
कुशला निपुणा इति प्रसिद्धाः 
स्मः । अतो हन्त यद्नुमतिभ- 
वतायुद्रीथ उद्वीथन्ञाननिमित्तां 


है कि किी दे ओर कार्म अथवा 
किसी निमित्तविदोपसे एकत्रित हुए 
पुरुषेमिं[ये तीन व्यक्ति उदु गथ निपुण 
ये ]। सरे सं्ारके भीतर उद्गीभ 
आदिके ज्ञानम इन तीनकी हो कुशल्ता 
हो-देसी वात नहीं है; क्योकि श्रुतिमं 
उपस्ति, जानश्रुति ओर कैकेय आदि 
सर्वज्ञकल्प पुरुष भी प्रसिद्ध है ्ी । 
वे तीन कौन थे १ इस विषयमे श्रुति 


| कती है- शिलक जिप्षका नाम था 


वह॒ शालवान्‌क्ा पत्र शालावल्य, 
चिकितायनक्ा पुत्र चैक्रितायन, नो 
दल्मगोत्रमे उन्न होनेके कारण 
दारभ्य कहा गया है। अथवा वह द्यामु- „ 
ष्यायण शोगा । तथा नामसे प्रवाहण 
ओर नीवलका पुत्र होनेसे जैव 
कदरनेवास ये तीन पुष ये। 
उन्होने परस्पर एक-दूसरेसे का~ ` 
हमखोग उद्गीथमे कुशूनिपुण है- 
इस प्रकार प्रसिद्ध है । अतः यदि 
आपलोरगोकौ सम्मति हो तो उद्गीथ- 


कथां विचारणां पक्षपरतिक्षोप- | मे -उद्गीथवियाक सम्बन्धमे कथा- 
न्यासेन वदामो वादं ङ्म | विचार कै, अर्थात्‌ पक्ष-प्रतिपक्षके 


€ 
इत्यथः । 


स्थापनपूव॑क परस्पर विवाद करं ।. ` 


ॐ जिस पुत्रको "यह मक्षे ओर दक्षे दोनोंहीको जठ ओर पिण्डदान देने- 





का अधिकारी होगा एेसा कष्टक षर्मपूवंक प्रण क्रिया जाता ह॑ उसे ्रया- 


मुष्यायण' कते हं । 


१०८ छन्दोग्योपनिषद्‌ [ अण्याय १ 
~ 9 ऋ ~ 9 9 ¬ 8 ¬ ८ 9 ¬ 9- > 


तथा च तद्विद्यसंबादे विपरी- | इस प्रकार, निन्द विवक्षित अर्थकर 


नो ज्ञान है उन पुर्षोकि पारष्परिि 
` तग्रहनाशोऽपूवविक्ानोपजनः | संवादसे विपरीत ग्रहणका नादय, 


अपूव ज्ञानकी उपति ओर संशयङ़ी 
निवृ होती है । अतः उन-उन 
` द्यसंयोगः कतव्य इति चेति- | विषयोके ज्ञाता पुरुषोका साथ करना 
चादिये- यह भी इस इतिहासका 
प्रयोजन है । यदी बात शिर्कादिक 
शिलकादीनाम्‌ ॥ १ ॥ प्रस्ग्मे-भी देखी नाती दै ॥ १॥ 


-भ- 99 


संञ्जयनिबृ्तिश्रेति । अतस्तदि- 


_हासप्रयोजनम्‌ । दश्यते हि 


तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रवाहणो जेवलि- 
` सशुवाच भगवन्तावग्रे वद तां बराह्मणयोवंदतोर्वाचशभो- 
.  ध्यामीति ॥ २॥ ॑ 


त वे "बहुत अच्छाः पेसा कहकर बैठ गये । फिर जीवे पुत्र 
भ्वाहणने कहा--“पहले आप दोनों पूज्यवर प्रतिपादन करं । मँ आप 
„ ब्राहमणो कहौ हदे वाणीको श्रवण करगाः ॥ २ ॥ 


तथेत्युक्त्वा ते स्ुपविविशरु- | - फिर वे बहुत अच्छा" पेसा कद- 
-कर बैठ गये । उनम [ ब्रा्मणोके 
प्रथम बोलनेसे | राजा (क्षत्रिय , 
. ^  प्रागल्भ्योपपत्तः की प्रगरमता ( धृष्टता ) सिदध होती 
| व | अत सीव पतर 
जेविरुवाचेतरो भगवन्तौ प्‌ जा- | पवाहणने शेष दोनोकि भति कहा-- 
“पहले आप भगवान्‌-पूजनीय रोग 
करट; आप तरक्षणोके कटे हुए यन्दो- 


 इदेपिविष्टवन्तः किर । तत्र राज्ञः 


बन्तावग्ने पूवं बद्ताम्‌ । ब्राह्मण- 


खण्ड ८ 1 शाड्रमाष्याथं १०९ 


दोरिति. लिद्काद्राजासौ युबयो- | को मँ श्रवण करूगा । आप दोनो 

ब्राक्ष्णोके' इस कथनरूप िङ्गसे ज्ञात 
बरह्मणयोवदतोर्वाचं श्रोष्यामि । | होता है कि वह क्षत्रिय है वाचम्‌ 
ठेसा विश्चेषण होनेके कारण दूरे 
व्याख्याकार “अथंहीन शब्दमात्र 
विशेषणात्‌ ॥ २ ॥ घुनंगा' दसा अथं करते है ॥२॥ 


अर्थरहितामित्यपरे वाचमिति 





स्र ह शिखकः शालावत्यश्वेकितायनं दाभ्यमु- 
वाच हन्त तवा पृच्छामीति च्छेति होवाच ॥ ३ ॥ 


तव॒ उस्र शाकावानके पुत्र शिल्कने निकितायनकमार दाटभ्यसे 
कादि वुण्डारी अनुमति हो तो मै तुमसे पृष ® उसने कहा-- 
'पूछो' ॥ ३ ॥ 


उक्तयोः स ह शिलकः शा- | उपर्युक्त दोनमिंसे शालवानके पुत्र 
लावत्यश्रैकितायनं दाल्भ्ययु- | शिले चैकितायन दार्भ्यसे कडा- 
बाच - दन्त यद्यनुमंस्यसे त्वा | यदि तुम अनुमति दो तो मेँ तुमसे 
त्वां पृच्छानीत्युक्त इतरः पृच्छेति | पृ । तत्र इस भकार शे नानेपर 


होवाच ॥ ३ ॥ दूसरेने 'पूछछो' एसा कहा ॥ ३ ॥ 
लन्धानुमतिराद- | उसकी अनुमति पाकर [ शिरक्- 
| ने ] ्डा- 


का साम्नो गतिरिति स्वर इति हौवाच 1 स्वरस्य 
का गतिरिति प्राण इति होवाच । प्राणस्य का गतिरित्य- 


त्रमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच ॥॥ _ 


११० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्याय ! 


'सामकी गति ( आश्रय ) क्या दै इसपर दूसरेने श्वर" ेसा 
कहा । स्वरकी गति क्या है ¢ सा प्रभ होनेपर दूसरेने श्राण' एेसा 
कहा । श्राणकी गति क्या है » इसपर दूसरेने अन्न पेसा कहा । तथा 
“अन्नकी गति क्या है ? पेसा पूछे जानेपर दारभ्यने जू ठेसा कहा ॥४॥ 


का साम्नः बप्रकृतत्वादुद्री- 


थस्य । उद्रीथो द्यत्रोपास्यत्वेन । 


प्रतः । ““परोवरीयां सयुट्री- 


थम्‌” ( १।९।२ ) इति च 
वक्ष्यति । गतिराश्रयः परायण- 
मित्येतत्‌। एवं पृष्टो दा्म्य 
उवाच-स्वर इति; स्वरात्मक- 
त्वात्साम्नः। यो यदात्मकः 
तदरतिस्तदाश्रयश्च भवतीति युक्तं 
मृदाश्रय इव घटादिः । 
स्व्रस्य का गतिरिति प्राण 
इति होवाच । प्राणनिष्पाद्यो 
हि स्वरस्तस्मात्स्वरस्य प्राणो 
गतिः । प्राणस्य का गतिरित्य. 


नमिति होवाच । अनावषटम्भो 
हि प्राणः । “शुष्यति वै प्राण 


सामकी--प्रकरणप्राप्त होनेके 
कारण उदूगीथकी गति--भाश्रय 
अर्थात्‌ परायण क्या है? क्योकि 
यहाँ उपास्यरूपसे उदुगीथका ह 
प्रकरण है, जैसा कि परोवरीयांसमु- 
दुगीथमुपाप्ते ८ १।९।२ ) इत्यादि 
श्रतिमे करेगै भी । इस प्रकार पृषे 
जानेपर दारभ्यने कहा-- स्वर्‌ 
क्योकि साम स्वरस्वरूप है । जिस 
प्रकर [ृत्तिकामय] घटादि पदार्थो 
का मृक्तिका ही आश्रय होती दै 
उसी प्रकार जो पदाथं यदातक-- 
जिसके स्वरूपसे युक्त होता है उस 
पदाथकी वही गति ,जौर आश्रय 
होता है-यह उचित ही है । 
-स्वरकी गति क्या है ® रपसा 
म्र होनेपर [ दारभ्यने ] श्राण' 
णमा कहा, ब्योकि स्वर प्राणसे ही 


निष्पन्न होनेवाला दै, इसखियि स्वर- 


की गति प्राण है। श्राणकी गति 
क्या है ® दसा पू जेप उसने 
कहा अन्न, क्योकि प्राण अन्नके 


री आश्रय रहनेवास दे, सा कि 


खण्ड ८ ] शाह्करमाष्याथ १११ 
~> ~~~ -3 ~ > ~> ~~ >< 9 9 > 


ऋतेऽन्नात्‌" ८ व° उ० ५ । | “नके विना भाण सू जाता दै” 
,;._ . | इस श्रुतिते सिद्ध होत दै तथा “अनन 
१२।१ ) इति दि श्रुतेः । “अनं | यह [वत्स्थानीय पराणकी] र्ती ह" 


दाम!" (ब्रृ° उ०२।२।१) | देसी श्रुति भी है । फिर अननकी 


ति च । अन्नस्य का गति- | गति क्या है ? पूसा प्ररन होनेपर 
ल्भ्यने कदा-- “आप्‌! क्योकि 
रित्याप इति होवाच । अप्सं- | शन्न घाप ८ नल ) से ही रसन्न 


भवत्वादन्स्य ॥ ४ ॥ होनेवाख दै ॥ ४ ॥ 


अपां का गतिरित्यसौ रोक इति होवाचामुष्य 
लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं खोकमतिनयेदिति 
होवाच स्वर्गं वयं खोक्सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गस<- 


स्तावं९हि सामेति ॥ ५ ॥ 


(जककी गति क्या है ? रसा प्रशन होनेपर उसने वह लोक! फसा . 
कहा । “उस रोककी गति क्या है ® इसपर दारभ्यने का कि स्वगं - 
लोकका अतिक्रमण करके सामको कोर किसी दंसरे आश्रयमे नहीं ले जा 
सकता । हम सामको स्वर्गलोके हो स्थित करते दै, क्योकि सामकी स्वगे- 


रूपसे स्तुति की गयी ह ॥ ५ ॥ 

अपां का गतिरित्यसौ लोक 
इति दोवाच । अपुष्मान्लोकाव्‌ 
वृष्टिः संभवति । असुष्य लोकस्य 
का गतिः १ इति पृष्टो दान्भ्य 
उवाच । स्वर्गमयुं रोकमती- 
त्याश्रयान्तरं साम न नयेत्क- 
शिदिति होवाच । 


'जर्छोकी गति क्या है इसपर 
दा्भ्यने "वह लोक प्सा कहा, 
क्योकि उस रोकसे ही वृष्टि होनी 
सम्भव ै । “उस रोककी कया गति 
है ¢ रेका पृष्ठे जानेपर॒दाभ्यने 
कटहा-- उस स्वर्गलोकक्ा अति- 
क्रमण करके कोई सामो किसी दूसरे 


-आश्चयमे नही ठे जा सक्ता 


११९ | । | छान्दोग्योपनिषद्‌ { -अष्टाच १ . 
= क 3 
अतो बयमपि स्वगं लोकं | भतः हम भी सामो स्वगे 
< स्वर्शलो 
सामाभिसंस्थाषयामः। क दी स्थापित करते ह । अर्थात्‌ साम । 
प नीम ४ 5, , | स्वगलोक्मे भतिष्ठित॒ समकषते है, | 
प्रतिष्ठं साम जानीम हत्यर्थः | 


1 क्योकि साम स्वगसंस्ताव भर्थात्‌ 
स्वगसस्ताय स्वगत्वेन संस्तवनं | जिसका स्वर्गते स्तवन किया 
संस्तायो यस्य॒ तत्साम सवर्ग- | गया है, एस स्वरगसंप्ताव ह"निशवव 
संस्तावं हि यस्मात्‌ “स्वगो वै | स्वर्गलोक ही साम है रेसा जानता 
लोकःसाम वेद” इति श्रुतिः |॥५।॥ दै यह्‌ रति भी है ॥ ५॥ 


=: ० := 


तह शिलकः शाखावत्यदचैकितायनं दार्भ्यमु- 


 वाचाप्रतिष्ठितं वे किलते दाल्भ्य साम यस्त्वेतहि 


बूयान्सूधां ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति॥६॥ 
जघ चिकितानपत् दारभ्यसे शाख्वानक पुत्र शिल्कने कदा--ह 
दारभ्य † तेरा साम निश्चय ही अमतिषठित षै । जो इस मय कोद 


सामवे्त यह कह दे ढि "तेरा मस्तक एथिवीपर गिर जाय तो निश्चय 
ही तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ ६.॥ ५ 


तमितरः शिख्कः शारावत्य- | उस चैकितायन दर्भ्यसे दूरे 
श्चकितायनं दार्म्यमवाच- - | श्राखवत्य॒धिक्कने कडा- 

दारभ्य | निरेचय ही तेरा साम 
अप्रतिष्ठितमसंस्थितं परावरीय- | अपरतिष्ठित-गसंस्थित अर्थात्‌ ऊ- 


रोर उक्ृषटरूपसे असमास गतिवाडा 
स्त्वेनासमाप्तगति सामेत्यर्थः। वा| दै ।' “वै जर किरु" इन निपातो 


इत्यागमं स्मारयति छिलेति च। | से शति भागम यानी उपदेश- 

दाल्भ्य ते यस्त्व- | ” ररा स्मरण कराती है । यदि 
„11. 
सदिष्णुः साभविदे त्तस्मिन्काले । भभतिषठित सामो ध्य `भतिटित 


ह्लण्ड ८ | 


शाङ्रभाष्याथ १९१३ 


्रुयात्कशिद्विषरीतविज्ञानमग्रति- 
षितं साम प्रतिष्ठितमिति एवं 
वादापराधिनं मूधा रिरस्ते 
विपतिष्यति विस्पष्टं पतिष्य- 
तीति । एवगुक्तस्यापराधिनस्त- 
थैव तद्विपतेन्न संशयो न त्वहं 
ब्रवीमीत्यभिप्रायः | 

ननु मूथ॑पाताहं चेदपरां 
कृतवानतः  परेणानुक्तस्यापि 
पतेन्मूर्धा न चेदपराध्युक्तस्यापि 


नैव पतति । अन्यथाढ़ृताभ्या- 
गमः कृतनारशच स्याताम्‌ ।. 
नैष दोषः; कृतस्य कमणः 
शुभाशुभस्य फलम्रातिदंशकाल- 
निमिततापक्षत्वात्‌ । तत्रव 


सति मूरध॑पातनिमित्तस्याप्यत्ता- 


नस्य पराभिव्याहारनिमित्तापि- 
षत्वमिति ॥ ६ ॥ 


हः इस प्रकार कहनेका अपराध 
कृरनेवाठे तुज विपरीत विज्ञानवानूसे 
कहे कि तिरा मस्तक गिर जायगा- 
स्पष्टतया पतित हो जायगा" तो इस 
प्रकार कहे जानेपर तज्ञ अपराधीका 
मस्तक उसी प्रकार गिर पडेगा-इसमं 
संशय नहीं । ताप्यं यह है किमतो 


एसा कहता नही ह यदि कोई जन्य । 


कह देगा तो अवद्य देसा ही होगा] ॥ ` 
शंका-यदि मस्तक गिरनेयोग्य पाप 


किया हे तव तो दूसरेके न कदने- 
पर भी मस्तक गिर ही जायगा ओर . 


यदि वह रेसा अपराधी नहीं है तो 
कहनेपर भी नहीं गिर सकता; नहीं 


तो बिना क्यिकी प्राप्ति ओर क्षिय ` 
| इएका नाश ये दो दोष भाप हगि। . 


समाधान-यह दोष नहीं दै, क्योकि 


क्यि हुए श्म ओर अश्युम कमेकि - 


फरुकी प्रापि देश, कारु ओर निमित्त- 
की ययेक्षावारी होती है । एसी 
स्थितिमं मूर्धपातका निमित्तमूत जो 
अज्ञान है, वह भी दूसरेके कथनरूप 
निमित्तकी अपेक्षावाखा ही है ॥ ६॥ 


-~-----नर्य< 


१९७ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय १ 


> आ 
एवभुक्तो दाल्भ्य आह- | एसा कहे जानेपर दारभ्यने कहा-- 


हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवा- 
चामुष्य रोकस्य का गतिरित्ययं रोक इति होवा- 
चास्य रोकस्य का गतिरिति न षतिष्ठां खोकमति- 
नयेदिति होवाच भतिष्ठां वयं लोकश्सामाभिसरस्था- 
पयामः प्रतिष्ठास्स्तावःहि सामेति ॥ ७ ॥ 


भै यह नात श्रीमान जानना चाहता. हवै; इसपर [ चिलकने ] 

कहा-- जान को ' तव “उस लोककी गति क्या है ¢ एसा पृषे नानेपर 

` उसने “यह कोकः पेसा कहा । फिर “इस ोककी गति क्या है ? रेसा 

मभ होनेपर “इस प्रतिष्ठामूत छोकका अतिक्रमण करके सामको जन्यत्र 

नदी ठे जाना चाहिये, एेसा का । हम प्रतिषटामूत इस रोकमे सामको 

स्थित करते है [ अर्थात्‌ यहीं उसकी चरम स्थितिका निश्चय करते है ] 
कोक सामका परतिषठारूपसे ही स्तवन किया गया है ॥ ७ ॥ 


हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानि | “जिसमे साम प्रतिष्ठित ( यह 
यत्पतिषठं सामतयुक्तः ्रत्युवाच । बात भे ॒श्रीमानसे जानना चाहता 
शालावत्यो विद्धीति होवाच । ह" एेसा कटे जानेपर शारावत्यने 
गतिरिति उत्तर दिया-- “जान छो । “उस 

अबुष्य लोकस्य का गतिरिति रोककी गति क्या है ® इस प्रकार 
पटे दाल्भ्येन शाला | दारभ्यसे पूछे जानेपर शाखवत्यने 
बत्योभ्यं रोक इति होवाच । | “यद लोकः एसा कहा; क्योकि यह्‌ 
अयं दि लोको यागदानहोमा- | लोक दी याग, वान जर होमादिके 
विन सरः ष्यतीति । हारा उस रोकका पोषण करता 


दै । इस विषयमे तः दानके 
अतः प्रदानं देवा उपजीवन्ति” | जत्र देवगण वित रहते ह" 


सखण्ड ८ ] 


शाङ्करभाष्य 


११५ 


इति हि श्रुतयः । प्रत्यक्षं हि 
सर्वभूतानां धरणी प्रतिष्ठेति । 
अतः साम्नोऽप्ययं लोकः प्रति- 
छ्रैवेति 

वेति युक्तम्‌ । 


अस्य लोकस्य का गतिः ! 
इत्युक्त आह . शालावत्यः । न 
प्तिष्ठामिमं लोकमतीत्य नये- 
त्साम कथित्‌ । अतो वयं 
प्रतिष्ठां सोकं सामाभिसंस्थाप- 
यामः । यस्मासप्रतिष्ठासंस्तावं 
हि प्रतिष्ठात्ेन संस्तुतं सामे 
त्यर्थः । (इयं वै रथन्तरम्‌'' 
इति च श्रुतिः ॥ ७ ॥ 


एेसी श्रुतियों भी दै । सम्पूणं प्राणियोंकी 
प्रतिष्ठा परथिवी है- यह प्रयक्ष ही है । 
अतः सामकी भी यही रोकप्रतिषठा 
है- एसा मानना उचित ही हे । 


रस लोककी गति क्या हे इस 
प्रकार पठे जानेपर शालवत्यने का- 
“किंसीको भी प्रतिष्ठामृत इस कोकका 
अतिक्रमण करके सामको अन्यत्र 
नहीं छे जाना चाहिये, भतः हम 
्रतिष्ठामूत इस ोकमे ही सामको ` 
सब प्रकारसे स्थापित करते दै, 
क्योकि साम॒ प्रतिष्ठासंस्ताव-- 
प्रतिष्ठारूपसे स्तत दै । “यह 
[ प्रथिवी ] ही रथन्तर साम है" 
एसी रति भी है ॥ ७ ॥ 


९ह प्रवाहणो जेवछ्िरुवाचान्तवद्रे किङ ते 
शालावत्य साम यस्तवेतदहिं बथान्मू्धां ते विपतिष्य- 
तीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो 
वेदानोति विद्धीति होवाच ॥ < ॥ । 
तब उससे जीवलके पुत्र प्वाहणने कहा--दे शालावत्य | निश्वय 
ही तुम्हारा साम अन्तवान्‌ है । यदि कोई फेसा कह दिया क तुम्हारा 
मस्तक गिर जाय तो वुम्दारा मस्तक गिर जाता । [शालावल्यने कदा] 
इते श्रीमानूसे जानना चाहता दँ ॥ इसपर भवाहणने 'जान लोः 


एसा कहा ॥ ८ ॥ 


क | 
१९६ ऊॐान्दोभ्योपनिषद्‌ [ जष्याय! 


तमेवयुक्तवन्तं ह प्रवाहणो | इस प्रकार कहनेवटे उस शा 
व्यक प्रति जीवर्के पुत्र प्रवाहणे 
। हे शाखवद्य ! तुम्हारा साम निश 
ही अन्तवान्‌ हैः इत्यादि पू्‌ 
ततः शाटावत्य आह--हन्ताह- ¡ 6 । तव राखवलयने कहा-¶ 
मेतद्गवतो वेदानीति विद्धीति | इसे श्रीमानसे जानना चाहता ह॥ 

| - | तव दूसरे ( प्रवाहण ) ने कहा- 
होवाच ॥ ८ ॥ (जान रोः ॥ ८ ॥ 





जेवलिस्वाचान्तवदरै किल ते 


(~ ¢ 
शालावत्य सामेत्यादि पूववत्‌ । 





-- “=+ ~ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये 
१ ४ 
अष्टमखलण्डभाष्यं सम्पृणम्‌ ॥ ८॥ 





| 


| 


ककमः 


खण्ड ` 





भिटककी उक्ति-आकाश्च ही सवका जाश्रय ह 


इतरोऽलुज्ञात आद-- | 


प्रवाहणकी अनुमति पाकर 
शिक्कने कदा -- 


अस्य ऊोकस्य का गतिरिस्याकाश इति होवाच 


सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव सजुलखयन्त 


आका परस्यस्तं यन्त्याकाशो हवेभ्यो उ्यायानाकाराः 


परायणम्‌ ॥ १ ॥ 


“स छोकक्ी क्या गति हे * 


क्योकि ये समस्त भूत॒ आकाशसे 


इसपर प्रबादणने कहा-- आकाशः 


ही उन्न होते है, आकाशे ही 


ल्यको परा हते दै ओर आकाश हौ इनसे बड़ा है; अतः आकस री 


इनका आश्रय है ॥ १ ॥ 


अस लोकस्य कां गतिरिति | 
 आकारोऽइति होवाच प्रवाहणः । 


आकाशं इति च प्र आत्मा 


 (आकाज्ञो वै नाम" ( छ 


उ० ८।१४। १) इति भुतः । 


तस्य॒ हि कमम॑सवेभूतोत्याद्‌- 
कत्वम्‌ । तस्मिनेव हि भूत- 
प्रख्यः । '“तत्तजोऽसजत'*(६।२। 
३), “तेजः परस्यां देवतायाम्‌" 


(६।८।६) इति हि वक्ष्यति । 


(इस ोककी गति क्या हे । इस- 
पर प्राहणने कहा “आकाश । यहाँ 
'आकारा' शब्दत परमात्मा विवक्षित 
हे । [ भूताकाश नहीं ] जैसा किं 
“आकरा ही नाम [ जर रूपका 
निर्वाह करनेवाला दै ]" इस श्रुतिसे 
सिद्ध होता है । सम्पूणे भू्तोको 
उसन्न करना यह उसीका कायं हे 
र उसी मूर्तका प्रस्य होता हे; 
जसा कि श्रुति “उसने तेजको रचा” 
“तेल पर देवतामे रीन होता है” 
| इयादि मकारसे अगे करेगी । 





११८ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अष्याय { 


त-क 880 5 -86 8 - 
सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि | “आतमन आकाशः सम्भूत 

| (तेजो ऽसृजत इत्यादि शरुतियोकि कक्ष 

ये सम्पूणं ॑चराचर भूत॒ तेज, बह ¦ 

त्पदयन्ते तेजोऽवनादिक्रमेण साम- | ओर अन्न इस क्रमसे आकरे 
ध्यात्‌ । आकाशं प्रत्यस्तं यास्ति ५ उसन् होते टै; ओर प्र्यक्ार 
प्रलयकाले तेनैव विपरीतक्रमेण । त (५ गान 

न „~ | रीन दो जाते दै, क्योकि जक्ष 
हि यस्मादाका्च एवैम्यः सर्वेभ्यो | 


ही इन समस्त मृतोसि बद्र है। 
भूतेभ्यो ज्यायान्महत्तरोऽतः स॒ | अतः वही समस्त मूता परायण- 


सर्वेषां भूतानां परमयनं प्रायणं | प्रम शाश्रयः अर्थात्‌ तीनों करप 
प्रतिष्ठा त्रिष्वपि कालेष्वित्य्थः।१।। उनकी पतिष्ठा है ॥ १ ॥ 


आक्ारासंज्नक उद्रीथकी ध ओर उसकी उपासनाका फल 
स एष परोवरीयानुद्रीथः स एषोऽनन्तः परोव- 
रीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह॒ खोकाञ्जयति य 
एतदेवं विद्वान्परोवरीया$समुद्ीथसुपास्ते ॥ २ ॥ 
वह यह उद्गीथ परम उक्छृष्ट दहै, यह अनन्त है । जो इसे इष 
भकार जाननेवाखा विद्वान्‌ इस ॒परमोल्कष्ट ८ परमात्ममृत ) उदृगीथकी , 
उपासना करता है उसका जीवन परमो्छृष्ट हौ जाता टै ओर वह उत्त- 
रोरर उजृट शोकको जपने अधीन कर छता है ॥ २ ॥ 
यस्मात्परं प्रं वरीयो व्रीय- | वरथो उततरोर उक्कृष्ट- गर्त 
सोऽप्येष वरः परथ बरीयांशच | भी 9 अर्थात्‌ पर्‌ ओर ० 
तः १ यह्‌ उदुगीथ ही परमात्मभा 
परावगयानुद्राथः परमात्मा सम्पन्न होता ट व 


संपन्न ५ इत्यथः । अत एव स | उदूगीथ अनन्त-जिसद्ना फो अन्त 
एषोज्नन्तोऽविद्यमानान्तः । नहीं है, सा ह । 


स्थावरजङ्गमान्याकाशादेव सयु- 


ण्ड र ] 


हशाङरभाष्यारथ. 


११९ 


48648508 तः त 8595 +¬ 35 8 


तयेतं परोवरीयांसं प्रमात्म- 
भूतमनन्तमेवं विदवान्परोवरीयां- 
सद्रीयशुपास्ते; तस्येतत्फल- 
माह- परोवरीयः परं पर 
वरीयो विशिष्टतरं जीवनं हास्य 
विदुषो भवति दृष्टं फलमवष्ं 
च प्रोवरीयस उत्तरोत्तरविशिष्ट- 
तरानेव ब्रह्माकाान्तघ्नोकाज- 
यति य एतदेवं विद्रायुद्वीथ- 


्ुपास्ते ॥. २ ॥ 


उस इस परम उच्छृष्ट परमात्ममूत 
अनन्त उदूगीथको इस प्रकार जान 
नेवाला जो विद्वान्‌ इस परमोक्ृष्ट 
उदुगीथकी उपासना करता है, 
उत्तके सि श्रुति यह फक बतसाती 
हे जो इसे इस प्रकार नानने- 
वाला विद्वान्‌ उद्गीथक्ी उपासना 
करता षै उस विदानो यह षट 
फल होता है कि उस विद्वानका 
जीवन उत्तरोत्तर उक्कृष्टतर हो जाता 
ह तथा अदृष्ट फ यह होता है 
कि वह॒ उत्तरोत्तर त्रह्माकाशपर्यन्त 


विशिष्ट रोकोंको जीत ठेता है ॥२॥ 


तश्दैतमतिधन्वा शोनक उदरशाण्डिस्यायोक्तवो- 
वाच यावच एनं परजायामुद्रीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो 
हेभ्यस्तावदरस्मिह्ोके जीवनं भविष्यति ॥ ३ ॥ 
नके पुत्र भतिधन्वाने उस ईइस उदृगीथका उद्रशाण्डिल्यके प्रति 


निरूपण कर उससे शदा--जबतक मेरी संततिमेसे [ मेरे वंशज ] इस 
उद्‌ गीथक्ञो जानेगे तवतक हस लोकम उनङृ¡ जीवन उत्तरोत्तर उक्कृषटतर 
होता जायगा ॥ २ ॥ 

दिं च तमेतभरद्रीथं विद्रानति- | तथा इस उद्‌गीथको जाननेवाले 
, । अतिषन्वा नामकं शौनकने-- शनक 


क्लौनक उद्राण्डिल्याय शि- । लयके प्रति इस उद्गीधविधाका 


१२०. ` छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्याय | ` 


< ० 
प्यायतयुद्रीथदशेनयुक्त्वोवाच । | वर्णन करक कहा - जवत्फ तै# 
यावत्त तव प्रजायां प्रजासंतता- प्रन अर्थात्‌ तेरी सततत 
वत्यथः। एनशुद्रीथं त्वतसंतति- भोनज इस उदुगीथको नती ` 
जा वेदिष्यन्ते ज्ञास्यन्ति तावन्तं | 


त > ! तवतक-उतं कषमय! उन् 
, कालं परोवरीयो हेभ्यः प्रसि- | तलक उतने समयत उदे 


दवेभ्यो छोकिकजीवनेम्य उत्तरो- | श्न ॒भसिद्ध॒रोकषिक जीवने 
त्रविशिष्टतरं जीवनं तेभ्यो | अपेक्षा उत्तरोत्तर विशिष्टतर जीका 
भविष्यति ॥ ३॥ प्राप्त होगा ॥ २३॥ 


भक 9 = (@ ० 


तथामुर्मि्छोके लोक इति। स य एतदेवं 

विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्नि्टो के जीवनं 

भवति तथामुरिंटोके लोक इति लोके खोक 
इति.॥ ४॥ । | 

तथा परलोके भी उसे [ उक्कृष्टसे उद्कष्ट ] लोककी प्रापि हरत 

। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरूष इसकी उपासना करता है, 

उका जीवन निश्चय ही इस लोके उ्ृष्टतर -होता है तथा परलोके 


भी उसे [ उत्तरोत्तर उृषटतर ] लोक पा होता है- पररोकंम उसे 
[ उत्तरोत्तर उद्कष्टतर ] कोक पाप होता हे ॥ ४॥ 


तथादषटऽपि प्रलोके्ष्मि- | (तथा अ परलोके भी उत 
नपरोबरीयोन्नोको भविष्यतीतयु- | उरो उद्ृट लोककी ही शरा 
्तवान्याण्डिन्यायाविभन्वा + शा ञनकपुत्र अतिषन्वा- 


स शाण्डिस्यके प्रति कहा । थह 
नकः। स्यादेतत्फलं पूर्वेषां महा- एरु पू्वकाङ्कि प्रम भाग्यशाली 


शण्ड ३ | शाङ्करमाष्याथं १२१ 
आग्यानां तैदयुगमीनानामित्या- | पपोको मत होता होगा, कमान 
र | युगके पुरपोको नहीं हो सकता 

 शङ्कानिदृत्तय आह--स यः | देसी आशा्धाफी निद्िके स्थि 
कृथिदेतदेवं बिद्ालुद्रीथमेतर्॑पा- | शति कहती दै- ईस समय भौ इते 

। इस प्रकार जाननेवाला जो कोर 
पुरुष उदुगीथकी उपासना करता हे 


ह सतत दि उसका भी इस रोकमे उसी प्रकार 
हास्यास्मि्नोके जीवनं भवति | उत्तरोत्तर उदक्त ही जीवन 


तथायुस्मिंन्नोके लोक इति लोके होता है तथा परलोक भी उसे 
उत्तरोत्तर उल्छष्टतर रोकफी दही 


लोक इति ॥ ४ ॥ पराप्त होती हे ॥ ४॥ 


-~----- 


स्ते तस्याप्येवमेव परोवरीय एव 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याय 
नवमखण्डभाष्यं सम्पणम्‌॥ ९ ॥ 








दकम्‌ खकर्डं 





उषस्तिका आख्यान 
उद्रीथोपासनप्रसङ्खेन प्रस्ताव | उद्गीथोपासनाके प्रसङगते हं 


प्रस्ताव एवं प्रतिहारविषयक उप 
सना भी बतलयी जानी चहिये, इषः 
व्यमितीदमारम्यते। आख्यायि- | स्यि आगेका भन्थ भार्म मि 

जाता ह । यहं नो आख्यायिका £ 
का तु सुखावबोधार्था | वह सरल्तासे समञ्षनेके स्मि - 


मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषसितिं 
चाक्रायण इभ्ययामे षद्राणक उवास ॥ १ ॥ 


ओले ओर पत्थर पड्नेसे कुरुदेशके सेतीके चपट हो जानेषर वह 

इभ्य भरामके भीतर (आटिकः ( जिसके स्तनादि स्रीजनोचित चिह प्रकट 

नहीं हुए है रेसी अस्पवयस्का ) पलीके साथ चक्रका पुत्र उषसि, 
दुगंतिकी अवस्थामें रहता था ॥ १ ॥ 

मटचीहतेषु मरच्योऽशन- | [कुरुजंके] मटचीहत शन 

यस्ताभिहतेषु नारितेषु इुरुषु | मरची ओर ओर पत्यरको कटते दै, 

ङरसस्यष्वित्यर्थः । तो दिते | नसे छर्वेशके अर्थात्‌ इरदेशकी 

खेतीके हत-नष्ट हो जाने तथा उसके 

जात आटिक्यानुपजातपयोधरा- | कारण दुर्भिक्ष हो जानेपर आव्की 

दिीव्यञ्जनया सह जाययोष्‌- | यानी जिसके स्तनादि स्जीजनोनित 


प्रतिहारविषयमप्युपासनं वक्त- 


स्तिहं नामतशचक्रस्यापत्यं चाकरा- | चिह कट नही ष्‌ है पेसी तीके 


चाक्रायण-चक्रका 
यणः । इमो हस्ती तमहदंतीतीम्य पुत्र इभ्य मामे 


इभ हशथीको 


॥ 
1 
॥ 


॥ 


कंच्ड १० शाङ्रमाष्या्थं १२ 
">~ (9 -ऋ अ 9 ॐ ॐ = ॐ 9 ॐ 2 = 
ईरो इस्त्यारोदो वा, तस्य राम | कहते + उसकी पात्रता रखनेवास्र 

व्यक्ति इभ्य-- धनी या हाथीवान- 

इम्यग्रामस्तस्मन्पद्राणकोऽना- | कंदलाता दै, उसके भामको इम्य- 
ग्राम कहते रै, उसमे अन्न प्राप न 
होनेके कारण प्रत्राणक होद्वा 
इत्सितां गतिं गतोऽन्त्वावस्थां | षाठुका प्रयोग कुत्सित गतिके भथेमं 
क होता दै, अतः कुत्सित गति यानी 

भरा इत्यथः । उवासोषितवान्‌ दुरवस्थाको प्रात हो किसीके षरा 
कस्यचिद्गृहमाभरित्य ॥ १ ॥ । आश्रय लेकर निवास करता था॥१॥ 


लामात्‌ । द्रा इत्सायां गतौ । 


स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तश्दोवाच । ` 


नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्चये म इम उपनिहिता इति ॥२॥ 


उने धुने हुए उडद खानेवाले एक महावतसे याचना की | तब 


उसने उससे कहा--इन जुटे उददोके सिवा मेरे पस ओर नह दै । जो 


कुछ एकत्र ये वे सव-के-सव ये मेने [ अपने भोजनपातरभ ] रख खथ ईं 
[ अतः भँ किस प्रकार आपकी याचना पूणं करं १] ॥ २ ॥ 


सोऽन्नार्थमटननिम्यं इुल्माषा- | भन्नके ठियेभरूमते-षूमते उसने 
न्कुत्सितान्माषान्खादन्तं मक्षयन्त| अकस्मात्‌ ९९ हाथीवानको घुने 


यदृच्छयोपलम्य विभिष याचित- | हद लाते देल उसने याचना ़ी। ` 


„ , | उस उषस्तिसे हाथीवानने कहा-- 
६ । त्सति दोवापिभ्यः । मेरद्रारा खाये जाते हुए इन जूठे 
नेतोऽस्मान्मया भश्यमाणादुच्छि-| उददोकि समूहके सिवा मेरे षास 
राशेः इल्माषा अन्ये न विद्य- | ओर उड़द नहीं है । जो एकत्रित 
न्ते । यच्च ये रारो मे ममोपनि- | थ वे समी मेरे इस पतरम गिरा 
हिताः प्रकष्ा इमे भाजने किं | स्थि गये दै, अव भ श्या 
करोमि १॥ २॥ क १॥ २ ॥ ¦ 






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हि) 


१२४ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ सष्याय। 
इत्युक्तः प्रत्युवाचोषस्तिः- | सा कदे जनिप्र उर 


| उत्तर दिया- । 
एतेषां मे देहीति होवाच तान्मे प्रददौ हन्ता- 
सुपानमिप्युच्छिषठं वे मे पीतरस्थादिति होवाच ॥६॥ 


त्‌ से दन्द दी दे दे-रेसा उपत्तिने कहा । तव महावते प 
उद्‌ उसे दे दिये ओर कहा "यह. अनुपान भी ठो ; इसपर क 
बोका-'इसे ठेनेसे मेरदरारा निश्चय ही उच्छिष्ट ज पीया जायगा ॥३॥ 


एतेषामेतानित्यथैः,मे महयं, तेषाम्‌, इस पषठन्त प 


अर्थं एतान्‌ ( इन्द ) ह । भर 
देदीति होवाच । तान्स इभ्यो- | (तू सुने इन उददोक्तो ही दै, पष 

उषस्तिने कहा । तव उस महावने 
ऽस्मा उषस्तये प्रददौ प्रदत्तवान्‌ । | उपस्तिको वे उडद दे दिये त्थ 

पीनेके स्थि पास रखे हुए जक 
अनुपानाय समीपस्थयुदकं हन्त | लेकर बोरा- “भाई ¡ अनुपान भी 

ठे खो ।' पसा के ब भ | 

गृहाणानुपानमित्युक्तः - | ने कदा--यदि. मे इस ज 

^ पीडगा तो निश्चय ही मेरेद्रारा यह 
वाच-उच्छिषटं वै मे ममेदयुद्कः | उच्छिष्ट जल पिया जायगा [अर्थ्‌ 

मुञे उच्छिष्ट जर षीनेका दोष प्रा 
पीतं स्यादि पास्यामि ॥ २॥ । होगा] ॥ ३॥ 


इस प्रकार कदनेवाले उद 


ःप्युक्तवन्तं प्रत्युवाचेतरः-- | उषस्तिसे दूसरे ८ महावत ) ने ' 
क्दा-- 


न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजी विष्यमि- 


मानलादश्निति होवाच कामो म उदकपानमिति ॥४॥ + 


स्लण्ड १० | 


> 
शाङ्करमाष्याथ १२९५ 


श्या ये ( उडद ) भी उच्छिष्ट नहीं है ¢ उसने कहा -“इन्दे 
बिना खये तो म जीवित नहीं रह सकता था, जक्पान तो सुञ्ञे यथेच्छ 


मात्रामे मिरूता हैः ॥ ४ ॥ 

किं न स्विदेते कुल्माषा 
अप्युच्छिष्टाश्युक्त आहोषर्तिन 
वा अजीविष्यं न॒ जीविष्यामी- 
मान्कुल्माषानखाद श्रमक्षयन्निति 
होवाच । काम इच्छातो मे 
ममोदकपानं लभ्यत इत्यर्थः| 


अतशचैतामवस्थां प्राप्तस्य वि~. 


द्ाध्मयसोबतः स्वात्मपरोपकार- 
¢ . (~ (९) -.(& 

समथस्यैतदपि कमं वतो नागः- 

स्य इत्यभिप्रायः । तस्यापि 


जीवितं '्रत्युपायान्तरेऽजगुष्िते 
सति जुगुष्ितमेतत्कमं दोषाय । 


ज्ञानावलेपेन इवंतो नरकपातः 


स्यादेवेत्यमिप्रायः, प्रद्राणक 
शब्दश्रवणात्‌ ॥ ४ ॥ 


“क्या ये उडद्‌ भी उच्छिष्ट नहीं 
है १ एेसा कटे जानेपर उषस्तिने 
कहा-- न उड््दोको बिना खये- 
बिना भक्षण क्रिये तो भे जीवित नहीं 
रह सकता था । जकूपान तो 
ु्ञे इच्छानुसार मिक जाता दै ॥ 


अतः इसका यह अभिप्राय है कि 
इस अवस्थाको भाप हए, विया, धरं 
ओर यद्चसे सम्पन्न तथा अपने जीर 
दूसरोके उपकारमे समथ पुरुषको 
ठेसा क्म करते इए भी पापका स्पशं 
नहीं हो सकता। उसके भी नीवनक्रा 
यदि कोई अन्य अनिन्य उपाय 
हो तो यह्‌ निन्दनीय क्म॑दोषके 
ही स्यि होगा । ज्ञानाभिमानवश्च 
एसा कमं करनेवारे पुरूषका भी 
नरकमे पतन होगा दी-यह इसका 
अभिप्राय हे; क्योकि श्रुतिमें 
(राणक शब्द्का प्रयोग हे#॥४॥ 


क 1 








® चाक्रायणने श्रद्राणक' अर्थात्‌ अयन्त आपदूस्त होनेपर ही उच्छिष्ट 
भोजन किया था--इससे यह सिद्ध होता है कि विधिका व्यतिक्रम जौवनरश्ाका 
करो वैष साधन न रहनेपर ही किया जा सकता ह अन्यथा कदापि नहीं । 


1 1.1. 


| 


१२६ छान्दोग्योपनिषद्‌ 


स ह खादिखवातिदोषाज्ञायाया आजहार साप्र एव 
सुभिक्षा बभूव तान्प्रति्ह्य निदधौ ॥ ५ ॥ 
उन्द खाकर वह वचे हुए उड दोको अपनी पलीके स्मि ढे भय । 


वह पटल ही खूब भिक्षा प्रप्त कर चुकी थी | अतः उसने उन ठक | 


रख दिया ॥ ५ ॥ 


तांच स खादित्वातिरोषान- | उन्हे खाकर वह बचे हुए उद 


तिचिष्टाञ्जायाये कारुण्यादाज- | को करणावश्च अपनी मायकि छि | 


हार । साटिक्यग्र एब इल्माष्‌- | ठे जया । वह आपकी उदृदमि 
प्राप्तेः सुभिक्षा शोभनभिभ्ा | मिख्नेसे पूवं दी धमिक्षा-शोभः 
रन्धानेतयेतद्बभूव संदा । भिक्षाहो ची ओ भर्भात्‌ भन 

ठ प्राप्त कर चुकी थी । तथापि ली. 


तथापि सखीस्वाभाव्यादनवज्ञाय स्वभाववश, [ पतिके दिये ह | 


तान्डल्माषान्पत्ुदस्तातपतिगु ह्य | उनउद्दोकी थवहेखना नकरके उं 


निदधौ निक्षि्ठवती ॥ ५ || | पतिक हाथ लेकर रख दिया ॥५॥ 
सह प्रातः संजिहान उवाच यद्बतान्नस्य 


लभेमहि लभेमहि धनमात्रार्राजासो यक्ष्यते स मा 


सर्वेरासििज्येडेणीतेति ॥ ६ ॥ 


उसने परातःकारु शय्यात्याग करनेके अनन्तर का- यदि हमे कछ 


अन्न मिरु जाता तो हम कुछ धन प्राक्त कर ठेते, वर्योकि वद राना यज्ञ 
करनेवाला हे, वह समस्त ऋखिक्कमेकि छियि मेरा वरण कर रगा ॥६॥ 


© 
स तस्याः कमं जानन्प्रात- | वह अपनी पलीके उस कार्यको किं 


 [ सष्याय! 


इसने उदङ्‌ वचा रखे है, जानता था,जतः 


भातःसमय-उषःकार्मे शय्या अथवा 


रुपःकाले संजिहानः सयनं निद्रां | नद्राका व्याग कनके भनन्तर उद 


1 


| 
4 


इ्लण्ड १० | 
वा परित्यजन्तुवाच पल्याः 
शृण्वन्त्याः, यद्यदि बतेतिखिद्य- 
मानोऽ्नस्य स्तोकं लभेमहि 
तद्धक्त्वान्नं समर्थो गत्वा 


लभेमहि धनमात्रां धनस्याल्पम्‌ 


ततोऽस्माकं जीवनं भविष्यतीति। 

धनलामे च कारणमाह-- 
` राजासौ नातिदूरे स्थाने यक्ष्यते । 
यजमानत्वात्तस्यात्मनेषदम्‌ । स 
च राजामा मां पात्रयुपरम्य 
सर्वैरालिज्ये कसिक्ममिचऋछ लि- 
्र्मप्रयोजनायेत्यर्थो ब्रणी- 
तेति ॥ ६ ॥ 


6 
श्ाङ्रमाष्याथ १२७ 


अपनी पलीके सुनते इए कहा-- 
'्यदि [ भूखसे ] विन्न होते इए 
हमें थोडा-सा अन्न मिरु नाता-यहां 
"वतः अंन्ययका तातयं॑दहै “खिन्न 
होते इएः--तो उस अन्नको खाकर 
सामथ्यंवान्‌ हो [ कुछ दूर ] जाकर 
हम धनकी मात्रा अर्थात्‌ थोडा-सा 
धन प्राप्त कर ठेते ओर उससे हमारा 
जीवन-निर्वाहि हो जाता । 


धनखम्मे कारण बतरता है- 
यहँसे थोडी ही दूरपर वह्‌ राजा 
यज्ञ करेगा । यजमान होनेके कारण 
उसके ल्यि “यक्ष्यते ेसा आत्मने- 
पदका प्रयोग किया गया दै#। वह 
राजा स॒ञ्चे युपात्र समञ्लकर ` समस्त 
आलिज्यों - ऋलिककमेकि रिगे 
अर्थात्‌ ऋलिक्कर्मोको करानेके प्रयो- 
जसे वरण कर ठेगा ॥ ६ ॥ 


~: ०? {- 


तं जायोवाच हन्त पत इम एव करस्माषा इति 
तान्त्रादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ॥ ७ ॥ 


उससे उसकी पलीने कहा -^्वामिन्‌ | [ आपके दिये हुए ] व 
उदद ही ये मोद है; [इन्दे रीनिये ] ॥ उषत्ि उन्दं लाकर ऋलिनो- 
द्वारा विस्तारपूर्वक कयि जानेवाके उस यज्ञम गया ॥ ७ ॥ 


णं १ गष 
@ क्योंकि यजनरूप क्रियाका फल उस राजाको दी प्राप्त होनेवाडा या ॥ 


॥;. 
[4 =. 


=------- -- - -- 
1 


। न ~ 8 3४ >~ ~ 


१२८ जन्दोन्योपनिषद्‌ [ अच्याय १ 


# 5 
एवुक्तवन्तं जायोषाच-- | इस प्रकार कहते हुए उष 


हन्त गृहाण हे पत इम एवं ये | उसकी पलीने कहा--दैस्वाि्‌। 


द्धस्ते बिनििपतास्त्वया - आप इन उड्दौको ही लीजिये जि 
न , _ , | आपने मेरे हाथमे दिया था । उषसि 
षा इति । तार्खादित्वामं यज्ञं 


ल उन्हं खाकर राजाके उस वितत 
रो वितं िस्तारिश्त्विगम- ऋषिजद्रारा विस्तारपूर्वक सम्पादित 


रेयाय ॥ ७ ॥ होनेवाले यज्ञम गया ॥ ७ ॥ 


राजयन्ञमें उषस्ति ओर ऋविजोका संवाद्‌ 


तत्रोदरातृनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेदा स ह 
स्तोतारमुवाच ॥ < ॥ 
वहं [ जाकर वह ]आस्ताव ८ स्तुति ) के स्थानम स्तुतिकरते हृए । 
उद्गाताओंके समीप बैठ गया ओर उसने प्रस्तोतासे कदा-॥ ८ ॥ 
तत्र च गत्वोदधातूलु दराठपुरु- | ओर बहो जाकर वह उद्गाता । 
पानागत्य स्तुबन्त्यस्मिभित्या- | ोगकि पस आ आस्तावमे- जि, 
सतावस्तस्मिास्ताबे स्तोष्य- | स्थानम (ष्तोतागण ) सठति कत । 
माणालुपोपविवेश समीप उपवि- | ह, उसे आस्ताव कहते दै, उस्े~ । 


(हिस 1 । स्तुति करते हुए उद्गाताओकि समीप | 
शसतेषामित्यथः । उपविडय स ह | वेठ गया । तथा वहाँ बेठकर उसे 
प्रस्तोतारमुवाच ॥ ८ ॥ 


। भस्तोतासे कडा-॥ ८ ॥ 
पस्तोत्या देवता भस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्रा- 


५ मूधा ते विपतिष्यतीति ॥ ९॥ 
भस्तोतः ! जो देवता परस्ताव-भक्तिमे उसे 
विना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर १५६ 


इ्लण्ड १० ] 


हे प्रस्तोतरित्यामन्त्याभिभु- 
सीकरणाय । या देवता प्रस्तावं 


शाङ्करभाष्या्थं १२९ 
¬ << < < - 


हे प्रस्तोतः [--इस प्रकार 
अपनी ओर रक्ष्य करानेके स्यि 
म्बोधन करते हुए [ वह बोला] 


व्रस्तवभाक्तमनु गतान्वायत्ता ता , (नो देवत। प्रस्तावरमे- प्रस्तावभक्ति- 


चेदेवतां प्रस्तावभक्तेरविद्रान्सन्‌ 


म अन्वायत्त यानी भनुगत है, यदि 
उस प्रस्तावभक्तिके देवताको बिना 
जने ही तू उसका, उसे जाननेवाले 


्रस्तोष्थसि विदुषो मम समीपे । | मेरे समीप. प्रस्तवन करेगा तो तेरा 


मस्तक गिर॒ जायगा यदि यह्‌ 


तत्परोकषेऽपि चेद्विपतेत्तस्य मूरा | माना जाय कि देवतां-्ञानियोके 


कर्ममात्रविदामनधिकार 
करमणि स्यात्‌ । तचानिष्टम्‌, 
दुषामपि कम॑द्य॑नात्‌ , दक्षिण- 


मारुतेश । अनधिकारे चावि- 
दुषाणत्तर एवैको मागः श्रूयेत । 
न च स्मातंकमनिमित्त एव 
दक्षिणः पन्थाः,“यज्ञेन दानेन” 
इत्यादिश्रुतेः । (तथोक्तस्य मया! 
इति च विरोषणाद्िदरसमकषमेव 


क्मण्यनधिकरारो न सवाग 





परोक्षमे भी मस्तक गिर जायगा तो 


एवे | कैव कम॑का ही ज्ञान रखनेवारका 
अवि-। कमम अनधिकार ही सिद्ध होगा । 


ओर यह बात माननीय नहीं हे 
क्योकिं कमं ॑तो अविद्रार्नोको भी 
करते देखा जाता है ओर दक्षिण- 
मागंका प्रतिपादन करनेवाली श्रतिसे 
भी यही सिद्ध होता है। जौर यदि 
उनका अधिकार न होता तो श्रतिमें 
एकमात्र उत्तरमागंका ही प्रतिपादन 
करिया होता, क्योकि दक्षिणमागं 
केवल स्मातं कर्मके ही कारण प्राप्त 
होनेवाखा नदी है, जैसा किं “यज्ञसे 
दानसे” इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध 
होता है । तथा “मेरद्रारा इस प्रकार 
कहे हुए" इस ॒वाक्यद्रारा विदोषः 
पसे निरूपण किये जनेके कारण 
भी विद्वानके सामने ही उसे कमका 
अपकार नही. है । ¶ । 





"द 





१३० र छान्दोग्योपनिषद्‌ 
होत्रस्मातंकर्माध्ययनादिषु च, स्मत कर्म ओर अध्ययनादि सुत 
अनुायास्तत् ९ कमृमिं पेन्ना नियम नहीं हे, कयो$ 
सर स्तत (8 नहो तो [ अविदन्‌ सिव भौ] 
कमेमात्रविदामप्यधिकारः सिद्धः | कर्मु्ठनकी आज्ञा देखी न 
कर्मणीति 1 अतः यह सिद्ध हुभाढ़ि 
1 । मूधा ते केवर कर्ममात्रका ज्ञान करनेवाशै. 
विपतिष्यतीति ॥ ९ ॥ का भी कमम अधिकार है॥९॥ 


पणी - वि 


एवमेवोदवातारमु वाचोद्रातर्या देवतो्रीथमन्वाः 
यत्ता तां चेदविद्रानुद्रास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति 
॥ १० ॥ एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच तिहतर्या देवता 
परतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्ान्रतिषटरिभ्यसि मूधाते 
विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तु ष्णीमासांचक्रिरे॥११॥ , 
दसी भकार उसने उदूगातासे भी कहा- ह उद्गातः | नो देवत 
` उद्गीथे अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने उदृगान करेगा तोते । 
। मस्तक गिर जायगा ॥ १० ॥ इसी प्रकार प्रतिहतसि भी कहा--6 
भव्हितः ! जो देवता प्रतिहारमे अनुगत यदित उसे बिना जाने प्रति. 
` हरण्‌ करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ तब वे प्रस्तोता आदि भपने- 
ख -उप्रत हो मौन होकर बैठ गये ॥। ११॥ 
` एवमेबोद्रातारं प्रतिदर्तार | इसी भकार उद्गातासे तथा मरि 
चेत्यादि समानमन्यत्‌ । ते 


हसि कहा-इत्यादि शेष अरं पू 
, भ्रस्तोत्रादयः कमंभ्यः समारता | वत्‌ है । तव वे भर्तोता भादि क्रमे 


` , उपरताः सन्तो मूधंपातभया्त- { समारत _ अर्थात्‌ उपरत हो मत्तक | 
क प्णीमासांचनिरऽन्यच्चाङव भातः | गिर जानेके भयसे चुप होकर 1 | 

गये ओर अथहोनेके कारण उन्दने । 
अर्थित्वात्‌ ॥ १०-११॥ | कुछ जौ नहीं किया ॥१०-११॥ । 
६ „ ~: # ६ | 
3 इतिच्छान्दोग्योपनिषदि भथमाभ्याये दशमसखण्डमपष्यं सम्पृणंम्‌॥ १०॥ | 


^ ~ 
~ 


[ सष्याय ! 





चं न्तः 
4) 








ए्क्दच् खर्ड 


राजा ओर उषस्तिक्रा सकद 

अथ हैनं यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विवि- 
दिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥ १ ॥ 

तष उससे यजमाने कहा--“म आप पूज्य-चरणको जानना चाहता 
ह इसपर उसने कहा--भ चक्रका त्र उपस्ति ह ॥ १॥ 

अथानन्तरं = यज- | तदनन्तर उस उषस्तिसे यजमान 
राजाने कहा भगवानूको-- 
पूजनीयो जानना चाहता द ॥ 
रसा कदे जानेपर उसने कहा-- 








मानो राजोवाच । भगवन्तं वै 
` पूजावन्तमहं बिविदिषाणि वेदि- 


ठमिच्छमीलयक्त उपस्तिस्मि | ` ` ~ 
खाक्रायणस्तवापि श्रो 'यदि तुमने सुना हो तो मँ चरका 


यदीति होवाचोक्तवान्‌ ॥ १ ॥ | एत्र उषस्ति ' ॥ १ ॥ 
~: £ :- 


. स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सवेराविज्येः 
पयेषिषं भगवतो वा अहमवित्यान्यानव्रषि ॥ २ ॥ 


ने इन समस्त दविक्कमेकि स्यि श्रीानफ्टो सोजा था । 


श्रीमानूके न मिटनेसे ही मने दूसरे लिर्जोका वरण किया था ॥२॥ 

स॒ ह यजमान उवाच-सत्य- , उस यजमानने कडा-- थह टीक 
मेवमहं भगवन्तं बहुयुणमश्रौषं | ही दै, मने श्रीमान्को बहुत गुण- 
स्वैश्च ऋलिकरमभिरासज्यैः | वान्‌ घना दै । भने सम्पूणं छलि- 
पर्यैषिषं पर्येषणं कृतवानस्मि । । क्कमके स्थि जप सोल 


छाः उ ५- 


१६२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय १ 


अन्विष्य भगवतो वा अहम- | की थी । द्दनेपर श्रीमानूके न 
विच्यालाभेनान्यानिमानब्रषिघर- | मिरनेसे ही ने इन दूरे ऋलिनो- 
तवानस्मि ॥ २॥ काव्रण किया था ॥ २॥ 


भगवास्तेव मे सवेराविञ्येरिति तथेत्यथ तर्येत 
एष समतिखष्टाः स्तुवतां यावच्वेभ्यो धनं ददास्ताव- 
न्मम द्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ ३॥ 


मेरे समस्त ऋत्विक्कमेकि रि श्रीमान्‌ ही रह येसा सुनकर 
उपस्तिने “दीक दै' पेसा का-[ ओर बोला- ] “अच्छा तो मेरे द्वार 
भस्नतासे आज्ञा वि हुए ये ही छोग स्तुति करं; ओर तुम जितना 


धन इन्दे दो उतना ही मुञ्चे देना ॥ तव यजमाने %सा ही होगा' यह 
कहा ॥ ३ ॥ 


अद्यापि भगवांस्त्वेव मे मम | “अव भी श्रीमान्‌ ही मेरे समू 
(५ सवरालिज्यै ऋत्विकं ¢ <~) 
ज्यं ऋछत्विकर्माथमस्त्वि- ऋलिक्कर्मोके स्यि रहं एेसा 
स्यक्तस्तथेत्याहोषस्तिः ॥ रं | कटे जानेपर उषस्तिने कदा-- 
त्वथेव तयत एव त्वया पूवं वृता अच्छा, कितु तुमने पषटरे निनक[ ` 
मया समतिसृष्टा मया सम्यक वरणकर ल्या हैवे ही ऋवि- 
सननायुज्ञाताः सन्तः र गगण मेरे द्वारा समतिखष्ट होत्रे 

तवेतत्कार्यम्‌ 

ताम्‌ । त्वया त्वेत › || म्रसन्नतासे आज्ञा पराप्त कर स्तवन 
यावचवेभ्य.भरस्तो्ादिभ्यःसर्ेभयो| करं । क तो यही करना होगा क 
जितना धन तुम इन सम्पूणं प्रस्तोता 
आदिको दोगे उतना ही सुञञे देना 
फेसा कटे जानेपर यजमानने “ेसा 
ही होगा यह्‌ कहा | २ ॥ 


धनं दद्याः प्रयच्छसि तावन्मम 
दद्याः । इत्युक्तस्तथेति ह यज- 
मान उव्राच ॥ २ ॥ 


खण्ड १९] शाङ्करमाष्याथं १३३ 
उषस्तिके प्रति प्रस्तोताका प्रदन 


अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद शस्तोतर्या देवता 
परस्तावमन्वायत्ता तां चेद विद्ान्प्रस्तोष्यति मूर्धा ते 


विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥४॥ 
तदनन्तर उस ( उपस्ति ) के पास [ शिष्यभावसे ] प्रस्तोता आथा 
[ ओर बोा--] “भगवन्‌ | आपने जो मुक्षत कहा था कि हे प्रस्तोतः | 
जो देवता प्रप्तावमे अनुगत हे यदि तू उसे. विना जाने प्रस्तवन करेगा तो 
तेरा मस्तक गिर जायगा--सो वह देवता कौन है ® ॥ ४॥ 
अथ हैनमौपर्त्यं वचः शरुत्वा | तदनन्तर उपस्तिका यह वचन 
सुनकर प्र्तोता उषस्तिके प्रति उपसन्न 
्रस्तोतोपससादोपसिति विनये- । हुभा- विनीत ावसे उपत्तके 
समीप आया [ ओर बोख-- ] 
नोपजगाम । प्रस्तोतर्या देवते- वचनो 
जो देवता प्रस्तावमें अनुगत है 
इसयादि वाक्य स॒ङ्षसे कहा थासो 
वभू; कतमा सा देवता १ या | वह देवता कौन दै, नो कि परप्ताव- 
4 भक्तिमे अनुगत है ® ॥ ४॥ 
प्रस्तावभक्तिमन्वायत्तेति ॥ ४॥ 


त्यादि मा मां भगवानवोचसपू- 


उष्स्तिका द देवता प्राण हे 
भ्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि 
प्राणमेवाभिसंविशन्ति ष्राणमभ्युजिहते। सेषा देवता 
प्स्तावमन्वायत्ता । तां चेदविद्वन्श्रास्तोष्यो मूषां ते 


व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ५॥ 
उस ८ उत्ति) ने "वह ( देवता ) प्राण हे" एसा कय क्योंकि 


ये सभो भृत प्राणे ही प्रवे कर जते है ओर भाणे ही उलन होते 


(क १ 
/' 7 ए +. 





१३७ अ छान्दोग्योपनिषद्‌  [ ष्याय १ 


है । वह यह प्राणदेवता ही प्रस्तावे अनुगत हे, यदि तु उसे बिना 
जाने ही परस्तवन करता तो भरदरारा इस प्रकार कहे जनेपर्‌ तेरा 
मस्तक गिर जाताः ॥ ५ ॥ 


ृष्टः प्राण इति होवाच । युक्तं ईस प्रकार पूछे जानेपर उसने "वह 
देवता प्राण हैः एसा कहा । प्राण 
म्तावका देवता हे- यह कथन दीक 
सर्वाणि स्थावरजङ्गमानि भूतानि | दी दै । किस प्रकार £ व्ोकि 

सम्पूणं स्थावर-जब्गम प्राणी प्रखयका- 
प्राणमेवाभिसंविरान्ति प्ररयकाले| मे प्राणहीमे मवे करते है, अर्थात्‌ 


भाणक्रो ओर रक्षयकर प्राणखपसे दही 
पाणममि लक्षयित्व प्राणात्म- | [ उत स्थित हो जते] भोर 





्रस्तावस्य प्राणो देवतेति। कथम्‌ १ 


णादेवोद्‌गच्छ- | उकारे उसीसे उद्गत होत है 
7 ४ ` ` । अर्थात्‌ वे भाणसे ही उस्न होते है । 
न्तीत्य्थं उत्पत्तिकाले । अतः वह यह्‌ प्राणदेवता ही प्रष्तावमें 









सेषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता । | अयुगत है। 


तां चेदविद्रांस्त्वं प्रास्तोष्यः 
` भ्रस्तवनें प्रस्तावभक्ति कृतवानसि 
यदि मूध शिरस्ते व्यपतिष्य- 
द्विषतितममविष्यत्तथोक्तस्य 


त्‌ यदि उसे बिना. जाने ही प्रप्तवन- 
भस्तावभक्ति करता तो तेरा मूर्धा 
यानी मस्तक गिर जाता । धर्थत्‌ 
उस समय मेरे इघ प्रकार कहनेपर 
तत्का मूधा ते विपतिष्यः विपतिष्यतीति । क तिरा मस्तक गिर जायगा? तेरा 
निषिद्धः कमणो यदुपरममकाषीं- निषेष कनेपर कर्मे उपरति की 
रित्युमिप्रायः ॥ ५ ॥ वह जच्छाही क्रा दै॥ ५॥ 


[१ 


<~ > 





अण्ड ११ | शाङ्करमाष्या्थं १३५ 
> > न = 
उद्गाताका ्रस्न 


अथ हेनमुद्रातोपससादोद्भातर्या देवतोद्रीथमन्वायत्ता 
तां चेदविद्वानुद्रास्यसि मुधा ते विपतिष्यतीति मा भग- 
वानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ६ ॥ 

तदनन्तर उसके समीप उद्गाता आया [ जर ॒बोख-- ] 

“भगवन्‌ ! आपने मुक्षसे जो कहा था कि हे उदुगातः | जो देवता 
उदुगौथमे अनुगत है यदि उसे बिना जने ही तु उद्गान करेगा तो तेरा 
मस्तक गिर जायगा- सो वह देवता कौन है ४॥ ६॥ 

तथोद्गाता पप्रच्छ कतमा | इसी प्रकार उससे उद्गाताने भी 
सोद्रीथभक्तिमनुगतान्वायत्ता दे- | पूछा किं वह उद्गीथमक्तिमे अनुगत 
वता ? इति ॥ & ॥ कोन देवता है १॥ ६ ॥ 


कि. /, ¬) 
उषस्तिका उच्तर-उद्गीथानुगत देवता आदित्य है 
आदित्य इति द्ोवाच सर्वाणि ह वा इमानि 
भूतान्यादित्यमुचैः सन्तं गायन्ति सेषा देवतोद्वीथम- 
न्वायत्ता तां चेदविद्वानुद गास्यो मूधा ते उ्यपतिष्यत्त- 
थोक्तस्य मयेति ॥ ७ ॥ 

उषस्तिने वह ( देवता ) आदित्य है" एेसा कहा, क्योकि ये सभी 
भूत ऊँचे उठे आदित्यका ही गान करते हैँ । वह यह आदित्य देवता 
ही उदुगीथमं अनुगत है । यदि तू उसे बिना जाने ही उद्गान करता 

तो मेरे द्वारा उस तरह कदे जनेपर तेरा मस्तकं गिर जाता ॥ ७ ॥ 
पष्ट आदित्य इति होवाच । | इस प्रकार पूरे जानेपर उसने 
“वह [ देवता ] आदित्य है' एसा 
सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्या- | कदा; क्योकि ये समी प्राणी उंचे 


९३६ छान्दोग्योपनिषद्‌ | अष्याय १ 
> > >>> >~ ट 
दित्यच्चैरुध्वं सन्तं गायन्ति | अर्थात्‌ उप्र विमान आदित्यका ही 
| गान---शव्द्‌ अर्थात्‌ स्तवन क्रते 
है; प्र्तावसे श्र शाब्दे समानता 
हौनेके कारण जैसे प्राण-प्रप्ताव-देवता 
था उसी प्रकार यहाँ [उद्गत आदिय 
जर उदूगीथकी ] उत्‌" शब्द 
सामान्यादिव प्राणः । अतः सषा | समानता हने यह्‌ उदूगीथ देवता 
है, अतः वह यह देवता आदि शेष 
देवतेत्यादि पूर्वत्‌ ॥ ७ ॥ | अर्थ पूर्ववत्‌ है ॥ ७ ॥ 


६ 


शब्दयन्ति स्तुबन्तीत्यरिग्रायः, 


उच्छब्द्सामान्यात्‌; भ्रशव्द्‌- 


ग्रतिहतकि प्रन 
अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता भरति. 
हारमन्वायत्ता तां चेद षिद्रन्प्रतिहरिष्यसि सूरी ते विष- 
तिष्यत्ीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥८॥ 
किर परतिहर्त उसके पास आया [ भौर वोर-- ] भगवन्‌ | 
आपने जो सुन्ञसे कहा था कि टे प्रतिहतः | नो देवता प्रतिहारं अनुगत 


है यदि उसे बिना जने ही तु प्रतिह्रण करेगा तो तेरा मस्तक गिर 
जायगा-- सो बह देवता कौन है ॥ ८ ॥ 


एवमेवाथ हैनं प्रतिहर्तोपस- ¦ इसी प्रकार फिर उसके पास 
८ 
साद्‌ कतमा सा देवता प्रतिहार | पतिह्त = 94 
पतिहारमे अनुगत देवता कौन | 


भन्वायत्तेति ?॥ ८ ॥ है॥ ८॥ 


----ज््----- 
उपस्तिक उत्तर-प्रतिहारानुगत देवत] अन्न ह 


अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह॒वा इमानि भूता- 
न्यन्नमेव पतिहरमाणानि जीवन्ति सेषा देवता पतिहार- 








खण्ड ११ | शाङ्करमाष्याथ १३७ 


मन्वायत्ता तां चेदविद्रान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपति- 
यत्तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ९ ॥ 


इसपर उसने "वह ८ देवता ) अन्न है" रसा कहा; क्योकि ये सम्पूणं 


भूत अपने प्रति अन्नका ही हरण करते हुए जीवित रहते है । वह यहं 
अन्न देवता प्रतिहारमे अनुगत है । यदि तु उसे विना जाने ही प्रतिहरण 
करता तो मेरेदरारा उस तरह कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता ॥ ९॥ 


पृष्टोऽननमिति होवाच । 
सर्वाणि इ वा इमानि भूतान्य- 
सरमेवात्मानं प्रति स्वतः प्रति- 
हरमाणानि जीवन्ति । सेषा 
देवता प्रतिशब्दसामान्यासरति- 
हारभक्तिमल्ुगता । समानमन्य- 
तथोक्तस्य मयेति । प्रस्तावो- 
दरीथप्रतिहारभक्तीः प्राणादित्या- 
न्दृषटयोपासीतेति समुदायाथेः। 
प्राणाद्यापत्तिः कम॑समृद्धवा 


फरुमिति ॥ ९ ॥ 


++ 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि 


इ प्रकार पूछे जानेपर उसने वहं 
देवता अन्न हैः एेसा उत्तर दिया, 
वर्थोकि ये सम्पूणं मूत सब ओरसे 
अपनी ओर अन्नका प्रतिहरण करते 
हुए ही जीवित रहते दै । वह यह 
देवता ही "प्रतिः शब्दम सादृश्य 
होनेके कारण प्रतिहार भक्तिमें 
अनुगत है । [ तां चेदविद्वान्‌ः 
यहाँ से लेकर ] तथोक्तस्य मयाः यहोँ- 
तक रोष अथं पहलेके समान है । 
समुदायाथं ८ श्राण इति होवाचः 
इत्यादि सव मन्त्रोका सारांश ) यह 
हे कि प्रस्ताव, उद्गीथ ओर प्रतिहार 
भक्तियोकी क्रमशः भ्रण, भादि 
ओर अत्रदृष्टिसे उपास्नना करनी 
चाहिये । प्राणादिषूपताकी प्रापि 
अथवा कर्मम समृद्धिम्‌ करना यह्‌ 
उस उपासनाक्रा फरु हे ॥ ९ ॥ 


प्रथमाध्याये 


ह 


पकादशखण्डमाष्यं सम्पूणम्‌ ॥ १६ ॥ 


( र 
-- ० :-- 


सद्र कण्डु 


--०-९ 42 9 ~ 


ज्ोवसामसम्बन्धी उपाल्यान 
अथातः शोव उद्गीथस्तद्ध वको दारभ्यो ग्लावो 

वा मेत्रेयः स्वाध्यायमुदरनाज ॥ १ ॥ 
तदनन्तर अव [अन्नरभके लिये जपेत्‌] सौव उदगीथका आरम्भ 


या जाता रै । वहाँ 


 भरसिद्ध है छि | पूर्वकास्मे ] द्मा पुत्र बक 


अथवा मित्राका पुत्र ग्लाव स्वाध्याये रयि [ गोवके बहर ] जङाशयके 


समीप गया ॥ १ ॥ 


अतीते खण्डेऽनाप्रापिनिमित्ता 
शोबोद्गीयोपदेश- कष्टावस्थोक्तो- 


भयोजनम्‌ च्छिष्टपयुपितमक्षण- 
रक्षणा सा मा भूदित्यमला- 
भाय अथानन्तरं ओोवः उभि 


उद्रीथ उद्दानं 
प्रस्तूयते । ` 


सामातः 


तत्तत्र ह किक बको नामतो | 


दल्भस्यापत्यं दाल्भ्यो गावो 
बा नामतो मित्रायाथापत्यं 
मेत्रेयः। बाञ्ञब्दथा्थे दथायुष्या- 


अतीत खण्डमे अन्नकी अप्रा्िसे 
दोनेवाली उच्छिष्ट ओर पर्युषित 
( बासी ) अन्नभक्षणङूप कष्टमयी 
अवस्थाका वणेन करिया गया था, 


वैसौ भवस्थाकी प्राति न हो-- 


इसख्यि जब इससे भागे भन्न- 
मर्क स्थि शौव- धानोद्ारा 
देखे हए उद्गीथ--उद्गान खाम- 
का भारम्भ किया जाता है । 


यहो परसिद्ध दहै कि बकनामक 
दारभ्य-दरभका पुत्र अथा ग्लव- 
नामक भेत्रेय-मित्रका पुत्र स्वाध्याय 
खि भरामसे बाहर “उद्नाजः 
एकान्त देशम स्थित जलाश्चयके 
समीप गया। यहो वाः शाब्द चः 


खण्ड १२ | 


श्ाङ्करभाष्याथं 


१३९ 


> < >< >< < --8- - -<- ----<----<--------- 


यणो ह्यसौ । वस्तुविषये क्रिया - 
स्विव 


(द्विनामा द्विगोत्रः" इत्यादि 


विकल्पानुपपत्तेः । 


हि स्मृतिः । दश्यते चोभयतः 
पिण्डमाक्त्वम्‌ । उद्वीथे बद्ध- 
चित्ततवादुषावनादराद्रा वाशब्दः 
स्वाध्यायार्थः । स्वाध्यायं कतुं 
ग्रामादूबदिरुदवाजोद्वतवान्विवि- 
क्तदेशस्थोदकाम्याशम्‌ । 
उद्व्राज प्रतिपालयाश्का- 
रेति चैकवचनाघ्निङ्गादेकोऽसा- 
षिः । शोद्वीथकारग्रतिपारना- 
दुषेःसवाध्यायकरणमन्नकामन- 


येति लक्ष्यत हत्यभिग्रायतः॥ १॥ 


[थ 
1 


( ओर ) के अर्थम है । अवद्य 
ही वह दरयाभरुष्यायण हे, कर्कि 
वस्तुके विषयमे क्रिया्जौके समान 
विकल्प दोना सम्भव नहीं दै । 
“द्विनामा द्विगोत्रः"' इत्यादि वाक्य 
स्मृति प्रसिद्ध॒ भी है। [ निस 
गोत्रे पुत्र उत्पन्न होता दहै ओर जहाँ 
वह धमूवंक गोद ज्या जाता है 
उन ] दोर्नोका उससे पिण्डग्रहण 
करना छोकर्मे भी देखा दी जाता 
है । अथवा उद्गौथविदामे बद्ध- 
चित्त होनेसे छषिरयोमे अनादर होने- 
के कारण वाः शब्दका प्रयोग 
स्वाध्यायके स्यि किया गया है । 


“उद्रवाजः ओर श्रतिपाख्याञ्चकार' 
इन क्रियारओमे एकवचन ` होनेसे 
सिद्ध होता है कि यष्ट एक दही 
चषि है । [तृतीय मन्त्रम कथित ] 
शानोके उद्गीथकारुको प्रतीक्षा 
करनेसे तादप्यतः यह रक्षित होता 
हे कि श्छषिका स्वाध्याय फरना 
अन्नकी फामनासे हे ॥ १ ॥ 


अ 
4 ५ ०9 र्का 


१९० 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय १ 


तस्मे श्चा श्वेतः प्रादुवभूव तमन्ये श्वान उपसमे 


त्योचुरच्ं नो भगवानागायकश्नायाम वा इति ॥२॥ 


उसके समोप एक श्त कृत्ता प्रकट हुआ । उसके पास दूसरे कुततोने 
आकर कदा-- भगवन्‌ | अप हमारे ल्य अन्रका आगान कीजिये, 


हम निश्चय दही भूखे हः ॥ २ ॥ 

स्वाध्यायेन तोषिता देवत- 
षिवा श्वरूपं गृहीत्वा श्वा शवेतः 
संस्तस्मा ऋषये तदनुग्रहाथं 
प्रादुर्बभूव प्राुकार । तमन्ये 
शुङ्ग श्वानं क्षुल्लकाः श्वान उप- 
समेत्योचुरुक्तवन्तोऽन्नं नाऽस्मभ्यं 
भगवानागायत्वागानेन निष्पा- 
दयचित्यथः । 


शृख्यप्राणं वागादयो वा 
प्राणमन्वन्नयुजःस्वाध्यायपरि- 


सन्तोऽयुगृहणीयुरेनं 
श्ररूपमादायेति युक्तमेवं प्रतिप- 


तोषिताः 


तुम्‌ । अशनायाम वै बुयुक्षिताः 


स्मो वाइति ॥२॥ 


तान्होवाचेहैव मा पात 
दाल्भ्यो गावो वा सेत्रेय 


स्वाध्यायसे संतुष्ट हो उस 
ऋषिके निमित्त--उसपर अनुग्रह 
करनेके स्यि [ कोड ] देवता या 
ऋषि श्वानछ्प भारणकर शेत कृत्ता 
बनकर प्रकट हुजा । उस श्वेत कुत्तसे 
दूसरे छोटे-छोटे कृत्तोने समीप 
आकर कहा--भगवन्‌ | आप हमारे 
स्थि जन्नका आगान कीजिये अर्थात्‌ 
अगानके द्वारा अन्न प्रस्तुत कीनिये ।' 


अथवा मुख्य प्राणसे वागादि 


` | गोण प्राणोने इस तरह कहा, क्थोकि 


मुख्य प्राणके पीके अन्न ग्रहण 
करनेवाटे वागादि गोण प्राण उसके 
स्वाध्यायसे संतुष्ट॒हो शानहूप 
धारणकर उसपर अनुग्रह करं-- 
एसा मानना उचित ही है । अवद्य 
ही हमं अशन (भोजन) की इच्छा दै 
अर्थात्‌ हम निश्चय ही भूखे हैः ॥२॥ 


सुपसमीयातेति तद्ध बको 


प्रतिपाखयाचकार ॥ ३ ॥ 


शण्ड १९ 1 काङ्करमाष्याथ १४१ 


~ ------- <<< --~ 
उनसे उस ( शेत श्वान ) ने कहा--“तुम परातःकार यहीं मेरे 
पाच जाना ! ठव दारभ्य बक अथवा मेत्रेय ग्छाव उनकी प्रतीक्षा करता 
रहा ॥ ३ ॥ 
एवुक्ते श्वा श्वेत उवाच | यपेसा कटे नानेपर रेत कुेने उन 
= ~ _ | छोटे-छोटे कुत्तौसे कहा- वम प्रातः- 
ता्॒नकाञ्ुन॒इवास्ममेव कार इसी स्थानपर मेरे पास आना। 
प्समीयातः इसत ॒करियापदमें दीर्धपाठ 
छान्दस है अथवा प्रमादके कारण 
समीयातिति । द्यं छान्दसं | दै । मरातकारुकी जो निधुक्ति कौ 
गयी है वह उसी समय उद्गानकरी 
सभीयातेति व्रमादपाटो वा । | कर्तव्यता सूचित करनेके ल्थि 
्रातःकालकरणं तत्का एव | अथवा मध्याहोरर कामे अन्नदाता 
करवया्थम्‌ । अन्नदस्य वा | सयं उद्गाके सन्ल नही रता 
सबितुरषराङ्केऽनाभिष्ख्यात्‌ । | यह सूचित करनेके स्थि दे । 
तत्तत्रैव ह बको दाल्भ्यो | तब दारभ्य वक अथवा मैत्रेय 
ग्लावो बा मैत्रेय ऋषिः प्रतिपा- | ग्व नामक ऋषि उसी स्थानपर 
र्याशचकार ब्रतीक्षणं कृतवा- श्रतिपाख्याश्चकार'-म्रतीक्ष करता 
नित्यथेः ॥ ३ ॥ रहा-यह इसका तात्पयं है ॥ ३ ॥ 


देशे भा भां प्रातः प्रातःकालडउपः 


--: ° :~- 


ते ह यथेवेह बहिष्पवमानेन रतोष्यमाणाः स 
रब्धाःसर्षन्तीत्येवमासश् युस्ते ह सम्‌ पविदय हि चक्तु॥४॥ 
उन कोने, जिस प्रकार कर्मे बहिष्पवमान सतोतसे स्तवन कने- 


वारे उद्गाता परस्पर भिरकर भमण करते दै उसी प्रकारं अमण क्या 
ओर परर वहो वठकर हकार करने रगे ॥ ४ ॥ | 


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१४२ छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ चष्याय १ 


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ते शधानस्तत्रैवागम्य ऋषेः | उन कुतोने वहो उ ऋष्क 
समक्षं यथेह कर्माणि बहिष्पवमा- | सम्पुल आकर, जिस प्रकार कर्मे 
नेन स्तोत्रेणस्तोष्यमाणाउद्वात्‌- | बदिष्पवमान स्तोत्रस स्तवन करने. 
पुरुषाः सरन्धाः संलग्ना अन्यो- वाले उद्वातारोग एक-द्सरेसे मिल- 
न्यमेव भुखेनान्योन्यस्य पुच्छं | कर चन्ते है उसी प्रकार हस 
गृहीत्वा ससुपुरासु न्तः परि- एक-दूसरे पूंछ पकटकर सर्पण- 
त १ परिभ्रमण क्रिया । उन्होने रस 
सन्तो हि चक्र्हिकारं कृतवन्तः | प्रकार परिभ्रमण कर फिर वशं 
91 ` वैटकर हकार किया ॥ ४॥ 


+ 
"‡ 9 ~~~ 


कृत्तोदवारा भिया हुजा हिकार 


ओ भदारमोंर३पिवा३ेमों३ देवो वरुणः 


परजापतिः सविता २ न्नमिहा २ हरदन्नपते ३ ऽन्न- 
मिहा २ हरा २ हरो ३ मिति॥५॥ 


ॐ हम खाति है, ॐ हम पीते टै, ॐ देवता, वरुण, प्रजापति, 
सुयेदेव यहाँ अन्न खव । हे अनपते | यहाँ अन्न खभो, अनन सभो, 
ॐ ॥ ५॥ 

ओमदामों पिबामो देवो चयो-| ॐ हम खाते है, ॐ हम पीते 
तनात्‌, वरुणो वषेणाजगतः, | दै, ॐ । आदित्य ही चोतनथीर 
ल पारनातमजानाम्‌ होनेके कारण देव, जगतूकी वर्षा 


4: ९ _ १ | करनेके कारण वरुण, प्रनार्जोका 
सप्ता प्रसत त्वात्सवस्यादित्य | पारन करनेसे भजापरि तथा सबका 
उच्यते । एतैः पर्यायैः स एव | पसव्ति होनेके कारण सविता 
भूत॒ आदित्योऽ्नमस्मम्यमिहा 1 


सरत करण पेसे गुर्णोवाले वे आदिय 
1हरात्व हमारे ९) 
दरदादरत्विति । यल अन रि । 


न 


खण्ड १२ ] शाङ्रभाष्याथे १५३ 
त एवं हि छरत्वा पुनरप्यूचुः- | इस प्रकार ईकार कर उन्होने 
_ 6८ [फिर भी कहा-व्हीतु हे भन्नपते | 

स तवं हैऽ्नपते ! स हि सवस्या- - सम्पूणं नका उत्त्तिकर्ता होनेके 
= कारण वी अन्नपति दै, क्योकि 

लस्य प्रसवितृतवात्तिः । न दि उसके पाक विना उत्यन्न हो जानेपर 
त्पाकेन मिना श्ह्वमनमु- | भौ भिय स्थि _भयुगात भौ 
अन्न उत्मनन नहीं होता, अतः वह 


मात्रमपि जायते प्राणिनाम्‌ । | अन्नपति है--दे अन्नपते | तृ हमारे 
लिये यहाँ अन्न ख ।' आहरः इस 
अतोऽमपतिः । हेऽमपतेऽ्नमस्म | शव्दङ्ी पुनरृत भद्रके च्य ` 


समाप्ति सूचित करनेके श्यि 


आदरार्थः । ओमिति ॥ ५ ॥ । दै ]॥ ५॥ 
--; ॐ ;--- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाभ्याये 
दादराखण्डमाष्यं सस्पूणम्‌ ॥ १२॥ 





खौद्त र 
~ 
छामावयवमूत स्तोमाक्षरसम्बन्धिनी उपासना 
भक्तिविषयोपातनं सामा-, सामभक्ति-विषयक उपासना 


वद्रभित्यतः सामावयर्वोसे सम्ब । अतः 
वयवसंबद्भमित्यतः सामावयवा- मसि ४ व | 
न्तरस्तोमाक्षरविषयाण्युपासना- | स्तोमाक्षरविषयक अन्य संहत 
न्तराणि संहतान्युपदिर्यन्ते- | उपासनार्ओका वर्णन किया जाता 
ऽनन्तरं सामावयवसंद्धःवावि- | दहै, क्योकि उनका भी सामावयव- 
ख्पसे [ सामभक्तिके साथ ] सम्बद्ध 

शेषात्‌-- होना समान ही है-- 


अयं वाव रोको हाउकारो वायुर्हाहकारश्न्द्रमा 
अथकारः । आम्मेहकारोऽभ्चिरीकारः ॥ १ ॥ 


यह छोकं ही हाउकार है, वायु हाईकार है, चन्द्रमा भकार दै, 
आत्मा इकार है ओर अग्नि ईकार है ॥ १ ॥ 


अयं बावायमेव रोको हाड- यह छोकं ही रथन्तर साम 
कारः स्तोभो रथन्तरे साम्नि प्रसिद्ध हाउकार्‌ स्तोभ है। ही 
सिद्धः । इवं ैरथन्तरम्‌' इत्य रथन्तर हे" इस सम्बन्धसामान्ये 
9 र हाउकरार स्तोभ ही यह छोक है-इस 
स्तोभोभ्यं लोक इत्येवभुपासीत्‌ । | प्रकार उपासना करे । वायु हाइकार 
वायुाडकारः। वामदेव्ये सामनि | है; वामदेव्य सामे हादकार स्तोम 
त रिद । वायु सोर. जलका 
बन्धश्च वामदेञ्यस्य साम्नोयानि सम्बन्ध ही वामदेव्य सामका मूक 





खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्याथ १४५ 
> ~ < = <-> >< 1 >< >- < 


रिति । अस्मात्‌ सामान्याद्धाई- | है । अतः इस समानताके कारण 
हाइकार सामकी वायुदृष्टिसे उप- 
कारं वायुदष्टयोपासीत । सना करनी चादिये । 
४ | चन्द्रमा अथकार है | अथकारकी 
चन्द्रमा अथकारः । चन्द्रः | उपासना चनद्रद्टिते करनी चाहिये, 
क्योकि यह ८ चन्द्रमा ) अन्नम दी 
स्थित है । चन्द्रमा अन्नस्वूप ही 
स्थितम्‌। अन्नात्मा चन्द्रः । | है । थकार जर अकारमें समानता 
होनेके कारण भी [अन्नखप्‌ चन्दरमा- 
थकाराकारसामान्याच । आत्मे- | कौ अथकाररूपसे उपासना करनी 
तीतः चादिये ] आत्मा इहकार है; इद" 
इकारः । इहेति स्तोभः परत्य थह [ एक प्रकारका | स्तोम होता 
| हे । प्रक्ष ही आत्मा हः पसा 
| कहकर निर्देश क्रिया नाता है ओर 
चस्तोभः, तत्सामान्यात्‌ । अमि- ¡ शदः देषा स्तोम भी होता दै, 
1 अतः उसकी समानताके कारण 
रीकारः । निधनानि चाग्नेयानि | [ आत्मा इहकार दै ] । अनि ईकार 
| हे । सम्पूणं आग्नेय साम ‰' में समाप्त 
; होनेवाटे दै । अतः उस सद्दाताके 
| कारण अग्नि ईैकार है॥ १॥ 


-व्9-+- 


आदित्य उकारो निहव एकारो विखे देवा ओ- 
होयिकारः धरजापतिहिकारः प्राणः स्वरोऽन्नं या 


वाग्विराट्‌ ॥ २॥ 
आदिल ऊकार दै, निहव एकार दै, विवेदेव ओहयोयिकार दै, 


दृष्टयाथकारमुपासीत । अन्ने हीदं 


दयात्मेहेति व्यपदिश्यते, इहेति 


सर्वाणि सामानीत्यतस्ततसामा- 


न्यात्‌ ॥ १ ॥ 


` ्नापति हकार है तथा भरण सवर दै, जन या दै पव वरद्‌ वाक्‌ दै ॥२॥ 


क 0. 


१४६ 
नि 


आदित्य उकारः । उच्चैरूध्वं 


सन्तमादित्यं | 


स्तोभः। आदित्यदेवत्ये साम्नि 
स्तोभ ऊ इत्यादित्य उकारः । 
निहव इत्याहवानमेकारः स्तोभः। 
एहीति चाहयन्तीति तत्सामा- 
न्यात्‌। विश्वे देवा ओहोयिकारः। 
 वैरवदेव्ये साम्नि स्तोभस्य दर 
नात्‌ । प्रजापतिर्दिकारः । आनि- 
रु्तथारदिकारस्य चाव्यक्ततवात्‌। 


प्राणः स्वरः, स्वर इति 
स्तोभः । प्राणस्य च स्वरहेतुतव- 
सामान्यात्‌ । अननं या। या 
इति स्तोभोऽन्नम्‌ । अन्नेन हीदं 
यातीत्यतस्त्सामान्यात्‌ । वा- 
गिति स्तोभो विराडन्नं देवता- 
विशेषो वा। वैराजे साम्न स्तो- 
भदशेनात्‌ ॥ २ ॥ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय १ 
< > ¬> 

भादि उकार है; ऊँचा धरथत्‌ 
उपरकी ओर स्थित आदिलका ही 
उदूगाता रोग] गान करते दै, अतः 
उकार ही यह स्तोभ है । आदि 
देवतासम्बन्धी सामम ऊ स्तोम है, 
अतः आदित्य उकार है- | रेी 
उपासना करे ] । निहव आहानक्गो 
कहते दै; वह एकार स्तोभ दै, क्यो. 
किं एहि एेसा कहकर रोग पुकारा 
करते ह, उस सादृश्यके कारण 
[ निहव एकार है ] । विश्वेदेव 
जदोयिकार रहै, क्थोकि वैरवदेव्य 
सामे यह स्तोभ देखा जाता दै । 
भ जापति हिकार है, क्योंकि उसका 
किसी प्रकार निर्वचन नहीं किया ना 
सकता तथा हकार भी अव्यक्त ही है। 
प्राण स्वर दै; श्वरः बह 
एक प्रकारका स्तोम है । स्वरका 
कारण होनेमे उससे प्राणकी सदश्चता 
होनेके कारण (माण स्वर है] । अन्न 
याहै। धाः यह स्तोम अन्न है, 


क्योक्ति अन्नसे ही यह प्राणी यत्रा . 


करता है अतः उसकी समानता होनेके 
भरण अन्न ॒या दहै । वाक्‌ यह 


स्तोभ विशट्‌--अन्न॒ अथवा 
देवताविरेष दै, वयोंकि वैराज 
सामे वारस्तोभ देला जाता दै ॥२॥ 


3 @ ई ` 


~ 


खण्ड १२ ] श्ाङ्करभाष्याथ १४७ 


अनिरक्तलयोदराः स्तोभः संचरो हकारः ॥६॥ 


जिसका [ विरोपरूप्सो ] निरूपण नही क्या नाता ओर जो 
[ कारयरूपसे ] संचार करनेवास है वह तेरहवाँ स्तोम हुंकार है ॥ २ ॥ 
अनिरुक्तोऽव्यक्तत्वादिदं चेदं | जो अव्यक्तं होनेके कारण शह 
चेति निर्वक्तं न॒ शक्यत | ओर यह" इस रूपे ० नही 
कि किया जा सकता, इसलिये अनिरुक्त 
इत्यत्‌ संचरो म हे ओर संचर अर्थात्‌ विकठ्प्यमान- 
स्वरूप इत्यथः। कोऽसो १ इत्याद स्वरूप है, वह क्या है १ सो बतलाते 
त्रयोदशः स्तोभो हकारः । | दब तेवो स्तोम हए द। बह 
र र „ _ । अव्यक्त ही है, अतः अनिरुक्तविरोष- 
एवोपास्य इत्यभिप्रायः ॥ २॥ । अभिप्राय हे ॥ ३ ॥ 


ू ( 
न © न्न 





स्तोमाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाजका एल 


स्तोभाक्षरोपासनाफलमाद-- | अब स्तोभाक्षरोकी उपास्नाका 
फल बताते है-- 


` दुग्धेऽस्मे वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्न वानन्नादो 
भवतिय एतामेव<साम्नासुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद्‌॥४॥ 
जो इस प्रकार इस सामसम्बन्धिनी उपनिषदो जानता है उसे 
बाणी, जो वाणीका फल दै उस फलक देती है तथा वह अन्नवान्‌ ओर 
अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥ ४ ॥ 


द्पेऽ्मे वाण्दोदमित्याबु- | ऽस्मे बाग! इादि- 
वाक्यका अथं पटले (छा १।२ । 


७ मे) क्डा जाचुकादहै। जो 





क्रथम्‌ । य एतामेवं यथोक्त- 


१४८ छान्दोभ्योपनिष्‌ [ मध्याय ! 
लक्षणां साम्नां सामावयवस्तो- | इस उपयुक्त रक्षणविशिष्ट स्न 

3 „ , ९.. | सामावयवमूत स्तोमाक्षरसम्बन्धिी 
माक्षरविषयाुपनिपदं दशनं वेद | उपनिषदको नानता दै, उते वह 
पूर्वोक्त फक मिरता है-पेसा इका 
तात्पयं है । उपनिषदं वेद्‌ उपति 
षदं वेद्‌" यह्‌ पुनरुक्ति अध्यायी 
समाति सूचित करनेके स्थि दै। 
अथवा स्ामावयवविषयक उपासन- 


विरोषकी समाति बतानेके स्मि 
परिसमाप्त्यर्थो वेति ॥ ४॥ | हे॥४॥ 


तस्यैतद्यथोक्तं फरमित्यथः | 
द्विरभ्यासोऽध्यायपरिसिमाप्त्य्थः 


सामावयवविषयोपासनाविशेष- 


~ -+ च्च 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये 
चयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम्‌ ॥१३॥ 


~: 9 :-~ 
इति श्रीमद्‌गोविन्द्भगवत्पृज्यपादरिष्यपरमदं सपरि वाजकाचारथ- 


श्रीमच्छंकरभगवःपादरृतो ऊन्दोग्योपनिषद्धिवरणे 
प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ १ ॥ 


द्वितीय अध्याय 


पथः कर्व 


साधुदशिसे सस्त छामोपासना 


ओसिव्येतदक्षरमिस्यादिना 


सामावयवविषययुपासनमनेक- 
फलषुपदिष्टम्‌ । अनन्तरं च 
स्तोभाक्षरविषयपासनयुक्तम्‌ । 
सवेथापि सामेकदेशसम्बद्मेव 


तदिति । अथेदानीं समस्ते 
साम्नि समस्तसामविषयाण्युपा- 
सनानि वक्ष्यामीत्यारभते 


शरुतिः । युक्तं दयेकदेशोपासना- 


नन्तरमेकदेशिविपयथुपासनयु- 
च्यत इति । 








[प्रथम अध्यायमें स्थित] ओमिलये- 
तदक्षरम्‌" इत्यादि मन्त्रके द्वारा अनेक 
फर देनेवाटी सामावयवस्षम्बन्धिनी 


| उपासनाओंका उपदेश किया गया । 


उसके पश्चात्‌ सामके अवयवभूत 
स्तोभाक्षरविषयिणी उपासनाका निद 
पण हआ । वह भी सर्वथा सामके 
एकदेशसे दी सम्बन्ध रखती है । 
इसके बाद अव मे समस्त सामे 
होनेवाली अर्थात्‌ समस्त सामसे 
सम्बन्ध रखनेवाली उपासना्ओंका 
वर्णन कंगी--इस आश्चयसे श्रुति 
आरम्भ करती है । एकदेश 
[अर्थात्‌ अवयव ] सै सम्बन्ध रखने- 
वारी उपासनाके अनन्तर एकदेशी 
( अवयवी ) से सम्बद्ध उपासनाका 


} वर्णनक्तिया नाता है-यह ठीक ही दहै। 


ॐ समस्तस्य खट साम्न उपासनःसाधु यत्खट 
साधु तत्सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥१॥ 


&£ 





१५० 


छान्दोग्योषनिषद्‌ 
< #< < ऋ # +€ < < < € ऋ "ऋ ऋ € € =< € ‰ ऋ ऋ 
ॐ समस्त सामकी उपासना साघु है । नो सधु 


[ मन्याय ¦ 


होता है उप्र 


साम कहते दँ ओर जो असाधु होता दै वह अपाम कहलाता है ॥१॥ 


समस्तस्य सर्वावयवविशिष्टस्य 
पाश्चभक्तिकस्य साप्तभक्तिकस्य 
चेत्यथंः। खल्विति बाक्याल- 
काराथंः साम्न उपासनं साधु । 
समस्ते साम्नि सापुदृष्टिविधि- 


पत्वा पूरवोपासननिन्दार्थत्व 
साधुशब्दस्य । 
नजु पूवत्राविद्यमानं साधुत्वं 


समस्ते साम्न्यभिधीयते, न; 
साधु सामेत्युपास्त इत्युपसंहा- 
रात्‌ । साधुशब्दः शोभनवाची 
कथमवगम्यते १ इत्याह-यत्वलु 
लोके साधु शोमनमनवद प्रसिद्धं 
तत्सामेत्याचक्षते इलाः । 


-यदसाघु विपरीतं तदसा- 
मेति ॥ १॥ 


समस्त अर्थात्‌ सम्पूणं अवते 
युक्त यानी पाञ्चभक्तिक ओर साप. 
भक्तिक सामकी उपासना साधु है। 
खट" यह निपात वाक्की शोभ | 
बद्ानेके ल्यि है । समस्त सामं । 
साधुदृष्टिका विधान करने प्रह 
होनेके कारण साधु शब्द पूवं उपः 
सनाकी निन्दाके स्वि नहीं दै । 

यदि कदो कि पूवं उपासना † 
रहनेवाखी ही साधुता समस्त साम 
बतलायी जाती हे, तो एता कहना 
ठीक नदी; क्योकि [पूर्वोक्त उपासना 


। का] साम साधु है इस प्रकार उपः 


सना क्रे" एेसा कहकर उपसंहार । 
क्रया हे । साघु" शब्द शोभन भथा 
बोधक है-यह कैसे जाना जता 
दै १ इसपर कहते दै--रोकषमै जी 
वप्तु साघु-सोभन भर्थात्‌ निर्दोषः | 
रूपसे परसिद्ध हे उसको निपुण 
सामः एेसा कहकर पुकारते है । , 
तथा जो असाधु यानी विपरीत शेती । 
द, उसको जसाम कहते है ॥१॥ 


की तक 


ण्ड १] शाङ्करभाष्याथं १५१ 
>>> ~~ >< < << 


तदुताप्याहुः साम्नैनसुंपागादिति सधुनेनमु- 
पागादित्येव तदाहूरसाम्नेनसुपागादित्यसाधुनेन- 
मुपागादित्येव तदाहुः ॥ २.॥ ` 
इसी विषयमे कहते है [ जन्‌ कहा जाय कि अयुक पुश्ष | 
इस [ राजा आदि ] के पस सामद्रारा' गया तो [ एेसा कहकर | रोग 
यही कहते हैँ कि वह इसके पास साधुभावसे गया ओर [ जब यो कहा 
जाय कि ] वह इसके पास असामद्रारा गया तो [ इससे ] रोग वही 
कहते है कि वह इसके यहाँ असाधुभावसे प्राप्त हुमा ॥ २ ॥ 
तत्तत्रैव साध्वसाधुविवेक- । वहां-उस साधु-असाधुका विवेक 


करण उताप्याहुः । साम्नेनं करने्मे ही कहते दै कि [ जब यह 
कहा जाता है कि] इस राजा 


ध ) सल्ल 
राजानं सामन्तं चोपागादुपगत अथवा सामन्तके पास ॒सामछ्पसे 
वाच्‌ । कोऽसौ १ यतोऽसाधुत्व- | गया-कौन गया १ जिससे कि 


्राप्त्याशङ्खा स इत्यभिप्रायः । | असाधुत्वकी प्रा्तिकी आशङ्का थ 
8 धुत वह--एेसा इसका तार्यं है-- तो 
शोभनामिप्रायेण साधुनेनधुपा- | उसके बन्धन आदि जसाधु कायेकि 
गादित्येव तततत्राहलो किकः! | न देखनेवाठे रौकिकं पुरुष यही 
बन्धनाद्यसाधुकायंमपरयन्तः । | कहते द. 

विपर्ययो 5 | सामन्त ] के पास शोभन अभिपा- 
व बन्धनाधसायु- | यते साघुमावसे गया । ओर जहाँ 
कार्यं परयन्ति तत्रासाम्नैनमु- | इसके विपरीत बन्धन आदि अस 
~ दितयेव कायं देखते है वर्होवेर्सादी 
पागादित्यसाधुनैनषुपागादित्यव | कहते है कि वह इसके पास 
तदाहुः ॥ २॥ असाम-असाधुरूपसे गया ॥२॥ 








षद्‌ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ बष्याय २ 


अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति । 
साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधुभवः 
त्यसाधु बतेस्येव तदाहुः ॥ ३ ॥ 
इसके अनन्तर एेसा भी कहते दै 9 हमारा साम यभ हुभ)। 
अर्थात्‌ जव शुभ होता है तो अहा ! ब अच्छा हुआ, रेसा कहते ह 
ओर देसा भी कहते है-हमारा असाम हु" अर्थात्‌ जव अह 
होता है तो ओह | बुरा हुआ ! एेसा कहते है ॥ ३ ॥ 
अथोताप्याहुः स्वसंवेद्यं साम , इसके अनन्तर ठेस भी कहते £ 
कि अहा | बह स्वयं ही अनुष 
। करने योग्य साम हमें प्राप्त हो ग | 
९३३ ~ ¡हे ।' बतः इस निपातका आश्य 
सबत्ामत्याहुः । एतत्तरुक्त | यह हे कि पे अनुकम्पा कते हए 


र कहते है । अर्थात्‌ उनके द्वारां यह 

भवति पत्‌ साधु भवति साघु | प्रतिपादित होता है कि जो साधुहोत 
| विपर्यय है वही अहा | यहसरधु हःप | 

तेत्यव तदाहुः । विपर्यय कहा जाता है तथा विपरीत १ 

“ओह | हमारे स्यि यह असाम्‌ ६ 

जाते स 

५.९ वसाधु | दूता कहते है । जो असाधु हीत 

भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः । | दै वही बह ! यह असाधु (र) । 


, | हे एसा कहा नाता है । इषे , 
1 साम ओर साधु रब्दोकी एकथेत । 


द्धम्‌ ॥ ३ ॥ सिद्ध होती है ॥ २३ ॥ 


> 
~-: ० ~ 


ल च पतदेव विदवान्साधु साेतयुपारतेऽभ्याशो ह | 
यदेनरसाधवो धम आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥४॥ । 


नोऽस्माकं बतेत्यलुकम्पयन्त्‌; 





खण्ड १] 


शाङ्करमाभ्याथं 


१५३ 


9-9-9८ < ८ < < < >< < < <<< < <-> 


अतः स यः कषित्साधु 
सामेति साधुगुणवत्सामेत्यु- 
पास्ते समस्तं साम साधुगुण- 
वद्वा स्तस्येतत्फलम्‌ अभ्याशो 
हक्षिप्रं ह, यदिति ह 
रेषणार्थम्‌, एनधुपासकं साधवः 
शोभना धर्माः शरुतिस्पृत्यविरुद्रा 
आ च गच्छ्युरागच्छ्युथ । न 
केवलमागच्छेयुरुप च नमेयुरुप- 
नमेयुशच भोग्यत्वेन पतिष्ेयुरि- 
त्यथः ॥ ४॥ 


अतः वह जो कोई पुरुष साम 
साधु हे यानी साम साधुगुणविशिष्ट 
हे-एेसी उपा्ना करता है अर्थात्‌ 
समस्त सामो साधु गुणवाद 
जानता है उसे यह फल मिलता 
है, इस उपासकको नो श्रुति 
सफृतिसे अविश्ड युम धमंहै, वै 
अभ्यास. अथि शीर ही प्रप्ते 
नते है । ययँ नो थत्‌ पद है 
वह क्रिया विशोषणके लिय हे । केवल 
भप्त ही नदीं होते उसके प्रति 


विनप्रमी हो नते दै, अर्थ्‌ 
भोग्यरूपसे उपस्थित हो नाते है ।४॥ 


~ ०० ‡- 


शतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये 
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पृणैम्‌ ॥ १ ॥ 








ता > > सरट्‌ 
(दत्धयः क्ट 
(3 $ 
लोकविषयक पाच प्रकारकी सामोपाततना 
कानि पुनस्तानि साधुदृष्टि- | रफिरवे साधृदृ्िविशिष्ट उपासन 
, विशिष्टानि समस्तानि सामा- | श्रने योग्य समत सामकोन-पे है 
न्युपास्यानि ? इति, इमानि | एेसी आशङ्का होनेपर कहते ३.३ 
तान्युच्यन्ते ोकेषु पश्चविध- | 'रोकेषु पञ्चविधम्‌! इत्यादि मन 
मित्यादीनि । द्वारा इस प्रकार बतलये जति है- 
लोकेषु पञ्चविधश्सामोपासीत प्रथिवी हिकारः। ¦ 
अभ्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो 
योनिधनमिः्यर््वेषु ॥ ९ ॥ 
ऊपरके कोकेमिं निम्नाङ्कितरूपसे पंच प्रकारके सामकी उपासना 


करनी चाहिये । परथिवी हिकार दहे, अमि प्रस्ताव दै, अन्तरिक्ष उदूगीथ 
ह, आदिय प्रतिशर है ओर चुरोक निषन दै ॥ १ ॥ 


ननु रोकादिदृष्टथा तान्युपा- | शंका कितु उन समस्त समो 
खाभ्नि दिवा द्टौ स्यानि साधु- | रोकादिद्टिसे तथा साधृदृ्टिसे भी 
विरोधोद्धावनम्‌ दृष्टया चेति | उपासना करनी चाहिये--रेषा 
विरुद्धम्‌ । , ल कहना तो परस्पर विरुद्ध दै ! 
न्‌, साभ्वथस्य समाधान-ेसी बात नहीं है, , 
कारणस्यानुगतत्वा- | क्योकि भिस प्रकार मृत्तिका आदि 
विरोधपरिदारः अपने विकार षरादिरम अनुगत होते । 
~ त्‌, शखदादिवदू्टादिवि- | दै उसी भकार [ सवक्ना ] कारण 
करेषु । साधुश्दवाच्योऽ्ोः | यल साधु पदां लोकादि करय | 
धमो दय वा सर्वथापि अनुगते । साधुशब्दका वाच्यार्थ षम्‌ | 


सोकादिकयेषबसगतम्‌ अथवा जहम सभी प्रकारसे कोकादि | 
रोकादिका्यष्बलुगतम्‌ । अतो | कार्वरगमं व्या ह 


ण्ड २ | श्ाङ्करमाष्याथं १५५ 
यथा यत्र॒ घटादिदृष्टिख्रदादिदु- , प्रकार जहो षाद होती दै वहो 
ष््तुगतेव सा, तथा च भ दी क 
लोकादिरदा [कः भ 
बुगतेव ध, धमा || 1 


49 ~ | साधुृष्टिसे अनुगत ही होती है; 
दिकायतवा्ोकादीनाग्‌ यदप | क ओ लकि भर्मादिक्र करं 
कारणत्वमविरिष्टं॒ब्रह्मधमयोः, 


ही होते है । ययपि बहम ओर धर्म 
तथापि धमं एव साधुशब्दवाच्य 


1 | का प्रपच्चकारणत्व तो समान है तो 
इति युक्तम्‌, साधुकारी साधुरभव- | भी “साघु शन्दका वाच्य धर्म ही 
तीति धर्मविषये साघु शब्द- | है- रसा मानना ठीक है; क्योकि 
प्रयोगात्‌ । | (साधु करनेवाख साधु होता है इस 
पकार-~धमंके विषयमे ही घु" 
शब्दका भ्रयोग किया गया है | 
शंका-रोकादि का्यमिं उनका 
कारण अनुगत होनेके कारण उसमें 
साघुदृषटि होना तो स्वतः सिद्ध है । 
एसी अवस्थामें क्षाम साधु है इस 
प्रकार उपासना करता है" यह नहीं 
कहना चाहिये था । 
समाधान--नही, क्योकि वह दृष्टि 
शालसे दी प्रप्तहो सकती है । समी 
भ धर्म ही उपासनीय 
ति अप्यश्ञा- | होते है, अशास्त्रीय धमं विधमान 
उवा रहनेपर भी उपासनीय नहीं होते । 
ख्ीयाः | परथिवी आदि ठोकिं पश्चविष- 
लोकेषु प्रथिव्यादिषु पश्च- | पंच भरकारकी भक्तिके मेदसे पाँच 


क श्वप्रकारं | प्रकारके साधुगुणविशिष्ट समस्त 
ध पव | | सामक उपासना कटनी चाहिये । 










ननु लोकादिकार्येषु कारण- 
ठोकादिषुद्श्य स्यायुगतत्वादथंप्रा 
लशासनवैय््या- प्तेव्‌ तद्दुष्टिरिति 
गा साधु सामेत्युपास्ते" 


इति न वक्तव्यम्‌ । 
न, शास्रगम्यत्वात्तद्‌ दृष्टेः । 
तभिरलनम्‌ सर्वत्र हि शाखप्रा- 
पिति एव॒ धर्मां 


सो किस प्रकार £ [यह बतखते है] 
कथम्‌ १ पृथिवी हिकारः । पृथिवी हकार हे | 'रोकेषुः इस पदमे 
रोकेष्विति या समी तां प्रथ- । जो सपमी विभक्ति है उते प्रयमा 





१५६ 


नन्दोम्योपनिषव्‌ 


[ अभ्याय \ 


`>: ~ ह: ८ ~: -8८ < ट ¬ ~ ऋ -3८ -8८ ¬ 8८ 


मात्वेन विपरिणमय्य पृथिवीदू- 
ष्य्या दकारे पृथिवी हिंकार 
इत्युपासीत । व्यत्यस्य वा सप्त- 
मीशरुतिं छोकविषयां हकारादिषु 
ए़थिव्यादिदष्टि कृत्वोपासीत । 

तत्र पृथिवी हिंकारः, प्राथम्य- 
सामान्यात्‌ । अप्निः प्रस्तावः, 
अग्रो हि कर्माणि प्रस्तूयन्ते; 
प्रस्तावश्च भक्तिः । अन्तरिक्षु- 
दरौथः, अन्तरिक्षं हि गगनम्‌, 
गकारविरिष्टथो द्रीथः । आदित्यः 
प्रतिहारः, प्रतिप्राण्यभिभुख- 
त्वान्मां प्रति मां प्रतीति । द्यौ- 
निधनम्‌, दिवि निधीयन्ते दीतो 


2 
त , & भ्रथमान्तलूपसे परिणत 
पञ्चविधं समेल्युपादीत । भा 


> < 9 9 9-99-9 
विभक्तिके रूपसे भ परिणत 
हिकाररमे प्रथिवी-दष्ट्वारा रथ 
थिव ्हिकार है" इस प्रकार उ 
सना करे । अथवा 'लोकेषु' इस पद. 
कौ सपतमी-श्रुतिको हिंकारादिमे कवे | 
ओर वहाँकी कर्मविभक्ति रोक शब्द 
मृ फर हिकारादिमे पृथिवी शि 
दृष्टि करके उपासना करे ।{ 

उनम प्रथिवी दिकार हे, क्य 
उन दोर्नोमिं श्रथमताः यह्‌ समान गुण 
हे । अभि प्रस्ताव दै, क्योकि अग्न 
ही कर्मोका प्रस्ताव किया जाता हैओौए 
प्रस्ताव भी एक प्रकारकी सामभक्ति 
हे। अन्तरिक्ष उद्गीथ हे । अन्ति 
गगन ( आकाश ) को कहते है ओर 
उद्गीथ भी गकारविरिष्ट है [इषः 
स्यि उन दोरनोमे सादश्य है) । आदि 
रत्र दै,क्योकि वह परतेक पराणी 
अभिमुख है । सब लोग यह अनुभव 
करते है कि वह “मा भरति, मां भिम 
सम्मुख है, मेरे सम्मुख हे ॥ तथा चौ 
४. 





केरनेपर वाक्यका स्वल्प यों होगा--'टोक | 


त्‌ यह्‌ कि ह यिर्व आ > 1 [रके साम 
इख पकार उपासना करे । इसी छिथ अ री आदि कोक पाच प्रक 


शब्दाम खतमी विभक्तिका प्रयोग 
अर्थात्‌ 


आगे 'धरयिवी हिङ्कारः" इत्यादिमे पयिवी 
न करर परथमाका ही प्रयोग हुं दै । 


इस पदम जा तत पप सामोपासीत इस वाक्यकरे अन्तर्गत ष्टोक्रेषु' | 
= य फे ह उसे पञ्च वि ~ | 
हकार आदये छे जाय ९ स पञ्चविध साम एवं उसके द्वारा प्रतिपाद्य । 


लखोकपदमं ल ज य 


ज्चविधं सामः 


मे जो द्वितीया विभक्तिदैउते | 


दस रता । 
खाकम्‌ ( लोकिः स्थाम वाक्यका स्वरूप एेसा होगा--पञ्चविधं सान्न 


2 ईत्ना ) उपासीतः 


लिखत द .हिकारादिषु ए्थिग्यादि 


। इसीका फलितां बतढाते इए भाष्यकार 1 
दष्टं इृत्वोपासीतः । र 1 


क्ष्ड २ ] ज्ाङरभाष्याथे १५७ 
>< 9 9 > 5-28८-5८ 3 < 3 ~ 5 9 28 -5 >8८ >8८ >< <: > > 


गता इतयूर्षुष्वंगतेु लोक- ¦ जनेवारे लोग दुरोके रक्ते जते 
है । इत पर कार उत्तरोत्तर ऊर्ध्वगत- 
उपरके लोकम ोकटष्टिसे की जने- 


दृश्या सामोपासनम्‌ ॥ १ ॥ 
| वाली उपासना वतलयी गयी ॥१॥ 





आगृत्तिकाटिक अधोमुख लोके पचकिषि सामोपासना 


अथाटृ्तेषु थौर्हिकार आदित्यः पस्तवोऽन्तरिक्च- 


मु द्रीथोऽभिः छतिहारः एथिवी निधन ॥ २ ॥ 
अव अधोयुख कमं सामोपासनाका निहूपण क्रिया नाता है- 


यलोक हकार है, आदित्य प्रस्ताव 


है, अन्तरिक्ष उद्गीथ दै, अग्नि 


भतिहार है नौर थिवी निधन है ॥ २ ॥ 


अथाटृत्तेष्ववाद्धुखेषु पश्व- | 
विधषुच्यते सामोपासनम्‌ । | 
गत्यागतिविरिशा हि रोकः । 
यथात, तश्रादृष्ट्ेव सामोपासनं 


विधीयते यतः, अत आदृत्तेषु 
लोकेषु चोर्हिकारः प्राथम्यात्‌ । 
आदित्यःश्रस्तावः, उदिते द्यादिव्ये 
प्रस्तूयन्ते कर्माणि प्राणिनाम्‌ । 
अन्तरिकमु्धीथः पूववत्‌ । अभिः 
प्रतिहारः, प्राणिभिः प्रतिहरणा- 


अब आदत्त अर्थात्‌ पुनरान्त्तिके 
समय अधोमुख खोकोमे पांच प्रक्ारकी 
सामोपासनाक्ा निद्पण करिया जाता 
हे, क्यो ये खोक गमन ओर आग- 
मन [ दोनो परकारकी वृतया ] से 
युक्त है । गमन जौर आगमन-कार् 
जिस प्रकार वे स्थित हैँ उसी दष्टिसे 
उनमें सामोपासनाका विधान ङ्किया 
जाता है, इसस्थि आगमनकार्भें 
उन अधोमुख रोके प्रथम होनेकरे 
कारण दुरोक कार दै, आदिल 
भरस्ताव दै, क्योंकि सूयक उदित होने. 
पर दी भाणियकि कमं प्रसत होते है; 
तथा पहल्ीके समान अन्तरिक्ष उद्‌- 
गीय दै; अगि प्रतिहार है, क्योकि 
पराणि्योद्ारा उघका प्रतिहरण ८ एकं 





थिवी 9 ~ = > ऋ 
दग्नेः । पृथिवी निधनम्‌, तत | स्थानसे दूसरे स्थानपर छ जाना ) 


होता दै ओर परथिवी निषन है 
क्योकि वंस आये हुए प्राये 
इसीमे रक्खा जाता हे ॥ २॥ 


~+ 


आगतानामिह निधनात्‌ ॥२॥ | 


उपासनफट्म्‌-- उपासनाका फर-- 


कल्पन्ते हास्मे रोका उर्ध्वाश्चादृत्ताश्च य एतदेवं 
विदरोषोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥ 


जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष रोको पञ्चविध सामी 


उपासना करता है उसके प्रति उर्व ओर अधोभुल रोक भोग्यल्पते । 
उपस्थित होते है ॥ ३ ॥ 


कल्पन्ते समथा भवन्ति हास्म, कल्प-समर्थ होते है (भोगप 

होते है ति 

लोका उर्घ्वाधाडत्ताश्च गत्या- | से ्ा्त होते दै ) अर्थात्‌ उपके पर 

क १ = गमनागमन कार्की स्थितिसे युक्त 

गतिविशिष्टा भोग्यत्वेन व्य | ऊर्वं एवं मधोयुख लोक क 

तिष्ठन्त 6, एतदेव उपस्थित होते हैँ । [किसके प्रति !। . 

रिठन्त इत्यथः । य एतदेव जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पु 

विद्वान्लोकेषु पञ्चविधं समस्तं | 'ोकोमे पाँच पकारका समस्त स्‌# 

~ ~ 5 | साधु गुणविशिष्टं देः इस प्रक | 

साधु सामेत्युपास्ते; इति सवते | उपासना करता है । इसी प्रक । 

योजना पञ्चविधे स्षविधे पञचविष ओर सपति ४, | 

उपासनामें भी सर्वत्र इस व 

= ॥ <. ॥ योजना करनी चाहिये ॥ ३ ॥ 
इतिच्छान्दोग्थोपनिषदि द्वितीयाध्याये 
द्वेतीयखण्डमाध्यः सम्प॒णामू ॥ २॥ 


म 
==; ० $ 


न =-= 


2 
वृ्िनिषयक पोत श्रकारकी सामोणतना 


दृष्टौ पथचविधःसामोपासीतपुरोवातो हिंकारो 
मेधो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्रीथो विदयोतते 


स्तनयति स प्रतिहारः ॥ १ ॥ 
बृष्टिमे पांच भ्रकारके सामकी उपासना करे । प्वीय वायु हकार 
है मेष जो उन्न होता है- वह प्रस्ताव है, जो बरसता है वह 
उद्गीथ है, जो चमकता ओर गजना करता है वह भरतिहार है॥ १॥ 
वृष्टो पञ्चविधं सामोपासीत; | वष्टिम पच भकारके सामकी 
लोकस्यतेिनिभितलादानन उपासना करे । रोकरकी स्थिति 
| वृष्टे कारण होनेसे इसङ्ा जोक 
(१ सम्बन्धिनी उपासनाके अनन्तर निरू- 
व्रः, | हकार है । पूर्वीय वाुसे 

वाताचयुदुग्रहणान्ता हि वष्टि; 6 टि ददी नाती 
यथा साम हिंकारादिनिधनान्तम्‌, है, नित प्रक्‌ कि हिकारसे ठेकर 
निषनपयन्त साम कहा जाता है । 

अवरः पुरोबाढो हकारः प्राथ- | अतः भथम होनेके कारण , पूर्वीय 
| वायुिकार हे । मेषो उलन होता 
मयात्‌ मेषो जायते सप्स्तावः, है वह प्रस्ताव है, वरषा तुमे मेषके 
्ाहृषि मेषजनने वष्टः प्रस्ताव | उततर होनेपर ही बृष्टि स्तुत शती 
है-यह भसिद्ध दै । मेष जो बरसता 

इति दि परतद्धः । वपति स हे वही भषठताके कारण उद्गीथ है; 


उदरीयः शष्थात्‌ । विद्योतते | उथा जो सिवडी चमकती जर 





१६० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्याय २ 
स्तनयति स प्रतिहारः, प्रति- | कड़कती दै-वही प्रतिहत ह 

( इधर-उधर पैसन ) क काण 
हतत्वात्‌ ॥ १॥ प्रतिहार है ॥ १॥ 


---*---- 


उदृहाति तन्निधनं वष॑ति हास्से वर्षयति ह य 
एतदेवं विद्ठान्ड्टो प्चविधश्सामोपास्ते॥ २ ॥ 
मेधजो जल 3 हण करता है-यह निधन है । जो इते इस प्रका 
जाननेगटा पुरुप वृष्टिमे पंच प्रकारके सामकी उपासना करता दै उक्षे 
लियि वर्षा होती है ओर वह [ स्वयं भी] वर्षा करा लेता है॥ २॥ 


उद्गृह्णाति तन्निधनम्‌, | [ बादर ] जो जल अरहण कृ 
हे यह निधन हे, क्योकि समाक 
समा्षिसामान्यात्‌ | फल्षुपा- | इन दोनोंकी समानता दै [ मर 
जलग्रहण जीर निधन दोनों अरि 
ति ं उपासना 
सनस्य वर्षति हास्म इच्छातः । | कायं दै ] । अन इस 
। फार वताते दै- उसके इच्छ 
कः र सार मेधवर्षा करता है, तथा दृ 
तथा वपयति दासत्यामपि वृष्टौ | न होनेपर भी वह वर्षा करा लत 
हे । "य एतदेवम्‌ः इत्यादि शेषवरक । 
प एतादत्याद्‌ पूववत्‌ ॥॥२।। । का अर्थ पूववत्‌ समञ्नना चाहिये ॥॥ 


--: ० ~ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि दितीयाघ्याये 
वतीयखण्डमाप्यं सम्पूणंम्‌ ॥ ३ ॥ 


+~ 4४ 





चकर्थ = 


जटविषयक पोच प्रकारक्ती सामोपास्तना 

सर्वास्वप्सु पञ्चविधसामोपासीत मेघो यत्संप्छवते 
स हिकारो यद्रषति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स 
उद्रीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम्‌॥१॥ 
सव प्रकारके जलम पोच प्रकारके सामको उपासना करे । मेष जो 
घनीभावको प्रप्त होता है- वह ्हिकार है, वह जो बरसता है-वह 
्र्ताव्‌ दै, [ नदिया ] जो पूव॑की ओर बहती है, वह उद्गीथ है तथा जो 

पश्चिमकी ओर बहती है वह प्रतिहार है ओर समुद्र निधन है ॥१॥ 
सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामो- । सव प्रकारके जलम पांच परकार- 
के सामक उपासना करे । सम्पूर्ण 
जक वृष्टिपूवक ही होते है हइस- 
लिये वृष्टिविषयक उपासनाके बाद 
~र ; _ | जरविषयक उपासनाका निरूपण 
मपामानन्तयम्‌ । मेषो यत्संश्ञ- | या गया त) (त 
करता है अर्थात्‌ परस्पर एक होकर 
वत एकीभावेनेतरेतरं घनीभवति | धनीमूत होता है [ संछवतेः का 
“घनीभूत होता है" अथं इसख्यि 
मेघो यदा उ्नतस्तदा संश्चवत | किया गया है कि ] जब मेष ऊँचा 
होता है उस समय वह संछवन 
| करता है- एेसा कदा जाता है । 
इत्युच्यते । तदापामारम्भः | उस घनीभूत होनेके ही समय 
जर्लोका प्रारम्भ होता दहै; अतः 
स दिंकारः। यद्वषति स प्रस्तावः,। संन ही हिंकार दै । वह जो 


पासीत । वरृष्टिपू्ंकत्वातसर्वासा- 





>>> >< >< >< न 
आपः सर्वतो व्याप्त प्रस्तुताः । | वरसता है उसी रत श 


जाता डे, कोक उसी सम क 
प्राच्यः स्यन्दन्ते ;, | का सर्व॑ मतार्‌ आसम हता | हि 

याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्रीथः, नो नल (गदि न र । 

~ , स | पू्वकी ओर बहते है ३ उ 

0 1 तच्य स होनेके कारण उद्गीथ घौर बर 

क परतीची (पश्चिम) की भर बहते १ 

प्रतिहारः प्रतिरब्दसामान्यात्‌ । शति शन्दमे समान होनेके का 

धनन तरि - | प्रतिहार कहे जाते है तथा प्फ 

सञद्रो निधनम्‌, तन्निधनलतवा निषन ह वयोम उच 
दपाम्‌ ॥ १ ॥ संचय होता हे ॥ १॥ 


न हाप्सु परत्यप्सुमान्भवति य एतदेवं विद्रान्सवी 
स्वप्सु पथविधश्सामोपास्ते ॥ २ ॥ 


जो इसे इस भकार जाननेवाख परुष सव भकारके जलो पम 


सामक उपासना करता ह वह जलम नहं मरता ओर जरते सर्फ 
होता है ॥ २॥ 


न दपु प्रति, नेच्छति | यदि वह इच्छा न रेतो नसं 

| रुक पराप्त नही होता तथा 1 | 

। अग्सुमानम्मान्मवति | ग्धमान्‌ भरथात्‌ [ इच्छा | 

ष | ध जरसे सम्पन्न होता है--यह 8 
फलम्‌ ॥ २ ॥ उपासना) का एङ है ॥ २॥ 


चक 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि 
चतुथेखण्डभाष्यं सम्पू्णम्‌ 


५ 
न 9 २-> 


दितीयाध्याथे 


॥ ७ ॥ 


पञ्चकम खर्ट 





ऋतुनिषयक पाचि प्रकारकी सामोपतसना । 
ऋतुषु पथविधश्सामोपासीत वसन्तो हिंकारो 
भीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्वीथः शरस्तिहारो हेमन्तो 


निधनप्र ॥ १ ॥ 


छतुओमें पाँच प्रकारके सामकौ उपा्नना करे । वसन्त हिकार है 
्रीष्म प्रस्तावे दै, वर्षा उदगीथ है, शरत्‌ परतिहार है ओर हेमन्त ` 


निधन है ॥ १ ॥ 


ऋतुषु पञ्चविधं सामोपासीत । 


ऋतुव्यवस्थाया यथोक्ताम्बुनि- 
वसन्तो 


दकारः, प्राथम्यात्‌ । ग्रीष्मः 
प्रस्तावः, यवादिसंग्रहः प्रस्तूयते 


मित्तत्वादानन्तर्यम्‌ । 


दि प्रावृडर्थम्‌ । वर्षा उद्वीथः, 
प्राधान्यात्‌ । शरत्प्रतिहारः, 
रोगिणां खतानां च प्रतिहरणात्‌ 
हेमन्तो निधनम्‌, निवाते निध 


नास्राणिनाम्‌ ॥ १॥ 


चऋछतुओरम पांच प्रकारके; सामकी 
उपासना करे । ऋतुर्ोकी व्यवस्था 
पूर्वोक्त जररूप निमित्तसे ही होती 
हे, इस कारण यह छतुविषयक 
सामोपासना उसके बाद कटी गयीं 


हे [ उनमें ] सबसे पहल. होनेके | 


कारण वसन्त दकारं हे ।.-शरीष्म 
प्रस्ताव हे, क्योकि [ इसी समय ] 
वर्षाछतुके स्यि जौ आदि .अन्नेकि 
संग्रहका प्रस्ताव किया जाता हे। 
प्धानताके कारण वर्षा उद्गीथ हे । 
रोगी ओर मत प्राणिर्योका प्रतिहरण 
करनेके कारण शरदतु प्रतिहार (एक- 
जगहसे दूसरे स्थानप्र ले जाना ) 
हे तथा वायुके अभावमें प्राणियोंका 


निधन होनेके कारण दहेमन्तऋत 
निधन है ॥ १॥ 





छा उ० &-- 





१६४ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्याय २ 


<-> < > -- >< > नज ऋ 


फर्म्‌-- | . इस उपासनाका फल- 

कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान्भवति य एतदेवं 
विद्वानृतुषु पञ्चविधशसामोपास्ते ॥ २ ॥ 

जो इसे इष प्रकार जाननेवास पुरुष ऋतुओंमे पाँच प्रकारके 
सामकी उपा्टना करता दै उसे तुए अपने अनुरूप भोग देती है ओर 
वह ऋतुमान्‌ ( ऋतुसम्बन्धी भोगोसे सम्पन्न ) होता है ॥ २ ॥ 

कल्पन्ते ह॒ ऋतुग्यवस्था- इस उपासनाके लिये ऋतु अपने 

कालको व्यवस्थाके अनुरूप फक 
भोग्-रूपसे उपस्थित करनेमे समर्थं 


संपन्नो भवतीत्यर्थः ॥। २ ॥ | सम्पन्न होता हे ॥ २ ॥ 


न चण -- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये 
पञ्चमखण्डमाष्यं सम्पूणं म्‌ ॥ ५ ॥ 


नुरूपं भोग्यत्वेनास्मा उपा- 








प्र 


9 


[ 


पु विषयक पच प्रकारकी सामोपसना 
पशुषु पञ्चविधश्सामोपासीताजा हिंकारोऽवयः 
प्रस्तावो गाव उद्धीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनम्‌॥ १॥ 


पड्म पोच प्रकारके सामकी उपासना करे । बकरे हकार है, 
में प्रस्ताव दै, गीं उदुगीथ दै, अध प्रतिहार है ओर्‌ पुरुष निषन हे ॥१॥ 


पशुषु पश्चविधं सामोपासीत । 
सम्यगबत्तेष्वूत॒षु पशव्यः काल 
इत्यानन्तयम्‌ । अजा हिंकारः, 
्राधान्याखाथम्याद्, “अजः 
पशुनां प्रथमः'' इति भुतः । 
अवयः प्रस्तावः, साहचर्यद्ो- 
नादजावीनाम्‌, गाव उद्रीथः, 
ष्यात्‌ । अश्वाः प्रतिहारः, 
प्तिहरणात्पुरुषाणाम्‌ । पुरुषो 
निधनम्‌, पूरूषाश्रयत्वात्यश- 
नाम्‌ ॥ १॥ 


9 


पञ्ुओंमिं पांच प्रकारके सामकी 
उपासना करे। चछतुओंके ठीक-टीक 
वरतनेसे पञ्ओंके स्यि अनुकर समय 
रहता है इसस्यि यह उपासना उसके 
पीठे कही गयी है । समे प्रधान 
होनेके कारण मथवा “पञ्चमे सव- 
प्रथम बकरा है” इस श्रुतिके अनुसार 
सवसे पहले होनेके कारण बकरे 
हकार दै। बकरे ओर मेडका 
साहचयं देखा जानेसे मेदं प्रस्ताव 
है । सर्वश्रेष्ठ होनेके कारण गँ 
उद्गीथ है । पोका, प्रतिहरण 
( ब्रह्न ) करनेके कारणं श्रौडे प्रति- 
हार दहै तथा पट्युवगं पुरषके आश्रित 
है, अतः पुरुष निषन है ॥ १ ॥ 





१६६ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय २ 


< >< ऋ >< € >< ऋ >< ऋ ऋ # ऋ< =< >< ऋ < 8 < 9 >< ऋ < -ड<= 
फटलम्‌-- | इस उपासतनाका फर -- 


भवन्ति हास्य पशवः पशुमान्भवति थ एतदेवं 
विद्वान्पशुषु पञ्चविधश्सामोपास्ते ॥ २ ॥ 

जो इस प्रकार जाननेवासा पुरुष पञ्युओंमे पञ्चविध सामकी उपासना 

करता दै उसे पञ्च प्राप्त होते है जर वह पडुधनसे सम्पन्न होता है ॥२॥ 


भवन्ति हास्य पशवः, | उसे प्श प्राप होते है ओर उह 


~ => होता है अर्थात्‌ वह 
पशुमान्भवति परुफलेश्च भोग- | पमान्‌ द 
॥ # पञ्ु्ओंसि प्राप्त होनेवाठे फल-भोग 
त्यागाद्मियुज्यत इत्यथंः॥२। | एवं दानादिपे युक्त होता है ॥ २॥ 


पि 9 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि द्वितीयाध्याये 
षष्ठलण्डमाष्यं सस्पूर्णेम्‌ ॥ ६॥ 


^ 


खकमः रणड 


५, 
त्-- 


ग्राणविषयक पोच प्रकारक सामोषसना 
घराणेषु पशविधं परोवरीयः सामोपासीत श्राणो 
हिंकारो वाक्पस्तावशवश्ुरुद्रीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो 
निधनं परोवरीयाशसि वा एतानि ॥ १ ॥ 


प्ा्णोमिं पच प्रकारके परोवरीय ( उत्तरोत्तर उककृष्ट ) गुणविरिष्ट 
सामकी उपासना करे । [ उनम ] प्राण हिंकार हे, वाक्‌ प्रस्ताव है, 
चक्षु उद्गीथ हे, श्रोत्र प्रतिहार है ओर मन निधन हे । ये उपासना 
निश्चय ही परोवरीय ८ उत्तरोत्तर श्रेष्ठ ) है ॥ १ ॥ 


प्राणिषु पञ्चविधं परोवरीयः 
सामोपासीत । परं परं वरीय- 
स्त्वगुणवत्प्राणदष्िविरिष्टं॒सा- 
मोपासीतेत्यथंः। प्राणो प्राणं 
हिंकारः, उत्तरोत्तरवरीयसां प्राथ- 
म्यात्‌ । वाक्प्रस्ताव, वाचा 
हि प्रस्तूयते सर्वम्‌, बागरीयसी 
प्राणात्‌, अप्रा्मप्युच्यते वाचा, 
्रास्यैव तु गन्धस्य ग्राहकः 
प्राणः । 


प्राणमं पोच प्रकारके परोवरीय 
सामकी उपासना करे अर्थात्‌ उत्तरो- 
त्र श्र्ठत्वगुणवान्‌ प्राणद्ियुक्त साम- 
की उपासना करे । उन उत्तरोत्तर शरेष्ठ 
प्रणो प्रथम होनेके कारण प्राण-- 
घराणिन्दिय र्हिकार है । वाणी प्रस्ताव 
ह, वरयोकि वाणीसे ही सबका प्रस्तावं 
किया जाता हे। वाणी प्राणकी 
अपिक्षा उद्कृष्ट हे, [ क्योकि ] वाणीसे 
अप्राप्त वस्तुका भी निरूपण क्रिया 


जाता हे ओर प्राण केवल भ्रात इए 
गन्धक्ा ही अह्ण करनेवाला है । 





१६८ छान्दोन्योपनिषद्‌ [ अन्याय २ 


>४--४---8- >> ¬ ¬< ¬< >< 6 ऋ इ >~ 
चततुरुद्रीथः, वाचो बहुतर- | चश्च उद्गीथ है; चश्च वाणीस भी 
बिषयं प्रका्यति चश्ुरतो अधिकं विषयको प्रकाशित करता 
वरीयो वाचः, उदरीः श्ष्ठयात्‌ । | उक्ष होनेके कारण ही उद्गीथ 
श्रोत्रं प्रतिहारः, प्रतिहतत्वाव्‌, | दे । परिहार है, क्योकि वह 
6, प्रतिहृत है तथा स्रव रसे श्रवण 

६ ¦ श्रवणात्‌ । 
५ ९.४५ त ५४ करनेके कारण वह नेत्रकी अपक्ष 
यनम्‌) उकृष्ट भी हे | मन निघन दे वर्योकिं 
निधीयन्ते रूपस्य भोग्यत्वेन | भोग्रूपसे पुरुषी समपूण इन्दियो- 
सर्ेन्दरियाहृता विषयाः, बरी- | दारा खये हए विषय मनमे ही 
यस्त्वं च श्रोतरान्मनसः, सर्व ९ जाते दै, तथा समूणे इन्द 
न्रियविषयव्यापकलात्‌ , अतो- विषयमे व्यापक होनेके कारण 
त्‌, अतो- | प्रकी भा 
न्द्रियविषयोऽपि मनसो गोचर | भी है । तात्पयं यह है किनो 
एवेति । यथोक्तहेतुभ्यः परो- | पदाथं अन्य इ्दोकी परुचसे परे 


है वह भी मनका विषयतो 
वरीयांसि प्राणादीनि वा | ही । उप्त हेव रणा 
एतानि ॥ १ ॥ उत्तरोत्तर उल्छृष्ट है ॥ १ ॥ 





परोवरीयो. हास्य भवति परोवरीयसो ह छोकाञ्ज- 
यति य एतदेवं विद्वान्‌ भाणोषु पञ्चविधं परोवरीयः 
सामोपास्त इति तु पथविधस्य ॥ २॥ 


जो इसे इस प्रकार जानेवाला पुरुष भाणो षच प्रकारके उत्त- 


रोखर उ्छृष्टतर॒सामकी उपासना करता 
स है उसका जीवन उत्तरोत्तर 


है; मतः वह वाणीसे उक्ृष्ट है जर . 


खण्ड ७ | शाङ्करभाष्याथं १६९ 
7 क. क > = > क अ 9 = = ॐ. = = 


एतदृदृष्टया विशिष्टं यः परो- | नो पुरुष इस प्राणटषटिसे युक्त 
उत्तरोत्तर उक्कृष्टतर सामकी उपा- 
वरीयः सामोपास्ते परोवरीयो | सना करता है उसका जीवन निश्चय 


९ | ही उत्तरोत्तर उ्ृष्टतर होता जाता 
दास्य जीवनं मवतीत्युक्ताथम्‌ । | हे-यह अर्थ पले (१।९।२ मे) 


कृहा जा चुका है । इस प्रकार यह 
पंच प्रकारके सामको उपासना तो 
सन्ुक्तमिति सप्तविधे वक्ष्यमाणः| कं दी गयी; यह बात शुतिने आगे 
कही जानेवारी सप्तविध सामोपा- 
सनामे बुद्धिको समाहित करनेके स्यि 
कहो टै, क्योकि पञ्चविध सामोपा- 
पक्षो हि पञ्चविधे ब्ष्यमाणे | सनामं निरपेक्ष इआ स्प ही अगे 
कही जनेवारी उपासनामे बुद्धिको 
बुद्धिं समाधित्सति ॥ २॥ | समादित करना चाहेगा ॥ २ ॥ 


इति तु पञ्चविधस्य साम्न उपा- 


विषये बुद्धिसमाधानारथम्‌। निर- 


= © :- 


इतिच्छान्दोगम्योपनिषदि दितीयाध्याये 
सत्तमखण्डभाष्यं सम्पणंम्‌ ॥ ७ ॥ 








ठम खण्ड 
--- (> ¬ 
वाणी विषयक सप्तपिष सामोपासनना 


अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधं सामोपासीत 
यक्कि च वाचो हूमिति स हिंकारो यत्प्रेति स प्रस्तावो 
यदेति स आदिः ॥ १॥ 


` अव सृप्तविध सामकी उपासनाका प्रकरण [ आरम्भ किया जाता ] 
है-वाणीमें सक्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीम जो कुछ 
“है' एेसा स्वरूप दै वह हिंकार दै,जो कुक शभ एेसा स्वरूप है वह भ्म्ताव 
है ओर जो कुछ “आ, पेसा स्वरूप है वह आदि है ॥ १ ॥ 
अथानन्तरं सप्रविधस्य सम- | अव इसके पश्चात्‌-यह सपतविध 
समस्त सामकी साधु उपासना आरम्भ 
की जाती दै । श्रुतम वाचि इस पद्‌- 
मारभ्यते । वाचीति सपमी | की समी विभक्ति पूर्ववत्‌ (रकेषु 
९ षिविरिषट सतति आदि पर्दोकी सक्तमीके समान ) 
पूववत्‌ । वा स समञ्चनी चाहिये । इसका तात्पयं यह 
` सामोपासीतेत्यर्थः । यत्कि | है कि वाश्टष्टिविरिष्ट सप्तविध साम- 
की उपासना करनी चाहिये । जो कुछ 
वाचः शब्दस्य हुमिति यो | वाणी अर्थात्‌ शब्दका हं पेता + 
विषः खूप वह हिकारटे, क्योकि ह 
‡ स हिंकारो हकारसामा- ओर ० स 
न्यात्‌ । यसेति शब्दरूपं स॒ | ज ङ भः पैसा शब्दरूप टै वह 


प्रस्ताव हे, क्याकि उन दोर्नोमिं शर 
स्तावः ब्रसामान्यात्‌ । यत्‌ आ | शब्दका साद्य है । तथा जो कुक 


स्तस्य साम्न उपासनं साध्विद- 


खच्ड ८ ] शङ्कस्भाष्यार्थ १७१ 
ॐ क ॐ ॐ - ॐ ॐ ॐ: ॐ - ॐ - ॐ - ॐ - ॐ - 4 > ॐ ॐ - ॐ ` ॐ ॐ ॐ ॐ ` ॐ ॐ - ॐ ॐ © 


इति स॒ आदिः, आकारसामा- | “आः रेसा राब्दरूप हे वह आकारे 

ग्द समता होनेके कारण आदि है । 
न्यात्‌ गोङ्ारः, | “आदि, यह॒ओङ्कारका वाचक दै, 
सर्वादित्वात्‌ ॥ १ ॥ क्योकि वही सवका जदि है ॥१॥ 


[य 2 रे 


यदुदिति स उद्रीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो 
यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनम्‌ ॥ २ ॥ 


जो दु “उत्‌ एसा शब्दरूप है वह उद्गीथ दै, जो कुछ श्रति' 
रेरा चन्द दै वह प्रतिहार दै, जो कुछ उप' एेसा शब्द है वह उपद्वव 
है जर जो कुछ “नि' एसा शब्दरूप दै वह निधन है ॥ २ ॥ 


यदुदिति स उद्रीथः, उत्पू- | . जो इछ “उत्‌ देसा शब्दरूप 
एविषि ष सव सी 
शब्दके आरम्भमे उतः है; जो कुछ 

वैत्वादुद्रीथस्य । यत्प्रतीति स श्रतिः एेसा शब्दस्वरूप दै वह 
प्रतिहार दै, क्योकि उनमें श्रति' 


प्रतिहारः, प्रतिसामान्यात्‌ । | शब्दका सारस्य दै; जो कुक “उफ, ` 


दसा शब्दरूप है वह उप्व है, 
यदुपेति स॒ उपद्रव उपोपक्रम- | क्योंकि उपद्रव शब्दके आरम्भमे 
` | उपशब्द है तथाजो कुछ नि 
त्वादुषद्रवस्य । यन्नीति तन्नि- | एसा शब्दरूप टै वह निषन है, 
क्योकि निः ओर ननिघन' मे “नि 

धनम्‌, निश्चब्दसामान्यात्‌ || २॥ । शब्दकी समानता हे ॥ २ ॥ 


=~-3 ‰ $~ 





१७२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय २ 


दुग्धेऽस्मे वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो 
भवति य एतदेवं विद्वान्वाचि सप्तविधश्सामोपास्ते॥३॥ 


जो इसे इस प्रकार जाननेवाख पुरुप वाणीम सप्तविधं सामकी 
उपासना करता है उसे वाणी, जो कुछ वाणीका दोह ( सार ) है उसे 
देती है तथा वह प्रचुर अन्नसे सम्पन्न जर उसका भोक्ता होता है ॥२॥ 
दुग्येऽस्मा इ्याचयुक्ता्थम्‌ ।।२॥ | ्ुगेऽस्मे' इयादि श्रुतिका ज 
पहले ( १।३।७में) कहा 

जा चुका हे॥ ३॥ 


2 ~क ० ~ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये 
अष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम्‌ ॥ ८ ॥ 





~ ~ 


वकण खर्डं 
-न-$््9- + 
जदित्यविषयिणी सात अ्रकारक्ी सामोपात्तना 


वेध ९ 
अथ खल्वमुभादित्यश्सप्तविधशसामोपासीत सवदा 
समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन 


साम ॥१॥ 


अब उस आदिव्थके रूपमे सप्षविध सामकी उपासना करनी चाहिए । 
आदित्य सर्वदा सम दै, इसख्यि वहः साम हे । मेरे प्रति, मेरे प्रति एेसा 
शनुमूत होनेके कारण वह सबके प्रति सम दै, इसल्यि साम दै ॥१॥ 


अवयवमात्रे साम्न्यादित्य- 
दृष्टिः पश्चविधेपृक्ता प्रथमे चा-. 
ध्याये । अथेदानीं खल्वमुमा- 
दित्यं समस्ते साम्न्यवयवविभा- 
गरोऽष्यस्य सप्तविधं सामो- 
पासीत । कथं पुनः सामत्व- 
मादित्यस्य ? इत्युच्यते-- 


पश्चविध सामोपासनाओंँके 
प्रसङ्खमे तथा प्रथम अध्यायमें केवर 
अवयवमात्र पामे भादित्यदृष्टि बत- 
ङायी गयी है । उसके बाद अब यह्‌ 
बताया जाता है किं उस्र आदित्यको 
समस्त साममें उसके अवयषविभागके 
अनुसार आरोपित कर सप्तविष 
सामकी उपासना करे । तो रिरि 


आदित्यकी सामरूपता किस प्रकार । 


है १ यह बतलाया नाता है-- 


उदीथत्वे हेतुवदादित्यस्य , आादियके उदुगीथरूप नेमं जिस ` 


सामवे हेतुः । कोऽसो ? सवदा 


„ समो इदविक्षयाभावात्तेन हेतना 


| लल मां प्रति. मां प्रतीति 


मकार हेतु है उसी प्रकार उसके 
सामरूप होनेमे भी दै । बह देतु 
क्या है १ वृद्धि ओर क्षवका अमाव 
होनेके कारण्‌ आदित्य सर्वदा सम. 
है इसी कारणसे वह साम है । बह 
भेरे भति, मेरे प्रति इस प्रकार 





१.७४ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय २ 


तुल्यां बुद्धियुत्पादयति; अतः 


सर्वेण समोऽतः सामं समत्वा- 


सवम समान बुद्धि उतन्न करता है, 
[ क्योकि उसे सभी प्राणी अपने- 
अपने सम्मुख देखते है ] इसल्यि 
वह सवके साथ समान है; अतः 


दित्यर्थः । इस समताके कारण वह साम है । 
उद्धीथमक्तिसामान्यवचनादेव | उद्गीथभक्तिमे समानता बतलने- 
से दी [ अर्थात्‌ उदृगीथके साथ 

तमना आदियका ऊष्वत्वमे साद्य है-- 
क्तसामान्याद्विकारा- | पसा जो श्रतिने कहा है उपके 


अनुसार दी] रोकादिमे भी 
[ सामावयर्वोके साथ ] सादृदय 
बतलाये जानेसे उनका हिंकारादि- 
खूप होना ज्ञात होता है--ईइसीसे 
[ शरुतिमे आदिव्यावयर्वोके ] हिका- 
रादिषूप होनेमे कारण नहीं बतलाया 
गया था ।# रितु आदित्यकी साम- 
रूपतामे न बतलाया गया कारण 
सुगमतासे नहीं जाना जा सकता 
इसर्यि उसके सम्बन्धमे समलखूप 
। कारण बतलाया गया है ॥ १॥ 


तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विदा- 


त्स्य यत्पुरोदयात्स हिंकारस्तदस्य पडावोऽन्वायत्तास्त- 
स्मात्ते हिं कुवन्ति हिंकारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥२॥ 


उस आदित्यम ये सम्पूणं मूत अनुगत ह फेसा जाने 
४ - एसा जाने । जो उस 
आदियके उद्यसे पूवं है वह हकार है । उत सूर्यका जो हिकारख्प दै 
® क्योकि 


3 
लोकादिके =-= - = 
आदित्यावयवोके सम्बन्धे ९ होनेमे जो-जो कारण दै, वेदी 


दित्वं गम्य इति हिंकारादित्वे 
कारणं नोक्तम्‌ । सामत्वे पुनः 
सवितुरलुक्तं कारणं न सुबोध- 


मिति समत्वमुक्तम्‌ ॥ १ ॥ 





जा सकते ह | 


श्वण्ड ९. | 


श्ाडरमाष्याथं 


१७५ 


> ------------------- <-> ऋ +< 
उसके पड अनुगत दै, इससे वे हिंकार करते हैँ । अतः वे दी ईस 
आदिव्यरूप सामके दिंकारभाजन दहै ॥ २ ॥ 


तस्मिननादिस्येऽबयवविभागच् | 
इमानि वक्ष्यमाणानि सर्वाणि 
भृतान्यन्वायत्तान्युगतान्यादि 
त्य पुपजीव्यत्वेनेति विद्यात्‌ । 
कथम्‌ ? तस्यादित्यस्य यत्पुरोद्‌- 
याद्रमरूपम्‌,स हिंकारो भक्तिस्त. 
त्रदं सामान्यं यत्तस्य हिंकारः 
भक्तिरूपम्‌ । 

तदस्यादित्यस्य साम्नः पशवो 
गवादयोऽन्वायत्ता अनु गतास्त- 
दवक्तिरूपणपजीवन्तीत्यथंः । 
यस्मादेवं तस्मात्तेदिुवन्ति पशवः 


उस आदिव्यमे ये आगे बतल्ये 
जानेवारे समस्त भूत अवयवविभा- 
गानुसार उसके उपजीव्य रूपसे अन्वा- 
यत्त अनुगत हँ एसा नाने । वे 
क्रिस प्रकार अनुगत है? [ यह 
बतलाते दै] उस आदिव्यका उदयसे 
पहटे जो ध्मूप ८ धमनुष्टानका 
प्रेरक स्वरूप) है वह दिंकारभक्ति 
हे । उप धर्मरूपमे यही सादश्य है 
किं वह उक्त ( आदिव्यसंज्ञक साम ) 
का हिक्रारभक्तिषूप दहे । 

उस इस आदि्यङूप सामके गौ 
आदि पशु अन्वायत्त-जनुगत हैः 
अर्थात्‌ उस दिकारभक्तिषूपसे उसे 
उपजीवी है । क्योकि पसाद 
इसीष्यि वे पशु सूरयोदयसे पूवं 
हिकार-शब्द करते है । अतः वे 


्रागुदयात्‌। तस्मादिकारभाजिनो| इस आदिव्यसंज्ञक सामके हिकार- 


ह्येतस्यादित्याख्यस्य साम्नः तद्ध 


पात्र हैँ । उस हिंकारभक्तिके सेवन- 
म तत्पर रहनेसे ही वे इस प्रकार 


क्तिभजनशीलत्वाद्वि त॒ एवं | बर्ताव करते है [ अर्थात्‌ सू्यदयसे 


वर्तन्ते ॥ २॥ 


पूवं हिंकार करते है ] ॥ २ ॥ 


५ ० 
"= © ~ 


अथ यप्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मयुष्या 
अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रस्तुतिकामाः षरशसाकामाः 
प्रस्तावभाजिनो द्येतस्य साम्नः ॥ ३ ॥ 








१७ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ ष्याय २ 
= -- ¬ ¬ ¬ >¬ ¬ = > 5 >. ~ >> 


तथा सूर्यके पले-पहर उदित होनेपर जो टप होता है वह प्रस्ताव 
है । उसके उस रूपके मनुष्य अनुगामी दै, अतः वे परसतुति 
[परयक्षपतुति] ओर प्रशंसा [ परोक्षसतुति ] की इच्छावलि है, क्योकि वे 
इ सामकी प्रप्तावभक्तिका सेवन करनेवले है ॥ ३ ॥ 


अथ यत्प्रथमोदिते सवित्‌- तथा सूर्के पहटे-पहर उदित 


सूपं तदस्यादिर्याख्यस्य साम्नः | दीनेपर जो उत्का स्प होता दै 
वह॒ इस आदिप्यसंज्ञफ सामक 
प्रस्तावस्तदस्य मयुष्या अन्वा- | भताव है; पूववत्‌ [ अर्थात्‌ पशुओं 
के समान ] उसके उस रूपके मनुष्य 
अनुगामी है । इसीसे वे ष 
व जर प्रशंसाकी इच्छा करते ठै, 
प्रशंसां कामयन्ते । यस्मात्रस्ता- भ (त 
घमाजिनो ह्येतस्य साम्नः।। २॥ | भजन कनेवलि है ॥ ३ ॥ 


यत्ताः पूव॑वत्‌ । तस्मात्त प्रस्तुतिं 


अथ यत्सङ्भववेखाया<स आदिस्तदस्य वयास्य- 
न्वायत्तानि तस्मात्तान्यन्तरिक्षेऽनारम्बणान्यादायात्मान 
परिपतन्त्यादिभाजीनि द्येतस्य साम्नः॥ ९ ॥ 
तत्वात्‌ आदित्यका जो रूप सङ्गववेलाम ८ सुर्योदयके तीन सुतं 
पश्चात्‌ कारम ) रहता हे वह॒ आदि है । उसके उस रूपके अनुगत 
पक्षिगण है; क्योकि वे इस सामके आदिका भजन करनेवाटे है, इसलिये 
वे अन्तरिक्षम अपनेको निराधाररूपसे सच ओर ठे जाते है ॥ ४ ॥ 
अथ यत्सङ्गवयेलायां गवा | तत्वात्‌ सङ्गववेलमे- जिस 
रदमीनां सङ्गमनं सङ्गमो यस्यां | वेखमे गो यानी सूकिरणोंका सङ्गम 
होता हे अथवा जिसमे गर्जाका 


वेलायां गवां बा त्सैः सा सङ्ग | बसे सङ्गम होता है उसे सङ्गववेला 


ए 


1 


ण्ड ९] शाङ्करभाष्यं १७७ 
-9--9- 2-8-99 9-9-99 ¬ 8-8-95: 9 8: +< 8: < >< 8 < 


ववेला तस्मिन्काले यत्सावित्रं | कते ठै, उस कारम सूर्यदेव 
शूपं स॒ आदिभक्तिविशेष ओ- | नो रूप होता है वह आदि-- 
ङारस्तदस्य वयांसि पक्षिणो- | भक्तिविरोष ओङ्कार दै । उसके उस 
ञन्वायत्तानि । रूपके अनुगामी पक्षिगण है । 
यत एवं तस्मात्तानि बयां- | क्योकि एेसा दै इसरिि वे पक्षि 
स्यन्तरिक्षेऽनारम्बणान्यनालम्ब- गण आकाशम अनारम्बण- बिना 
नान्यात्मानमादायात्मानभेबा- ना 
म्बनत्वेन गहीत्वा परिपतन्ति [ 'आदायात्मानं परिपतन्ति इसके 
गच्छन्त्यत आकारसामान्यादा- | आरम्भमे ] भाकाररूप सादृश्य 
दिभक्तिभाजीनि ह्येतस्य | होनेके कारण वे इस सामकी आदि- 
साम्नः ॥ ४ ॥ संज्ञक भक्तिके भागी है ॥ ४॥ ` 


न> नकर 9 


अथ यत्सभ्ध्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य 
देवा अन्वायत्तास्तस्मात्ते सत्तमाः प्राजापत्यानायुद्रीथ- 
भजिनो द्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥ 


तथा अब जो मध्यदिवसमे मादवित्यका रूप होता है वह उदूगीथ 
है । इसके उस रूपके देवताङोग अनुगत दै । इसीसे वे प्रजापतिसे 
उदन्न हुए प्राणियोमे सर्वश है, क्योकि वे इस सामक उद्गीथमक्तिके 
मागी है ॥ ५॥ 


अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिन! ध अब जो सम्प्रति मध्यन्दिने 
९, टीक्‌ मध्याहमे [ भादिव्यका 

छलजुमष्यन्दिनि इत्यथः । स | प दोग ] दै बह उदूमीयमकि 
उद्रीथमक्तिस्तदस्य देवा अन्वा- उसके उस रूपके अनुगामी देषता- 


१७ ८ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय द 
यत्ताः, चयोतनातिशयात्तत्काङे । | कोग है, क्योकि उस समय वे जत्यनत 


तस्मात्ते सत्तमा विशिषटतमाः | ष्काशशीर होते है । इसीसे वे प्राजा- 
प्राजापत्यानां प्रजापत्यपत्या- । पर्योमे-- प्रजापतिके पुत्रम सत्तम- 
नाभुद्रीथभाजिनो द्येतस्य | विरिष्टतम होते दै, क्योकि वे इस 
साम्नः ॥५।। सामकी उद्गीथभक्तिके मागीरै ॥५॥ 








अथ यदूष्वं मध्यन्दिनास्ागपराहात्स प्रतिहा- 
रस्तदस्य गभा अन्वायत्तास्तस्मातते प्रतिहता नावप ` 
न्ते प्रतिहारभाजिनो श्चेतस्य साम्नः ॥ ६ ॥ 


तथा आदि्यका जो रूप मध्याहके पश्चात्‌ ओौर॒ अपराहके पूवं 
होता दै बह प्रतिहार है । उसके उस्र खूपके धनुगामी गभ॑ है । इसीपे 
चे प्रतिहृत ८ ऊपरकी ओर जाङ्ृष्ट ) किये जनेषर नीचे नही गिरते, 
क्योकि वे इस सामकी प्रतिहारभक्तिके पात्र है ॥ ६ ॥ 


अथ यदृष्वं मच्यन्दिनात्राग- | तथा जादित्यका जो रूप मध्याह- 
पराह्ायद्रूपं सवितुः स प्रति- | के पृशवात्‌ भौर अपराडसे पूरव 
हारस्तदस्य गमां अन्वायत्ताः । | होता दै बह प्रतिहार है । उसके 
अतस्ते सवितुः प्रतिदारभक्ति- | उस सूपके अनुगामी गभं दै । मतः 
स्पेणोध्व॑ प्रतिहताः सन्तो | 2 खथ भतिदारभक्तिरूपते उपरकी 
नावपद्यन्ते नाधः पतन्ति जर प्रतिहत ( माङृष्ट ) दोनेके 
तदूदरारे सत्यपीत्यर्थः । यतः शी पतनके द्वारपर रहते हए 
्रतिदारभाजिनो दतस्य साम्नो | ^ १ नही होते- नीचे नदी 


गिरते, क्योकि गर्भ॑इस सामकी 
गर्भाः ॥ & ॥ परतिहारभक्तिके भागी ह ॥ ६ ॥ 


© 
$ = ~~ 


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ण्ड ९ ] श्ाङ्करमाष्या्थं १७९ 
>< 8 ~> ८ 2८ < > 9 < ~> 8८८ -9-< < < ऋः 
४५ 
अथ यदूष्वमपराह्ास्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तद्‌- 
स्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते पुरुषं इष्टा कक्षः श्व- 
भ्रमिद्युपद्रबन्तयुपद्रवभाजिनो श्येतस्य साम्नः ॥७॥ 
त्था आदियका जो रूप अपराहके पवात्‌ ओर सूरयसतते पूवं 
होता वह उपद्रव दै । उसके उख रूपके अनुगामी वन्य पञ्च है । 
इसीसे वे पुरूषको देखकर भयवरा अरण्य अथवा गुहाम भाग जाते है, 
क्योकि वे इस सामढ़ी उपद्रवभक्तिके भागी है ॥ ७ ॥ 
अथ यदृष्व॑मपराङ्वा्रागस्त- | .ठ्था १५६ 0 
__ , | राहके पश्चात्‌ सूर्यस्तके पूरं 
मयात्स उ : 
प | होता है वह उपद्रव है । उसके 
पशचवोऽन्वायत्ताः । तस्मात्ते । उद रूपके अनुगामी वन्य पद है । 


पुरुषं दृष्टा भीताः कक्षमरण्यं | इससे वे प देखकर भयभीत 

- स हो कक्ष-- अथवा मयशूल्य 
शत्रं भयशुन्यमित्युषद्रबन्त्युप- 

4 गुहाम भाग जते है । इस प्रकार 


गच्छन्ति; दृष्टोपदरावणादुपदर इ- | देखकर भागनेके कारण वे इस 
भाजिनो दयेतस्य साम्नः ॥७॥ । सामक उपद्रवभक्तिके भागी दै ॥७॥ 


अथ यस्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वा- 


यत्तास्तस्मात्तान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न 
एवं खल्वसुमादित्यश्सघ्विधसामोपास्त ॥ < ॥ 

तथा आदियक्य जो रूप घुर्यस्तसे पूं होता है वह निधन है। 
उसके उस खूपके अनुगत पितरृगण है; इसीसे [ भाद्धकामे ] उन्दं 
[ पिदृ-पितामह आदिरूपते दभेपर ] स्थापित करते है, क्योकि वे पितृ- 
गण निश्वय ह्वी इस सामकी निघनभङ्छिके पात्र है । इसी रकार इस 
आदिव्यङूप सप्तविधं सामकी उपास्नना करते है ॥ ८ ॥ 





१८० 
> 98 8-8-82 


छान्दोग्योपनिषल्‌ 


| [ अध्याष २ 


मास्तमिते उ (८ ऋ 
अथ यत्परथमास्तमितेऽदशनं | तथा सूर्यस्तसे पूर्वं रथात्‌ स 


जिगमिषति सवितरि तन्निधनं 
तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मा- 
त्तान्निदधति पितपितामहप्रपि- 
तामहरूपेण दर्भेषु निक्षिपन्ति 
तांस्तदथं पिण्डान्वा स्थाप- 
यन्ति । निधनसंबन्धाननिधन- 
माजिनो ह्येतस्य साम्नः पितरः। 
एवमवयवशः सप्तधा विभक्त 
खल्वयुमादित्यं सप्तविधं सामो- 
पास्ते यस्तस्य तदापत्तिः फल- 
भिति वाक्यशेषः ॥ ८ ॥ 


जव अदृश्य होना चाहता दै उस सम 
उसका जो रूप है वह निषन दै। 
उसके उस रूपके अनुगत पितृगण है| 
इसीसे उन्द निहित करते है अर्थात्‌ 
प्ता, पितामह ओर प्रपितामहशूपपे 
उन्हं दर्भोपर स्थापित करते 
अथवा उनके उदेश्यसे पिण्ड रसते 
है । इस प्रकार निधनका सम्बध 
होनेके कारण वे पितृगण इष 
सामकी निधनभक्तिके पातर है | 
इस प्रकार अवयवशूपसे सात भागम 


विभक्त हुए इस आदित्यरूप सविध 
सामङी जो उपासना करता दै उपे 
आदित्यरूपताकी प्राति होनाहूप एलं 
मिरुता है- यह वाक्यदोष है ॥८॥ 





इतिच्छान्दोम्योपनिषदि 


द्वितीयाघ्याये 


नवमखण्डभाष्यं सस्पू्णम्‌ ॥ ९ ॥ 


नै 


वजा ० ~ -- ~ 


द्य ण्ड 





मृत्युस अतीत सप्तविध सामकी उपासना 
शृत्युरादित्यः अद्ोरात्रादि- | दिवस जौर रात्रि आदि श्रार्के 
द्वारा जगत्का प्रमापयिता 
[ अर्थात्‌ वधकर्ता ] होनेके कारण 





कारेन जगतः प्रमापयिवत्वा- 





त्स्यातितरणायेदं सामोपासन- आदित्य मृल्यु है, उसे पार करनेके 
स्यि इस सामोपासनाका उपदेश 
युपदिश्यते-- किया जाता दै-- 


अथ खल्वात्मसंमितमतिष्घत्यु सप्तविधशसामो 
पासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्रयक्षरं 
तत्समम्‌ ॥ १ ॥ 

अब [ यह बकाया जाता है फि ] समान भक्षरोवाले मृत्युसे 
अतीत सक्तविध ॒घामकी उपासना करे । “हिंकारः यह तीन अक्षरगल 
है तथा भ्रस्तावः यह भौ तीन अक्ष्रोवाख है, अतः उसके 
समान द ॥ १॥ 

अथ खल्वनन्तरमादित्य- अब निश्चय दी आदिव्यरूप मृद्यु- 

8 , | के विषयभूत सामकी उपासनके 
मत्युविपयसामो पासनस्यात्मसं- | पश्चात्‌ आसमसंमित अपने अवयवे 
८ सामावयवो ) की तुल्यताद्रारा 
परिमिति अथवा परमात्मखदशताके 
कारण ज्ञात, जो मूटयुको जीतनेका 
देतु होनेके कारण अति्रलयु है, 
मतिभूत्यु त्युनयहेतुत्वात्‌ । | [ उस सक्चविध सामो उपाषना 


मितं स्वावयवतुल्यतया मितं 


परमात्मतुल्यतया वा संमित- 








१८२ 
यथा प्रथमेऽध्याय उद्रीथभक्ति- 
नामाक्षराण्युद्रीथ इत्युपास्यत्वे- 
नोक्तानि, तथेह साम्नः सप्त 
विधभक्तिनामाक्षराणि समाहत्य 
त्रिभिखिभिः समतया सामत्वं 
परिकल्प्योपास्यत्वेनोच्यन्ते । 


तदुपासनेन मृत्युगोचराक्षर- 
संख्यासामान्येन तं मृत्यु प्राप्य 


तदतिरिक्ताक्षरेण तस्यादित्यस्य 
म्रत्योरतिक्रमणायेव संक्रमणं 
कल्पयति । अतिमृत्यु सप्तविधं 


सामोपासीत मृत्युमतिक्रान्त- 
मतिरिक्ताक्षरसंस्ययेत्यतिमूत्यु 
साम । तस्य प्रथमभक्तिनामा- 


राणि दिका इत्येतल्यक्रं 


भक्तिनाम । प्रस्ताव इति च 


ॐ यहं नात आगे पांचवें मन्वे 


छान्दोग्योपनिषद्‌ [ 


< 9 < ऋ ऋ ऋ 36 > क क ऋ -8--- 


सभ्याय १ 


करे यह्‌ बतलाया जाता है ] जि 
पकार प्रथम अध्याय उद्गीथभषठ 
के नामके अक्षर "उदूगीथ रहै स 
प्रकार उपास्यशूपसे बतलये गये दै 
उषी प्रकार यहां सामी सात 
प्रकारको भक्तियकि नामेकिं भक्षरोक 
एकत्रित कर तीन-तीन अक्षरोद्रारा 
समत्व होनेके कारण उनके स्ामल- 
की कृस्पना कर ॒उन्द उपाष्यह्प 


बतखाया जाता है । 
म्युके विषयभूत अक्षरो संशया 


[जो इकीस दै उस] की सदृशतके 
कारण उन अक्षरो की उपासना करलेपै 
मृलयु (आदिय) को प्राप्तकर उनते 
अतिरिक्त अकषट्रारा उस आदिय 
ृतयुके अतिक्रमणके ल्यि ही शुत 


< < < < < + >< ९९५ 


[ उपासकके ] सक्रमणको कयना ` 


करती दे# [शरतिमे जो कटा दै 
कि ] अतिमृ्यु सप्तविध सामकं 
उपासना करे सो अतिरिक्त अक्ष 
संख्या (बादैस्ी) के द्वारा मृत्यु 
अतिक्रमण _करनेके कारण साम 
अतिष्लयु है । उस सामकी ध्रथम 
भक्तिके नामाक्षर रहिकार" है, यह 
भक्तिनाम तीन अक्रोवाला है; तथा 


न्न = 
स्पष्ट कर दी गयी हे । 


1 


3 
खण्ड १० ] शाहूरमाप्याय १८३ 
> ॐ < < < >< ऋ ~> ~ ऋ 396 8-95-8 9 ~< 9-95-85 95 


भक्तरयक्षरमेव नाम वसर्ेण | शरस्वाव' यह भरस्ठावभक्तिक़ा नाम 
भी तीन भक्षरोवाखा दी दै, जतः 
समम्‌ ॥ १॥ यह्‌ परे नामके समान दै ॥ १ ॥ 


~° © -~ 


आदिरिति द्वक्षरं ध्रतिदार इति चतुरक्षरं तत 
इहैकं तत्समम्‌ ॥ २ ॥ 
"जादि यह दो अक््रोवाख नाम है ओर श्रतिहार' यह चार 
अ्षरौवास नाम ह । इसमेखे एक अक्षर निकालकर आदिम मिखनेसे व 
समान हो जते दै॥२॥ 


आदिरिति द्रथक्षरं सप्तविध- | आदि' यह दो अक्षरोवाला्‌ हे। 
र लाः स तः सात प्रकारके सामक संख्याको पूणं 
२ ६ र | कृरनेमे ओङ्कार “भाद्रि' इस नामसे 


आदिरित्युच्यते । प्रतिहार इति | शा जाता दे । तथा भ्रतिहार चार 
अक्षरोवाखा नाम है । यहाँ उसर्म॑सं 
चतुरक्षरम्‌ । वत इेकमक्षरमव- † एक अक्षर निकारकर आदिके दो 
चारोः प्रभिषयते | अक्षरम भिखा दिया जाता दे। 
इससे वह॒ उसके समान दही हो 
तेन तत्सममेव भवति ॥ २ ॥ । जाता हे ॥ २ ॥ 
~ © © ३--~ 


उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभि- 
च्िभिः समं भवत्यक्षरमतिरिष्यते तयक्षरं तत्समम्‌ ॥३॥ 


“उदृगीय' यह तीन अक्षरो करा ओर “उपद्रव' यह्‌ चार जकषरो ङा नाम 
हे । ये दोनो वीन-तीन जक्षरोमे तो समान है; किंतु एक अक्षर बच 
रता दै । अतः [ अक्षर होनेके कारण ] तीन अक्षरोवाख होनेसे तो 
वह्‌ [ एक्‌ ] भी उनके मान ही है ॥ २ ॥ 


१८४ छान्दोव्योषनिषद्‌ [ बभ्याय २ 


~ 9 ऋ 9 ~ 9 9 आ 8 9-98-2 


9 8-8-43 
उद्रीथ इति अ्यक्षरगुपद्रब | “उद्गीथ यह नाम तीन अकषर. 


(५ वाला है भौर उपद्रवः यह चार 
इति चतुरषर * तम | जक्षरोवाला । तीन-तीन ण्रोसे थै 
भवत्यक्षरमतिशिष्यतेऽतिरिच्यते || समान दै, रतु एक अक्षर व्च 

रहता है यानी बढ़ता ह । उसके 
तेन वेषम्ये प्रापनं साम्नः समत्व- | कारण इनमे विषमता परा होनेपर 


सामक समत्व करनेके स्यि श्रुति 
करणायाद तदेकमपि सदक्षर- कृटती है क्षि वह शक होनेपर भी 


मिति श्यक्षरमेव भवति । अत- , अक्षर" हे, इसल्यि वह नाम भौ 
तीन अक्षरोवारा ही दहै। अतः 
स्तत्समम्‌ ॥ ३ ॥ उन्हीके समान दै ॥ ३ ॥ 





निधनमिति व्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि हवा 
एतानि द्ाविश्रातिरक्षराणि ॥ ४ ॥ 


निधन' यह नाम तीन अक्षरोका दै, अतः यह उनके समान ही 


है । वे दी ये वादस जक्ष टै ॥ ४॥ 


ए्नचनामत ज्यक्षर॑तत्सम- | 'निषन' यह तीन अक्रोवाग 
भेव भवति । एवं ज्यक्षरसमतया | नाम दे, अतः यह उनके समान ही. 


है। इस प्रकारा तीन अक्षरि 
समानता होनेके कारण उनका सामतं 
श्षराणि संख्यायन्ते । तानि ह | सम्पादित कर इस प्रकार प्रा हए 
वा एतानि सप्भक्तिनामाक्षराणि | अ्षरोकी गणना की जाती हे-- 


0 श्वय ही वेये सात भक्तियोके 
द्वाविंशतिः ॥ ९॥ नामाक्षर॒बाईष है ॥ ४ ॥ 


न. =: ० -- 
त 
1 


सामत्वं संपाद्य यथाप्राप्तान्येवा- 


न न ¢ 


1 
३ 


अण्ड १० ] 


६ १८७ 


8-9-39 > ४-8-99 ऋ > -2- 8-8-39 8 ~ > < 


एकविशशत्यादित्यमाभोत्येकविर्शो वा इतो- 


ऽसावादित्यो द्वावि्दोन 
तद्विडोकम्‌ ॥ ५ ॥ 


परमादित्याजयति तन्नाकं 


इक्कीस अक्षरोदारा साधक आदिव्यलोक परापत करता हे, क्योकि इस 
लोकसे वह आदित्य निश्चय दी इक्कीस है । वाईस अकषद्ररा वह 


आदि्यसे परे उस दुःखदीन एवं शो 


तत्रेक विंशत्यक्षरसंख्ययादि- 
त्यमाश्नोति सत्यम्‌ । यस्मादेक- 
विश्च इतोऽस्मान्नोकादसावा- 
दित्यः संख्यया । “द्वादश 
मासाः पश्चतंवक्नय इमे रोका 
असावादित्य एक वि शः'" इति 
रतेः । अतिशिष्टेन द्वाविंशेना- 
्षरेण परं मृत्योरादित्याज्ञय- 
त्या्नोतीत्य्थः । यच्च तदादि- 
त्यात्परं किं तत्‌ १ नाकं कमिति 
सुखं तस्य प्रतिषेधोऽकं तन 
भवतीति नाकं कमेवेत्यथंः, 


अमृत्युविषयत्वात्‌ । विशोकः 
च तद्विगतश्लोकं मानसदुःख- 
रहितमित्यथः । तदाभो- 
तीति॥ ५॥ 


करटित लोकको जीत ठेता है ॥५॥ 


वहाँ वह इक्छीस अक्षर-संख्याके 
द्वारा तो आदित्यरोकषूप मृल्युको प्राप्त 
करता है, क्योकि इस रोककी अपेक्षा 
वह आदियरोक संघ्यामे इक्कीस 
हे। जैसा कि “बारह महीने, पांच 
ऋतुं, तीनये लोक ओर ₹क्कीसवां 
वह्‌ आदिवयरोक इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध 
होता है । बचे हए बाईसवं अक्षरदरारा 
वह मृद्यु यानी आदिव्यरोकसे परे 
उक्कृष्ट रोकरो जीत लेता यानी प्राप 
कर ठेता है । उस आदित्यरोकसे जो 
परे हे वह क्या दै ? वह नाकं है- 
क घुखको कहते हैँ उसका प्रतिषेधक . 
अक है, वह जिसमें न हो उसे नाक 
कहते है; अर्थात्‌ स्का विषय न 
होनेके कारण वह क (घुल) ही हे। 
तथा वह विलोक -शोकरटित अर्थात्‌ 
मानस्सकदुःखसे हीन हे । उसी (रोक) 
को वह्‌ प्राप्त क ठेता है ॥ ५॥ 


~ ° १-- 


उक्तस्यैव पिण्डितार्थमाह-- | 


श्रुति ऊपर कदी हुदै बातक्ा ही 
सारा कहती दै-- 


१८६ छन्दोग्योपनिषष्‌ [ मध्याय 


का कगान्नननिक 
आभोति हादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजयाः 

जयो भवति य एतदेवं विद्वानास्मसंमितमतिमृच 

सप्तविधरसामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ 

[वह्‌ पष] आादियलोककी जय प्राप्त करता ह तथा उते आदिर 
विजयसे भी उक्ृष्ट जय प्राप्त होती ह जो ईस उपासनाफो इस पर्न 
नाननेबाल होकर आत्मसम्मित ओर मृतयुसे अतीत सप्तविष सामी 
उपासना करता दै-- सामो उपासना करता है ॥ ६ ॥ 

एकरविंशतिसंख्ययादित्यस्य , हवकोसवी भक्षः संसा द्र 
जयमामोति । परो हास्यैषंबिद | आदिष्यरोककी जय परा का है 


आदित्यजयान अतः तातपयं यह है फि इस प्रभा 
1प्त्यजयान्श्रत्युगो चरात्परो जाननेवाले इस उपासकक्ो बाई ¦ 
जयो भवति द्वाविंशत्यक्षरसंख्य- | भक्षर-संल्याके दवारा इस मृुगोच 
त ४ आदित्यजयकी अपेक्षा भी उक्ष स 
त्यथः । य एतदेवं विदवानि- | पराप्त होती हे । “य एतदेवं विद्म 


त < . | इत्यादि वाक्यका अर्थं पहले कहा न 

त्याचयुक्ताथम्‌ । तस्येतद्यथोक्त चुका है; उसे यह उपर्युक्त फ १6 

>) 

होता है । सामोपास्ते- सामोपास्त 
फलमिति । दिरभ्यासः साप- 

~ ४ १ | यह द्विरुक्ति उपासना सक्तविधताकी 

वन्पसमाप्त्यथः | & ॥ | समाप्ति सूचित करनेके स्यि दै ॥६॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्‌शमखण्ड- 
भाष्यं सम्पृणम्‌ ॥ १० ॥ 


५ ५ 
-* 9 :-~ 


एकाद र्ट । 

.__ . गायसामक्षी उपालना 

विना नामग्रहणं पञ्चविधस्य [यदहोतक) तिना नाम रि पञ्चविध । 
सतविधस्य च साम्न उपासनञरु- | एवं सविध सामकी उपासनाक 1 
\ ॥ 


हण्ड ११] शाद्कुरभाष्याथ १८७ 
ॐ <~ 3 ~> >€ >> >< >€ < > >: >< 3 >< < < 9 ---~ 


क्तम्‌ । अथेदानीं गायत्रादिना- | वर्णनक्रिया गया । अब आगे गायत्र 
मग्रहणपूरवकं  विशिष्टफलानि आदि नाम लेकर विचष्ट फर्वती 
| | अन्य सामोपसनाओंका उल्लेख किया 
जाता है । गायत्र जादि उपानाभो- 
का उनके करमके अनुसार कर्मं प्रयोग 
प्रयोगस्तथेव- किया जाता दै; उसीके अनुषार- 
मनो हिंकारो वाक््रस्तावश्वलतुरुद्रीथः श्रोत्रं पति- 
हारः प्राणो निधनमेतद्रायत्रं प्राणेषु प्रोतम्‌ ॥ १ ॥ 
मन हिंकार दै, वाक्‌ प्रस्ताव है, चक्षु उदुगीथ हे, श्रोत्र भतिहार है 
ओर प्राण निषन है । यह गायत्रसं्ञक साम प्राणोमे प्रतिष्ठित है ॥ १॥ 
मनो दहिकारो मनसः सव॑- | समपू्णं इन्द्ियदृपियम मनकी 
करणट्त्तीनां प्राथम्यात्‌ । | भरयमता होनेके कारण मन हकार {= 
तदानन्तर्यादराक्परस्तावशच्रुदरी ५ ध. व 
, = श , | दै, उक्ष होनेके कारण चक्षु उद्गीथ 
थः श्रेष्ठात्‌ । तं मिदर | "तहि नक करण भ्रभतहिर 
प्रतिहतत्वात्‌ । प्राणो निधनं तथा भाण निषन ह, व्योमि दुवुि- 
यथोक्तानां प्राणे निधनात्स्वा- कारोत समू्णइन्दरयवर्ग भाणे 
पकार । एतद्वायत्र साम | छीन हो जातेहै । यह गायत्रसंज्ञक साम 
प्राणेषु प्रोतं गायच्याः प्राण- | प्रेमे भरतिष्ठित है, क्योकि गायत्रीका 
संस्त॒तत्वात्‌ ॥ १ ॥ प्राणरूपसे स्तवन किया गया है ॥१॥ 
स य एवमेतद्रायत्नं प्राणेषु पोतं वेद प्राणी भवति 
सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति 
महान्कीर्त्या महामनाः स्यात्तद्‌नतम्‌ ॥ २ ॥ 
वह लो इस प्रकार गायत्रसं्ञक सामको प्राणो प्रतिष्ठित जानता है, 
प्राणवान्‌ होता दै, पूरणं आयुका उपमोग करता है, परशस्त जीवनखाम करा 
हे, प्रना जर पञ्चओंद्ारा महान्‌ होता दै तथा कीतिके द्वारा मी महान्‌ 


सामोपासनान्तराण्युच्यन्ते 
यथाक्रम गायत्रादीनां कमणि 


होता द । बह महामना (उदारददय) शवे यदी उसका ऋ है ॥२॥ ` 


१८८ 
= 9 2 4 


स य एवमेतद्वायत्रं प्राणेषु 
प्रोतं वेद प्राणी भवति | अवि- 
कलकरणो मवतीत्येतत्‌ । सर्व. 
मायुरेति। ““शतं वर्षाणि सवे- 
मायुः परूपस्य'” इति श्रुतेः । 
उयोगुज्ज्वलं जीवति । महा- 
नभवति प्रजादिमिमंहां च कीर्त्या | 
गायत्रोपासकस्यैतदुव्रतं भवति 
वन्महामनस्त्वम्‌, अञुद्रचित्तः 
स्यादित्यथः ॥ २ ॥ 


. छान्दोन्योपनिषद्‌ 


कः [ मध्याय; 


भय 
वह जो हस पकार इस गाः 
संक सामो प्ाणोमे प्रति 
जानता है, प्राणवान्‌ होता है 
अविक इद्दियवान्‌ होता ह, ३ 
पूणं आयुका उपभोग कशत है। 
शुरुपकी पूणं आयु सौ वषं 2 
एसी श्रुति है । ज्योक्‌ उन्न 
जीवनत्मतीत करता हे; प्रनाक्कि 
कारणमी महान्‌ होता है तथाकरीर 
के कारण भी महान्‌ होता है। एह 
जो महामनस्त (विशालददयता) है 
गायत्रोपासकका नत है अर्थात्‌ से 
उदारचित्त होना चाहिये ॥ २॥ 


वि + 4- क) 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये पकाद्दाखण्डा 
भाष्यं सम्पृणेम्‌ ॥११॥ 


दप्दच्छ खणड 


+ 3क-9> - 
रथन्तरसामक्री उपास्तना 


अभिमन्धतिस हिकारो 
ज्वखुति स उद्गीथोऽङ्गारा 


धूमो जायते स प्रस्तावो 


रा भवन्ति स प्रतिहार 


उपराम्यति तन्निधन<सरशास्यति तन्निधनमेतद्रथ- 


न्तरमग्नो पोतम्‌ ॥ १॥ 
अभिमन्थन 


करता है यह हिंकार ह, घूम उत्पन्न -- यष 
पस्ताव है, परज्वसिति त 


होता दै-यह 
प्रतिहार है तथा शान्त होने र्गता है 
हो नाता है यह भी निन है । रथन्तरसाम 


यहं निधन हे 


उद्गीथ दै, अङ्गार होते है यह 
ओर सर्वथा शान्त 


अभ्नमे तिष्ठत हे ॥१॥ 


खण्ड १२ | 


~ ---9--9-9- 8-99-9 > "39 ->> -9 


अभिमन्थति स दिक्रारः प्राथ 
भ्यात्‌ । अग्नेधुमो जायते स 
प्रस्ताव आनन्तर्यात्‌ । ज्वरति 
सघ उद्रीथो दविःसंबन्धाच्ुष्टयं 
ज्वलनस्य । अङ्करा भवन्ति स 


श्रतिदारोऽङ्गाराणां प्रतिहृतत्वात्‌। 
उपशमः सावरेषत्वाग्नेः संशमो 
निःशेषोपमः समािसामान्या- 
निधनम्‌। एतद्रथन्तरमघ्रौ 
मन्थने ह्यगनेर्गीयते ॥ १ ॥ 


2 । ८९, 
अ ऋ 
[ अग्निका ] अभिमन्थन करता 
है- यह सर्वप्रथम होनेके कारण 
हिकार दै । अग्निस्ते नो धुं उखन्न 
होता है वह इसका पश्वादुवर्ती 
होनेके कारण प्रस्ताव दै । अग्रि 
जलता दै- यह उद्गीथ है; हविकरा 
सम्बन्ध होनेके कारण अग्निके 
प्रज्वसिति होनेकी श्रेष्ठता है । अङ्गार 
होते है-यह भतिहार्‌ है, क्योकि 
अङ्खारोका प्रतिहरण क्रिया नाता 
। अग्निक बुञनेम कसर रद नानेके 
कारण उपडाम ओर उसङ्गा सर्वथा 
जन्त हो जाना संम रूप निधन है, 
वर्योकरि उसके साथ समाधिम नकी 
समानता हे । यह रथन्तरसाम अग्नि- 
मे अनुस्यूत है तथा यह अग्नि-मन्थन- 
कालम गाया जाता दै॥ १॥ 


सं य एवमेतद्रथन्तरमन्नो मोतं वेद्‌ बह्मवचस्यन्नादो 
भवति सवमायुरेति ज्योग्जीवति महान्ध्रजया पशुभिभवति 
महान्कीत्या न प्रत्यङ्डन्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तदू्रतम्‌।२। 


वह, जो पुरष इस प्रकारं इस॒रथन्तरसामको अग्निमे अनुप्यूत 
जानता दै वह तरहमतेजःसम्पन्न जर अन्नका भोक्ता होता है, पूणे जीवनका 
उपभोग करता है, उज्ज्वर जीवन व्यतीत करता हे, प्रना ओर पञ्युओके 
कारण महान्‌ होता है तथा कीतिंके कारण महान्‌ होता है । अग्नि 


ओर सुख करके भक्षण न रे जर 
स य इत्यादि पूव॑दत्‌। ब्रह्म 


वच॑सी एचस्वाष्यायनिमिततं 


न थूके ही--यह वत है ॥ २ ॥ 
. वयः इत्यादि मन्त्रका - अर्थ 
पूर्वत्‌ समञ्चना चाहिये । ब्र्षर्चसी 
-सदाचार ओर स्वाध्यायके 


१९० छान्दोग्योपनिषद्‌ 


१११२११३३ 
९ ् 

तेजो त्र्वचसप््‌, तेजस्तु 

केवलं तििड्भावः । अन्नादो | कलग है, केवल तेज तो 


५ 

ख: भाव ( कन्ति) का नामदै। 

दीपताप्निः। न प्रत्यङडग्नेरभिधखो अन्नाद" का अथं दीप्तानि १। 
नाचामेन्न क्षयेककिञचित्न निष्ठ- | मिग ओर शल कके भका 


व , यानो कुछ भी भक्षण न करगौ 
वैच शे्मनिरनं च न ह्या | न निष्ठीवन ~-रष्मा ( कफ ) काह 
तद्व्रतम्‌ ॥ २॥ व्याग करे--यह त्रत है॥ २॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि बितीयाघ्याये 
ढादरखण्डभाष्यं समस्पृणम्‌ ॥ १२॥ 


तर योदकरः णड 
वामदेव्यलामकी उफलना 
उपमन्त्रयते स हिकारो ज्ञपयते स स्तावः शिया सह 
शेतेस उद्वोथःपति चरी सह शेते स प्रतिहारःकाटं गच्छति 
तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमे तद्रामदेव्यं मिथुने प्रोतम्‌ 


पर्ष. जो संकेत करता दै, वह्‌ हिकार है; जो तोष देता (भष 
कलनेके ल्यि मीठी बाते कता) 


< 9 क ऋ ऋ ८५ अ 


(अनुकूर वर्ताव) करत्‌ ष वह प्रतिहार है 


है, वह निघन हे; मेथुन आदि क्रियाङ्की 
निषन ही दै, यह वामदेव्य साम मिधुनमे ओत-परोत हे ॥ १॥ 
उपमन्त्रयते संकेतं करोति प्रा 


; मिथुनद्वारा जो समय वितत 


५, 
निमित्से पराप्त हुभा तेज नक्ष 


"वह प्रस्ताव है; खीके साथ नोषो | 


जो समाति कता दै, वह म । 


| पुरुष जो उपमन्त्रण- सक्त ` 


म्पात्स हिकारः। लपयते तोषयति | करता दै, वह्‌ पथम होनसे हिम । 
। बो लापन करता -मीटी बात इट. । 
स प्रस्तावः ।सदशयनमेकपर्यङ्गग 


कर तोष देता द 


,बह प्रस्ताव है । लीः ` 


२ उस्ञ्ननो साभ सोना-एक य्याए 
मनं स उदरीयः रषटाद्‌। भविस | बना 


हैव उद्गीथ है,क्योक्ज्ठन 


"9 पल्‌ कक 


खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्याथं १९९१ 
८9 > > 3-34-4 > 8 81-88-99 9 9-9-95 8 ऋ 
शयनं खियोऽभिध्रखीभावः स | सन्तानकी प्रापिका हेतु होनेके कारण) 
 । वह उक्कृष्ट दै । अपनी अनेक पलिर्यो- 
प्रतिहारः । कालं गच्छति मैथुनेन | स प्रसेकके साथ नो शयन करना- 
सम्मुख या अनुकूल होना है, वह 
प्रतिहार दै । पुर्व ॒मिधुनद्रारा नो 
समय विताता है तथा मेधुनक्रियकी 
5 जो समाति करता है, वह निघन दै। 
एतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्‌ , | यह वामदेव्य साम मिथुनरमे ओतप्रोत ` 
है; क्योकि वायु जर जले मिथुन 
वागवस्बुमिथुनसम्बन्धात्‌ ।॥१॥ (जोड) से इसका सम्बन्ध दै ॥ १ ॥ 
= 


पारं समाप्तिं गच्छति तन्निधनम्‌ । 


स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी 
भवति मिथुनान्मिथुनासरजायते सर्वमायुरेति योग्जी- 
वति महान्प्रजया पशुभिभवति महान्कीर्त्या न काचन 
परिहरेत्तद््रतमर ॥ २ ॥ 

जो पुरुष इस प्रकार इस वामदेव्य सामको मिथुन ओतप्रोत जानता 

दै, वह मिथुनवान्‌ ( दाम्प्य-घुखते सम्पन्न ) होता है, प्रत्येक मेधुनते 
संतानो जन्म देता दै 1 सारी आयुका उपभोग करता है, उज्वल जीवन 
विताता ह । प्रना- ओर पडुजकि कारण महान्‌ होता है तथा कीर्तिके 
कारण भी महान्‌ होता है । जिस उपासककेः अनेक पलां दो वह उनमेसे 
किंसीका भी परित्याग न करे, यह (वामदेन्योपासक्रका) त हे ॥ २ ॥ 
= ` स यः' इ्यादि मन्त्रमागक्रा अर्थं 

स य इत्यादि पूर्ववत्‌ । भिथुनी ८ 
भवत्यविधुरोमवतीत्यथेः ् कभी विधुर ( पलीके संयोग-सुखसे 

बश्चित) नहीं होता हे । मिथुत-मिथुन- 

न्मिथुनात्मजायत इत्यमोषरेतस्त्व | से संतानको जन्म देता है, इक्त कथनके 
द्वारा उषी अमोषवीय॑ता बायी जाती 
युच्यते। न काश्चन काञिद्पि | दै । अपनी बहुत-सी स््ियेमिसे नो कोई 
> जव कभी समागमकी इच्छा टेकर अपनी 
द्वियंस्वात्मबन्पप्ाक्षं न परिहरेत्स-। शय्यापर आ जाय, उस्न परिल्याग न ` 


न अ ४ 
मागमार्धिनीम्‌ , = करे; क्योकि वामदेव्य सामोपासनाे 
अङ्गरूपसे इसका विधान करिया गयाहै। 

पासनाङ्गतेन विधानात्‌।एतस्मा समृतियोक निषेषवचन हस गन 
; -| पासनासे अन्यत्र ही रगृ होते हैत. 
नन | 1 के वचनोंके भरमाणसे ही धर्मक निय 
। माण्याच धर्मावगतेनं प्रतिपेध- होता है, अतः निषेधशाप्त्रके साथ 

शाल्ेणास्य विरोधः ॥ २ ॥ | विधिका विरोध नहीं है ॥ २॥ 


न 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि _ द्वितीयाध्याये 
चयोद्शखण्डभाष्यं सम्पणम्‌ ॥ १३ ॥ 
4041 
तिर बहत्सामकी उपाच्ना 
उयन्हकार उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽ 
पराह प्रतिहारोऽस्तंयन्निधनमेतद्वृ हदादित्येप्रोतम्‌॥९॥ 
उदित होता हुआ सूरं हिकार है, उदित इआ प्रस्ताव हे, मध्याहकालिकि 
सूय उद्गीथ दै, मध्याहोत्तरकालिक प्रतिहार ह ओर नो अस्तमित होने- 
बारा सूयं हे, वह निषन है । यहं बृहरसाम सुमे स्थित है ॥ १॥ 
उयन्सविता स हिंकारः | उदित होता हआ जो सूयं हं वह 
प्राथम्यादशनस्य । उदितः । ० क्योकि उसा दरशन सव- 
भस्तापरस्तवनहेतुत्वाद्कर्मणा-| से पहले होता ह । उदित हुमा सूय 
१.४४ मा भस्तवनका हेतु होनेके कारण 
भ्‌ । मध्यन्दिन उद्रीथः शरष्ठथात्‌। मस्ठाव है 


| € । मध्याहकारीन सूर्यं उक्कृष्ट 
अपराः प्रतिहारः पश्वादीनां | होनके कारण उद्गीथ है । पृ 
शान परति हरणात्‌ । यदस्तं | आदिक परोकी जोर छे जानेके 


य॑स्तन्निधनं रात्रौ गृहे निधानाव्‌ व ८ है (1 

भाणिनाम्‌ । एतदूबृहदादित्ये स सातः 

प्रोतं वृत आदित्यदैवत्य- निहित करनेवा] होनेसेनिधन 
ह बहर 


त्वाद्‌ ॥ १॥ म बृतुका ५ 


शे 
खण्ड १७ ] द्ाल्माच्याथ १९३ 
क त = = 


स य एवमेतदबृहदादित्ये भ्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो 
भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभि- 
वति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्नतम्‌ ॥ २ ॥ 


वह्‌ पुरुष, जो इस प्रकार इस बहतसामको सूर्यम स्थित जानता 

ह, तेजस्वी ओर अन्नका भोग करनेवाला होता है । वह पूण युको 

भ्रा होता दै, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रना ओर पञ्युभकि 

कारण महान्‌ होता दै तथा कर्तिके कारण भी महान्‌ होता है । तपते 
हुए सूर्यकी निन्दा न करे--यहं नियम है॥२॥ 

[> १ ५ ९ 

स य इत्यादि पूवेवत्‌। तपन्त | , (स॒ यः? इत्यादि श्रुतिका अथं 

पूर्ववत्‌ है । तपते हुए सुक 

निन्दा न करे--यद [ इहत्सामो- 

न निन्देत्तदुरतम्‌ ॥ २॥ ` ` पासकके स्यि ] नियम .है ॥ २ ॥ 


~व 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाल्याये 
चतुर शवण्डभाष्यं सम्पृणेम्‌ ॥ १४ ॥ 





णञ्कदक्र खण्ड 


वैह्पसामकी उपासना 


अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेधो जायते स 
भरस्तावो वष॑ति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार 
उदृण्ाति त्निधनमेतदवूपं पर्जन्ये घोतम्‌ ॥ १ ॥ 


बादर एकत्रित होते है-- यह हकार है । मेव उलत्न होता ै- 
यह प्रस्ताव है । जरः षरसता है- यह उदुगीथ है । बिजली चमक्षी | 
ओर कट़कती है- यह पतिहार है तथा वृष्टिका उपसंहार होता दै-- 
यह्‌ निषन है । यह वैरूप साम मेषे ओतपरोत है ॥ १ ॥ 


अभ्राण्यन्म्रणान्भेष उद्क- | ज्षारण कनके कारण बादल. 
का नाम “अग्नः है तथा नर्ते 
से्ततवात्‌ । उक्ताथमन्यत्‌ । | करनेवाले होनेसे वे “मेषः करति 


म त ह । शेष सबका अर्थं पटे [ लण्ड 
प्वम्रूप साम्‌ पजन्य प्रोतम्‌ । | २ मन्त्र १ भं ] कदा जा रुर 


५ | है। यह शल्यः नामक साम 
अनेकमतवादमादिभिः पर्- मेषमे अनुप्यूत है । भभादिरूपते 
अनेकरूप होनेके कारण पर्जन्यक्ी 


न्यस्य बैप्यम्‌॥ १॥ | तिपिषरूपव ६॥ १॥ 
। रोर । 


खण्ड १५] शाङ्करमाष्याथ १९५ 
>< ~ 9-99-8 9-99-9 

ल य॒ पवमेतद्ररूपं पजन्य प्रोतं वेद विरू 
पार्थ सुरूपाश्च पडुनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जी- 
वति महान्‌ प्रजया पशुभिभवति महान्कीर्त्या वषन्तं 


न निन्देत्तदूत्रतम्‌ ॥ २ ॥ 
वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैरूप सामको पर्जन्यम अनुस्यूत 
जानता है वह विरम जोर सुरूप पु्मोका अवरोध करता ह, पूणे 
आयुकन प्रा होता दे, उञ्ज्वरु जीवन व्यतीत करता हे, प्रना ओर 
पञुभोकि कारण महान्‌ होता है तथा कीरतिके कारण महान्‌ होता दै । 
रसते हुए मेषकी निन्दा न करे-- यह त्रत है॥२॥ 
विरूपं सूपांशाजावि- | वह बकरी खीर मेड आदि 
विरूप एवं सुरूप पञ्ु्ओका अवरोष 
तीन्‌ परुनवरुन्े ्ाभोती- | कता दै, अर्थात्‌ उन भा कएता 
द । बरसते हुए मेषकी निन्दा न 
कुरे--यह [ वैरूपसामोपासकके 
तम्‌ ॥ २॥ स्यि ] नियम है ॥ २॥ 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि द्वितीयगध्याये 
पञ्चदश्चखण्डभाष्यं सम्पणंम्‌ ॥ १५ ॥ 


त्यर्थ; । वषेन्तं न निन्देत्तद््र- 





कक्र खणह 


[व्क 


वैराजसामकी उपासना 


वसन्तो हिकारो भीष्मः परस्तावो वर्षा उद्रीथः 
शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्रेराजमरतुषु घोतम्‌॥१॥ 


वसन्त हकार हे, भ्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद्‌ 
छतु प्रतिहार है, हेमन्त निधन दहै- यह तैराज साम चछतुओमिं 
अनुस्यूत दै ॥ १ ॥ 


बसन्तो हकारः प्राथम्यात्‌ । | सरवभथम होनेके कारण वसन्त 
्रप्मः प्रस्ताव इत्यादि पू- | दिकार ह, भष्म भरस्ताव ड इत्यादि 
वत्‌ ॥ १॥ अथ पूर्ववत्‌ समक्चना चाहिये ॥१॥ 


1 


स य एवमेतद्रेराजमृतुषु पोतं वेद्‌ विराजति 
अजया पशुभिबर्मवचसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति 
महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीत्यत्‌ न निन्दे त्त- 
दृत्रतम्‌ ॥ २ ॥ 


वह्‌ पुरुष, 


¦ जो ईस प्रकार इस वैरान सामको ऋतु ओमि अनुस्यूत 
जानता है, प्रजा 1 


प्च ओर हतिनके कारण शोभित दता दै, ह 


खण्ड १६ ] शाङ़रमाण्याथं १९७ 
4 4 ॐ 4 ८-9८-८ ऋ 9 ऋ व 25 + + == > + 


पूणं भयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वर जीवन व्यतीत करता दै, भरना ओर 
पञ्ुनोकि कारण महान्‌ होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान्‌ होता 
है । ऋतु्मोकी निन्दा न करे यह नत है॥२॥ 

एतदैराजमूतुषु प्रोतं बेद | इस वैरान सामको जो ऋतम 
अनुस्यूत जानता है वह छतुओकि 
समानं विराजता है । जिस प्रकार 
"छतः ऋतुसम्बन्धी धमेकिं कारण 
शोभाको प्राप्त होती दै उसी प्रकार 
विद्वान्‌ भरना आदिके कारण घुशो- 
भित होता दै । जौर सब अथं 


विराजति ऋतुवद्यथरतैव आतं- 


रधरमेविराजन्त एवं प्रजादिभि- 


विदानिल्युक्तमन्यत्‌ । ऋतन | कदा जा चुका दै । चछतुओंकी 
निन्दा न करे--यह [ वैराजसामो- 
निन्देत्तद्व्रतम्‌ ॥ २ ॥ पासकके छ्य ] नियम दै ॥ २॥ 





इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये 
सोडश्ाखण्डमाष्यं सम्पृणम्‌ ॥ १६ ॥ 


(~ 


स॒दक खण्ड 

शकरीसामकी उपासना 
पृथिवो हिकारोऽन्तरिक्षं भस्तावो योरु्रीथो दिशः 
प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्यो छोकेषु घोताः॥१॥ 
एथिवी दकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, धुरोक उद्गीथ है, दिशा 
तिहार दे ओर समुद्र निषन दै-यह्‌ शकरी्ाम लोकम जनुस्यूतदै ॥ १॥ 
परथिवी दकार इत्यादि पू- | थिवी हिंकार” इत्यदि शतिक 
बत्‌ । शक्यं इति नित्यं बहु- | अथ पूववत्‌ दै । रेव” इस 


पदके समान शक्यः, यह पद्‌ सर्वदा 
वचनम्‌, रेवत्य इव । लोकेषु बहुवचनान्त है । [ यह ॒शकरी.- 


प्रोताः ॥ १ ॥ साम ] लोकम अनुस्यूत है ॥१॥ 

स य एवमेताः शक्यो छोकेषु पोता वेद लोकी 
भवति सवंमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभि- 
भवति महान्की्या लोकान्न निन्देत्तद््तम्‌ ॥ २ ॥ 

-वह पुरुष, जो इस पकार इस ॒शकरीसामको रोको अनुस्यूत 
जानता हे, कोकवान्‌ होता द, वह सम्पूण आक प्रप्त होता है । 
ञ्ज्व जीवन व्यतीत करता है । प्रजा ओर पडुओकि कारण महान्‌ 


होता दे तथा कीर्तिके कारण भी महान्‌ होता हे । छोकोंकी निन्दा न 
: करे यह नत है ॥ २॥ 


लोकी मवति रोकफलेन रोकी होता है अर्थात्‌ लोक- 
युज्यत इत्यथः । लोकान | सम्बन्धी 1 1 दत दै। 
1 न करे 
न्देत्तदूव्रतम्‌ ॥ २ ॥ सामोपासकके लियि] व 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि. द्वितीयाध्याये 
सखसदशण्डमाष्यं सम्पूर्णम्‌ ॥ १७ ॥ 





न -- - -~--------- >+, "रोति 


प्रणादः खण्ड 
रेवतीक्तामकी उपासना 

अजा हिंकारोऽवयः भ्रस्तावो गाव उद्रीथोऽश्वाः 
घरतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्ोताः॥१॥ 
बकरी हकार दै, मं भरस्ताव दै, गो उदूगीथ दै, बोडे प्रतार 
हे ओर पुरुष निषन दै--यह रेवतीसाम पडजम अनुस्यूत द॥ १॥ 
अजा हिकार इत्यादि पूर्- | (अना हकार? इत्यादि मन्वका 
अर्थं पूर्ववत्‌ है । यह [ रेवतीसाम | 

वत्‌ । पशुषु प्रोताः ॥ १ ॥ । पञ्चमं अनुपयूत हे॥ १॥ 


---°"=~---~ 


स य एवमेता रेवत्यः पशुषु भरता वेद्‌ पशुमान्‌ 
भवति सर्वमायुरेति उ्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिः 
वति महान्कीत्या पशुन्न निन्देत्तद्त्रतम्‌॥ > ॥ 

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको पञ्चम अनुप्त 


। जानता दै, पञचमान्‌ होता दे, बह पूण जाको भप्त होता हे। 


उच्ञ्वर जीवन व्यतीत करता दै । प्रजा ओर पञ्भंकि कारण महान्‌ 
होता है तथा कर्तिके कारण भी महान्‌ होता ै। प्डजोकी निन्दा न 
कुरे, यह नियम हे ॥ २ ॥ 
पन्न निन्दे्द्वरतम्‌ ।॥२॥ पद्युमोकी निन्दा न करे 
| यह [ रेवतीसामोपासकके स्थि ] 
नियम है ॥ २॥ ` 


इतिच्छान्दोष्योपनिषदि द्वितीयाध्याये 
अष्टादशखण्डमाप्यं सम्पणेम्‌ ॥ २८॥ 


= खम्पणम्‌ 


9 भ, 
[ 9 र्ये 


एकोन खश्ड 
यन्ञायन्नीयसामकी उपासना 
, खोम हिंकारस्तक्पस्तावो माश्समुद्रीथोऽस्थि परति. 
हारो मना निधनमेतयज्ञायज्ञीयमङ्गेषु धोतम्‌ ॥ १॥ 
रोम हकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मांस उदृगीथ दै, अस्थि 


तहर है ओर मजा निषन है । यह यज्ञायज्ञीय साम अङ्गम ¦ 


नुस्यूत है ॥ १ ॥ 


रोम दकारो देहावयवानां | देहके भवयवेमि सर्वभथम होनेके 
प्राथम्यात्‌ । त्वक्प्रस्ताव | कारण लोम दिका है। रोमोके 
आनन्तर्यात्‌ । मांसथुद्रीथः भनन्तर होनेके कारण त्वचा पसव 
भरष्टयात्‌ । अस्थि प्रतिहारः है। उ्कृष्ट होनेके कारण मांस 


। उदुगीथ है प्रतिहृत होनेके कारण 
प्रतिहृतत्वात्‌ । मज़ा निष्न- स १ (4 अन्ते 
मानन्सपात्‌ । एतद्यज्ञायजञीयं | स्थित होनके कारण मज्जा निन 
नाम साम॒ देदावयवेषु | है । यड यज्ञायकीयनागक साम देह- 
भ्रोतम्‌ ॥ १ ॥ के मवयो अनुस्यूत ई ॥ १ ॥ 


~: & :-- । 
सय प्वमेतचज्ञाजञीयमङगष भोतं वेदाङ्धी भवति 
नाङ्गन विहृछसि सर्वमायुरेति ज्योग्जोवति महान्पर- 
जया पशुभिभेवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो 
नाभीयात्तद््तं मज्ज्ञो नाश्रीयादिति वा ॥२॥ 


ण्ड १९ 1 


शाङकरभाष्याथं २०१ 


9 ९-99-3 


~ ऋ 
वह एरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायजञीय सामको अङ्गोमं अनुस्यूत 
जानता ह, अह्ञवान्‌ होता ह । वह अङ्गके कारण कुटिरु नदीं होता 
पूणे युको परापत होता हे, ञ्ज्व जीवन व्यतीत करता हे, प्रना ओर 
पयेकि कारण महान्‌ दोता दै तथा कीर्तिके कारण भी महान्‌ होता 
ह । णक वतक मांसमकषण न करे--यह नत दै, अथवा [ सवदा दी | 
मसभक्षण न करे--ेसा नियम हे ॥ २ ॥ 


अङ्गी भवति समग्राङ्धो भव- 
तीत्यर्था नाङ्खेन हस्तपादादिना 
विहरति न इष्टी भवति पड 


कुणी वेत्यथेः । संवत्सरं सव- 


ल्सरमात्रं मज्तो मांसानि नाशनी- 
यान्न भक्षयेत्‌ । बहुवचनं 
अत्स्योषलक्षणा्थेम्‌ । मञ्तो 
नादनीयात्सरवदेव नादनीयादिति 
वा तदत्रतम्‌ ॥ २॥ 


जङ्गी होता है अर्थात्‌ पूरण्ग 
होता है । अङ्ग अर्थात्‌ हाथ्पोव 
आदिके द्वारा कुटिर यानी क्गड़ा या 
इमशररदित नहीं होता। संबस्रप्न्त 
अर्थात्‌ केवर एक सारु मांसभक्षण 
न करे । मज्ज्ञः इस पदमे बहुवचन 
मछस्योंको उपरुक्षित करानेके 
स्यि है [ अर्थात्‌ मांस एवं 
मदप्यादि न खाय ] । अथवा “मज्ज्ञो 
नारनीयात्‌- सवदा ही मास-मछरी 
न खाय-एेसा नियम है ॥ २॥ 


५ © °-~--- 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि दवितीयाघ्याये' पकोन 
विंश्चखण्डमाष्यं सम्पणम्‌ ॥ १९ ॥ 


ॐ 
1 (2 कऽ 4 6 ४ + 


विक्त खणड 


~--‡ ०9 °~- 


राजनपामकी उपात्रना 


अग्निर्हिंकारो वायुः 


प्रस्ताव आदित्य उद्रीथो 


नक्षत्राणि प्रतिहारदचन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु 


पोतम्‌ ॥ १ ॥ 


अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव दै, आदित्य उद्गीथ है, नक्षत्र प्रति- 


` हार है, चन्द्रमा निषन दै- यह राजनसाम देवताभमे अनुस्युत है ॥१॥ 


अग्निकाः प्थमस्थानत्वात्‌ || अग्न ईकार दै, करयोकि उसका 


वायुः प्रस्ताव आनन्तर्य॑सामा- 
न्यात्‌ । आदित्य उद्वीथः 
ष्ठात्‌ । नक्षत्राणि प्रतिहारः 
प्रिह तत्वात्‌ । चन्द्रमा निधनं 
कर्मिणां तन्निधनात्‌। एतद्राजनं 
देवतासु प्रोतं देवतानां दी्षि- 
मच्वात््‌ ॥ १ ॥ 


स्थान सर्वथम है । आनन्तर्ये 
तुल्यता होनेके छारण वायु प्रस्ताव 
हे । उच्ृषट होनेके कारण आदित्य 
उद्गीथ हे । प्रतिहत होनेके क्षारण 
नक्षत्र प्रतिहार टै तथा चन्द्रमा 
निघन ह क्योकि उसी कम 
काण्डियोका निधन होता है । यह 
शजनसाम _ देवताओमि अनुस्यूत 


हे, क्योकि देवगण दीप्तिमान्‌ 
होते है ॥ १॥ 


"९ ५२ 9 ~ 


विदत्कलम्‌-- 


स य एवमेतद्राजनं 


रस उपासनाके विद्वानूको प्रा 
होनेवाल 


फर-- 


देवतासु धोतं बेदेतासामेव 


देवताना<सलोकतारसाष्टिता<सायुज्यं गच्छति सर्व. 


ण्ड २० | शाङ्करभाष्यं २०३ 
>< 


3-2-99 8-988-98 
मायुरेति ्योग्जीवति महान्‌ परजया पशुभिभैवति 


महान्‌ कीर्त्या बाह्मणान्न निन्दे तद्व्रतम्‌ ॥ २ ॥ 

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस राजनसामको देवताओं अनुस्यूत 
जानता है, उन्दी देवताओंके सालोक्य, सार्व ( तुल्य श्चर्यं ) ओर 
सायुज्यको प्रा हो नाता दै । वह पूपं आघुको प्रत होता दै, उज्ज्वल 
जीवन व्यतीत करता दै, प्रना ओर पञ्ुओंके द्वारा महान्‌ होता दै तथा 
कीक द्वारा भी महान्‌ होता है । त्राह्णोको निन्दा न करे--यह. 
व्रत है ॥ २॥ 


; वता. | इन अग्नि आदि देवता्ओंकौ ही 
एतासामेवारन्यादीनां देवता | सलोकता- समानरोकता, सार्टिता 


नां सलोकतां समानलोकतां | - समान देशय, . सायुन्य-- 
साषटितं दिलं साध्यं परस्पर मिरु जानेके भावको अर्थात्‌ 
तां समानद्वित॒सायुज्य | एक ही देहके देदिखको प्राप्त हो 
सयुग्भावमेकदेददेदित्वमित्येतत्‌ || नाता हे। यों "वाः शब्द उप्त 
व्यः | | समञ्चना चाहिये । अतः 'सखोकतां 
वारब्दोऽ षो स वा" इत्यादि पाठ जानना चाहिये । 
सलोकतां वेत्यादि । भावना- | कर्योकरि भावनाविशेषसे फरुविरोष- 
वरेषतः फलनिशेपोपपः । | की उतपि दरी द अर इ सव 
फरोका समुष्य होना [ अर्थात्‌ एकं 
गच्छति प्राप्नोति । सथुचयानुप- | दी उपासकको इन सब फलोंका 
पतते । ब्राह्मणान्न माघ होना] मी सम्भव नही हे । 
` | ब्राहमणोकी निन्दा न करे--यह 
८।एते वै देवाप्रतयक्षं यद्बाक्मणाः ५५ व अ छिये नियम 
ति अते्ादगनिन्त । “ये नो ब्राह्मण हैं मत्यक्ष देवता 
0 देवता- | ही ह" पे श्रुति होने बरण- 
निन्दवेति ॥ २ ॥ निन्दा देवनिन्दा दी दै ॥ २॥ 


इतिच्छन्दो्योपनिषदि ितीयाभ्याय विंयलणड- 
भाष्यं सम्पृणेम्‌ ॥ २० ॥ 


| ५, 
क = = ज 





एककरः खणड 

सवेविषयक सामकी उपएरसना 
त्रयी विदा हिकारख्रय इमे खोकाः प्रस्तावोऽन्नि. 
वायुरादित्यः स उद्रीथो नक्षत्राणि वयासि मरीचयः 


स प्रतिहारः सपा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत्साम 
सवस्मिन्प्रोतम्‌ ॥ १ ॥ 





त्रयीविद्या हकार है । ये तीन लोक प्रस्ताव है । अग्नि, वायु 
र आदिय ये उद्गीथ दै । नक्र, पक्षी जोर किरणे ये प्रतिहार 
है । सप, गन्धव नौर पितृगण-ये निधन है । य सामोपासना स्म 


अनुस्यूत है ॥ १ ॥ 


तरयी विद्या हिंकारः । अगन्या- | त्रयीविद्या हिका है । त्रयीविद्या 
अगि आदिकरा का्य॑है--रेसी 
श्रुति होनेके कारण जयीविद्या अमि 

= आदि सामोपासनाके पश्चात्‌ कही 
ह | द। समं कमि मासमे 
्रथम्यात्सवेकतैव्यानाम्‌ । तरय इमे। होनेके कारण त्रथीविदा हिकार दै । 


स उसके कायं होनेके कारण ये तीन 

न्तरा इति | रोकं उसके पाद्वत है, अतः 
ये मस्तावे है । उकछृष्टताके कारण ` 

्रस्तावः। अग्न्यादीनामुद्रीथत्वं | अग्नि मादिका उद्गीथत्व बतलाया 


य गया है । तथा प्रतिहत होनेके 
्रेष्ठयात्‌ । न भित । करण नकषवरादिङकी प्रतिहार दै । 


दिसाम्न आनन्तयं त्रयीविद्याया 


चाण्ड २१] 


छाङकरभाण्याथं २०५ 


= =7 = = ॐ 2 ¬ ¬: ¬: = ~ ~ = = ~: =: > ~ >: >: ऋ: >: ऋ -5 ऋ 


स्बाखतिहारसम्‌ । सर्पादीनां 
धकारसामान्यान्निधनसवम्‌ । 

एतत्साम नामविशेषाभावा- 
त्वामसषठदायः सामशब्दः सं- 
स्मिन््ोतम्‌ । त्रयीविचयादि हि 
सर्वम्‌ । त्रयीविद्ादिदृषटया 
दिकारादिसाममक्तय उपास्याः । 


अतीतेष्वपि सामोपासनेषु येषु 
प्रोतं यद्यत्साम तद्दृष्टया तदु- 
पास्यमिति । करमाङ्गानां दृष्टि- 
विकेषेणाज्यस्येव संस्कायंत्वात्‌ 
॥ १॥ 


जीर धकारमे समामता होनेके 
। कारण सर्पादिका निघनत्व बतलाया 


| गया है ।# 


यह साम--किसी नामविरोषः 
का अभाव दहोनेके कारण यह 
सामसमुदाय अर्थात्‌ सामः शब्द्‌ 
समे अनुस्यूत हे । त्रथीविद्या 
आदि ही सब कुछ है; तथा त्रयी- 
विद्या आदि दष्टिसे ही हिंकार भादि 
सामभक्तिर्योकी उपासना करनी 
चादिये । पीठे बतटायी हई सामो- 
पासनाओंमे भी जिन-जिनमे जो-नो 
साम अनुस्यूत दहै इन त्रयीविया 
आदिकी र्टिसे दही उनकी उपासना 
करनी चाहिये । [ “पल्यविक्षित- 
माज्यं भवतिः इस वाक्यके अनुसार - ` 
पत्नीकी र्ट पडुनेसे ] जैसे आज्य 
संस्कारयुक्त होता हे, उसी प्रकार 
सभी कर्माङ्गं दष्टिविरोषसे दी संस्कार 
किये जाने योग्य है ॥ १ ॥ 


० 
[री . वि यी 


सर्वविषयसामविदः फलम्‌- 


स य एवमेतत्साम 
भवति ॥ २॥ 


सरवविषयक सामक विदवानूको 
| मिरनेवाख फर-- 
सवंस्मिन्प्रोतं वेद सर्व॑श्ह 


ॐ यहाँ “सपं, शब्दका पयाय “विषधर, “फणधर' आदिः कोई धकारनिशिष्ट 


शब्द्‌ ठेना चाहिये; जैसा कि २।२।१ के माष्थमे भाष्यकारने अन्तरि्चको उद्गीय 
बतछाते ह अन्तरिश्चके पयांयभूत गकारविशिष्ट "गगन" शब्दुका अहण किया । 





२०६ छान्दोग्योपनिषद्‌ 


> < > > ¬ >>> ~ > 8 9 8-994-88 


[ अध्याय २ 


वह, जो इस प्रकार सवम अनुस्यूत इस सामको जानता है स्वरूप 


हो जाता है॥ २॥ 
सवं ह भवति सर्वेश्वरो भव- 


सवं हो जाता है अर्थात्‌ सर्वर 


तीत्यथः। निरूपचसितिसर्वभावे | दो जाता है; क्योकि सर्वभावकषा 


हि दिक्स्थेभ्यो बलिग्राप्त्यनुष- 
पत्तिः ॥ २॥ 


उपचार हुए बिना सम्पूरणं दिशाज- 
म स्थित पुरषोसे बक प्राप्त होना 
सम्भव नहीं हे ॥ २॥ 


५ न 
~-* 9 -~- 


सवंविषयक सामी उपासनाक्ना उलपं 
तदेष इरोको यानि पञधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो 
न ज्यायः परमन्यदस्ति ॥ ३॥ 
इसी विषयमे यह मन्त्र भी है- जो पोच प्रकारके तीन-तीन बत- 
खये गये दै, उनसे र्ठ तथा उनके अतिरिक्तं ओर कोई नदीं है ॥२॥ 
तदेतस्मिन्नथं एष इलोको । इसी अथमे यह इरोक यानी मन्त 


मन्त्रोऽप्यस्ति । यानि पञ्चधा 
पञचग्रकारेण हिकारादिषिभागैः 
भरोक्तानि णि त्रीणि ब्रयी- 
विद्यादीनि तेभ्यः पश्चत्रिकेभ्यो 
ज्यायो महत्तरं परं च व्यति- 
रिक्तमन्यद्स्त्वनन्तरं नास्ति न 
विद्यत इत्यथः । तत्रैव हि स्व॑ 
स्यान्तर्मावः ॥ ३ ॥ 


भी दै। हिकारादि-विभागो्रारा 
जो पाच परकारसे बतलये हुए तीन- 
तीन है यानी त्रयीविद्या आदि है, 
उन पच त्रिकोंकी अपेक्षा उल्ृष्ट- 
महान्‌ ओर उनसे भिन्न. कोई दूसरी 
वस्तु नहीं हे--यह इसका तात्पर्य 
दे । भरथात्‌ उनहीमे सम्पूणं वस्तुर्णो 
का अन्तर्भाव हो जाता है ॥ ३ ॥ 


यस्तद्वेद स वेद स्॑सलवा दिशो बणिनस्त 
हरन्ति सव॑मस्मीत्ुपासीत तद्रतं तदूनतम्‌ ॥ ४ ॥ 


1 


"~~~ 


खण्ड 2९ ] ह्लाङ्रमप्याथं २०७ 


99 => > > > ऋ > 


जो उसे जानता दै वह सव कुछ जानता ह । उसे सभी दिशाप 
बलि समर्पित कग्ती है । भं सब कुछ है इस रकार उपासना करे- 
यह नियम दै, यह नियम है ॥ ४ ॥ 
यस्तद्यथोक्तं सर्वात्मकं साम | जो पुस्पं शस पर्वोक्तं सर्वालमक 
इ ॐ सामको जानता दै, वह सबको 
वेद स वेद सवं स॒ सवेज्ञो भव- १. अर्थात्‌ वह सर्वज्ञ हो 
९ ९. | जाता है । सम्पूण दिश्चाए-सम्पूण 
ती्यथेः । सवां दिशः सबाद्‌- | ददामि स्थित पुरूष इस प्रकार 
जाननेवले इस उपासकके प्रति 
ध बलि यानी मोग उपस्थित करते ह, 
हरन्ति प्रापयन्तीत्य्थः । सवे- | भरथत्‌ उत भेरगोकी प्राति करति 
मस्मि भवामीत्येवमेतत्सामोपा 4 
इस सामकी उपासना करे--उस 
, ( उपासकके लिय यदी नियम दे । 
जो द्विरुक्ति दै वह सामो- 


साभोपासनसमाप्त्यथां ॥ ४॥ : पासनाकी समाति स्यि है ॥ ४॥ 


क्स्था अस्मा एवंविदे बलि भोगं 


सीत तस्यैतदेव व्रतम्‌ । दिरक्ति 


=> 9 [यिं 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि द्वितीयाध्याये 
पकविंश्षखण्डमाप्यं सम्पुणेम्‌ ॥ २९ ॥ 


क, - 


दाङिज्ञि श्वर 
विनदिगुणवियथिष्ट सामक्री उपासना 


सामोपासनप्रसङ्गन गान | सामोपासनाके प्रसङ्गसे उद्गाता- 


१. = को गानविशोषादि' सम्पत्तिका 
विशेपादिसंपदुद्रातरूपदिश्यते; | उपदेश किया जाता ह क्योकि इते 


फलविशेषसंबन्धात । फरविरोषका सम्बन्ध होता है । 
विनदिं साम्नो बणे पशग्यमित्यग्नेरुद्रीथोऽनिरुक्तः 

प्रजापतेनिरक्तः सोमस्य खदु दल्ष्णं वायोः इलक््ण 

चख्वदिन्द्रस्य कों बरृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य 


 तान्स्ानेवोपसेवेत वारुणं स्वेव वर्जयेत्‌ ॥ १ ॥ 


सामक "विनर्दिः नामक गानका वरण करता ह; वह पडुोके ल्मि 
हितकर हे ओर अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ है । प्रजापतिका उद्गीथ 
अनिरुक्त है, सोमका निरुक्त है, वायुका मृदुल ओर ररक्ष्ण ८ सरर्तासे 
उच्चारण के जानेयोग्य ) है, इनका प्ण ओर बर्वान्‌ दे, बृहस्पति 
का क्च ( करौच्पक्षीके शब्दके समान ) है ओर वरुणका अपध्वान्त 
(अष्ट) दै। इन सभी उदूगीथोका सेवन करे; केवर वरुणसम्बन्धी उद्गीथ- 
काही परियागकरदे॥ १॥ | 


विनदिं विशिष्टो नदः स्वर विनर्दि जिसका न्द यानी 
स्वरविरोष छछषभ ( बेरु ) के शब्द- ` 
के समान विरिष्ट दै वह विनर्दि 
` | गान दै, यहाँ गानः शब्द वाक्य- 
स्तीति वि नदिं गानमिति वाक्य- | रोष | । वह विनर्दि गान पञ्यु्ओकि 





विशेष ऋषभङूनितसमोऽस्या- 


1: 


खण्ड २२] 
शेषः| तच्च साम्नः संबन्धि परुः 
भ्यो हितं पदशव्यमग्ेरमनिदैवत्यं 


चोदरीथ उद्ानम्‌ । तदहमेवं 
विशिषं वृणे प्राथंय इति कधि- 
द्जमान उद्भाता वा मन्यते । 
अनिरुक्तोऽषकसम इत्यविशे- 
पित; प्रजापतेः प्रजापतिदेवत्यः 
स॒ गानविशेषः, आनिरुक्त्या- 
लजापतेः । निरुक्तः स्पष्टः 
सोमस्य सोमदेवत्यः स॒ उद्वीथ 
इत्यर्थः । मदु श्क्ष्णं च गानं 
वायोर्बायुदेवत्यं तत्‌ । श्ण 
बरुवच् प्रयत्नाधिक्योपेतं चेन्द्र 
स्यन्द्रं तद्वानम्‌ । करोश्चं करोश्व- 
पक्षिनिनादसमं ५ 
तत्‌ । अपध्वान्तं भि्कांस्य- 
स्वरसमं बरुणस्येतद्रानम्‌ । तान्‌ 


सर्वानिवो पसेवेत प्रयुञ्जीत वारुणं 
तवेवैकं वज॑येत्‌ ॥ १॥ 


स्यि हितकर ओर अम्निदेवता- 
सम्बन्धी उदृगीथ--उदृगान ह । 
इस प्रकारके उस विशिष्ट ॒सामका 
मँ वरण करता हँ अर्थात्‌ उसके 
स्यि प्रार्थना करता हष प्रकार 
कोई यजमान अथवा उद्गाता 
मानता हे । 

प्रनापतिका नो गानविशेष दै, वह 
अनिरुक्त है अर्थात्‌ अमुकके तुल्य दै- 
इस प्रकार विशेषपसे निरूपित नहीं 
किया जा सकता; क्योकि प्रजापति 
भी विशेषरूपे निरूपित नहीं किया 
जाता । सोमका अर्थात्‌ सोमदेवता- 
सम्बन्धी जो उद्गीथ दै, वह निरुक्त 
यानी स्पष्ट है । जो गान मृदु भौर 
दलक्ष्ण हे, वह वायुका यानी बाु- 
देवतासम्बन्धी है । जो ररक्ष्ण जीर 
बलवान्‌ यानी धिक प्रयलकी 
उपिक्षावाला दै, वह इन्द्रका यानी 
इन्द्रसम्बन्धी गान दै । जो क्रष्च 
यानी करश्चपक्षीके शब्दके समान है, 
वह ब्हस्पतिका यानो बृहस्ःपिदेवता- 
सम्बन्धी गान हे | अपध्वान्त धर्थात्‌ 
पटे हुए कोँसेके स्वरके समान जो 
है, वह वरुणदेवतासम्बन्धी गान है । 
उन सभीका सेवन अथात्‌ प्रयोग 
करे, एकमात्र वरणसम्बन्धी गानका 
ही त्याग करे ॥ १॥ 


----शन्वछन्यै--- 


२१० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्वाय २ 
> ड > 9-99-9 8 ~ 
स्तवनके स्मय ध्यानकी प्रकार 

अग्रत देवेभ्य आगायानीत्यागायेरस्वधां पितृभ्य 

णोदकं © © 

आगां मनुष्येभ्यस्तर पशुभ्यः स्वगं टोकं 

पजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा 
ष्यायत्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥ 

म देवताओकि स्यि अगृतत्वका आगान ( साधन ) कर्--इस 
प्रकार चिन्तन करते हुए आगान करे । पितृगणके स्यि स्वधा, मनुरष्योके ` 
ल्म भारा ( उनकी इष्ट वस्तुओं }, पुकि रियि तृण ओर नलः, 
यजमानके रिथ स्वर्गलोक भौर अपने ल्य मन्नका आगान कट -इस 
भकार इनका मनसे ध्यान करते हुए पमादरहित होकर स्तुति करे ॥२॥ 

अमृतत्वं वेभ्य आगायानि | भँ देवताओोके लये अमृतका 
साधयानि । स्वधां पितृभ्य आ- | गान ¬ साषन करू पिवृगणके 
४ , | स्यि स्वषाका आगान क मनुर्यो- 
गायान्याशां मनुष्येभ्य आशां | के ज्यि जा यानी प्रार्थित वस्तुका 
प्राथितमित्येतत्‌ । वृणोदकःं | [ साधन कं ] । परओकि लिथि 
पशुभ्यः स्वगं लोकं यजमाना- | कृण अर जर, यजमानकै वयि स्वग 


। रोक ओौर अपने स्यि अन्नका आगान 
याननमात्मने मद्यमागायानीत्ये- करू - इस प्रकार इन वातो 


तानि मनसा चिन्तयन्भ्याय्न- | मनसे ध्यान-चिन्तन॒कृरते इए 
प्रमत्तः स्वरोष्मव्यञ्जनादिभ्यः | खर, उप्म ओर व्यज्ञनादिके ¦ 


उच्चारणे प्रमा 
स्तुवीत ॥ २ ॥ | सठुति्रे॥ २ एय द 
सरादि षणोकी देवात्मकता 
स्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मनः .सर्वं ऊष्माणः 


सवै ; पजापते- 
एत्मानः स स्प सत्योरातमानस्तं यदि स्वरेषूपाल- 


श्ाङ्करमाप्याथं २९१ 


„8: 8 >< 9-3-99 3 +> 


भतेन्द्रश्दारणं प्रपन्नोऽभूवं स खा परति वक्ष्यतीत्येनं 


ब्रुयात्‌ ॥ ३ ॥ 


समू सवर इन््रके भासा रै, समस्त ऊष्मवणं प्रनापतिके आमा 
है, समस्त स्पकशैवणे मृयुके मात्मा दै । [ ईइ प्रकार जाननेवलि ] उस 
उद्गाताको यदि को पुरुष स्वरोके उचचारणमे रोष प्रदश्चित ऋरे तो वह 
उससे कटे कि भै दन्दके शरणागत हः वही तुञ्चे इसका उत्तर देगा ॥२॥ 


सर्वे स्वरा अकारादय इन्द्रस्य 
बलकर्मणः प्राणस्यात्मानो देदा- 
वयवस्थानीयाः । सवं उस्माणः 
शषमहादयः प्रजापतेर्विराजः 
कदयपस्य वात्मानः । स्व 
सपर्शाः कादयो व्यञ्जनानि 
मृत्योराटमानः । 

तमेवंविदयुद्रातारं यदि 
कश्चित्स्वरेषुपालभेत स्वस्त्वया 


` दुष्टः प्रयुक्त इत्येवयुपारन्ध 


इन्द्रं प्राणमीश्वरं शरणमाश्रयं 
्रप्नोऽभूवं स्वरानपरयुञ्ञानोऽदं 
सं इन्द्रो यत्तव वक्तव्यं त्वा तां 
प्रति वक्ष्यति स एव देव उत्तरं 


दास्यतीत्येनं ब्रुयात्‌ ॥ २ ॥ 


अकारादि सम्पूणं स्वर, वरु ही 
जिसका कर्म है उस इन्द्र॒ यानी 
पराणके आत्मा अर्थात्‌ देह देदावयव- 
स्थानीय दहै। शषस दह अदि 
समस्त उष्मवणं प्रनापतिके अर्त्‌ 
विराट्‌ या करयपके आसि है| क 
आदि ( कव्गसे लेकर पवर्ग॑तक ) 
सम्पू स्यशंबणं यानी व्थन्जन्‌ 
मूलके आलकि दै । 

इस प्रकार जाननेवारे उद्गाताको 
यदि कोई पुरूष स्वरम उपाटम्भ 
दे तूने दोषयुक्त स्वरका भरयोग 
किया दै'-इस प्रकार उपारूम्भ 
दिये जानेपरं वह उसे यह उत्तर दे 


कि स्वरौका प्रयोग करते समय 


चं इन्द्र अर्थात्‌ प्राणूप ईदवरके 
शरणागत--आभ्रित था; अतः तुस 
जो कुछ उत्तर देना होगा, बह 
इन्दरदेव दी देगा ॥ ३ ॥ 


( ५, 
[` 


र < 


२१२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्याय \ 
अथ यद्येनमूष्मसूपाखभेत पजापतिश्शरणं परए 
न्नोऽभूवं स खा प्रति पेश्ष्यतीस्येनं ब्रूयादथ यदेनश्स्फं 
पृपालभेत सल्यु<शरणं प्रपन्नोऽभूवं स स्वा पति धष 
तीत्येनं व्रूयात्‌ ॥ ४ ॥ 
ओर यदि को$ इसे उप्मवर्णोकि उचचारणमे दोष प्रदरित करे ते 
उससे कटे कि ^ पनापतिके शरणागत था, वही तेरा मर्दन करेगा ॥ 
ओर यदि कोई इसे स्यशेकि उचारणमे उलाहना दे तो उससे कटे कि 
भे मकौ रणको प्राप्त था, वही तञ्च दग करेगा ॥ ४॥ 
अथ यदयेनमृष्मसु तथेवोपा- | ओर यदि उसी प्रकार को$ पुल 
लभेत प्रजापतिं शरणं परपन्नो- | इसे ऊप्वर्णोकि उच्चारण दौ 
ऽभूवं स त्वा त्वां प्रति पेकष्यति | प्रदसित करे तो वह उपे कर. 6 


वि | भिं प्रनापतिकी शरणको प्रा थ, 
सचणयिष्यतीत्यनं ब्रूयात्‌ | अथ वही तुञ्ञ पीसेगा अर्थात्‌ [तेरे मदं 


यथैनं ॒स्परेपूपालभेत मुल्यं अच्छी तरह चूं करेगा ॥ भै | 
प्रपन्नोऽभूवं स त्वा लां | यदि को$ इसे स्पश्ेकि उचा्णै । 
रणं प्रपन्नोऽभूवं स॒त्वा त्वां > 
र व उलाहना दे तो उससे के कि (| 
प्रात धक्ष्यति भस्मीकरिष्यती- के शरणागत था, बही दे 
त्येनं ब्रूयात्‌ ॥ ४ ॥ दग्ध यानी भस्मीभूत करेगा" ॥४॥ 
"2, 


वणोके उचारणकालमें चिन्तनीय | 

सर्व स्वरा घोषवन्तो बर्वन्तो वक्तव्या इन्द्रे बटं ददा ` 
नीति सवं ऊम्माणोऽयस्ता अनिरस्ता विच्रता वक्तव्याः 

परजापतरात्मात्मानं परिददानीति स्पे स्पर्शा लेरोनानभि- 
निहिता वक्तव्या सत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥ 


समप स्वर वोषयुक्त ओर बख्युक्तं उच्वारण किये जाने चाहिये; 
भतः [ उनका उचारण करते समय ] र्व इन्दं वलकरा आधान कल! 


णड | १९ ~ शाङ्करभाष्याथे 


२१३ 
४ - 


[निरत करना चये ]। सारे उप्मवणं प्रस्त, अनिर्त एव 
विवरतरूपसे उचारण किये नाते है [ अतः उन बोकते समय एेसा चिन्तन 


करना चाहिये कि] 


र परजापतिको आतदान कर । समस्त स्पशेवर्णो को 


एक दूरेसे तनिक भी मिखये बिना दी बोख्ना चाहिये जौर उस समय 


च मृलयुसे अपना परिहार करू" [ 

यत इन्द्रा्यात्मानः स्वराद्‌- 
योऽत; स्वै खग घोषवन्तो 
बलवन्तो वक्तव्याः । तथाह- 
मिन्द्र बकं ददानि बरमाद 
धानीति । तथा सवं उस्मा- 
णोऽस्ता अन्तरपरवेशिता अनि- 
रस्ता बहिरप्रकि्षा विवृता 
विढ़ृतप्रयत्नोपेताः प्रजापतेरा- 
त्मानं परिददानि प्रयच्छा- 
नीति । स्वे स्पा ठेशेन 
शनकैरनमिनिदिता अनमिनि- 
क्षक्ष वक्तव्या भरत्योरात्मानं 
बालानिव शनकैः परिदरद्धि- 
त्योरात्मानं परिहराणीति । | 


ठेसा चिन्तन करना चाहिये ॥ ५ ॥ 


क्योकि ये स्वरादि इन्द्ादिूप दै, 
अतः सम्पूणं स्वर॒षोषयुक्त ओर 
बलयुक्तं बोले जाने चाहिये । तथा 
[ उस्र समय ] भे इन्द्रम बल्का 
आधान करू णसा [ चिन्तन करना 
चादिये) । इसी प्रकार समस्त ऊष्म- 
वर्णं अप्रस्त- भीतर बिना प्रवेश 
कराये हुए, अनिरस्त-- बाहर बिना 
निकले हए, ओर विशृत विवृत 
प्रयलसे युक्त उच्चारण किये जने 
चाहिये ओर [उनका उचारण करते 
समये] भै प्रनापतिको आत्मदान कल 
ठेसा [चिन्तन करना चाये] । तथा 
समप स्पश॑वणं लेशमात्र थोड़े से 
भी अनभिनिदित-परस्पर बिना" मिले. 
हुए बोरने चादिये ओर [उस्‌ समय यह्‌ 
चिन्तन करना चाहिये कि] जिस प्रकार 
लोग धीरे-धीरे बार्कोको नर आदि 
से बचाते है उसी प्रकर मँ अपनेको 
धीरे-धीरे स्यसे हयं ॥ ५॥ 


=: © २० 
इतिच्छान्दोम्योपनिषदि द्वितीयाध्याये 
द्वाविंशखण्डमाष्यं सम्पणम्‌॥ २२ ॥ 
न्क 


५. वर्णोके स्पृष्ट, ईषल््ष्ट, 


इसमे स्वर ओर ऊर्मोका विड़त्‌, स्पर्शोका स्प 


हृस्व अवणंका संहृत भ्रयलन रोता ई । 


विवृत ओर संत ये लस प जोत 3 चज हते । होते हं ॥ 


अन्तःस्थोका, दष्सयष्ट ओर 
-" ४ 0. 





पः 
[3 


च थोकिक्रिः रह 





तीन षर्मस्कन्ष 


ओङ्ारस्योपासनविष्यथं त्रयो 
धर्मस्कन्धा हत्याद्यारम्यते । 


ओङ्कारोपासनाफा विधान एन 

४3 
स्थि श्रयो धर्मस्कन्धाः इता 
प्करणका आरम्भ किया जता है 


नैवं मन्तव्यं सामावयवभूतस्ये- एसा नहीं मानना चाहिये ङि एक- 


वोदवीधादिरक्षणस्वोङ्कारस्योपा- 
सनात्फल प्राप्यत इति । किं 
तहिं ? यत्सरपि सामोपासनैः 
कमेमिधाप्राप्यं तत्फलममूृतत्व 
केवलादोङ्कारोपासनात्माप्यत 
इति । तत्सतुत्यथं सामप्रकरणे 
तदुषन्यासः- 


मात्र सामके अवयवमूत उदूगीथादि- 
रूप मङ्कार ही उपासनसे रकी 
परति होती षै । तो फिक्य 

बात है ? एेसा प्रभ होनेपर कहते 
है-] जो सभी सामोपासनाभों भौर 
कमेसि मी अप्राप्य है, वह अमृत. 
त्वरूप फर केवर ओ्कारोपसनते 
दी प्राप्तो जाता है । अतः उसकी 
स्तुतिके स्यि घामोपास्तनके भकरणमे 
उसका उच्छ किया जाता £-- ` 


जयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः 
स्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचारय्कखवासी तृतोयो- 


ऽत्यर 


ऽवसादयन्सवं एते पुण्य- 


लोका भवन्ति बह्मस< स्थोऽम्तव्वमेति ॥ १ ॥ 


घर्मके तीन स्कन्ध (आघारस्तम्भ) ह यज्ञ अध्ययन ओर दन-- 
ह पसा स्कन्प दै । तप ही दूसरा न्प दै । भाचायंकुलमे रहनेवाली 


शण्ड २३ | 
>> 


हाङ्करभाष्याय 


> 2 3 9 > ॐ ॐ = > > ॐ 5 ॐ ॐ = = = > ॐ 4 


व २१५. 


# ॐ. ॐ ॐ ॐ ॐ 9 
हमचारी जो आचारथकुल्मे अपने शरीरको अयन्त क्षीण कर देता हे 
तीसरा स्कन्ध हे । ये सभी पुण्यलोकके भागी, होते है । ह्मे सम्यक्‌ 
भ्रकारसे स्थित [चलु्थश्रमी संन्यासी] अतत्वको प्रा होता दै॥ १॥ 


त्रयच्िसंख्याका धर्मस्य 


स्कन्धा धर्मस्कन्धा धर्मप्रवि- 


भागा इत्यर्थः । के ते ! 
इत्याई-यज्ञोऽगनिदोत्रादिः । 
अध्ययनं सनियमस्य ऋछगादे- 
रभ्यासः । दानं बहिर्वेदि यथा- 
शक्तिद्रव्यसंविभागो भिक्षमा- 
जेभ्यः । इत्येष प्रथमो धर्म- 
स्कन्धः । गृहस्थसमवेतत्वात्त 
निर्व्तकेन गृहस्थेन निर्दिर्यते। 
प्रथम एक इत्यर्थो दितीय- 
ठतीयभवणाा्याथः 


तप एव द्वितीयस्तप इति 


| कृच्छुचान्द्रायणादि तद्वास्ता- 


पसः परिवद्‌ वा न त्रहमसंस्थ 
आश्रमधर्ममात्रसंस्थो बहम- 
संस्थस्य त्वमृतत्वश्रवणात्‌ । 


द्वितीयो धर्मस्कन्धः । 


धर्मस्कन्ध--ध्मके स्कन्ध यानी 
धर्मके विभाग त्रयः अर्थात्‌ तीन 
संख्यावले है “वे कोन-से है १ इस- 
पर कहते है, यज्ञ--भग्नहोत्रादि, 
अध्ययन-नियमपू्वंक ऋ्वेदादिका 
अभ्यास ओर दान- वेदौके बाहर 
भिक्षा मोगनेवार्छोको यथाशक्ति धन 
देना-दस प्रकार यह पहला धर्मस्कन्ध 
दे । यह धर्म गृहस्यघमेसम्बन्धी होनेके 
कारण उसके साधक गृहस्थरूपसे 
उसका निर्दश किया जाता हं । यहा 
श्रथम' शब्दका अर्थं एकं दै, श्रतिमे 
द्वितीय, तृतीय! शब्द होनें इसका 


प्रयोग आद्य अर्थम नहीं किया गया । 


तप ही दूसरा षर्मस्कन्ध है । 
(तप, इस शब्दसे इच्छरचान्द्रायणादि 
समक्षने चादिये, उनसे युक्तं तपस्वी 
या परि्राजक, ब्रह्मनिष्ठ नहीं बस्कि 
लो केवरु आश्रमधर्म दी स्थित 
ह; क्योकि श्रुतिने त्रहषनिष्ठके स्थि 
तो अमृततवकी प्राति बतायी हे । 


अह दूसरा षर्म्छन्ध दे 


२१६ 


छान्दौग्टोपनिचद्‌ 


[ मध्याय ९ 


ऋ < > 3 >+ ऋऋ जत 


ब्रहमचार्याचायङुले 
शीलमस्येत्याचाय॑ङ्लवासी 


वस्तुं 


अत्यन्तं यावज्ञीवमात्मानं निय- | 


मेराचायङरऽवसादयन्क्षपयन्देहं 
तृतीयो धमंस्कन्धः । अत्यन्त- 
मित्यादिविशेषणान्नैष्टिक इति 
गम्यते। उपकुर्बाणस्य स्वाध्या- 


¢ ¢ 
यग्रहणाथत्वान्न पुण्यरोकत्वं. 


ब्रह्मचर्येण । 


सवं एते त्रयोऽप्याश्रमिणो 
यथोक्तधरेः पुण्यलोका भवन्ति। 
पण्यो लोको येषां त इमे 
पुण्यलोका आश्रमिणो भवन्ति। 
 अवरिष्स्त्वनुक्तः परिवाड नह्म- 
संस्थो त्रकणि सम्यकूर्थितः 
सोऽतत्वं पुण्यलोकबिलक्षण- 
ममरणभावमात्यन्तिकमेति ना- 
पेक्षिकं देवा ृतत्ववत्‌; पुण्य- 
लोकात्‌ एथगमृतत्वस्य विभा- 
गकरणात्‌ । 


निसका स्वभाव आचा 


| | निवास करनेका हे, वह चाक 


वासी ब्रह्मचारी, जो कि अत 
अर्थात्‌ यावज्ञीवन अपनेको नो 
द्वारा आचाय॑कुल्म ह अवसन्न कप 
रहता दै, यानी अपने देहके की 
करता रहता दै, तीसरा धमय 
हे । “अल्यम्तम्‌' इत्यादि विरोषणो 
यह्‌ जाना जाता है कि यहो नैकि 
्रह्मचारी अभिप्रेत है, करयो उप 
कुर्वाण ब्रह्मचारीका बरह्मच स्वाध्याय 
के स्यि होनेसे उसके द्वारा पृण 
रोककी प्राप्ति नहीं हो सकती । 


ये सभी अर्थात्‌ तीनों भारम 
उपर्युक्त घमेकि कारण पुण्यलोकं 
मागी होते है । जिन पुण्यलोकं 
माप्त हो पेसे ये आश्रमी पुण्ये 
कहरते दै । इनसे बचा हुआ, निक 
यहाँ उल्टेख नहीं किया गया, वह 
चतुथं परिनाजकं बरहमसंस्य तरह 


सम्यक्‌ प्रकारसे स्थित होकर शरः 


ठत्वको- पुण्यरोकोंसे भिन्न भालः 
न्तिक अमरणभावको प्रप्त हो जता 
हे, देवादिकोंके अमरलके समात्‌ 
उसका अमृतत्व आपिक्षिक नदीं होता; 


वरयामि यहां पुण्यरोकसे अमृतत्व 


प्रथक्‌ विभाग किया गया दै । 


शण्ड २३ | 


शाङ्करमाष्याथ 


२१७ 


यदि च पुण्यकोकातिशय- | 
अधिकृता ) ही अमृतत्व होता तो 


मात्रमख्तत्वमभविष्यत्ततःपुण्य- 
लोकत्वाद्विभक्तं नावक्ष्यत्‌ । 


विभक्तोपदेशाचात्यन्तिकमम्त- 
त्वमिति गम्यते । 


अत्र॒ चाधरमधर्मफलोपन्यासः 
प्रणवसेबास्तुत्यथं न तत्फरुबि- 
धयर्थम्‌ । स्तुतये च प्रणवसेवाया 
आश्रमधर्मफलविधये चेति दि 
भिद्येत वाक्यम्‌ । तस्मात्स्यृति- 
सिद्धाश्रमफलाडुवादेन प्रणवसे- 
बाफलमभ्रतत्वं॒ब्रुन््रणवसेवां 
स्तौति । यथा पूणंवमंणः सेवा 


भक्तपरिधानमात्रफला राजवमे- 
णस्तु सेवा राज्यतुल्यफठेति 
तदत्‌ । 


तसप्रतीकत्वात्‌। 


‹(एतद्धयेबाक्षरं ` 


यदि पुण्यलोकका अतिशयमात्र 


पुण्यरोकरूप ही होनेके कारण ईइस- 
का उससे पथक्‌ वणन न करिया जाता। 
अतः प्रथक्‌ उपदेश किया जानेके 
कारण यँ आ्यन्तिकि अमृतत्व ही 
अभिप्रेत दै-रेसा जाना जाता हे । 


यहां जो आश्रमधममेकि फरका 
उल्टेख किया दै, वह प्रणवोपासना- 
की स्तुतिके स्थि दही दै, उनके 
फठो्ा विधान करनेके स्यि नहीं 
ह । परंतु यदि यह कहा जाय किं 
“यह वाक्य प्रणवसेवाकी स्तुतिके स्यि 
ओर आश्रमधर्मके फर्का विधान 
करनेके ल्यि भी दै, तो वाक्यमेद्‌ 
हो जायगा । अतः यह्‌ मनर स्मृति- 
प्रतिपादित आश्रमफरुके अनुवाद्‌- 
द्वारा श्रणवसेवाका फक अमृतत्व हैः 
यह बतलाता हुआ प्रणवोपासनाकी 
ही स्तुति करता है । जिस प्रकार 
[ कोर कटे & ] पूणेवर्माकी सेवा 
मोजन-वस््रमात्र फर देनेवारी 
ओर राजवर्माकी सेवा राज्यके 
समान शक देनेवाटी दै । उसी 


प्रणवश्च तत्सत्यं परं ब्रह्म | ११ यँ समज्ञना चाहिये । 


प्रणव ही वह सत्थ प्रत्रह्म. 8 
बयोकि यह उसका परतीकं है । 


२१८ छान्दोग्योपनिषद्‌ = - 


[ अभ्याय २ 


ऋ 4 ल 9 8 > 6 9 - 9 9-0-8८ 2 ऋज 


ब्रह्म, एतद्र येवाक्षरं परम्‌"(क० 


उ० १।२।१६) 


म्नायात्काठके युक्तं तत्सेवातो- 


ऽमृतत्वम्‌ । 


अत्राहुः केचिचतर्णामाभ्रमि- 
णामविरेषेण स्वकर्मा 


परमतोप- 


चुष्ठानाप्पुण्यलोकतेहो- 


न्यास 
क्ता ज्ञानवर्जितानां 
सवं एते पुण्यलोका भवन्तीति । 


नात्र परिव्राडवशेपितः । परि. 


त्राजकस्यापि ज्ञानं यमा नियमा 


तप एवेति (तप एव दवितीयः" 


इत्यत्र॒ तपःशब्देन परिराट्‌- 
तापसो गृहीतौ । अतस्तेपामेवे 


चतुर्णा यो बक्मसंस्थः प्रणव- 
9 सोऽग्ृतत्वमेतीति; चतु- 
मधिकृतत्वाविशेषाद्‌ ब्रहमस्‌- 
सथत्वेऽप्रतिेधाच। स्वकर्मच्चदि 


पत्तः 


च बदमसस्थतायां साम््योपि- 
| | 


कटोपनिषदूर्मे “यह अक्षर ही ऋ 
दै, यह अक्षर ही ए दै” इत्यादि 
भ्रति होनेसे उसको सेवाद्रार 
अमृत्त्वकी प्रापि होना उचित 
ही दहै। 

वरह कुछ रोग पसा कहते है कि 
इस मन्त्रम ये सभी पुण्यलोकके भागी 
होते है" इस वाक्यद्रारा ज्ञानरदित 
चारो ही आश्रमिर्योको समानरूपे 
अपने-अपने धर्मोफा पाटन करनेसे 
पुप्यलोश्की प्रापि बतलायी गयी है। 
इनमे परित्राजकको भी छोड़ा नहीं टै। 
परिदाजकके भी ज्ञान, यम ओर 
निवम-ये तप ही दै, अतः तप दी 
दूसरा षर्मस्कन्ध टै रस वाक्यम 
"तप शब्दस परिनाजक ओर वान- 
रस्य दोनोंका महण किया गया द। 
अतः उन ॒चारोंहीम जो रह्मन 
पणवोपासक होता हे,वही अमृतलको 
प्राप्त हो जाता है, क्योकि इन चार 
ही अधिकार समान है ओर 


नरहमनिष्ठामे भी किसीका प्रतिषेध नहीं 
ङ्य गया, क्यो्धि  अपने-मपते 


| कमेक अनुानसे अवक मिलन 
पर सभीको ब्रहम स्थित होनेका 


सामथ्यं होना सम्भव हे | 


शण्ड २३] 


शा्करमाष्याथं 


२१९ 


~ -9- 9-8-9८ ~ > 3 ४ 9 9 9 8-9-89 9 3 -9  - -- 


न च यववरादादिश्चब्दबद्‌त्र- | इसके सिवा “यव' ओर वराद! आदि 


ह्वसंस्थब्दः परिव्राजके रूढः, 
ब्रह्मणि संस्थितिनिमित्तयुपादाय 
्रबृत्तसवात्‌ । न दि रूदिशब्दा 
निमित्तश्पाददते । सर्वेषां च 
अह्मणि स्थितिरूपपद्यते । यत्र 
यत्र॒ निमित्तमस्ति ब्रह्मणि 
संस्थितिस्तस्य तस्य निमित्त 
वतो वाचक सन्तं ब्रह्मसंस्थ- 
शब्दं परि्राडेकविषये संकोचे 
कारणाभावान्निरोदधुमयुक्तम्‌ । 
न॒ च पाखिाञ्याश्रमधरम- 
मत्रेणाग्तत्वम्‌, ज्ञानानथंक्य- 
प्रसङ्कात्‌ । 


पारिवराज्यधर्मयुक्तमेव न्ञान- 
ममृतत्वसाधनमिति 
आश्रमधर्मत्वाविरेषात्‌ । धमां 


वा ज्ञानविरिष्टोऽमतत्वसा- 


धनमित्येतदपि सर्वाभ्रमधममा- 


चेन 9 


शव्दोके समान ्॒रक्षसंस्थ' शब्द 
परिव्राजके ही रूढ भी नही है, 
क्योकि यह तो त्र्ममे स्थितिूप 
निमिक्तको लेकर दी प्रवृत्त हुआ है । 
खूढ शब्द्‌ किसी निमित्तको स्वीकार 
नहीं करते । ओर त्ह्ममे सभीकी 
स्थिति होनी सम्भव दै । अतः जरह 
जौँ मी ब्रह्मे स्थितिषूप निमित्त 
है उसी-उसी निमित्तवानका वाचक 
होनेसे ्ऋह्संस्थ शब्द केवर परि- 
नारका दी वाचक है-देसे संकोच- 
का कोई कारण न होनेसे उसे उसी 
अर्थम निरुद्ध करना उचित नहीं दै । 
इसके सिवा पारितराज्य ( संन्यास ) 
आश्रमधर्ममात्रसे भी अमृतत्व 
राप होना सम्भव नहीं दै, क्योकि 
इससे ज्ञानकी निरथकताका प्रसङ्ग 
उपस्थित हो नाता दै । 


य॒दि कहो कि पास््ाज्यरमसदित 
ही ज्ञान अग्ृतत्वका साधन है, तोेसा 
कहना ठीक नहीं, वयोकि आश्रमधमे- 
तत्त्वम अन्य आश्रमोके धमेसि उसमें 
कोई विरोषता नहीं हे । मथवा यदिरयो 
कहो कि ज्ञानविरिष्ट धमं दी अमृततव- 
का साधन दै तोयह नियम भी समस्त 


| ~ 
~~. - 


२९० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्याय २ 


> ~ ८ 3८ ब ट 3 < ९ ऋ >< >< ऋ 3 ~ ट 
णामविरिष्टम्‌ । न च वचन- | आश्रमधमेकि ल्ि एक-पा है। एष 


मस्ति परखिाजकस्येव ब्रह 
संस्थस्य मोक्षो नान्येषामिति । 
शानान्मोक्ष इति च सर्ोपि- 
निषदां सिद्धान्तः । तस्माद्य एव 
ब्रह्मसंस्थः स्वाश्रमविदितकमं- 
वतां सोऽमृतत्वमेतीति । 


न; कमेनिमित्तविघयाप्रत्यय- 
यो्विरोधात्‌ । क्रा 
इस दिकारकक्रियाफ़ल- 
भेदप्रत्ययवचवं हि 
नमत्तयुपादायेद्‌ विदं मा 
कार्षीरिति कमविधयः प्रवृत्ताः । 


तच्च निमित्तं न शाखकृतम्‌, 


सवप्राणिषु दनात्‌ । ८स्‌ 
एकमेवादितीयम्‌'' ( छा इ० 
९।२।१ ) आ्मेेदं सर्वम्‌” 
(ख ०० ७।२५।२) “व्ह 
वेदं सवम्‌” (ृसिंहो ° उ० ७) 
इत शाच्रजन्यत्रत्ययो विद्या- 

स्वाभाविक क्रयाकारकः 
फरमेदपरत्ययं कमेविधिनिमित्- 


कोई शासवाक्य भी नहीं हैकिष्क 


मात्र ब्रह्मनिष्ठ संन्यासीको ही मेक्षप्ा 
हो सकता है, ओको नहीं । ज्ञाने 


मोक्ष होता है--यही सम्पूणं उप 
निष्दोका सिद्धान्त हे । अतः अपने 


अपने आश्रमधमका पान करने- 
वाखमे जो कोई भी ब्रह्मनिष्ठ हेग 
वही अमृतत्वको प्राप्त होगा । 


सिद्धान्ती-पेसा नहीं हो सकता, 
षयोकि क्म॑के निमित्तभूत प्रयय ओर 
ज्ञानोखादक प्रयये परस्पर विरोध 
है । कर्ता जादि कारक, करिया जर 
फलके भेदसे युक्त होनाषप निमितत- 
को लेकर हौ यह करोः ओर ह 
मत करोः इस प्रकार कर्मविधिं 
वृत्त होती हैँ । ओर वह निमित 
शासका किया हुआ नहीं है, क्यो 
वह सभी प्राणिर्योमे देखा नाता 
है । “एक ही अद्भितीय सत्‌ है" 
“यह सब आत्मा ही दहै ८यह सव 
नह € है” यह जो शाखजनित 
विरूप प्रत्यय दै, वह्‌ कर्मनिमित्तं 
स्वाभाविक क्रिया, कारक ओर पर 
मेदरूप पत्ययो नष्ट क्ये विना ` 


खण्ड २३ ] 


शाङ्करमाष्याथे 


२२१ 


~ -->& < ऋ < € < < < ऋ ऋ < < = = क = 3 


मनुषमृद्य न॒ जायते भेदाभेद- 
्रत्ययोविरोधात्‌ । न हि तेमि- 
रिकद्विचन्द्रादिमेदग्रत्ययमनुप- 
मृश्च तिमिरापगमे चन्द्रा्येकत्व- 
प्रत्यय उपजायते, वियाविद्या- 
प्रत्यययोविरोधात्‌ । 
तत्रैवं सति यं भेदप्रत्यययुपा- 
दाय कमंबिधयः 
परित्राज एव 
प्रदत्ताः स यस्यो- 
ब्रह्मसंस्थत्वम्‌ 
पमर्दितः ““सद्‌''" 
एकमेवादि तीयम्‌'' ( ० उ° 
६ ।२।१ 
उ० ६ । ८। ७ ) ““विकारभे- 
दोऽनृतम्‌'” इत्येतद्वाक्यप्रमाण्‌- 
जनितेनैकलप्रत्ययेन स॒सर्व- 
कर्मभ्यो निवृत्तो निमित्त निषत्ते 
स च निव्रत्तकमां ब्रह्मसंस्थ 
उच्यते सं च परि्राडवान्यस्या- 
संभवात्‌ । 


अन्यो द्यनिवृत्तमेदप्रत्ययः 


सोऽन्यत्पशयज्धृण्वन्मन्धानो वि 


उत्पन्न नदीं होता, क्योकि मेद 
जोर भमेद प्रत्ययो परस्पर विरोध 
हे। तिमिररोगके नष्ट होनेपर तिमिर्‌- 
रोगजनित द्विचन्द्रद्ेनादि भेद- 
पर्ययका नारा हुए विना चन्द्ादिके 
एकत्वकी प्रतीति भी नदी होती, 
क्योकि ज्ञान ओर अज्ञानकी 
प्रतीति्ोमिं परस्पर विरोध है । 
एेसी अवस्था; जिस मेद- 
्रतीतिको स्वीकार कर कम॑विधियां 
वृत्त हुई है,वह मेदप्तीति जिसकी 
“एक्‌ ही अद्वितीय सत्‌ दै” “वही 
सत्य दै” “विकारखूप मेद मिथ्या 
है इत्यादि वाक्यप्रमाणजनित एक- 
लवमरतीतिकै द्वारा नष्ट हो गयी दै, 
वही कर्मदिधिके निमित्तकी निवृति 
हो जनेसे सम्पूणं कमेसि निदत्त हो 
जाता है, वह कर्मासि निवृत्त हुआ 
पर्प ही त्रहमसंस्य कहा नाता है 
जर वह परिाजक ही हो सकता 
है, क्योकि दूसरेके स्थि एसा होना 
असम्भव हे । 
उतसे भिन्न॒ जिसक्ती मेदप्रतीति 
नित नहौ इई दै, वह अन्य 
पदार्थको देखता, सुनता, मानता 
ओर जानता हआ "देसा करके इसे 


जानमिदं कृतेदं ्राप्डुयामिति | भर कृशा" यह मानता है । पसा 
हि मन्यते । तस्यैवं इव॑तो न ` केवले उस पुरुषको ब्रहमनि्टता 


२२२्‌ 


छान्दोम्योपनिषद्‌ 


[ सण्यायरे 


ऋ > 99 > 9 9 9 > > 9-968-9८ क >3--8--- >> 


ब्रहसस्थता । वाचारम्भणमात्र- 
विकारानृताभिसंधिग्रत्ययव्वा- 


त्‌। न चासत्यमित्युपमर्दिते 
भेदग्रत्यये सत्यमिदमनेन कर्त. 
व्यं मयेति प्रमाणप्रमेयबुद्धिरुप- 
पद्यते । आकरा इव तलमल- 
बुद्धिर्विवेकिनः । 


उपमर्दितेऽपि भेदप्रत्यये करम॑- 
भ्यो न निवतते चेतपरागिव भेद- 
्रत्ययोपमद॑नादेकत्वप्रत्ययविधा- 
यकं बाक्यमप्रमाणीकृतं स्यात्‌ । 
अभक्ष्यभक्षणादिप्रतिषेधवाक्या- 
नां प्रामाण्यवच्रुक्तमेकत्ववाक्य- 
स्यापि भ्रामाण्यम्‌;सर्वोपनिषदां 


तत्परत्वात्‌ । 


©^ 
कमविधोनामप्रामा- 
कमविधीन।म- 


ण्यप्रसङ्गइति चेत्‌ ? 


प्रामाग्यनिरसनम्‌ 


न; अनुपमर्दितभेदप्रत्ययव्‌- 
त्पुरुपविषये प्रामाण्योपपत्तेः ,स्व- 


आदिप्रत्यय इव माक््रबोधात्‌ । 


नहीं हो सकती, क्योकि वह वाचा. 
रम्भणमात्र विकारमं मिथ्यागिनिवेश्च- 
रूप प्रतीति करनेवाख होता है । यह 
असत्य है-ईस प्रकार मेदपरतीतिके 
बाधित हो जानेपर उसमे "यह्‌ सय 
हे, इससे सुस्े यह कतव्य है' ती 
प्रमाण-प्रमेयरूप वुद्धि होनी सम्भ 
नहीं हे, जिस प्रकार कि विवेकी पुष. 
को आकारा्मे तल्मल्बुद्धि होनी । 

यदि भेदप्रतीतिके नष्ट हो जने 
पर॒ भी बोधवान्‌ पुर्ष मेदज्ञानकर 
निवृत्ति होनेसे पूर्वके समान कमो 
से निवृत्त नकी होता तो वह मानो 
ए कृत्वविधायक वाक्योको अग्रामाः 
णिक सिद्ध करता है । अभक्षयमक्ष- 
णका प्रतिषेध करनेवाले वाक्यो 
परामाणिकताके समान एकलप्रति 
पादक ॒वाक्यकी प्रामाणिकता, मी 
उचित हौ है; करयोक्रि सम्पूण उपः 
निषदं उसीका प्रतिपादन कर 
त्त्पर है 


४५ 


। 
पूव ०-इस प्रकार तो कर्मविषिर्ोकी 


अप्रामाणिकताका प्रसंग उपस्थित 
हो जायगा । 
सिद्धान्ती-नदी, निस पुरपकरा 


मेदज्ञान निवृत्त नहीं हुआ दै उपकर 
सम्बन्धमे उनकी प्रामाणिकता हे 
सकती हे, जिस प्रकार कि जागने- 


से पूवं॒स्वादिका ज्ञान प्रामाणिक 
माना जाल है । 


खण्ड २३ | धाङ्करभाष्याथं २२३ 
3८-9८-98 3-6-88 4-9-39 9 क क > = = 


विवेकिनामकरणात्कमंविधि- | पूवं ० कितु विवेकियेकि न 
तो कर्मविधिकी प्रमाणताका 
प्रामाण्योच्छेद इति चेत्‌ १ करनेस 
प उच्छेद मानना ही होगा । 
न,काम्यविष्युच्छेदददोनात्‌ सिद्धान्ती-न्ही, क्योकि काम्य- 
हि प विधिका उच्छेद होता देखा नहीं 
न हि कामात्मता न प्रशस्तेत्यवं | गया । '्तकरामता अच्छी नही है 
विज्ञानवद्धिः काम्यानि कर्माणि | रेसा निन्द ज्ञान हो गया है उन 
नानु्ठीयन्त इति काम्यकम॑मिधय| परणोारा काम्यकमे नहीं किये नत, 
स # | अतः काम्यकर्मोकी विधियोँका उच्छेद्‌ 
उच्छिद्यन्तेऽनुष्ठीयन्त एव कामि- | हो गया हो -रेसी वात देखनेमं 
भिरिति । तथा बरह्मसं्ै्हमयि- | नदी आती; बच्कि [ उस समय भी 
व रः सकाम पूरर्षोदरारा उनका अनुष्ठान 
द्िनाुर्ठ कर्माणीति न | [रिया ही लाता है । इसी प्रकार 
यदि ब्रह्मनिष्ठ ब्रहमवे्ताभोद्रारा करमोका 
तद्विधय उच्छ्िन्तेऽ्मविद्धिर- | अनुष्ठान नदी शरा जता तो इससे 
एतेति उनकी विधिकरा ही उच्छेद नहीं हो 
नु्ठीयन्त एवेति । जाता । जो ब्रहम नही है उनके ` 
द्वारा उनका भनुष्ठान क्रिया दी 
जाता हे । 
परिव्राजकानां भिक्षाचरणा- | पूर्व०-जिस प्रकार संन्यासीरोग 
दिवदुत्पन्नकत्वप्रत्ययानामपि मिक्षाटन करते है उसी प्रकार जिन्दं 
ोवरादिकरम एकलज्ञान उन्न हो गया है उन 
गृहस्थादीनामबिदत्रादिकर्मा- | गृहस्थोकि भी भमहोतरादि कोरी 
निदृत्तिरिति चेत्‌ ? निति नही होनी चाहिये, यदि 
एेसी शहा हो तो £ 
नः; प्रामाण्यचिन्तायां पुरुष- सिद्धान्ती -नही क्योकि भ्रमाणता- 
| का विचार करने्मे पुरुपकी भरदृत्ति 
्रृत्तरदृष्टान्तत्वात्‌ । न हि | दृष्टन्तरूप नहीं हो सकती । 


२९७ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्याय ९ 


नाभिचरेदिति प्रतिषिद्धमप्यभि- 
चरणं कशचि्युवन्दृष्ट इति श्रौ 
देषरहितेनापि विवेकिनाभि- 
चरणं क्रियते । न च कर्मविधि- 
प्रवृत्तिनिमित्ते भेदप्रत्यये बाधि- 
तेऽपनिहोत्रादो प्रबतंकं निमित्त 
मस्ति । परिवाजकस्येव भिक्षा- 
चरणादो बुक्षादि प्रवतंकम्‌ । 
इदहाप्यकरणे प्रत्यवायभयं 
¢ (~ (~ 

प्रवतेकमिति चेत्‌ १ 
न, भेदग्रत्ययवतोऽधिषृत- 
त्वात्‌ । भेद्रत्ययवानुपमदित- 
भदबुद्धिरवि्या यः स॒ कर्मण्य 
धिकृत इत्यवोचाम । यो ्धि- 
कृतः कर्मणि तस्य तदकरणे 


भ्रत्यवायोन निदृत्ताधिकारस्य, 


> 9-3-99 
अभिचार न करे" इस प्रकार प्री. 
षिद्ध होनेपर भी क्रसीको अमिचाः 
करते देला है-तनेहीसे निर्न 
रादुके मति द्वेषभाव भी नहीं है क 
विवेकी पुरुष- भी अभिचार फे 
ल्गे-- यह सम्भव नहीं है। ही 
प्रकार कर्मविधिकी प्रवृततिके निमि 
भूत मेदप्रत्ययका बोध हो ननेफ 
बोधवान्‌ पुरुषको अग्निहोत्रादि कम॑ 
रवतत करनेवाला कोद निमित्त नहीं 
है, जिस प्रकार कि संन्यासीको 
भिक्षाटनादिम प्रवृत्त करनेवाला 
्वुधादिरूप निमित्त है । 

पूं ० यहाँ भी नित्यकं न केः 
पर प्रत्यवाय होनेका भय ही प्रषृत | 
करनेवाला दै-यदि पेता मान ग! 

सिन्द्राती-नही, कोक कर्मः 
ुष्ठानका अधिकारी मेदज्ञनी ही दै। 
जिसकी मेदवुद्धि ज्ञाने नष्ट नी 
हुई है वह॒ भेदज्ञानी ही कमक 
अधिकारी है- पसा हम पदले कट 
चुके है । इस प्रकार जो कमक 
अधिकारी दहै उसे दी उसके न 
करनेप्र प्रत्यवाय हो सकता दै । 


जो उसके मधिकारसे बाहर दै उसे 
भत्यवाय नदी हो सकता, जिस 


खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यं २२५ 
4-४-49 ~ 3 3 >~ 
गृहस्थस्येव ब्रह्मचारिणो विशेष- | प्रकार कि बरह्मचारी विहोष धर्मका 
अनुष्ठान न॒ करनेपर गृहस्थको 

धर्माननुष्ठाने । म्वाय नहीं हो सकता । 


एवं तदं सवे; स्वाश्रमस्थ पूरव° -इस प्रकार तब तो जिसे 
एकत्वका ज्ञान दो गया हे वह कोई 
उत्यननेकलपरत्ययः परिव्राडिति | भी प अपने माश्ममे रहता हुआ 

ही परि्राजकं हो सकता है £ 

चेत्‌ १ 

= 2 सिद्धान्ती- नही, क्योकि उनकी 
न; स्वस्वामितवभेदवुदधथनि- | स्वस्वामिवूप' मेदयुद्धि निच 
वृत्तेः । कर्माथंतवाच्चेतराश्रमा- नहीं होती, क्योकि अन्य मश्नन 
{ क्मनुष्ठानके ही स्यि है; जैसा कि 


णाम्‌; “अथ कमं कुवीय'' (बृ° ८4 स्त्री-पुत्रादिकी परा्तिके ] अनन्तर्‌ 
मै कमै करेगा” इस श्रुतिसे सिद्ध 

उ० १।४। १७) इति श्रुतेः । | होता दै । अतः स्वस्वामिभावका 
अभाव हो जानेसे एकमात्र भिक्षु दी 

त मः पटहो सकता दै, गृहस्थादि जन्य 


„ ` | आश्रमावम्बी नहीं हो सकता । 
एव परिव्राट्‌ ; न गृहस्थादः । 


, = पर्व° -एकत्वकी प्रतीति करनेवाले 
एकत्वप्रस्ययविधिजनितेन प्र | विधिवाक्यसे उतपन्न क्षत्रः 
कर्मविधिनिमित्तक मेदज्ञानके निदत्त 
हो जनेसे तो संन्यासीको यम- 
नियमादिका पार्न करना भी सम्भव 
नही है [ अतः उसका स्वेच्छाचारी 
पत्तिः परित्राजकस्येति चेत्‌ १ | शो जाना बहुत सम्भव हे ]। 


इसका स्वामी ह एेसी अभिङृत-अधिकायीरूप ॥ 


त्ययेन विधिनिमित्तमेदप्रत्यय- 


स्योपमर्दितत्वाद्यमनियमाद्यनुष- 


--- 


नि 
9` य मेरा है ओरर्यै 


पिव [ मष्याष ९ 

न; बुथक्षादिनेकत्वप्रत्ययात्‌ | सिद्धन्ती-देसी वात नहं 

- वर्ोकिं क्षुधा आदिद्वारा एव 

प्रच्यावितस्योपपत्तेनिदृत्यथेत्वात्‌।| प्रयसे च्युत कर दिये जनेष्‌ 

उसके द्वारा अनुचित करमोसे निवृ. 

न च प्रतिषिद्धसेवाप्रापतिः; के ख्य उनका पाटन क्रिया जाना । 
सम्भव है । इसके पिवा उस ॥ 

एकत्व प्रत्ययोत्पत्तेः प्रागेव प्रति- | द्वारा प्रतिषिद्धि कर्मोका सेवन क्रि 

जाना भी सम्भव नहीं है, क्यों 

पिद्धत्वात्‌ । न॒हि रात्रौ करूपे | उनका प्रतिषेष तो वह एकलकञनग् 

। उत्यत्तिसे पूवं ही कर चुकता है। 

कण्टके वा पतित उदितेऽपि | रात्रिके समय कर्णं या किमि गि, 

जनेवाठा पुरूष सूर्योदय होनेष्‌ भी 

सवितरि पतति तस्मिन्नेव । | उन्दीमे नहीं गिर जाता । अतः तद 

होता है कि कर्मोसि निवृत्त हश 

तस्मात्सिद्धं निडत्तकर्मां भिज्ञकं | भिश्चक दी ब्रह्मनिष्ठ हो सकता है| 
तथा यह जो कहा कि सम्पूणं जनः | 

एव ब्रह्मसंस्थ इति । रहित पुरुषको पुण्यलोककी भ्रा 

यतयुनरक्तं सवेषां ्ञानवि- | हीतो दै सो ीक दी दै, पट ध 

तपःशब्देन तानां पुण्यरोकते- | जो कहा कि तप” शब्दसे संन्यासी 
परिज्रा्हणस्य ति, सत्यमेतत्‌ । | का मी कथन है सो ठीक नर्ही। | 
त्याश्यानम्‌ यच्चोक्तं तपःशब्देन देसा क्यों हे £ क्योकि परि्राजक्की | 
परिवाडप्यक्त इति, एतदसत्‌; दी ननित होनी सम्भव ६। 6 | 
कस्मात्‌ ! परि्ाजयसयेव रह वही [पुण्यरोकको प्रास्त हो | 
स्यतासंमवाद्‌ । स॒ एव इव मसे] बच रहा है-ेसा ह्म | 
सेषित तात्‌ । एकलवि- पहले कह चुके है, क्योकि एकत 
इत्यवोचाम रानवतोऽभदोवाि विज्ञानवानका तो अग्निहोत्राविके 

४ समान तप भी निवत्त हो ही जाता 


रेष मदद म एव दि वपः- दे। मेदवुदधिमानमे ही वपी 





ण्डः २३ 1 


हा्रमाष्याथे 


२२७ 


8888-8 8 84 ~ >~ 


तव्यता स्यात्‌ । एतेन करम | कर्तव्यता भी रह सकती ह । इससे 


अन्य आश्रमवार्छोको भी क्सि 


स ढ्‌ ४७ 
च्छद्र बह्मसस्थतासामथ्यम्‌ , | वकारा मिर्नेपर॒त्रहमस्थितिके 


सामर््यका तथा उनके रिय ब्रह्म- 


अम्रतिषेधश्च प्रत्युक्तः । तथा | निष्ठाके जपरतपेषका भी निषेध 


ज्ञानवानेव निवृत्तकमा पणि- 


डिति ज्ञानवैयथ्यं प्रत्युक्तम्‌ । 


यत्पुनरुक्तं यववरादहादिशब्द- 


परिव्राजके ब्रह्म- वत्परिव्राजके न 
संम्यशब्दस्या- रूढो बह्मसंस्थश्ब्द 
श्टत्निरासः इति तत्परिहृतम्‌ । 
तस्यैव बरह्मसंस्थतासंभवाज्ान्य- 
स्येति । 


` यत्पुनरुक्तं रूढश्दा निमितं | करता, 
“रूदिनिमित्तं नो- नोपाददत इति, क्योकि 


पादत्ते इति न्या- तुन्न, गृहस्थतक्ष- 


यस्यानित्यत्वम्‌ पृरिव्राजकादिन्ब्द्‌- | 


द्शेनात्‌ । गृदस्थितिषारिाज्य- 


कर्‌ दिया गया । तथा ज्ञानी ही 
निदृततकरमा पतताट्‌ हो सकता -- 
इससे ज्ञानकी निरथेकताका भी 
खण्डन क्र दिया गया | 
तथाण्सानो काकि यव 
जीर "वराह" आदि शब्दोकि समान 
प्रहमसंस्थ शब्द परि्रालकर्मे रूढ 
नही है उसका भी परिहार कर 
दिया गया, क्योकि उसीकौ ब्रहनिष्ठा 
होनी सम्भव दै,जोर किसीकी नदीं । 
इसके सिवा वादीने ज कडा कि 
रूढ शब्द निमित्तको स्वीकार नदी 
सो रेसी बात नदीं ह, 
गृहस्थ, तक्षा ओर ॒परि- 
त्रानकादि शब्द देखे जाते है । गृहमे 
रहना, पारिन्नाज्य सब डु व्याग कर्‌ 
चरा जाना ओर तक्षण कष्ठ छदन 
आदि निमिरतोको स्वीकार करते 


तक्षणादिनिभितोपादाना अपि हुए भी "गृहस्थः जौर "पलिरजकः 


गृदस्थपरित्राजकावाश्रमिविरेषे 


शब्द्‌ आश्रमिविरोषोमं ओर (तकाः 


विशिष्टजातिमति च तस्ति खूढा | शब्द्‌ जातिविशेषे रूढ देखे जति 
दृश्यन्ते शब्दाः । न॒ यत्र यतर | है । ये गृहस्यादि चन्द बहा नहो 


तानि निमित्तानि वत्र तन्न |वे निमिष है वहीवही ष ` 


. शः उ ८- 








२९८ 


छान्दोग्योपनिषत्‌ 


[ खच्याय २ 


वर्तन्ते; प्रसिद्धयभावात्‌ । तथे- 
हापि ब्रह्मसंस्थशब्दो निदतसव- 
करम॑तत्साधनपरिव्राडेकविषये- 

ऽत्याश्रमिणि परमहंसाख्ये बृत्त 


इह मवितुमहति, शुख्यामृतत्व- 
फलश्रवणात्‌ । 


अतस्चेदमेवेकः वेदोक्तं पारि- 
व्राज्यम्‌। न = 
इति । 


“रण्डोऽपरिग्रहः'' (जाबा ० उ० 
९५ ) ""असङ्कः'" इति च श्रुतिः, 
“अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रम्‌” 
( शवे° उ० ६ ।२१ ) इत्यादि 


कमण्डल्वादिपरिग्रह 


च उवेताशवतरीये। ““निःस्तुति- 
निनेमस्कारः' इत्यादिस्मृति- 
भ्यश्च । ““तस्मात्कमं न वन्ति 
यतयःपारदशिनः । तस्मादलिङ्गो 
धमकतोऽव्यक्तलिङ्गः'' इत्यादि- 
स्मृतिभ्यध्‌ ॥ 


नहीं होते, क्योकि एसी प्रसिद्धि 
नहीं है । इसी प्रकार यहाँ भी 
त्रहमसंस्थः शब्दकी वृप्ति सम्पूणं . 
कमं ओर उनके साधर्नसे निदत्त 
हए एकमात्र अत्याश्रमी परमहंस 
परिव्ालकमे ही होनी उचित है, 
क्योकि उन्हीको सुर्य अमृतत्वरूपं 
फलफी प्राति घुनी गयी है । 

अतः एकमात्र यही वेदोक्त पारि- 
राज्य हे । यज्ञोपवीत, त्रिदण्ड या 
कमण्डलुं आदिका ग्रहण करना 
मुख्य पािाज्य नदीं है । इस 
विषयमे ““मुण्डित अपरिग्रह" ओर 
“असङ्ग” पसो श्रुति दहै; तथा 
“अ्याश्रमिर्योको परम॒ पवित्र 
[ जानका उपदेश किया ]' इस 
इवेताधतरीय श्रुतिसे ओर 
““निःस्ुतिर्निनेमस्कारः'? इत्यादि स्मु- 
तियोसे एवं “अतः पारद यति- 
गण कमं नहीं करते, इसख्यि 
अशिङ्ग॒धर्मज्ञ॒ ओर अव्यक्त 
[होकर विचरे]” इत्यादि स्मृतियोसे 
मी यही बाच सिद्ध होती है । 


ण्ड २३ ] 


शाह्रभाष्याथं 


२२९. 


अ ऋ ऋ # < € # + >< < ऋ ऋऋ >< 9 8 > 


यत्तु सांख्यैः कमत्यागोभ्यु- 
क्रिया- 
कतृषककरमत्या- कारकफरभेदवुद्धः 
गस्य मिथ्यात्वम्‌ सत्यत्वाभ्युपग- 
मात्‌, तन्मृषा । यच्च 
बौद्धः शुन्यताभ्युपगमादकतंल- 
भ्युपगम्यते, तदप्यसत्‌, तद- 
भ्युपगन्तु साभ्युपग- 
मात्‌ । यच्चाज्ञेररसतयाकठेतवा 
भ्युपगमः सोऽप्यसत्कारकबुद्धर- 
निवतितत्वास्रमाणेन । तस्मा- 
देदान्तप्रमाणजनितैकत्वप्रत्यय- 
वत॒ एव॒ कमंनिवृत्तिरक्षणं 
पारिव्राज्यं ब्रह्मसंस्थत्वं चेति 
सिद्धम्‌ । एतेन गृहस्थस्यकत्व- 
विज्ञाने सति पाखिाज्यमथ- 
सिम्‌ । 
नन्व्गन्युत्सादनदोषभाक्स्या 


सांख्यनोद्धाज- पृगम्यते, 


त्परिव्रजन्‌, “वीरहा वा एष 
देवानां योऽग्निगुद्धासयते'" इति 


तेः; न, देषोत्सादितवादुत्सन 


~----~-- = -~_-~~-~्‌~्‌-~-~-~----्‌ १ -----1------- ~~~ 


करिया, कारक नौर फर्प मेद- - ` 
ुद्धिका सत्यत्व स्वीकार करनेके कारण 


साख्यवादी जो कम॑ल्यागको स्वीकार 
करते दै, वह दीक नहीं है । तथा 
बैद्धोनि नो शूल्यताको . स्वीकार 
कृरनेके कारण अकरततवको स्वीकार 
कियादैवह भी ठीकनही है, 
वयोकि उन्ह उसका अकवत स्वीकार 
करनेवालेकी मी सत्ता माननी होगी 
[ओर बौद्ध रोग आताकी सत्त 
स्वीकार नदीं करते] । तथा अज्ञानी 
लोग. जो आरुस्यवश अकवत स्वीकार 
कर छेते दै वह भी ठीक नहीं हे, 
दथोँकिं प्रमाणद्भारा उनकी कारक 
बुद्धिकी निवृत्ति नदीं होती । अतः 
वेदान्तप्रमाणजनित एकत्व ज्ञानवान्‌- 
को ही कर्मनिदृत्तिरूप पारित्ाञ्य 
ओर ब्रहमनिषठत हो सकते दै-- यद 

दध होता है । इससे गृदस्थको 
भी एकल विज्ञान हो जनेपर पारि 
त्राज्य अर्थतः सिद्ध हो जाता है । 


यदि कहो किं परित्राजक होनेसे 


तो वह अमिपरित्यागरखूप दोषका 


भागी होगा; जैसा “जो 
अग्निका व्याग करता दै वह 
देवतार्भोका पुत्रधन होता है” इस 
्रुतिसे सिद्ध होता है तो घा 
कना ठीक नदी, क्योकि विधाता- 


२३० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ ध्याय रे 


->----9----8ः न स 8८ ऋ 
एव हि स एकतदशेने जाते द्वारा उच्छिन्न कर दिया जानेकै 

, कारण वह अग्नि एकल होनेपर 

“(अपागादग्नेरग्नित्वम्‌"' इति , स्वतः ही यक्त हो जाता दै, जैसा 

| कि “अभिका अग्निर निवृत्त हो 

श्रुतेः । अतो न दोषमाग्गहस्थः । गया" देसी शरतिसे सिद्ध होता हे । 

| अतः परिव्राजक होनेसे गृहस्थ 


परिजननिति ॥ १ ॥ दोषका भागी नहीं होता ॥ १ ॥ 


~> 


त्रयीविद्या ओर व्याहतिरयोकी उत्यत्ति 
यत्संस्थोऽगरतत्वमेति तन्नि- | जिसमे स्थित हुआ पुरुष अमृतत्व 


€ प्रा कर केता है उसका निरूपण 
रूपणाथेमाद-- करनेके स्यि श्रुति कहती दै-- 


पजापतिर्छोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितक्भ्यख्यी विद्या 
संपघाखवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि 
9. © 
संप्रा्लवन्त भूभुवः स्वरिति ॥ २ ॥ 


प्रनापतिने रोककि उद्‌ स्यसे ध्यानरूप तप किया । उन अभितप्त 
लोकसे त्रयी विद्याकी उतयत्ि हुदै तथा उस अभितप्त त्रयी विदयासे “मूः, 
सुवः ओर स्वः ये अक्षर उत्पन्न हुए ॥ २ ॥ 


प्रनापतिरविराट्‌ कड्यपो वा | प्रनापति अरथत्‌ विराट्‌ या करयप- 
रोकानुदिर्य तेषु सारनिध्रक्- | जीने ओेकेकि उदेशयसे-उनमेसे सार 
याभ्यतपदभितापं कृतबान्ध्यानं | महणकरनेकी इच्छासे अभिताप क्या 
तपः कृतवानित्यर्थः । तेभ्यो- अर्थात्‌ ध्यानरप तप किथा । इस प्रकार 


८ अमितत इए उन भूतोँसे उनकी सार- 
ऽभितपेभ्यः सारभूता त्रयी विद्या भूता ्यीविधा प्रादुर्भूत हुई; ताद्य 


० =. 
संप्राख्वत्प्रजापतेमनसि प्रत्यभा- । यह्‌ कि परनापतिके मनम नयीवि्याका 


व € 
खण्डं २६ | ज्ञाङ्ूरमाष्याथं २३९ 


दित्यर्थः । तामभ्यतपत्‌, पू्- | भतिभान हमा । प्रनापतिने पूवत 
बत्‌ । तस्या अभितक्षाया एता- उसके उदेश्यसे मो तप किया 

क ९ | उस अभितप्त त्रयीविद्यासे भूः, सुवः 
न्यक्षराणि संप्राल्रदन्त भूवः 


जर स्वः- ये व्याहृतिरूप अक्षर 
स्वरिति व्याहृतयः ॥ २ ॥ | उस्न हए ॥ २ ॥ 


ओकारकी उत्पत्ति 
तान्थभ्यतपत्तेभ्योऽभितसेभ्य ॐकारः संप्राखवत्त- 
यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोङ्कारेण- 
सर्वा वाक्संतृण्णोङ्कार प्वेद्‌ समोका एवेद <- 
स्वम्‌ ॥ ३ ॥ 
[ फ प्रनापतिने ] उन अक्षरोका जालोचन किया । उन आरोचित 
अक्षरोसे ओङ्कार उलत्न हुभा । निस प्रकार शङ्कं ( नसो › दवार 


सम्पूणं पते व्याप्त रहते हैँ उसी भकार ओङ्ारसे सम्पूणं वाक्‌ व्याप्त दै । 
ओङ्कार ही यह सब कुछ दै--ओङ्ार दी यह सब ङछ दे ॥ २ ॥ 


तान्यक्षराण्यभ्यतपत्तेभ्यो- 
ऽभिततेभ्य उश्कारः संप्रास्चवत्त- 
द्तरह्म॒कीदुशम्‌ १ इत्याह-- 
तद्यथा शङ्कुना पण॑नारेन 
सर्वाणि पर्णानि पत्रावयव- 
जातानि संत्रण्णानि विद्धानि 
व्याप्तानीत्य्थः । एवमोङ्खा- 
रेण ब्रह्मणा परमात्मनः श्रती- 
कभूतेन सवां वाक्शब्दजातं 


[ फिर उसने ] उन॒अक्षरोकी 
आलोचना की । उन आरोचित 
अक्षरे ओङ्कार उन्न हआ । 
वह [ ओङ्काररूप ] ब्रह कैसा है 
इसपर श्रुति कहती दै-जिस भकार 
शङ्क-पेक नसे सम्पूणं पत्ते 
पततोके अवयवसमूह अनुविद्ध अर्थात्‌ 
व्याघ् रहते, इसी पकार परमासाके 
प्रतीकमूत॒ ओङ्करखूप ब्रहद्रारा 


२२ छान्दोण्योपनिषव्‌ [ अण्या ९ 


संतृण्णा । “अकारो वै सर्वा सम्पूणं वाक्‌-- शब्दसमूह व्याप्त ह, 
जैसा कि अकार ही सम्पूणं वाक्‌ 


वाक्‌ इत्यादिभुतेः । हेछयादि शरतियेसे सिद्ध होतादै । 


परमात्सविकारशच नामधेय- | जितना नामघेयमात्र॒ दहै सव 


मात्रमित्यत॒ ईकार एवेदं | परमालाका ही विकार है । , अतः 
क डः | यह ख जङ्कार ही हे । द्विरुक्त 
1 । रभ्यास जर | आद्रके स्यि हे । तथा रोकादिको 
राथेः । रोकादिनिष्पादन- | पराप्त कराना आदि जो कहा गया दै 
कथनमोङ्ारस्तुत्यथमिति ॥२॥ । वह भंकारकी स्तुतिके स्यि ६।२॥ 
इतिच्छान्दोग्यो पनिषदि द्वितीयाध्याये 
जयोविंशखण्डभाष्यं खस्पणाम्‌ ॥ २३ ॥ 





[५ 
~ 

सामोपासनप्रसङ्धेन कमंगुण- सामोपसनाके प्रसङ्गसे कम॑का 
गुणमूत .(अङ्ग) हो जानेके कारण 
अब आओङ्कारको [ उपासनाकाण्डसे ] 
प्रतीकत्वादमृतत्वहैतुत्वेन मही- | निवृत्त कर॒ वह्‌ परमातमाका प्रतीक 
६ होनेके कारण अमृतका साधन है 
छत्य॒प्रकृतस्वव॒ यजस्याङ्ग- | इस प्रकार उसे महान्‌ बताकर भकरण- 
प्राप यज्ञके ही भङ्गमूत साम, होम, 
मन्त्र ओर उत्थानोका उपदेश्च करने- 

न्युपदिदिक्षनाह-- की इच्छासे श्रुति कहती है-- 

सवनोके अधिकारी देवता 
बह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां पातःसवनररुद्राणां 
माध्यन्दिनश्सवनमादिस्यानां च विश्वेषां च देवानां 
तृतीयसवनम्‌ ॥ १ ॥ 

ब्रह्मवादी कहते है कि प्रातःसवन वघुओंका है, मध्याहखवन 

रोका है तथा तृतीय सवन आदिय ओर विर्वेदेवोंका है ॥ १ ॥ 
ब्रह्मवादिनो वदन्ति यस्रातः- | तह्मवादी रोग कहते है कि जो 
क व | 4० परसिद्ध हे वह वघुरओं- 
सवन प्रसिद्ध तदघ्नाम्‌ । तथ | क़ ह । उन सवनके अधीर्वरोदवारा 
यह ॒प्रातःसवनसम्बन्धी रोक अपने 
वशीमूत किया इञ है । तथा 
कृतः सवनेशानैः । तथा रुदे- । मध्याहसवनके अधीश्वर सदोहारा 


भूतत्वान्निदत्योङ्कारं परमात्म- 


भूतानि सामहोममन्त्रोस्थाना- 


प्रातःसवनसंबद्धोऽयं लोको वी- 


२३४ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय २ 
४-8-33 8: 8 > ++ 


माध्यन्दिनसवनेशानैरन्तरिक्ष- | अन्तरिक्षरोक ओर ततीय सवन- 

के स्वाभी आदिलयो एवं विदद 
रोकः । आदिष्येश वियेदबेध | द्वारा ततीय लोक अपने अधीन 
तृतीयसबनेशानैस्ठृतीयो लोको | किया हु हे । इस प्रकार यजमान- 
वशीदतः । इति यजमानस्य | के छ्यि इनके अधिकारसे बचा 
लोक्षोऽन्यःपरिरिष्टो न विद्यते ।१॥ हुआ कोई दूसरा रोक नहीं दै ॥१॥ 


-->: 9 -न्न्== 


साम आदिको जाननेवाला ही यज्ञकर सङृताहै 


क तहि यजमानस्य खोक इति स थस्तं न 
विद्यात्कथं कुर्यादथ विद्वान्छुर्यात्‌ ॥ २ ॥ 
तो फिर यजमानका रोकं कहाँ है ? जो यजमान उस रोकको 
नहीं जानता वह किंप्त पकार यज्ञानुषटान करेगा १ अतः उसे जाननेवाख 
दी यज्ञ करेगा ॥ २॥ 
अतः क तर्हिं यजमानस्य | अतः यजमानका वह ठोक कों 
रोको यदर्थं यजते । न कचि- | दै निसके स्थि ,वद यज्ञान्न 
म करता है ए तात्प यह दहै किं वह 
स्ाकोन््तीत्यभिप्रायः। "लोकाय | लोक कदं नही ह । कतु ५नो भी 
वै यजते यो यजते इति श्रतेः. | यज्ञ करता है वह पूण्यलोकके ही 
=: ~ “ | स्यि करता है" एेसी श्रुति होनेके 
रोकाभावे चस यो यजमानस्तं त 


| कारण जो यजमान रोकृका अभाव 
लोकस्वीकरणोपायं सामहोम- | होनेसे साम, होम, मन्न ओर 


मन्त्रोस्थानरक्षणं न॒ वि्ाज्न | उत्थानरूप ोकसवीतिके उपायकेो 


„= + नही जानता वह अज्ञानी किस प्रकार्‌ 
विजानीयात्सोऽ्तः कथं ङया- यजञानुषठान कर सकता है १ तात्पयं 
दत्तम्‌ । न कथञ्चन तस्य केतव | यह दहै कि उसका कर्तृव किसी 


युपपद्यत इत्यथः । प्रकार सम्भव नहीं हे । 


षण्ड २४ |] 


३ 
शाङ्करभाष्याथे 


२३५ 


~ 2-४-28 >~ 8-9-33 3 8 >~ >> 88८2 ~ 


सामादिविन्ञानस्तुतिषरत्वा- 
न्ाविदुषः कठैखं कर्ममात्रविदः 
प्रतिषिष्यते । स्त॒तये च सामा- 
दिविज्ञानस्याविदरत्कतैतप्रतिषे- 
धायं चेति हि भिद्येत वाक्यम्‌। 
आगमे चौषस्त्ये काण्डेऽविदु- 
षोऽपि कर्मास्तीति दहेतमबो- 
चामं । अथेतदरक्ष्यमाणं सामा- 


द्युपायं विदान्‌ र्यात्‌ ॥ २ ॥ 


=~‡ © 


[ यह वाक्य ] सामादिविज्ञानकी 
स्तुति करनेवाङा दै, अतः इसके 
द्वारा केवर कर्ममात्रकै ज्ञाता अज्ञानी- 
के कतृत्वका प्रतिषेध नहीं किया 
जाता । {यह वाक्य] सामादिविज्ञान- 
की स्तुतिके सिये है ओर विद्वानके 
कर्म-कतृत्वका प्रतिषेध करनेके स्यि 
भी दै" यदि एेसा माना जाय तो 
वाक्य मेद हो जायगा; क्योकि प्रथम 
अध्यायके ओपषस््यकाण्डमे ८ दशम 
खण्डमे ) कमं अविद्वानके भी स्यि 
है-एेसा हमने [ करमानुष्ठानमं | हेतु 
बतलाया है । अतः अगे बतलये 
जानेवाले सामादि उपायोंको जानने- 
वारा होकर ही कमं करे ॥ २॥ 


५, 
[य 


्रातःखवनमे वयुदेवतासम्बन्धी सामगान 


किं तद्वे्यम्‌ १ इत्याह-- 


वह उसका ज्ञातव्य साम क्या 


| है १ सो श्रुति बतलती है-- 


पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाजघनेन गारहपत्यस्यो- 
दख उपविश्य स वासवश्सामाभिगायति ॥ ३ ॥ 


भातरनुवाकका आरम्भ करनेसे पूयं वह ८ यजमान गाहंपत्यागिके 
पीचिक्ठी ओर उत्तराभिणुख बैठकर वघुदेवतासम्बन्धौ समक्ष ॒गान॒“ 


करता दै ॥३॥ 





२३६ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अभ्याय २ 


~ < 3 ऋ ऋ ऋऋ 
पुरा पूवं॒प्रातरलुवाकस्य | प्रातरनुवाकसे पूं मरथात्‌ पराः- 
शखस्य प्रारम्भाज्ञनेन गाद- | कामे पढ़ नाने योग्य शक्लः नामक 
स्तोत्रपाटसे पर्वं गारहपत्याग्निके पीठे- 

पत्यस्य पथादुदढगुखः सन्तुप- न ठ 
६ ध च की ओर उत्तरामिमुख बैठकर वह्‌ 


यजमान वास्षव--वसुदेवतासम्बन्धी 
सामाभिगायति ॥ ३ ॥ | सामका गान करता दै ॥ ३ ॥ 


-"नन एद - 


विद्य स॒ वासवं वसुदेबत्यं 


लो ३ कद्वारमपावा ३ णू ३३ पद्ये खा वयश्या 
३३३३३द्‌३म्‌आ३३ज्या३यो३अआ ३२११ १३ति॥४॥ 
[ हे अग्ने । ] तुम इख रोकका द्वार खोरु दो; जिससे कि हम 
राज्यप्राप्तिके स्थि तुम्हारा दशन कर ठे ॥ ४ ॥ 
लोकदारमस्य पृथिवीलोकस्य | हे अग्ने ! तम ठोकद्रार--इस 
प्राप्ये दारमपाबृणु॒देऽने तेन | प्रथिवीरोककी परा्तिके ल्यि, इसका 
द्वारेण परयेम त्वा तां राज्या- । द्वार खोरु दो । उस द्वारसे हम राज्य- 
येति ॥ ४.॥ प्रतिक स्यि तुम्हारा दरशन करं ॥४॥ 


; ० {-- 


अथ जुहोति नमोऽञ्ये एथिवोक्षिते रोकक्षिते रोकं 
मे यजमानाय विन्देष वे यजमानस्य लोक एतास्मि ॥५॥ 


तदनन्तर [ यजमान इस मनत्र्वारा ] हवन करता है एथिवीमे 
रहनेवले इदरोकनिवासी अग्निदेवकरो नमस्कार हे । सुञ्ञ यजमानको तुम 
[ परथिवी ] रोककी प्रप्ति कराओ । यह्‌ निश्चय ही यजमानका कोक दै, 
भ इसे प्राप्त करनेवाखा ह ॥ ५ ॥ 


ड म छकमन्नोका गान नहीं किया जाता उन्हे शस" कहते है ओर 
जिन शब््ाका मरातःकाठ पाठ क्रिया जाता हे उनका नाम श्ल र] 
/ 


हण्ड २७ |] 


श्ाङ्करभाष्यार्थ 


२३७ 


अथानन्तरं जुदोत्यनेन मन्त्रेण 
नमोऽनये प्रह्रीभूतास्तुभ्यं बयं 
पृथिवीक्षिते परथिवीनिवासाय 
लोकक्षिते प्रथिवीलोकनिवासा- 
येत्य्थः । लोक मे मद्यं यज- 
मनाय विन्द रभस्व । एष वे 
मम॒ यजमानस्य लोक एता 
गन्तास्मि ॥ ५ ॥ 


इसके पश्चात्‌ वह इस मन्तरह्रारा 
हवन करता है--अग्निदेवको नम्‌- 
स्कार दे। हम पृथ्वीम रहनेवाटे 
ओर प्र्वीलोकनिवासी तुम्हारे प्रति 
विनच्र होते है । मुञ्च यजमानको तुम 
पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ । यह 
निश्चय ही यजमानका कोक दै, मेँ 
इसे प्राप्त करनेवाला ह ॥ ५॥ 


अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परि 
घमित्युक्त्वो्तिष्ठति तस्म । वसवः प्रातःसवन.<संभर 


यच्छन्ति ॥ £ ॥ 


इस रोक यजमान भ आयु समाप्त होनेके अनन्तर [ पुण्य- 
कको प्राप्त होगा ] श्वाहा- एसा कहकर हवन करता है, ओर 
परिष ( अर्गख--अहंगे ) को नष्ट करो! एसा कहकर उत्थान करता 
है । वघुगण उसे प्रातःसवन प्रदान करते है ॥६॥ 


उत्रास्मिल्लोके यजमानोऽ्द- 
मायुषः परस्तादध्वं मृतः 
सनित्यथः; स्वाहेति जोति । 
अपजद्यपनय परिघं लोक 


दरारागमित्येतं मन्य- 
क्त्वोत्तिष्ठति । एवमेते- 
वसुभ्यः प्रातःसवनसंबद्धो 


लोको निष्क्रीतः स्यात्ततस्ते 


यहाँ -इस रोकरमे यजमान मँ 
आयु समाप्त होनेपर-- आयुके पीठे 
अर्थात्‌ मरनेपर [ पुण्यरोक प्राप्त 
करगा ] स्वाहा" एेसा कहकर हवन 
करता दै । "तुम परिघ यानी लोक- 
द्वारकी अगंलको दूर करो- इस 
मन्त्रको कहकर उत्थान करता दहै । 
इस प्रकार इन [ साम्‌, मन्त्र, होम 
ओर उत्थान ] के द्वारा वघुओसि 
प्रातःसवने सम्बद्ध लोक मोर 














२३८ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ ज्याय २ 
्रात;सवनं वसवो यजमानाय | लै ल्या जाता है । तव वे वघु- 

गण यजमानको प्रातःसवन प्रदान 
सम्ब्रयच्छन्ति ॥ ६ ॥ करते दै ॥ ६ ॥ 


मध्याह्सवनमें रृद्रसम्बन्ध] सामयान 
पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाजलघनेना- 
मरीधीयस्योदङमुख उपविद्य स ॒रोद्र्सामाभि 
गायति \॥ ७ ॥ 
मध्याहसवनका आरम्भ करनेसे पूव यजमान दक्षिणाग्नि पीठे 
उत्तराभिमुख वैखकर रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ७ ॥ 
तथाग्नीभरीयस्य दक्षिणाग्नेजं- | तथा आग्नीध्रीय यानी दक्षिणामि- 


घनेनोदट्ुख उपविश्य स रोद्र के पीठेकी ओर उत्तराभिमुख बैठ 


(= कर यजमान वैराज्यपदकी प्राप्तिके 
सामाभिगायति यजमानो रुद्र खयि रुद्देवतासम्बन्धी सामका गान 


ज => = ज्य 
देवत्यं वेराज्याय ॥ ७ ॥ करता हे ॥ ७ ॥ 


~: > *--- 


रो रेकद्वारमपावारणू ३२ पर्येम खा वयं वेरा 
२३३३२ दह्‌३ म आ ३३अ्यार३योर३ 
आ३२१ ११ इति॥<॥ 


[ हे वायो ! ] तम अन्तरिक्षछोकका द्वार खोर दो, जिससे कि 
वैराज्यपदकीःप्राप्तिके ल्यि हम वुम्हारा दरशन कर सके ॥ ८ ॥ 

अय्‌ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्चक्षिते लोकक्षिते 
खोकं मे यजमानाय विन्देष वे यजमानस्य रोक 
पुतास्मि ॥ ९ ॥ | 


न द ~~ -- ------- ---- 


खण्ड २७ ] शाङ्करभाष्याथं २३९ 
>>> >< >< < -अ-------<--ऋ < ४. 


तदनन्तर [ यजमान इस मन्त्रहमारा ] हवन करता हे--अन्तरिक्ष- 
से रहनेवालि अन्तरिक्षरोकनिवासी वायुदेवको नमस्कार है । मुञ्च यन- 
मानको तुम [ अन्तरिक्ष ] कोककी प्राप्ति कृराओ । थह निश्चय ही यज- 
मानका रोक है; मे इसे प्राप्त करनेवासा है ॥ ९ ॥ 
अन्न यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परिघः 
क 
मिस्युक्सोचतिष्ठति तस्मे द्दरा माध्यन्दिन सवन 
सम्पयच्छन्ति ॥ १०॥ | 
यहो यजमान, श्ये जायु समाप्त होनेप | अन्तरिक्षरोक प्राप्त 
कर्गा ] स्वाहाः एसा कहकर हवन करता हे जर 'छोकद्वारकी अगंश- 
को दूर्‌ करो" एेसा कहकर उत्थान करता हे | रुद्रगण उसे मध्याहसवन्‌ 
प्रदान करते दै ॥ १० ॥ 
अन्तरिक्षक्षित इत्यादि समा- “अन्तरिक्ष्षतेः इयादि मोका 
अर्थं [ पोँचवे ओर ठे मन्त्रके ] 
नम्‌ ॥ <८-१० ॥ समान दै ॥ ८-१० ॥ 
ततीय सवनम आदित्य ओर विदेदेवसमबन्धी सामक्रा गान 
पुरा ठतीयसवनस्योपाकरणानघनेनाहवनीयस्यौ- 
द्युख उपविदय स आदित्य स वेश्वदेवईसामाभि- 
गायति ॥ ११॥ 
तृतीय सवनका आरम्भ करनेसे पू यजमान आहवनीयाग्निके पीठे 
उत्तराभिुख ैठकर आदित्य ओर विधेदेवसम्बन्धी सामका गान्‌ करता है ११ 
तथाहवनीयस्योदड्घुख उप- | तथा आहवनीयाग्नके पीठे उत्त- 
विहय स॒ आदित्यदेवत्यमादि- | राभिशल वेटकर वह स्वाराज्य ओर 
त्यं वैश्वदेवं च सामाभिगा- साम्राज्यप्रा्तिके स्थि क्रमशः आदि- 
यति क्रमेण स्वाराज्याय लदेवतासम्बन्धी तथा विखवेदेवसम्बन्धी 
साम्राज्याय ॥ ११ ॥ सामक गान करता है ॥११॥ 


> 





२४० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ खभ्याय २ 
> ~> > > 5 > 4-9-89 2-3-98 ४ 


खो कद्वारमपावा णू ३३ पदयेम ता वय 
स्वारा ३२३३२ हुरेम्आ३३ञ्या३यो३आ 
३२१११ इति ॥ १२ ॥ आदित्यमथ वैश्वदेवं लो- 
३ कद्वारमपावा ३ णू ३३ पद्येम ता वयर साश्रा ३३ 
२३३३२ हर मआ३३अ्या३यो३आ ३२१११ 
इति ॥ १३॥ 
ोकका द्वार सोर दो, निससे हम स्वाराग्यप्राप्तिके स्यि तुम्हारा 
दोन कर से । यह आदि्यसम्बन्धी साम दै; अव विवेदेवसम्बन्पौ 


साम कहते ह --रोकका द्वार सोर दो, निससे हम साप्राज्यप्रापतिके 
स्यि दुष्हारा दशंन कर सकं ॥ १२-१३ ॥ 


1 | 
--: © ° -- 


अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो 
दिविक्षिद्धयो छोकक्षिद्धयो लोकं मे यजमानाय 
विन्दत ॥ १४ ॥ 


ततपशवात्‌ [ यजमान इस मन्बदवारा ] हवन करता है स्वर्गमे 
रहनेवले दुरोकनिवासी आदि्यको ओर ॒विदवेदवोको नमस्कार हे। 
सुक्ल यजमानकेो तुम पुण्यरोककी प्रा कराओ ॥ १४ ॥ 


००९ 
५१ ^ यजमानस्य खोक पएतास्म्यत्र यजमानः 


स्तादायुषः स्वाहापहत परिघमिस्युक्वोततिष्ठति ॥१५॥ 
यह्‌ निश्चय ही यजमानका रोक 


ण्ड २७ 1] शाङ्करभाष्याथं २४१ 
ॐ ऋ >~ < < 8 |ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ. ॐ क क क > 4 


दिविक्षिद्भ्य इत्येवमादि | "दिविक्षिद्भ्यः इत्यादि शेष सब 
अर्थं पहठेके ही समान है । “विन्दत, 
समानमन्यत्‌ । विन्दतापहतेति | अपहतः इन करियाम बहुवचन - 
होना दी पूरवकी पेक्षा विशेष दै । 
ये मन्त्र यजमान-सम्बन्धी दै, कर्थोकिं 
मानं तेतत्‌ । एतास्म्यत्र यजमान | भे यजमान इस रोकको भरा 
करनेवाला है इत्यादि लिङ्गसे यह 
इत्यादिलिङ्गात्‌ ।। १४-१५ ॥ । खट होता दे ॥ १४१५ ॥ 


तस्मा आदिस्याश्च विदे च देवास्ततीयसवन<सम्परयच्छ- 

न्तयेष्‌ ह बे यज्ञस्य मात्रा वेद्‌ य एवं वेद य एवं वेद्‌ ॥१६॥ 
उस ८ यनमान ) को आदित्य ओर विभ्वेदेव तृतीय सवन भदान 
कुरते है । जो इस प्रकार जानता है, नो इस प्रकार जानता ह वह 
निश्चय ही यज्ञकी मात्रा ८ यज्के यथाथ स्वरूप ) को जानता हे ॥१६॥ 
एष ह वै यजमान एवंविद्‌ | एवंवित्‌--इस म्नार पूर्वक 
यथोक्तस्य सामादेर्विद्रान्यक्तस्य सामादिको नाननेवाङा यह यजमान 
निर्चय दही यज्ञकी मात्रा-यज्ञके 
परोक्त यथार्थ स्वरूपको जानता है । 
य एवं वेद य एवं वेदेति द्ि- | “ एवं वेद य एवं वेद" यह द्विरुक्त 
रक्तिरष्यायपरिसिमाप्त्यर्था ।१६॥ जध्यायकरी समािके सिये हे ॥१६॥ 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि दवितीयाध्याये 
चतुर्विशाखण्डभाष्यं सम्पूणम्‌ ॥ २४ ॥ 


=: © ` --~ 


इति री गोविन्दमगवस्पूञ्यपादरिष्यस्य परमं सपरिवाजकाचाय- 
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतो @ान्दोग्यविवरणे 
द्वितीयोऽन्यायः सस्पृणः ॥ २॥ 


क्य @ 2 


बहुवचनमात्रं॒विशेषः । याज- 


मात्रां यज्तयाथात्म्यं वेद्‌ यथोक्तम्‌ । 


तृतीय अध्याय 


रवण्ड 





मधुतिद्या 


ॐ असौ वा आदित्य इत्या- 
दयघ्यायारम्भे सम्ब ¦ 

प्रकरण- 
न्धः 

सम्बन्धः 
राध्यायान्त उक्तं यज्ञस्य मात्रां 
वेदेति यक्ञविषयाणि च साम- 
होममन्तोत्थानानि विशिष्टफल- 
पराये यज्ञाङ्गभूतान्युपदि्ानि । 
सर्वयज्ञानां च कार्यनिर्यु्िरूपः 
सविता महत्या भरिया दीप्यते । 
स॒ एष सवभराणकर्मफरभूत रुभतः 
्रतयक्षं सवेरुपजीव्यते । अतो 
यज्ञन्यपदेशानन्तरं तत्कार्यभूत- 
सविदविषय्ुपासनं सर्वपुरुषा- 


। अतीतानन्त- 


| 
| 


ॐ असो वा आदित्यः इत्यादि 
अध्यायके आरम्भे पूर्वोत्तर प्रन्थका 
सम्बन्ध [ वतलया जाता है ]। 
अग्यवहितपू्वं अध्यायके अन्तम यह 
वतखया गया है किं "वह यज्ञके 
यथार्थ स्वरूपको जान जाता दै । 
तथा उसी अध्यायमे विशिष्ट फलकी 
प्राप्तिके र्थि यज्ञके अङ्गमूत यज्ञ 
सम्बन्धी साम, होम, मन्त्र ओर 
उत्थार्नोका भी उपदेश्च किया गया 
दै । [ इनके द्वारा ] सम्पूर्णं यजे 
का कायेनिष्पत्तिरूप [ अर्थात्‌ सम्पूणं 
यज्ञसाधनोका फलस्वरूप ] सूय 
महती श्रीसे दीप्त हो जाता दै। 
बह यह सूयदेव सम्पूणं भाणियकि 
कर्माका फरप्वल्प दै; अतः समस्त 
जीव प्रत्यक्ष दी इसके आश्रयसे 
जीवन धारण करते है । जतः शब 
यजञका निरूपण करनेके पर्चात्‌ 
उसके फरुस्वर्प सूर्य उपासना ` 


ण्ड १] 


शाङ्करमाष्याये 


७३ 


~> > 8 >< 9-8-89 >8-8- 8 26८8 95 >8< < 8८ क: 85 ~ध 9: 9 9 


भ्यः श्रेष्ठ तमफलं विधास्यामी- | का, ज स्पे पुसमारथोसि शष्ठतम्‌ 


त्येवमारभते भुतिः-- 


फरवाटी है, विधान करूगो- इस 
उदृदेशयसे श्रुति भारम्भ करती है- 


ऊ आरदित्यादिमे मधु आदि-दि 
ॐ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव 
तिरश्चीनवश्योऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ ९ ॥ 
ॐ यह आदित्य निर्चय ही देवतार्का मधु है । दुरोक ही 
उकषका तिरा बक है [ निखपर छि वह र्का हुमा है], अन्तरिक्ष 
छता है ओर किरणं [ उसमे रहनेवाठे ] मव्खयोके वच्चे द ॥ १ ॥ 


असौ वा आदित्यो देवम- 
भ्वित्यादि । देवानां . मोदना- 
ल्मध्विव मध्वसावादित्यः। 


वस्वादीनां च मोदनहेतत्वं 
वक्ष्यति स्वयत्तफलरूपत्वादादि- 
त्यस्य । 


कथं मधुत्वम्‌ १ इत्याद तस्य 
मधुनो द्यौरेव भ्रामरस्येव मधु- 
नस्तिरभीनशासौ वंशस्चेति तिरः 
शनर्ंशः । तिर्वम्मतेव हि चोलं- 
श्यते । अन्तरिक्षं च मध्वपूषो 


असौ वा आदित्यो देवमघु 
इत्यादि । देवताओंको प्रसन्न करने- 
वाला होनेसे वह॒ आदिय मघुके 
समान भानो मधु है । वघु जदिको 
प्रसन्न करने उसकी हेतुता श्रुति 
आगे ( ३।६ । १ मेँ ) प्रतिपादन 
करेगी, क्योकि वह आदिय सम्पूण 
यज्ञोका फलस्वरूप है । 


इसका मधुत्व किस प्रकार है १ 
यहं श्रुति बतलाती दै--मधुकरके 
मघुके समान इस मधुका धुरो ह 
तिरा बो दै। जो तिरस्चीन (तिरा) 
हो जोर वंश ( बोघ) हो उसे 
तिरशीनवंश (तिरा बाघ) कहते है; 
क्योकि युरो रिरका ही दिखायी 
देता है । तथा अन्तरिक्ष मधुका छर्ता 
दे, बह युलोकरूप बमं रूगक 


२४७ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ स्याथ ३ 


द्वं ल्मः संल्लम्बत इवातो मानो स्कता ह, अतः मधृके छक्के 


} 
1 


मध्वपूषसामान्यादन्तरिक्षं मध्व- | 
पूथो मधुनः सवितुराश्रयत्वाच । 
मरीचयो रद्मयो रदिमस्था 


आपो मोमाःसवित्राढर्टाः “एता 
वा आपः स्वराजो यन्मरीचयः'" 


इति हिं विज्ञायन्ते । ता अन्त- 
रिक्षमभ्वपूपस्थरदम्यन्तगंतत्वा- 
द्भ्रमरबीजभूताः पुत्रा इव हिता 
लक्ष्यन्त इति पुत्रा इव पुत्रा 
म्वपूपनाव्यन्तगंता दि भ्रमर 
पत्राः ॥ १ ॥ 


समान होनेके कारण तथा मधुप 
सुर्यका आश्रय होनेसे भी अन्तरिक्ष 
रोक दी मधुका छत्ता है । 

मरीचि-किरणे अर्थात्‌ सुंदरा 
खीचा हुभा उसकी किरणेमिं स्थित 
पाथिव जल-- जिसका कि “स्वराट्‌ 
( स्वयंप्रकाश सूयं ) की जो किरणें 
है वे निश्चय दही जरु दै इ श्रुति 
द्वारा ज्ञान होता हे, वह अन्तरिक्ष 
शा्टदके छन्तेमे स्थित किरणोके 
अन्तगैत होनेके कारण मधूकरोकि 
बीजभूत पुत्रो ( मधुमविखर्योके बच ) 
के समान उनम निहित दिखायी 
देता है। अतः वह सूर्थररिमस्थ जर) 
अमरपुर््रोके समान पुत्रखूप है, 
क्योकि छेके छिद्रो ही अमरपुत्र 
रहा करते है ॥ १ ॥ 


क 1) 
आदित्यकी पूवदिकसम्बन्धिनी किरणोमे मघुनाड्यादि-दशि 
तस्य ये घरा्ो रइमयस्ता एवास्य प्राच्यो मधु- 
नाड्यः । ऋच एव मधुकृत ऋष्वेद्‌ एव पुष्पं ता 
अद्ता आपस्ता वा एता ऋचः॥ २ ॥ एतस्ग्वेदम- 
भ्यतपरस्तस्याभिततस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्ना- 


व्यश्रसोऽजायत ॥ ३ ॥ 


शा्करभाष्वाथं २४५ 
9 ऋ 


उस आदियकी नो पूर्वदिशाकी किरणे दै, वे ही इस ( अन्तरिक्ष 
हप छते ) के पूर्दिशावतीं छिद्र दै । ऋक्‌ दी मधुकर है, चछग्ेद दी 
पुष्प है, वे सोम आदि अशत दौ जर हं । उन इन ऋक्‌ { रूप मघु- 
करो ] ने दी इस छग्बेदका अभिताप करिया । उस अभितप्त ऋग्बेदसे 
य, तेज, इन्द्रिय, वीयं जर अन्ाद्खूप रस उतत इन ॥ २-३ ॥ 


खाण्ड १ |] 


तस्य॒ सवितुम॑ध्वाश्रयस्य 
मधुनो ये प्राशः प्राच्यां दिशि 
गता रदमयस्ता एवास्य प्राच्यः 
प्रागश्चनान्मधुनो नाव्यो मधु- 
नाड्य इव॒ मध्वाधारच्छिद्रा- 
णीत्यथः | 

तत्र ऋच एव मधुकृतो 
छोहितरूपं सवित्राश्रयं मधु 
कुर्वन्तीति मधुकृतो भ्रमरा 
इव्‌ यतो रसानादाय मधु 
कुर्वन्ति तत्पुष्पमिव पुष्पख- 
ग्वेद्‌ एव । 


तत्र ऋग्बाक्षणसमदायस्यग्वे- 
दाख्यत्वाच्छब्दमात्राच्च भोग्य- 


रूपरसनिसरावासंमवादुषवदशब्दे- 
नात्र ऋण्वेदविहितं कम॑ । ततो 
हि कम॑फलभूतमधुरसनिसाव- 


मुके आश्रयमूत उष सुयेरूप 
मधुकी जो पूर्वदि्ागत किरणे दै 
वे दी पूर्वकौ ओर जनेके कारण 
इसकी पूर्वं मधुनाडिाँ है । मधुक 
नादियेकि समान मधुनाव्ाँ है 
अर्थात्‌ वे मधुके आधारमृत छिद्र है । 


तहँ ऋचा ही मधुकर है वे 
सूर्यम रहनेवाखा रोहितरूप मधु 
उत्पन्न करती है, अतः भरमरोके समान 

| वे ही मधुकर है । जिससे रसोको 
ग्रहण करके वे मघु करती है वह्‌ 
वेद ही पुष्पके समान पुष्प हे। 


कितु याँ ऋग््राक्षणससुदायका 
ही नाम ऋगवेद है ओर केवर शब्द्‌- 
से दही भोग्यद्प॒रसका निकर्ना 
असम्भव दै; तः “भवेद शब्दसे 
यँ चछग्वेदविहित कमं अभिप्रेत 
हे, क्योकि उसीसे कमफलमूत 
मधुप रसका निकलना सम्भव 


संभवात्‌ । मधुकररिष पुषप- । दै । मधकक समान ऽप पुष्प 





छान्दोन्योपनिषल्‌ 


[ भष्वाय १ 


8 >~ 


2४ 
स्थानीयादग्बेदविहितात्कमंण 
अप आदाय ऋभ्भिमधु 
निवैत्यते । 


कास्ता आपः १ इत्याह-ताः 
कर्मणि प्रयुक्ताः सोमाज्यपयो- 
रूपा अग्नो प्रक्षिप्रास्तत्ाकाभि- 
निवेत्ता अमरता अमृता्थत्वा- 
दत्यन्तरसवत्य आपो भवन्ति | 
तद्रसानादाय ता वा एता 
ऋचः पुष्पेभ्यो रसमाददाना 
इव भ्रमरा ऋचः एतमग्वेद्‌- 
मृण्वेदविहितं कमं पूष्पस्थानी- 
यम्‌ अभ्यतपन्नभितापं कृत- 
वत्य इवेता ऋचः कर्मणि 
प्रयुक्ताः । 

ऋग्मिहि मन्त्रः शसरा्ज्ञ- 
भावमुपगतेः क्रियमाणं कर्म 
` मधुनिवेतंकं रसं युश्वतीत्युप- 
पद्यते पुष्पाणीव भ्रमरैराचूष्य- 


माणानि। तदेतदाद-तस्यग्बेद- 
स्याभितप्तस्य, कोऽसौ रसः१ य 











ग्रहण करके ऋचाओदवारा मधु 
तैयार किया जाता है । 


वे सक्या है सो रति 
वतसाती है--वे करमोमिं प्रयुक्त 
अर्थात्‌ अथिमें उटे हुए सोम, धृत 
एवं दुग्ध्प रस अभ्निपाकसे निष्ग 
हुए अम्रत होते है अर्थात्‌ अमृतल 
( मोक्ष ) के देतु होनेके कारण षै 
[ अमृतसंञ्ञक ] जरु अत्यन्त रसमय 
होते है । उन रसौको ही रहण 
करके इन ऋचाओंने- पुष्येपि र 
ग्रहण करनेवाले अमरोके समान इन 
ऋ चार्ओने इस दग्वेदको- पुष्प 
स्थानीय ऋगबेदविदित कर्मक 
अभितप्त किया अर्थात्‌ कर्मे प्रयुक्त 
हुई इन ऋचाओनि मानो उनका 
अभिताप किया । 


शसखादि यज्ञङ्गमावको प्राप्त इए 
ऋगादि मन्त्ोद्रारा ही किया हुर्भा 
कमं अमरोसे चसे जाते हए पृष्पोकै 
समान मघु बनानेवाखा रस छोडता 
हे--यह कथन टीक ही है । इसी 
बातकरो यह श्रुति बतलाती है--उस 
अभितप्त 'ग्वेदका वह करौन-सा रस 


¢ 
खण्ड १] शाङ्करथाष्याथ २७७ 
9 >~ < < < ऋ ४-2-38 


ऋट्मधुकराभितापनिःखत इ्यु- है ! जो ऋगृरूप मधुकरके अभि- 
तापसे निक हुआ दै- रेषा 

च्यते । कटा जाता है । 
यक्ञो वि रुत्वं तेजो देहगता | उस यागादिूप कर्मसे यश्च-- 
किनिवं साण्यपत | व 
यैरेकल्यं वीयं सामथ्यं बल इनसान 
(9 ४ | कारण-अविकर्ता, वौय- साम्य 
मिस्यथः, अन्नाद्यमनं च तदाद्यं | यानो बर ओर अनाय नो अन्न 
चः येनोपयुञ्यमानेनादन्यहनि | दो जर खाच ( भक्षय) मीहो, 


वानां स्थितिः स्या्दत्नायमेष । जिसका भरिदिन उपयोग कये 
द £ | जानेपर देवतार्ओंकी स्थिति हो 


रसोऽजायत यागादिरक्षणात्‌ | ते अनना कहते रै- वा रघ 
कर्मणः ॥ २-३ ॥ उलन हुज ॥ २-२ ॥ ` 


"~" © -न् 


तद्रयक्षरत्तदादिस्यमभमितोऽश्चयत्तद्रा एतव्यदेतद्‌- 
दित्यस्य रोहितःरूपम्‌ ॥ ४ ॥ 


वह ( यश्च आदि रस ) विरेषूपसे गया । उसने [ जाकर । 
आदित्यके [ पूवं ] भागम आश्रय लिया । ब नो आदियका रोदित 
( लर ) खूप है वही यह ( रस ) हे ॥ ४ ॥ 


यश बायपयन्तं तद्वथ- | यशसे चक अन्नायपरयन्त वह 
रदविशेषेणाक्षरदगमत्‌ । गत्वा | रस व्यक्त विरषरूपसे गया । 
ल ५ ५ | उसने जाकर सुर्यको पार्तः सूरयंके 

च तदादित्यममितः पाश्वतः पू | पूर॑मागको आश्रित किया, पेखा 


भागं सवितुरश्रयदाभितवदि- | इसक्ना ताप्यं है । दम ईस 
सवथः । अष्म्मिन्नादिते संचितं | आदिम संचिव ह कर्मफरसंक 








२४८ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ सभ्याय\ | 


5-8-30 0 | 
कमफलार्यं मधु भोश््यामह | मधुको भोगेगे-इस परकर कए 
इत्येवं दि यरदिलक्षणफ़ल- | आदिरूप फलकी प्ािके रिथ मनु 


~ | द्वारा कमं श्रिये नाते दै जेते 

रषये कमभि व्रियन्ते मनुष्ये | छृषकलोगधान्यदिकी भके लि 

केदारनिष्पादनमिवं कषैकैः । | क्यार बनाते है। शरद्धा उरि 

तत्प्रत्यक्षं प्रद्येते श्रद्धाहेतो- स्मि अब भः ७ भद 

कि या नता हू वह्‌ निश्चय यह्‌ 

1 ८ वः है । वहक्याहै? यह्‌ नो उदि 

तदादित्यस्यो्यतो दश्यते | होति हए सूरथकना रोहित ( सङ) 
रोहितं रूपम्‌ ॥ ४ ॥ रूप देखा नाता दै ॥ ४॥ 


--भ ग्ड 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि दततीयाध्यायं 
्रथमखण्डमाष्यं सस्पणम्‌ ॥ ९ ॥ 


3 क 


ह्दिकीः खण्ड 


जादित्यकरी दक्षिणदिक्सस्बन्धिनी (करणोमे मधुनाञ्यादि-दष्ट 


अथ येऽस्य दक्चिणा रदमयस्ता एवास्य दक्षिणा 
मधुनाञ्यो यज्‌ष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता 
अघ्नतां आपः ॥ १ ॥ 


तथा इसकी जो दक्षिण दिशाकी किरणं है वे दी इक दक्षिण- 
दिजचावर्तिनीं मधुनाडयो दै, यजुःश्ुतिर्यो द मधुकर है, यजुवद द पुष्प 
है तथा वह [ सोमादिरूप ] अग्रत ही अप्‌ हे॥ १॥ 


अथ येऽस्य दक्षिणा रमय | अथ येऽस्य दक्षिणा रद्मयः 
इत्यादि समानम्‌ । य्येव | यादि शति अथ पूववत्‌ हे । 
मधुकृतो यजुदविदिते कर्मणि | बजुश्तयो ही मुक है अर्थात्‌ 
प्रयुक्तानि । पूव॑बन्मधुकृत व 
दविदित ९ | मन्त ही पूर्ववत्‌ मधुकरोके समान 
शव ५. कम | ह | यलुरवदविहित करम ही पुष्य 
स्थानीयं ु्ममिलयु्यते । स्थानीय होनेके कारण धुप देः 
ता एव सोमाद्या अता | ेसा कहा जाता दै । तथा वे सोम मादि 
आपः ॥ १ ॥ अमृत ही आप है ॥ १॥ 


तानि वा एतानि यजू<ष्येतं यजुवेंदमभ्यतपस्त- 
स्याभिततस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीयमन्नाद्यश्रसोऽजा- 


२५० छान्दोष्योपनिषल्‌ [ अष्वाद\ 


= > 8 8 8 ~ > 8-0-66 
यत ॥ २ ॥ तद्चक्षर्तदादित्यमभितोऽ्रयन््रा एत, 
द्यदेतदादित्यस्य शुङ्क रूपम्‌ ॥ ३ ॥ 

उन हन यनुःरुतिरयोनि इस यजुर्वेदका अभिताप किया । उस अमि. 
तप यनुर्वदसे यश, तेज, इन्दिय, वीयं ओर अत्नायूप रस उर 
हुआ । उस रसने विशेषषूपसे गमन किया ओर आदिक निक 


[ दक्षिण ] मागम आश्रय स्या । यह जो आदिलयका श्ुक्छ शूप है ` 
वह्‌ वही ह ॥ २-२ ॥ 


तानि बा एतानि यजरष्येतं | उन यजुःश्रतियोनि ही इस यनु 


यजुबदमभ्यतपन्नित्येवमादि सव 3 
परकारसे यह सव अर्थं पूर्ववत्‌ दै 


॥ 1१ सनयतदातित्यस्य यह्‌ जो आदित्यका शु्खहूप दिखायी 
दुरयते शुङ्ग रूपम्‌ ॥ २-३ ॥ | देता है मधु है ॥ २-३ ॥ 


--; ० :~- ` 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि कतोयाध्याये 
द्वितीयलण्डमास्यं सम्पृणेम्‌ ॥ २॥ 


<< ऊ 


न 


= 


णड 
~ : ४ :- 
आदित्यकी पचिमदिवि्तस्वन्धिनी किरणों मधुनाञ्यादिदष्टि 
अथ येऽस्य प्रस्यथचो रदमयस्ता एवास्य प्रतीच्यो 
मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता 
अस्ता आपः ॥ १ ॥ 
तथाये जो इसकी पर्चिम ओरकी रमय दँ वे दी इसको परिच- 
मीय मूनाथ है । सामश्तिय दौ मधुकर दै, सामवेदविहित कमम ही 
पुष्य है तथा वह [ सोमादिषप ] अगत ही आप्‌.हे॥ १॥ 
तानि वा एतानि सामान्येतशसामवेदमभ्यतपः- 
स्तस्याभितततस्य यदास्तेज इन्द्रियं वो्यमन्नायर्रसो- 
ऽजायत ॥ २ ॥ 
उन क्न सामशरुतयोनि ही इस सामवेदविहित कमेका अभिताप 
करिगा । उस अभित सामवेदे ही यश, तेन, इन्दि, वीर्यं ओर 
अन्नाद्यरूप रस उतसन्न इ ॥ र२॥ (५ 
तद्रवक्षरत्तदादिस्यमभितोऽश्रयत्तदा पतयदेत- 
द्‌ादित्यस्य कष्णरूपम्‌ ॥ २ ॥ 
उस रखने विशेषरूपसे गमन किया जर आदित्यके समीप [पश्चिम] 
भागते जाश्रय ल्वा । यह जो जादि ष्ण तेन दै यह वही द॥२॥ 
अथ य्सय प्रत्यश्ो रदमय | अथयेऽस्य प्रयशो रङमयःइत्यादि 
इत्यादि समानम्‌। तथा साम्नां | श्रति्योका अर्थं पूर्ववत्‌ हे । तथा 
मधु तदादित्यस्य कृष्णं सामशरुिर्योका जो मधु है वही यह 
रूपम्‌ ॥ १-३ ॥ आदित्यका ङृष्ण तेज दै ॥१-३॥ 


इतिच्छान्दोभ्योपनिषदि ठतीयाध्याये 
 ततीयसखण्डमाष्यं सम्पणम्‌ ॥ २ ॥ 





चतुथः खर 
आदित्यकी उत्तरदिक्सम्बन्धिनी किरणे मधुनाञ्यादि-दि 


अथ येऽस्योदञओो रदमयस्ता एवास्योदीच्य 
मधुनाञ्योऽथरवाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं 
पुष्पं ता अस्ता आपः ॥ १ ॥ 


तथा इसको जो उत्तर दिशाकी किरणं है वे ही इसकी उत्रदिश- 
कौ मधुनाडियं है । अथर्वाङ्गिरस श्रुति ही मधुकर रै, इतिद्ास-परण 
ही पुष्प ह तथा वह [ सोमादिहूप ] अमृत ही जप दै ॥ १॥ 


ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणः 
मभ्यतपरस्तस्याभितपस्य यशस्तेज इन्दं वीय 
मन्नाद्यऽरसोऽजायत ॥ २ ॥ 


` उन इन अथव्गिरस शरुतियोने ही इस इतिहास-पुराणको अमित 
किया । उस जमितप्त हए [ इतिहास-पुराणरूप पुष्प ] से दी यद, तेन। 


इन्द्रिय, वीयं ओर अन्नायरप रसकी उत्पत्ति हुई 1 २ ॥ 


तदचक्षरत्दादित्यमभितोऽश्रयततदरा तयद, 
तदादिरयस्य परं छृष्णररूपम्‌ ॥ ३ ॥ 
उस रसने 
गमन करिया ओर आदित्यके निकट [उक्त] 
भागम आश्रय ख्या । यह्‌ जो. ष्णः £ 
1 आदित्यका अव्यन्त कष्ण. ख्य दै थ 


खण्ड छ ] शाह्करमाष्याथ २९५३ 


अथ येऽस्योदश्चो रमय | “अथये इस्योदञरो रहमयः यादि 
इत्यादि समानम्‌ । अथरवा्गि मर््त्रोका अथं पूर्ववत्‌ है । अ्र्वा- 
रसोऽथर्वणाद्धिरसा च दृष्ट ्रिरसः-अथर्वा जर अङ्गिरा ऋषि- 
= ६ | येकि प्रक्ष क्रिये हए मन्त्र अरथा 

मन्त्रा अथवाद्िरसः कमणि स 
त = ङ्खिरस करते दै; कमं प्रयुक्त 
` । शतदा | हुएवे ही न्च मधुकर दै। इतिदाप- 
पुराणं पुष्पम्‌ । तयोधेतिहास- | पुराण ही पुष्प है । उन इतिदास 
पुराणयोरशवमेधे पारिषवाखु | ओर पुररणोका अधमेष यकम पि 
रात्रिषु कर्माङ्गत्वेन विनियोगः | प्लव रा्ियेमभकरमङगल्पसे विनिः 


सिद्धः । मध्वेतदादित्यस्य | योग प्रसिद्ध दी है । इस आदिल्य- 
परं कृष्णं रूपमतिश्येन दृष्ण- | का जो परम इष्ण अर्थात्‌ अतिशय 
मित्य्थः ॥ १-३ ॥ ष्ण रूप हे वही मधु हे ॥१-३॥ 


19. 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि कतीयाण्याये 
चतुथ खण्डभाष्यं सस्पणेम्‌ ॥ ४॥ 











® अश्चमेघयज्ञ बहुत दिनों समास होता दै । उसके अनुष्ठानमें चुपचाप 
वे-्रठे यज्ञकर्तार्ओंको आकत्य आने कगता है । उसकी निडप्िकै चयि श्रतिने 
रात्रिक समय इतिहास-पुराणादिभवणका विधान क्रिया हे । विविध उपाख्याना- 
दिके समुदायका नाम “्वारिष्ठवः है; जिन रातिरय उनके भवणका विधान दै 
। वे (रिष्ठा रात्रिया" कहटाती ईं । + 


पञ्चः 
आदित्यकी उध्वं दिक्सम्बन्धिनी किरणों मधुनाञ्यादि-दष्टि 
अथ येऽस्योर््वारदमयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाञ्योयुहा 
एवादेशा मधुकृतो बह्येव पुष्पं ता असता आपः॥ १॥ 


तथा इसकी जो उ्वरदिमाँ है वे दही इसको उपरी मखी । 


मधुनादियां दै । गुहय आदेश ही मधुकर दै; [ प्रणवरूप ] रह दी धृष 
हे तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप है ॥ १ ॥ 


ते वा पतेयुद्या आदेदा एतद्रह्माभ्यतपस्तस्याभि- 


तत्तस्य यरस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाव्यश्रसोऽजायत॥२॥ 


उन इन गुद्च आदेोने ही इस [ प्रणवसंज्ञक ] ब्रह्मो अमितप्‌ 


क्रिया । उस अभितप्त ग्रहमसे ही यश, तेज, इन्दिय, वीर्यं ओर त्र- 


यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २ ॥ 


तद्रचक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तदा एतयदेतदा- 


, दित्यस्य मध्य क्षोभत इव ॥ ३ ॥ 


उस रसने विरोषूपसे गमन किया ओर वह आदित्यके निकट 


[ उष्वं ] भागम आधित हआ । यह्‌ जो आदित्यके मध्यमे श्ुन्ध-सा 
दोता ह यदी वह (मषु) है ॥ ३॥ 


अथ येऽस्योर्ष्वा रसमय इत्यादि । “अथ ये.ऽप्यर्ष्वा रइमयः इत्यादि 


ह मनत्रोका अथं पूर्व रं 
पूववत्‌ । गद्या गोप्या रहस्या ती. 1 न 


एवादेशा लोकद्वारीयादिविधय है यानी जो रोकदवारीयादि# 
जा. 


ˆ ॐ लोकद्वारमपावृणु पर्येम त्वा वयम्‌? ( ल 
व यम्‌" ( काकका द्वार सोक दे; जिठसे 


इत्यादि ही 'टोकदवारीयादि विषिया' र। 


ण्ड ५] शाहूरयाष्याथं २५९ 
>~ 9-989-90 9 ऋ >< 9 ऋ 


उपासनानि चं कर्माद्भविषयाणि | विधियां ओर कर्म्गिसम्बन्धिनी 


मधुतः । हैव शन्दाधिकाराद्‌ उपासना है बे दी मधुकर है । 
रह्म शब्दका अधिकार होनेसे 


प्रणवाख्यं पुष्यं समानमन्यत्‌ । | पणवसंक ब्रह ही ५्प है । शेष 


म्वतदादित्यस्य म्ये कषोमत | णयं भूत्‌ दै । समाहित 

36 परुषको इस आदित्यके मध्यमे जो 
इव समादितदृषटटर्यते सश्चल- | यमित अर्यात्‌ संचरित.सा होता 
तीव ।॥ १-३ ॥ दिखायी देवा है वही मघ है॥१-३॥ 


ते वा एते रसानाश्रसा वेदा हि रसास्तेषामेते 
रसास्तानि वा एतान्यस्रतानामम्रतानि वंदा ह्य भ्रतास्ते- 
षामेतान्यस्रतानि ॥ ४॥ 


वे ये [ पूर्वोक्त रोदहितादि रूप | ही रसेकि रस वेद ही रस 
ह ओरये उनके भीर दहै । वेदीये मृतके अमृत है- वेद ही 
अमृत दै ओर ये उनके भी भमृत है ॥ ४ ॥ 


ते वा एते यथोक्ता ६ वे ये पूर्वक्त रोहितादि रूप 
दिरूपविशेषा रसानां रसाः । विष ही रसोकि रस ह । किन 


केषां रसानाम्‌ १ इत्याह -वेदा हि रपोकि रत है १ एेसा परभ होनेपर 
- ` _ | श्रुति कहती दै क्योकि रोकोकि 


# सारभूत होनेके कारण वेद हौ सार 
रसास्तेषां रसानां कमभावमा- | अर्थात्‌ रस है ओर कर्मभावको परा 
पलनानामप्येते रोदहितादिविशषा | हुए उन रकि भी वे रोहितादि स्स 
रसा अत्यन्तसारभूता इत्यथः । | विशेष रखयानी अवन्त सारभूत | 








रदे ह्मन्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय \ 


>< >< 8 < < 96 4 < 86 ¬< ~< 6 96 >€ ~€ >< >< >€ € € >< <¬ 


तथाम्रतानामम्तानि वेदा ह्यमृताः 


नित्यत्वात्‌, तेषामेतानि रोहिता- 


दीनि ूपाण्यमृतानि । रसानां 
रसा इत्यादि कर्मस्त॒तिरेषा-- 
यस्येवं विरिष्टान्यमृतानि एफल- 


मिति ॥ ४॥ 


का ब 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि 


तथा ये अमूोके भी असूत है, ष 
कि वेद ही निलय होनेके कारण प् 
है, उनके भी ये रोदितादि ह 
अग्रत है । रसानां रसाः ( रस 
रस) इत्यादि वाक्य करमकी सतुति है 
अर्थात्‌ इस वाक्यका रे्ा तासं १ 
किं जिस रसप कर्मके रसे अमृत. 
खूप फर है [ उसके माहात्य- 
का कहाँतक वणेन शि 

जाय १॥ ४॥ | 


कतीयाभ्याये 


पञ्चमखण्डमाष्यं सम्पण ॥ ५ ॥ 


1 ~ 


एष खख 





वसुओंके जीवनाश्रयमूत प्रथम अमृतकौ उपासना 
तवयस्पथममस्तं तद्वसव उपजीवन्त्यञ्चिना सुखेन न 
वे देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवाभरतं दष्टा तप्यन्ति ॥१॥ 
हनम जो पहला अभृत दै, उससे वघुगण अग्निपरधान होकर जीवन 
धारण करते है । देवगण न तो लति है भौर न पीतेदी दै, वेस. 
अमृतको देखकर दी तृप्त हो जाते दै ॥ १॥ 


तत्तत्र यस्प्रथमममृतं रोहित- 
शूपलक्षणं तद्रसवः प्रातःसवने- 


शाना उपजीवन्त्यभ्निना युखेना- 
भिना ॒प्रधानमूतेनाधिप्रधानाः 
सन्त उपजीवन्तीस्य्थः। अन्ना 
रसोऽजायतेतिवचनात्कबल्ग्राह- 
मश्नन्तीति प्रापम्‌, तत्प्रतिषिध्यते 
न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्तीति। 
कथं तद्मुपजीवन्ति १ इत्युच्यते- 
एतदेव हि यथोक्तमञ्तं रोहितं 


रूपं दष्रोपलम्य सर्वकरणेरुभूय 


वह इनमे जो रोहितरूपवाखा 
पहरा अमृत दै उसके उपलीवी 
प्रातःसवनाधिकारी वघुगण दै। वे 
अभ्िमुखसे- प्रधानभूत अग्रसे 
अर्थात्‌ अभिप्रधान होकर इसके 
उपनीवी होते दै । “अन्राचयखूप रस 
उलन्न हुआ इस वाक्यसे सिद्ध होता 
हे किवे उसे एक-एक ग्रास लेकर 
खाते है । इसीका "देवगण नतो 
खाति है जीर न पीते ही हैः-इस 
वावयदवारा प्रत्षिष किया जाता है 

तो फ्रि वेकिस प्रकार उसके 
उपनीवी होते है £ एसा प्रशन होने- 
प्र कहा जाता है- वे इस उप्यक्त 
अमृत अर्थात्‌ रोहितरूपको देखकर 
उपलब्ध कर यानी समस्त इन्द्रर्थो- 
से इसका अनुभव कर तृष हो जाते 








४५८ 


छ्मन्दोग्योदनिषह्‌ 


> अ > > ८ 


[ अध्याय ! 


8 > 
दप्यन्ति, दृशेः सव्करणहारोप- | है, व्याक श्‌ धातु ए 


रन्ध्यथत्वात्‌ । 


नलु रोहितं सूपं दषयक्तम्‌) | कि 


कथमन्येन्दरियविषयस्वं रूपस्येति! 


न; यशआदीनां भरोत्रादिगम्य- 
खात्‌ । भरोत्रगरा्ं यशचः। तेजो- 


रूपं चाज्ुषम्‌ । इन्द्रियं विषय- 


ग्रहणकार्यानुमेयं करणसामर्थ्म्‌ । 


वीयं बलं देहगत उत्साहः प्राण- 


वत्ता अन्नाद्यं प्रत्यहभुपजीव्य- 


मानं शरीरस्थितिकरं यद्भवति । 
रसो दयेवमात्मकः सर्वः। यं दृष्टा 


तप्यन्ति सवे । देवा दृष्टा तृप्य 
न्तीत्येतत्सवं स्वकरणरुभूय 
दप्यन्तीत्यथः। आदित्यसभरया; 


सन्तो वगन्ध्यादिदिहकरणदोष्‌- 
रहिताश्च ॥ १ ॥ 


इन्दरयोदरारा उपरुब्धि (क्न 
होनेके अथ प्रयुक्त हनेवोस ह| 
रितु यहो तो कदा गवा दै। 
रोहितरूपको देलकर [ अर्ष 
सम्पण इन्द्रियोसे उसका लुम ® 
कर्‌" ] फिर रूप अन्य इन्दि 
विषय कैसे हो सकता है १ [इष 
कहते है -] ेसी बात नही ६ 
क्योकि श्रोत्रादि अन्य इन्दि 
विषयतो यश्च आदि दहै। ण 
्रोतरग्राह्य है, चश्चु इन्द्रियका क्षि 
तेजोखप है। विषयभ्रहणरूप काय 
अनुमित होनेवाे कर्णोकि 1 साम॑ 
का नामश्न्दरियः हे, वीय॑का अ 


हे बल-देहगत उत्साह यानी प्राणव 


तथा अन्नाय जिसके आश्रित होक 
प्राणादि भतिदिन जीवित रहते ई 

ओर जो शरीरकी स्थिति करेवा 
है, बह है । इस प्रकार यह स्व 


कुछ रस है, जिसे देखकर € 


देवता तृप्त होते है । 'देवगण देलक 
तृप्त होते है-, इसका आशय य 
हे किं इन सबका अपनी इनि 
अनुभव करके वे तुप हो नति है . 
तथा आदित्यके आश्रित होनेसे 


= आदि देह ओर इन्धि 


से रदित भी है ॥ १ ॥ 


~ = 
~; 9 ३ 


हि. 
९. भ्योकि भाव्यसे यः बाद्का णेखा ही स्थ॑ कषा गया है । । 





खण्ड & ] शाङ्करभाष्ये २५९ 


- ८-8-99 96 > 3 399 > >< 


किते निरू्यमा अमृतञ्चुप-| तो क्या वे उचयमहीन रहकर ही 
इस अमृतके उपजीवी होते है ? 


जीवन्ति १ न; कथं तहिं १ नही, तो फिर किस प्रकार हेते दै !- 
त एतदेव रूपमभिसंविशान्त्येतस्माद्रुपादुवयन्ति ॥२॥ 
वे देवगण इस रूपको रक्षित करके दी उदासीन हो जति दै जर 
फिर्‌ इसीसे उत्साहित होते दै ॥ २ ॥ 
एतदेव ॒रूपमभिरश्याधुना | इस रूपो ही रक्षित कर अरथत्‌ 
मोगावसरो नास्माकमिति | अभी हमारे भोगका अवसर नही 


(स ~ | है-एेसा जानकर वे उदासीन हो 
बुद्ध्वा भसि शन्त्युदासत | = 
इट्‌ ^< जते हैँ । भौर जब उस भमूृतके 


यदा वै तस्यागतस्य भोगावसरो | भोगका अवसर उपस्थित होता हे 


== तव इस अमृतसे अर्थात्‌ इस अमृत- 
78 । „ | के भोगके लियि इस रूपसे दी उत्साह- 
त्यथः । एतस्माद्रुपादु्न्लुत्सा यक्त कषे जते है, यमि वो 


हवन्तो भवन्तीत्यथंः । न घ्यनु- जनसह जनन बोर मरती 
त्साहवतामनयुतिष्ठतामलसानां | है, उन्द लेक्रमे भोर्गोकी प्राप्ति 
मोगम्रािरकि दृटा ॥ २ ॥ | होती नही देखी नाती ॥ २ ॥ 
स थ एतदेवमभरतं वेद वसूनामेवेको भूतवाभ्निनेव 
मुखेनेतदेवाशं दृष्टा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंवि- 
शात्येतस्मादरुपादुदेति ॥ २ ॥ 
वह, नो इस पकार इष अ्रतको जानता दै वह वघमोमेसे. ही 


को$ एक होकर अग्निकी ही भषानतासे इसे देखकर तृप हो जाता है । 
वह्‌ इस रूपको र्य करके ही उदासीन हेता दै ओर इस खूपसे दी 


उत्याहित होता है ॥ ३ ॥ 


छा० उ° ९- 


२६० 





सं यः कथिदेतदेवं यथोदित- 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


ध 3. 5 + 


[ अष्याय ३ 


जो कोई पुरुष इस यथोक्त 
अमृतको इस प्रकार [ जानता है] 


मृढ्‌ मधुकरतापरससंक्षरणमूृग्ेद- । अर्थात्‌ ऋग्बेदविदित कर्मरूप पुष. 


विहितकर्मपुष्पात्तस्य चादित्य- 
संश्रयणं रोहितरूपतं चामरतस्य 
प्राचीदिग्गतररिमनाडीसंस्थतां 
वसुदेवभोग्यतां तद्विदश्च वसुभिः 


सहैकतां गत्वाग्निना भुखेनोप- 
जीवनं द्शेनमात्रेण ति स्वभो- 


गावसर उद्यमनं तत्कारापाये च 
संवेशनं वेद सोऽपि वसुवत्सवं 


तथेवालुभवति ॥ ३ ॥ 


से छक्‌-श्रतिरूप मथुकरोकि अभि- 
तापद्वारा रसका संक्षरण होना, 
उसका आदिव्यके आश्रित होना, 
रोदितष्प होना, अमृतका पूर्वदि्- 
्तिनी रदिमनादियोमे स्थित होना, 
वदुनामक्‌ देवौका मोग्य होना, उपे 
जाननेवार्छोका वघुगणके साथ एक- 
ताको प्राप्त होकर अनिप्रधानता- 
से उसके आश्रित जीवन धारण 
करना, उसके ददंनमात्रसे उनका 
८ उसे नाननेवालका ) त्च होना, 
अपने भोगके समय उनका उससे 
उत्सादित होना ओर भगावसरकी 
समा्िपर उदासीन हो जाना 
जानता है वह भी वदु्ओके समान 
इन सव॒ बातोक। उसी प्रकार 
अनुभव करता है ॥ ३ ॥ 





कियन्तं कालं विदांस्तदग्रत- 


मुपजीवति १ इत्युच्यते- 


विद्वान्‌ किंतने समयतक उस 


अमृतके आश्रित होकर जीवन धारण 
करता दै, यह बतलाया जाता है-- 


स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता ` पश्चादस्तमता 


वसूनामेव तावदाधिषः 
. जबतकं आदित्य पूयं दिशसे 
अस्व होता है 


तबतके वह्‌ [ विद्ध 
स्वाराज्यको भ्रा होता है ॥ ४ ॥ 


रस्वाराञ्यं पर्येता ॥ ४ ॥ 
उदित होता है ओर पश्चिम दिशे 
न्‌ ] वपुओंके आधिपत्य ओर 


खण्ड ६ ] 


शाङरभाष्याथ २६१ 


3-9-93 > ~~ ~ ~ 99-98-89 2 5 ~ 8 > 8 


स॒ ॒विद्ान्यावदादित्यः पुर- 
स्तास्राच्यां दिश्युदेता पशास- 
तीच्यामस्तमेता ताबदघनां 
भोगकाटस्तावन्तमेव कारं 
वघ्नामाधिपत्यं स्वाराज्यं 
पर्येता परितो गन्ता भवती- 
त्यर्थः । न यथा चन्द्र 
मण्डलस्थः केवलकमीं परतन्त्रो 
देवानामन्नभूतः । किं तदि ! 
अयमाधिप्त्यं स्वराड्भावं 


चाधिगच्छति ॥ ४ ॥ 


जवतक आदित्य पूर्वकी ओर-- 
पूर्वदिज्ामे उदित होता अर 
पश्चिमकी ओर अस्त होल है तव- 
तक वघुर्भोका भोगकाल है; वह 


विद्वान्‌ उतने ही समयतक वघु्ओके 


आधिपत्य ओर स्वाराज्यको पयता 
सब ओरसे प्राप होता है- एसा 
इसका भावार्थं है । जिस प्रकार 
चन्द्रमण्डरमें स्थित केवर कर्मपरा 
यण पुर्ष देवताओंका भोग्य होकर 
परतन्त्र रहता है उस प्रकार यह 
नहीं रहता । तो फिर किस पकार 
रहता है ? [ इसपर कहते है] 
यह तो आधिपत्य ओर स्वाराज्य- 
स्वराड्भावको भरा हो नाता हे ॥४॥ 


~ च २ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि ठतीयाध्याये 
षष्ठखण्डभाण्यं सम्पणंम्‌ ॥ ६ ॥ 


ववम 


सद्रोके कीवनाश्रयभूत द्वितीय अमृतकरी उपासना 
अथ यदृहितीयमसतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण 
मुखेन न वे देवा अद्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं 
हृष्टा तप्यन्ति ॥ १ ॥ 


अ, जो दूसरा अमूत है, रुदरगण इनदरमधान होकर उसके 
आश्चित जीवन धारण करते हे । देवगण न तो खाते है ओर न पीते 


दै, वे इस अमूतको देखकर ही तृप्त हो जाते ह ॥ १॥ 


त एतदेव रूपमभिसंविशा- रत्येतस्मा दरपादुयन्ति ॥२॥ 


वे इ रूपो लक्षित करके ही उदासीन हो नाति है भोर 
इसीसे उमशीर होते है ॥ २ ॥ 


स य एतदेवममृतं वेद्‌ रुद्राणामेवैको भूवेनद्रेणैव 
सुखेनेतदेवाशतं दष्टा प्यति स पतदेव रूपममि- 
संविरात्येतस्मादरपाटु देति ॥ ३ ॥ 


बह, नो इस प्रकार इस अमृतक्रो जानता हे, र्दोमिसे दही कोई 
एक होक इनदरकी ही भषानतासे इस अमृतको दी देखकर तृप हो 
जाता दै । वह इस रूपसे ही उदासीन हो जाता है ओर इस रूपे 
दी उमरीरु होता है ॥ ३ ॥ 


अथ यदुदवितीयमयतं तद्रा | “मथ यदद्ितीयममृतं तदुदरा उपः 
¢ ` जीवन्तिः इत्यादि श्ुति्ोकरा अर्थ 
उषजीवन्तीरे ।१-२॥ पूववत्‌ है ॥ १-२ ॥ 


] ९ 
खाण्ड ७ | शाङ्करमाष्याथं २६३ 
>9----*--9---- >> ८-8-89 8 ~ ऋ 9 > ऋ ऋ 


स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता 
दविस्तावदक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव 
तावदाधिपर्यस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ 


जवतक आदित्य पूर्वसे उदित होता ओौर पश्चिमम अस्त होता 
है उससे दुगुने समयतक वह ॒दक्षिणसे उदित होता है ओर उत्तमे 
अस्त होता है । इतने समयपयंन्त वह रदरोके दी आधिपलय एवं 
स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ 


स यावदादित्यः पुरस्तादु- | वह आदित्य जबतक पवसे उदित 
देता पश्चादस्तमेता द्विस्ताव- होता ओर पश्चिमम अस्त होता दै 
| उससे दूने समयतक दक्षिणसे उदित 
तततो द्विगुणं कारं दक्षिणत | होता ओर उत्तरम अस्त होता रहता 

६ ठ भोगकार 

उदेतोत्तरतोऽमेता खराणां है । इतना समय सद्रोका भ 
र 7 | हे [अर्थात्‌ वघुभोी जपेशा रदा 

तावद्धोगकालः ॥ ४ ॥ भोगकार दूना दे] ॥ ४॥ 


92 नक >~ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि ठतीयाध्याये 
सप्तमखण्डमाष्यं सम्पुणेम्‌ ॥ ६॥ 





ऋष्क सखु 


~~~ 


आदित्यके जीवनाश्रयभूत तृतीय अमूतकौ उपा्तना 
अथ यत्ततीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन 
सुखेन न वे देवा अश्नन्ति न पिबन्स्येतदेवामुतं दा 
तृप्यन्ति ॥ १॥ 

तदनन्तर जो तीसरा अमृत है, आदिगण वरणग्रधान होकर 
उसके आश्रित जीवन धारण करते दै । देवगण न तो खते दै ओर न 
पीते है; वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते है ॥ १ ॥ 

त एतदेव रूपमभिसंविङन्त्येतस्मा द्रपाहुवयन्ति ॥२॥ 
वे इस रूपको ही लक्षित करके उदासीन होते है जीर इसीसे 
उद्यमशीर हो जाते दै ॥ २ ॥ 

स य तदेवममृतं वेदादित्यानामेवेको भूल 
वरुणेनैव मुखेनेतदेवामतं द्रा तृप्यति स एतदेव 
रूपमभिसंवित्येतस्माद्र पादुदेति ॥ ३ ॥ 

वह, जो इस प्रकार इस ॒असेतको जानता है, आदि्योमिसे दी 
कोई एक होकर वरुणकी दी प्रषानतासे इस अमृतकरो देखकर तृत हो 
जाता है । बह इस रूपसे ही उदासीन होता है ओर इसीसे उद्योगी 
हो जाता है॥३॥ 

स यावदादिस्यो दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता 


दिस्तावरपश्वादुदेता पुरस्तादस्तमेतादित्यानामेव ताव- 
दाधिपत्यशस्वाराज्यं पर्येता ॥  ॥ 


„राक्र 


अण्ड ८ | 


 शाङ्रभाष्याथं २९५ 


$ 4 ~~ 9 + 9 ऋ ऋ ऋ 

वह्‌ आदित्य जितने समयतक ॒दक्षिणसे उदित होता ओर उत्तरं 

अस्त होता है उपसे दूने समयतक पशचिमसे उदित होता ओर पूर्वमे 

अस्त होता रहता है । इतने समयतक वह॒ आदिर्योक दी आधिपत्य 
ओर स्वाराज्यको प्राप्त होता दै ॥ ४ ॥ 


तथा पशचादुत्तरत ऊष्वदेता 


उत्तरोत्तरेण विपर्ययेणास्तमेता । 
द्विगुणकाठात्यये पूवस्मातपूव॑स्माद्‌- 
आक्षेपः द्विगुणोत्तरोत्तरेण का- 
लेनेस्यपोराणं दशनम्‌ । सवितु- 
श्रतुदिशमिन्द्रयमवरुणसोमणएरी- 
पूदयास्तमयकारस्य तुल्यत्वं हि 
पोराणिकैरुक्तम्‌ । मानसोत्तरस्य 
मूरभनि मेरोः प्रदक्षिणावृत्तस्तु 
ल्यत्वादिति । 

अत्रोक्तः परिहार आचार्यः । 
उक्ता्षेप- अम्रावत्यादीनां पु- 
निरसनम्‌ रीणां द्वियुणोत्तरो- 
त्रेण काठेनोद्वासः स्यात्‌ । 
उदयश्च नाम सषितुस्तननिवासि- 
नां प्राणिनां चशगोचरापतति्त- 


दत्ययशचास्तमनं न प्रमाथंतः 


इसी भकार पूर्व-पूव॑की अपेक्षा 
उत्तरोत्तर दूने समयतकं पश्चिम, उत्त 
ओर ऊपरकी भर सूं उदित होता 
है ओर इनसे विपरीत दिशामि भस्त 
होता दहै । किंतु यह तो पुराणदृष्टिके 
विरुद्ध ह; क्योकि पोराणिकोनि चारों 
दिशामि इन्दर, यम, वरुण ओर 
सोमकी पुरिमं सूर्यके उदय ओर 
अस्तके कार समान ही बतरये है, 
कारण कि मानसो त्तर पर्वतके शिखर 
पर ो सूर्यका सुमेर्के चारो ओर 
धूमनेका मागं है वह सर्व्समान हे । 


यह आचायेनि (श्रदरविडाचाये- 
ने ) इस प्रकार इस ( धाक्षेप) करा 
परिहार किया दै--अमरावती 
आदि पुरि्योका उत्तरोत्तर दूने 
समयमे उद्रस ८ नाश ) होता हे। 
उम पूरि्योके निवाियेंकी ष्टिम 
आना ही सूर्थकरा उदय है भोर 
उनकी दृष्टस छ्पि जाना ही 


र्का असत दै । क्तः सयक 





२६६ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ भष्याव १ 


> < < < < < < >< < >< < > >< < >< < 8 8 98 
उदयास्तमने स्तः । तन्निवा- | उदय जौर अस्त दै ही नहीं । उन 
पुरियमिं निवास करनेवाले प्राणियो- 
का अभाव हो जानेपर उनके स्मि 
सुयंदेव उसी माग॑ंसे जति हुए भी 
तो उदित होते हैँ ओर न अस्त ही 
होते है, कर्योकिं उस समय सूर्या 
किसीकी दष्टिका विषय होना अथवा 
न होना समाप्त हो जाता है । 
तथा अमरावती पुरीको अपेक्षा 
दूने समय संयमनी पुरी रहती है। 
अतः उसमे रहनेवाले प्राणियेकि 
स्यि सुर्यं मानो दक्षिणकी ओरसे 
उदित होता है ओर उत्तरम अप्त 
हो जाता दै- यह बात हमरो 
की दष्क लेकर कही गयी है । 
इसी प्रकार आगेकी अन्य परियम 
भी योजना र लेनी चाहिये । तथा 
मेर इन सभीके उतरकी ओर है। 
जिस समय अमरावती परीमे 
सर्य मध्यम स्थित होता दै उत 
समय संयमनी पुरीम वह॒ उदित 
होता देखा जाता दै, ओर 'वंहीप 
मध्याहमे स्थित होनेपर . वरुणकी 
परीमे उदित होता दिखायी देता 


हे । इसी प्रकार उत्तरदिशावर्तिनी 
पुरीके विषयमे समक्षना चाहिये 


क्योकि उसकी प्रदक्षिणाका चक्र 
सर्र समान हे । 


सिनां च प्राणिनाममावे तान्प्रति 


ततैव मार्गेण गच्छनपि नैवो 















देता नास्तमेतेति चचुर्गोचरा- 


पततस्तद्त्ययस्य चाभावात्‌ । 
तथामरावत्याः सकाक्ञाद्‌ 
द्विगुणं कालं संयमनी पुरी 
वसत्यतस्तनिवासिनः प्राणिनः 
प्रति दक्षिणत इवोदेत्युत्तर- 
तोऽस्तमेतीत्युच्यतेऽस्मद्वुद्वि 
चाप्य; तथोत्तरास्वपि पुरीषु 


योजना । सर्वेषां च मेरुरुत्त- 
रतो भवति । 


` यदामरावत्यां मध्याष्टगतः 
सविता तदा संयमन्यामुद्यन्‌ 
दुश्यते,तत्र मभ्याह्गतो वारुण्या 
य्॒न्दृश्यते, तथोत्तरस्याम्‌ प्रद- 
क्षिणाइनेस्तुन्यत्वात्‌ । इलावृत- 


वासिनां स्वेतः पर्वतप्राकारनि 


ज्ड ८ 1 


ज्ाङ्करमाष्याथ 


२६७ 


८-2-98 9८ < < 8 -8 -- <  ‰ ‰ ऋ <-ऋ-ऋ-ऋ-ऋ 


वारितादित्यरदमीनां सवितोष्वं 
इवोदेतार्वागस्तमेता दश्यते । 
पर्वतोध्वच्छि्रभवेशात्सविवप्र- 


काशस्य । 

तथर्गादयृतोपजीविनामग्ता- 
नां च द्वियुणोत्तरोत्तरवीयंव्च- 
मलुभीयते भोगकालदरेगुण्यलि- 
गेन । उद्यमनसंवेशनादि देवानां 
रद्रादीनां विदुषश्च समानम्‌ 
॥ १-४ ॥ 


५० ५ 


सब ओरसे पर्वतरप परशटेद्रारा रोक 
स्यि जानेके कारण इटावृतखण्डमे 
रहनेवार्छोको वह मानो ऊपरकी 
ओर उदित होता ओर नीचेकी ओर 
अप्त होता दिखायी देता है, क्योंकि 
वहाँ सर्यका प्रकाश्च॒पवतोकि ऊपरी 
ख्दरद्वारा दी प्रवेशं करता है । 

इस प्रकार शगादि अमृतके 
आश्रित जीवन व्यतीत करनेवाले 
देवता्ओंके पराक्रमकी उत्तरोत्तर 
द्विगुणताका उनके भोगकारके 
द्विगुणत्वरप रिञ्गसे अनुमान किमा 
जाता है । रदरादि देवता्भां ओर 
विद्वानोके उद्यमन ओर सवेशन 
समान ही रै ॥ १-४ ॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि दतीयाघ्याये 
मष्टमखण्डभाष्यं सस्पृणेम्‌ ॥ ८ ॥ 


(न ५४००० ^ क व 








नकम सरह 


मरुद्गणके जीवनाश्रयभूत चतुथं अमृतक्री उपासना 


अथ यच्चतुथममुतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन 

सुखेन न वे देवा अदनन्ति न पिबन्त्येतदेवामुतं दषा 
तृप्यन्ति ॥ १॥ 

तथा जो चौथा अशत दै, मरुद्गण सोमक प्रथानतासे उसके 


आश्रित जीवन धारण करते हैँ । देवगण न तो खाते है जर न पीते 
है, वे इस अग्रृतफो देखकर दी तृप्त हो नति ह ॥ १ ॥ 





त एतदेव रूपमभिसंविरशन्त्येतस्माद्रपाटुदयन्ति ॥२॥ 


वे इस रूपको रक्षित करके ही उदासीन होते है ओर शसीसे 
उद्यमशीरु हो जाते है ॥ २ ॥ 


~: 9 :~- 


स य एतदेवममृतं वेद्‌ मरुतामेवेको भूत्वा सोमे- 
नेव सुखेनैतदेवामूं द्ठा तृप्यति स एतदेव रूप. 

` मभिसंविशत्येतस्मादर. पादुदेति ॥ ३ ॥ 
वह, जो इख प्रकार इस अमृतो जानता है, मर्तोमिसे ही कोई 
एक होकर सोमक प्रधानतासे ही इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता 


दै । बह इस रूपसे दी उदासीन ही 
उत्साहित होता दै ॥ ३ ॥ ५१९ | शास क 


& 
खण्ड ९ 1 शाद रभाच्याथ २६९ 
~ ~ ~ ¬ >2 > >& ¬> क 9 क ह >: >: ड ऋ > ¬: ~ ~ + 


स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्ता- 


वदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावद्‌ाधि- 


पत्यईस्वाराज्य पयता ॥ ९॥ 


वह आदित्य जितने समयतक पश्चिमसे उदित होता ओर पूवम 
अप्त होता दै. उससे दूने कार्तक उत्तरसे उदित होता ओर दक्षिणम 
अत्त होता रहता है । इतने कार्तक वह मरुदूगणके ही आधिपय ओर 
स्वाराज्यको प्राप्त होता दै ॥ ४॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि ततीयाध्यायं 
नवमसण्डः सम्पणेः ॥ ९॥ 


क 


~ 








दक्ख खणड 





साध्योके जीवनाश्रयभुत पचम अम्रतकी उपासना 
अथ यत्प्चमममुतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा 
मुखेन न वे देवा अदनन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दष्ा 
तुप्यन्ति ॥ १ ॥ 
तथा जो पांचवा अमृत हे, साध्यगण ब्रह्मी प्रधानतासे उसके 
आश्रित जीवन धारण करते है । देवगण न तो सति है ओर न पीते 
है, वे इस अमृतको देखकर दी तृप्त दो जते दै ॥ १॥ 


= 9 --~ 


= र प 
य एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माप्रादूदुवयन्ति ॥२॥ 


वे इस खूपको रक्षित करके ही उदासीन हेते ई जौर इसीसे 
उद्यमशीरु हो जाते है ॥ २ ॥ 


( र 
१ © ¦~ 


स य एतदेवममुतं वेद्‌ साध्यानामेवेको मूता 
बह्मणेव मुखेनेतदेवामुतं दृष्टा तृष्यति स एतदेव 
रूपमभिसोविरात्येतस्माद्रपादुदेति ॥ ३॥ 

वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, साध्यगणममसे दी 
कोई एक होकर ब्रहमाकी ही प्रधानतासे इस अमृतको ही देखकर तृ 


हो जाता दै । बह इस रूपको लक्ष्य करके ही उदासीन होता है ओर 
इस रूप्से ही उत्साहित हो जाता दै ॥ ३ ॥ 


=; 9 ‡-~-= 


खण्ड १० ] श्ाङ्करथाष्या्थं २७१ 
-------8-- <-> ऋ ~प 


स यावद्‌ादिस्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता 
दविस्तावदृध्वं उदेतार्वाडस्तमेता साध्यानामेव तावदाधि- 
पत्यशस्वाराञ्यं पर्येता ॥ ४ ॥ 

वह आदित्य जवतकं उत्तरसे उदित होता है ौर दक्षिणमे 
अस्त होता है उससे दूने समयतक उःपरकी ओर उदित होता है ओर 
नीचेकी जर अस्त होता है । इतने कारुतक वह सारध्याके दी आधिपत्य 
जर स्वाराज्यको प्राप्त होता हे ॥ ४ ॥ 


=! 9 ° 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि ठतीयान्याये 
दश्चमखण्डः सस्पूणः ॥ १० ॥ 








एक्ादक्ल खणड 


~, ०१- 


भोगक्षयके अनन्तर सवका उपसंहार ह्ये जानेषर जादित्यखूप 
त्रह्मक स्वस्वरूपमे स्थिति 


कृत्वेवयुदयास्तमनेन प्राणिनां | इस प्रकार उदय ओर अस्तक 
स्वकम॑फलमोगनिमित्तमनुग्रहं त-। दारा पराणियोंको अपने-अपने करम 

भोगके स्यि अनुगृहीतःकर, उनके 
त्कमेफलोपमोगक्षये तानि प्राणि- कमकरमोगका कय वन 
जातान्यात्मनि संहत्य- प्राणियोका अपने उपसंहार कर- 


अथ तत ऊर्वं उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल 
एव मध्ये स्थाता तदेष इटोकः ॥ १ ॥ 


पि उस पश्चात्‌ वह ऊर््वगत होकर उदित होनेपर फिर भ ते 
उदित होगा ओर न अस्त ही होगा; बल्कि अकेखा ही मध्यमं स्थित 
रहेगा 1 उसके विषयमे यह इरोकं है ॥ १ ॥ 


अथ ततस्तस्मादनन्तरं प्रा- | फिर उसके पर्चात्‌-प्राणियो- 
ण्यनुग्रहकालाद्ष्वः सन्नात्मन्यु- 9 हो 
देत्योट्रम्य यान््रतयुदेति तेषां | अर्थात्‌ जिन प्राणि्योपर ८. 
करनेके ख्य उदित होता है न 

पराणिनामभावाल्स्वात्मस्थो प्राणि्ोक्रा जमाव हो जानेके आ 
(~ अपनेहीमे स्थित हो वह न तं 
देता॒नास्तमेतैकरोऽधितीयो- उदित ही होगा ओर न अस्तदी 
ऽनवयदो मध्ये स्वात्मन्येव | होगा; बल्कि अकेला--अद्वितय 
त्ता अर्थात्‌ निरवयव होकर मध्यमे 

| अपनेभे ही स्थित रहेगा । 





| 
॥ 


खण्ड १९ ] श्ाङकरमाष्यार्थ २७३ 
ऋ < ¬ < ऋ ल 7 


तत्र कथिद्धिद्वान्वस्वादिसमा- | वहाँ [ क्रमणुक्तिमे ] जिसका 
आचरण वघु आदिके समान है ओर 
जो रोहितादि भमृतभोगका भाजन 
भागी यथोक्तक्रमेण स्वात्मानं | दै पेते किषी िद्वानले उप्यक्त क्रमसे 
| आसमभूत सु्येको आतमषूपसे उपरब्छ 
करते हुए समाहितचित्त हो इस 
दितः सन्नेतं मन्त्रं दृष्टोत्थितो- | मन्तका साक्षत्कार कर ्युसथान 
होनेपर अपनेसे प्रक्र करनेवाले एक 
दूसरे व्यक्तिसे इस प्रकार कहा था । 
स्त्वमागतो ब्रह्मलोकाक्कि तत्रा- | उससे जव यह पूढा गया कि 'तुम 
ब्रह्मरोकसे आये हो [ अतः बताओ 
तो ] क्या वह भी सूयं दिन-रात 
सविता प्राणिनामायुः क्षपयति | विचरता हुमा भाणिर्योकी आायुक 
$ क्षीण करता है जिस प्रकार कि वह 
यथेहास्माकमितयेवं पृष्टः प्रत्याह यँ हमारी आटुका क्षय करता है ¢ 
तत्तत्र यथाप यथोक्ते चार्थ | --ठब उसने निम्नाङ्कित उत दिा। 
“इस प्रकार पूछे इए उपयुक्त प्रशषके 

एष श्लोको भवति तेनोक्तो | विषयमे उसयोगीदराा कहा हुआ यह 


योगिनेति भ्रुव चनमिदम्‌ ॥|१।। | शोक दै ॥ यह श्रुतिका बाय ॥१॥ 


~? ® ˆ~ 


नाचरणो रोहिताद्यमृतभोग- 

सवितारमात्मत्वेनोपेत्य समा- 
५ 

ऽन्यस्मे पृष्टवते जगाद । यत- 


म (~ ¢ 
प्यहोरात्राभ्यां परिवतमानः 


ब्रह्मलोकके विषयमे निद्रानका अनुमव 
नवे तन्न न निम्लोच नोदियाय कदाचन । 
देवास्तेनाह्सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥ 


वहाँ निश्चय ही पेसा नहीं होता । वों [ सूयक ] न कमी अक्त 
होता दै ओर न उद्य होता है । हे देवगण | इस स्के दवार मे 
नदसे विरुद्ध न होऊं ॥ २ ॥ 





2,७४ 


छान्दोष्योयनिचह्‌ 


[ सच्याष 


"अ द 1 ट 89 ऋ 4 


न वै तत्र यतोऽहं ब्रह्मलोका- 
दागतस्तस्मिन्न वै तत्रेतदस्ति 
यत्पृच्छसि । न हि तत्र निम्ो- 
चास्तमगमत्सविता न चोदिया- 
योद्रतः इतधित्कदाचन कस्मि- 
धिदपि कार इति । 

उदयास्तमयवजितो ब्रह्मलोक 
इत्यनुपपन्नमित्युक्तः शपथमिव 
प्रतिपेदे । ` हे देवाः साक्षिणो 
यूयं शृणुत यथा मयोक्तं सत्यं 

. वचस्तेन सत्येनाहं बरह्मणा बह्म- 
स्वरूपेण मा विराधिषि मा 
विरुष्येयमप्राषित्रहणो मम मा 
भूदित्यर्थः ॥.२ ॥ 


जह से- जिस बऋ्मरोकते भ 
आया ह-वहां उसमे निश्चय ही यह्‌ 
तम जो कुछ पूते हो नही दै। 
वहाँ न तो सूर्यास्त होता दै गैर 
न कभी किमी भी समय सूय 
कहते उदित होता है । 

नह्रोक सूयके उदय बौर 
अस्तसे रहित है--यह वात तो भस- 
ङ्गत है- इस प्रकार कहे जानेपर 
वह मानो शपथ करता है-हे 


| देवगण । तुम साक्षी हो, घनो- 


मैने जो सत्य वचन कहा है उष 
सत्यके द्वारा भै ब्रह्मसे- जक्षके 
स्वरूपसे विशुद्ध न होऊ; अर्थात्‌ 
मुञ्चे ब्रह्मकी अप्राप्ति न हो ॥ २॥ 





मधुविद्याका फल 


सत्यं तेनोक्तमित्याह भुतिः-- 


उसने सत्य ही कहा है-- गह 
बात श्रुति बतल्मती है-- 


न हवा अस्मा उदेति न निम्लोचति सङ्कहिवा 
हेवास्मे भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषद्‌" वेद्‌ ॥ २ ॥ 
जो इस पकार इस ब्रह्मोपनिषद्‌ ( वेदरहस्य ) छो जानता दै 


उसके खयि न तो सुका उद्य होता दै जर न॒ अस्त होता है । 
उसके स्थि सवेदा दिन ही रहता है ॥ २ ॥ 


न इ वा अस्मै यथोक्तबरह्म- 


विदे नोदेति न निम्लोचति 





इसके अर्थात्‌ उपर्युक्त बरहवेत्ताके 


ल्यिन तो सूर्यं उदित होता है 


भोर न अस्तमित ही होता. दै । 


ण्ड ११] 


` ` शाङ्कप्माष्याथं 


२७५ 


~> >3- 32८ >< >< > > > 2. 98 < ए ॐ > क 9 अ 9 = 4 


नास्तमेति किन्त ब्रह्मविदे 
सकृदिवा दैव सदेवादभेवति 
स्वयंज्योतिषटात्‌ । य एतां 
यथोक्तां ब्रह्मोपनिषदं वेदगुद्य 
वेद । एवं तन्त्रेण वंशादित्रयं 


प्रत्यमृतसम्बन्धं च यच्चान्यद्‌- 


वोचामैवं जानातीत्यर्थः ` । 
विद्राचुदयास्तमयकारापरिच्छें 
नित्यमजं ब्रह्म भवतीत्यर्थः 


॥ ३ ॥ 


बस्कि इस ब्रहवेत्ताके ल्य सङ 
दिवा-सर्वदा दिन ही बना रहता 
है, क्योकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप 
होता है [ पेसा किसके स्थि होता 
ह £.देसा प्र होनेपर कदते है --] 
जो इस उपर्य ब्रह्मोपनिषद्‌ - वेद- 
रदस्यको जानता दै; भर्यात्‌ जो 
शाल्दरारा वंशादित्रय प्रत्येक अमृत 
के साथ वस्तु आदिका सम्बन्ध तथा 
ओर मी जो कुछ हमने कहा है उसे 
उसी प्रकार जानता है । तात्ययं यह 
है कि वह विद्वान्‌ उदम शौर 
अस्तद्प कासे भपरिच्छेशच नित्ब 
अजन्मा ब्रहम ही हो जाता है ॥३॥ 








॥ तम््दायपरमरा । 

तद्धेतद्ब्ह्य भ्जापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे 

मनुः परजाभ्यस्तद्धेतदुदाखकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय 
पिता बरह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥ 

वह यह मृजा तरहमने विराट भ्जापतिसे का आ, परनापतिन मनुसे 


कहा ओर मनुने प्रजावर्गके प्रति कहा । तथा अपने.ज्ये्ठ पत्र अरुणनन्दन 
उदालकको उसके पिताने ईस ्रहमविज्ञानका उपदेश दिया था ॥ ४ ॥ 


तद्धतन्मधुक्ानं ब्रह्मा हिरण्य- | , वह यह मधुशान रह्मा-दिरण्य- 
गर्भने विराट्‌ प्रनापतिको घुनाय। था । 


गभो विराजे प्रजापतय उवाच। । उने भी इसे मनुको सुनाया ओर 





न ~ 
१ तिसथीनवंश, मध्वपूप ओर मधुनाडी--इन तीर्नोको । 


२७द छन्दोग्योनिषद्‌ [ अध्याय 


> 3 
सोऽपि मनवे । मनुरिश्वाक्रा- | मनुने दक्वा आदि भनावमं (अप 
याभ्यः प्रजाभ्यः प्रोवाचेति | संतान) को घुनाया-इप भकना 
विद्यां स्तौति ब्रह्मादिविशिष्टकर- | ह विचा त्रहादिवििष्ट परर 
मागतेति । कं च तदधतन्मधु- | आमी, &' येमा ह शिक 


ओ .पि विद्यकौ स्तुति करती दहै । ए 
लानयुदारुकायारुणये पिता नही, यह मधृजञान अरुण उ 
ब्रह्मविज्ञानं ग्येष्ठाय पुत्राय | ल्कको अर्थात्‌ यह बरह्मविज्ञान पित 


प्रोवाच ॥ ४ ॥ अपने उ्वेषठ पुत्रको घुनाया था ॥४॥ 





इद वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म परब्र 
यात्‌ प्रणाय्याय वान्तेवासिने ॥ ५ ॥ 


जतः इस ब्रहविज्ञानका पिता अपने ज्येष्ठ पुत्रो अथवा घुयोण 
िष्यको उपदेश करे ॥ ५ ॥ 


इदं वाव तद्यथोक्तमन्योऽपि } अतः कोई दूसरा विद्वन्‌ भी ग 
उयेष्ठाय पुत्राय स्प्रियार्हाय बहम | उपर्ु् ्रहमविञान सबसे पिय वतु 
्रनूयात्‌ । प्रणाय्याय वा योग्या- | पात्र अपने ज्येष्ठ पुत्रको ही बति | 
द्ान्तेवासिने शिष्याय ॥ ५ ॥ । जो शिष्य सुयोग्य हो उससे कदै॥५॥ 


अक 9 (2 [द 


१. कस्मेचन यद्यप्यस्मा इमामद्धिः परि. ' 
णीता धनस्य पूर्णां दयादेतदेव ततो भूय इत्येत 
देव ततो भूय इति ॥ ६ ॥ 


किसी दूसरे नही वतलावे। ययि व, 
परिवेष्टित जर ते परं 9 इस आचायको यह सयुर" 


सारी एथिवी दे [ तो भी किसी 1 


खाण्ड १९ |] शाडरभाष्याथं २७७ 
~अ ------- 


9-9-99 + 
दूसरेको इस विदयाका उपदेश न कर, क्योकि ] उससे यदी बढ़कर है, 
यही बढ़कर दै ॥ ६ ॥ 


नान्यस्म कस्मैचन प्र्ुयात्ती। क्रिसी जोरको इसका उपदेश 
न करे-पेसा ककर श्रतिने 

धद्यमलुक्तातमनेकेषां प्राप्तानां | आचारं (विचा देकर विधा सीसने- 
वाटे) आदि अनेकं तीर्था ८ विदा- 

तीर्थानामाचायादीनाम्‌। = दानके पातो ) मसे केवर दो तीर्थ 
८ ज्येष्ठ पुत्र ओर योग्य शिष्य ) के 
ल्थि दी अज्ञादी है। कितु इस 
इत्याद- विद्याके पात्रिका संकोच क्यो किया 

कृतम्‌ १ इत्याह- यद्यप्यस्मा ग 
आचार्याय इमां कथित्पथिवी- | यदि इस विघय।का बदला. चुश्चनेके 
च्य कोई पुरुष इपत॒ आचाय 
जरसे परिगृहीत अर्थात्‌ सथुद्रसे 
धिरी इरे ओर षनसे परिपूणं यानी 
भोगको सामग्नि्योसे सम्पन्न यह सारी 
परथिवी मी दे तो भी वह इसक। बदला 
नहीं हो सकता १ रकर्याकि उष 
दानसे भी यह मधुविदयाका दान ही 
बड़ा--अधि$ फल्वाल है, ेसा 


सयुनस्तीथसंकोचनं विब्रायाः 







मद्धिः परिगृहीतां र 
वेष्टितां समस्तामपि दद्यात्‌, यस्या 
विद्याया निष्कयार्थम्‌, आचा 
धनस्य पूर्णां संपन्नां भोगोपकर- 
णैः; नासावस्य निष्क्रयः, यस्मा 
ततोऽपि दानादेतदेव य॑न्मधुवि- 
द्यादानं भूयो बहुतरफलमित्यथः || इसका तात्पयं दे । द्विरुक्ति विधा 
दिरम्यास आदरार्थः ॥ & ॥ । आद्रके ल्थि हे ॥ & ॥ 


---भ-न्टक ~ 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदिं द्वितीयाध्याये 
यकाद्शकण्डभाष्यं सम्पृणोम्‌ ॥ ११॥ 


५ 
क्क @ > 


दहदः शकर 
{= 
गायश्री द्वारा बह्मकी उपाक्तना 
(~ द 
यत एवमातशयफलेषा ब्रह्म- | क्योकि इस प्रकार तऋव्धि 
अतिशय फल्वती है ६सरिये उपक 
अन्य प्रकारसे भी वणेन कल 


६ ६ १ 
वक्तव्येति गायत्री वा इत्यादचा- | चाहिय इसे गायत्र वा, हि 
मन्त्रका आरम्भ किया जाता है| 


विद्यातः सा ब्रकारान्तरेणापि 


रम्यते । गायत्रदरारेण चोच्यते, गायत्ीद्रारा भी ब्हमका दी निह । 
५ किया जातां है, क्योकि नेति नेति 
जक्षणः सवविरोपरहितस्य नेति | इत्यादि भकारसे वरे रि. । 


नेतीत्यादिविशेषप्रतिषेधगम्यस्य | दवारा अनुमूत होनेवाला स्वविष 
 दु्बोधत्वात्‌। सत्स्वनेकेषुच्छन्दःसु वाला है । अनेको छन्दोके रहे 
अ्ञानदारतयोपा गायप्री्ष 

गायज्या एव | इए भी प्रधानताके कारण गाय 
ही ब्रह्ज्ञानके द्वाररूपसे श्र्ट्ण 
दान प्राधान्यात्‌ । सोमाहरणादित- किया नाता है । सोमाह्रण " करने 


रच्छन्दोऽ्षराहरणेनेतरच्छन्दो- | न्य छन्दोके क्रोको रनेसे* 


(1 व ~ 
9. एक बार सोमाभिलाषी देवताओंने सोम ठ्न ख्य गायत्री, त्रिष 


ओर जगती-इन तीन छन्दको नियुक्त किया; परंवु असमर्थं होनेके कारण 


ओर बिष्टप्-ये दो छन्द तो माग॑मेसे ही टो आये, केवल एक गायत्री छण्दरी 
सोमके पास जा खका ओर वही 


सोमके रक्चकोको परास्त कर॒ उसे देवताओंकं 


पास लावा । यह्‌ कथा एेतरेय बराह्मणम “सोमो वै राजामुष्मिल्टोक आसीत्‌' दव 
प्रसङ्खमे आयी है । 


२. गायत्रीके सिवा जो ओर 


-जानेके कारण अपने कुक अक्षर छोड आये थे । जगतीके तीन ॥ 
| न अक्षर ओर तिष्ट 
प्क अचर ये मागमे रह गये ने । इन्दे लाकर गायन्रीने उनकी पूर्तिं की । 


रहित ब्रह्म कटिनतासे समक्षम भाने" | 


छन्द सोम कनेके खयि गये थे वे मार्गत हीथक 


। 


॥ 
। 
| 


॥ 
¶। 


| 
। 
| 
। 


ण्ड १२] स्ा्ुरभाष्याथं २७९ 
ॐ 2-9-99 | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 5 ॐ ॐ 4 
© व्याप्त #1 
व्याप्त्या च 3 इतर स व्याप्त ध र 
= सभी सवनम व्यापक होनेसे* यज्ञम 
धान्यं च्याः । गाय- 
यजत प्राधान्यं ग।यत्याः । गाय- | गायत्री परषानता दै । क्योकि 
्रीसारत्वाच्च ब्राह्मणस्य, मातर | र्षक सार्‌॒ गायत्री ही ह, 
भिव हित्वा गुरुतरां गायत्रीं इसलिये उपयुक्त ब्रह्म भी माताके 


1 „ _ | समान गुरुतरा गायत्री को छोडकर 
ततोऽन्यद्शुरुतरं न प्रतिपद्यते | उससे उक्षत किसी अन्य 


यथोक्तं ब्रह्मापीति । तस्यामस्य- | आटग्बनको प्रात नही होता, क्योकि 


तौ 5 उसमे लोकका अव्यन्त गौरव प्रसिद्ध 
न्तगौरवस्य प्रभिद्धत्वात्‌ । अतो | ही ह । अतः गायत्रीके द्वारा ही 


गायत्रीभुखेनैव ब्रह्मोच्यते-- । यका निरूपण करिया जाता है-- 
गायत्री वा इद ९ सर्वं भूतं यदिद" किं च वाग्व 
गायत्री वाग्वा इद्‌< सर्वं भूतं गायति च घ्रायते च ॥१॥ 
गायत्री ही ये सब मूत-प्राणिवगं हैँ । जो कुछ भी ये स्थावर-जंगम 
माणी है बे गात्री ही है । वाक्‌ ही गायत्री है जौर वाक्‌ ही ये सव पराणी 
है, क्योकि यदी गायत्री उनक्षा गान ( नामोक्चारण ) करती ओर उनकी 
[ भय आदिसे ] रक्षा करती दै ॥ १ ॥ 
गायत्री बा ₹ईत्यवधारणा्ं 


वैशब्दः । इदं स॒वं भूतं प्राणि- 
जातं यक्कि च स्थावरं जङ्गमं वा 


“गायत्री वै" इस पद मे “वै शब्द्‌ 
निश्चयार्थक दै । ये समस्त भूत 
अर्थात्‌ ये जो कुछ स्थावर-जङ्गम 
प्राणी है वे सब गायत्री ही दै । 


तत्सवं गायन्येव । तस्यारछन्दो- | बह ८ गायत्रो ) तो केवर छन्दमातर 


१. उष्णिक्‌ ओर अनुष्टुप्‌ आदि अन्य छन्दोंके प्रत्येक पाद्मे क्रमशः ७ ओर 
८ आदि अक्षर होते ह ओर गायत्रीके एक पादम ६ अक्षर होते ईहःइखटिये यह उन 
छन्दोम मी व्यास है, क्योकि मधिक संख्याकी सत्ता स्यून संख्याके निना 
नहीं हो सकती । स 
२, भावःखवन गायन है, मध्याहसवन शट है ओर ठृतीय सबन जागत 
हे । अर्यात्‌ गायत्री, निषटुप्‌ मौर जगती ये क्रमशः उनके छन्द ईं । गायत्री 
त्रिष्टुप्‌ मर जगतीमे व्याप्त है; इसखिये वष्ट उन सवनो भी व्यापक हे । 

















२८० छान्दोग्योपनिषद्‌ 


ऋ ~ ८-८9-9 ९ 


€ 


मात्रायाःसवेभूतत्वमनुपपन्नमिति। 


हे, उसका सर्वमूतरूप होना तै 


गायत्रीकारणं १४ ~ ( 
गायत्रीकारणं वाचं शब्दशूपा- | सम्भव नहो है; अतः वागे ग्री 


मापादयति गायत्रीम्‌, बागे 
गायत्रीति । 
वाग्वा इदं सवं भूतम्‌ । 


यस्मादाक्शब्दरूपा सती सवं 
भूतं गायति शब्दयत्यसौ गौर- 
सावश्व इति च, त्रायते च रक्षत्य- 
यष्मान्मा भेषीः, किं ते भयगरु- 
त्थितम्‌,इस्यादिना सर्वतो भया- 
निवत्यमानो वाचा त्रातःस्यात्‌। 
यद्वाग्भूतं गायति च त्रायते च 
गायच्येव तद्वायति च त्रायते च 
वाचोऽनन्यत्वाद्रायत्याः। गाना- 


त्राणाच्च गायत्र्या गायत्रीतवम्‌ 
॥ १॥ 


+ , यावे सा गायत्रीयं वाव सा येयं परथिव्यस्याई ¦ 


| हद सवं भूतं भ्रतिष्टितमेताैव नातिर्ीयते ॥ २॥ 1 


ठेस कहफर श्रुति गायत्रीकी कार. 
मूत शब्दरूप वाकको ही गाणी 
कहती हे । 

वाक्‌ ही यह सव भूतसपुद 
हे; क्योकि शब्दरूप हुई वह 
समस्त भूर्तोका गान--शब्द यती 
नामोल्टेल करती है; जैसे ह गौ टै 
“यह अश्च हैः इत्यादि; तथा णी 
तराण- रक्षा करती है; जेते से 
मत इरः तुञ्ञे क्या भय उन्न इ 
है ? इत्यादि वाकर्योसे सब जे 
भयते निवृत्त किये जानेपर्‌ वाणे 
ही द्वारा मनुष्यक रक्षा कौ जाती 
है । इस प्रकार वाणी जो प्राणिर्योका 


[ मध्याय 


गान जौर त्राण करती है वह गत | 
ओर त्राण गायत्रीके द्वारा हीक्ि | 
जाता है, क्योकि गायत्री वाणी 
भिन्न नही है । गान जीर त्राण | 
करनेके कारण दही गायत्री | 


गायत्रीत्र है ॥ १ ॥ 


| 
| 
| 
| 
। 
॥ 


॥ 
| 


कश्ड १२] 


शांहरमाण्वाथं 


२८१ 


= ~ ॐ ¬> >9: -8 ~ ~ ~ 8 ~ ~ ~ ~ ऋः 
लो वह गायत्री है वह यही दहै, जो किं यह प्रथिवी है; क्योकि 
इसीमें ये सव मूत स्थित है भर इसीका वे कभी अक्क्रिमण नहीं 


करते ॥ २ ॥ 

या वै सैवंलक्षणा सवभूतरूपा 
गायत्री; दयं वाब सा येयं 
पृथिवी । कथं पुनरियं पृथिवी 
गायत्रीति ! उच्यते-सवेभूतसंब- 
न्धात्‌ । कथं सवेभूतसंबन्धः ! 
अस्यां प्रथिव्यां हि यस्मात्स 


जो वह ेसे रक्षणोवाटी सव- 
भूतरूप गायत्री है वह यही है, जो 
कि यह पृथिवी हे। किंतु यह पृथिवी 
गायत्री किसप्रकार है १ सो बतलाया 
जाता है- सपूणं प्राणिरयोसे इसका 


सम्बन्ध होनेके कारण यह गायत्री 


हे । इसका समस्त प्राणिर्योसे किस 


स्थावरं जङ्गमं च भूतं प्रतिष्ठितम्‌ \| भकार सम्बन्ध दै १ वथो ईस 


एतामेव परथिवी नातिशीयते परथिवीमे 


नातिवतंत इत्येतत्‌ । 


यथा गानत्रागामभ्यां भूत- 


ही समस्त स्थावर तथा 
जङ्गम प्राणी स्थित दै ओर वे इस 
प्रथिवीका दही अकक्रिमण अर्थात्‌ 
अतिवतंन कभी नहीं करते । 

निस प्रकार गान ओर त्राणके 


संबन्धो गायन्याः, एवं भूतप्रति| कारण गायत्रीका भाणिर्योसे सम्बन्ध है 
छ्ानाद्भतसंबद्धा पृथिवी; अतो | उसी भकार मूरतोकी भष होनके 


गायत्री पृथिवी ॥ २॥ 


कारण प्रथिवी मूरतोसे सम्बद्ध हे 
अतः प्रथिवी गायत्री हे ॥ २॥ 





याते सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे 


रारीरमस्मिन्दीमे प्राणाः 
दीयन्ते ॥ ३ ॥ 


प्रतिष्ठिता एतदेव नाति- 


लो भी यह प्रथिवी है वह यदी दहैनोकि इस पूरुषम शरीर 
ह; वर्योकि इसीम ये प्राण स्थित. है ओर इसीको पे कभी नहीं 


छोड़ते ॥ ३ ॥ 





२८२ ` छाल्दोग्योपनिषल्‌ [ बच्याय १ 
ब व 
यावे सां परथिवी गायत्री; हयं | नो भी वह्‌ प्रयिवीरूप गायत्र 
वाव सेदभेव;तत्किम्‌ १ यदिद्म- | दै वह यह निश्चय ही दै; यही कौन ! 
स्मन्पुरुषे काय॑करणसंघाते जी- | नो इस पृरू्भे-मूत जोर इन्दरोके 
ति शरीरं पाथिवत्ाच्छरीरस्य । | सनीव संभा शरीर दै, वयो 
9 तः ५. शरीर पृथिवीका हो विकार है । 


- शरीरका गायत्रीत्व किंस प्रकार 
र ायतरीत- हे १सो बतलाया जाता दै; क्योकि 


मिति ! उच्पते--अस्मिन्दीमे वीतं त चन्द 
माणा मूतच्न्दवाच्याः परतिषठि- | परत्ठित है । अतः पृथिवी समान 
ताः, अतः पृथिवीवद्‌ भूतशब्द्‌- “भूत शब्दवाच्य पराणोंका अषिष्ठान 
नाच्यप्राणप्रविष्ठानाच्छरीरं गा- | होनेके कारण शरीर गायत्री 
यत्री; . एतदेव यस्माच्छरीरं | क्थोकि पराण इस शरीरका दी 
नातिशीयन्ते प्राणाः ॥ ३ ।, । अतिक्रमण नहीं करते ॥ २॥ 


-; ° {~ 


यदवे तत्पुरुषे शरीरमिद' वाव तच्यदिद्मस्मिन्नन्तः- 
पुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्टिता एतदेव 
नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥ " | 


जो भी इस पुरुषे शरीर है वह यदी हे, जो किं इस अन्तःपुर. 
मे हृदय हे; क्योकि इसीमे ये प्राण प्रतिष्ठित है ओर इसीका अतिक्रमण 
नहीं करते ॥ ४ ॥ 


यदव सुरूपे शरीरं गायत्रीदं । जो भौ इस ॒पुरुषमेः शरीररूप 


क गायत्री है वह यही है, जो कि हस 
वाव तत्‌। "तम्य | जन्तःषुरष- मध्यवती पुरुपम 


परुषे हृदयं पण्डरीकार्यभेतद्रा- एण्डरीकसंुक हृद्य है | वह गायत्र 
यत्री। कथम्‌!इत्याह-अस्मिन्दीमे है । किष प्रकार £ सो वतरते दै-- 


खण्ड १२] शाद्रमभ्वाथे २८३ 


प्राणाः प्रतिष्ठिताः; अतः शरीर- | क्योकि इसीमे ये प्राण प्रतिष्ठित दै । 
बद्भायत्री हृदयम्‌ । एतदेव च | अतः शरीरके समान हदय 
नातिश्चीयन्ते प्रामः । “प्राणो ह | गायत्री है, क्योकि प्राण इसका भी 
पिता प्राणो माता ।' ( छ० | अतक्रिमण नही करते । “राण 
उ० ७ । १५ । १ ) (अर्हिस- | पिता है, प्राण माता दै» “सम्पूणं 


न्सवंभूतानि" ( जछा०उ० ८ । | प्राणिर्योकी दसा न करते हुए” 
१५ । १ ) इति च श्रुतेः, भृत- | इत्यादि शतिं होनेके कारण भाण 
शब्दवाच्याः प्राणाः ॥ ४ ॥ | भूत' शब्दवाच्य है ॥ ४ ॥ 

~ (=) १-~-- 


सेवा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदचाभ्य- 
नृक्तम्‌ ॥ ८॥ 

वह यह गायत्री चार चरणोवारी ओर छः प्रकारकी है । वह यद 

[ गायच्थाख्य ब्रश ] मन्त्रो द्ारा प्रकालित किया गया है ॥ ५॥ 
सेषाः चतुष्पदा षडक्षरपदा | वह यह चार पदोवाडी ओर 
छन्दोरूपा सती भवति गायत्री | 9-ढः भक्षरोके पदोवारी दै ता 
पदूबिधा वाम्भूतध्रथिवीशरीरहदयः। वा, म थिवी, शरीर, हदव 
ॐ भ ओर प्राणरूपा होनेसे वष्ट षदविषा- 
प्राणरूपा सती षड्विधा भवति । | _ ह 
प छः प्रकारकी है । वाक्‌ ओर प्राण 
वाक्प्राणयोरन्याथनिरदिंटयोरपि | का यपि अन्य अर्थे निर्देश ङा 
गायत्रीप्रकारत्वम्‌; अन्यथा षड्‌- गया दै, तो भवे ८ भकार- 
विधसंस्यापूरणानुपपततः । तदे- | रूपे स्वीकृत किये जते हैःअन्यथा 
ल + गायत्रीके छः प्रकारो की संख्या पूणे 
तस्मि्िथं एतदरायत्याख्यं ज्म | नही हो सकती । इसी अर्मे यह 
गायभ्यनुगतं गायत्रीखेनोक्त- । गायत्रीसंज्ञक नक्ष, जो गायत्रीका 


> 9 ल 9 अ 8-9-88 ऋऋऋ ३ 


सचापि मन्त्रेणाभ्यन्‌क्तं प्रका- 


रितम्‌ ॥ ५॥ 


अनुगत जीर गायत्रद्वारा ही परि 


पादित दै, ऋचा यानी मन्ते भ 
प्रकारित किया गया है ॥ ५॥ 


अवट 9 -- 


अयद ओर शु नहाका मेद 
तावानस्य महिमा ततो ज्यायारश्च पूरुषः । पादो. 
ऽस्य स्वा भूतानि त्रिपादस्याघसं दिवीति ॥ ६ ॥ 


[ उपर जो कुछ कहा गया 


है] उतनी ही इस ( गयन्या्य 


ब्रह्म ) की महिमा हे; तथा [ निविकार | पुरुष इससे भी उक्ष है । 


+७ मो 
सम्पूणं भूत इसका एक पाद है जर 


प्रकारामय स्वात्मा स्थित है ॥ ६ ॥ 


तावानस्य गायत्याख्यस्य 
ब्रह्मणः समस्तस्य महिमा विभूति- 
विस्तारः । यावां अतुप्पासषड्वि- 
धश्च ब्रह्मणो विकारः पादो गाय- 
नीति व्याख्यातः । अतस्तस्मा- 
दविकाररक्षणाद्वायत्याख्याद्वाचा- 


रम्भणमात्रात्ततो ज्यायान्महत्त- 
रथ॒ परमाथसत्यरूपोऽविकारः 
पूरुषः पुरुषः सर्व॑ूरणातपुर 
शयनाच । 


दसका [ पुरुषसंज्क ] त्रिपाद्‌ अमृत 

इस गायत्रीसं्ञक समस्त (पद 
विभागविरिष्ट) ब्रह्मो उतनी ही 
महिमा विभूतिविस्तार है, नितना 
कि चार्‌ पादवाला ओर छः प्रकर 
का ब्रह्मका विक्रारभूत एकपद 
गायत्री है; ठेसा कहकर नि्पण 
किया गया है । अतः उस विकारभूत 
वाचारम्भणमात्र गायत्रीसं्कं 
ब्रहमसे परमाथं सत्यस्वहूप निविकार 
पुरुष उक्ृष्ट॒महत्र॒दै; नो 


सबको पूरित करने तथा शरीरूप , | 


पुरमे शयन करनेके कारण पुरुष 
करता है । 


ण्ड १२ ] शाङ्करमाष्या्थे २८५ 
> अ 9 9 


तस्यास्य पादः सर्वा सर्वाणि | तेन, अन्न ओर यप्‌ आदि सम्पूणं 
भूतानि तेजोऽबन्नादीनि सर्था- | स्थावर-जङ्गम प्राणी उस इस पुरुषका 
वरजङ्खमानि । त्रिपास्रयः पादा | एक पाद है । तथा वह्‌ त्रिपत्‌-- 
अस्य सोऽयं त्रिपात्‌ । त्रिपाद्‌- | जिसके तीन पाद हों उसे (त्रिपात्‌, 
मरतं पुरूषाख्यं समस्तस्य गाय- | कहते है समस्त गायत्रीरूप पुरुषका 
ऽयात्मनो दिवि चयोतनवति | पृरुषसंजञक त्रिपाद्‌अमृत दिविति 
स्वात्मन्यवस्थितमित्यथं इति | मानम यानी प्रकाशस्वरूप स्वाम 
॥ ६ ॥ स्थित है-रेसः इसका तापं है।।६॥ 


भूताकाश, देहाकाशच जर हृदगराक्ञाशाकरा अभेद ` 


यद्धे तदूब्रह्मतीद्‌' वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषा- 
दाकाशो यो वे स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥७॥ अयं 
वाव स योऽयमन्त॒ पुरुष आकाशो यो वे सोऽन्तः 
पुरुष आकाशः ॥ < ॥ अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय 
आकाशस्तदेततपू्णमप्रवति पूर्णामप्रवतिनोऽधरियं 
लभते य एवं वेद्‌ ॥ ९ ॥ 


ओ भी वह [ त्रिपाद्‌ अमृतरूप ] बह्म है वह यही है, जो कि 
यह पुरुषसे बाहर आकारा है; ओर जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश 
है। वह यही है जो कि यह पुरुषके भीतर आकाश दै; तथा जो भी 
यह पुरुषके भीतर आकारा है । वह यही दै जो कि इदयके अन्तरगत 
जाक है । वह यह हृदयाकार पूणे जीर कंदी मी प्रवृत्त न होनेवाख 
है । जो पुरुष एेसा जानता दै वह पूणं ओर कीं प्रवृत्त न होनेवाडी 
सम्पति प्राप करता दै ॥ ७-९ ॥ 


२८६ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याद ६ | 


>< 8 < ८ < ऋ >< ऋ 3८ ऋ: < >< 8८ ८ < < 8८ < ८ क ट 9 । 


यदवे ततिपादमतं गायत्री- 


जो कमी गायत्रीके द्वारा कहा हुभ 


युखेनोक्तं बहोतीदं वाव तदिद- | वह त्रिपाद्‌ अमृत रहम है वह यही १ 


मेव ॒तय्योऽयं प्रसिद्धो बहिर्धा 
बहिः पुरुषादाकाशो भौतिको 
स॒ वहिर्धा पुरुषादा- 
काश उक्तः ॥७॥ अयं 
वाव स योऽयमन्तः पुरुषे शरीर 
आकारः | 
यो वै सोऽन्तःपुरूष आका- 
शः ॥ ८ ॥ अयं वाव स 
मन्तहंदये 
योऽय हदय पुण्डरीक 
आकाशः । 
कथमेकस्य सत आकाशस्य 
त्रिधा भेद इति ? उच्यते- 
बा्येन्दरियविषये जागरितस्थाने 
नभसि दुःखबाहुल्यं दुर्यते 
ततोऽन्तःशरीरे स्वमस्थानभूते 
मन्दतरं दुःखं मवति स्वरान्‌ 
पर्यतः । हृदयस्थे पुनन॑मसि 
न क्श्चन कामं कामयते न 


कच्चन स्वं प्रयति । अतः 
५ खनिवृत्तिरूपमा 
सथदुःखनदृत्तिरूपमाकाशं सुषु- 
प्रस्थानम्‌ । 


वह निश्चय यही डहैबो किय 
नाहरकी भोर-पुरुषसे बाहर प्रसि 
भौतिक आकश्च दै । तथानोभी 
यह ॒पुरुषसे बाहर भकार बतशशया 
गया है ॥७॥ षह यही है बो पु 
अर्थात्‌ क्षरीरके भीतर आकाश दै । 
जो भो वह पुरुषके भीत 
आकाश्च है ॥८॥ वह यही है बो 
यह हृदयके भीतर अर्थात्‌ हृदय" 
पण्ठरीकमे भाकाक्ञ दै । 
एक होनेपर भी आका्टका तीन 
प्रकारका मेद्‌ क्यों प ् 
होनेपर कदा जाता है- जो ब 
इन्दियोका विषय है जर जिसकी 
जाग्रत्‌ अवत्थामे उपरन्धि होती ह 
पेसे इस भाकाक्षमे दुःखी बहुता, 
देली जाती दै । उसकी अपिश 
स्वप्ने उपलब्ध होनेवाले शरीरान्तः 
गेत भाकनाशम स्वप्न देखनेवाले ध 
षको मन्दतर दुःख होता है । कि 
हदयस्य आकाशम जीव न तो किसी 
मोगकी इच्छा करता दे जौरन 
कोद स्वप्न हौ देखता दै; अतः 
सिम उपरुन्ध होनेवाला भाकाश 
सम्पूणं दुःखोकरा निदृतिरूप दै । 


खण्ड १२ ] 


शाङ्करथाष्या्थं 


२८७ 


८-5-99 9-5-59 


अतो युक्तमेकस्यापि त्रिधा 
मेदान्वाख्यानम्‌ । 


बहिधां पुरुषादारभ्याकाशस्य 
हृदये संकोचकरणं वेतःसमा- 
धानस्थानस्तुतये यथा 'त्रया- 
णामपि रोकानां इरकषत्रं 
विशिष्यते । अर्ध॑तस्तु इरुकेत्र- 
मर्धैतस्त॒॒परथूदकम्‌" 
तद्वत्‌ । 


इति 


तदेतद्धार्दाकाशाख्यं ब्रह्म 
पूणं सवगतं न हदयमात्रपरि- 
च्छिन्नमिति मन्तव्यम्‌, यद्यपि 
हृदयाकाशे चेतः समाधीयते । 
अग्रवति न तश्ितक्चित्प्तिंतं 
श्ीलमस्येत्यप्रबरतिं तदनुच्छित्ति- 
धर्मकम्‌ । यथान्यानि भूतानि 
परिच्छिननान्युच्छित्तिधर्मकाणि न 
तथा हाद नभः। पूर्णामप्रवर्तिनी- 


इसल्यि एक ही आकराशके तीन 
मेदोँका कथन उचित ही है । 


पुरुषके बहिःस्थित आकाशसे रेकर 
जो हृदयदेशे आकाडशका संकोच 
किया गया है वह चि्तको एका- 
ग्रताके स्थानी स्तुतिके ल्ि है; 
जित प्रकार [ स्थानकी स्तुतिके स्यि 
ही एसा कहा जाता है-]“तीनोंँ 
लोकोमिं कुरुक्षेत्र उक्कृष्ट॒दहै तथा 
[ द्विदरु धान्यके समान ] अधेमें 
कुरकेत्र है ओर भधेमे शरुदकः 
2" उसी प्रकार [ यहाँ हृदयाक्षाजञ- 
की स्तुति समञ्चनी चाहिये ]। 


वह॒ यह हृदयाकाशसं्ञक तर्ष 
पूणे- सर्वगत दै, वह केवरु हृदय- 
मात्रमे ही परिच्छिन्न है-पेसा नही 
मानना चादिये; यद्यपि चिप्त केवर 
हइदयाकारामे ही समाहित शिया 
जाता है । वह अप्रवतिं अर्थात्‌ 
अविनाशी स्वभाववारा है-जिसका 
कभी कीं रवृत होनेका स्वभावनष्टो 
उसे अप्रवर्ति कहते ई । जिसभ्रकार 
अन्य परिच्छिन्न मूत उच्छित्ति(विनाश) 
धर्मवाटे दै उसी प्रकार हदयांकाश 
नारावान्‌ नहीं है । जो पुरुष इस 
भकार उपयुक्त पूणं ओर अरिश्च 


२८८ छान्दोग्योयनिचद्‌ 


ऋऋ € < ऋ ¬ ८ < 56 96 96 > ¬ ट 2८ < € >€ ट ~क 
मनुच्छेदात्मिकां श्रियं विभूतिं 
गुणफलं लमते दुष्टम्‌; य एवं 
यथोक्तं पूर्णापरवर्तिगुणं ब्रह्म 
„ फरक माप्त करता दै । अर्थात्‌ इ | 
बेद जानाती जीवंस्तद्भावं | लोकम यानी जीवित रहते हए हौ 
प्रतिपद्यत इत्यथः ॥ ९॥ तदरुपताको प्राप्त हो जाता है ॥९॥ 


[ मध्याय \ ¦ 
३ | 
गुणविशि् ब्रहमको जानता है क । 
पूणं ओर अपरवर्तिनी -कमी न 


होनेवारी श्री-विभूति इस इष्ट गोण 





इतिच्छान्दोग्योपनिषदि ठतीयाध्याये 
दादशसण्डभाष्यं सस्पूर्णेम्‌ ॥ १२॥ 





च्योदव्छ खण्ड 


ह दयान्तगंत प्वंघुषिभूत प्राणक्र उपान 


तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य प देवसुषयः स 
योऽस्य प्राङ्‌ सुषिः स प्राणस्तचक्षुः स आदित्यस्त- 
देतत्तेजोऽन्नायमिल्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवतिय 
एवं वेद्‌ ॥ १ ॥ 


उस इस प्रसिद्ध दयके पाँच देवघुषि है । इसका नो पून॑दिशा- 
वर्ती सुषि (छिदि) दै वह प्राण दै; वह चश्च है, वह भादि है, 
वही यह तेज भोर घन्नाय दहै--इस परार उपासना करे । जो इव 
प्रकार जानता है [ अर्थात्‌ इस प्रकार इनकी उपासना करता है ] वह 
तेजस्वी ओर अन्नका भोक्ता होता दै ॥ १ ॥ 


तस्य ह वा इत्यादिना| इस (त्य ह वा, इत्यादि खण्ड- 
द्वारा गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मी उपासनाके 

गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मण उपास- | घङ्गरूपसे द्वारपारादि गुणक 
नाङ्गत्वेन द्रारपारादिगुण- विधान करनेके खयि [ यह उत्तर 
अन्थ ] आरम्म करिया जाता है । 

विधानाथंमारम्यते । यथा लोके | क्योकि निस भकार रोकमे रानाके 
ववी द्रारणर उपासनासे ८ भेट आदि 

द्वारपाला रा उपासनेन वशी- | दक ) अपने शथीन कर लिमि 
जानेपर राबासे भट करनेमे उपयोगी 

कृता राजप्राप्त्यथा ५ ता 
तयेदापीवि । उपासनाङ्गका उपयोग होता है |। 


१ 


2९० 


तस्येति प्रकृतस्य हृदयस्मेत्य- 


थः। एतस्यानन्तरनिदिष्टस्य 


पञ्च संख्याका देवानां सुषयो 
देवसुषयः स्वगरोकप्रािदार- 


च्छिद्राणि, देवैः प्राणादित्यादि- 
भी र्यमाणानीत्यतो देव- 


सुषयः। तस्य स्वगलोकभवनसय 
हृदयस्मास्य यः प्राड्‌ सुषिः 


पू्वामिषुखस्य प्राग्गतं यच्छिद्रं 
दरं स प्राणः, तत्स्थस्तेन दारेण 
यः संचरति वायुविशेषः स 
प्रागनितीति प्राणः । 


तेनेव संद्धमव्यतिरिकतं तच्च- 


षुः, तथेव स॒ आदित्यः “आ 
दित्यो इ वै बाह्यः प्राणः११(्र० 
उ० ३। ८ )इतिभ्रते - 
भ्रतिष्ठाक्रमेण हदि ५४ 
आदित्यः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति 
चजुषि" ( ५ उ० ३।९। 
२०) इत्यादि हि वाजसनेयके । 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


= ~ > ऋ ~ 


[ ध्याय \ 


ऋ 
तस्य अर्थात्‌ उस प्त हवत 
एतस्य- जिसका व्यवहित पष 
दी वणन ्गिया गया है, पब 
संस्यावाले देवुषि- देवताभे्ष 
घुषि अर्थात्‌ ्वर्गरोककी प्रि 
द्वारभूत पोच छिद्र है े प्राग घौर | 
आदित्य आदि देवताओंसे पुकि 
है इसख्यि देवघुषि कलते है। ¦ 
स्वगंरोकके भवनरूप उस इस. | 
का जो प्राङ्सुषि है-पूर्वामिषुह 
हृद्यका जो पूदिश्ावतीं दद्र यर 
द्वार है वह प्राण दै। जो उस हृदयं 
ही स्थित है भौर उसीके द्रप 
संचार करता है वह वायुवरोष 
भाक्‌ अनितिः इस ॒श्युवप्ि 
जनुसार प्राण कहलता दहै । 


उख (भाण) हसे समद भौ 
अभिन्न च्च दै। इसी प्रक 
वह आदिभी है, नैषा ह 
“आदित्य निङ्चय ही बाहपराण दै 
इस श्रुति प्रमाणित होता है । 


चश्च ओर ख्पके प्र 
हृदयम स्थित है । “बह आदिद 


किमे स्थित है १ चक्रमे" इत्यदि 
बानसनेय-श्रुतिमे कडा दै । परण 





कच्ड १३] छाद्रभाव्याथे २९१ 


प्राणवायुदेवतैव देका च्ुरा- | वायुरूप एक दी देवता एक ही 
धाश्वयमें स्थित होनेके कारण च्च 
दित्य स॒ाभरयेण । वक्ष्यति च | जीर भादित्य नामसे कहे नाते दै । 
॑ओ ९ | श्राणाय स्वाहा" फसा शहकर दिया 
प्राणाय स्वाहेति हुतं हविः स्े- | हभ हवि चक्षुरादि सम्पूणं इन्दियौ- 
की तृषि करता है-रेसा भागे 
(५ 

मरेतत्तपंयतीति | करगे भी। 
तदेतत्ाणाख्यं सर्भरोक- | वह यद प्राणाख्य ब्रहम सगोक- 
ग {लोकं का द्वारपारु है अतः स्वगमराधिङी 
दारषासत्वादुत्रह्न स्वग॑रोकं । इच्छावाला पुरुष, यह चक्ष ओर 
्तिषितसुस्तेजशरैतचदुरादित्य- | भावित्यरूपसे तथा भनाचस्पसे 


च . | सविताका तेन ओर अन्नाय 
स्वरूपेणान्ना्यत्वाच्च सवितुस्ते _ इस प्रकार इन दो रणोसे इसकी 


जोऽस्नाद्यमित्याभ्यां गुणाभ्याष्ष-| उपासना करे । इससे वह तेजस्वी 


सीत । ततस्तेजर्व्यजादश्रामया- | जौरं॑णन्नाद अर्थात्‌ रूणलादिसे 

८ रहित होता है । जो रसा जानता 
=. तस्यैत, ह; छन्तु मुय फर तो यही षै 
५८ कि उपासनाद्रारा भपने अधीन 


वक्षोकृतो दारः सर्गलोकप्रा्ि- | किया हंभा बह दाएपठ स्वगलोक- 
हतर्मबतीति शर्वं च फलम्‌| १॥ | भापिका शरण दाता है॥१॥ 


हृदयानतर्म॑त दक्षिणसुिभूत व्यानकी उपासना 
अथ योऽस्य दक्षिणः खषिः स व्यानस्त- 
चोत्रश्स चन्द्रमास्तदेतच्छीश्च यरा्ेत्युपासीत 
श्रीमान्यास्वी भवति य एवं वेद्‌ ॥ २ ॥ 


छा उ ९०-- 


२९२ 


छान्दोग्योषनिषद्‌ 


> > 8-८-88 ~~ 
तथा इसका नो दक्षिण छिद्र है वह 


[ अध्याय ३ 
9 8 -~ 


व्यान हे, वह श्रोत्र दै, वह 


चन्द्रमा है ओर वही यद श्री एवं यश है - इस प्रकार उती उपासना 
करे । जो एेसा जानता है वह श्रीमान्‌ ओर यशस्वौ होता है ॥ २ ॥ 


अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिस्त- 
तस्थो वायुविशेषः स वीर्यवत्कर्म 
ुवेन्विगृह्यवा प्राणापानौ नाना 
वानितीति व्यानस्तत्संबद्धमेव 
च तच्छोत्रमिन्द्रियं तथास 
चन्द्रमाः-श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्च 
चन्द्रमा"! इति शते: । सहाश्रयौ 


पूर्ववत्‌ । 
तदेतच्छीथ विभूतिः श्रोत्र 


चन्द्रमसोज्ञानान्नहतुत्वम्‌ अतस्ता 
भ्यां शरीत्वम्‌। ज्ञानालवतश यश्च; 
ख्यातिरभवतीति यरोहतुत्वाय- 


शस्त्वम्‌ + अतस्ताभ्यां गुणाभ्या- 
ुपासीतेत्यादि समानम्‌ ॥ २ ॥ 


३ 


"=+ 


तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है 
उसे स्थित जो वायुविरोष है दह 
वीयंवान्‌ कर्म करता हुभा गमन 
करता है या प्राण ओर अपाने 
विरोध करके अथवा नाना प्रकारे 
गमन करता है, इस कारण 
“व्यानः कहलता है । उससे सम्बद्ध 
जो श्रोत्र है वह इन्द्रिय है। तथा 
उसीसे सम्बद्ध॒वह चन्द्रमा दै, 
जसा क्न “[ विराट्के ] प्रोत्वारा 
दिशा ओर चन्द्रमा रचे गये दैः 
इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । पूववत्‌ 
( चक्षु ओर आदिलयके समान ) 
ये भी एक दी आश्रयवाटे दै । 
वह यह [ व्यानसंज्ञक त्य ] 
श्री यानी विभति है। श्रोत्र भौर 
चन्द्रमा क्रमशः ज्ञान जर अन्नके 
देत है; इसण्यि उनके द्वारा व्यान- 
का श्रीत्व माना गया है । ज्ञानवान्‌ 
जीर अन्रवान्‌का यश्च अर्थात्‌ प्रसिद्धि 
होती है; अतः यशका हेतु होनेषे 
उसकी यजशःस्वरूपता हे । अतः उन 
दो गु्णोसे युक्त उसकी उपासना 
करे इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत्‌ 
॥ २ ॥ 


षण्ड १२ ] शाङ्रभाष्यायं २९३ 
ॐ ~ > ~ल => ८ ८ < ~< ~ ~ ~ ८ ~ ~ > > ८ ~: ~ ऋ = 9: 9 
४५ 
हृदयान्तगेत पश्चिमदुषिभ्‌त अपानकी उपासना 


अथ योऽस्य ब्रस्यडः सुषिः सोऽपानः सा वाक्सो 
ऽभ्निस्तदेतदृब्रह्मवचंसमन्ना्यमिल्यु पासीत बह्मवच॑स्य 
ज्नादो भवति य एवं वेद्‌ ॥ ३॥ 


तथा इसका जो परिचम छिद्र है वह अपान है, वह वाक्‌ है, 
वृह अग्नि है ओर वदी वह बरहतेज एवं अन्नाय है- ईस प्रकार 
उसकी उपाद्ना करे । जो पूसा जानता दै वह ब्रहमतेजस्वी ओर अन्नका 
भोक्ता होता है ॥ ३ ॥ 


अथ योऽस्य प्रत्यङ्‌ सुषिः | तथा इसका जो भरयङ्‌ एुषि-- 
युविरेष प्रत्यङ्‌ यानी परिचम उसमे स्थित 
पश्विमस्तत्स्थो वायुविशेषः स | नो वाुविरेष है वह॒ मल 
मूत्रादिको दूर्‌ करता हुआ नीचेकी 
ओर के जाता दै। इसश्यि 
पानः सा तथा वा; तत्सब- | अपानः कहराग है । तथा वही 
९, | वाक्‌ जर अग्नि दै, क्योकि इनका 
न्धात्‌, तथाभ्िः तदेतदुत्रह्मवचेसं | उस ( समष्टि भपान ) से ब्व्य 
| हे । वह यह ब्रहषतेन है- सदाचार 
दृ्तस्वाष्यायनिमिततं तेजो ब्रहम | ओर स्वाध्यायके कारण होनेवारे 
तेजका नाम ब्रह्मवच॑स है, क्योंकि 
सदाचार ओर स्वाध्याय अग्नसे 
ध्यायस्य । अनग्रसनहेतुत्वाद - | सम्ब है । अन्न निगल्नेमे हेतु 
होनेके कारण अपानका भन 
पानस्यान्नाद्यत्वम्‌ । ट भोक्तृ स्वीृत क्रिया गबा है । 
॥ २॥ शेष भर्थं पूथ॑वत्‌ है ॥ २ ॥ 


कोम @ = 


ूतरपुरोषाद्यपनयनधोऽनितीत्य- 


वर्चसम्‌; अम्निसंबन्धाद्‌ इत्तस्वा- 


8९७ 


छान्दोम्योषनिषदू 


[ मेष्यावं ३ 


85 > 9 > ऋ > 8 ~ > 9 8 9 9 
हृदयान्तगत उत्तर षिभूत समानकी उपासना 


अथ योऽस्योदडः सुषिः स समानस्तन्मनः स 
पजन्यस्तदेतत्कीतिश व्युष्टिश्चेव्युपासीत कीरतिमान्धयु- 
ष्टिमान्‌ भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥ 


तथा इसका जो उत्तरीय छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह 
मष है ओर वदी यह कीतिं जीर व्युष्टि ( देहका खवण्य ) दै- इष 
भकार उसकी उपाघना करे । जो इष प्रकार जानता है वह कीर्तिमान्‌ 


ओर व्यु्टिमान्‌ होता दै ॥ ४ ॥ 
अथ योऽस्योदट्‌ सुषिरुद- 


ग्गतः सुपिस्तरस्थो वायुविशेषः 
सोऽशितपीते समं नयतीति 
` समानः । तत्संबद्धं मनोऽन्तः- 
करणं स॒पजैन्यो ब्ृष्टयात्मको 


देवः पञेन्यनिमितताश्वाप इति, 


“मनसा सृष्टा आपश्च वरुणश्च"? 
इति भुतः । 


तदेतत्कीतिथ, मनसो ज्ञानस्य 


कीतिहततवाद्‌; आत्मपरोकषं विभु 


तत्वं कीतिः; यञ्चः स्वकरण- 


कहते है । 


तथा इका जो उदङ्‌ सुषि-- 
उत्तरवरतीं छिद्र है, उमे स्थित हुज 
जो वायुविशेष है वह लये-पथे 
अन्न-नरुको समानरूपसे [ सम्पूण 
शरीरम ] ठे जाता दै, इसि 
“समानः है । उशते सम्बन्ध रखने- 
वाला मन--अन्तःकरण ओर वह 
पर्जन्य यानी वृषटिरप देव है, 
क्योकि ^ विराट्‌ पुरषके ] मनसे 
अप्‌ ओर वरुण रचे गये ई" इस 
रुतिके भनुस्ार अप्‌ ( जल ) मेष- 
हीसे होनेवाटे है । 


तथा यह ( समाननामक ब्रह्य ) 
ही कीरति हे, क्योकि मन यानी ज्ञान 
ही कीर्तिका हेतु है । अपने पीछे 
जो विख्यात होती है उसे कीर्ति 
जो ख्याति अपनी 


कण्डं १३] छ्याङ्करर्मष्याय २९५ 
-----ः > 3८ > >8 ¬ ८ > 8-8-88 > अ ~ 3 --- 


संवेद्यं विभरुतत्वम्‌ । व्युष्टिः का- । इन्वसि गृहीत की जा सकी दै 
उसे यश्च कहते रै । व्यु्टि- कान्ति 
न्िर्द्हगतं छावण्यम्‌ । ततश्च | यानी देहगत सुन्दरताको कहते दै । 


दवीतिसंभवात्कीविश्रेति । समा- | उससे भी कीर्ती उत्पति होती हे 
अतः वह भी कीर्तिद्ी है। शेष 


नमन्यत्‌ ॥ ४ ॥ | अथे पूववत्‌ है ॥ ४॥ 


हृदयान्तगंत ऊप्मुिभूत उदानकी उपासना 
अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः सु उदानः स वायुः 
स॒ आकाशस्तदेतदोजश्च महश्वेयु पलीतोजस्वी 
महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥ 
तथा इसका जो उर्व छिद्र है वह उदान दै, वह वायु है, वह 
भाकाश है ओर वही यद ओन ओर महः दै--इस प्रकार उसकी 
उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी ८ बल्वान्‌ ) 
जोर महस्वान्‌ ८ तेजस्वी ) होता है ॥ ५ ॥ 


अथ योऽ्स्योध्वैः सुषिःस | त्था इसका जो उध्वषद्ि दै 
९ | वह उदान दहै । पेरके तएसे 
उदान आ पादतलादारभ्योष्व- | छक ऊपरक्ो ओर उक्तमण करनेके 


कमणा टुत्वं च कर्म र्व- | कारण जर उकतषके रिथ कमे 
१ प | कृवा हु चेष्टा करता है-इसल्यि 


ननितील्युदानः स वायुस्तदाधा- | वह “उदानः है। वही वायु ओर 
उसका आधारमूत आकाश भी दे । 

रधाकाशः । तदेतद्‌ वाय्वाका- | वा जौर आक्राश ओनके देतु ई 
 __ | अतः यह ८ उदानसंज्ञक क्म ) ही 

१५ बर मह | ओोज-- बरु है भर महत्ताके कारण 
स्वाच मह इति समानमन्यत्‌ ॥।५।॥ महः भी दै । शेष मथ पूववत्‌ दे॥५॥ 





शरदे 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अन्याय ३ 


~अ >3< >< > 8 >< ऋ ऋ < >< ऋ < 5८ < >< >< € < इ~ ऋ ---‰----- 
उपयुक्त प्राणादि द्वारपालोकी उपास्नाक्ता एल 


ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वगस्य रोकस्य दरार. 
पाःसय एतानेवं पञ बह्मपुरुषान्स्वर्गस्य रोकस्य द्वार 
पान्वेदास्य ले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वं रोकं य 
एतानेवं पञ्च ब्ह्मपुरषान्स्वगंस्य ोकस्य द्ारपान्वेद्‌॥६॥ 

वे ये पंच ब्रह्मपुरुष स्वगंरोकके द्वारपारु दै । वह जो कोद भी 
स्वगरोकके द्वारपारु इन पच त्रह्मपुरर्षोफो जानता दै उसके कुरे वीर 


उत्पन्न होता है । जो इस प्रकार स्व्गरोकके द्वारपारं इन पाँच पुर््षको 
जानता दै वह प्वर्गरोकको प्राप होता दै ॥ ६ ॥ 


तेवाएते यथोक्ताः पश्च 
सुपिसंबन्धात्पश्च ह्मणो हादस्य 
पुरुषा राजपुरुषा इव द्वारस्थाः 
सवर्गस्य हाद्य लोकस्य 
हारपा द्ारपालाः। एतेहि चक्षुः 
्रोत्रवाड्मनः प्राणेवेदिभख- 


= © ४ © (2. < 
्रवृत्त्रह्मणो हादस्य प्राप्ति 


द्वाराणि निरुद्धानि । प्रत्यक्षं 
ह्येतदलितकरणतया बाद्यविषया- 
सङ्खाचृतप्ररुूटसवान्‌ हाद ब्रह्मणि 
मनस्तिष्ठति। तस्मात्सत्यमुक्तमेते 
पश्च बहापुरुषा; स्वर्गस्य लोक- 
स्य द्वारपा इति । 


वे ही ये, जैसे कि ऊपर बतलये 
गये है, पाँच सुषियोके सम्बन्धके 
कारण हृदयस्थ ब्रह्मके पांच पुरुष 
है, अर्थात्‌ द्वारस्थ राजपुरुपोकि 
समान हृदयस्थ स्वर्गरोकके द्वारपार 
है । चक्ष, श्रोत्र, वाक्‌ , मन ओर 
प्राणेकिं द्वारा बाहरकी ओर प्रवृत्त 
हए इन्दीके द्वारा हृदयस्थ ब्रह्मो 
प्ा्तिके द्वार रुके हए दै । यह 
बात भवयक्ष ही है कि अजितेन्द्रियता- 
के कारण बाह्य विषर्योकी आसक्ति- 
रूप अनृतसे व्याप्त रहनेके कारण 
मन हदयस्थित ब्रह्मम स्थित नही 
होता । अतः यह ठीक दी कहा 


किये र्पोच त्रह्मपुरूष स्वर्गलोकके 
द्वारपार दै । 


खण्ड १३ | 

अतः स य एतानेवं यथोक्त- 
शुणविशिष्टान्‌ स्वगस्य लोकस्य 
द्वारपान्‌ वेद्‌ उपास्त उपासनया 
वक्षीकरोति स राजद्वारपारानि- 
वबोपासनेन वशीकृत्य ॒तेरनि- 
वारितः प्रतिपद्यते स्वगं लोकं 


राजानमिव हादं बह्म | 

किं चास्य विदुषः कुरे वीरः 
पुत्रो जायते वीरपुरूषसेवनात्‌ । 
तस्य चर्णापाकरणेन ब्रह्मोपासन- 


्रृतिहेत॒त्वम्‌ । ततश्च स्व 
छोकप्रतिपत्तये पारम्पर्येण भव- 


तीति स्वगंरोकप्रतिपत्तिरेवैकं 
फलम्‌ ॥ ६ ॥ 


अथ यदसौ विद्ान्स्वगं लोकं 


शा हरथाष्याथं 
~> 998 ~ -----9--- 


२९७ 





ऋ 
अतएव जो कोई इन उपर्युक्त 
गुणविरिष्ट स्वगकोकके द्रारपारको 
इस प्रकार जानता है--उपासना 
करता है अर्थात्‌ उपासनाद्रारा अपने 
अधीन करता दै, वह रानके द्रार- 
पालके समान हन्द उपासनाद्रारा 
वशीभूत कर इनसे निवारित न 
होता हुभा राजक प्राप्त होनेके 
समान स्वगंरोकं यानी हदयस्थित 
्रहमको प्रप्त होता दे । 


तथा वीर पुरषका सेवन कनेके 
कारण इपर विद्रानके कुमे वीर पत्र 
उदत्र होता है । वह एत्र पित. 
ऋणकी निवृत्ति करके उसे त्रहमकौ 
उपासनामे प्रवृत्त करनेका देतु होत 
है। अतः वह प्रम्परासे उक्षकी 
स्वर्गरोकंपरा्िका भी कारण होता 
ह; इसर्यि स्व्गलोककर प्राति ही 
इसका एकमात्र फल है ॥ ६ ॥ 


तथा वह विद्वान्‌ वीर पुरुषका 
सेवन करनेसे निस स्वगेरोकको 


बीरपुरुषसेवनासपतिपदयते,यचचोक्त| भा होता है ओर निस स्वगंका 
“इसका तीन पादरूप अमृत ुरोकृ- 
“(त्रिपादस्याख्रतं दिवि" इति । म दै” इस प्रकार वणेन किया गया 
है उसीको अब अनुमापक्‌ लिङ्ग 
तदिदं लिङ्गेन चशुःरोत्न््रिय- | दारा च्च ओर शरत्रन्दिका विषय 


९९८ छन्दोन्योचनिषद्‌ [ अध्याय इ 


वच 

भोचरमापादयितव्यम्‌, यथा- | बनाना है जिस पकार कि धूमादि 

लिङ्गसे अग्नि आदिकी प्रतीति 

ग्यादि धूमादिरिङ्गेन । तथा | करायी नाती है । त्न होनेपर ही 

। उपयुक्त पदार्थके विषयमे “य रसा 

घेवमेवेदमिति यथोक्तऽ्थं दृढा | ही है” देखी इद प्रतीति हो सक्षी 

हे ओर इसी प्रकार उसका अभेद 

प्रतीतिः स्यात्‌ । अनन्यत्वेन च | रूप्से निश्चय भी हो सकता है । 
निश्चय इति । अत आह-- | इीषयि श्रुति कहती है-- 

हृदयस्थित मुख्य बह्मक्तौ उपासना 


अथ यदतः परो दिवो उयोतिर्दीप्यते विश्वतः 
ष्टेषु सवतः प्ष्ठष्वलु्मेषुत्मेषु रूोकेष्विदं वाव 
तयदिदमस्मन्नन्तः युसुषे ज्योतिः ॥ ७ ॥ 


तथा इस दुरोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर यानी सवके 
ऊपर, जिनसे उत्तम कोई दुसरा रोक नहीं है एेसे उत्तम ोकोमिं भकाशित 
हो रदी दै बह निश्चय यदी है जो कि इस पुर्षे भीतर ज्योति ॥७॥ 
यदतोऽरप्मादिबो श्लोकात्‌, | इस दिव अर्थात्‌ दलो$ते परे- 
यहां परः इस पिङ्ग पदको नध 
सकरि्गमे बदलकर “परम्‌ समञ्चन 
चाहिये-जो ज्योति दीप्त दै; नित्य 
प्रकारामान होनेसे वह ज्योति स्वर्य- 
प्रकाशत्वादीप्यत इव दीप्यत | भश्म दै, अतः दीप्यते" इस पसे 
वह मानो दीप्त होती दै-इस प्रकार 

इत्युच्यते; अगन्यादिवज्ज्वलन- | कदा जाता हे, क्योकि अग्नि आदिकं 
समान उसमे प्रज्वङिति होनाद्प 

लक्षणाया दीपैरसंभवात्‌ । दीपी कोई सम्भावना नहीं है । 


परः परमिति लिङ्गव्यत्ययेन, 


ज्योतिदीप्यते, स्वयप्रभं सदा- 


अण्ड १३] शाङ्करमाष्याथं २९९. 
~ # ७8 >< ७ # < 8 ८ 8: ~ ८ 8-८८-8८ = 


विश्वतः ष्ठषवितयेतस्य व्या- | "विश्वतः परष्ठेषुः इसीकी व्याछ्या 
ख्यानं सवेतः पृष्टेष्विति, संसा- | सरवतः पष्ेषु ये पद दै; अर्थात्‌ 
रादुपरीत्यथः, संसार एव हि | संसारसे उपर, करोकि संसार दी 
सर्वः; असंसारिण एकल्वान्नि- | सतर है; असारी नक्ष तो एक 
ंदत्वाच्च । अलुक्तमेषु, ततपुरुषस| ओर मेदरहित दै । अनुत्तमेषु" इष 
भसाशङ्ञानिदृतय आह, उत्तमेषु | पदमे [ जो उम न हो-रेसा अथ 
लोकेष्विति, सत्यलोकादिषु दिर करके होनेवालो तसपुरुषसमासको 


ण्यगर्भादिकायेरू पस्य परस्येश्चर- 
स्यासननत्वादुच्यते, उत्तमेषु 
लोकेष्विति । 

इदं वावेदमेव तद्यदिदमस्मिन्‌ 
पुरुकेऽन्तमेष्ये ज्योतिशक्षुःशरोत्र- 
ग्राह्येण लिङ्घनोष्णिम्ना शब्देन 
चावगम्यते । यत्वचा स्पशंरूपेण 


गृह्यते तच्च्लुपेवः; दुदप्रतीतिकर- 
त्वात्वचः, अविनाभूतत्वाच्च 
रूपस्पशंयोः ॥ ७॥ 


शाङ्काको निवृत्त करनेके लिय “उत्तमेषु 
ोकेपु' एेसा कहा हे । सत्यरोकादिमे 
हिरण्यगर्मादि काहू ब्रह्म समीप 
रहता है, इसख्यि उनके विषयमे 
उत्तमेषु लोकेषु" पेसा कहा गया दै। 
वह्‌ निर्चय यदी है जो कि यह 
इस पुरुषके भीतर ज्योति है, जो 
क्रमशः चश्च जोर शरोत्रसे ग्रहण कयि 
जाने योग्य उष्णता ओर शब्दखूप 
रिद्गसे जानी जाती है । लचाद्रारा 
स्पशखूपसे नजिषका प्रहण किया 
जाता है उस्र ॒वस्तुका मानो चक्षसे 
ही श्रहण होता दै, क्योकि खचा तो 
केवल उसकी दृद प्रतीति करनिवाडी . 
हे, तथा खूप ओर स्यथ ये एक- 


दूसरेके बिना रह नहीं सकते ॥७॥ 


-भ-म्ञडै--# ~ 


हृदयस्थित परमग्योतिका अनुमापक लिङ्ग 


कथं पुनस्तस्य ज्योतिषो 
लिङ्गं त्दृष्टिगो चरत्वमापद्यते ? 
इत्याह-- ` 


ङित उस ग्योतिका अनुमापक 


लिङ्ग तलगिन्दरियकी विषयताको करि 
.| प्रकार प्राप्त होता हे £ इष 
श्रुति क्डती है-- 


३०० छान्दोग्योपनिषत्‌ [ च्या 


> इ ऋऋ ऋऋ = = क 5 8 < ~~ 9-8-33 + 

तस्येषा दष्ियत्रेतदस्मिञ्छरीरे सरस्परनोष्णि- 

मानं विजानाति तस्येषा शरुतियंत्रेतत्कर्णावपिह्य निनद्‌- 

मिव नदथुरिवाग्नेरिव उवखत उपश्रणोति तदेतदृदषट 

च श्रुतं चेद्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद 
य एवं वेद ॥ < ॥ 


उस इस (हृदयस्थित पुरुष) का यही दश॑नोपाय है जव कि [मनुष्य] 
इस शरीरम प्पशं्रारा उप्णताको जानता है तथा यही उसका श्रवणोपाय 
है नब कि यह्‌ का्नोको मदकर निनद ( रथके घोष ), नदु ( वैरे 
कराने ) ओर जरते हुए अग्निके शब्दके समान श्रवण करता है, वह 
यह ्योति दष्ट ओर श्रुत है-- इस प्रकार इसकी उपा्ना करे । जो 


उपासक एसा जानता हे [इस प्रकार उपासना करता है ] वह दश्च॑नीय 
ओर विश्रुत ( विख्यात ) होता हे ॥ ८ ॥ 


यत्र यस्मिन्कारे, एतदिति | यतर जिस समय, "एतत्‌, 
~ यह 'विजानातिः इस्त ॒क्रियाका 
क्रियाविशेषणम्‌, अस्मिज्छरीरे सं 
८ विशेषण दहे, इस शरीरम हाथसे 
स्परां करके उस स्पशं्रारा रूपके 


कि ¡वि जानता 
रूपसहभाविनशरष्णस्पर्भावं वि~ | साथ रदनेवारी उष्णताको 

हे; वह उष्णिमा ही नामरूपका 

जानाति, स दुष्णिमा नासरूप- | विभाग करनेके ल्य देहम अनु- 


प ज्योतिका 
व्याकरणाय देहमनुप्मिष्टस्य चै. | ¶विष्ट॒ह॒ चैन्यास 


अनुमाने करानेवाखा णिग है, क्योकि 
तन्यात्मज्योतिषो शिज्गमव्यभि- उसका कभी व्यभिचार नहीं होता । 


चारात्‌। न हि जीवन्तमात्मान- | जीवित शरीरो उष्णता कमी नही 


हस्तेनारभ्य संस्पर्शे नोष्णिमानं 


ध - 


लज्ड १३ |] 
ष्णसा व्यभिचरति । इष्ण 
एवं जीविष्यज्छीतो मरिष्यन्‌! 
इति हि विज्ञायते । मरणकाठे 


च तेजः परस्यां देवतायामिति 


परेणाविभागत्वोपगमात्‌। अतो- 


ऽसाधारणं लिङ्गमोष्ण्यमग्नेरिव 


भूमः । अतस्तस्य परस्येषा दृष्टिः 
(* © 
साक्षादिव देनं दशनोपाय 
इत्यथः | 
तथा तस्य ज्योतिष एषा 


भ्रुतिः श्रवणं श्रवणोपायोऽप्यु- 


च्यमानः । यत्र यदा पूरुषो 
ज्योतिषो रद्धं शुश्रूषति तदे- 
तत्कणीवपिगृेतच्छब्दः क्रिया- 
विशेषणम्‌ । अपिगृद्यापिधायेत्य- 
्थोभङुलिभ्यां प्रोणुत्य निनद्‌- 
मिव रथस्येव घोषो निनदस्त- 
भिव शूणोति नदधुखि चऋछषभ- 
दरूजितमिव शब्दो यथा चाग्ने- 


4 
शाङ्करमाब्यायं = १०९१ 
क 4 ~> -9 -< ~ -- ८ 3८-92-८9 < < < ऋऋ 


त्यागती । जीवित रहनेवाख उष्ण 
ही होता है ओर मरनेवारा शीत 
होता दै- रसा दी जाना जाता 


| हे । मरण-कारमे तेज पर॒ देवतामे 


लीन हो नाता दै, क्योकि उप॒ 
समय पर देवताके साथ उसका 
अभेद हो जाता दै। अतः धूम निस 
प्रकार अभ्रिका अनुमापक दै 
उसी प्रकार उष्णता जीवनक्ता 
अक्ाधारण लिङ्ग है । इसलिये उस 
पर देवताकी यह दृष्टि यानी साक्षात्‌ 
द्श॑नके समान उ्तके दशका 
साधन दै- पसा इसका तासं है। 


तथा यह्‌ उस ज्योतिकी श्रुति-- 
श्रवण यानी सुननेका आगे कदा 
जानेवास उपाय है। नर्हा -- 
जिस समय पुरुष इस उ्योतिके 
रिद्नको घुनना चाहता दै उप 
सुमय, “एतत्‌ कर्णावपिगृहः यहाँ 
“एतत्‌ शब्द अपिगृह्य क्याका 
विशेषण दै, अर्थात्‌ कानको इस 
प्रकार मूंदकर--अह्भुलियोसे वद्कर 
निनदके समान--रथके धोषको 
“निनदः कहते है, उसके समान शब्द 
सुनता है तथा नदथु-वैकके डकराने- 
के समान ओर जिस रकार बरहर 


३०२ 


छागधोष्योचनिषद्‌ 


[ घच्याय ३ 


> 96 8 ~ < ~ ~ > 3 2. ~ 9-9-78 2-9-८9 ध 9 5 9 


बंदिज्व॑रुत एवं शब्दमन्तःशरीर 


उपशृणोति । 


यदेतञ्ज्योतिरदष्टभ्रुतरिश्गत्वाद्‌ 


दृष्टं च भुतं ॒चेत्युपासीत । 
यथोपासनाच्चक्षुष्यो दशंनीयः 


भुतो विश्रुतश्च । यत्स्पदागुणो- 


पासननिमित्तं फलः तद्रूपे संपा- | 


दयति चज्ञुप्य इति, रूपस्पशे- 
योः सदभावित्वात्‌; इष्टत्वाच्च 


देनीयतायाः । एवं च विद्या- 
याः फलमुपपननं स्यान्न तु मदु- 
© © 
त्वादिरस्पशवत्वे । य एवं यथो- 
क्तो गुणो वेद्‌ । स्वर्गलोकप्रति- 


पततिस्तू्तमट्टं फलम्‌ । दिर 
भ्यास आदरार्थः ॥ ८ ॥ 


जरते इए अग्निका शब्द होता है 
उस्र प्रकारके शब्दका भपने शरीर 
के भीतर श्रवण करता है । 

इस प्रकार यह ज्योति ष्ट भौर 
ध्रूत॒लिङ्गयुक्त होनेसे दृष्ट भौर 
श्रुत है- इघ तरह इसकी उपासना 
करे । इर प्रकार उपासना करनेसे 
वह उपासक चश्चुष्य- दर्शनीय ओर 
्रुत--वि्यात हो जाता ह । सय 
गुणसम्बन्धिनी उपाञ्ननासे जो फर 
होता हे उसीको श्रुति वक्ष्य 
णसा कहकर खूपमे सम्पादन करती 
दे, क्योकि रूपं घौर स्य ये दोनो 
साथ-साथ रहनेवठे है ओर दशं 
नीयता सबको इष्ट भी दै। ईष 
प्रकार [ दशनीयताके मिरनेसे ] शी 
इस विद्याका दष्ट फर उत्पन्न हो 
सकता ह, मदुतवादि स्पशंयुक्त होनेसे 
नही । इस प्रकार जो इन दोनों 
गु्णोको जानता है [ उसे ईस फट 
की प्राति होती है ] । स्व्गलोककी 
मापि तो इसका अदृष्ट फरु बत 
लाया गया हे । “य एवं वेद्‌--य एवं 
बेद' य द्विरुक्ति आद्रके छ्ि दै॥८॥ 


-: ० :- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि 


ततोयाध्याये 


योद्‌ शखण्डभाष्यं सम्प्णम्‌ ॥ १३॥ 
हिर 


न=; ० {> 


© 
चतुद कण्डु 
=ज्स्न 
शाण्डिल्यविद्या 
सर्वटष्टिते ब्रह्मोपा्तना 
पुनस्तस्यैव त्रिपादम्रतस्य ब्रहम अब परर उसी त्रिपादमूत, 
8 अनन्तगुणवान्‌, अनन्तशक्ति ओर 
गोऽनन्तगुणवतोऽनन्तशक्तरनेक- | अनेक ्रकारसे उपासनीय ब्रह्मी 
विशिष्टगुणयुक्त ओर शक्तिमान्‌ 
खूपसे उपासनाका विधान कनेकी 
मचेनोपासनं विधित्सनाह--- । इच्छसे श्रुति कहती है-- 

सर्व खद्विदं बह्म तनानिति शन्त उपासीत । 
अथ खदु क्रतुमयः पुरुषो यथाकतुरस्मिोके पुरषो 

भवति तथेतः प्रेत्य भवति स कतुं कर्वीत ॥ १ ॥ 
यह सारा जगत्‌ निर्चय तरह ही दे, यहं उपीपे उतयन होनेबाला, 
उसमे लीन होनेवाला जोर उसमे चेष्टा करनेवाखा है--इस प्रकार शन्त 
[रागद्ेषरहित) होकर उपासना करे, क्योकि पुरुष निर्चय ह करुमय-- 
निश्चयात्मकं है; इस कोकमें पुरुष जैसे निश्वयवाख होता हे वैसा दी यहांसे 
मरकर जानेपर होता दै । अतः उस्‌ पुरुषको निश्चय करना चाहिये ॥१॥ 
सवं समस्तं खल्विति वाक्या- | सर्व- समस्त लल यह निपात 


। वाक्यकी शोमा बद्रानके ल्थि दै । 
लङ्काराथों निपातः । इदं जग- | यह अर्थात्‌ नाम-ूपमय विक्षरो 


प्राप्त होनेवारा ओर प्रयक्षादि 


तवि ` | प्रमाणोका विषयभूत जगत्‌ ब्रहम 
+ ६ कारणरूप ही है । वृद्धम [ ससे 


बड़ा ] होनेके कारण वहं [ जगत्‌- 
बह्म कारणं इुद्तमतवादूह्म । । का कारण ] बर कलत दै । 


भेदोपास्यस्य विरिष्टगुणशक्ति- 


दे०७ 


कथं सर्वस्य ब्रह्मत्वम्‌ १ इत्यत 
आह- तज्जलानिति, तस्माद्‌- 
ब्रह्मणो जातं तेजोऽ्वननादिक्रमेण 
सर्व॑म्‌ , अतस्तज्जमू;तथा तेनैव 


जननक्रमेण प्रतिलोमतया तस्मि- 


नेव ब्रह्मणि रीयते तदात्मतया 
शिष्यत इति तलम्‌, तथा 


तस्मिन्नेव स्थितिकारेऽनिति प्रा 


णिति चेष्टत इति । एवं बरह्मा- 
त्मतया त्रिषु कारेष्वविशिष्टं 
द्यति रेकेणाग्रहणात्‌ । अत- 
स्तदेवेदं जगत्‌ । यथा चेदं तदे- 
बेकमद्वितीयं तथा ष्ठे विस्त- 
रेण वक्ष्यामः । 

यस्माच्च स्वमिदं ब्रहम,अतः 
शान्तो रागदेषादिदोपरदितः 


संयतः सन्यत्तत्सवं बरह्म त द्रश्य- 


माणेगणेरुपासीत। 
कथमुपासीत ? करतुं डुवीत 


कतुनियोऽध्यवसाय एवभेव 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


>< ~ > ~ ऋ -- 819: 


[ सध्वाख ६ 


यह सब ब्रहमह्प न) 
हे १ पेल परश्च होनेपर श्रुति कहती 
है-^तज्लानिति' । तेज, अप्‌ घ 
अन्नादि क्रमसे सारा नगत्‌ उ 
ब्रहमसे उत्पन्न हुमा है, इसल्यि यह 
“तन्न है तथा उसी जनक्रमकै 
विपरीत क्रमसे उस ब्रह्ममे ही रीन 
होता है अर्थात्‌ तादास्यशूपसे उस- 
मं मिल जाता हे, इसि "तषट दै 
ओर अपनी स्थितिके समय उसमे 
अनन~प्राणन यानी चेष्ठा कता, 
इसल्यि (तदनः है । इस प्रकर 
्रह्मात्मरूपसे वह तीनों कारो 
समान रहता है, क्योकि उसका 
उस ( ब्रह्म ) के विना ग्रहण नही 
किया जाता; अतः वह ( ब्रह्म) हौ 
यह सारा जगत्‌ है । जिस प्रकार 
यह जगत्‌ वह एकमात्र अद्वितीय 
रह्म ही हे" उसका हम छठे अध्याय- 
म विस्तारपूर्वक निरूपण करगे । 
क्योकि यह सव ब्रह्म हे, अतः 
शान्त यानी रागेषसे रहित-- 
संयतेन्द्रिय होकर वह जो सव ब्रहम 
उसकी आगे कहे जानेवाटे गुणा- 
द्वारा उपासना करे। . 
उसकी किस प्रकार उपासना 
करे १ [ सो बतखाते है-- ] क्रतु 
करे- कलु निश्चय यानी जध्यवसाय- 


। 
4 


नान्यथेत्यविचलः प्रत्यस्तं 
करतुं ङुवींतोपासीतेत्यनेन व्यव- 
हितेन संबन्धः । करं पुनः 
क्रतुकरणेन कतव्य प्रयोजनम्‌ १ 
कथं वा क्रतुः कतेव्यः ? 


~ 


क्रतुकरणं चाभिप्रेता्थसिद्धि- 
साधनं कथम्‌ १ इत्यस्याथंस्य 


प्रतिपादनार्थमथेत्यादिग्रन्थः । 


(~ (~ ¢ 
अथ खन्विति हैत्वथः । | 


यस्मात्‌ क्रतुमयः क्रतुप्रायोऽध्य- 
वसायात्मकः पुरुषो जीवः; 
यथाक्रुर्यादृशः करतुरस्य सोऽयं 
यथाक्रतुयंथाध्यवसायो यादृ- 
निश्वयोऽस्मिूललोके जीवनिह 
पुरुषो भवति, तथेतोऽस्मादेदा- 
स्परय मृत्वा भवति; क्रत्वुरूपफ- 
लात्मको भवतीत्यथः\ एवं दयेत- 
च्छाखतो दृष्टम्‌- “य यं वापि 


को कते है अर्थात्‌ यह पसाही दै, 
इससे जन्य प्रकारका नदीं है-- 
एसी जो अविच प्रतीति है वदीक्रतु 
है, उस क्रतुको. करे--इस प्रकार 
इसका व्यवधानयुक्त "उपासीत, इस 
करियासे सम्बन्धष्टै। कितु उष॒ 
क्रतुके करनेसे क्या प्रयोजन सिद्ध 
करना है ? अथवा किस प्रकार वह 
क्रतु करना चाहिये तथा वह क्रतु 
करना किष भकार अभीष्ट अर्थक 
सिद्धिका साधन दै? इस सब 
विंषयका प्रतिपादन करनेके ्ि ही 
“अयः इ्यादि मगेकरा मन्थ है । 


"अथ खलु" यह पदसमूह हैतुके 
स्यि हे । क्योकि पुरष यानी जीव 
करतुमय--क्तुप्राय भर्थात्‌ भध्य- 
वसायासक दै, इसल्यि इस ोकमे 
जीवित रहता हभ यह पुरुष 
यथाक्रतु-- जिस्‌ प्रकारके क्तुवारा 
होता है अर्थात्‌ निस प्रकारके 
भध्यवसायवार- जैसे निश्चयवाल 
होता दै, वैसे ही यहोसे--इस देसे 
शरेयः मरकर्‌ होता दै । तायं यह 
है कि वह अपने निश्वयके अनुसार 
फल्वाख होता है । शाखसे भी यह 
बात रेसी ही देखी गयी है-“जिस- 


#; 


३०६ 


स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कठव्‌- 
र्‌'' ( गीता ८।६) इत्यादि । 
यत॒ एवं व्यवस्था श्ाखद्‌- 
्टातः स एवं जानन्रतुं कुवीत 
यादृशं क्रतुं वष्यामस्तम्‌ । यत 
एवं शास्प्रामाण्यादुपपद्यते 
करत्वनुरूपं फलम्‌, अतः स 
कतन्यः क्रतुः ॥ १ ॥ 


छान्दोग्योयनिकह्‌ 


[ सष्याय १ 
> = 
न॒ भावको स्मरण करता हषा 
अन्तम शरीर त्यागता है [ षीः 
उसी भावके प्राप्त होता है]" क्योकि 
देसी व्यवस्था शाज्लमतिपादित है 
अतः इस्त प्रकार जाननेवाला वह्‌ 
परुष क्रतु करे-जिस प्रकारका करतु 
हम वतलते है, वा ही क्रतु करे । 
क्योकि इस प्रकार शाप्रामाप्यते 
निश्वयके अनुरूप ही फर मिलना 
विद्ध होता है, इसल्यि उसे वह 
निश्चय करना चाहिये ॥ १॥ 


‡ 6 °= 


समय बह्म जरोषित गुण । 


कथम्‌ ? 


किस प्रकार निश्चय करना 


चाहिये 


मनोमयः पराणङ्रीरो भारूपः सत्यसंकटप 


४५ 


तेऽनेनेति मनस्तत्खदृत्या विष- 


आकाशात्मा सवकमा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः 
सवमिद्मभ्यात्तोऽवाक्यनाद्रः ॥ २॥ 
[ वहं ब्रह्म ] मनोम्‌य्‌, भाणडरीर, 
 भाकारशरीर, सर्वकर्म, स्वकाम्‌, सगन्ध, 
सव ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित घौर 
मनोमयो मनः्रायः; मनु- | 


मकारास्वरूप, सत्यसंकरपः 
सवरस, इस सम्पूर्णं जगत्को 
सम्भमद्यू्य है ॥ २ ॥ 


मनोमय--मनःपाय; जिसके 


हारा जीव मनन करता है उसे भन 
कहते है, यह अपनी वृदद्ारा 


[ताता >. 


हण्ड १४७] 


शादर्माष्वा्थ ३०७ 


2-4-८० = ~ > > ~ - -9-9~ः 


येषु प्रवत्तं मवति, तेन मनसा | विषर्ोमे पद हुआ करता है । उष॒ 


मनके कारण वह मनोमय है; अतः 


तन्मयः; तथा प्रवृत्त इव तत्प्रायो पुरूष भनःप्राय होकर मनके प्रवृत्त 


निवृत्त इव च| अत॒ एव 


प्राणक्षरीरः प्राणो लिङ्गात्मा 
विज्ञानक्रियाशक्तिदढयसंमूच्तिः; 


"यो वै प्राणः साप्रज्ञायावा 
प्रज्ञा स प्राणः'' (कौ० उ० ३। 
३)इति श्रुतेः। स शरीरं यस्य स 
प्राणशरीरः, “मनोमयः व्राण- 
शरीरनेता' (ञु° उ० २।२। 
७ ) इति च श्रुत्यन्तरात्‌ । 


भारूपः, भा दी्षिश्चेतन्य- 
सक्षणं रूपं यस्य स॒ भारूपः । 
सत्यसंकल्पः, सत्या अवितथाः 
सकल्पा यस्य॒ सोऽयं सत्यसं- 
कल्पः । न यथा संसारिण इवा- 
नेकान्तिकफलः संकल्प ईश्वर- 
स्येत्यथः । अनृतेन मिथ्याफल- 
त्वदेत॒ना प्रतयुढत्वात्संकल्पस्य 
मिध्याफरुतवम्‌ । वक्ष्यति- 
अनृतेन दहि प्रत्यूढाः" इति 


होनेपर प्रवृत्त-सा होता दै अ।र 
निवृत्त होनेषर निवृत्त-सा हो जाता 
हे । इसीलियि वह प्राणदारीर है, 
"जो प्राण है वही प्रज्ञा टै ओर 
जो प्रज्ञा टै वह प्राण है” इस 
तिके अनुसार विज्ञान ओर क्रिया 
हन दो शक्तियोंसे मिरकर्‌ बना हुजा 
रिङ्गशरीर ही प्राण दै; वह प्राण 
जिसका शरीर दहै उसे प्राणक्षरीर 
कहते है; जषा फि “आला मनोमय 
ओर प्राणङूप शरीरो [अन्य देहम] 
ले जानेवाला दै" इख भन्य श्रुति 
सिद्ध होता है । 

भाखूप- भा-दीप्ति अर्थात्‌ 
चैतन्य ही जिसका रूप है उसे 
भाखूप कहते ह । सत्यसंकल्य-- 
जिसके संकटप सत्य यानी अमिथ्या 
ह वह यह ब्रह सत्यसंकल्प है । 
तात्प यह है कि संसारी पुरुषके 
समान श्खवरका संकर अनैकान्तिक 
(कमी हो, कमी न हो रेसे) फर- 
वाल नदीं है। संसारी जीवक 
संकल्प मनृत अर्थात्‌ मिथ्या फल्ट्प 
देसे प्लयूड-वृदधिको प्राप होनके 
कारण मिथ्या फलवाला होत है । 
धवे अनृतते परसयूढ दै" दसा आगे 
चकर श्रुति कदेगी भी । 


३०८ 


छान्दोग्योपनिषल्‌ 


[ अध्याय १ 


ॐ 3 न 


आकाञ्चात्सा, आकाश इवा- 


त्मा । सवंगतत्वं शर्ष्मत्वं रूपा- 
दिदीनसं चाकाशतुल्यतेश्वरस्य | 
सर्वकर्मा, सवं विश्वं तेनेशरेण 
क्रियत इति जगत्सवं कर्मास्य स 
सवर्मा; “स हि सर्वस्य कर्ता" 
(ब्रृ० उ० ४।७५।१३) 
इति श्रतेः । सर्वकामः स 
कामा दोषरहिता अस्येति सर्व- 
कामः; “धममाविरुद्रो भूतेषु 
कामोऽस्मि" (गीता ७ । ११) 
इति स्मृतेः । 

नजु कामोऽस्मीति वचनादिह 
बहुवीहिनं संभवति स्व॑काम 
इति । 

न; कामस्य कर्त॑न्यत्वा- 
च्छब्दादिवत्पाराथ्य प्रसङ्गाच्च 
` क जःय उद्रि बहुनीदि न मानकः 


ओर ब्रह्म एकरूपः सिद्ध होगे, एेखी 
ब्रह्म भी अनादि नदीं 


माना जा सकेगा । इसके अतिरिक्त जैसे सभी 
चेतन काके अधीन होते है उसी तरह ब्रह्मम भी पराधीनताका दोर उपस्थित 


होगा । इतना ही न्दी, शब्दादिके 


आकाशात्मा-- जिसका 


उसे “आकाशात्मा कहते ह | 
स्त्र व्यापक, पक्ष्म तथा रूप आद्रि 
रहित होना ही ईर्वरका मकार 
समान होना हे । सरवकर्मा-उस शध 
के द्वारा सवं यानी विश्का निर्माण षि 
जाता हे--इसल्ि यह सारा बत 
उसका कमं है; अतः वह ईद्वर स्व 
कर्मा हे, जैसा कि “वही सक्र 
कर्ता हे” इस श्रुतिसे सिद हेत 
हे । सर्वकाम- सम्पूरणं दोषरहित 
काम उस्‌ परमात्माके ही दै इसस्यि 
वह सवकाम हे; जैसा ङि ५ 
पराणिर्योमि धमते अविश्द्ध कम £ 
इस स्मृतिसे प्रमाणित होता दै । 
शङ्का-करितु “कामोऽस्मि (४ 
काम हर) ठेसा वचन होनेके कए 
सवकामः इस पदमे बहुत्रोहिपमा 
नही हो सकता ? 
सम।घान- नही, क्योकि कामका 
कायत स्वीकृत किया गया दैशवइषः 
स्थि शब्दादिके समान भगवानूकी भी 
मान 


` ~----- € 
र कमंघारय-माने तो समस्त काम (काय 


समान काम मी पद : काम ओर 
ब्रह्मकी एकता माननेषर ब्रह्मम भी १८ 


यहां बहूवीहिसमास ही ठीक हे । 


पदाथंताकी आपत्ति होने लगेगी; इखटिये 


अन्म . 
त्मा स्वरूपं यस्य स॒ आकाशा- | यानी स्वरूप आके समान ह 


खण्ड १७ | 


ज्ाङ्रभाष्याथं ३०९ ` 


3.3 3454 > > = > = 5 = 5 5 > > 4 


देवस्य । तस्माद्यथेह सव॑काम 


इति वहुपरीदिस्तथा कामोऽस्मीति 
स्मृत्यर्थो वाच्यः । 


सवंगन्धः, सवे गन्धाः सुख- 
करा अस्य सोऽयं सवंगन्धः । 
“(पुण्यो गन्धःपृथिव्यामू""(गीता 
७।९ ) इति स्मृतेः। तथा 
रसा अपि विन्ञेया अपुण्यगन्ध- 
रसग्रहणस्य पाप्मप्तम्बरधनिमि- 
तत्वश्रवणात्‌ । ^तस्मात्तेनोमयं 
जिघ्रति सुरभि च दुगंन्धि च । 
पाप्मना येष्‌ विद्धः" (छा० उ० 
१।२।२)इतिशरुतेः।नच 
पाप्मसंसगं ईश्वरस्य, अविद्यादि- 
दोषस्यानुपपत्तः । 


सवमिदं जगदभ्यात्तोऽभि- 


व्याप्तः । अतते्व्याप्त्यथंस्य 


परा्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा । 
अतः जिस प्रकार यहाँ सर्वकामः 
पदम बहुत्रीहिसमास किया गया हे 
उसी प्रकार कामोऽस्मि इस 
स्मृतिका अथं करना चाहिये ।# 
सर्वगन्ध-- समस्त सुखकर गन्ध 
उसीके दै इसल्यि वह सवंगन्धः 
है; जैसा कि “प्रथिवी म पुण्यगन्ध 
ह" इस स्मृतिसे सिद्ध होता हे । 
इसी प्रकार पुण्यरस्र भी उसीके 
समश्चने चाये । क्योकि श्रुतिने 
अएण्यगन्ध भौर रसका ग्रहण तो 
पापसम्बन्धके निमित्तसे बतलाया दै 
जैसा कि “ईइसीसे उस (धणिन्दरिय) 
के द्वारा सुगन्ध ओर दुग॑न्ध दोनो 
को ही संघता है, वर्योकि यह पापस 
विद्ध है" इस श्रतिद्वारा प्रमाणित 
होता है । कितु ईशवरका पापे 
संसर्गं नहीं हे, क्योकि उसमें 
अविद्यादि दोष होने सम्भव नहीं है । 
इस सम्पूणं जगत्‌को वह सब ओर 
व्याप्त किये हुए हे । व्यापि जथवारे 
अत्‌ धातुसे कर्ता अथमें निष्ठा (क्त) 
प्र्य होनेसे “आत्त” पद सिद्ध होता 
हे । इसी प्रकार वह अवाकी भी दे, 


€~ ~ = 
कतैरि निष्ठा । तथावाकी, उच्यते| जिसके हार बोला जागा है उते वाकः 





8 तात्प यह कि उक्त गीताके "कामोऽस्मि" इन पदोका काम हः रेखा 


अथंन करके कामबाला हूः यह अथं समक्षना चाहिय । 


६१० छान्दोग्योयनिषष्‌ | अभ्याव \ 


< ¬< ¬< < < < < << 8 9९ 
ऽनयेति वाक्‌, वागेव वाकः। यद्वा | कहते है, वाक्‌! दी वाक दै | 
ह अथवा"वच्‌, धाुसे करण अर्थ, 
घंजन्तस्य करणे वाकः । स न ॥ 
वचेषमन्तस्य कर पयय करनेसे "वाकः शब्द निष 
यस्य विद्यते स वाकी न वाकी | होता है। वद (वाक ) नितं 


८ हो उसे दाकी' कहते दै, जो बग 
त वाक्यप्रतिपेधश्चात्रोप न दो कही "ग 
लक्षणाथेः। | 


श्वरस्य प्राप्नानि घ्राणादीनि कर- | दै वह्‌ अन्य 4 षिः 
(६ 8 करनेके लिये हे । श्रुतिमें गन्ध ओर 

ण ग्र त 

नि गन्धादिग्रहणाय । अतो सावि मग श 

वाक्प्रतिषेधेन प्रतिषिध्यन्ते | रहण करनेके छि ईवरके प्राणदि 
4 ४ इन्दियो होनी सिद्ध होती है; भत 

तान्‌ । “अपाणिपादो जवनो वाकके प्रतिपेद्वारा उन सवना ौ 


ग्रहीता परयत्यचज्ञुः स शरृणो- | प्रतिषेष किया गया दै; जेष 


“विना हाथ-पावका ही वह वेगवन्‌ 


(4 

त्यकणः” (रे० उ० ३ । १९) | जोर ग्रहण करनेवारा है तथा वि 
नेत्रका होकर भी देखत ओर तिन 
इत्यादिमन्त्वर्णात्‌ । रका होकर भी सुनता दै” इयि 

मन्त्रवण॑से सिद्ध होता है । 
अनादरोऽसंभ्रमः । अप्राप्त अनाद्र अर्थात्‌ भसम्भम 
प्राप्तो हि संभ्रमः स्यादनाप्तका- | ( माग्हरहित ) ह । जो ग 

ध = 
मस्य । न॒त्वाप्तकामत्वामित्य- | न्ह 2 उसे दी अपरा 


„~ _ | प्राप्िके स्थि आग्रह हो सकताहै। 
तृपस्येश्वरस्य संभरमोऽस्ति काचत्‌ | आप्तकाम होनेके कारण नियत्‌8 
॥ २॥ 


देरवरको कहीं भी सम्भम नही हे ॥२॥ 


~: ० :- 


यहो जो वाक्का प्रतिषेध कियाग््‌ 


॥ 


ण्ड ९७ ] शाङ्करमाष्या्थं ६११ 
ल 0 0 अ ~ 
रह्म छोटेसे छटा ओर वड़ेते बड़ा है 


एष म॒ आत्मान्तहंदयेऽणीयान्त्रीहेवां यवाद्रा 


सबपाद्रा र्यामाकाद्रा 


इयामाकतण्डुलद्वैष म 


आल्मान्तहदये ज्यायान्प्रथिव्या ज्यायानन्तरिक्षा- 
ञञ्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो छोकेभ्यः ॥ ३ ॥ 
हदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे, सरससि, 


इ्यामाकसे अथवा उयामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा हृदयकमरके भीतर 
यह मेरा आला थिवी, न्तर, धोक अथवा इन सन सोक 


अपेक्षा भी बडा हे ॥ २॥ 

एष यथोक्तगुणो मे ममा- 
स्मान्तहंदये हृदयपुण्डरीकस्या- 
न्त्॑भ्येऽणीयानणुतरो व्रीहेर्वा 
यबाद्ेत्या्त्यन्तदवक्मतवप्रदशे- 
नाथम्‌ । र्यामाकाद्मा श्यामा- 
कतण्डुलाद्वेति परिच्छिननपरिमा- 


यद उपयुक्त गुणविशिष्टं ॒मेरा 
आत्मा अन्तहदय--हृदयकमरूके 
अन्तः- भीतर व्रीहि ८ धान ) से, 
अथवा यवादिसे भी जणीयान्‌-सूक्षष- 
तर दै, यह कथन आत्माकी अत्यन्त 
सुक्ष्मता प्रदर्शित करनेके ल्यि हे । 
वह्‌ स्यामाक ओर इयामाकतण्डुकसे 
भी घुष्ष्म है- इस प्रकार परिच्छिन्न 


णादणीयानि्युक्तेऽणुपरिमाणत्वं | परिमाणसे सूक्ष्म बतखनेपर उसका 
अणुपरिमाणत्व प्राप होता है-एेसी 


्राप्माशङ्य अतस्तत्प्रिषे- | आशङ्का कर अव॒ उसका भतिषेष 
धायारभते--एष म॒ आत्मा- | कटनेके श्य “एष म आत्मा ज्याया- 
नतहेदथे उ्यायान्परथिव्या | थिन्या" इत्यादि , व्यते श्रुति 


आरम्भ करती है । इस प्रकार 
स्थूरतर पदार्थोकी जपेक्षा भी उसकी 
महत्ता प्रदरिंत कर श्रुति मनोमयः 


इत्यादिना । ज्यायःपरिमाणाच 
ज्यायस्त्वं दशंयन्ननन्तपरिमा- 





१९ छष्टोव्योस्‌ति ल ॥ खष्याद्‌ १ | 


> ध -9 -<  ऋ < -धट >< =< > =< < >< ८-9-86 
५९ £ चि ऋ, 
णत्वं दशयति मनोमय इत्या- | यहे लेकर “्यायनेभ्यो लेः 
दिना ज्यायानेभ्यो रोकेभ्य | यतमे ब्न्धद्रारा उस्न जनन 
इत्यन्तेन ॥ ३ ॥ परिमाण परदरित करती ह।॥१॥ ` 





हृदयस्थित बह्म ओर प्रवद्य एकता 
स्वंक्मा त © © © 
सवकमा सवकामः सगन्धः सवैरसः सर्वमिद्‌. 
मभ्यात्तोऽवाक्यनादर एब म आत्मान्तहदथ एतद्ब्रह्म. 
तमितः परेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विषः 


कषित्सास्तोति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिस्थः॥ ४॥ 
जो सकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सको सब गोपत 
व्याप्त कटनेवार, वाहित ओर॒सम्भरमरन्य है वह भेरा भास 
, हृदयकमरूके मध्यमे स्थित है । यही ब्रह्म है, इख शरीरे मरक 
जानेपर ओ इसीको प्राक्ठ होञगा । पसा जिसका निश्चय है ओर नित 
इस विषयमे कोई संदेह भी नहीं है [ उसे $शरभावकी ही परा हेत 
दे । रेसा शाण्डिच्यने कडा दे, शाण्डिस्यने कहा है ॥ ४ ॥ 
यथोक्तगुणलक्षण ईश्वरो | पूर्वोक्त गुणोसे रक्षि श 
ईवरका ही ध्यान करना च) 
भनोपास्यतेन ध्येयो न्‌ तु तद्गुण- उन गुणोसि युक्ता नही; ष ` 
खगुणबरहवाभि-बिशिष्ट एव । यथा | 'राजपुर्षको अथवा चित्रको ल 
भरतं न नि्ण- फा कदे जानेपर उनके 
मिति स्यापनम्‌ राजपुरुषमानय | ( राजा अथवा चित्र-विचित्र गय ) 
चित्रगु वेत्युक्ते न विशेषणस्याप्या-| को कनेकी चेष्टा नदी फी नती 


पर उसी प्रकार यहाँ मी निगुण ब्रह्म 
नयने व्याप्रियते ५ | उल्लस]. भत व| 


भ्राध्षमतस्तनिदृत्यथं सवकर्मेत्यादि| अतः उसकी निवृततिके छियि 64 





=-= 
9. जिखकी गाय चित्रविचिन रगकी हो उत तसरद जद 1 


खण्ड १७ ] शाड्रभाष्याथं ३१६ 
> > >< < < < < << < > ८ < < ८ + अ ८ ८ + 


पुनर्भचनम्‌ । तस्मान्मनो- | कर्मा' इत्यादि विरोषणोको पनः 
मयत्वादिगुणविचिष्ट एवेशो | कडा गया है। इसल्यि मनोमयत्वादि 
गु्णोसे युक्त ईधर्का दी ध्यान 
भ्येयः। करना चादिये । 
अत॒ एव षष्ठसप्चमयोरि| इसी छठे ओौर सातवें अध्या्यमि 
रतिने निस प्रकार “तत्त्वमसि” 
[तु वह दै] ओर “लेवेदं सर्वम्‌" 
१६) “आमेदं सर्वम्‌" (घ्म ० | [ यह घव भासा दी हे] इन 
१ १ वाक्योदरारा सराधकको स्वाराज्यपर 
उ० ७ ।२५। २) इति नेह स्वा- | अभिषिक्त किया है उसं प्रकार 
वद यँ नदीं कर्ती; ह्‌ 
राज्येऽभिषिश्वति, एष म आत्मं- | मेरा जाता ह "ह ह हैः शर 
तदुत्रह्मतमितः = यसे मरकर नानेप इसे परा 


ति होऊंगाः इत्यादि वाक्य ईष 
स्मीति लिङ्गात्‌; न तवातमश्देन | विषयमे लिह हे । यहो (भासा' 


शब्दसे प्रस्यगात्माका दी निषूपण 
नदीं किया जाता, क्योकि ममः 
यह पष्ठी उसके सम्बन्धाथंकौ प्रतीति 
करानेवाङी है । तथा भं इसे रपत 
अभिसंभवितास्मीति च कर्मकठ- | होगा, इन शब्दहवर ब्रहम भोर 
आत्मके कर्मव भर कर्ैतक्रा 
त्वनिर्दंशात्‌ । निर्देश किया गया है । 

नलु षठऽप्यथ संपत्स्य इति | ` पूर्व° रितु छठे अध्याये भी 
| (अथ संपत्स्ये, [ देहत्यागके भनन्तर 
पूर्वपक्षिण सत्संपत्तेः काला- ससस्वखूप हो जाऊंगा ] इस वचनसे 
शरुतिने सत्स्रहूप होनेम कालका 

आक्षेपः न्तरितत्वं दशयति । | व्यवधान तो दिलाया ही है। 


(^तत्वमसि'" (छा०उ०६ । ८ । 


परत्यगात्मेबोच्यते, ममेति षष्ठयाः 


संबन्धारथपरत्यायकत्वात्‌, एतम्‌ 


३१७ छान्दोग्योवनिषद्‌ [ अध्वा 


च नो 

न, आर्धसंस्काररेषस्थिस्य- | लिद्धन्ती-देसी वात नही दै 

४५ 

उक्ष धूपरत्वात्‌, न | भ्यामि यदं कनन भारम 

जनित संस्कारोकी समापयन्‌ 

निरासः कालान्तरिताथ॑ता; । ही जीवकी स्थिति वतटानेके छि 

| है, इसका तार्यं कालका व्यवधान 

अन्यथा तच्वमसीत्येतस्याथस्य | पदर्चित करनेमे नदी है, नही 

तो तु वह है इ वाक्यके अधे 

याध होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा#। 

यद्यपि यर्हो “आस्माः शब्द प्रय 

गात्ाका बोधक हे, जर ह सब 

ब्रह्मेति च प्रकृतम्‌,एपम आतमा- | निश्चय ऋ ही हैः इस वाक्ये 

ऽ सत ब्रह्मका भी प्रकरण है तथा "यह 
न्तहदय एतद्बरहषत्युच्यते; तथा- 

१ मेरा आत्मा हृदयके भीतर दै--बह 


उवतेतमा- | र हे' रेस्राभी कहा गया हैः 
प्यन्तर्धानमीषदपरित्यज्येवेतमा- वापि वदास न 


त्मानमितोऽस्माच्छरीरातप्ेत्यामि- | छोडकर भँ मरनेपर इस शरीरे 
जाकर इसे प्रात होञंगाः- रसा 
साघकका निश्चय बताया गया है । 
यथाक्रतुरूपस्यात्मनः प्रति- | इस प्रकार जाननेवाले निष 
विद्वान्‌को श्न भपने निश्चयके भर्गः 
रूप सगुण परमात्माको पराप्त होनै- 
दद्रा सत्यमेवं स्यामहं प्रत्येव न | वारा ह, मे अवदय. वैषा ही हौ 
^ 


%@ इसमे ब्रह्म ओर आत्माके अभेदका वर्तमानकालिकं क्रियापदसे 


मतिपादन करिया गया दै; अतः कालभेद स्वीकार करसे इसके अभिप्राय 
विरो उपस्थित होगा । 


 बाधब्रसङ्गात्‌ । यदयप्यात्मश्ञब्दस्य 


(भ ष 9 
प्रतयगथेत्वं सवं खल्विदं 


संभवितास्मीतयुक्तम्‌ । 


पत्तास्मीति यस्येवंविदः स्याद्धवे- 


= + ¢ 
कं्ड १४ | शाङ्कलमाव्याथ ३१५ 
>9 > >< >8८ ¬ ¬< ऋः 8८ ८ > ~< ~ ~> -- + > ॐ + 5 ॐ > >. 4 


स्यामिति न च विचिकित्सास्ति, जागा" देसा निरचय दै, ओर जिसे 
इत्येतसमनर क्तुफरसंन्ध; स] पसा ही हेडं दष मगन 
निर्चयके फरक सम्बन्धे शा नहीं . 
तथेवेश्वरभावं प्रतिपद्यते विद्रानि- | है, वह विद्वान्‌ उसी प्रकार ईर- 
त्येतदाह स्मोक्तवान्किल शाण्डि भावको भा हो जाता हैषा 


व्यो 7 शाण्डिल्य नामक चछषिने कहा है । 
ल्वा नान । द्र्भ्ास्‌ | (ण्ड्यः ण्डय? यह द्विरुक्त 
¢ 

आदराथंः । ४ ॥ आद्रके स्थि है ॥ ४॥ 


म ५ 
--* 9 `--- 


इतिच्छान्दोग्यो पनिषदि कठतीयाण्याये 


चतुदेशलण्डभाष्यं सम्पृणेम्‌ ॥ १४ ॥ 





फञ्चदक्र खण्ड 


विराटकीञ्चोपासना 


अस्य इर वीरो जायते" | “इसके कुलम वीर पतर शेत 
हे- शसा (३। १३।६) 

इरयुक्तम्‌ । न ॒वीरजन्ममात्रं | कहा गया है । रतु वीर्‌ पुता 
जन्ममात्र ही पिताकी रक्षाका 1 

पितच्ञाणाय; ^तसमासपुत्मलुि्ट| दी दी सकः जषा कि 
अनुशासित पुत्रको | ब्राहमणलोग्‌ | 

लोक्य [ पुण्यलोकृ प्राप्त कनै 
वाला ] कते है” इस अन्य श्रते 


दीर्घायुषं कथं स्यादित्य सिद्ध होता हे। अतः उसे दीर्घा 
अतस्त कथ स्यादत्येव्‌- | क़ी पापि कैसे हो सकती दै--इसीफै 


5 स्यि कोशविज्ञानका आरम्भ क्वि 
मथ कोराविजञानारम्मः । अभ्य- जाता दै । जभ्यर्दित# उपाखनकि 
परतिपादनमे संरून रहनेके करणा 

हितिजानन्यासङ्गादनन्तरमेव | श्रो जायते' इस श्ुतिके अनन्तर 


नोक्तं तदि इसका वर्णन नहीं किया, इट्य 
नोक्तं तदिदानीभेवारभ्यते-- जब आरम्भ किया नाता है-- | 


रोक्यमाहुः''इति भरुतयन्तरात्‌ । 


~ 


6 1 युत ब्रहमकी उपासनाको कौशचेय ज्योतिसे आरीः | 
कृरना अभ्यरहित है कि 
मिथि ब्होपाखना अन्तर 4८ ा ५ हे जोर उसकी मनोमयत्वादिुण 1 


खण्ड १५] शाङ्करमाच्याथं ३१७ 
>€ 9 त 9 ----- > 


अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो 
ह्यस्य खक्तयो योरस्योत्तरं बिरुश्स एष कोशो वसुधा- 
नस्तस्मिन्विश्वमिद्‌ श्चितम्‌ ॥ १ ॥ 


अन्तरिक्ष जिसका उदर है वह को पथिवीरूप मूखवाला है । 
वह नीणं नहीं होता । दिशा इसके कोण रै, आकाश उपरका छिद्र है 
(प 
वह यह कोश वघुधान है । उसीमें यह सारा विश्च स्थित हे ॥ १ ॥ 


अन्तरिक्षुद्रमन्तः सुषिरं य- | अन्तरिक्ष दै उद्र--अन्तः्र 
स्य सोऽयमन्तरिशनोदरः, कोशः | जिसका वहं यहं अन्तरि्दर कोश 
कोश इवानेकधर्मसादृश्यात्कोरः जो अनेक धर्मम सादृश्य रसनेके 


(4 ८ कारण कोशके समान कोश ट, वह 
स च भूमिबुध्नः, भूमिबुष्नो मूलं स 


यस्व स भूमिबुध्नः; न जीयति न्‌| एसा मूमिवुध्न (््वीमूलक) दै, वह 
विनश्यति, बरैलोक्यार्मकत्वात्‌ । १ श जीण नही 
ल ताअ नारको प्राप्त नहीं 
सहस्रयुगकारावस्थायी हि सः। श 
दिशो ह्यस्य सर्वाः स्रक्तयः | युगकाल्पर्यन्त रहनेवाख है । 
कोणाः ~ | समस्त दिशाणं ही इतकी सक्तियाँ 
को 4 । दयौरस्य कोशस्योत्तर नविम 
म्व बरिलमू्‌+स एष यथोक्तगुणः | ऊपरी छिद्र है । वह यह पूर्वोक्त गुणो- 
कोरो वसुधानः, बसु धीयते- | वाखा कोश बधषान है, इसमे भाणि- 
। वकि कर्मफरसंजञक वघुका आधान 
ऽस्मिन्प्राणिनां कमंफलार्यमतो | किया जाता ह, इसर्यि यह कोर 
, | वघुषान है । तात्य यह है कि 
वसुधानः । तस्मन्न्तरविंव | उ कोशके भीतर ही भाणिका 
समस्तं॒प्राणिकफलं सह । सम्पू कर्मफल लिसक्षा कि, 


३१८ छान्दोच्योयनिषद्‌ [ग 


9 88988 आ > 
[व [० | 
ततसाधनरिदं यद्गृयते प्रत्यक्षादि परलक्षादि परमाणोसे ग्रहण शि ' 


॥ [१ 
प्रमाणेः भ्रितमाभरितं स्थितमि- ¦ जाता €, अपने साषनेकि पि 
| प्रित--आश्ित अर्थात्‌ छि 
( 
त्यथः | १ ॥ हे॥ १॥ 


प © गन 


तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिण 
राज्ञीनाम श्रतोची सुभूता नामोदीची तां वायुवैतसः ¦ 
स य एतमेवं वायुं दिशां वत्तं वेद न युत्ररोदश्रोदिति ' 
सोऽहमेतमेवं वायुंदिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदरुदम्‌॥२। 
उस कोकी पूवं दिशा नुह नामबारी है, दक्षिण दिश 
(सहमाना' नामको है, पश्चिम दिशा “राज्ञी, नामवाटी है तथा उक्त दि 
भूताः नामकी है । उन दिशार्थोका वायु वत्स है । दह, नो | 
प्रकार इस ॒वायुको दिशा्मोके वत्सूपसे जानता है पुत्रके निमित्ते | 
रोदन नही करता । वह भँ इस प्रकार इस वायुको दिश्चा्ओके वतखूपते 
जानता हं; अतः भर पुत्रके कारण न रोऊॐ“ ॥ २ ॥ | 
तस्यास्य प्राची दिक्प्राग्गतो | उस इस कोटाकी भावी दिश-- 
पूर्वैकी ओरका माग, "जुह्‌' ष" । 
मागो जहूर्नाम जुहस्यस्यां | वाखा है । कर्मठ रोग इ | 
दिशामे पूर्वाभिसुख होकर ध्वा । 
दिशि कर्मिणः प्राङ्मुखाः सन्त | करते है इसि यह लुह! वा । 
वारी है । दक्षिण दिशा “सहमा | 
इति जुनाम । सहमाना नाम | नामकी है, क्योकि इसी दिशा बव । 
सहन्तेऽस्यां पापकमंफलानि यमपुरी अपने पापकमेकि फलस | 


यमपर्या भाणिन इति सहमाना त क | 
नाम दक्षिणा विक्‌ । तथा राजी ।है। तथा भतीची यानी पथम दि । 
नाम प्रतीची पश्चिमा दिक्‌, । राज्ञी नामकी ह वरुण रनद । 


॥ 
# 
| 
1 


खण्ड १५ | 


क्ाङकरमाष्याथ 


३१९ 


वि = 3 3 = 3333575 3 


र्ती राज्ञा वरुणेनाधिष्ठिता | 


संभ्यारागयोगाद्वा । सुभूता नाम| 


अधिष्ठित होनेके कारण अथवा 
सायंकाछ्िकं राग ( खकल्मि ) के 


योगसे परिचिम दिशा श्ची है । 
उत्तर दिशा धघुभताः नामवाी है । 


भूतिमद्धिरीश्वरङुबेरादिभिरधिष्ठि ईश्वर, कुबेर भादि भतिसम्पन्न देव- 


तत्वात्सुभूता नामोदीची । 
तासां दिशां बायुेत्सो दि- 
ग्जत्वाद्यायोः; पुरोवात इत्यादि- 
दशनात्‌ । यः कथित्पुत्रदीष- 
जीवितार्थ्येवं यथोक्तगुणं वायु 
दिशां वत्समसरतं वेद, सन 
त्ररोदं पुत्रनिमित्तं रोदनं न 
रोदिति पूत्रो न म्रियत इत्यथः 
यत एवं विरिष्टं कोशदिग्वत्स- 


विषयं विज्ञानमतः सोऽ पुत्र- 
जीविताथ्यंवमेतं वायुं दिशां 
वत्सं वेद्‌ जाने । अतो मा पुत्र 
रोदं मा रुदं पुत्रमरणनिमित्तम्‌ । 
पत्ररोदो मम माभूदित्यथंः॥२॥ 


तार्जोसे अधिष्ठित होनेके कारण 
उत्तर दिशा मृताः नामवाली है । 

उन दिशार्ओका वायु वत्स है 
क्योकि वायु दिशाओंसे ही उन्न 
होनेवाढा है । जैसा छि पूर्वीय वायु 
आदि प्रयोगोंसे देखा जाता दै । बह 
कोई भी पुरुष, जो कि पुत्रके दीघ 
जीवनकी कामनावाला है, यदि इस 
प्रकार पूर्वोक्त गुणवाटे दिाओंकि 
वत्स अगृतरूप वायुको जानता है 
वह पुत्ररोद--९ त्रनिमित्तक रोदन 
नहीं करता । भर्थात्‌ उसका पुत्र 
नहीं मरता, क्योकि कोश ओर 
दिश्चा्ओके वत्ससे सम्बन्ध रखने- 
वाल विज्ञान पसे गुणवाला है अत 
अपने पुत्रके जीवनको कामनावाखा 
म दिश्चाओंके वत्सरूप इस वायुको 
इस प्रकार जानता ह; इसल्यि 
पुत्ररोद्--पुत्रके मरणसे होनेवाख 
रोदन न करू । अर्थात्‌ मुञ्चे पुत्रके 
स्यि रोनेका प्रसङ्गं प्राप्त न 
हो ॥२॥ 


11 | छान्दोण्योपनिषल्‌ 


[ सध्या | 
> 9 9 ट ट त अ ८ ४ ॐ 3 ५ | 


अरिष्टं कोशं भप्येऽसुनामुनासुना पाणं प ` 
दयेऽमुनामुनासुना मूः पपयेऽभुनामुनासुना भुवः, 
देऽमुनामुनासुना सवः षरपद्येऽसमुनामुनामुना ॥ ३॥ 
म अमुक अमुक अमुकके सहित अविनाशी करोकी शर ह 
अमुक मुक भमुक्के सहित प्राणी शरण ह; अमुक ममुक अमुके 
सदित भूकौ शरण ह; अमुक-अभुकं अमुरके सहित भुवःकी शरण पि 
अमुक अमुक असुकके सहित स्वःकी शरण ह#* ॥ ३ ॥ 
अरिष्टमविनािनं कोशं य- ] पुत्रक दी्घायुके ष्थि परवत 


ध £ ए 
धोक प्रपये प्रपन्नोऽस्मि पुजा- अरिष्ट-- अविनाशी कोशकी श | 
नति ठ ह । भुना अमुना अखुना' इक | 
युषे । अगनारनानेति त्रिरनाम | यह्‌ तास है कि तीन-तीन क | 
अपने एतरका नाम स्ता दै । त | 
अमुक भमुक अमुकके सहित प्रण | 
्, = की शरण है अमुकं अयुक अमुके | 
प्रपद्यऽयुनायनाना, भूःप्रपचेऽमु- | 
5 सहित भूःकी शरण है; अमुक अ | 
ुकके टित युवःकी शरण £ | 
सुनाना, स्वः प्रपचेऽुनाुना- | भोर अमुकं युक अके . | 
स्वकी शरण द| सवत | 
युना, सवेत प्रपद्य इति तिर्नाम | अमुक अमुकके सहित 6 | 
ठेसा कहकर बारम्बार तीनं | 
गृहणाति पुनः पुनः ॥ ३॥ बार पुत्रका नाम लेता दै ॥ २॥ | 


गृह्णाति पुत्रस्य । तथा प्राणं 


नाघुनायुना, ओवःप्रपयेऽयुना- 





| 


४५4 १ ५ | 
स यदवोचं घ्राणं घरपद्य इति प्राणो वा इद << | 
भूतं यदिदं किच तमेव तत्प्रापत्सि ॥४॥ अथ यदवोच 


न ५4 1 | 
% ईसम जशो-जर्दा अमुकः राब्द्‌ आया है वरह अपने पुत्रके नाच 
उच्चारण करना चादिये । ४ 


काण्ड १५] शाङ्करआस्याथे ३२१ 
~8८------ - - - ल ------------ब- ------ <+ 


भूः भपय इति प्रथिवी प्रप्य ऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं पपय 
इत्येव तदवोचम्‌ ॥ ५ ॥ अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य 
इत्यधि धपव्ये वायुं पप आदित्यं प्रपद्य इत्येव तद्‌- 
वौचम्‌ ॥ ६ ॥ अथ यद्वोचरस्वः प्रप्य इ्युग्ेदं 
प्रपद्ये यलुर्वेदं प्रप्य सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं 
तदवोचम्‌ ॥ ७ ॥ 
उसर्भैनेजोकहा किर प्राणकी शरण है सो यह जो 
कुछ सम्पूणं भृतसमुदाय है प्राण ही हे, उसीकी मँ शरण है ॥ ४॥ 
तथार्भेनेनो कहा करि भरँ मकौ शरण है इससे मेने यही 
कहा है कि भ प्रथिवीकी शरण है, अन्तरिक्षकी शरण ह ओर युरोक- 
कीशरणर्हैः॥५॥ फिरर्मेने जोकि भे भुवःकी शरण ह 
इससे यह कहा गया है किं श्रे अग्निकी शरण है, वाधुकी शरण ह ओर 
आदियक्री शरण दह ॥ & ॥ तथा मने जोकहा कि “मे स्वकी शरण है 
इससे “मेँ ऋग्वेदकी शरण ह, यजुर्वेदी शरण हँ ओर सामवेदकी 
शरण है" यदी भने कहा दै, यही मेने कहा हे ॥ ७ ॥ 
स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति| “उस ने जो कदा किरम प्राणकी 
व्याख्यानाथेयुपन्यासः । प्राणो ् हः इसीकी व्याख्या करनेके 
विस्तार किया जाता हे। यह 
॥ जितना भी जगत्‌ है सब ध ही 
यथा वारा नामो' ( छ° उ° | है, जैसे कि नाभिमे अरे रगे रहते 
७ । १५ । १ ) इति वशयति । | है [ उघ्च मरकर भाणमे सम्पूणं भूत 


त .. | समर्पित है एेसा आगे करेगे भी। 
अतस्तमेव सवं तत्तेन प्राणप्रति भतः जत गानो ति 


पादनेन ्रापत्सि प्रपन्नोऽभूवम्‌ । | भ उस सर्वभूत [विराट्‌] की ही शरण 
तथा भूः प्रपद्य इति वरी्नोकान्‌ | है । मैने जो यद का कि भे भूः 


३२२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय | 
स 6 व | 
भूरादीन्परपव्र इति तदवोचम्‌ । | की शरण हैः उससे यही कहा | | 
कि मे एथिवी जादि तीन शेक 
शरण ह । तथा मेनेनोकहा$ 
ग्यादीन्परपद्य इति तदवोचम्‌ । | भे सवःकी शरण है" उपसे फ 
कटा गया हे क्रि मेअमि अलति 
रारण दँ । जर देस नो कहा र 
गवेदादीन्प्रपच्य इत्येव तदो च- | कि भे स्वःकी शरण ह इसपे शच 
हा गया हे क्रि म ऋषे 
शरण ह । ततपश्ात्‌ उक्त अन्‌ 
ूवोक्तमजरं कोशं सदिण्व्सं । कोशका दिशाभके वक ए 


द विपिपूर्वक ध्यान कर उपरे मनर | 
, यथावद्धयात्वा । द्विवंचनमादरा- | दो जपे । (तदवोचं तदवोचम्‌! इ 


थेम्‌ ॥ ४-७ ॥ विरक्ति जदरके लिये है॥४-५॥ | 


रन्त 


अथ यदवोचं युवः व्रपद्म इत्य- 
अथ यदबोचं स्वः प्रपद्य इत्यु- 


मिति । उपरिष्टन्मन्त्राञ्जपेत्ततः 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि ठतीयाध्याये 
पथ्चदशखण्डमाप्यं सम्पूणेम्‌ ॥ १५॥ 





कोःटक्लू खश 


आत्मयज्नोपासना 
पुत्रायुष उपासनगरक्तं जपश्च । | पुत्रकौ आयुके ल्य उपासना 
ओर जप कहे गये | अब अपनी 
अथेदानीमातममनो दीधेजीवना- | दीरषयुके स्मि इत जप जर 


उपासनाका विधान करता हु 
वेद कहता है । पुरूष स्वयं जीवित 
जीवन्हि स्वयं पुत्रादिफरेन रहनेपर दी पुत्रादि फरुसे युक्त 
होता हे, ओर किसी प्रकार नही; 
इसीसे वह अपनेको यज्ञरूपसे 
त्मानं यज्ञं संपादयति पुरुष :- | निष्पन्न करता है-- 
पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्वि<शतिवर्षाणि 
तस्परातःसवनं चलुरविश्शत्यक्षरा गायत्री गायत्रं पातः 
सवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः पाणा वाव वसव एते 
हीद्सर्वं वासयन्ति ॥ १ ॥ 
निश्चय पुरूष ही यज्ञ है । उसके ८ उसकी आयुके ) जो चौबीस 
वष है, वे प्रातः सवन है । गायत्री चौबीस अक्षरोवारी है; ओर भातः- 
सवन गायत्री छन्दसे सम्बद्ध ह । उस इस प्ातःसवनके वुगण अनुगत 
है । प्राण दही वु रै, क्योकि ये दी इस सबको बसाये हए है ॥ १ ॥ 
पुरुषो जीवनविशिष्टः कायं- | जीवनसे युक्त देह ओर इन्दिोका 
संघात, जैसा कि प्रसिद्ध दे, वही 
पुरुष दै । वाव शब्द निरचयाथंक 
वावशाब्दोऽधारणार्थः । पुरुष | दै । भतः तालयं॑ यह है कि पुरुष 
छा० उ ९९-- 


येदभरुपासनं जपं च बिदधदाह । 


युज्यते, नान्यथा । इत्यत आ- 


करणसंघातो यथाप्रसिद्र एव । 


देश छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मष्याय १ 
क > 8 >< >- 8) > 


>>> 
एव यज्ञ॒ इत्यथः । तथा हि | दी यज्ञ है । अव श्रुति सदत 


सामान्यः संपादयति यज्ञत्वम्‌ | | दिखलकर पुरुषकी गकञह्पता पिद 
कथम्‌ १ तस्य पुरुषस्य यानि | कती दे । किस परर! (सो क 


है- ) उस पृरुषकी आयुके 
चतुरविंशतिवर्षाण्यायुषस्ततप्रातः- लो चौषीस वं हे, पे उद प 


सवनं पुरुषाख्यस्य यज्ञस्य । संज्ञक यज्ञके प्रातःसवन है । 
केन सामान्येन १ इत्याह-चतु-। वे कि समताके कारण प्र 


वि गायन्नी छन्दो | समन दै? सो बतलते है--गायत्री 
"कि छन्द चौबीस भक्षरोवारा है ओर 


गायत्र गायत्रीछन्दस्कं हि विधियक्ञका प्रातःसवन भी गायत्र ` 


र गायत्रीछन्दवाला है । अततः पुरूष 


वरातःसवनसपन्नन चतुर्विंशति- | वंको अयुसे युक्त है । दसी 
वर्पायुषा युक्तः पुरुषः अतो | विभियकते सशता होनेके कारण 


वह यज्ञ हे । इसी प्रकार षीठेकी 
ट # ९ 

सिभियरसादृयाध्ः । त धो दोनों आयु ओंसे त्रिष्टप्‌ ओर जगती 
त्रयोरप्यायुषोः सवनद्रयसंप- | छन्दके अक्षरोकी संख्याम समानता 


तितिष्टवजगतयकषरर | होनेके कारण उनके द्वारा अन्य 
तताल्चष्टर प्वक्षरसख्यासामा दोना सवनी निष्पत्ति बतलानी 


न्यतो वाच्या | चाहिये । 
किंच त॒दस्य पुरुषयज्ञस्य । तथा विषियङ्के समान इस 


प्रातःसवनं विधियज्ञस्येव वसवो | पुरुषयज्ञके प्रातःमवनक्रे भी वषु ` 


देवा अन्वायत्ता अनुगताः (4 ध है। स यह ५ 
सवनदेवतारूपसे वे उ 
सवनदेवतातेन स्वामिन इत्यर्थ, क 


है । [इस कथनसे] विधियज्ञ 
परुषयञेऽपि विधियज्ञ इवाग्न्या- के समान पुरुषयज्ञमे भी जगनि जादि 
द्यो वसवो देवाः प्राना इत्यतो | ही वघुदेवता निशित होते है; अत 


द्धः 


लच्ड शद ] शाङ्करभाष्यं ३२५ 
9 9 9 2 9 = 5 क = =-= 5 5 => ॐ 4 


विकषिनष्टि । प्राणा वाव वस्वो | श्रुति उनकी विरोषता ८ विमिता ) 
बतलाती है । [ पुरुषयकषमे ] वाक्‌ 
आदि इन्दर्याँ ओर प्राण आदि 
यस्मादिदं पुरुादिप्राणिजातमेते | गणु ही व्छु दै, क्योकि वेदी इस 

पुरुष आदि प्राणिसमुदायको वासित 
वासयन्ति । प्राणेषु हि देहे | करि इए दै । देहमे प्राणोकि रहते 

हए ही यह सव बसा हुमा हे, ओर 
वसत्सु स्वमिदं वसति, नान्यथा; किसी प्रकार नही; अतः देहम 

बसने अथवा उसे वसानेके कारण 
इत्यतो बसनाद्वासनाच्च वसवः।१॥ प्राण वषु है ॥ १ ॥ 


वागादयो वायव; ते दि 





तं चेदेतस्मिन्वयसि किञिदुपतपेत्स बरयासप्राणा 
वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनरसवनमनुसंतनु- 
तेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विोष्सोयेल्यु- 
द्धेव तत एत्यगदो ह भवति ॥ २ ॥ 
यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमे उसे कोई रोग आदि कष्ट 
पू्हुचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, दे प्राणरूप वुगण | मेरे इस 
प्रातःसवनको माध्यन्दिनिसवनके साथ एकट्प कर दो; यज्ञस्वरूप मँ आप 
प्राणरूप वसुरओके मध्यमे विटप ८ नष्ट ) न होऊ” तब उस कष्टसे मुक्त 
होकर वह नीरोग हो जाता है ॥ २॥ 
तं वेदयज्ञसंपादिनमेतस्मिन्प्रा- | उस यज्ञपम्पादकको यदि भ्रातः- 


{सवनसंपन्ने वयसि किञचिद्धधा-| सवनरूपसे निष्पन्न हुई इसे आये 
त मरणकी शङ्काकी कारणमूत कों 
ध्यादि मरणश्ङ्खाकारणष्चुपतपेद्‌. निनि 


दुःखघुत्पादयेत्स तदा यक्ञसंपादी | यजञसम्पादन करनेवाख पुरुष 


३२६ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ खभ्याय ३ 
> > > 6 9 4८ > 8 ¬ ह ~ ऋ८ 2८ 8-८-6८ "ऋ ~~ 9 > 


परुष आत्मानं यनं मन्यमानो | अपनेको यज्ञ मानते हुए कटै - 
बृयाज्पेदित्यथं इमं मन््रम्‌-- | अर्थात्‌ इस मन्वको जपे-- 


हे प्राणा वसव इदं मे प्रातः- | शे प्राणरूप वुगण ! यह पैर 
सवनं मम यज्ञस्य वतेते तन्मा- यज्ञका प्रातःसवन विदिमान है; 
ध्यान्दन सवनम्‌ नुस्ततसुतात्‌ मा- | इसे माध्यन्दिनसवनङूपसे अनुसंतत 
ध्यन्दिनेन सवनेनायुषा सटित- करो; अर्थात्‌ इसे माध्यन्दिनिसवनषटप 
मेकीभूतं संततं ङुरुतेत्यथेः । | मेरी आटके साथ एकीभूत कर दो । 
माहं | यज्ञो युष्माकं प्राणानां यज्वरूप भें प्रा्ःसवनके अधिष्ठाता 
वशठनां प्ातःसवनेशानां मध्ये | आप॒ पराणप बघुभोकि म्ये 
विलोप्सीय विलुप्येय विच्छिधये- | विट अर्थात्‌ विच्छिन्न न देऊं । 
यत्यधः । इतिशब्दो मन्त्रपरि- | मूरमे ति, शब्द मन्त्री समापि. 
समाप्त्यथेः। स तेन जपेन ध्यानेन के स्यि है । उत्त जप जर ध्याने 
च ततस्तस्मादुपतापादुदत्युद- | द्वारा वह उस कष्टसे हट जाता है 
च्छति । उद्धम्य॒विशरुक्तः सनन- | ओर उससे च्रटकर अगद--संताप- 
गदो हाजुपतापो भवत्येव ॥२॥ | शून्य ही हो जाता दै ॥ २ ॥ 
-; ४ :-- 
अथ यानि चलुश्चस्वारिश्र्षाणि तन्माध्यन्दिन<- 
सवनं चतुश्चत्वारिश्शदश्चरा विष्टपं माध्यः 
न्द्निशसवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव 
रुद्रा एते दीद सर्व्रोदयन्ति॥३॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि 
किश्चिहुपतपेत्स बुयात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्य 
न्द्निश्लवनं तृतीयसवनमनुसखंतनुतेति माहं 
„ ध्राणानाररुढार्णां मध्ये यज्ञो विोप्सीयेद्युद्धैव तत 
एत्यगदो ह भवति ॥ ४ ॥ 


~= ---------------- --- 


ण्ड १६ | शाङ्करमाष्वाथ ३२७ 
~9----9----- -  ऋ  ऋ  -  ऋऋऋ# ः 
इसके पश्चात्‌ जो चौवाटीस वषं है, वे माध्यन्दिनसवन है । 
षट्‌ छन्द चौवालीस क्षरोवाला है ओर माध्यन्दिनवन त्िषटप्‌ 
छन्दसे सम्बद्ध है । उस माध्यन्दिनसषवनके रुदरगण अनुगत है । प्राण 
ही रुदर है, करोकि ये ही इस सम्पण प्राणिसमुदायको रुते है । यदि 
उस यज्ञकतकि इस आयुमे कोई [ रोगादि ] संतप्त करे तो उसे इस 
प्रकार कहना चाहिये, हे प्राणरूप रुदगण ! मेरे इस मध्याहकारिकि 
सवनको तृतीय सवनके साथ एकीभूत कर दो । यन्ञस्वरूप मेँ प्राणरूप 
स्रकि मध्यमे कभी विच्छिन्न ८ नष्ट ) न हो । एेसा कदनेसे वह उस 
कषटसे छूट जाता है जीर नीरोग हो जाता है ॥ २-४॥ 
अथ यानि चतुश्वतवारिशद्- | “अथ यानि चतुश्चलारिशदर्षणि' 
पागीरयादि समानम्‌ । रुदन्ति इत्यादि वाक्यका अथं पूर्ववत्‌ हे । 
यन्ती | रोते अथवा रुलते है, इसल्यि 
रोदयन्तीति प्राणा रुद्राः ऋ | प्राग शर है । वे (आण) मध्यम 
हि ते मध्यमे वयस्यतो रुद्राः आयुं नर होते ह इसखियि रुद्र 


॥ ३-४ ॥ कहलाते हँ ॥ २-४ ॥ 


अथ यान्यष्टाचत्वारिशशद्रर्षाणि तत्त॒तीयसवन- 
मष्टाचतारिश्शादक्षरा जगती जागतं ततीयसवनं 
तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणां वावादित्या एते - 
हीदशसर्वमाढदते ॥ ५ ॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किंञचि- 
दुपतपेत्स ब्रूयात्‌ प्राणा आदि्या इदं मे तृतीयसवन 
मायुरयुसंतनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो 
विकोप्सीयेदयुद्धेव तत एत्यगदो हेव भवति ॥ & ॥ 
' इसके पश्चात्‌ नो जड़तारीस वर्ष है, वे तृतीय सवन है । जगती 
छन्द अडतारीस अ्षरोबाला है तथा तृतीय सवन जगती छन्दसे सम्बन्ध 


६२८ छन्दोन्योदनिषद्‌ 


8८ << >< < ऋ < < ८ >< -&८। ल टट 
रखता है । इस सवनके आदिगण अनुगत हे । पाण दी आदिय है 
क्योकि ये दी इस सम्पूणं शब्दादि विषयसमूहको ग्रहण करते है | उत 
उपासकको यदि इस आधुम कोई [ रोगादि ] संतप्त करे तो उसे इष 
भकार्‌ कहना चादिये, £ प्राणङ्ूप आदि्यगण | येरे इस तृतीय सवनो 
आयुके साथ एकीभूत कर दो । यज्प्वरूप भँ प्राणरूप जादियोकि मध्यम 
विनष्ट न होऊं ॥ देसा कहनेसे वह उस कष्टसे सुक्त होक नीरोग हो 
जाता है ॥ ५-६ ॥ 

तथादित्याः प्राणाः । ते दीदं | इसी प्रकार भाण ही आदिल है। 
= ~ |वे इस शब्दादि विषयरसतमूहका 
शब्दादिजातमाददतेऽत आदि- मादान ( हण ) कते ह इ. 
स्याः । तृतीयसवनमायुः षोडशो ष्ि आदिय है । [ हे प्राणहप 
आदिलयगण |] ततीयसवनको 
आयुरूपसे अनुसतत करो अर्थात्‌ एक 
सौ सोरुह्‌ वर्ष॑तक पूरणं करो यानी 
इस यज्ञको समाप्त करो । रोष सब 
पूववत्‌ है ॥ ५-६ ॥ 


[ मध्याय १ 


त्रवषेशतं समापयतानुसंतच॒त 
यज्ञं समापयतेव्यर्थः । समान- 
मन्यत्‌ ॥ ५-& ॥ 





र 


निधिता हि विद्या फराये- 


© 


निश्चिता विद्या अवदय फलवती 


होती है-इस बातको प्रर्चित करती 
स्वतद्शयन्युदाहरति-- इई श्रुति उदाहरण देती दै-- 


एतद्ध स्म वे तदवदरानाह महिदास रेतरेयः स 


कि म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रष्यामोति स ह 


षोडरां वरषशातमजीवस ह षोडशं वर्षदातं जीवति य 
एवं वेद्‌ ॥ ७ ॥ 

इस भसिद्ध वि्याको जानने 
{ जरे रोग । ] तृ सु 





बाले ेतरेय महिदासने कहा -था-- 
क्यो कष्ट देता है, जो ङ्क इस रोगद्वारा 


>< 83 


(कैन न्य 


खण्ड १६] 


शाङरभाण्वाथे 


३२९ 


>> 9 >> >9< >< >अ ¬< ¬< -8: 8: 9 > > 8 9 8. < ८ 9 > -- 
मृलयुको प्राप्त नदीं हो सकता । वह एक सौ सोख्ह वष जीवित रहा 
था; जो इद प्रकार जानता है वह एक सौ सोर वषं जीवित रहता 


ह ॥ ७ ॥ 

एतचयक्तद्शनं ह स्म वै किर 
तद्विद्वानाह मदिदासो नामतः, 
इतराया अपत्यमेतरेयः । किं 
कस्मान्मे ममेतदुपतपनयुपतपसि 
स त्वं हे रोग; योऽहं यज्ञोऽनेन 
त्वत्छृतेनोपतापेन न प्रेष्यामि न 
मरिष्याभ्यतो बथा तव भ्रम 
इत्यर्थः । इत्येवमाह स्मेति पूर्वेण 
सबन्धः । स एवंनिश्चयः सन्‌ 
षोडशं व्शतमजीवत्‌ । अन्यो- 
ऽप्येवेनिश्वयः पोडशं व्रतं 


प्रजीवति य एवं यथोक्तं यज्ञ 


इस प्रसिद्ध यज्ञदशंनको जानने- 
वाटे महिदासनामक इतराके पुत्र 
रेतरेयने दै रोग | तृ सुनने यह 


संताप क्यों देता है ? जो यज्ञरूप 


मे तेरे इस संतापसे मृयुको 
प्राप्त नदीं होऊगा- नहीं मख्गा; 
ताप्यं यह्‌ है कि इसल्यि तेरा यह 
श्रम वृथा ही है-इ प्रकार कहा 
था--इसका पूर्वसे सम्बन्ध है । 
पसे निर्चयवाला होकर वह एकसौ 
सोर वषं जीवित रहा । एसे ही 
निरचयवाला दूसरा पुरुष भी, जो 
इस प्रकार पूर्वोक्त यज्ञसम्पादनको 


संपादनं षेद जानाति, स | जानता हे, एक सौ सोलह वषं 
हत्यर्थः ॥ ७ ॥ जीवित रहता है ॥ ७ ॥ 
इतिच्छान्दोग्यो पनिषदि ततोयाध्याये 


घोडशखण्डमा्यं सम्पृणेम्‌ ॥ १६ ॥ 


९.-><<>े <> > 


ससद शर्ट 


--*९ नर. ®= ~ 


अक्षयादि फल देनेवाली आत्मयन्नोपास्तना 
स॒ यदशिशिषति यिपासति यन्न रमते ता 


अस्य दीक्षाः ॥ १ ॥ 


वह [ पुर्ष ] जो भोजन करनेकी ह्च्छा करता हे, जो पीनेकी 
इच्छा करता है ओर जो रममाण ८ प्रसन्न ) नहीं होता --वही इक 


दीक्षादहे॥ १॥ 
स॒ यदशिरिषतीत्यादियन्ञ्‌- 


सामान्यनिर्देशः पुरुषस्य पूर्वेणेव 
संवध्यते । यदशिशिषत्यरितु- 
मिच्छति, तथा पिपासति पातु- 
मिच्छति, यन्न रमत .इष्टा्- 


प्रापिनिमित्तम्‌, यदेवंजातीयकं 


"वह जो भोजन करनेकी इच्छा 
करता है" इत्यादि पृरुषका यजञसे 
सादृश्यनिषूपण पूरवरन्थसे दही 
सम्बन्ध रखता है । जो अरिरिः 
पति,-खानेकी इच्छा करता है 
तथा “पिपासति पीनेकी इच्छ 
करता है, तथा जो इष्ट पदार्थ 
अप्रा्तिके कारण रममाण नौं होता 
अर्थात्‌ जो इस प्रकारके दुःखका 


; अनुभव करता है, वह, दुः 
दुःखमनुभवति ता अस्य दीक्षाः, 


दुःखसामान्याद्विधियज्ञस्येव ।१। । 


सदृशता होनेके कारण विधियक्की 
दीक्षके समान, इसको दीक्षा ६॥१॥ 


~: 9 <~ 


० 


अथ यदश्नाति यसिवति यद्रमते तदुपसदेरेति ॥२॥ 


क्षि बह जो खता हे, जो पीता दै ओर जो रतिका अनुभव करता 
द--वह उपसदोकी सटृताको भ्रा होता दै ॥ २ ॥ 


प 
(1 


खण्ड १७ | 


शाङ्करभाष्या्थे ३९१ 


~ ८ ८8 < 9८ < 6 9८ 8: < < 3 < + << ऋऋऋ 


अथ र्वद्श्चाति यत्पिवति 
यद्रमते रतिं चानुभवतीषश्टादि- 
संयोगात्तदुपसदेः समानतामेति। 
उपसदां च पयो्रतत्वनि मित्त 
सुखमस्ति । अल्पभोजनीयानि 
चादान्यासनानीति प्रधासो- 


ऽतोऽकनादीनाथुपसदां च सामा- 
न्यम्‌ ॥ २॥ 


फिर वह जो भोजन करता है, 
पीता है ओर इष्ट पदार्थादिके संयोग- 
से रतिका अनुभव करता दै-वह्‌ 
सव॒ उपसदोँकी समानताको प्राप्त 
होता है । उपसदोको पयोत्रतत्व 
८ केवर दुग्धपान ) सम्बन्धी सुख 
प्राप्त होता है । जिन दिनो स्वल्प 
आहार प्रप्त हो सकता हे वे समीप 
ही है- यह देखकर यज्ञकतकिो 
आश्वासन होता हे । अतः मोजनादि- 
की उपसरदेसे सदृशता है ॥ २ ॥¦ 





अथ यद्धसति यजक्षति यन्मेथुनं चरति 
स्तुतशाखरेरेव तदेति ॥ ३॥ 
तथा वह नो हसता है, जो मक्षण करता हे ओर जो मेथुन करता 
हे-- वे सव स्तुत रक्री दी समानताक प्रा्होते है ॥३॥ 


अथ यद्धसति यज्ञक्षति 
भक्षयति 
स्तुतशखरेरेव तत्समानतामेति; 
शब्द्व्चसामान्यात्‌ ॥ ३ ॥ 


---ः 
४ 


तथा वह जो हसता है, जो 


यन्मैथुनं चरति | भक्षण करता दै जर नो मेथुन कर- 


ता है वह स्तुतशखकी समानताको 
प्राप होता हे; क्योकि शब्दयुक्त 


| होनेमे उनम समानता है ॥ २ ॥ 


~ 
४ 


अथ यत्तपो दानमाजवभहिर्सा सस्यवचनमिति 


ता अस्य दक्षिणाः ॥ ४ ॥ 


तथा जो तप, दान, आजव ( सरक्त ), अर्हिसा ओर सत्यवचनं 
. है, वेदी इसकी दक्षिणा दै ॥ ४॥ 


१य२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अभ्याव ६ 
7 4 न > क~~ >> 
अथ यत्तपो दानमाजवमहिंसा- 


सत्यवचनमिति 


ता अस्य 


तथा पुरुषके जो तप्‌ दान्‌, 
आजव, अहिंसा ओर सत्यभाषणं 


[आदि गुण ] है, वे हीडइसकी' 


दक्षिणाः; ध्पुटिकरत्वसामा- | दक्षिणा हैः व्थोकि धर्मी धृ 


न्यात्‌ ॥ ४ ॥ 


करनेमं [ दक्षिणाके साथ ] उनकी 
तुस्यता हे ॥ ४ ॥ 


~ 9 *१-=* 


यस्माच यज्ञः पुरुषः- 


। क्योकि प्रुष यज्ञ है-- 


तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमैवाख 


तन्मरणमेवावभृथः ॥ ५ ॥ 


इससे कहते हे कि भरसूता होगी" जथवा श्रसूता हुई” वह इसका 
पुननन्म ही है; तथा मरण दी अवमृथस्नान है ॥ ५ ॥ 


तस्मात्तं जनयिष्यति माता 


यदा, तदाहुरन्ये सोष्यतीति तस्य 


मातरम्‌ यदा च प्रघता भवति, 
तदाऽसोष्ट पूणिकेति, विधियज्ञ 
इव सोष्यति सोमं देवदत्तोऽसोष्ट 
सोम यज्ञदत्त इति, अतः शब्द्‌- 
सामान्याद्वा पुरुषो यज्ञः । पुन- 
रुर्पादनमेवास्य तपुरुषाख्यस्य 


यज्ञस्य यत्सोप्यत्यसेषटेतिशब्द्‌- 


इसीसे जव माता उसे ननम देनै- 
वाी होती है, तब दूसरे रोग उसकी 
माताके विषयमे कहते है किं 
यह प्रसृता होगी! ओर जब वह 
परसूता होती है तो “यह प्रसूता हई 
अर्थात्‌ पूणिका हुदै" एेसा कहते है, 
जञेसे कि विधियज्ञमे धदेवदत्त सोमा- 
भिषव (सोमरसका पान या साधन) 
करेगा अथवा “यज्ञदत्तने सोमामि- 
षव किया' एेसा कहते हैँ । इस 
प्रकार सोष्यति तथा “असोष्ट 
शर्व्दोमिं समानता दोनेके कारण 
पुरुष यज्ञ हे । विधियन्ञके समान 
इस पुरुषसंज्ञक यज्ञका जो “सोष्यति' 
ओर “असोष्ट' इन रन्दोसे सम्बद्ध 
होना हे वह 


| 
1 
ध 


^ 


इऋण्ड १.७ ] 


शाङ्ुरभाष्याथे १३३ 


> >< >: ¬< ~ 6 86 ~< 2 ~: ~ 8 ¬< ~< ~ ~€ ~ ~ ~ ~ ~ (ऋ ~ - 


संबन्धिसखं विधियज्ञस्येव 


| | ही है; तथा मरण ही इष पुरुषसंजञक 


किं च तन्म्रणमेवास्य पुरुष- | यज्ञा अवमृथप्नान दै, क्योकि 


यज्ञस्यावमृथः; 
न्यात्‌ ॥ ५॥ 


[१ 
1 


समा्चिसामा- | समामे इन ( मरण ओर अवभृथ-. 
` स्नान) दोनोकी तुल्यता है ॥ ५॥ 


तद्धेतदधोर आद्भिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायो- 

क्तवोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत््रयं 
प्रतिपद्ये ताक्षितमस्यच्युतमसि भ्राणसशितमसीति 
तत्रैते द्वे ऋचो भवतः ॥ & ॥ 

घोर आद्ञिरस छषिने देवकीपुत्र छृष्णको यह॒यज्ञदशंन सुनाकर, 
निसपते कि वह अन्य विद्याओंके विषयमे तृष्णादीन हो गया था, कहा- 
८उसे अन्तकारुम इन तीन मर्क जप करना चाहिये ( १) तू अक्षित 
( अक्षय ) दै, ( २ ) अच्युत ( अविनारी ) हे ओर ( ३ ) अतिषुक्षम 
पराण है । तथा इसके विषयमे ये दो ऋचां दै ॥ & ॥.“ 


तद्धेतचत्तद्शंनं घोरो नामत 
आद्खिरसो गोत्रतः कृष्णाय 
देवकीपुत्राय रिष्यायोक्तलोवाच 
तदेतत्रयमित्यादिन्यवहितेन स- 
बन्धः । स चैतदशेनं भरुत्वापि- 
पास एवान्याभ्यो विव्राभ्यो 
वभूव । इत्थं च विरिष्टेयं विद्या 
यत्कृष्णस्य देवकीपुत्रस्यान्यां 


इस यज्ञदशंनको आङ्गिरस गोत्र- 
वाटे घोरनामक ऋषिने अपने शिष्य 
देवकीपुत्र कृष्णके प्रति ककर फिर 
कट[ । इस वाक्यका 'तदेतल्रयम्‌'! 
इस व्यवधानयुक्त वाक्यसे सम्बन्ध 
है । तथा वह कृष्ण तो इस यज्ञ- 
द्शनका श्रवण कर रिरि जन्य | 
विचार्जोके प्रति ठष्णारहित हो ` 
गया । थ्यह विद्या एसी विशिष्ट 
गुणसम्पन्ना है कि यह अन्य विवार्ओं- 
के प्रति देवकीपुत्र कृष्णक्षी तृष्णा- 


३३७ 


पुरुषयन्तविद्यां स्तौति । 
घोर आद्धिरसः कृष्णायो- 


क्त्वेमां विद्यां किथुवाच ? इति 
तदाहस एषं यथोक्तयक्तविदन्त- 
वेलायां मरणकाल एतन्मन््र- 


त्रयं प्रतिपद्येत जपेदित्यर्थः । 


किं तत्‌? अक्षितमक्षीणमक्षतं बासी- 


त्येकं यजुः । सामर्भ्यादा- 
दित्यस्थं प्राणं चैकीकृत्याह- 
तथा तमेवाहाच्युतं स्वरूपाद- 
्रच्युतमसीति द्वितीयं यजुः । 
प्राणसंरितं प्राणश्च स संशितं 
सम्यक्तनृङकतं च सक्षम तच्वम- 
सीति ठतीयं यजुः । ततरैत- 
स्मिन्नथं विच्यास्तुतिपरे दे ऋचो 


मन्त्रौ मवतः, न जपा, त्रयं 


प्रतिपद्येतेति त्रित्वसंख्यावाध- 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


विद्यां प्रति तड्विच्छेदकरीति | का छेदन करनेवारी हुई 


[ अध्याय ३ 
= 8 


पेमा 
कहकर श्रुति पुरुषयक्षवि्याकी स्तुति 
करती है । 
घोर आङ्गिरसने कृष्णक प्रति 
यह विद्या कहकर क्या कहा- ह 
वतलते टै पूर्वोक्त यज्ञविदो 
जाननेवाखा बह पुरुष अन्तिम समव- 
मरणकार उपस्थित होनेपर इन तीन 
मर्त्रको प्रतिपन्न हो अर्थात्‌ इनका 
जप करे । वह॒ मन्त्र कौन-से दै! 
"तू अक्षित-- अक्षीण अथवा अक्षय 
हेः यह एक यजु है । प्रसङ्गके 
सामथ्यंसे यह कथन आदियस् 
पुरुष॒ ओर प्राणकी एकता कके 
करिया गया हे । तथा उसीके प्रति रति 
कहती है-^तु जच्युत-- स्वल्पे 
च्युत न होनेवाला है -- यह दूर 
यजु हे। ततु प्राणसंशित--न 
प्राण संशित-- सम्यक्‌ प्कारसे तु 
यानी सूक्ष्म किया गया हे वह तू 
हे यह तीसरा यजु दे। इस 
अथ॑ इस वि्ाकी स्ठुति करनेवाटी 
दो ऋचां यानी दो मन्त्र है, ह॒ 
वे जपके ल्थि नहीं है, करथो 
पहले जो (व्य प्रतिपद्येत ( तीनका 


नपकरे ) देसी विधि की गवी है 


उसकी (तीन संख्याका वाध ही 


। 
॥ 


खण्ड १.७ | शाङरमाष्याथ ३२५ 
~< < ल ल > ल 3 अ~ 


नात्‌; पश्वसंख्या दि तदा | जायगा ओर तव धाचि संख्या हो 
स्यात्‌ ॥ & ॥ * जायगी ॥ ६ ॥ 


- क्ट । 
आदिद्प्रत्नस्य रेतसः । उद्यं तमसस्परि ज्योतिः 
पदयन्त उत्तरस्वः पदयन्त उत्तरं देवं देवत्रा सू्ंम- 
गन्म उयोतिरुत्तममिति उयोतिरुत्तममिति ॥ ७ ॥ 


[ 'आदिस्त्नस्य रेतसः' यह एक मन्त्र हे ओर “उद्वयं तमसस्परि 
इत्यादि दूसरा दै । इनमे पहला मन्त्र इस प्रकार दहै-आदिखलस्य 
रेतसो ज्योतिः परयन्ति वासरम्‌ । परो यदिध्यते दिवि इसका अथं यह 
हे-] पुरातन कारणका प्रकाश देखते है; यह सर्वत्र व्याप्त प्रकाश, जो 
परब्रह्म स्थित परम तेन देदीप्यमान है, उसका ह । [ अब “उद्भयं 
तमसस्परि इत्यादि दूसरे मन्तरका अथं करते है] जज्ञानरूप अन्धकार- 
से अतीत उक्कृष्ट ज्योतिको देखते हुए तथा आत्मीय उ्कृष्ट तेनको 
देखते हुए हम सम्पूर्ण देवम पभ्कारामान सर्वोत्तम ज्योतिःस्वरूप सूर्यको 
प्राप्त हए ॥ ७ ॥ 


आदिदित्यत्राकारस्यायुबन्ध- | “आत्‌ इत्‌ इसमे आकारके 
रिं वातः पीलेका तकार ओर इत्‌ शब्द 
स्तकारोऽनथक इच्छन्द । श्रत्न- | अर्थरहित है । ्रलस्य'-चिरन्तन 


¢ 
स्य चिरन्तनस्य पुराणस्यैतयथः, | यानी रातन॒देतसः" कारणक 
रेतसः कारणस्य बीजभूतस्य | अर्थात्‌ जगत्‌के बीजम्‌त ॒सत्‌- 


जगतः सदाख्यस्य ज्योतिः संज्ञक बरह्मके ‹ज्योतिः- प्रकाशको 


ता र देखते दै । अपने अनुबन्ध तकारसे 


उत्सृष्टाचुबन्धः परयन्तीत्यनेन | क्रियासे सम्बद्ध॒दै । उस किंस 
संबध्यते । किं तज्ज्योतिः । ज्योतिकर देखते दै £ इसपर श्रुति 
र आनन्दगिरिङकत टीकासे । 


ददद 


परयन्ति ! 
तत्सवतो 
ज्योतिः । 
निचृत्तचक्षुपो बहमविदो बह्म- 
चयादिनिटृत्तिसाधनैः बुद्धान्तः- 
करणा आ समन्ततो ज्योतिः 
परयन्तीत्यथः । परः प्रमिति 
लिङ्गव्यत्ययेन, ज्योतिष्यरत्वात्‌; 
यदिश्यते दीप्यते दिवि चोतन- 
वति परस्मिन््रह्मणि वर्तमानम्‌, 
तेन ज्योतिषेद्धः सविता तपति 
चन्द्रमा भाति विदयुद्धि्योतते 
ग्रहतारागणा विभासन्ते । 
किं जान्यो मन्तरदृगाह य- 
थोक्तं ज्योतिः पश्यन्‌- उद्यं 
तमसोऽज्तानलक्षणात्परि परस्ता- 


वासरमहरहरि 
व्याप्रं ब्राह्मणो 


दिति शेषः । तमसो वापनेत्‌- 
यज्ज्योतिरुत्तरमादित्यस्थं परि 
प्रयन्तो वयमुदगन्मेति व्यव- 
हितेन संबन्धः। तज्ज्योतिः खः 


. स्वमात्मीयमस्मदधृदि स्थितम्‌, 


छान्दोग्योयनिषद्‌ 


[ खष्याय ३ 
=> २ अ 


कती है--] वासर अरथत्‌ दिन 
समान सर्वत्र व्याप्त उस व्ही 
ज्योतिको देखते है । 

तात्य यह दै कि जिनी 
इन्दि विषयोसे निवृत्त दो गयी 
व ब्रह्मचयं आदि निषृत्तिके साधनो. 
द्वारा शयुद्धचित्त हए ब्रह्मवेत्ता उप 
ञ्योतिको सव ओर देखते है । नो 
ञ्योति "दिवि, द्योतनवान्‌ पर्रम 
देदीप्यमान है; तथा जिस ज्योतिसे 
दीप्त होकर सयं तपता है, चन्द्रम 
प्रकाशित होता हे, बिजली चमकती 
हे तथा अह जीर तारागण विशेष 
रूपसे भासते हं । यहाँ परः? यह 
शव्द [नपुंसकटिङ्ग] “ज्योतिः'के साथ 
अन्वित हे,इसख्यि इसका लिङ्ग बदल 
कर “परम्‌, ेसा समञ्लना चाहिये । 


तथा उप्यक्त ज्योतिको देखने- 


वाला एक दूसरा मन््रदरष्टा कहता 


है--अज्ञानरूप अन्धकारसे अतीत 
[ जो परम तेज दै ] मथवा अन्य 
कारकी निवृत्ति फरनेवाख जो सूय 
मण्डलस्य उक्छृ्च तेज दै उसे 
देखते हुए हम प्राप्त हुए--इस 
भकार इसका व्यवधानयुक्त क्रियाः 
से सम्बन्ध दै। व्ह ज्योति 
(स्व'-णात्मीय अर्थात्‌ मर 1 


खण्ड १७ ] शाङ्करथाष्याथं ३३७ 
~ -‰ < >< 9८ >< 8: ¬ ¬ 9 ¬ ¬ 9 आ ~ ~ 


आदित्यस्थं च तदेकं ज्योतिः । | न्तःकरणमे स्थित तेन ओर 
यदुत्तरयुषटतरमू्व॑तरं वापर आदिय स्थित तेन एक ही है, 
४. | बिस जन्य तेरजोकी अपेक्षा उत्तर-- 
ज्योतिरपेक्य पर्यन्त उदगन्म | उक्तः ग 
वयम्‌ । देखते हुए हम प्राप्त हुए । 
कणुदगन्म ! इत्याह-देवं | किति परापत हुए--यहं श्रुति बत- 
काती है--ञ्षमस्त देवताओंम देव 
अर्थात्‌ चोतनवान्‌ सूरयको पराप हुए; 
रसानां रदमीनां प्राणानां च जगत| नो रस, किरण ओर संसारके 
भराणेकि प्रेरित करनेके कारण सूयं 
ईरणासघ्यस्त्॒दगन्म गतवन्तो | कंदलाता दै उस उत्तम ज्योतकि- 
< ली सम्पूणं ज्योतिर्योमै उक्कृष्टतम्‌ 
उयोतिरुत्मं सवेज्योतिभ्य उत्ृ- | ज्योतिको भाक्त हुए; भदो ! [ आश्चयं 
है कि] हम उसे प्राप्त इए- 
एसा इसका तात्पयं हे । यही वह 
इदं तज्ज्योतिर्॑दृभ्यां स्तुतं | ज्योति दे निकी दौ चछचाभेनि 
स्तुति को है तथा जो उपयुक्त तीन 
यद्यजुचयेण प्रकाशितम्‌ । दिर- | यजुःश्रति्ोद्रारा प्रकाशित दै । 
ए “ज्योतिरुत्तमं ज्योतिरूतमम्‌ यह 
भ्यासो यत्तकन्पनापारसमा- | द्विरुक्ति यज्ञकस्पनाकी समपि 
प्त्य्थः ॥ ७ ॥ सूचित करनेके स्यि ६1 ॥ ७ ॥ 


ग्रोतनवन्तं देवेषु सर्वेषु षयं 


(~ भ 
षतममहो प्राप्रा बयमित्यथः । 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि ठतीयाध्याये 
स्तद्शखण्डभाष्यं सम्पूणम्‌ ॥ १७ ॥ 


~--‡ ०9 $= 


षक शकण 
मन आदि दषटिचे अध्यात्म ओर आधिदैविक बह्मोपास्ना 
मनोमय ईश्वर उक्त आका- | [ चतुर्दश ण्डके द्वितीय मन्त्रे] 
ईैश्वरके गुणोकि एकदेशको लेकर 
शात्मेति च बरह्मणो गुणेकदेश- | उते मनोमय ओर आकाशात्मा 
गया है। अव इससे आगे मन 
ओर भाकाशमे समस्त त्रहद्टिका 
समस्तत्रहमदष्टिविधानां आरम्भो | विधान करनेके छथि (मनो, ऋ 
इत्यादि [ अष्टादश खण्ड ] क्र 
` मनो ब्रह्मत्यादि-- आरम्भ किया नाता दै-- 
मनो बह्मेत्युपासीतेत्य्यात्ममथाधिदेवतमाक्रादो 
~, ५ ॐ चाधिदे 4 
बरह्मव्युभयमादिष्ठं भवत्यध्यात्मं वतं च ॥१॥ 
“मन ब्रह्म हः इस प्रकार उपासना करे । यह अध्यालदृ्टि है । 
तथा (आकाश ब्रहम दैः यह अथिदेवतदष्टि ह । इस प्रकार अध्यात्म ओर 
अधिदेवत दो्नोका उपदेश किया गया ॥ १ ॥ 
मनो मदतेऽनेनेत्यन्तःकरणं | मन--जिससे पाणी मनन करता 
तद्र परमित्युपासीतेति, एत- | है उस॒ अन्तःकरणको मन कहते 


= वेह परब्रहम है- एेसी उपासना 
+; द्ैनमध्यात्मम्‌ । { यह दष्चेन 
अथाधिदैवतं देवताविषयमिदं | ध्यासम है । अन यद्‌ अपिदेवत- 


२ ( देवताविषयक दर्शन कते दै । 
व्यासः । आद्भाो बरवेतयुपा- आकाश ब्रहम है--रेसी “उपासना 


सीत । एवभमयमध्यात्ममधि- | करे । इख भरकर अध्याल नौर 


त्वेन। अथेदानीं मनआकाशयोः 


1 
1 


# 
| 
1 


। 


खण्ड १८ ] शाङ्करमाण्याथे ३३९ 
> >~ -&< < < < 9 ८ < < 3 9 ८ ८ ८ लः 


दैवतं चोभयं ब्रह्मदृष्टिविषयमा- | अधिदैवत दोनों प्रकारकी ब्रहष्टिके 
क विषयमे आदेश उपदेश किया 
दिष्टमुपदिषटं भवति, आकाश | जाता दै; कयो भका जर मन 
दोनों ही सूक्ष्म है । इसके सिवा, 
ब्रह्म मनसे उपरन्ध क्य जा 
लभ्यत्वाच ब्रह्मणो योग्यं मनो ! सकता दै, इसलिये भी मन तरहाष्टिके 
¦ योग्य है, तथा सर्वगत, सुक्ष्म ओर 
~. € 1 मे 
ब्रहदृष्ेः । आकाशश्च, सवेगत- | उपािहीन होनेके कारण भकार 
लवात््मत्वादुपाधिद्ीनत्वाच ।१॥ भी बरबदके योग्य है ॥१॥ ` 


~: ° 


मनसोः घरकष्मत्वात्‌ मनसोप- 


तदेतच्तुष्पाद्ब्रह्म । वाक्पादः प्राणः पादशश्षुः 
$ धिदेवतमभ्चि 
पाद्‌ः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्मम्‌ । अथाषिदेवतमभः 


` पादो वायुः पाद आदिस्यः पादो दिशः पाद इत्यु- 


भयमेवादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदेवतं च ॥ २ ॥ 
वह्‌ यह ( मनःसंक्क ) बरहम चार पादोवाला है । वाक्‌ पाद है, 
भाण पाद्‌ हे, च्च पाद है घोर श्रोत्र पाद है । यह भध्यास है । 
अव अधिदेवत कहते है- म्नि पाद दहै, वायु पाद ह, मदितय पाद 
ह ओर दिशां पाद दै । इस प्रकार भध्यात ओर अधिदैवत दोनो 
उपदेश किया गया ॥ २ ॥ 
तदेतन्मनआख्यं चतुष्पा- | वह यह मनस्क ब्रहम चतुष्पाद्‌ 
है । जिसके चार पाद हों उसे चतुष्पाद्‌ 
रहय, चत्वारः पादा अस्येति । | कृते है । यह मनोत्रह चतुष्पाद्‌ 
किस प्रकार हे १ यह श्रुति बतटाती. 


ं ं ब्रह्मणैः १ 
कयं तनां स हे- वाक्‌, पाण, चश्च ओर श्रोत्र 


-इत्याह--बाक्प्राणश्रज्ञः ्रोत्र- । ये इसके पाद है । यह अभ्याल्‌- 


11 आनद ल्योतोदचंङ्ध ॥ स्याथ ३ 
णार + 
मित्येते पादा इत्यध्यात्मम्‌ । | वटि है । अ मधिदैवत वतौ 
अथाधिदेवतमाकाक्षस्य ब्रह्मणो दै--आकाशसं त्रके मि 
ऽग्निरबायुरादित्यो दिश इत्येते । वायु, आदित्य ओर्‌ दिश ए 
एवमुभयमेव चतुष्पाद्रह्मादिषटं | है । इस पकार ध्याम ओ 
मवत्यष्यात्मं चेवाधिदेवतं | अधिदेवत दोनों भकारके चतुष्ण्‌ 
च ।॥२।। ` ब्रह्मका अदेश क्रिया गया॥ २॥ 


=: ° :-- 


तत्र-- | उनमै- 


वागेव बह्मणश्चतुर्थः पादः । सोऽग्निना ज्यो 
तिषा भाति च तपति च। भाति च तपति च कीया 
यासा बह्मवचसेन य एवं वेद्‌ ॥ ३ ॥ 
वाक्‌ ही बरहमका चौथा पाद ह; वह्‌ अभिरूप ज्योति दीप्त होत 
है ओर तपता है । जो देसा जानता है वह कीर्ति, यश ओर ब्रह्मने 
कारण देदीप्यमान होता जोर तपता हे ॥२३॥ 
वागेव मनसो ब्रह्मणश्चतुर्थः | वाक्‌ ही मनरूप ग्रहन, श 
पाद इतरयाद्त्रयपेक्षया । वाचा ' तीन पादकौ अपेक्षा चौथा पद 
, है। जिस प्रकार गौ आदि नैव 
दि पादेनेव गवादि वक्तव्य- | पदद्रारा इष्ट ॒स्थानपर जाकर्‌ म 
विषयं प्रति तिष्ठति स्थित होते दै उसी भकार वरण 
| ४ ही मन वक्तव्य विषयप्र उहर्ता दै। 
मनसः पाद्‌ इव॒ वाक्‌ । तथा | अतः वाक्‌ मनक पादके समान दै। 
इसी प्रकार प्राण-श्राण भी 
भाणो घ्राणः पादः । तेनापि | उसका पाद है। उसके द्वारी 
क बह गन्धर्ूप॒विषयके प्रति नाता 
गन्धविषय प्रति च कामति । | हे। रेसेदी चश्चु पाद दै ओर, २ 


खण्ड १८ ] 


शाङ्करभाष्याथं 


२७१ 


इस्येवमध्यार्मं चतष्पाखं मनसो 
ब्रह्मणः । 
अथाधिदेवतमभिवायवादित्य- 


दिक आकाशस्य ब्रह्मण उद्र | 


इव गोः पादा विलग्रा उपलभ्य- 
न्ते । तेन तस्याकाशस्यागन्या- 
दयः पादा उच्यन्ते । एवमुभ- 
यमध्यार्मं चैवाधिदेवतं चतु- 
प्पादादिष्टं भवति । तत्र वागेव 
मनसो जहमणश्चतुथः पादः । 
सोऽगरिनाधिदेवतेन ज्योतिषा 
भाति च दीप्यते तपति च 
संतापं चौष्ण्यं करोति । 


अथवा तैरघताद्याग्नेयाशने- 


नेद्धा वाग्भाति च तपति च 


वदनायोत्साहवती स्यादित्यथः। 


विद्वत्फलम्‌--माति च तपति च 


¦ मनह्प त्रह्का अध्या चतु- 
 प्पा्व दै | 

तथा अधिदैवतदृष्टि इस प्रकार 
है-- जिस तरह गौके उद्रसे पैर 
जुड़े रहते दै उसी प्रकार आकाशच- 
खूप ब्रह्मके उदरमे अग्नि, वायु, 
आदिय ओर दिश्याए- ये दिखायी 
देते दै । इसल्यि ये अग्नि 
आदि उस आकाशखप ब्रक्षके 
पाद कहे जाते दै । इस प्रकार 
अध्यात्म ओर अधिदैवत दोनों 
प्रकारके चतुष्पाद्‌ ब्रक्षका उपदेश 
किया जाता है। उनमें वाक्‌ ही 
उस मनरूप ब्रहका चौथा पाद हे । 
वह अग्मनिरूप अधिदैवत ज्योतिसे 
मासित-- दीप्त होता ओर तपता 
अर्थात्‌ संताप यानी उष्णता 
करता दे । 


अथवा तैल सौर धृत आदि 
आग्नेय ८ तेजोमय ) पदाथेकि 
भक्षणसे दीप्त हुई वाक्‌ प्रकारित 
होती ओर तपती दै; अर्थात्‌ बोरनेके 
स्मि उत्साहयुक्त होती है । इस 
परकारक़ी उपासना करनेवाटेको 
प्रा होनेवाला फल--जो पूर्वोक्त 


३४२ छान्दोग्योयनिषषू [ अध्याय ६ 
> 3-36-2 ---- ड 8 8 26 >< 3-28-8 + 8. + ऋः 


कीया यशसा बहव्चसेन य | अरथको जानता है वह कीरिं, | 


यशः ओर ब्रहमतेजसे प्रकर । 
एवं यथोक्तं वेद्‌ ॥ २ ॥ होता ओर तपता है ॥ २॥ 


घ्राण एव ब्रह्मणश्चतुथेः पादः । स वायुना ज्यो- 
तिषा भाति च तपति च । माति च तपति च कीत्य 

यदासा बह्यव्यसेन य एवं वेद ॥ ४ ॥ 
पराण ही भनोग बरहका चोथा पाद दै । वह वायुरूप प्यते 


रकशित होता ओर तपता है । जो इस प्रकार जानता दै वह कीरति, 
यज्ञ॒ ओर ब्रह्तेजसे भरकाशित दोता ओर तपता है ॥ ४ ॥ 


चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स आदित्येन 
उ्योतिषा भाति च तपति च । भाति च तपति च 
कीर्त्या यासा बह्यवर्चसेन य एवं वेद्‌ ॥ "+ ॥ 


च्च ही मनःसंज्क तरहक चौथा पाद्‌ है । वह आदियर 
ज्ोतिसे भक्षित होता जोर तपता हे । जो इस मकार नानता दै व 
कीरति, यश ओर ब्रहमतेजसे प्रकाशित होता ओर तपता हे ॥ ५ ॥ 


श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स दिग्मिरज्योतिषा 
भाति = तपति च। भाति च तपति च कीरस्य यशस 
बह्मवचसेन य एवं वेद य एवं वेद्‌ ॥ ६ ॥ 


रत्र ही मनोप ब्रहमका चथा पाद्‌ दै । वह दिशारूप ज्यो 
भक्मरित होता ओर तपता है । जो इस प्रकार जानता दै वह कीरिं 


१, प्रत्यक्ष प्रशंसा । २. परोश्च प्रंखा । 


शं्ड १८ ] शाडरथाभ्या्थे २७६ 


तथा प्राण एव ब्रह्मणशवतुर्थः | इसी प्रकार प्राण दी ब्रह्मका चौथा 
पाद दहै । वह वायुद्रारा गन्धग्रहणके 
पादः । स वायुना गन्धाय | ल्यि प्रकाशित होता ओर तपता 
हे [ अर्थात्‌ उत्साहित होता है ] । 
इसी तरह च्च रूपग्रहणके लियि 
रादित्येन सूपग्रहणाय श्रोत्रं | आदिदयद्वारा ओर शरोत्र शब्दग्रहणके 
स्यि दिश्ाओंद्रारा उत्साहित होता 
दिग्भिः शब्दग्रहणाय । विद्या- | हे । इस प्रकारकी उपासनाका फल 
९ ६ सर्वत्र समान दहै । जो एसा जानता 
फल समानम्‌ । सवत्र त्म | है उते सर्वत्र ब्रहप्रापिरूप ` अदृष् 
फर मिक्ता है । य एवं वेद, य 
एवं वेद" यह द्विरुक्ति विद्याकी 
दिरुकति्द्नसमाप्त्यर्था।।४-६॥ । समािके स्यि है ॥ ४-६ ॥ 
- कज 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि ठतीयाघ्याये 


अष्टादशब्रण्डभाष्यं सस्पूणंम्‌ ॥ १८ ॥ 


भाति च तपति च । तथा चकु 


संपत्तिरदृष्टं फलं य एवं वेद्‌ । 





ना --- ------- 


ठकोनःविल्ल णड 


आदित्य ओर अण्डहष्टित्े अध्यात्म एवं आपिरैविक्त उपासना 





आदित्यो ब्रह्मणः पाद उक्त आदिव्यको ब्रह्मका पाद बतलय ¦ 


इति तमाकच्यवदृ्य ६ | गया हे; अतः उसमे समस्त वरग 
ई थ दृष्टि करनेके लि इस्त खण्डक 


मिदमारभ्यते- आरम्भ किया नाता है- 


आदित्यो ऋहयेत्यादेदास्तस्थोप्याख्यानमसदेवेदमय 
आसीत्‌। तत्सदासीत्तत्समभवत्तदाण्डं निरवत॑त संस्सं. 
वत्सरस्य मात्रामदायत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले 
रजतं च सुवर्णं चाभवताम्‌ ॥ १ ॥ 
आदित्य तरह है-एेखा उपदेश दै; उसीकी भ्याख्या की नाती 
दै । पहले यह असत्‌ ही था । वह सत्‌ ( का्यमिषुल ) हुभा । व 
अङ्कुरित हुआ । वह एक अण्डेमे परिणत हो गया । वह एक वर्षपयन्त 
उसी भकार पदा र्वा । फिर वह शटा; वे दोनों अण्डेके खण्ड रजत 
ओर खुवणैरूप हो गये ॥ १ ॥ 
आदित्यो बहेत्यादेश उप- | (जादित्य ब्रह्म दै" यह भदिश- 
असत्कायवाद्‌- उपदेश्च हे । उस आदिलयका 
देशस्तस्योपन्या- स्तुतिके ख्यि उपाख्यान का 
मीशा ख्यानं क्रियते स्तु- | जाता द ।` पटे अर्थात्‌ अपनी 
उत्पत्तिसे पूर्वको अवस्थां. 
त्यथम्‌ । असद्व्याङृतनामरूप- | सम्पूर्ण जगत्‌ असत्‌ -- जिसके 
| नाम-खूयोकी अभिव्यक्ति -नदीं इई 


मिदं जगदशेषमगरेप्रागवस्थाया- | दै एेसा था; सर्वथा असत्‌ [ यूय | 
६ 


~ - 


क्षष्ड १९. ] 


त्पत्तरासीन्न त्वसदेव; “कथ्‌- 
£ 
मसतः सन्जायेत' इत्यसत्काय- 


त्वस्य प्रतिषेधात्‌ । 
नन्विहासदेवेति विधानाद्वि- 


कल्पः स्यात्‌ । 


न; क्रियास्विव वस्तुनि 


विकल्पानुपपत्तेः । 
कथं तहींदमसदेवेति ! 


नन्ववोचामान्याक़ृतनामरूप- 
त्वादसदिवासदिति । 
नन्वेवशब्दोऽवधारणा्थः । 


सत्यमेवम्‌ , न तु सलाभाव- 
मवधारयति । 


किं तदि? 

व्याकृतनामरूपाभावमवधारय 
ति, नामरूपव्याकृतविषये सच्छ- 
ब्दप्रयोगो दष्टः । तच्च नामरूप 


व्याकरणमादित्यायत्तं प्रायशो 
~ 
® अर्थात्‌ खट पूवं यह खज कुछ “असत्‌ अथवा सत्‌” थ, इच श्रकृर्‌ 


विकल्प दो सकता ह । 


शाङ्कर्ाण्याथं ३४५ 
ॐ ॐ = 9 = ॐ ॐ > 9 24 |® ॐ ॐ ॐ ॐ. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 4 


ही नहीं था; क्योकि असतसे सत्की 
उसत्तिकैसे हो सकती दै" इस प्रकार 
[ णागे छठे अघ्यायमे ] श्रुविने 
असत्कायंत्वका प्रतिषेध क्षिया है । 

ूर्° कितु य्ह असदेव 
आसीत्‌ एसा विधान होनेके कारण 
विक्रट्पश्वहो सकता दै । 

सिद्धान्ती- नदी, क्योकि क्रियाओं 
के समान व्तुर्मे विक्स होना 
सम्भव नहीं है । 

र्व०-तो फिर दम्‌ असत्‌ एवः 
यह्‌ वाक्य क्यो कहा गया है ! 

सिद्धान्ती-हम कह चुके है न, 
किं नाम-रूपकी अभिन्यक्तिसे रहित 
होनेके कारण मानो असत्‌की तरह 
अपतत्‌, था । 

पूर्व॑०-र्कितु एवः शब्द ॒तो 
निश्वया्थक है | 

सिद्धान्ती-यह तो ठीक दै, कितु 
यह्‌ स्चाके अभावका निश्चय नही ` 
करता । 

ूरव०-तो फिर क्या करता है १ 
सिद्धान्ती-व्यक्त नाम-रूपके अभावका 
निरुचय करता है । 'सत्‌" शब्दका 
प्रयोग, जिनके नाम-ख्प व्यक्त हो 
गये है उन पदार्थेकिं विषयमे देखा 
गया हे; भर जगतके नाम-रूपकी 
अभिव्यक्ति प्रायः आदि्यके अधीन 


= 


अध 


इान्डोल्योचंजिचं 
> 9 > 3 > 8-2८-29 ऋऋ 


[ भ्या ६ 


ऋऋ ऋ 


जगतः । तदभावे न्धं तम्‌ इदं | है, क्योकि उसके जमाकर धो 


न प्रज्ञायेत किश्च न,इस्यतस्तस्स्तु- 


तिपरे वाक्ये सदपोद्‌ प्रागुत्त्तेज- 
गदसदेवेव्यादित्यं स्तौति ब्रह्म- 


ृष्टयहैत्वाय । 
आदित्यनिमित्तो दि लोके 


सदिति व्यवहारः; यथासदेवेदं 
रात्तः ङं सवंगुणसंपने पूर्ण - 
वर्मणि राजन्यसतीति तदत्‌ । न 
च सखमसच्वं वेह जगतः प्रति- 
आदित्यो 


बह्मत्यादेशपरत्वात्‌ । उपसंहरि- 
ष्यत्यन्ते आदित्यं बहयतयुपास्ते' 
इति । 

तत्सदासीत्‌, तदसच्छब्दवाच्यं 
प्रागुत्पत्तेः स्तिमितमनिस्न्दम- 


सदिव सत्कार्यामिघुखमीषटुप 


पिपादयिषितम्‌, 


जन्ध्कररूप हुभा यह जगत्‌ कह ¦ 
भी नहीं जाना जाता। इछि 
आदिप्यके स्तवनपरक वाक्यम, सतू 
होनेपर भी उत्पत्तसे पूवं यह जत्‌ 
असत्‌ ही था ेसा कहकर श्रुति 
यह सूचित करनेके छथि म आद्ि 
्रह्मदष्टिके योग्य है, उसकी स्ति 
करती हे । | 
लोकम आदिलयके कारण दही त्‌ 
पे व्यवहार होता है, जप प्रका | 
सर्वगुणसम्पन्न राजा पूणंवमकि त । 
रहनेसे यह राजवंश नर्दी-सा रहं ग 
? रेस्ा कदा नाता है, उसी भरकर 
3 चाहिये । इसके सिवा 
यह हस वाक्यसे जगत सत्ता अथ. 
वा मसत्ताका प्रतिपादन करना अ 
भी नदी दै, क्योकि यह भन 
आदिल बर्ह देखा आदिश कनेक 
स्मि दी है; तथा अन्तम भी जदि 
रह्म है इस भकार उपासना कत 
है रेषा कहकर श्रुति 


उपसंहार करेगी । 

^तत्सदासीत्‌ः-वह, "अ. 
शब्दसे कटा जनेवाखा त्व 
उतपत्तिसे पुवं स्तञ्घ, 


जर असतके समान था, 0 
कार्यामिमुख होकर कुछ 9 


खणड १९ ] शाङ्ूर्माष्यार्थं ३५७ 
~> ~~ ~ > >8< ¬8( ¬8८ 8८ ¬: >€: - < 8: >द- 8. ८ 9 -: = -: > < ऋ: 


जातप्रवृत्ति सदासीत्‌ ततो रुभ्ध- | पेदा होनेसे सत्‌' हो गया । फिर 
परिस्वन्दं तत्समभवदल्पतर- | उससे भी कु स्यन्दन प्रा कर वह्‌ 
नामरूपव्याकरणेनाङ्करीभूतमिव | थोडेसे नाम-रूपकौ अमिल्यक्िके 
बीजम्‌ । ततोऽपि क्रमेण स्थूली- | शरण भङ्कित हुए वीलके समान हो 
मवत्तदद्धय आण्डं समबतंत | गया । उद अवस्थासे भी वह करमशः 
स्तम्‌ । आण्डमिति दध्यं | इ ओर स्थर होत इब नर्ते 
अण्डेके रूपमे परिणत हो गया । 
“आण्डम्‌? यह दीष प्रयोग वैदिक दै । 

वह अण्डा संवत्सर नामसे प्रसिद्ध 
कारुको मात्रा यानी परिमाणतक 


छान्दसम्‌ । 

तदण्डं संवत्सरस्य कालस्य 
प्रसिद्धस्य मात्रां परिमाणमभिन्- 
स | स्थितं बभूव । [अर्द्‌ रेप बध उती भ्र पड़ 
तत्ततः संत्सरपरिमाणात्काला- | रूपसे पारदा । तलात्‌ प्‌ वै 
दध्वं निरभिद्यत निभिन्नं वयसा- | प्रिमाणकारके अनन्तर वह पक्ष्यो- 
मिवाण्डम्‌ । वस्य नरमत्स्वा- के अण्डेके समान पूट गया । उस 
ण्डस्य कपारं दरं रजत च सुबण | एूटे हए अण्डेके जो दो खण्ड थे वे 
चाभवतां संदत्ते ॥ १ ॥ रजत ओर छुवणेरूप हो गये ॥१॥ 


~~~ 


तव्यद्रजतश्सेयं प्रथिवी यत्सुव्णशसा योयं रायु 
ते पर्व॑ता यदुस्ब्समेधो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो 
यद्दास्तेयमुदकस समुद्रः ॥ २ ॥ 


उनमे जो खण्ड रजत हुजा वह॒ यह प्रथिवी है ओर जो वणे 
इभा वह दुरोक है । उस अण्डेका नो जरायु ( स्थूल गरभवेष्ठन ) था [वही] 
व पर्वत है, जो उस्व ( सूक्ष्म गभ॑वेष्टन ) था बह मरषोके सहित इरा 


२७८ छान्दोग्योनिषव्‌ मण्याव 
वव >= स | 
दैः जो परमनियौ वे नदिया है तथाजो वस्तिगतं नथा ब | 
समुद्र है ॥ २॥ 


तत्तयोः कपालयोयंदरजतं | उन सरण्डोम नो रजतमय स 
कपालमासीत्‌, सेयं प्रथिवी प्रथि- | था वही यह थिवी अर्थ्‌ पृथवी. । 
्ुपरकषितमधोऽण्डकपालमित्य- | रूपसे उपरकषित नीक भण्ड 
धः । यतसुवणं कारं सा चरोदयुः| ६ भोर नो धवम सष्ड बाद | 

ति „_ > | यौः अर्थात्‌ चयुरोकष्ूपसे उपरुक्षि 
रोकोपलधितमूधवं कपारमित्य- | ऊपरका अण्डं है । त्थ दै 
थः। यज्जरायु गभेपरिवष्नं सथू- | खण्डोम विभक्त होनेके समब उह | 
लमण्डस्य द्विशकरीभावकाल | अण्डेका जनो जरायु -स्थूल ग्भ । 
आसीत्‌, ते पर्वता बभूवुः । यदुल् वे्न था वड परैत हज) च 
मं गर्भपरवि्टनम्‌, तत्सह | उ ` पुरम गभच्ठनवा १ 

ह त के सहित नीहार--अकदयाय अर्थ्‌ । 
मेघः समभेषो नीहारोऽवस्यायो ऊ्रा हुमा, नो उलन्न हुए उ रण । 
वभूेत्यथेः । या गभंस्य जातस्य| के शरीरम धमनि [सतव 
दह धमनयः शिराः, ता नद्यो | नाडियँ र्थी, वे नदियों हुं भीर न 
बभूवुः । यत्तस्य वस्तो भवं | उसके वस्तिस्थान ८ मूत्राय ) 
बास्तेयञ्रदकम्‌, स समुद्र; ॥२॥ | जर था, वह समुद्र हुमा ॥ २॥ 





--: ऽ `~ 


अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं 
घोषा उद्ूखवोऽनुदति्ठन्त्सर्वाणि च भूतानि सर्वे च 
कामास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं पति घोषा उद 
वाऽनृत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सवे च कामाः ॥३॥ 


फिर उषसे जो उलन हुा वह यह्‌ आदित्य हे । उसके उक्र 
होते दी बडे नोरोका शब्द हज तथा उसीसे सम्पूणं प्राणी 4 


| 
। 
| 


| प 


खच्छः १९. | 


¢ 
शाङ्करथाच्याथ 
~ ¬ > 9 9 9 ¬ 


३४९ 


ओर सारे भोग हए है । इसीसे उसका उदय जर अस्त होनेषर दो्ध- 
काब्दयुक्त घोष उन्न होते है तथा सम्पूणं प्राणी ओर सारे भोग भी 


उत्पन्न होते है ॥ ३ ॥ 
८५ 0 
अथ यत्तदजायत गभंरूपं 


फिर उस अण्डेमे जो गर्भरूपसे 


तस्मिन्नण्डे, सोऽसावादित्यः, | उतपन्न हआ वह यह आदित्य है । 


तभादित्य जायमानं घोषाःशब्दा 


उलूरुव उरूरवो विस्तीणेरवा 


उदतिष्ठञुत्थितवन्तः, ईश्वरस्ये- 
वे प्रथमपुत्रजन्मनि; सर्वाणि च 


स्थावरजङ्गमानि मतानि सवं च 


तेषां भूतानां कामाः काम्यन्त 
इति विषयाः स्ीवस्रान्नादयः । 
यस्मादादित्यजन्मनिमित्ता 


भूतकामोत्पत्तिस्तस्माददय्वेऽपि 
तस्यादित्यस्योदय प्रति प्रत्या- 
यने प्रत्यस्तगमनं च प्रति, अथवा 
पूनः पुनः प्रत्यागमनं प्रत्यायनं 
ततपति - तभनिमिततषृत्येत्यथं 

सर्वाणि च भूतानि सवे च 
कामा घोषा उलूलबश्वानूततष्ठ- 


उप॒ आदित्यके उत्पन्न होनेषर 
उल्ल्व--उद्रव यानी घुदृरव्यापी 
शब्दवाले घोष-शब्द्‌ उपस्थित इए- 
उत्पन्न हुए, जिस प्रकार कि रोक्मेँ 
किवी राजाके यहाँ प्रथम पुत्रजन्म 
होनेपर॒ [ उत्सवपूणं कोहर 
हुआ करता है ] तथा उसी समय 
समस्त स्थावर-जङ्गम जीव ओर उन 
जी्वोकि काम-जनिनको कामना 
की जाती दै वे सनी, वस्र एवं अन्न 
आदि विषय उत्पन्न हुए । 


क्योकिं प्राणिवगं ओर उसके 
भोर्गोकी उत्पत्ति आदित्यके जन्मके 
कारण ही हुई है इसख्यि आजकल 
मी उत्त सयंदेवके उदयके भरति 
जर भ्रत्यायन अर्थात्‌ प्रत्यस्तगमन 
८ अस्त ) के प्रति अथवा पुनःपुनः 
प्रत्यागमन ही प्रस्यायन है, उसके 
ग्रति अर्थात्‌ उसे ही निमित्त व्रनाकर 
सम्पूणं मूत, सारे भोग ओर दीष 
शब्दयुक्त धोष उतपन्न दोते दै । 


३५९० छान्दोन्योपनिषद्‌ [ 


>< >8< < क + अ - --9--- > 


अध्याय्‌ | 


स म < ध ऋ | 
न्ति, प्रसिद्धं द्येतदुदयादौ | सूरयके उदय आदि होनेकै ५ 
सवितुः ॥ ३ ॥ सव प्रसिद्ध दही है ॥ ३॥ 





--: °: -- 


स य एतमेवं विद्वानादित्यं बरह्मेल्युपास्तेऽभ्यष 
ह यदेनशसाघवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निग्र. 
रश्नम्रेडरन्‌ ॥ ४ ॥ 


वह जो इस प्रकार जानेवाला होकर आदित्यकी "यह ब्रह है! छ | 
रकार उपासना करता दे, [ वह आदिव्य्प हो जाता है, तथा ] उक । 
समीप शीघ्र ही घुन्दर घोष आते है मौर उसे घुख देते टै, खल देते है ॥॥ । 


स यः कथिदेतमेवं यथोक्त-) वह जो को$ इस आदिक | 
त कन देसी महिमावाला नानकर इसकी 
महिमानं विदवान्सन्नादित्यं अघ चह ब्रहम है, इत भकार उपरत । 
तयुपास्ते स ॒तद्धावं प्रतिपद्यत | करता हैः वहतदूष ही होन | 
हे-ेसा इसका भावाथ है । त्था । 
उसे यह दष्टफल भी मिरता है । 
किप्रं तदिदः, यदिति क्रियावि- | इस प्रकार जाननेवलि न | 

एनमेवं सकके समीप अभ्याश्चः- | 
 शेषणम्‌ , विदं साधवःलो- शद अ ता 
भना घोषाः, साधुं घोषादीनां। होते दै । मूलम "यत्‌" शब्द क्रिय" 


^ विरोषण है । घोषादिकी साधृत 
५ । आ | यी है कि उनका उपभोग करने 
च गच्छषुरागच्छेयुश्च, उप॒च पापानुबन्ध नहीं होता । वै धोष 3 


(२. ६ 
इत्यथः । कश्च दृष्ट फलमभ्याशः 


शण्ड १९. ] शाङ्करथाष्याथं ३५१ 
~प -8--- << <-> >: ऋ > 9 


निम्रेडरन्लुषनिग्रडरंध न केवल- | अति हँ ओर उसे घुल देते है,उसे 

सुख देते है । तातपयं यह दै किं 
मागमनमात्रं षोपाणाडपसुखये- | पोरा केवर आगमन ही नही 
युश्नोषसुखं च इुरित्य्थः । | होता वे उसे घुल भी देते दै, घुख 
र ऽ | भी देते है | ननिग्ेडरननिग्रेडरन्‌! यह 
दिरभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्त्यथं दिरक्त जव्ययकी समपि चित करने 
आदराथंश्च ॥ ४ ॥ जीर आदरपरदर्नके स्यि दै ॥४॥ 





इतिच्छान्दोग्योपनिषदि ठतीयान्याय एकोन- 
विंशखण्डभाष्यं सस्पू्ण॑म्‌ ॥ १९ ॥ 


--: ० :- 


इति श्रीमद्‌ गोविन्दभगवस्पूज्यपादरिष्यस्य परमहं सपरिव्राजकाचायेस्य 
श्रीमच्छंकरभगवतः रतो छान्दोग्योपनिषद्विषवरणे 
तृतीयोऽष्यायः समाप्तः ॥ ३॥ 





चतुथं अध्याय 


रम्‌ रहय 
1 राजा जानश्रुति ओर रैक्वका उपाख्यान | 
वायुप्राणयोत्रहमणः पाददुष्टय- | वायु ओर प्राणमे बही पद, 
- दृष्टिके अ वर्णन पहु 

ष्यासः पुरस्तादणितः । अथे- शिके अध्यासक्रा वर्णन पए | 
(तृतीय अध्याय) कर्‌ दिया ग। 
दानीं तयोः साक्षादत्रहमत्वेनोपा- | अग इस समय उनका सक्ष । 
ब्रह्मरूपसे उपास्यत्व॒ बतलनेके । 
स्यि अग्न प्रकरण जस्मश्चि 
बोंधार्थाख्यायिका विद्यादान- | नाता दै। यहाँ जो आख्यायिक । 
6 वह सरल्तासे समक्षनेके यि त्थ | 
गरहणविधिप्रदशनार्था च । | विके दान ओर ग्रहणक वि । 
प्रदर्शित करनेके ल्यि दै। साधष | 
इस आल्यायिकादवारा श्रद्धा, अन्नदति | 
ओर अनुद्धतत्व ८ विनय ) भादिकघ | 
विद्यप्रापतिमे साघनत्व भी प्रदरवित । 

आख्यायिकया- किया जाता हे- 


| | 
ॐ जानशनुतिहं पोत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी | 


स्यत्वायोत्तरमारभ्यते। सुखाव- 


भद्धानदानाचुदधतत्वादीनां च 


विद्याप्रा्निसाधनत्वं प्रददर्य॑त 


॥ 


चह्पाज्य आस । स ह सवंत आवसथान्मापयाथके ¦ 
ह 
सवेत एव मेऽस्स्यन्तीति ॥ ६ ॥ 


{ त (शा | 
जनत सतान-परम्परामे उन्न एवं उसके पुत्रका पोत्र श्रदवपूक 
दनेवाख एवं बहुत दान करनेवाला था जोर उसके यहाँ [दान करनेके ठि 


खच्ड १] 


हदछाङ्कल्भाभ्याथं 


३५९ 


वहुत-सा अन्न पकाया जाता था । उसने, इस आयसे कि रोग सब जगह 
मेरा ही भन्न खाय गे, सर्वत्र निवासस्थान (धरमशाे) बनवा दिये थे ॥१॥ 


जानशरुतिजेनशरुतस्यापत्यम्‌ , 
ह रेतिद्या्थः, पुत्रस्य पोत्र 
पौत्रायणः स एव श्रद्धादेयः 
्रद्धापुरःसरमेव . ब्राह्मणादिभ्यो 


देयमस्येति श्रद्धादेयः। बहु दायी 
प्रभूतं दातं शीलमस्येति बहुदा- 


यी । बहुपाक्य बहु पक्तव्यमह- 
न्यहनि गृहे यस्यासौ बहुपाक्यः। 
भोजनार्थिभ्यो बहस्य गृहेऽन्न 
पच्यत इत्यथः ! एवंगुणसम्प- 
तनोऽसौ जानश्रुतिः पौत्रायणो 
विशिष्टे देशे काले च करिमधि- 
दास बभृव । 


स ह सर्वतः सर्वासु दिज 
ग्रामेषु नगरेषु चावसथानेत्य 


वसन्ति येष्वित्यावसथास्तान्माप 
{4 © ¢ 
याश्चक्रे कारितवानित्यथः । सवत 


जानश्रुतिका--जनश्रुतका अपत्य 
८ वंशधर ), हः यह निपात ईइति- 
हासक्षा योतक दहै, पुत्रके पोतेको 
पौत्रायण कहते रै; वही श्रद्वादेय 
था, उसके पस जो कुछ था वह्‌ 
राह्मण जादिको श्रद्धपूवक देनेके 
ल्य ही था, इसख्े उसे श्रद्ादेय 
कहा गया है; बहुदायी- जिसका 
स्वभाव बहुत दान कटनेका था ओर 
वहुपाक्य-- जिसके घरमे निव्यप्रति 
बहुत-सा पाक्य- पकाया हुआ अन्न 
रहता था अर्थात्‌ जिसके घर भोजना- 
्ियोके ल्य बहुत-सा भन्न पकाया 
जाता था-रेसा था, पसे गु्णोसे 
युक्तं वह जनश्रूतकी संततिमें त्पन्न 
हुभा उसका भपौत्र किसी उत्तम 
देश ओर कार्म हुमा था । 


प्रसिद्ध दै, उसने सब ोर-- 
समस्त दिश्ा्ओमिं माम भौर नगरोकि 
भीतर आवसथ ८ धमेशचाले )-- 
जिनमे मकर यात्री उहरते ई वे 
भावसथ कंहरते रै- निमित 
कराये अर्थात्‌ बनवा दिये ये। इससे 


एव मे ममां ॒तेष्वावसथेषु | उघका यह अमिप्राय था कि 


देष छाब्दोग्योवनिषत्‌ 


>< < ¬> ८ ¬< < < < ¬< --- < 2 >> = 
वसन्तोऽत्स्यन्ति भोश्ष्यन्त इत्ये- 


रोग सर्वत्र मेरा ही अन भक 
करेगे ॥ १॥ 


न्त 
तत्वं सति राजनि तस्मिन्‌ | वहा इस प्रकार रहता हुभा इ 





वमभित्रायः ॥ १ ॥ 





धर्मकारे दर्यतलस्ये-- 


क्षीस्तच्चा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २॥ 


उसी समय रात्रिम उधरसे हंस उड़कर गये । उनमेसे एक हंसौ 
दूसरे हंससे कहा- “अरे ओ भट्लक्ष | ओ भल्लाक्ष | देख, नान | 
पीत्रायणका तेज चुखोकके समान कैर इभा है; तू उसका सदं न ऋ । 


वह्‌ तुज्ञे भस्म न कर डेः ॥ २ ॥ 


अथ ह हंसा निशायां रात्रा- । उसी समय निशा अर्थात्‌ सर्ति । 


उषरते हंस उड़कर गये । रकि 


वतिपेतुः। ऋषयो देवता वा अन्नदानलनबन्धी गुणेति संदष्ट हए । 


ज्ञोऽ्दानगुणेस्तोषिता 
राज्ञ(जन्रदानयुणस्तोषताः सन्तो च्छूषिं या देवता हंसख्प होक 


दशनमो 

+ ˆ | राजाकी ष्टके सामने होकर ॐ। 

चरेऽतिपेतुः पतितवन्तः । तत्त- | उस समय॒ उड़कर जाते हए ॐ 
हंसरिंसे पीठे उड़ते इए एक हे 


स्मिन्कारे तेषां पततां हंसानामेकः| भागे उड़कर जते हए दूसरे हसत 


[ बध्याब्‌॥ | 
उन धर्मालेमे निवास करव 


राजा जब एक वार गर्मकि स | 


अयने महक छतपर वैद था- ॥ 
अथ ह ॒हश्सा निङायामतिपेतुस्तद्धेवश्हश्षो 
हरसमभ्युवाद हो होऽयि भक्ष भक्ष जानश्रुतेः 
पोत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसार ` 


ृष्ठवः पतन्तः पठन्तं हंसम्‌- | “अरे मो भलक्ष । भो मल्ल । । 


खण्ड | 


शाङरभाष्वाथं 


३५५ 


~> 9८ ~ढ: ~ ~ ~ ~ह~ 9 ~न अ 9 ~ 9 9 9 ¬ 9 -9 ~व. ऋ 9 


स्युवादाभ्युक्तवान्‌ हौ होऽयीति | इस प्रकार सम्बोषन करते हए ओर . 


भो मो इति सम्बोध्य भल्नाप्ष 
भल्नाकषत्यादरं दश्ेयन्यथा पर्य 
पर्यायमिति तद्वत्‌ । भन्ना- 
षेति मन्ददुषटित्वं श्चचयन्नाह । 
अथवा सम्यग््रहमदनाभिमा- 
नवच्वा्तस्यासढृदुपारन्धस्तेन 


पील्यमानोऽमपिंतया 
यति म्राक्षेति । 

जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं 
जानश्रुतेः तुल्यं दिवा चुलोकेन 
पभाववणनम्‌ ज्योतिः प्रमास्वर- 
मनदानादिजनितप्रभावजमाततं 
व्याहं॑चयुलोकरमित्यथः । 
दिबाह्या वा समं ज्योतिरित्ये- 
तत्‌! तन्मा प्रसाङ्गीः सञ्जनं 
सक्तिं तेन उयोतिषा सम्बन्धमा 
का्षीरित्यथंः । तत््सञ्जनेन 
तज्ज्योतिस्त्वा ववां मा प्रधा 
छाः उ १२- 


तत्छूच- 


जैसे कि देखो, देखो, बड़ा आश्चयं 
हः इत्यादि कथनमे देखा जाता दै 
उसी प्रकार “भल्लाक्ष | भटाक्ष 
रा कहकर [ अपने कथनके प्रति | 
आदर प्रदरतित करते हुए कहा । 
“भट्यक्ष रेखा कहकर उसकी 
मन्ददृष्टिताको सूचित करते इए 
वह्‌ बोल । अथवा सम्यक्‌ ब्रक्ष- 
ज्ञाने अमिमानसे युक्त होनेके 
कारण उस (आगे उडनेवाले हंस ) 
से निरन्तर चेडे जनेसे पीडित 
होकर कोधवशच उसे।“भल्सक्ष' कह- 
कर सूचित करता है । [क्या सूचित 
करता है १ यह बतलते ईदै-] 
जानश्रति पैत्रायणकी ज्योति-- 
अन्नदानादिजनित प्रभावसे प्रा 
हुई कान्ति धुरोकके समान करी 

हुई दै; अर्थात्‌ ुोकका स्य 
करनेवारी है । अथवा इसका यह 
भी ताप्य हो सकता है किं दिवा 
यानी दिनके समान दै । उसते 
प्रसङ्ग सञ्जन यानी सक्ति न कर 
अर्थात्‌ उस ज्योतिसे सम्बन्ष न 
कर । उसका सङ्क करनेसे वह 
ज्योति वुञ्े मस्म रथात्‌ द््वान कर्‌ 


३८५६ छान्दोम्योपनिषद्‌ [ मध्याय ४ 


ऋ ल < >> 9 ऋ 
ष्मा दहतित्य्थः । पूरुषव्य- | उठे। यहाँ पुरुषका परिवतंन करै 
[मा प्रधाक्षीः"के स्थानम] मा परषा- 
त्ययेन मा प्रधाक्षीदिति ॥२॥ । क्षीत्ेसा पाठ समङ्ञना चाहिये ॥२॥ 
तमु ह परः प्रलयुवाच कस्वर एनमेतर्सन्तश्सयु- 
ग्वानमिव रेकमास्थेति यो लु कथरसयुग्वा रेक 
इति ॥ ३ ॥ 
उससे दूसरे [ अग्रगामी ] हंसने कहा-“अरे | त किंस महत्वसे 
युक्त रहनेवारे इस राजके प्रति इस तरह सम्मानित वचन कह रहा है ! 
क्या तु इसे गाड़ीवाटे रेक्वके समान बतखता हे ¢ [ इसपर उसने 
पूछा -- ] “यह्‌ जो गाड़ीवाटा रैक्व है, केसा दै ॥ ३॥ 
तमेवयुक्तवन्तं प्र ईइतरो- | इस भरकार कते हए उस हंससे 
रेकपेया ऽगरगामी परतयुवाचारे दूसरे आगे चर्नेवठे हसने कदा- 
अरे ! यह बेचारा राजा तो बहत 
जान्तेनिंङ- निकृषटोऽयं राजा | तुच्छ है । मला किस रूपमे वतंमान- 
ह्य . - | केसे महच्वसे युक्त रहनेवाटे ईस 
नि एं 1 इस प्रकार यह 
पूसन्तं केन माहात्म्येन युक्तं | भत्यन्त सम्मानपूणं शब्द कह रदा 


सन्तमिति इत्सयत्येनमेवं सबहु है-रेखा कहकर वह उसकी थवज्ञा 


„= (करता दै- क्यात्‌ इसे गादरीवाले 
मानमेतद्वचनमात्य १ रेकमिव | रेकके समान [ बतलता है १ | 


सयुग्बानं सद युग्बना गन्त्या | जो युखा भर्थात्‌ गाड़ीके साय 


प. स्थित है उसे सयुग्वा कहते टैः 
वतत इतत सयुग्वा रकरः, तमि- | एसा जो रेक है उसके समान त्‌ 


` अ्नकि प्पाीः नन एच्कदज्त्त ~ 
® क्योकि भरवाक्षीः' मध्यम पुरूपकी त्र दै ओर इसका क्रतां 


ज्योतिः" जो प्रथम पुरुष ह । इसलिये इसका रूप भी प्रथम पुरुषके अनुसार 
“प्रधाश्चीत्‌" एेखा होना चादिये । 


खण्ड १] शाङ्करमास्वाथं ३५७ 


वात्थेनम्‌ १ अननुरूपमस्मिन्‌ , | इसे बतला रहा है £ यह कथन 
इसके अनुरूप नहीं है; अर्थात्‌ 
ध्यह रेक्वके समान दैः रेषा 
रायः । इतस््ाह- यो चु कथं | कना उचत नौ । इसपर 

दूसरेने कहा- "जिसके विषयमे 
त्वयोच्यते सयुग्वा रक्वः। तुम कह रहे हो वह्‌ गाड़ी- 
वाला रैक्व कैसा हे ® एसा कहने- 
वाटे उस हंससे भर्लक्ष बोख- 
यथा स रेक्वः ॥ ३॥ (जैसा वह रैक्व दै, सुन' ॥ २॥ 


न युक्तमीदृशं वक्त क इवेत्यभि- | 


इत्युक्तवन्तं भल्नाक्ष आह-श्रणु 





यथा करतायविजित्ायाधरेयाः संयन्त्येवमेनश्सव 
तदभिसमेति यत्कि प्रजाः साधु कर्वन्ति यस्तद्वेद 
यत्स वेद स मयेतदुक्त इति ॥ ४ ॥ 

जिस प्रकार [ चतक्रीडाम ] कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवलि . 
ुरुषके अधीन उससे निम्न शरेणीके सारे पासे हो जाते दै उसी प्रकार 
प्रना जो कुछ सत्कर्म करती है वह सव उस (रेक) को प्राप्तो 
जाता है । नो बात वह रैक्व जानता है उसे जो कोई भी जानता दै 
उसके विषयमे मी भने यह कह दिया ॥ ४ ॥ 


यथा लोकै कृतायः कृतो | निस भकार रोकरमे चतक्रीडाके 
र ह समय जो चार अङ्कवाखा कृत- 
खचस्य महम्‌ नामायो चयूतसमये| नामक पासा परसिद्ध है, जव यूते 

प्रासद्धश्तुरङ्कः, स | प्रवृत्त हुए. पुरर्पोका वह कृतनामक 


यदा जयति दयते परदृ्ानां तस्मै | पासा जय भ्रा करता है तो उसके 
(र ते तिदय द्वारा विजय प्राप्त करनेवल्ेको ही 
विजिताय तदथमितरे त्रिदवधेका- | सीन, दो जोर एक अङ्कते युक्त 


ङा अधरेयासरेताद्ापरककिना- तरेता, द्वापर ओर कठिनामक 


३५८ 
मानः संयन्ति संगच्छन्तेऽन्त- 


भेवन्ति। चतुर ताये त्रिदये 
काङ्ानां विच्यमानत्वा्तदन्तभं- 


बन्तीत्यथेः । यथायं दान्तः, 
एवमेनं रेकं कृतायस्थानीयं 


्रेता्ययस्थानीयं सवं तदभि- 


समेत्यन्तमेवति रेके । फं तत्‌ 


यक्किश्च लोके सर्वाः प्रजाः साघु 
शोभनं षमंजात कुर्वन्ति तत्सवं 
रेकस्य धर्मेऽन्तभवति । तस्य 
च फले सव॑प्राणिधमंफलमन्तरभ- 
वतीत्यर्थः । 

तथान्योऽपि कथिदयस्तदे्यं 


वेद्‌, फं तत्‌ ? यदेयं स रेको 


वेद तदेद्यमन्योऽपि यो वेद तमपि 


सरवप्राणिधमजातं तत्फलं च 


रेकमिवाभिसमेतीस्यलुवतते। स 


छान्दोष्योनिषह्‌ 


9-3-6८ -ऋर- >~ <> 8 ऋ 


[ खष्याय ४ 
= 0 
नीचेके पसे भी प्रा हो नते ह 
अर्थात्‌ उस्रके अधीन हो जाते है 
तासयं यह ह क चार जडे यकत 
ृतनामके पासेमे तीन, दो ओर 
एक शङ्कवाले पासे भी विद्यमान 
रहनेके कारण बै भी उसके अन्तर्गत 
हो जते है । जैसा यह दन्त दै; ` 
उसी प्रकार कतस्थानीय इस रेक्व- 
को त्रेतादिस्थानीय वह सव प्राप्हो 
जाता हे- सब उस रेक्वके अन्तग 
हो जाता हे । वह क्था है वह 
यह कि जो कुछ रोकमें प्रज। साधु 
-- शोभन यानी धर्मकार्यं करती है 
सव-का-सब रेक्वके धर्मम समा 
जाता है । तात्य यह है कि 
समस्त प्राणिर्योके धर्मफल उसके 
धर्मफरुके अन्तर्गत हो जाते है । 

तथा दूसरा पुरुष भी, नो कोई 
उस वेयको जानता दै बह वेध 
क्याहै! जिसे किं वह रेक 
जानता है उस वेको दूसरा भी 
जो फोई जानता हे उसे भी रेक्वके 
समान समस्त प्राणियों का धर्मसम्‌ह 
ओर उसका फठ परापत हो नाता है 


इस रकार यहाँ सवं तदमिसमेति'दस 


पूव॑वाक्यक्रा अनुवर्तन होता है । वह 


इस प्रकारका रेक्वसे भिन्न विद्वान्‌ 


एवंभूतोऽेक्ोऽपि मया विदवानेत-। भी मेने देखा ककर बतला दिया । 


~~~ -- --~ - 


खण्ड १] शाङूरभाण्याथे ३५९ 
>~ - -  ऋ--- - - ~अ अ 


दुक्त एवुक्तः, रेवत्स एव | तासयं यह हे करि रेक्वके समान्‌ 
कृतायस्थानीयो भवतीत्यभि- | वही कृतनामक पसेके सदश 
प्रायः ॥ ४॥ होता दै ॥ ४॥ 


तदु ह जानश्रुतिः पोत्रायण उपशुश्राव । स ह 
संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्कारे ह सयुग्वानमिव रेक 
मास्थेति यो कथश्सयुग्वा रेक इति ॥ ५॥ यथा 
कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनशसवं तदभिस- 
मेति यत्किञ्च प्रजाः साधु वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद्‌ 
स मयेतदुक्त इति ॥ & ॥ 

इस बातको जानश्रति पेत्रायणने घन ल्या । [ दूसरे दिन सवेरे ] 
उठते ही उसने सेवकसे कहा-अरे भया | तू गाड़ीवाटेरेक्वके समान मेरी 
सतुति क्या करता है / [ इसपर सेवकने पूछा-- ] थह जो गाद़ीवाल 
रेक दै, केसा दे ? ॥ ५ ॥ [ राजाने कदा- ] "नि प्रकार छतनामक 
पासेके द्वारा जीतनेवाटे स्षके अधीन उससे निम्नवतीं समस्त पासे हो 
जाते है उसी प्रकार उस रैक्वको जो कुछ परजा सतकमं करती हे, वह सब 
प्रा हो जाता है तथा जो कुछ वह ८ रैक्व ) जानता है उसे जो कोई 
जानता है उसके विषयमे भी इस कथनदवारा मेने बतला दिया ॥ ६॥ 





तदु ह तदेतदीदृशं हंसवाक्य-| महल्की छतपर स्थित राजा 
जनश्रुति पत्रायणने अपनो निन्दा- 
(द खूप ओर रेक्व॒ आदि किसी अन्य 
रक्राद्‌ः म्रशसारूपञुपरुश्राव | विद्रानकी प्ररंसारूप यह इस परकार- 
शरुतवान्दम्यतरस्थो राजा जान- | का॒हंसका वचन शुन स्था । 
रतिः पौत्रायणः । तच दंसवाक्यं | तथा उस हंसके वचनको पुनः- 


मात्मनः इत्सारूपमन्यस्य विदुषी 


श्द ` आन्दोनयोपनिषद्‌ | 


सन्यांय ४ 
न 2-8-28 


= = > 
स्मरनेवं पोनःपुन्धेन रावरिशेष- | पुनः स्मरण करते हुए ही उने 
तव वन्दियो्वाा स्तुत्वा 


९, वन्दिभी | > | से जगाये जानेपर राजन शय 
स्ततियुक्तामिवाग्मिःप्रतिबोध्य- | अथवा न्को स्यागते ही सेके 
मान उवाच क्षत्तारं संजिहान | कदा- दे वत्स ¡ भरे | क्य तृ 
एव शयनं निद्रां बा परित्य- | गाड़ीवाठे रेकवके समान बतला रहा 
जन्नेव, हेऽङ्ग वसार ह सयुग्बान- | दै £ तासं यह दै कि ्व॒तिके योय 


= क तोवहीदहे, मँ नहीं हः अथवात्‌ 

मे ~ | ) ० 
(४ 9 ध जाकर गाड़ीवल रैक्वक्तो उसे देखने- 
एव स्तुत्यो नाहमित्याभिप्रायः || की मेरी इच्छा खना । पेता अर्थ हेन 


अथवा सयुग्वानं रेक्मात्थ गत्वा ए२.सयुग्बानम्‌ इवमे हवरव्द निश. 
मम तदिदु्षाम्‌; तदेव्व्दोऽब- | यारथक अथवा जर्थहीन कहना चाहिय। 
7 राजक अभिप्रायकरो जाननेवाटे 
धारणार्थोऽनथेको वा वाच्यः | | °> 
„ | उस सेवके रैक्वको लनेकी इच्छे 
सच षता भर्युवाच रका- | पूडा-- यह नो गाड़ीवाा रवव है, 
नयनकामो राज्ञोऽभिप्रायत्ञः। यो | कैसा हे ® अर्थात्‌ राके ईस 
ख कथं सुगा रेक इति रावं | भकार कदनेपर उसे खानेके लिय 
शोक आच वब तमः | नजा इ 
- गाद़ीवा # 
चछन्‌योनु कथं स्‌ युग्बा रेक ९/1 = 
न ४६ कैसा दै £ रसा कहा । तव राजनि 
इत्यवोचत्‌) स च भल्लाक्षवचन- 


भर्लाक्षका वचन ही दुहरा दिया 
मेवावोचत्‌ ॥ ५-& ॥ ॥ ५-६ ॥ 


तस्य स्मरन्‌-- | उसके कथनो याद्‌ रखकर-- 


वज्ड १) शाङ्करभाष्याथं ३६१ 
> 4-99-9 9-9-98 9-9-98 88 ५-४9-४ 


स ह क्षत्तान्विष्य नाविदमिति प्रत्येयाय त 
होवाच यत्रारे बाह्यणस्यान्वेषणा तदेनमर्च्छेति ॥७॥ 
वह सेवक उसकी खोज करनेके अनन्तर भँ उसे नहीं पा सका" 
एसा कहता हुमा रोर आया | तब उससे राजान कहा-अरे | जहां 
ब्राह्मणकी खोज की नाती है वहो उसके पस जा' ॥ ७ ॥ 
सह क्षत्ता नगरं ग्रामं वा| वह सेवकं नगर या प्राममे जाकर 
गत्वान्विष्य रेक्वं॑नाविदं न | वहो खोननेके अनन्तर शवेन रेकको 
व्यज्ञासिषमिति प्रत्येयाय प्रत्या- | नही जाना- नहीं पहचानाः पेखा 
गतवान्‌ । तं होवाच कषत्तारमरे | कहता हुआ रो आया । तब 
यत्र ब्राह्मणस्य ब्रह्मविद एका- | राजाने उस सेवकसे कदा- अरे ] 
न्त्ये नदीपुलिनादो विविक्ते जहाँ एकान्त जंगलूमे--नदीके तीर 
आदि श्ूल्य स्थानोमें ब्राह्ण~त्रह्म- 
व वेत्ताकी खोज की जाती हे वहाँ इस 
तसत्रनं रकमच्छ ऋच्छ गचछ | रेकके पास शछच्छ' रथात्‌ जा यानी 


देकेऽ्न्वेषणानुमा्गणं भवति 


तत्र भार्मणं इवित्यथं; ॥ ७ ॥ | वहां नकर उघकी सोन कर ॥ ७॥ 





इत्युक्तः- ¡ इस प्रकार कहे जानेपर-- 
सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणसुपोपविवेडा 
तरहाभ्युवाद्‌ तवं नु भगवः सयुग्वा रेक इत्यह्यरा ३ 
इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताविदमिति प्रत्येयाय ॥८॥ 


उसने एक छकडेके नीचे खान खुनठाते हए [ रक्वको देखा ]। 
वह उसके पास बैठ गया भोर बोला-'भगवन्‌ | क्या आप ही गाद़ी- 
वे रेक्व दै तब रैक्व “अरे ] हाँ, मे ही है एेसा ककर स्वीकार 


वे६२ 


छान्दोन्योकनिषष 


>~ (3 ¬ 2 ८ 2 द 8 --षट ~ 


[ मध्याय ह 
ह 9 > ® + 4 


किया । तव वह्‌ सेवक यद समङञकर कि मैने उसे पहचान सिवा दै, 


छोर माया ॥ ८ ॥ 


क्षत्तान्विष्य तं विजने देशे- 
ऽधस्ताच्छकटस्य गन्त्याः पामानं 
खज्‌ कषमाणं कण्डूयमानं दुष 
अयं नूनं सयुग्वा रेकः' इत्यु- 
पसमीप उपविवेश विनयेनोप- 
विष्टवान्‌ । तं च रेकं हाभ्युवा- 
दोक्तवान्‌--खमसि हे भगवो 
भगवन्‌ सयुग्वा रेक इति । एवं 
पृष्टोऽ्मस्मि ह्यरा २ अर इति 
हानादर एव प्रतिजज्ञेऽभ्युपगत- 
वान्‌ । स. तं विज्ञायाविदं 
विज्ञातवानस्मौति प्रत्येयाय 
प्रस्यागत इत्यथः ॥ ८ ॥ 


वह सेवक निन स्थानम सोन 
करनेपर उसे एकं गाड़ीके नीचे 
खाज खुनखते देखकर "निश्चय यही 
गाड़ीवाला रेक हे सा निश्चय क 
उसके समीप नघ्रतपूरवक बैठ गग; 
तथा उस रैकसे कहा--्े भगवन्‌ | 
गाद्धीवठे रेक आपद? इष 
तरह पूछे नानेपर “अरे! हौ, मै ह 
है इस प्रकार “अरेः कहकर उपने 
अनादर ही प्रकट किया । तब सेवक 
उसे जानकर-यह समञ्ञकर कि अब 
ने रेकको जान स्ा- पहचान 
स्या देः शो आया ॥ ८॥ 





इतिच्छान्दोग्योपनिषदि ठतीयाच्याये 


भ्रथमशलण्डमाष्यं सम्पुणेम्‌ ॥। १ ॥ 


=> "स~ 


हितीयः सकर्ड 


रेकके प्रति जानश्रुतिक्षी उपस्ति 
तदु ह जानश्रुतिः पोत्रायणः षटुश्तानि गवां 
निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमेतईहाभ्युवाद्‌ ॥९॥ 
तन वह जनश्रुति पौत्रायण छः सौ गौ, एक हार ओर एक 
खच्चरिर्योसे जुता हु रथ ठेकर उसके पास आया ओौर बोख ॥१॥ 
तत्तत्र ऋषे्गाहस्थ्यं प्रत्यभि- | तब [ सेवकके कथनसे ] ऋषि- 


८ = _ का गृहस्थाश्रम-सम्बन्धी अभिप्राय 
प्राय बुद्भ्वा धनाथितां च उह ओर धनकी इच्छा जान वह जान- 


एव॒ जानश्रुतिः पौत्रायणः श्रुति वेत्राण छः सो गोपे, निष्क 
षट्‌शतानि गवां निष्कं --गर्का हार ओर एक अधतरी- 
कण्ठहारमश्च तरीरथमश्चतरीभ्यां | रथ- दो अश्वतरियों [ खचरं ] 
युक्तं रथं तदादाय धनं गृहीत्वा | से जुता दुभा रथ--यह इतना धन 
प्रतिचक्रमे रेकं प्रति गतवान्‌ । | ेकर रेक्वके पास चरा । नोर 
तं च गत्वाभ्युवाद्‌ हाभ्युक्त- | उसके पास जाकर अभिवादन 
वान्‌ ॥ १॥ क्या अर्थत कहा ॥ १ ॥ 


-& 

रेकेमानि षट्‌डञातानि गवामयं निष्कोऽयमश्च- 
तरीरथोयु म एतां भगवो देवताश्शाधि यां 
देवतामुपास्स इति॥ २ ॥ 


९ रेक्व | ये छः सो गौं, यह हार ओर यह सलचवरियोसे जुता इमा 
रथ मै [ भाप्के स्यि ] राया ह| [ भप इस धनो स्वीकार कीजिये 





३६४ छान्दोन्योषनिषद्‌ 


333 9 9 न 
ओर ] हे भगवन्‌ ! आप मुञ्ञे उस देवताका उपदेश दीजिये, जिसकी 
खाप उपासना करते है ॥ २ ॥ 

हे रेक गवां षट्‌ शतानीमानि | दै रेवच ! म जापके स्वये 
सौ गँ खया हँ तथा बह हार 
ओर खचरियोंसे जुता हभ रथ 
भी खया, इस धनको रे लीन्ि 
ओर हे भगवन्‌ | मु्े उस देवताका 
मगवोऽशाधि च मे ममेताम्‌, उपदेश दीजिये जिसकी अप 


; स उपासना करते है; अर्थात्‌ उप 
यां च देवतां खणुपा्से तदेवतो- देवताका उपदेश करनेके द्वारा मेरा 


पदेशेन मामलुश्ाधीरय्थः ।|२॥ । अनुदान कीनिये ॥ २ ॥ 
तसु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा श्रदर तवेव सहं 
गोभिरस्सिति । तदु ह पुनरेव जानश्रुतिः पोत्रायणः 
सहस्तं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय 

प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥ 
` उस राजास दूसरे [ अर्थात्‌ रैक्व ]ने कहा--े शुद्र । गौ्कि 
सरित यह हारयुक्त रथ तेरे दी पास रे । तव वह जानश्ुति पौत्रायण 
एक सहल गो, एक हार, सचरियोसे जुता हुभा रथ ओर भनी 
कन्या-इतना धन लेकर फिर उसके पास आया ॥ २ ॥ 

तमेवशुक्तवन्तं राजानं प्रसयु- | इस प्रकार कते हए उस रानासे 


= स उस द्वितीय न्यक्ति-रेक्वने कदा- 

वाच परो रकः; अहैत्ययं निपातो गह" यह॒तिषात दूसरी जगह 

विनिग्रदाथी योऽन्यत्रह त्वनर्थकः | 'विनिम्रद" अर्थम प्रयुक्त होता दै, 
१ ९३, 

कितु यहाँ “दवः शब्दका प्रक, 

= शथकमरयोगात्‌ । परयोग॒रहनेके कारण निरथक 

हारेत्वा हारेण युक्ता इत्वा गन्त्री | दै । हारते युक्त जो इतवा- गाद 


तुभ्यं मयानीतानि, अयं निष्को- 


ऽधतरीरथश्रायमेतद्धनमाद स्स्व, 


खण्ड २ |] 


हशाङ्कराष्याथं 


१६५ 


~ 9-29-8 9 9 ऋ ऋः 


सेयं हारेत्वा गोभिः सद तवैवास्तु 
तयैव तिष्ठतु, न॒ ममापर्याप्तेन 
कर्मारथमनेन प्रयोजनमित्यमि- 
प्रायः, हे बद्रेति । 

नजु राजासौ कषततुसम्बन्धात्स 
ह क्षत्तारमुवाचेत्युक्तम्‌ । विधया- 
ग्रहणाय च ब्राह्मणसमीपोपग- 
माच्छर स्य चानधिकारात्कथमि- 


दमनयुरूपं रेक्वेणोच्यते हे 


शूद्रेति १ 
तत्राहुराचायाः--दंसवचन- 
शरवणाच्छुगेनमाविवेश; तेनासौ 
शुचा,भुत्वा रेक्वस्य महिमानं वा 
आद्रवतीति ऋषिरात्मनः परोक्ष- 
्ञतां दर्शयञ्य्रेरयाहेति। भूद्रवदया 


धनेनैवैनं विदयाग्रहणायोपजगाम 


उसे रत्वा कहते टै, वह यह्‌ 
गौओके सहित शराः तेरा दी 
रदे । तायं यह है किं हे शुट्‌ ! जो 
कर्मके स्यि सपर्याप् है देते इस 
धनसे मुञ्चे कोई प्रयोजन नहीं हे । 
शङ्का-क्षत्ता ( सेवक ) से सम्बन्ध 
होनेके कारण यह जानश्रुति तो 
रानाहे, क्योकि स ह क्षत्तार- 
मुवाच ८ उसने सेवकसे कहा ) 
एसा पहले कदा जा चुका है । तथा 
शटुका अधिकार न होनेसे ब्राह्णके 
समीप वियाग्रहणके. स्यि जनेके 
कारण भौ [यह क्षत्रिय ही जान 
पडता दै ] फिर रेक्वने दे श 
सा अनुचित शाब्द क्यो कहा १ 
समाधान-इस विषयमे आचाय 
गण एसा कहते है कि सका वचन 
सुननेपर ईस जानश्रुतिमे शोकका 
अविश हो गया था | उस ्ोकसे 
अथवा रक्वकी महिमा सुनकर वह 
द्रवीमूत हो रहा था; इसल्यि ऋषिने 
अपनी प्रोक्षज्ञता प्रदरित करनेके 
स्यि उसे “शुद्र कहकर सम्बोधित 
क्रिया । अथवा वह शूदके समान 
केवरु धनके द्वारा दी विद्या ्रहण 
करनेके स्थि उसके समीप गया था, 
येशरषादरारा अहण करने नहीं गया 


३६६ 


छान्दोग्योपनिषत्‌ 


[ ध्याय ४ 


>< < 6 8 -&< ¬< 8: ¬: >< € -डः 9८ -2८ -&८ 9८ >< 3 8८ -&--हः 9 > 96 ~ > 


न च शुश्रूषया, न तु जात्येव | [ इसल्यि उते शुः कहा हे] 


शृद्र इति । 
अपरे पुनराहुरल्पं धनमा- 


हृतमिति रुषेवैनयुक्तवाञ्छरेति । 


िद्धिं च बहाहरण उपादानं 
धनस्येति । 


तदु दर्पम॑तं ज्ञात्वा पुनरेव 
जानश्रुतिः पौत्रायणो गवां सद- 
समधिकं जायां वचर्षेरभिमतां 
दुदितरमात्मनस्तदादाय प्रति- 
चक्रमे क्रान्तवान्‌ ॥ ३ ॥ 


वह॒ नातिसे ही शद हो- देसी 
वात नहीं हे | 


परंतु अन्य छोग एेषा कहते है कि 
वह थोड़ा धन खया था इपल्यि 
रोषवश उसे “शद्रः कहा था; बहुत- 
साधन रनेपर उसे अ्रहण क 
ठेना इसत बातक्ो सूचित करता दै। 


तव ऋषिका अभिप्राय समञ्चकर 
राज। जानश्रुति पौत्रायण पहटेते 
अधिक्र करके एक सहस गौर तथा 
ऋषिको अभीष्ट परनीद्पा अपनी 
एक कन्या लेकर फिर उसके पस 
गया ॥ २ ॥ 


<हाभ्युवाद्‌ रेक्वेद सहस्रं गवामयं निष्कोऽयः 
मश्वतरीरथ इयं जायायं भामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा 
भगवः शाधोति ॥ ४॥ तस्या ह मुखसुपोद्ण्हन्नु- 
वाचाजहारेमाः श्रद्ानेनेव सु खेनाखापयिष्यथा इति 
ते हेते रेक्वपर्णां नाम महादृषेषु यत्रास्मा उवास 
स तस्मे होवाच ॥ ५॥ 

जर उस (रैक्व ) से कहा- -ेरेवव | ये एक सहस गोष, यह 
हार, यह खचरियसि जुता हुआ रथ, यह पली जर यह ग्राम जिसमे कि 
आप है लीन्यि ओर हे भगवन्‌ | सुञ्ञे अवर्य अनुशासित कीनिये' ॥४॥ 


=<-------- ~ -- - ----- 


खाण्ड २ ] ज्ाद्भरमाष्याथ ३६७ ` 
०: क - > ॐ = = = क ॐ = ॐ 4 = = > क ऋ 9 -+ - 


तव॒ उस (राजकन्या) कै मुखको दी [ विदयाग्रहणका द्वार | 
समङ्चते हुए रैक्वने कहा--अरे श ! तू ये ( गोएं आदि ) सया हे 
[ सो ठीक है; ] तु इस विधाग्रहणके द्वारसे ही ससे भाषण करता 
ह ॥ इस प्रकार जहाँ वह रैक्व रहता था वे रक्वपणेनामक आराम महावृष 
देशे प्रसिद्ध है । तब उसने उससे फा ॥ ५॥ 
रैक्वेदं गवां सहस्रमयं निष्को-| [ जर रेक्वसे कहा-- ] € 
„| रैक्व! ये एक सहस गौ, यह हार, 
ऽयमश्वतरीरथ इयं जायाथं मम | यह खचसियोसे युक्त रथ ओर 
यह प्ली अर्थात्‌ आपको भर्या 
दहितानीतायं च ग्रामो यर्मि- | होनेके रिय अपनी कन्या सया है 
तथा जिसमें आप रहते है वह गवि 
भी मने आप्हीके स्थि निश्चित 
कर दिया है। हे भगवन्‌ | इन 
सवको ग्रहणकर आप सुञ्ञे उपदेश 
कर्‌ ही दीज्यि 
एेसा कहे जनेपर भार्या होनेके 
स्यि खयी गयी उस राजकन्याके 
मुखको ही विद्यादानका द्वार 
अर्थात्‌ तीथं जानते हुए [ रेक्वने 
कहा-] पेसा इसका तायं हे । 
इस विषयमे विद्याका यह वचन 
परसिद्ध दै-“ ब्रह्मचारी धन देनेवाख 
बुद्धिमान्‌, श्रोत्रिय, प्रिय ओर जो 
विद्याके बदलेमे विद्याका उपदेश 


नास्ते तिष्ठसि स च त्वदर्थे मया 
कल्पितः । तदेतत्स्व॑मादायाचु- 


शाध्येव मा मां हे भगवः । 
इत्युक्तस्तस्या जाया्थमानी- 
ताया राज्ञो दुहितरहैव शुखं दारं 
विद्याया दाने तीर्थुपोदरहज्ान- 
नित्यथंः। “व्रह्मचारी धनदायी 
मेधावी श्रोत्रियः प्रियः। विद्यया 
वा विद्यां प्राह ॒तानि तीर्थानि 
षण्मम, इति विद्याया वचनं 


[व ---~------------------------------------- 


विज्ञायते दि । करता है-ये छः मेरे तीथं है ॥” 
एवं जाननुपोद्गृहमुवाचो- | रेसा जानकर अर्थात्‌ अण कर 
्तवान्‌--आजदाराहृतवान्म- । रेक्वने कदा-^त्‌ जो ये गो तथा 


३६८ छान्दोन्योपनिषद्‌ [ जप्याय ४ 


&< >< 8 € < € 8८ ऋ > ट 8८ ऋ ॐ ¬ 8 2८ -8€ ट < 8 धट ८ ॐ 
बान्यदिमा गा यचान्यद्भनं | अन्य धन काया है; यह ठीक ही 
तत्साध्विति वाक्यशेषः । शरेति दै,-पेसा वाक्यरेष है । बहौ नो 

~ ज ६ ति ९ 
पूरवोक्तानुङृतिमात्र न तु कारणा- | “शर एसा सम्बोधन है व परोक्त 
त का अनुकरणमात्र ही है, पूर्ववत्‌ 
न्तरापेक्षया पूववत्‌ । अ 
७४ क ९ 6 नेनैव किसी अन्य करणकी अपेक्षासे नही 
मुखेन विद्याग्रहणतीर्थेनालाप- 


< 0. हे । इस मुख यानी विचग्रहणके 
यिष्यथा आरूापयसीति मां भाण- स्ते हौ तु सदसे आखाप अर्थात्‌ 


0 
यसीत्यथः । सम्भाषण कराता है । 


ते हैते भ्रामा रेक्वपर्णा| वये रेक्वप्णं नामसे प्रसिद्ध मरम 
नाम विख्याता महाघ्रषेषु देशेषु | महादृष देशम दै, जिन प्रमेमिं 
यत्र येषुग्रामेषूवासोषितावान्रेकः,| कि रक्व रहा करता था, वे पराम 
तानसौ ्रामानदादस्मे रक्वाय | राजाने इस रैक्वको दे दिये । इष 
राजा । तस्म राज्ञं धनं दत्तवते इ | प्रकार धन देनेवाले उस्र रानक्रो 
किंरोवाच विद्यां स रेक्वः ।|४-५।॥ रेक्वने विचाका उपदेशा किया ॥४-५॥ 





इतिच्छान्दोभ्योपनिषदि चतुर्थाध्याये 
द्वितीयखण्डभाष्यं सस्पणेम्‌ ॥ २ ॥ 


90 
9 2.0 <+ <-> 


0९ + 


तीयः = 
1 शण्ड 
रकद्रारा संवर्गविद्याका उपदेश 
वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्ायति वायुमेवा- 
प्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा 
चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥ 
वायु ही संवर्गं हे । जव अनिन ु्ञता है तो वायुम ही छीन 
होता है, जब सूर्यं अप्त होता है तो वायुर्मे हौ लीन होता है ओर 
जव चन्रमा अस्त होता दै तो वायुम ही रीन हो जाता है ॥ १ ॥ 
वायुर्वाव संवर्गो वायुरबाह्यो | वायु दी संवग हे । यहाँ वायु 
, , | शब्दे बाहवायु अभ्धित हे । 
वावेत्यवधारणाथंः । संवगः | वाव, यह निपात निश्वयारथक हे । 
अ , | संबजंन-सं्रहण अथवा संमरसन 
 संवजनातसंगरहणातसंप्रसनाद्वा सं `| करनेके कारण वह संवग है । आगे 
९ द कटे जानेवाठे अग्नि आदि देवताओं 
वमः । वक्ष्यमाणा अभ्न्याद्या र चल स ए स्त 
। , | है इसल्यि वह संवगं हे । इत- 
देवता आममावमापादयतीत्यतः | नामक़ पतेम जैसे अन्य पाका 


संवर्गः । संबर्जनाख्यो गुणो | अन्तर्भव हो नाता दै उसी दृान्त- 
के अनुसार वायुके समान संवजेन- 

दृष्टान्तात्‌ । कथं संबगंतवं | चाहिये । वादु संव्गता किष 
ह „ | प्रकार हे १ इस विषय श्रुति कहती 

वायोः {इस्याह-यदा यस्मिन्काले ह-जब अर्थात्‌ निस समय अमन 


वा अग्निरदायययुद्रासनं प्राप्नो- | उद्राघनको प्राप होता है अर्थात्‌ 


३.9० 


छान्दोम्योपनिषह्‌ 


[ मध्याय ४ 


अ 8 8 9 ¬ ल ¬ 5 > > > > ऋ 


त्युपशाभ्यति तदासावग्निर्बायु- 
मेवाप्येति बायुस्वाभाग्यमपि- 
गच्छति । तथा यदा पूर्योऽस्त- 
मेति बायुमेवाप्येति। यदा चन्द्रो- 


ऽस्तमेति वायुमेवाप्येति । 

नञ कथं सर्याचन्द्रमसोः 
स्वरूपावस्थितयोर्वायावपिनम- 
नम्‌ १ 

नैष दोषः; अस्तमनेष्दशन 
प्रपेवायुनिमित्तत्वात्‌, वायुना 
दयस्तं नीयते रयः; चलनस्य 


वायुकार्यत्वात्‌ । अथवा प्रलये 
सूर्याचन्द्रमसोः स्वरूपश्रशे 


तेजोरूपयोर्बायावेवापिगमनं 
स्यात्‌ ॥-१ ॥ 


| अदशनको. प्राप्त दोना 


शान्त हो जाता है उस समय यह 
अगि वायु ष्ठी रीन हो जाता है 
अर्थात्‌ वायुके स्वभावको प्राप्त हो 
जाता है। तथा जिस समय सूं 
अस्त होता है वह भी वायुम ही 
ठीन हो जाता है भौर जव चन्द्रमा 
अस्त होता ्ै वह भी वायुम दी 
लीन हो बाता है । 

. शङ्ा--णपने स्वरूपम स्थित 
तुयं ओर चन्द्रमा वायुम कित 
प्रकार ल्य हो सकता है ! 


समाधान-- यह कोर दोष नदी 
है, क्योकि इनका स्त॒ होनेपर 
वायुके 
कारण होता है । सुर्य वायुके ही 
द्वारा भस्तको प्राप्ठ कराया जातां 
है, क्योकि गति वायुका दी कायं 
है अथवा प्रर्यकार्मे तेनोरूप 
सूर्यं मौर चन्द्रमाके स्वरूपका नाश 
होनेपर भी उनका वायुम ही छ 
हो सकता है ॥ १ ॥ 


~ 
-\ © ~ 


तथा-- 


। तथा-- 


यदाप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुँ वैतान्‌ 
स्वान्सं्ङ्क्त इत्यधिदेवतम्‌ ॥ २ ॥ 


छव ~. -- ---- = = 


खण्ड ३ ] 
> > 3999 - 


काद्रमव्याथ 


१७६ 
क ॐ ॐ < ॐ ॐ < 


(नव ऋः 
जिस समय जल सूखता दै वह वायुम दी रीन हो जाता हे । 
वायु ही इन सब जलको जपनम रीन कर केता ष । यदह. भषिदेवव 


दष्ट है ॥ २॥ 
यदाप उच्छुप्यन्त्युच्छोष- 


मच्लुवन्ति तदा वाघुमेवापिय- 
न्ति । बायुष्ठिं यस्मादेवैतान- 
गन्याचान्महाबलान्संडङ्क्त, अतो 
वायुः संवर्मगुण उपास्य इत्यथैः 
इत्यधिदैवतं देवतासु संवग॑दरं- 


नधुक्तम्‌ ॥ २ ॥ 


जब जर सूखता है--शोषणको 
माप्त होता है उख समय बह भी 
वायुम ही रीन हो जाता है। 
वयक वायु हौ इन भग्नि भावि 
महावरवान्‌ तत्त्वोको अपनेमरे रीन 
कर केता है, इसक्िे वायुकी संवगे 
गुणङ्पसे उपा्ना करनौ जाहिये- 
यह इसका तामं है । इख प्रकार ` 
य॒ अधिदेवत-देबता्ोमि संगं 
दृष्टि कदी गयी ॥ २ ॥ 





अथाध्यारमं प्राणो वाव संवगः स यदा स्वपिति 
प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः भाणो प्राणं 
मनः भ्राणो द्यवेतान्सरवान्संबरडक्त इति ॥ ३ ॥ 
जव अष्यातदर्शन कहा जाता दै- प्राण दी संबगे है । जिस . 
समय वह्‌ पुरुष सोता है, प्राणको दी वाक इन्द्रिय भास दो जाती है; 
प्राणको हौ चक्षु, पाणको ही श्रोत्र ओर प्राणको ही मन प्राप्त हो जाता 
हे, प्राण ही इन सबको घपनेमे रीन कर ठेता है ॥ २ ॥ 


अथानन्तरमध्यात्ममात्मनि 
संबगदसेनमिदगच्यते -- प्राणो 
मुख्यो वाब संवगः । स पुरुषो 
यदा यस्मिन्कार स्वपिति प्राण- 





अब आगे यह अध्यास अर्थात्‌ 
शरीरम संव्गद्॑न कहा जाता है । 
मुख्य प्राण ही संबगं है । यह पुरूष 
निस समय सोता है उस समय 
पराणको ही वाक्‌ इन्द्रिय प्रघ हो 


३७२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ जप्याय ४ 


>~ ~ व > 
मेव वागप्येति वायुमिवाग्निः | | जाती हे, जिस प्रकार ङि नि 


प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं दु । ता रणत हौ ह 


द. भराण्को ही श्रोत्र घौर प्राणको दही 
{ ण = ५ ९ 

मनः प्राणो (> पसमदेबैत- [मन माप्त हो जता है क्वे 

न्वागादीन्सवान्स्क्त इति | भाण ही इन वाक्‌ आदि स 


॥ ३॥ | अपनेमे ठीन कर छेता है ॥ ३॥ 


--ः 9 `~ 


तोवाणएतो द्धौ संवर्गो वायुरेव देवेषु प्राण; 
प्राणेषु ॥ ४ ॥ 


वेयेदो ही संवगं है--देवताओंमि वायु ओर इन्दियोमे भाण ॥५॥ 
.तोवाएतो द्वौ संब संव्‌- | वेयेदोही सवगं--संबन 
जनगुणो वायुरेव देवेषु संवर्ग; | गुणवारे है- देवता्मिं वायु दी 
प्राणः प्राणेषु वागादिषु | संवर्गं है तथा वाक्‌ आदि प्रणमि 
मुख्यः ॥ £ ॥ ८ इन्द्र्योमे ) मुख्य प्राण ॥ ४॥ 

संवगंकी सतुतिके ल्य आख्यायिका 
अथैतयोः स्तत्यथमियमा- | अव इन ८ वायु ओर प्रण ) 
की स्तुतिके स्यि आ्यायिका 
ख्यायिकारम्यते-- आरम्भ की जाती हे- 


अथ ह शोनकं च कपेयमभिषतारिणं च 
काक्षसेनिं परिविष्यमाणो बह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ 
ह न ददतुः ॥ ५॥ 


एक वार कपिगोत्रन शौनक ओर कक्षसेनके पुत्र अमिप्रतारीसे, 


जव कि न्द भोनन परोसा ना रहा था एक ब्रह्मचारीने भिक्षा मांगी 
कितु उन्हनि उसे भिक्षान दी ॥ ५॥ 


च्ड ३1 शाङ्करभाष्याथं ३७३ 
>< $ क 9 4 क क 2. ॐ 4 ऋ अ 


हतयैतिदया्थः, शौनकं च गुन- | ह" यह निपात पेत (परम्परा- 
गत कथानकं) का चोतक है । 
शोनक -द्युनकका पुत्र शोनक नो 
गोत्रमभिग्रतारिणं च नामतः | कि कषिय--पिके गोतम उसन 
व: हुमा था, उससे ओर ॒कक्षसेनक। 
क्षसेनस्यापत्यं काक्षसेनिं मोज- | पुत्र काक्षसेनि, जो नामे अमि- 
नायोपविषटौ परिविप्यमाणो | प्रतारी था, उससे,जव किं वे दोनो 
पकारेवचारी अहमनिच्छौण्डो | भोजने छिव चः च ओः रसो 
विभिष मिक्षितवान्‌ । वह द्वारा इन्द भोजन परोस्रा जा रहा 
था; अपनेको ब्रहमवेत्ताओं मँ शूरवीर 

चारिणो ब्रह्मविन्मानितां बुद्ध्वा ¦ सम्नेवाले एक व्रह्मचारीने भिक्षा 
तं जिज्ञासमानो तस्मा उ भिक्षां | मोगी । चारीक भे रवे हते 
सदतस , | अभिमानको जानकर यह जाननेक . 

न ददतुनं दत्तवन्तो इ किमयं | इच्छसे क धं यद कया कहता 


वक्ष्यतीति ॥ ५ ॥ दै उन्होने भिक्षान दी ॥५॥ 
स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार 
भुवनस्य गोपास्तं कपिय नाभिपदयन्ति मत्यां अभि- 
पतारिन्वहूधा वसन्तं यस्मे वा एतदन्नं तस्मा एतन्न 
दत्तमिति ॥ ६ ॥ 
उसने कहा- युवनोँके रक्षक उस एक देव प्रजापतिने चार 
महासमाओंको ग्रस ल्या है । हे कापेय | हे अभिप्रतारिन्‌ | मनुष्य 
अनेक प्रकारसे निवास करते हुए उस एक देवको नदीं देखते; तथा 
निक स्थि यह अन्न है उपे ही नहींदिया गया ॥ ६ ॥ 
स होवाच बरह्मचारी महात्म- | उस ब्रहमचारीने कहा--भंहात्नः 
ओर चतुरः” ये पद्‌ द्वितीया विभ- 
नश्तुर इति द्ितीयाबहुवचनम्‌ । । क्तिके बहुवचन है । उस एक शी देव 


कस्यापस्यं शौनकं कापेयं कपि- 


२.७४ 


छान्दोन्योपनिषद्‌ 


[ सष्याय ४ 


23 >9< > 9 9 8 9 4-5-55 8८-6- >>> 8 ~ ऋ > 


देव एकोऽन्यादीन्वायुर्बागादीन्‌ 
प्राणः, कः स प्रजापतिर्जगार 
ग्रसितवान्‌ कः स जगारेति 
प्रभनमेके । भुवनस्य भवन्त्य- 
स्मिन्‌ भूतानीति थूवनं भूरादिः 
सर्वो लोकस्तस्य गोपा गोपा- 
यिता रक्षिता गोपरत्यथः। तं 


क प्रजापतिं हे कापेय नाभि- 
परयन्ति न जानन्ति भर्त्या 


मरणधर्माणोऽविवेकिनो वा 
हेऽभिप्रतारिन्बहुधाध्यात्माधिदे- 
वताधिभूतप्रकारेवसन्तम्‌ । 


यस्मे वा एतदहन्यहन्यमद्‌- 
नायाहियते संस्क्रियते च तस्मे 


प्रजापतय एतदनं न दत्तमिति 
॥ & ॥ 


क--प्रजापतिने अर्थात्‌ वायुने 
आदिको ओर प्राणने क 
गर ल्या है। किन्दी-किन्दीका 
मत हे कि निसने ग्रा है वह 
देव कोन है ? इस प्रकार यह पश 
है । वह युवनक्षा-- निम भूत 
(प्राणी) आदि होते है उष 
मूर्छकं अ[दि समस्त लोकन 
सुवन कहते टै, उसका गोप-- 
गोपायिता अर्थात्‌ . रक्षा करनेवाला 
है। हे कापेय | उस क भर्थत्‌ 
प्रनापतिको अथवा हे अभिप्रतासि्‌। 
घनेक प्रकारसे यानी अध्यास, 
अधिदैवत ओर भधिभूत-मेदसे वास 
करते हुए उप्त देबको मत्य मरण- 
घर्मा मथवा अविवेकी पुरूष नही 
देखते । तथा जिसके भक्षणके 
ये नित्यप्रति इस अचका आहरण 
-संस्कार फिया जाता दै उस प्रना- 
पतिको ही यह अन्न नहीं दिया 
गया ॥ £ ॥ 


५ 
=-{ ० :- 


तदु ह शोनकः कापेयः प्रतिमन्वानः परत्येयायातमा 
देवानां जनिता भजानाहिरण्यद्‌ श्रो बभसोऽन- 
य. सुरिमहान्तमस्य मदिमानमाहुरनयमानो यदनन्नमत्तीति 

ंहाचारतिद गा 
१० नह्मचारिननदसु पास्महे द तस्मे भिक्षामिति॥७॥ 
उव वाक्यका कपिगोतोत्ल सौनकने मनन दिया ओर फिर उस 


[ बह्मचारी ] के पास आकर कहा 


-- जो देवतरार्ओंका आत्म, प्रनाजका 


४ 


श्रर्मष्याथ ३.७५ 


क ॐ ॐ = ॐ ॐ क क ॐ क ॐ = = > > 4 > 
उत्पतिता, हिरण्यद,भक्षणरीर ओर मेधावी दै, निकी बड़ी महिमा 
गयौ है, ो स्वयं दूसरोसे न खाया जानेवाा ओर जो वस्तुत 
अन्न नदीं दै उनको भी भक्षण कर्‌ जाता हे, हे ब्रह्मचारिन्‌ | उसीकी 
इम उपा्ना करते ई । [ पसा कहकर उसने सेवको अशा दौ कि] 
इस ब्रह्मचारीको भिक्षा दोः ॥ ७ ॥ 


ण्ड | 


तहु ह-बह्मचारिणो वचनं 
शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानो 
मनसालोचयन््रह्मचारिणं प्रत्ये- 
यायाजगाम । मत्वा चाद यं 
त्वमबोचो न पश्यन्ति म्या 
इति तं वयु पयामः; कथम्‌ ! 
आत्मा सवस्य स्थावरजङ्गमस्य, 


किश्च 


संहत्य ग्रसित्वा पुनजनितोत्पाद्‌- 
यिता बायुसूपेणाधिदेवतमण्न्या- 
दीनाम्‌ । अध्यात्मं च प्राण- 
स्पेण वागादीनां प्रजानां च 
जनिता । 


अथवात्मा देवानामभिवागा- 


दीनां जनिता प्रजानां स्थावर- 


जङ्गमानाम्‌। न 


ऽमग्नदघर इति यावत्‌ । बभसो 


कपिगोत्रोखत्न शोनक ब्रहमचारी- 
के उस्र वचनकी मनसे आरोचना 
कर ब्रक्षचारीके धमीप गया तथा 
जाकर इस प्रकार बोख-जिघके 
विषयमे तुमने कहा कि मत्येगण 
उसे नहीं देखते उसे हम देखते दै । 
किस प्रकार देखते है १ वह सम्पूण 
स्थावर-जङ्गमका भात्मो तथा अग्नि 
आदि देवतार्भोका उसततिकर्ता 
अर्थात्‌ अधिंदैवत वायुरूपसे अपने 
ठीन कर्‌ अमि आदिका पनः उन्न 
करनेवाला जोर अध्यास प्राण्पसे 
वागादि प्रनाओंकी उदत्ति कटने- 
वाला है। 
अथवा यो समञ्षो कि अम्न 


ओर वाक्‌ आदि देरवोका आता 
ओर स्थावर-जङ्गम प्रनार्थोका 


उलयत्तिकर्त है । दिरण्यदष्र-- 
अमूतदष्र अर्थात्‌ लिकौ डद 
कभी नदी द्रटती, "नभसः - 
मक्षणसीर, "अनसुरि- शरि 


भक्षणगरीलः । अनघरिः छरि्- | मेषावीको कहते दै, जो सूरि न 


8.७ 





धावीन ररिघरि्तत्मतिषेधो- 
ऽनघरिः घ रिशिवित्यथेः । महान्त- 


सतिप्रमाणमव्रमेयस्य प्रजापते- 


मेदिमानं बिभूतिमाहू्बहाविदः । 


छन्दोष्योवनिवद्‌ 


~ > >>> >8 >< ऋ नऋ 


| अष्याय ४ 
हो वह *अपूरि' कहता है उसका 
भी प्रतिषैध “अनघूरि, है अर्थ 
वह सूरि (धावी) हीहि । तहे. 
लोग हस प्रनापतिकी महती- अहि 
प्माणवारी अर्थात्‌ अप्रमेय महिमा 


विभूति बतलाते है; कर्यो यह्‌ स्वयं 
दूसरोसे अभक्ष्यमाण-- न खाया 
जानेवारा ओर जो अग्नि भादि देवता- 
माणो यदनन्नमग्निवागादिदेवता- रूप अन्न ८ दूसरोका अत्न नही ) 
है उसका णदन--भक्षण करता है। 
धै" यह अव्यय निरर्थक है | है 
निरथंकः । वयं ह ब्रह्मचारिन्‌ | वदाचारिन्‌ । हम इस उप 

रु्षणोँवलि त्रह्यकी दही उपासना 
आ इदमेवं यथोक्तरक्षणं बरह्म | करते है । उपाक्मदे' इस करियाकरा 

व्यवधानयुक्त "वयम्‌" इस कर्तापि 
वयमा उपास्महे । वयमिति व्य- | सममन्भ दै। कोई कोई [त्रि 

ननेदूुपास्महे' इसका शरक्षचारिन्‌ न 
वहितेन सम्बन्धः। अन्ये न बय- | इदम्‌ उपास्महे" देखा पदच्छेद कर] 


मिदघपास्महे, फं तदि १ परमेव | म इस ब्रहमको उपासना नही 


( 
यस्मात्स्वयमन्येरनधमानोऽमक्य- 


रूपमत्ति भक्षयतीति । वा इति 


ब्रहमोपारमह इति वर्णयन्ति । करते; तो क्रसकी करते है १ प्र 


दत्तास्मे मिकषामित्यवोचट्‌ भ 
स्यान्‌ ॥ ७ ॥ 


ब्रह्मी ही उपासना करते है-- 
एेसो व्याख्या करते है । फिर उसने 
सेवकरोसे कहा कि इसे भिक्षा दो, ॥७॥ 


© ॐ 


तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पथान्ये पञ्चान्ये दश 


दिक्ष्वन्नमेव द्रा कृतश्सेषा 


कषच्ड ९ |] क्ाङूर्माच्याथ ३७७ 
< > < ऋ ७ ७८ < < ऋ >< 1 ऋ ऋ आद ऋ ऋऋ १.4 


विराडन्नादि तयेद९सर्व॒दष्टश्स्वमस्येदं ष्टं भवत्य- 
न्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद्‌ ॥ ८ ॥ 


तव उन्होने उते म्क्षादेदी। वेये [ भन््ादि र वायु | 
पौच [ वागादिसे ] अन्य ह तथा इनसे [ वागादि ओर प्राण ] ये पच 
अन्य दै इस प्र्नार ये खव दश होते दै । ये दश त ८ कृतनामक 
पासेसे उपलक्षित यूत ) है । अतः सम्पूण दिशचाओमिं ये ज्र ही द 
त दै । यह विराट्‌ ही अनादी ( अन मक्षण करनेवास ) हे । उसके 
द्वारा यह स्तब देखा जाता है। जो पेसा जानता है उसके द्वारा यह सब 
देख किया जाता है भौर वह अन्न भक्षण करनेवासा होता है ॥ ८ ॥ 


तस्मा उ इ ददुस्ते हि|. त्व उन्दने उसे भिक्षादेदी। 
वैये अगि आदि, जो किं भक्षण 

भिक्षाम्‌। ते वै ये ग्रस्यन्तेऽग्न्या- करिये जति दै भौर जो उन्द भक्षण 
कृरनेवारा वायु हे -ये पवां वागादि- 

द्यो यश्च तेषां ग्रसिता वायुः से अन्य है तथा उनसे वागादि ओर 
षां ग्रसिता वायुः | प्राण-ये पच अध्यास अन्य ह । 

ये सव संख्याम दश होते है जर 
व दश होनेके कारण ये इत दै । 
तेभ्यः पश्चाध्यास्मं वागादयः | उनमें एक पाषा चार जङ्ोवाा 
| होता दै; उी प्रकार [अग्न आदि 
जर वागादि-ये ] चार है 

| निस प्रकार तीन अर्कवाखा पसा 
संख्यया, ट्श सन्तस्तत्कृत भवति होता ह उसी प्रकार [ अग्यादि 
ओर वागादिर॑से एक.एकको छोड्‌- 

कर्‌ ] रोष अन्न है । निस पकार 
दो अङ्कवास पासा होता हे उसी 


खथङ्काय एवं त्रयोऽपरे दरयङ्काय । ^ शर [ दो-दोको छोडकर 1. अन्य 


पश्चान्ये वागादिभ्यः तथान्ये 


प्राणश्च, ते स्वे दश भवन्ति 


ते । चतुरङ््‌ एकाय एवं चत्वारः 


४७८ 


[ बण्याब ` 


> < 9 9 9 8 9 2 9 - -9>8 --8ट ऋ (= 
एवं दावन्याविकाङ्ाय एवमेको- | अन ह पथा चिस पकार ए 


ऽन्य इति । एवं दश्च 


त्कृतं भवति । 


यत एवम्‌ , तस्मात्सर्वासु दिल 
दरशस्वप्यगन्याद्या वागाद्याश्च 
दशसंस्यासामान्यादमेव ।*८द्‌- 
ा्षरा विराट्‌" “'विराडन्नमू” 
इतिहि भ्रुतिः । अतोऽन्नमेव दश्च 


संख्यत्वात्‌ । तत एव दश्च छृतं 
कृतेऽन्तर्भावाचतुरङ्ञायत्वेनत्यवो 
चौम । सषा विराड्‌ दशसंख्या 


सत्यं चानादी-अन्नादिनी च 


भतातोऽ 
[तातोऽभमन्नादिनी च सा । 


अह्वाम पासा होता है उश 
प्रकार इनसे भिन्न [ वायु जौर प्राग 
--ये जन्नादी ] दहै । इस प्रक्षा 
[४,२३, २, १] ये घव मिरुक 
दश्च होनेके कारण ही कृत है । 


क्योकि एेसा दै, इतस सुमपूं 
यानी दो दिद्यार्थेमिं अम््यादि ओर 
वागादि-ये दश संख्याम समान 
होनेके कारण अन्न ही है । “विराट्‌ 
दरा अक्षरोवाला दै” “विराट्‌ अत्न 
है, सी श्रुति भी है । भतः 
दश संख्यावारे होनेके कारणः ये 
[ अन्न्यादि ओर वागादि ] शत 
ही है । इसीख्ियि ये दश्च इत ही 
दै, क्योकि चार मद्भवारा होनेसे 
हृतनामक पासेमे सब पार्घोका 
भन्तभवि हो जाता है- रेषां हम 
पहले कह चुके है । वह यह विराट्‌ 
देवता दशा संख्यावारी होती हुई 
अन्न ओर अन्नादी-अनादिनी अर्थात्‌ 


। अन्न भक्षण करनेवाटी हे, क्योकि 
कृतत्वेन । ते दि दशचसंख्यान्त- ' 


बह हृतखूपा है । सृते द्य 
संख्याका अन्त्माव दै, इसलिमि 
यह्‌ शन्न ओर अन्नादिनी दै । 


खण्ड र] 


छाहरभाष्याथं 


8७९ 


~ >9- 29-99-9८ >9८ ~ ~ 8 8 > ~ > 9 8 ~: 2 >: ऋ. ड < 


तथा विद्वान्दशदेवतात्मभूतः 


संवगवियायाः सन्विराट्त्वेन दक्न- 


स्बोपरन्धि- संख्यानं कृत- 


फठत्म्‌ संख्ययालादी च । 
तथान्ालादिन्येदं सवं जगदश- 
दिक्संस्थं दृष्टं कृतसंख्याभूतयो- 
पलन्धम्‌ । एवंबिदोऽस्य सवं 
कृतसंख्याभूतस्य दशदिक्संबद्ध 
ृष्ट्टुपलन्धं भवति । सिज्ाना- 


दश मवति य एवं षेद यथोक्त- 


दी । दवरम्यास उपासन- 
समाप्त्यथंः ॥ ८ ॥ 


इस प्रर जाननेवाखा उपाक 
दश्च देवताओंसे तादास्य प्राप्त कर्‌ 
दश्च संख्याके कारण विराटहूपसे 
अन्न जर्‌ इतरूपसे भन्नादी हो 
जाता है । इस प्रकार हृतसंख्यामूत 
उस अन्न ओर अन्नादिनीद्वारा दशो . 
दिङ्ञाओंसे सम्बद्ध यह सारा जगत्‌ 
दष्ट अर्थात्‌ उपरन्ध कर ड्या गया 
हे । इस प्रकर जाननेवाले इत- 
संख्यामूृत इस विद्वानको दर्शो 
दिशसे सम्बद्ध सबक द्ट यानी 
उपरन्ध हो जाता है । तथा पूर्वोक्त 
टृष्टिवाख जो उपासक हस प्रकार 
जानता ह बह मन्ना [वी्ाम्नि] भी 
होता षै । “य एवं वेद्‌ य एवं वेदः 
यह्‌ द्विरुक्ति उपासनाकी समािके 
स्यि है॥ ८॥ 


% 
--, ° :-- 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि चतुर्थाध्याये 
दतीयखण्डभाप्डं सम्पणोम्‌ ॥ ३ ॥ 





© 
तुथः खणड 
सत्यकामक्रा वह्मचर्य-पालन ओर वनम जाकर गो चराना 
सवं वागाब्गन्यादि चाना-| अन्न र अन्नादङ्पसे भरी 
प्रकार स्तुत हुए वागादि बैर 
अग्यादिद्प सम्पूर्णं अगत्को 
षोडशधा प्रविभज्य तस्मिन्ह्म- | कारणरूपसे एक कर र फिर उसके 
सोरट-विभाग कर उक ब्रह्मरष्टिका 
दृष्िविधातव्येत्यारभ्यते । श्द्धा- विधान करना है; इषीके छथि अ् 


प आरम्भ किया जाता है । बहाँनो 
¢ 
तपसोत्रहमोपासनाङ्गतव प्रदरोना- आख्याकिका है वह श्रद्धा ओर 


तपका ब्रह्मोपाप्तनाका अङ्ग 
याख्यायिका । प्रदर्शित करनेके स्यि हे । 
सत्यकामो ह जाबारो जवालां मातरमामन्त्रथा- 
चक्रे ब्रह्मचर्य भवति विवरस्यामि किंगोत्रो न्वहम- 
स्मीति॥ १ ॥ 


जबालके पुत्र सलकामने अपनी माता जबाला सम्बोधित रके 

निवेदन श्रिया पूज्ये | मँ बरह्मचयंपू्वक [ गुरुर्मे ] निवास करना 
चता ष [ चता ] मे कि गोत्रवाल दँ ¢ ॥ १ ॥ 

सत्यकामो ह नामतः, हशब्द हः शब्द इतिहासका। योतक 

= (~ £ 
तद्या; जबालाया अपत्यं | है । वालके पुत्रने, जो नामसे 
जावालो जबालां खां मातरमा- ० ९ | 
क। आमन्तित-सम्बोधित [ कर 

मन्त्रयाश्चक्र आमनि ॥ = 

९१ । निवेदन] किया--ह पूजनीये | म॑ 

स्वाध्यायग्रहणके ययि त्रहमचर्थपूरवक 

आचायजुर्मे निवासत कग । 


नादत्वसंस्तुतं जगदेकीङ्कत्य 


बह्मचयं स्वाध्यायग्रहणाय हे 
भवति विवत्स्याम्याचार्यङुले 





खण्ड ७ ] छाङकराप्या्थं १३८१ 
>>> धः क कक क = ॐ = र ॐ 2 = > = 95 4 


किंगोघ्रोऽदं किमस्य मम गोत्रं म किगोत ह् १ मेरा क्या गोत्र दै 
सोऽहं किमोत्र न्वहमस्मीति ॥१। अर्थात्‌ मे किंस गोत्रवाखा ह ४।१॥ 


--; ० 


एवं पृश-- ]) इस प्रकार पूष्टी जानेप्र-- 
सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्रोत्रस्स्रमसि 

बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने वामलमे साहमेतन्न 
वेद्‌ थद्रोत्रस्वमसि जबाखा तु नामाहमस्मि सत्यकामो 


नामत्व परसि स सस्यकोम एव जावा बवीथा इति॥२ ॥ 
उसने उससे कहा--े तात । त॒ जिस गोतरवाला हे उसे में नही 
जानती । पहके भँ पतिके धर आये हुए बहुत-से अतिथिर्योकी सेवा-टहलं 
करनेवाली परिचारिकः थी । [परिचयं संरन होनेसे गोत्र आदिकी ओर 
मेरा ध्यान नहीं था ] उन्दी दिनों युवावस्थामे जव मने तज्ञ प्रा क्रिया 
तुम्हारे पिता परलोकवासी हो गये, अतः उनसे भी पूछ न सको | 
इसल्ि भ यह नहीं जानती किं त्‌ किस गोत्रवाख है मे ते जवास 
नामवाली हँ जर तू सत्यकाम नामवाला है। अतः तू अपनेको सव्यक्ाम 
जाबारु' बतला देना ॥ २ ॥ 


जबाला सा हैनं पुत्र॒वाच-- | उस ड अपने उस पुत्रस 
- कहा-हे तात | निस गोत्रवाखा 
नाहमेतत्तव गोत्रं बेद, हे तात हे इतेरे गोच नही नानत / 


यद्धोतरस्त्वमसि । कस्मान्न वेत्सि १| क्यों नी नानती {--इ भकार 
जातमतिथ्यभ्यागतादि चरन्त्यहं | की बहुत हर करनेवारी मेँ परि 


परिचारिणी चारिणी-परिचर्या करनेवारी 
परिचारिणी. परिचरन्तीति परि न 1 


चणशीरेवाहम्‌, परिचरभवित्त- | भकार परिचयमिं चित्त लगा रहने 
तथा गोत्रादिस्मरणे ममर मनो | कारण गोत्र दिको यद्‌ रलनम मेश 


३८२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय # | 
च | 
नाभूत्‌ । यौवने च तत्काले तवा- ¦ मन नही था । तथा उस तुं 
मलभे रग्धवत्यस्मि । तदेव ते | युवावस्थमे ही मैन त प्रा्रिव 


पितोपरतः । अतोऽनाथाहं साद- | था । ती समय तेरे तितक्न | 
॥ „ | देशन्त हो गया । इससियि 
मेतन्न बेद॒यदोतरस्त्वमपि । सनाथा हो गयी जर इसीसे ग्ने | 
जबाला तु नामाहमस्मि र कुष्ठ पता नी कित्‌ क्षि | 
सत्यकामो नाम त्वमसि स स्वं | गोत्रवाल है । मे तो जवास नाम 


ह वाढ र जौर तू सत्यकाम नामना 


त्याचार्याय बुषीथाः, य्ाचा- [भावाय त्से पूष तो तु यही कह देन 
येण पृष्ट इत्यमिप्रायः ॥ २ ॥ । फ भ सत्यकाम जाबाल ह ॥२॥ 
स ह हारिदुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्य भगवति ` 
वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥ 
उसने हारिदुमत गोतमके पस जाकर कहा- प्य श्रीमान्‌के यहां 
नहचर्पूरक वास कलगा; एसीसे मापकी स्निधिमे माया हः ॥२३॥ 
स॒ह सत्यकामो हार्दम | उस सत्यकामने, जो गोत्रतः 
दरिदिमतोऽपस्यं हार्रिमतं गोतमं गौतम ये, छन ्ारिदुमत-हरिदुमानके 
गोत एय गत्वोवाच जह्ाचयं | एके पास नाक नर 
भगवति पूजावति तवयि वत्सया. | चनः लयवे यद नश 


स वास करूगा; इसीसे म आपकी 
म्यत उपेयायपगच्छेयं िष्यतया सन्निधिम उपसत्ति--रिष्यभावसे 


भगवन्तम्‌ ॥ ३ ॥ गमन करता ह ॥ २३॥ 


म रेक्-जे-अ-- 


इतयुक्तवन्तम्‌-- | इस भकार कहनवारे-- 
तदोवाच किंगोघ्रो लु सोम्यासोति स होवाच 


भो यद्रो्ोऽहमस्म्यप्च्छं मातरश्सा मा 
भत्यनत्रवीद्‌बहहं चरन्ती परिचारिणी योवने लामलमे 


कछण्ड 8 ] शाङ्करभाष्याथे ३८३ 
साहमेतन्न वेद यद्दोत्रस्त्वमसि जवाखा तु नामाहमस्मि 
सत्वक्षामो नाम तमसीति सोऽह श्सत्यकामो जावा- 


लोऽस्मि भो इति ॥ ४॥ 

उससे [गोतमने] कहा-े सोम्य ! तु किस गोत्रवाख है 2 उसने 
कहा--“भगवन्‌ । मँ जिस गोत्रवाला ह उसे नी जानता । मेने मातासे 
पूया था । उसने सुञ्ञे यहं उत्त द्विया कि 'पहके मँ पतिके घर भये हुए 
बहुतसे अतिथि्योकी सेवा-टहल करनेवाली परिचारिका धी [ परिचयमिं 
संरपर होनेसे हो गोत्र आदिकी ओर मेरा ध्यान नहीं रश ] । उन्हीं दिनों 
युवावम्थामे नव मैने तज्ञ प्रत सा | तुम्हारे पिता परोकवासी हो गये, 
अतः उनसे भी न पूछ सकी ], इट्यि भं यह नही नाती ङि तृ किस 
मोत्रवाला ष ? रै जाला नामाली दव ओर तू सत्यकाम नामवारा है 

अतः हे गुरो ! भे सयक्षाम जागार द ॥ ४ ॥ 
तं होवाच गोतमः-- किंगोत्रो | उसे गोतमने  कहा- ह 
सोम्य | तु किंस गोत्रवाला है ! 
नु सोम्यासि ! इति, विज्ञातङल- वर्योकि जिसके कुर ओर गोत्रका 


= चश पता हो उसी रशिष्यका उपनयन 
गोत्रः शिष्य उपनेतन्यः,इति पृष्ट करना चाद्ये । इस भकार पू 
प्रत्याह सत्यकामः । स | नानेपर्‌ स्यकामने उत्तर दिया | 
ल्ेवाच नाहमेतद्वेद भोः, यदधो- | द बोला--“भगवन्‌ | म निस 
= गोत्रवाला ह उसे नहीं जानता 
्रोऽहमस्मि, किं तवपृच्छं पृष्ट | तु मैने मातस प॒ श, 
वानस्मि, मातरम्‌; सा मया म र ध 
. | यदी उत्तर दिया बहुत- 

पृष्टा मा प्रत्यत्रवीन्माता-बहवहं | अतिथिर सेवा-खहर करनेवाटीः 


चरन्तीत्यादि पूर्ववत्‌ । तस्या | इ्यादि पूववत्‌ समक्चना चाहिये । 


स | शे उसके वे वचन याद दैः 
अहं वचः स्मरामि, सोऽहं सत्य- | अत; हे गुरो | भ सल्यकाम जाबाल 


कामो जाबालोऽस्मि मो इति ॥४॥ £ ॥ ४ ॥ 


~ म० सरग 


३८७ छान्दोग्योपनिषत्‌ [ मण्या 8 


न | 
मर्हति | 

तश्टोवाच नैतदबाह्यमणो विवक्तुमर्हति समिधः | 
सोम्याहरोप सा नेष्ये न सस्यादगा इति तमुपनीय 


छृशानामवकतानां चतुःशता गा निराज्कत्योवाचेमाःसोभ्याः | 
नुसंबजति ता अभिधस्थापयन्चुवाच नासहसरेणावते | 
येति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यद्‌ सहस संपेदुः॥५॥ | 


उससे गोतमने कहा --्ेसा स्पष्ट भाषण छोई ब्राह्मणेतरः नहींक्‌ | 


सकता । जतः हे सोम्य ! तू समिधा ठे जा, भँ तेरा उपनयन कर दग, 


कङ तृते सलक व्याग नही किया | तव॒उसतका उपनयन कर च॒, 


सौ छृश ओर दुबल गौर अरग निकालकर उससे कटा- सोम्य | तून 
गोमके पीछे जा । उन्दँ ठे नाते समय उसने कृहा-ईनकी एक सहस 
गाये हए बिना भे नहीं ल्हगाः जव तक क वे एक सहस हुई वह बहुत 
वर्षेत बनमें ही रहा ॥ ५॥ 


तं होवाच गोतमो नैतद्चो- | उत गोतमने कहा- शसा 


सरलाथयुक्त वचन विरोषतः कोई 
ह अत्राह्मण नहीं बोर सकता, क्योकि 
वाथसयुक्तम्‌ । ऋजवो हि ब्राहम- | त्राण तो स्वभावतः दी सरर हेते 

। है, जीर रोग नही | क्योकि त्‌ 
शा नेतरे सवभावतः । यस्मात त्राह्मणजातिके धभ सत्यसे विचलित 
अथात्‌ अष्ट नहीं हुथा, अतुः मे त 
अतो बाणं तवाु- | वराहणका उपनयन-संस्कार कग । 
पनेषयेऽ्तः संस्काराथं होमाय | इसरियि दे सोम्य ! संस्कारं होम 


व क्रनेके ठेआ॥' 
समिधं सोम्याहरेतयक्त्वा तसु- | एवा क श करनेके 
पनीय कच्ानामवहानां गो- अनन्तर उसने गोभोके युमसे 


ऽब्राह्मणो विषेण वक्तुमत्याज- 





सत्यादुब्राह्म णजातिधर्मादगा ना- 
पेतवानसि, 





खण्ड ७ | शाङ्करमाष्याथं 4 
39 9699-9 < आट 9 ल अ~ 39 - ् 


युथान्निराृत्यापकृप्य _ चतु | चार सौरा ओर नि ७ ८ 
कता चत्वारि शतानि गवा- | सर्ग निकारकर उसे क्च कृ 
शि. - न 
यवाचेमा गाः सोभ्यानुसंत्रजा- | सोम्य | तू हन गोओंका जद्षुगम “ # 
नुगच्छ । कर्‌--ईइनके पीठे-पीठे जा ।' चे ^4 04148 , 
इत्युक्तस्ता अरण्यं प्रत्यभि- इस प्रकार कहे जनेपर छन्द 
प्रस्थापयन्तुवाच नासदसरेणा- | वनक्री ओर हँकते इए सत्यकामने 
कहा--विना एक सदस हए 
अर्थात्‌ इनकी एक सहस्र संख्या 
्रत्यागच्छेयम्‌ । स एवशुक्तवा | पूरी हुए बिना भ नही लेगा 
गा अरण्यं तृणोदकवहुलं दन्द- , रेषा कंद बद उन गोर्ोको एक 
रहितं प्रवेश्य स॒ह वपगणं वने, निम किं तृण ओर जककी 


थी तथा जो सवथा द्रन्‌ 
भे अधिकता 
वास प्रोषितवान्‌ । ताः | रित था, ठे गया जोर व्षोतक-- 


सम्यम्गावो रक्षिता यदा यस्मि- | बहुत कारुपयन्त, वतक कि सम्यक्‌ 
न्काले सहस्रं संपेदुः संपन्ना | प्रकारसे रक्षा की हु वे गोए एक 
बभूवुः ॥ ५ ॥ सहस हुई, वहीं रदा ॥ ५ ॥ 


--अ-व्टन्-^८ 9 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये 
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम्‌ ॥ ४ ॥ 











पूर्गैन सहस्रेण नावर्तय न 





पञ्चम चण्ड 
वृषभद्रारा सत्यकामकी बह्यके प्रथम पाद्का उपदेश 


तमेतं श्रद्रातपोभ्यां सिद्धं| श्रद्वा जीर तपसे सिद्ध हए उष 


ति इस सत्यकामसे दिक्सम्बन्धिनी 
वायुदेवता दिक्सम्बन्धिनी तुष्टा | वायुदेवता संतुष्ट होकर शऋषम 


न ८ सोँड ) मेँ अनुप्रविष्ट हुई अर्थात्‌ 
सत्युषभमयु्रावरयषमभावमाप- उसषपर इषा करनेके स्यि श्षम- 


न्नानुग्रहाय । भावके प्राप इई । 
अथ हेनश्रषभोऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति 
भगव इति ह प्रतिशुश्राव पास्ाः सोभ्य सहस्र स्मः 
प्राप्य न आचायङकुलम्‌ ॥ १ ॥ 
तब उससे सांडने सत्यकाम | पे कदा । उसने भगवन्‌ |" 
फसा उत्तर दिया । [ वह बोला- ] हे सोम्य | हम एक सहल हो 
गये दहै, अव तृ हम ाचार्यकुरमे पषा दे, ॥ १ ॥ 
अथ॒ दैनमृषभोऽभ्युवादा- | ` तब उससे सांडने सकाम 
भ्युक्तवान्सत्यकाम २ इति | इस प्रकार सम्बोधन करते हए 
संबोध्य, तमसौ सत्यकामो | कदा । उते सत्यकामे भगवन्‌ | 
सगव इति इ प्रतिशुभाव प्रति- | एेसा कहकर भ्रतिविचन-- रुर 
वचनं ददौ । ब्रापताः सोम्य | दिया । [घोडे कडा] द सोप् । 
सदस स्मः, पणां तव प्रतिज्ञा, | हम एक सदस हो गये है, तरै 
अतः प्रापय नोऽस्मानाचारय- | मतिज्ा पूरी हो गयी; अतः भब तु 
इरम्‌ ॥ १ ॥ ह्मे आचाय॑कुरमे पर्हैचा दे' ॥१॥ 


"ग्यः ~ 


खण्ड ५. ] द्याहकरभाण्वाथं ३८७ 
आ 9-9-9८ 9-7-99 9 9 9 8 9 
किं च- | तथा- 


ब्रह्मणश्च ते पादं वाणीति व्रवीतु मे भगवा- 
निति तस्मे होवाच प्राची दिक्खा प्रतीची दिक्खा 
दक्षिणा दिक्रलोदीचो दिक्ररेषं वे सोम्य चतुष्कलः 
पादो ब्रह्मणः पकारावान्नाम ॥ २ ॥ 


६ च ॥ 1 

[ क्या ] मेँ तुञ्च ब्रह्मका एक पाद बतलाऊ" ! तन [ सत्यकामने ] 
कहा- "भगवान्‌ सुञ्ञे [ अवदय ] बतखवे ॥ सोंड उससे बोका-- पूवं 
दिक्षा, पश्चिम दिक्घला, दक्षिण दिकसा ओर उत्तर दिक्कला, हे सोम्य | 


यह्‌ त्ह्मका ्रकारावान्‌! नामक चार कलार्मोवाखा पाद्‌ हैः ॥ २॥ 


अहं ब्रह्मणः परस्य ते तुभ्यं 
पादं त्रवाणि कथयानि १ 
इत्युक्तः प्रत्युवाच ब्रवीतु 
कथयतु मे मद्यं भगवान्‌ । 
इत्युक्त ऋऋषभस्तस्मं सत्यका- 
माय होवाच प्राची दिकला 
ब्रह्मणः पादस्य चतुर्थो भागः 
तथा प्रतीची दिकलां दक्षिणा 
दिकलोदीची दिकठेष वै सोम्य 
ब्रह्मणः पादश्चतुष्कलश्तसः कला 
अवयवा यस्य सोऽयं चतुष्कः 
पादो बरह्मणः प्रकाशवान्नाम 
प्रकारवानित्येव नामाभिधानं 


८ (= 

[ क्या ] में तञ्चपे परब्रहमका 
एक पाद बतखऊ~- करर एसा 
कहे जानेपर सत्यकामने . उत्तर 
दिया-- "भगवान्‌ मुञ्चे [ अवय |] 
बतलावं ॥ इस भ्रशनार कटे जानेपर 
सांडने उस सत्यकामसे कहा - पूव 
दिका उस ब्रहमके पादका चौथा 
भागदै। इसी प्रकार पश्चिम 
दिक्कला, दक्षिण दिला ओर उत्तर 
दिका दै--हे सोम्य । यह ब्रहम 
चतुष्कलपाद दै-- जिसमे चार 
कर्ण अवयव है एेसा यह बह्यका 


प्रकाशवान्‌ नामका अर्थात्‌ भक्रा्च- 


वान्‌ यदी निसका नाम दै [ देस 
एकं पाद है ] | इपी प्रकार ब्रह्मके 


यस्य । तथोत्तरेऽपि पादाञ्लय- | आगेके तीन पाद भी चार कलर्ओं- ` 
श्वतुष्कला बरह्मणः ॥२॥ वरे ही-रहै ॥ २॥ 


छाः उ० ९२-- 


६८८ छान्दोम्योषनिषद्‌ [ लष्याय ४ 


> > ~ 8 3 8 ~ ~ क 0 9 ~ > 9 
स य एतमेवं विद्राश्थतुष्कटं पादं बह्मणः 
प्रकाङावानिस्युपास्ते प्रकाशवानरस्मिररोके भवति 
प्रकारावतो ह॒ खोकाञज्जयति य एतमेवं विद्रा<्तु- 
ष्कटं पादं बरह्मणा; प्रकारावानित्युपास्ते ॥ ३ ॥ 


वह, जो इस प्रकार जाननेवाखा पुरुष व्रह्मके इस चुतुष्फरर पादकौ 
श्रकारावान्‌" इस गुणसे युक्तं उपासना करता है, इस रोक प्रकाशवान्‌ 
होता है ओर प्रकाशवान्‌ छोकोक्रो जीत छेतादहै, नो करि इसे इस 
प्रकार जाननेवाखा पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्क पादकी श्रकाशवान्‌ः इस 
गुणे युक्त उपासना करता है ॥ ३ ॥ 


स यः कश्चिदेवं यथोक्तमेतं | वह, नो कोई विद्वान्‌ ब्रहम 
ब्रह्मणश्चतुष्कलं पादं बिद्रान्प्र- | इस ॒चतुप्कल पादको इस प्रकार 
काशवानित्यनेन गुणेन विशि- | काशवान्‌। ह भ 

= ए | उ ता है उसे यह 
पास्ते तस्येदं फलं प्रकाशवा- | < करता 


= 8 मिलता दहै कि वह इस लोकं 
ल्लोके भवति प्रख्यातो द ए 
. | प्रकाशवान्‌ अर्थात्‌ विख्यात होता 


पीर ९, ष 
था ल हे । तथा अदृष्टफक यष्ट होता दै 


काशवतो इ रोकान्देवादिसि- | क वह मरनेपर देवतादिसं सम्बद्ध 


म्बन्धिनो खतः सञ्जयति । भ्कारवान्‌ छोकोको नोत केत टै, 
्रामोति । य एतमेवं विद्ांधतु- । नो विद्वान्‌ कि इस प्रकार ब्रहमके 
ष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानि- | इस ॒चतुष्करपादकी भरकाशवान्‌' 
त्युपास्ते ॥ ३ ॥ ¦ इस खूपसे उपासना करता है ॥२॥ 





इतिच्छान्दोम्योपनिषदि चतुर्थाध्याये 
पञ्चमसण्डमाष्यं सम्पणंम्‌ ॥ ५ ॥ 


--‡ ० ‡-- 


क खणड 


-भ व्छव्व्क$--- 


अगनिनिद्रारा ब्रह्मे दवितीय पदका उपदे 
अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह शोभूते गा अभिषस्था- 
पया्कार । ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्रागनिसुपसमा- 
धाय गा उण्शष्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः श्राड्- 


पोपविवेश ॥ १ ॥ 


“अग्नि तुज्ञे [ दूसरा ] पाद्‌ बतलवेगा"-रेसा [कहकर दृषभ मोन 
हो गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको [ गुस्करुलकी ओर ] होक दिया। 
वे सायंकालमे हँ एकत्रित इई वहीं अग्नि प्रञ्वङ्ति कर गौर्मोको रोक 
समिधाधान कर भग्निके पश्चिम पूर्वाभियुख होकर बैठ गया ॥ १ ॥ 


सोऽग्रिस्ते पादं बकतेत्युपररा- 
मषभः । स सत्यकामो ह श्वोभूते 
परेदनैत्यकं नित्यं कमं त्वा 
गा अभि प्रस्थापयाञ्चकाराचाय- 
दलं प्रति । ताः श्नेशवरन्त्य 
आचायंङ्रमिभुख्यः प्रस्थिता 
यत्र यसिमिन्काके देशेऽमि सायं 
निशायामभिसंबभूवुरेकत्राभि- 
ख्यः संभूताः । तत्राग्निषुप- 
समाधाय गा उपरुध्य समिधमा- 
धाय पश्चादग्नेः प्राडुपोपविवेश 
ऋषभवचो ण्यायन्‌ ॥ १ ॥ 


वह सांड (अनि तुञ्चे दूसरा] 
पाद बतखवेगा-एेसा कहकर मोन 
हो गया । दूसरे दिन सत्यकामने 
नैत्यक-- नित्यकमं रनेके अनन्तर 
गौओंको गुर्कुरुकी ओर चल दिया। 
वे गुरुकुरुकी जोर धीरे-धीरे चरती 
हई जिस समय ओर जिस स्थाने 
अभि सायम्‌--रातमे एकत्रित हुईं 
वहीं अग्नि स्थापित कर गौ्ओको 
रो समिधाधान कर सोंडके वचनं 
को याद्‌ करता हा अग्निक पश्चिम 
पूर्वाभि होकर बैठ गया ॥ १॥ 


कय 9 @ > > 


तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति 


ह प्रतिशुश्चाव ॥२१ 


३९० छाम्दोम्योपनिषंष्‌ [ मध्याय ४ 


ॐ ॐ कक क क 9 क क क अ 9 क 9 9 कक = ॐ 4 4 >४ 
उससे अग्निने सत्यकाम | पसा कंडा । तव उग्नने "मगवन्‌ |! 
प्सा प्रलयुत्तर दिया ॥ २ ॥ 
तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ | उससे अग्निने सल्यकाम | 
इति संबोध्य, तमसो सत्यकामो , इस प्रकार सम्बोधन करते हुए 
भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्रति- | कदा । उसे सत्यकामने “भगवन्‌ |' 
वचनं ददो ॥ २॥ ठा प्रयुत्तर दिया ॥ २ ॥ 
--{ (1 १--~ 
ब्रह्मणः सोभ्य ते पादं वाणीति ब्रवीतु मे 
भगवानिति तस्मे होवाच प्रथिवी कङान्तरिक्षं कला . 
दयोः कछा समुद्रः केष वे सोम्य चतुष्कः पादो 
ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥ 
^हे सोम्य | मं तुस ब्रह्मका एक पाद बतलाञॐ  [ सव्यक्रामने 
कहा-- ] “भगवान्‌ मुञ्चे [ भवरय ] बतखयें ।' तब उसने उससे कहा-- 
“थिवी कसा दै, अन्तरिक्ष कला दै, यलोक कख दै ओर समुद्र कला 
है। हे सोम्य ! यह बरहषका चतुष्क पाद अनन्तवान्‌' नामवारा दै" ॥२॥ 


ब्रह्मणः सोम्य ते पादं वा- 
णीति ब्रवीतु मे भगवानिति 
तस्मे होवाच पृथवो कला- 
न्तरिषं कला चोः कला समुद्रः 
कलेत्यात्मगोचरमेव दशंनम- 
ग्निर्रवीत्‌ । एष वै सोम्य 
चतुष्कलः पादो नक्षणोऽनन्त- 
वानाम ॥ ३ ॥ 


दे सोम्य | मँ तुञचे ब्रह्मका एक 
पाद बतरऊं [सत्यकामने कदा] 
भगवान्‌ मुञ्ञे बतकविं ।' तब उसने 
उससे कहा-“एथिवी कटा दै, 
अन्तरि कला दै, युरोक कला है 
जर मुद्र कला दै"- इस प्रकार 
अग्निने अपनेसे सथ्वद्ध॒दशनका 
निरूपण किवा-हे सोम्य | यद 
नरक्मका चार कखा्ओंवाख पाद 
ˆ अनन्तान्‌" नामबाल दे" ॥ ३॥ 


--2 र 
४ © न 


क्ख ६] छखाहरभाण्वाश ३९१ 
4 -2-4 = ॐ ॐ > क ॐ @ @ ॐ ॐ @ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 4 


स य एतमेवं विद्राश्श्तुष्कटं पादं ब्रह्मणोऽ- 
नन्तवानित्यपास्तेऽनन्तवानस्मिंहछोके भवत्यनन्तवतो 
ह खोकाज्ञयति य॒ एतमेवं विद्ारश्वतुष्कलं पादं 
बरह्म गोऽनन्तवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ 


वहू, जो इसे इस प्रकार जानेवाला पुरुष नह्मके इस चतुप्कल 
पादको “भनन्तवान्‌" इख गुणसे युक्त उपासना करता है उह इम लोकम 
अनन्तवान्‌ होता है ओर अनन्तवान्‌ ोरकोको जीत छता है,जो कि 
इसे इस प्रकार जाननेवाख पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्क पादक “अनन्तवान्‌” 
इस गुणसे युक्त उपासना करता दै ॥ ४ ॥ 


सयः कृश्चियथोक्तं पादम- | वह, जो कोर पुरुष उप्यक्त पाद्‌- 


नन्तवचवेन गुणेनोपास्ते स क़ अनन्तवत्त्व गुणसे युक्त मु 
कृता है वह इस ठेोकर्म उसी 


(र ` भवत्यस्मिन्लो 
तथैव तद्गुणो मवत्यस्मिन्रोके परकार-उ्षी गुणवाङा हो जाता दै, 
भृतश्वानन्तवतो ह॒ लोकान्स | तथा मरनेपर अनन्तवान्‌ लेके 

जीतछ्तादै, जो कि इसे इस 
जयति य॒ एतमेबमिल्यादि प्रकार जाननेवाख पुर्ष--इत्यादि 
पूववत्‌ ॥ ४ ॥ शेष अर्थ पूर्ववत्‌ है ॥ ४॥ 
[0 


इतिष्छान्दोम्योपनिषदि चतुथाभ्याये 
षष्ठसखण्डमाप्यं सम्पूणेम्‌ ॥ ६ ४ 
९.-><<2 ॐ > 


खक सकर 
हंसद्वा्य बह्मके त्रतीय पादक उपदेश्च 
हश्सस्ते पादं वक्तति स ह श्वोभूते सा अभि. 
परस्थापयाचकार ता यत्राभि सायं वभूवुस्तत्रागनिसु- 
पसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः 
प्राङ्पोपविवेदा ॥ १ ॥ तरह <स उपनिपत्याभ्युवाद 


सत्यकाम ३ इति भगव इति ह ध्रतिशुश्राव ॥२॥ 
दंस तुज्ञे [ तीसरा ] पाद वतरवेगा' एेसा [ कहकर अग्नि निवृत्त 
हो गया ] । दुसरे दिन उसने गोर्थको आचार्युलंक़ी जोर दोक दिया। 
वे सायङ्काल जहाँ एकत्रित ईं वह उसी जगह अग्नि प्रस्वरिति कर, 
गोजको रोक ओर समिधापान कर अग्निके पश्चिम ॒पर्वामिुल होक 
बेटा ॥ १ ॥ तव हंसने उदके. समीप उतरकर कहा- सत्यकाम ॥ 
उसने उत्तर दिया--भगवन्‌ | ॥ २ ॥ 
सोऽग्निहंसस्ते पादं वक्तेत्यु-) वह अग्नि (हं तज्ञ तीसरा 4द 
क्तवोपरराम । ईस आदित्यः, | बतरवेगा' देसा कहकर उपरत दो 
शोक्रयात्यतनसामान्याच्च | | "शा । यन त ४.। 
स ह श्वोभूत इत्यादि समा- दोनेके कारण यँ आदिव्यको हंस 
शत इत्या समा- | कडा गया हे। स ह श्वोभूते, आदि 
नम्‌ ॥ १-२॥ । वाक्यका अथं पूर्ववत्‌ है ॥१-२॥ 
बरह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति वीतु मे 
भगवानिति तस्मे होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्र 


कला विथयुत्कलेष वे सोभ्य चतुष्कलः पादो बरह्मणो 


ज्योतिष्मान्नाम ॥२॥ 


ल्च्छ र £ > 
हण्ड ७ ] शाङ्रमाष्याथ ३९ 
9-99-9 9-99-9 9 ~ 9 99 ~ "3 9 ---9 - 


[ हंसने कदहा-- ] हे सोम्य | मँ तचे ब्रह्मका पाद्‌ वतरा 
[ खत्यकाम बोख-- ] भगवान्‌ मुञ्े वतर ॥ तव वह उससे बोख-- 
“अभ्नि कठा दै, सूयं कटा दै, चन्द्रमा कला है ओर वियत्‌ कला है । 
हे सोभ्य ! यह व्रह्मा चतुष्क पाद भ्योतिप्मान्‌? नामवारा है" ॥२॥ 
स च पतमेवं विद्राश्चतुष्कटं पादं ब्रह्मणो 
स्योतिष्मानित्युपास्ते उ्योतिष्मानस्भिखोके भवति 
उ्योतिऽमतो ह खोकाज्ञयति य एतमेवं विद्रार्तु- 
ष्कलं पादं ब्रह्मणो उयोतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ 
जो कोई इसे इस प्रकार जानेवाला पुरम ॒तब्रह्मके इस चतुष्कलं 
पादक “योतिष्मान्‌' पसे गुणसे युक्त उपासना करता ह वह इस शोकम 
ज्योतिष्मान्‌ होता है तथा ज्योतिष्मान्‌ लोकोको जीत ठता है, जो कोड 
कि इसे इस प्रकार नाननेवाख पुरुष ॒ब्रहमके इस॒चतुष्करु पादफो 
ज्योतिष्मान्‌" एसे गुणसे युक्त उपासना करता हे ॥ ४॥ 
अभिः कला खयः कला चन्द्रः | “जमन कला दै, स्यं कला है, 
मला तिचुतकंब वै सोम्येति | चन्द खा दे, र एला ३ ह 


र सोम्य यह” इत्यादि वाक्यसे उसने 
ज्योति्विंषयमेव च देनं प्रोवा- | ज्योतिरविपयक दरश॑नका ही निरूपण 


चातो दंसस्यादित्यत्वं प्रती- | क्या हे; थ हंसका आदित्यत्व 

विहर --च्योिष्मा- | ९ होता दहे । इस प्रकारके 
वअ विद्ानूको प्रा होनेवाला फल-- 
न्दीपषयुक्तोऽस्मिन्छोके भवति । | वह इस लोकम ज्योतिप्मान्‌-- 
चनद नां ज्योतिष्मत | दीपियुक्त होता दहे तथा मरनेपर 
५८८५ रे ~ | चन्द्र एवं आदिव्यादिके ज्योतिष्मान्‌ 
एव च त्वा छकाञज्ञयात; | ठोककि दी नीत रेता है । अगे- 


समानयुत्तरम्‌ ॥ ३-४ ॥ का अथं पूर्ववत्‌ दै ॥ ३-४ ॥ 


--: ° :- 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुथाध्याये 
ससमलरण्डभाष्यं सम्पणेम्‌ ॥ ७॥ 


-- ~क 


ष्मः च्कणड 


मद्गुद्रारा वह्मके चतुथं पाद्का उपदेश 


मद्ये पादं वक्तेतिस ह श्वोभूते गा अभिपरस्था- 
पयाधकार ता यत्राभि सायं बभूुस्तज्ाग्निसुपसमाधाय 
गा उपर्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः पराड्पोपविवेरा ॥१॥ 


“मद्गु तुञ्े [ चौथा ] पाद वतठावेगा' रसा [ कहकर हं चला 
गया  । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुर्कीो आर हक दिया । व 
सायकार्मे जहां एकत्रित हुई" वहीं अमि प्रज्वलित कर गार्योक्ो रोक 
समिषापान कर जभ्निके पीछे पूरवाभिमुख होकर वै गया ॥ १ ॥ 


हंसोऽपि मद्गुष्टे पाद्‌ वक्तं- | हंस भी भदूणु दङ्े [चौ ] 
पाद्‌ बतरवेगाः एसा कहकर चला 
गया। मदगुः जलचर पक्षीको कहते 
स चाप्सम्बन्धास्ाणः । स ह | दै; नरपे सम्बन्ध होनेके कारण वह 

प्राण ही है । सह श्वोमूतेः इत्यादि 
शोभूत इत्यादि पूववत्‌ ॥ १ ॥ | वाक्यका तात्प पूर्ववत्‌ है ॥ १ ॥ 


त्युपरराम । मद्गुरुदकचरः पक्षी 


तं मदयुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति 
भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २॥ 


मदुगुने उसके पास उतरकर कहा--'सत्यकाम | तव उसने 
उत्तर दिया भगवन्‌ | ॥ २ ॥ 


खण्ड ८ 1 श्याङ्करभाष्याथं ३९५ 


>8<-9 < क 2 8: > + < 9८ -8 -9: -- (ऋ < ऋ < < ऋऋऋ 


ब्रह्मणः सोभ्य ते पादं वाणीति वीतु मे 
भगवानिति तस्मे दोवाच प्राणः कटा चन्तुः करा 
श्रोत्रं कडा मनः करेष बे सोम्य चतुष्कलाः पादो 
ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३ ॥ 

[ मद्गु बोका-] हे सोम्य । मेँ तुचे ्रहमका पाद्‌ बतलाऊं 


[ सत्यकाम गोका--] भगवान्‌ सुस्े बतलावें ॥ तव वह उससे बोख-- 
प्राण कला दै, च्च कला दै, श्रोत्र करा है जर मन कला है । हे 


` सोम्य | यह्‌ बरहषका चतुष्क पाद्‌ “आयतनवान्‌! नामवाला है" ॥ २ ॥ 


स च मदृगुः प्राणः स्वविषय- | उस मदृशु यानी प्राणने भी भाण 
5 कला दैः इत्यादि (जायतनवान्‌' इस 
मेव च दशनुवाच प्राणः | नामवाा पाद दै, सा कहकर 


करेत्याद्यायतनवानित्येवं नाम। | पनेसे सम्बद्ध दर्नक्षा ही निहूपण 
किया । समस्त इन्दिर्योद्रारा ्रहण 
किये हए भोर्गोका आयतन मम ही 


ए है, वह जिस पादमं विद्यमान दै 
विद्यत इत्यायतनवाम्ाम | बं पाद “आयतनवान्‌ नामबाला 


पादः ॥ २-२ ॥ है ॥ २-३ ॥ 


आयतनं नाम मनः सवेकरणो- 
पहतानां भोगानां तद्यस्मिन्पादे 


ू ५, 
न> @ नक 


स य एतमेवं विद्रा<श्चवुष्कटं पादं बह्मण 
आयतनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिंहछोके भवत्याय- 


तनवतो ह खोकाज्ञयति य एतमेवं विद्राश्थतुष्कलं पादं 


ब्रह्मण आयतनवानिद्युपास्ते ॥ ४ ॥ 


३९६ छाग्डोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय ४ 


>< 9 > ~ 9 9८ 8 95 ¬ 9 ~ 95 5 5-9-9८ 9-8८-3 ऋः 
वह जो इ प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रकषके इस चतुष्क पादकी 
“जायतनवान्‌ः से गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोक 
(आयतनवान्‌ होता है ओर आयतनवान्‌ रोकोको जीतसेता दै, नो 
कोई कि इसे इस प्रकार जाननेवाखा पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्क पादकी 
आयतनवान्‌ एेसे गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥ 
तं पादं तथेबोपास्ते यः स | उस्र पादकी नो उी प्रकार 
आयतनवानाश्रयवानस्मिल्लोके | उपासना करता है वह इस रोकं 
भवति । तथायतनवत | आयतनवान्‌--आश्रयवाा होता 
श॒ लात) तथा मरनेपर अयतनवान्‌- 
अवकाशयुक्त रोर्कोको ही जीतता 
जयति । य एतमेवमित्यादि | दै । “य एतमेवम्‌ः इत्यादि वाक्य 
वत्‌ ॥ ४ ॥ का अर्थ पूर्ववत्‌ है ॥ ४॥ 


[र ~) 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाभ्याये- 


ऽष्टमखण्डभाष्यं सस्पर्णेम्‌ ॥ ८ ॥ 


| ब 


नकषः सण्ड 


५ 
--- ० {~ 


, सत्यकामका आचाय॑कुलमे पहचकर आचायंद्रारा 
पुनः उपदेश्च ग्रहण करना 


स एवं ब्रह्मवित्सन्‌-- इस प्रकार वह ब्रह्मवेत्ता होकर-- 
प्राप हाचार्थङ्कटं तमाचर्योऽभ्युवाद सस्यकाम 
३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ ९ ॥ 


नाना पर्वा । उससे आचायंने कहा -'सयकाम | तब 
उद्वे उत्तर दिया--“मगवन्‌ | ॥ १ ॥ 





प्राप ह॒ प्राप्वानाचायं- | आचायकुरमपरहैवा । उससे 
कुलम्‌ । तमाचाययोऽम्युवाद | माचायने सल्यकाम ।' पसा कहा । 
सत्यकाम ३ इति ।- मगव इति | तब उसने “भगवन्‌ [ पसा उत्तर 
ह प्रतिञुध्राव ॥ १ ॥ दिया ॥ १॥ 





ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु तानुशाशासे 
त्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवारस्त्वेव मे. 
कामे ब्रुयात्‌ ॥ २॥ | 

दे सोम्य | तू ब्रहमवेत्त-सा भाषित हो रहा दै; त्े किसने 


उपदेश दिया है ® टेसा [ आचार्यने पूछा ] तब उसने उत्तर दिया 
नुष्योसे भिन्न [देवतार्ं] ने .मञ्ञे उपदेश दिया है, भव मेरी इच्छाके 


, अनुसार ाप पून्यपाद ही सुसे विघाका उपदेश कर" ॥ २ ॥ 


ब्रह्मविदिव वै सोभ्य मासि । दे सोम्य | तु त्रहवे्ता-सा 
मासित हो रहा दै ॥ इतां ब्रह्म 
प्रसन्नेन्द्रियः प्रदधितबद्नश्च । वैचा ही भषन्ेन्दिय, दसथु्त उल 


३९८ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्याय ४ 


० क क > = = क = 9 9 क 2 क 9 ॐ. ॐ ॐ + 4 ऋऋ 


निधिन्तः कृताथोँ जह्यविद्धवति | वाखा जर चिन्तारदित हुमा करता 
अत॒ आचार्यों ब्रह्मविदिव भा- | सीसे जाचा्ने कडा ङि तु तऋ- 


निति वियः वेत्त-सा प्रतीत होता है, मौर रोः 
सीति को न्विति वितकयन्तु- च इस मकार वितकैकरते हुए पू 


वाच कस्त्वामजुशशासेति । | तुचे किसने उपदेश दिया द ? 
स चाह सत्यक्रामोऽन्ये मलु- | उस सत्यकामने कहा-भनुरष्यो- 
येभ्यो देवता मामुशिष्टवत्यः, | से जन्य देवतानि यञ उपदेश 
न्य ~ | दिया है।' तासं यह है कि “मनुष्य 
कोऽन्यो मगवच्छि्यं मां होनेपर तो भुद्च श्रीमान्‌के शिष्यको 
मनुष्यः सननुशासितुगुरसहैते- । उपदेश करनेका साहस ही कौन 
क अतोऽ क , कर्‌ सकता द ¢ मतः उसने यही 
त्यामब्रायः । अतोऽन्ये मनुष्ये- , परतिज्ञा की कि यसे ननुप्येसि भन्यने 
भ्य इति ह प्रतिजज्ञे प्रतिज्ञात- | उपदेश किया है ॥ अब परी इच्छा 
वान्‌ । भगवांस्त्वेव मे कामे | ॐ णदुसार भगवान्‌ ही सु उपदेश 


त करे, जरोकि के हुएसे से क्या 
ममेच्छायां ब्रयाक्किमन्यैरुक्तेन लेना हे ¢ अभिप्राय यह ष्टैकि 
नाहं तद्वणयामीत्यमिप्रायः॥२॥ | उते कु भी नही समञ्ञता' ॥२॥ 


किच- । यही नही- 


श्रतःद्यव मे भगवद्दृशेभ्य आचा्यद्धेव विया 
विदिता साधिष्ठं पापतीति तस्स हेतदेवोवाचात्र ह न 
किचन वीयायेति वोयायेति ॥ ३॥ 


भने श्रीमान्‌-जेसे ऋषियोंसे घना है कि भाचार्यसे जानी गयी 
विया हौ अतिशय साधुताको मरा होती है ।' तव आाचार्यने उसे उसी 


विद्याका उपदेशच किया । उसमे कुछ भी न्यून नदी 
हुमा, न्यून नदी 
हूना [ भर्थत्‌ उसकी विधा पूर्णं ही रही ] ॥ ३ ॥ 


खण्ड ९. | 


भरतं हि यस्मान्मम विद्यत 
एवास्मिननर्थं भगवद्दृशेभ्यो 
भगवत्समेभ्य ऋषिभ्यः, आचा- 
यादधेव विद्या विदिता साधष 
साधुतमत्वं प्रापति प्रामोती- 
स्थतो भगवानेव ब्रूयादित्युक्त 
आचार्योऽतरवीत्तस्मे तामेष 
देवतैरुक्तां विद्याम्‌ । अत्र ह न 
किंश्चन षोडशकरविद्यायाः 
किश्चिदेकदेशमात्रमपि न वीयाय 
न विगतमित्यथः । द्विरभ्यासो 
वि्यापरिसमाप्त्यथंः ॥ ३ ॥ 


-- 


शाङड्रमाष्वाथ ३९९ 
> अ 4 ॐ = ॐ = क = = क 9 = ग = आ 4 


(क्योकि इस विषयमे भगवान्‌-- 
श्रीमान्‌के सदय छषिर्यासे मेरा यदी 
पुना हुआ दै कि आचायंसे जानी गयी 
विद्या ही अतिशय सराधुताको प्राप्त 
होती है । अतः अव श्रीमान्‌ दी मुञ्चे 
उपदेश करं ।' रसा कदे जानेपर 
आचार्यने उसे देववार्ओ्वारा कदी इई 
उसी विद्याका उपदश्य किया । उसमे 
अर्थात्‌ उस षोडश कर्ओंवारी 
विद्याम कुछ भी -उसका एकदेश 
भी व्यययुक्त यानी विगत नदी हज 
अर्थात्‌ उसकी विया पूणं दी रदी । 
धवीया५ वीयाय" यह द्विरुक्ति विया- 
की समापिके स्थि है॥ ३॥ 


@ {= 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि चत॒थाभ्याये 


नवघमखण्डमाष्यं 


सस्पणंम्‌ ॥ ९ ॥ 


द्मः रल 





उपक्रोसलके प्रति अनिद्रारा बह्मतिाका उपदेश्च 
पनर्न॑हतर्यां प्रकारान्तरेण पुनः अन्य प्रकारसे त्रहविघाका 
| „ || निद्धपण करना है, इर्य तथा 
वक्ष्यामीत्यारभते गतिं च तद्वि- ्रहमेचाछी गति जोर अभिवि्या भो 
वतलानी है, इसल्यि श्रुति आरम्भ 
करती है । यहं नो आख्यायिका 
पूव॑व्छरदधातपसो्ब्विद्यासाध- | है वह भूव्‌ शरदा जौर तपा 
| ब्रह्मवियामें साधन प्रदर्शित करने- 
नत्वप्रदशेनार्था । ` कैष्यिदहै। 4 
उपकोसलो ह वे कामलायनः सत्यकामे जाबाले 
ब्रह्म चयंमुवास तस्य ह द्वादशवर्षाण्यग्नीन्परिचचार 
भ 
स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयशस्तश्ह स्मैव न 
~) समावर्तयति 

समावतयति ॥ १ ॥ | 
उपकोसलनामसे प्रसिद्ध॒ कमरुका पुत्र सत्यकाम बावाङ्के यहो 
्रहमचये अर्ण करके रहता था । उसने बारह वर्तक उस भचार्यके 
अन्यो सेवा को; तु जाचार्यने जन्य बह्मचारि्योका तो समावतन 

संस्कार कर दिया, तु केवर इसीका नही किया ॥ १॥ 

उपकोसलो ह॒वै नामतः| कमलके पत्र॒ कामरायनने, 
कमलस्यापत्यं कामलायनः सत्य-| निका नाम॒ उपकोसल ह 
२ ९ सत्यकाम जावाल्के यहाँ ब्रह्मचय- 
कामे =. । | पूवक वास श्रिया । “तप्य इ" इसमे 
प्य द पतिषवाथः | तस्याायस्य | ह ठति ए हे । उसने बाद 
दवादशवर्षाण्यीन्परिचचारागनी-  वर्षेतकं उस साचार्यके अम्न्योकी 


दोऽग्रिषि्यां च । आख्यायिका 


खर्ड १० ] शाङ्करभाष्याश ४०१ 
$ 4 -8--9- ऋ 9 ॐ क क क ॐ = ॐ = ॐ ॐ = क 5 ॐ ॐ 3 


नां परिचरणं कृतवान्‌ । स ह | परिचर्या-सेवा की । किन्तु उष 

स्माचार्योऽन्यान्तरह्मचारिणः स्वा- | आचाय॑ने अन्य ब्रह्मचारियोका तो 

ध्यायं ग्राहयित्वा समावतंयंस्त- | स्वाध्याय रहण कराकर समावर्तन 

मेबोपकोसरमेकं न समावतंयति | कर दिया, किन्तु उस उपङ्रोसलकरा 

स्मह ॥ १॥ ही समावर्तन नही किया ॥ १॥ 
---व््न््क्ल्--~ 


तं जायोवाच तो बरह्मचारी कशलमभीन्परिच- 
चारीन्मा साश्नयः परिप्रवोचन्धनरह्यस्मा इति तस्मे 
हाध्रोच्येव प्रवासाथक्र ॥ २ ॥ 
उस ( भाचायं ) से उसकी भायनि कहा-- यह बह्चारी खुब 
तपत्या कर लुका ३, इसने.भच्छी तरह अम्नयंकी सेवा की दै । 
[ देखिये ] णम्नियाँ आपकी निन्दा न करं । अतः इसे वि्याका उपदेश 
कर॒ दीनि । किन्तु वह॒ उसे उपदेश करये विना ही बाहर चला 
गया ॥ २॥ 
तमाचाय जायोवाच तपो | उस भाचायंसे उसकी भायनि 
उपकोचलाय ब्रह्मचारी शलं | कहा- इस ब्रह्मचारीने खव तपस्या 
विदां ब्रूहीति सम्यगग्नीन्परिच- की ह; इसने श जच्छी 
त सेवा की है | किन्तु श्रीमान्‌ 
पतिं प्रत्याचाय॑- वचारीत्परिचरित- " 
नि सर्वर तो अम्मिर्योमं भक्ति रखनेवाठे इष- 
ल्या अनुरोधः गं 
„ | का समादतंन ही नहीं करते । अतः 
वान्‌ । भगवां शाभिषु भक्तं न |, _ § 
न  , | यह हमारे भक्तका समावतन नही 
६ ॥ अतोऽ्मद्धक्त न | करता'-- एसा जानकर भ्य 
समावतंयतीति ज्ञात्वा त्वामग्रयो | आपका परिवाद-भापकी निन्दा न 
मा परिप्रवोचन्गहा तव मा | कर;इघस्यि इस उपकोसर्को इसकी 
युः । अवः प्बूहस्मे विद्यामि- ( अभीष्ट तिका उपदेश कर दीनिये 


४०२ छान्दोम्योपनिषल्‌ [ सश्याय ४ 
ऋ > > > ¬ ¬ < ऋ ¬< >: ¬ ८ 8८ > > ८ ~: ~ ॐ 4 > ऋ = 


्टामुपकोसलायेति । तस्मा एवं | किन्तु, खीदवारा इस प्रकार करे 
जाययोक्तोऽपि हा प्रोच्यवालुक्त्यैव| नानेपर भी, वह उत्से कछ क 
किञ्चित्मवासाश्चकरे प्रवसितवान्‌ २| विना हौ बाहर चला गया ॥ २ ॥ 


-- ०9 ---- 


स ह व्याधिनानशितुं दभे तमाचार्यजायोवाच 
ब्रह्मचारिन्नशान कि नु नाश्चासीति। स होवाच बहव 
इमऽस्मनपुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः पतिपूरण 
ऽस्मि नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥ 

उस उपकोसरने मानसिकं खेदसे अनशान करनेका निश्चय क्रिया । 
उससे आचायंपलीने कहा-“णरे ब्रह्मचारिन्‌ | तु भोजन कर, वर्यो नही 
भोजन करता ¢ वह बोल-ईस मनुष्य वहुत-सी कामना रहती दै 
जो वस्तुके स्वरूपका उल्लघ्लन करके अनेक विषरयोकी ओर जानेवारी है । 
मे उन्दी नानायब (बहुसुली ) मानसिक चिन्ताओते परिपू है, इसस्मि 





भोजन नही करूंगा ॥ ३ ॥ 

स॒ होपकोसरो व्याधिना 
खेदादुप- मानसेन द्ःखेनान- 
कोखलप्या- शितुमनशनं कतु 
नशनम्‌ दभर धृतवान्मनः । 
तं तष्णीमग््यागारेऽ्स्थितमा- 
चायजायोवाच ह. ्रह्मचारिन्न- 
शान द्श्ष्व किं नु कस्मान्न 
कारणानाश्चासीति । ५ 


स होवाच बहवोऽनेकेऽस्मि- 


परुषेष्कताथे प्रकृते कामा 
इच्छाः कतव्यं प्रति नानात्ययो- 


उस॒ उपकोसल्ने व्याधि-- 
मानसिक दुःखसे अनशन करनेका 
मनम निश्चय किमा । तव अमि 
शालामे चुपचाप बैठे हए उससे 
आचायंपलीने कंडा--्े ब्रहम 
चारिच्‌ ! अश्न- भोजन कर, 


 कयो- क्रिस कारणसे भोजन नही 


करता 

वह॒ बोख- “दस भङ्ृताथं 
साधारण पुरुषे अपने कर्तव्यके 
मरति बहुत-सी कामन्- इच्छां 
रदती है, जिन व्यापियो- कर्तव्य- 


खण्ड १० | „पमा हाङ्करमाण्याथं ४०३ 
9-४-39 < + ~ > --->--8- 


म 
ऽतिगमनं येषां व्याधीनां कव्य -| सम्बन्धिनी चिन्ताओकि घत्यय-- 


= ,| अतिगमन~वस्तुके ्वरूपका उर्रह्न 
चिन्तानां ते नानात्यया व्याधयः करके विषय-भवेरके माग नाना है 


कर्तव्यतात्रा्चिनिमित्तानि चित्त- | एेसी जो नानात्यय कामनाखूपन्याधियां 


{| वैशरतिषूणो अर्थात्‌ कर्तव्यता प्रा्िनिमित्तक मान- 
दःखानीत्यथंः। तै्तिू्णोऽसमि| सिक दुख, मँ उनसे परिपूर्ण {स 
अतो नाचिष्यामीति ॥ ३॥ । ण्यि भोजन नहीं कद्ग ॥३॥ 


उक्त्वा तुष्णीभूते ब्रह्म-| ब्रह्मचारीके इस प्रकार कहकर 
चारिणि-- । चुप हो जनेपर-- 
अथ हान्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी शलं नः 
€ "स नोः भ 
पर्यचारीद्धन्तास्मे परत्रवामति तस्मे होचुः भाणो ब्रह्म 
9 = र 
कं बह्म खं बह्म ति॥ ४॥ 
फिर अम्नर्योने एकत्रित होकर कहा- यह ब्रह्मचारी तपस्या कर चुका 
है; इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की दै। अच्छा, हम इसे उपदेश कर" एसा 
निश्वयकर वे उससे बोले-श्राण ब्रहम दै, क' रह्म दै, स' बह्म है" ॥४॥ 


अथ हाग्नयः शुश्रुषयावजिताः | किर उसकी सेवासे अनुक 


अग्नीनां कारुण्याविष्टाः सन्त- 
लम उ वोप समूदिरे | प न 





निश्चयः 

संभूयोक्तवन्तः । इन्तेदा- 
नीमस्मे ब्रह्मचारिणेऽस्मद्धक्ता- 
य दुःखिताय तपस्विने श्रदधा- 
नाय सर्वेऽ्ुशास्मोऽ्ुश्रनवाम्‌ 
बरह्मविद्यामिति । एवं संप्रधायं 
तस्मे होचुरुक्तवन्वः-प्राणो ब्रह्म 
कः ब्रह्म खं ब्रह्मेति ॥ ४ ॥ 


आपसमे मिख्कर कहा- अच्छा 
अपने अवक्त इस दुखित, तपस्वी 
एवं श्रद्धालु ब्रह्म चारीको हम शिक्षा 
द---इसे हम तब्रह्मविदयाका 
उपदेश करं--पेसा निश्चयकर वे 
उससे बोटे---श्राण त्र हे, क 
रह्म है, "खः ब्रह्म हः ॥ ४॥ 


^ ० < ५ ------------- 
छ जवि नानात्यया: पद कामाः" का ही विशेषण ह, तथापि भाष्यकारने 
कामनाओं जौर व्याधियोको एक मानकर उसे व्याधिका भी विदोषण बनाया है। 


४०४ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मभ्याय ४ 


ऋ 
स होवाच विजानाम्यहं यत्पाणो ब्रह्म कं चत 


खं चन विजानामीतिते 


होचुद्वाव कं॑तदेव सं 


यदेव खं तदेव कमिति पाणं च हास्मे तदाकाशं 


चोचुः ॥ ५ ॥ 


वह बोरा--यहतो म नानाह कि प्राण ब््महै; किंतु क जीर 
'ख' को नहा जानता ।' तव वे बोले- निश्चय नो कर है वही ख' टै जीर 
जो ख' है वही क' दै | इत प्रकार उन्होने उसे प्राण ओर उसके 
[ भाश्रयमूत ] जाकाशका उपदेश क्रिया ॥ ५ ॥ 


स होवाच बरह्चारी विजाना- | वह ब्रह्मचारी षोरा-'आपने जो 


उपरिष्यमा- म्यहं यद्धवद्धिरुक्त 
नसय ब्मचारिणः र 

षा स्ाणो त्रह्ेति; 
यस्मिन्सति जीवनं यद्पगमे च 
न॒ मवति, तसिमन्यायुविरोषे 
लोके रूढः; अतो युक्तं बहात्वं 
तस्य । तेन प्रपिद्धपदार्थकल्वा- 
दविजानाम्यहं यतराणो ब्षेति | 
कचतुखंचन विजानामीति। 

नख कंखंशब्दयोरपि सुखा- 
काराविषयत्वेन प्रिद्धपदार्थक- 





क्ट कि प्राण ब्रह्म हे, सो प्रसिद्ध 
पदार्थवाला होनेके कारण यह तौ 
भ जानता ह, निसके रहनेपर 
जीवन रहता है ओर जिसके चे 
जानेपर जीवन भी नही रहता 
लोकम उस वायुविशेषमे ही श्राण' 
छान्द रूट है । भतः उसका ब्रहम 
ख्प होना तो उचित ही है । अतः 
भसिद्ध पदाथयुक्त होनेके कारण 
यह तो मँ जानता्ह कि श्राण बरह्म 
है" किंतु क' ओर सः को भँ नहीं । 
जानता । 

शङ्का-घख ओर आकाश 
विषयक ्ोनेके कारण (क' ओर ल 
शब्द भी तो प्रसिद्ध पदार्थवारे ही 


क्षच्ड १० ] 


शछाहरमाष्याथे 


८०५ 


-9 8८ >9< 9979-9 + 4 5 + 5 >> == 3 ह ॐ ॐ, = 9 


तवमेव कस्मादु्रहचारिणोऽकञा- | है; फिर बरदमचारीको उनका अज्ञान 


नम्‌ । 

नूनं सुखस्य कंशब्दवाच्यस्य 
तदीयशङ्काया क्षणप्रध्वंसित्वात्व- 
युक्तत्वम्‌ शब्दवाच्यस्य चा- 
काशस्याचेतनस्य कथं ब्रह्मत्व- 
मिति मन्यते, कथं च भवतां 
वाक्यमप्रमाणं स्यादिति; अतो 
न विजानामीत्याह । 

तमेवुक्तवन्तं ब्रह्मचारिणं 
अग्निकतृक ते हागनय उचुः । 
समाधानम्‌ यद्वाव यदेव वयं 


कमवोचामः तदेव खमाकाश- 
मिति। एवं खेन विशेष्यमाणं 
कं विषयेन्द्रियसंयोगजाससुखा- 
निवर्तितं स्यान्नीलेनेव विशेष्य- 
माणघुतपल रक्तादिभ्यः । यदेव 
खमित्याकाश्मवोचाम तदेव च 
कं सुखमिति जानीहि । एवं च 
सुखेन विगेष्यमाणं खं | 
दचेतनात्वानिवतितं स्यान्ीरो- 


कैसे रहा 


समाधान-निश्वय ब्रह्मचारी यदी 
मानता हे कि क' शब्दका वाच्य घुख 
्षणप्रध्वंसी होनेके कारण ओर “ख' 
शब्दका वाच्य आकाश अचेतन होने- 
से किस प्रकार ब्रह्म हो सकता है ! 
ओर आपका वचन भी कैसे णप्रा- 
माणिक होगा १ इसीसे उसने कहा 
कि भै नदी जानता' । 


इस प्रकार कहते इए उस 
ब्रहमचारीसे अग्नर्योने कदा-- इम 
जिसे क' रसा कहकर पुकारे दै 
वही 'ख' यानी आकाश है । इस 
प्रकार जैसे (नीर इस ॒विरोषणसे 
युक्तं कमर रक्तकमर आदिसे विग 
कर दिया जाता दहै, उसी प्रकार 
“ख शब्दसे विशेषित क विषय 
ओर इन्द्ियोके सहयोगसे होनेवाके 
घखसे निद्रे कर दिया जाता है । 
निसे हम 'ख'!- माकाश कहते दँ 
उसीको तु क'--युख जान । इस 
प्रकार नीरोत्परुके समान ही सुखसे 
विरोषित किया हुआ ख, ( आकाश ) 
भौतिक अचेतन “ख' से निदत्त कर 
दिया जाता है । तात्य यह दे छि 


ष्ट 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


| म्याय ष 


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त्पलबदेव । 

नेतरल्लोकिकम्‌ । आकाशं च 
सुखाश्रयं नेतरद्धोतिकमि- 
त्यथः | 


नन्वाकाशं चेत्सुखेन विशेप- 


विशेपणदयेऽ- यितुमिष्टमस्त्वन्य- 


न्यतरस्यायुक्त- तरदेव विशेषणं 
स्वरङ्कनम्‌ यद्वाव कं तदेव 


खमिर्यतिरिक्तमितरत्‌ । यदेव 
खं तदेव कमिति पूविरोषणं 
वा| 

ननु सखाकाशयोरुभयोरपि 
उभयोरावश्य- लोकिकसुखाकाशा- 
कताप्रद्यनम्‌ भ्यां व्यावृत्तिरिषि- 
त्यवोचाम । सुखेनाकारो विशे- 
पिते व्यादृत्तिरुमयोरथप्ा्तैवेति 
चेसत्यमेवं करं तु सुखेन विरे- 
पितस्येवाकाशस्य ध्येयत्वं वि- 
हितं न त्वाकारागुणस्य विशेष- 


सुखमाकाशस्थं | आकाशस्थित ठुल ब्रह्म दै अन 


लोकि दुख नहीं तथा सुक 
आश्रित रह पेवाला आकाश ब्रह्म दै 
अन्य भौतिक आकाश नहीं । 
रड्ा-यदि याँ आकारो 
पुखंके द्वारा विशेषित करना इष्ट 
हेतो कोई भी एक विरोषण रह 
सकता था; अर्थात्‌ द्वाव कं तदेव 
खम्‌" पसा एक विरोषण रह जत, 
दूसरा धयदेव खं तदेव कम्‌" यह 
विशोषण अधिक है| अथवा यदि 
“यदेव कं तदेवे कम्‌" यही रहे तो 
पहला विशेषण अधिक है ।# 
समाधान कितु इन यु ओर 
आकाश दोर्नोहीकी लौकिक घुख 
ओर आकारसे व्यावृत्ति अभीष्ट 
है- रेसा हम पहले कह चुके दै । 
यदि कहो कि सुखके द्वारा आकाश- 
के विशेषित होनेपर दोनोकी भ्याृति 
स्वतः सिद्ध दी दै तोयह ठीक दै 
किन्तु इससे सुखसे विशेषित 
आकाशका ही ध्येयत्व विहित होगा 
आकाशगुणसे युक्त ॒विशोषणमूत 
सुखका ध्येयत्व विहित नहीं होगा 


® तात्य यह हे कि इन दो उकियोमेसे किसी भी एक उक्तिते भ्ुतिका 


अभिप्राय सिद्ध हो सक्ता या; फिर दोनोका 


कथन क्यो दूजा ? 


ण्ड १० ] शाङ्करभाष्यं ७०७ 
क 9 ~8-9>-- ह: ॐ. ॐ ॐ ॐ ॐ थ + न ॐ 5 ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 9 = = 4 


णस्य सुखस्य ध्येयत्वं विहितं | वर्योकिं विरोषणका ग्रहण अपने 
न ¦ विशेष्यका निमन्त्रण करके ही 
॥ नस्य | 

| समाप्त हो जाता दै । इसट्यि 


बिकषेष्यनियन्दत्वेनैवोपक्षयात्‌ । | [ घुखका मी ] ध्येयल प्रतिपादन 


स्यात्‌ । 


अतः खेन सुखमपि विशेष्यते 
ध्येयत्वाय । 


कुतशरैतन्निथीयते ९ 


कंशब्दस्यापि ब्रह्मशब्दसं- 


बन्धात्मकं ब्रह्मेति । यदि हि सुख- 


गुणविरिष्टस्य खस्य ध्येयत्वं 
विवक्षितं स्यात्कं खं ब्रह्मेति 
नुयुरग्नयः प्रथमम्‌ । न चव- 
मुक्तवन्तः; फं तहिं १ कं ब्रह्म 
खं ब्रह्येति । अतो ब्रह्मचारिणो 
मोदापनयनाय कंखंशन्दयोरि 
तरेतरविगेषणविरोप्यत्वनिर्देशो 


युक्त एव यद्वाव कमिस्यादिः। 
तदेतद्ग्निमिरक्तं॑वाक्याथं- 


मस्मद्वोधाय भ्रुतिराह-पराणं च । अर्को 


करनेके स्यि आकाशसे घुखको 
भी विङोषित का गया है। 


` शङ्का- र्षितु पेखा किस प्रकार 
निश्चय किया जाता है ? 
समाधान-- रक्षः शन्दसे क" 
शब्दका भी सम्बन्ध होनेके कारणं 
“क' ब्रक्म दै-रेसा निश्चय होता दै। 
यदि सुखगुणविशिष्ट आकाशका ही 
ध्येयत्व॒ बतलाना इष्ट होता तो 
अम्निगण पहले कंखं ब्रह्मः 
( सुखस्वर१ आका ब्रह्म हे) 
एसा कहते । किन्तु उन्दने एसा 
नही कहा; तो क्या कदा है 
“क बरहा दे, शखः ह्म दहै, एेसा 
कहा हे । भतः ब्रह्मचारीके मोहको 
निवृत्तिके स्यि यद्वाव कम्‌! इ्यादि . 
ख्पसे क' ओर खः दोनों दी 
शन्दोको एक दूसरेके विरोषणविशे- 
ष्यहूपसे बतलाना उचित ही है । 
अग्नियोकि कटे हए इस वाक्यके 
श्रुति हमारे बोधके छथि 


४०८ छान्दोम्योयनिष्‌ [ अष्याय ५ 


| 45 93 
हास्म ब्रह्मचारिणे तस्याकाश- | कहती है - अमियेनि उब अहन 
| चारीको प्राण ओर (तदाकाशच 
उसके आकाशका अर्थात्‌ भाध्रय. 
। रूपसे प्राणसे सम्बद्ध हदयाकाशका 
पदेश श्रिया, तथा घुखगण 
सुखगुणवखनिदशात्त चाकाशं | विशिष्टता वतलनेके कारण उ 
आकाशको सुखगुणविशिष्ट ब्रह 
ओर उसमे स्थित प्राणक्रो 
ब्रहमके सम्पकके फरण ही ब्म 
बतलाया । इस प्रकार प्राण 
माणं चाकारं च समुच्चित्य | नीर ओकरा इन देक 
समुचय कर॒ अन्िर्योनि दो ऋ 
ब्रह्मणी उचुररनय इति ॥ ५ ॥ ` वतरये' ॥ ५ ॥ ` 


स्तदाकाशः प्राणस्य संबन्ध्या- 


¢ (९ 
भ्रयत्वेन दाद आकाश इत्यथः, 





खगुणविरिष्टं ब्रह्म तस्स्थं च | 


प्राणं ब्रह्मसंपकदिव बह्येत्युभयं 





इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाभ्याये 


दशमखण्डभाष्यं सम्पणेम्‌ ।। १० ॥ 


=> 9 °, 


एकार्दव् खर्ड 


--: ° :=- 


गाहपत्याग्निविदा 


संभूयाग्नयो ब्रह्मचारिणि 


त्रह्मोकूवन्तः । 


[ इस प्रकार ] सव भगििरयोनि 
मिरकर ब्रह्मचारीफो त्रह्मका उपदेश 


किया। 


अथ हेनं गार्हपत्योऽचुशशास एथिव्यग्निर- 
जनमादिस्य इति । य एष आदित्ये पुरुषो दद्यते 
सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥ 
फिर उसे गा्हपत्याम्नने शिक्षा दी-- पृथिवी, ग्नि, अन्न जोर 
आदित [ ये मेरे चार शरीर है | । आदित्यके अन्तर्गत जो यह पुर्ष 
दिखायी देता है वह भ ह, हीमे ॥ १॥ 


अथानन्तरं प्रत्येकं स्वस्ववि- 

षां विद्यां वक्तुमारेभिरे । 
तत्रादाचेनं बरदमचारिणं गाद 
पत्योऽग्निरुशाशास । पथि- 
व्यग्निरनमादित्य इति ममे- 
वाश्चतसखस्तनवः । तत्र॒ य 
आदित्य एष पुरुषो दुश्यते 
सोऽमस्मि गाहपत्योऽग्नि- 
यश्च गार्हपत्योऽग्निः स एवा- 
हमादित्ये पुरुषोऽस्मीति । पनः 
` पराबरच्या स एवाहमस्मीति 
वचनम्‌ । 


फिर उनसे प्रयेकने भपने- 
अपनेसे सम्बद्ध विदयाका निरूपण 
करना आरम्म किया । उनम सबसे 
पहले उस बरह्मचारीको गाहंपत्याम्नने 
शिक्षा दी--थिवी, अग्नि, अनन 
ओर आदित्य- ये मेरे चार शरीर 
है । उनम भादित्यमे जो यह पुरुष 
दिखायी देता है वह मँ गाहंपत्यामि 
ह जर यह जो गापतयाग्नि हे वही 
भँ आदित्यम पृरष ह । "वही है 
यह्‌ वाक्य [ पूवेवाक्यकी ] पुनरा- 
वर्ति करके कहा गया दै । 


४१० छाण्डोग्योवनिषव्‌ [ नष्वाव\ 
पृथिव्यन्नयोरिवि = भोज्य- | मोज्यत्व ही जिनका शकण 
त्रक्षणयोः संबन्धो न गाहै- | उन एएथिवी ओर अनक समा 
€ गाहपलयाग्नि ओर आदि न्प 
पत्यादित्ययोः । अततृखपक्तुतव- | १९१९ ^ व) 


विशिष्टा उयन्‌ | नहीं है । इन दोनो मोक, 
मकाशनधरमां अविशिष्टा इत्यत | पाचक जोर भकाशकल ये ष 


एकत्वमेवानयोरत्यन्तम्‌ | | समानरूपते है; अतः इन दोन 
पृथिव्यन्नयो भोज्यस्वेनाभ्यां ¦ अत्यन्त अभेद हे | परथिवी ओर 
छ | अन्नका तो इनसे भोज्यहूपसे 

सम्बन्ध हे ॥ १ ॥ 


णर. क 


संबन्धः ॥ १ ॥ 


स य॒ एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पाप्य 
खोक भवति सवंमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावर 
युरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं सुञ्ञामोऽस्मिश्थ लोके- 
ऽसुष्मि९श्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ 

चह परप, जो इसे इस पकार जानकर इसकी उप्रसना करता दै, 
पापकर्मोको नष्ट कर देता दै, अग्नरोकवान्‌ होता है, पूणं मुकर भ्रा 
होता है, उञ्ञ्वरु जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवती (संतान 
परराम उस्न ) पुष क्षीण नही होते । तथा उसका इम इ लोह 
ओर पररोक्मे भी पालन करते है नो कि इस प्रकार जानकर हसढ़ी 
उपासना करता ` है [ उसको परवक्त फर्की प्राति होती है ]॥ २ ॥ 
स यः केथिदेवं यथोक्त वह परुष, जो कोई कि इस 
गाहंपत्यमग्निमाजनादत्वेन च | कार भोग्य शौर भोक्ताङूपसे ५ 
ठा प्मिमकतयपासत सोत मकारो विभक्त इए पूर्वोक्त गाह. 


9. पत्यागिकी उपासना करता दै बह 
विनाशयति पापङृत्यां पापं । पापको नाच कर देता दै, तथा 


ण्ड १९ 1 


पाुःरसाप्णप्ये ४११ 


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कर्म । लोकी छोकवांशास्मदी- | हमरे आम्नेय रोकके द्वारा उसी 


येन लोकेनाग्नेयेन तद्वान्भवति 
यथा वयम्‌ । इह च लोके 
सर्द वरषशचतमायुरेति प्रामरोति । 
उयोगुञ्ञ्वरुं जीवति नाप्र 
ख्यात इत्येतत्‌ । न चास्याव- 
रश्च ते पुरुषाश्वास्य विदुषः 
सन्ततिजा इत्यथः । न क्षीयन्ते 
सन्ततयुच्छेदो न भवतीत्यथेः । 
किं च तं वयथुषज्ञामः 
पालयामोऽसमश्च रोके जीवन्त- 
ममुभ्मिश्च परलोके । य एतमेवं 
विद्वानुपास्ते यथोक्तं तस्ये 
तत्फलमित्यर्थः ॥ २ ॥ 


प्रकार रोकी-- रोकवान्‌ होता है 
। जेते मिहम है । इस लोकम भी 
वह सम्पूरण- सो वष॑की आयु प्राप्त 
करता दै; ज्योक --उज्ज्वल जीवन 
व्यतीत करता है अर्थात्‌ सप्रसिद्ध 
होकर नहीं जीता तथा इसके 
अवर पुरुष जो अवर--पश्वादवती 
यानी संतति उलन्न हए पुरुष है 
वे क्षीण नदीं होते अर्थात्‌ इसकी 
संततिका उच्छेद नदीं होता । 
यदी नही, इस कोकरमे जीवित 
रहते इए तथा परलोके भी हम 
उसका पारन करते दै । तात्पयं 
यह है कि जो विद्वान्‌ इस प्रकार 
इसको उपाषना करता -है उसे 
पूरवक्त फर ्राप् होता है ॥ २ ॥ 





इतिष्छान्दोग्योपनिषदि चतु थाध्याये 
पकादशस्रण्डमाष्यं सम्पुणेम्‌ ॥ ११ ॥ 


क ~ 


दद्र खर 


--: ० :- 
अन्वाहार्यपचनाग्निविया 


अथ हैनमन्वाहा्यपचनोऽलुशरासापो ददो 
नक्षत्राणि चन्द्रमा इति । य॒ एष चन्द्रमसि पुरुषो 
र्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥ 


फिर उसे अन्वाहार्यपचन ( दक्षिणाग्नि ) ने शिक्षा दी-- जल, 
दिशा, नकषतर ओर चन्द्रमा [ये मेरे चार शरीर है ]। चन्द्रममे नो 
थह पुरुप दिखायी देता है वह मे है वही मेह ॥ १॥ 


स य॒ एतमेवं विद्रानुपास्तेऽपहते पापङ्कत्यां 
खोकी भवति सर्वमायुरेति अयोग्जोवति नास्यावर. 
पुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं मुञ्जामोऽस्मिःश्च लोके. 
ऽमुष्मि९श्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ 

वह पुरुष, जो इसे इस पक्रार जानकर इस ८ चार भार्गोमें विभक्त 
भग्न ) कौ उपासना करता हे, पापकमोंका नाश कर देता ह, ोकवान्‌ 
होता हे, पूणे भायुको पराप्त होता है जर उज्वल जीवन व्यतीत करता 
है । उसके पीछे होनेवाले पुरुष ( वंशज ) क्षीण नहीं होते तथा इस 
लोक भौर परलोके भी हम उसका पान करते है, जो कि इस प्रकार 
जानकर इसकी उपासना करता है ॥ २ ॥ | 
अथ हैनमन्वाहा्यपचनोऽलु- फिर उसेः भन्वाहार्यपचन-- 
शगास दक्षिणाग्निरापो दिशो दक्षिणाम्निने शिक्षा दी- नलः 


नक्षत्राणि चन्द्रमा इत्येता मम दिशा, नक्षत्र ओर चन्द्रमा- ये 
५ । मेरे चार शरीर दै । मै अपनेको 
चतसस्तनवधतुर्ादमन्वाहार्यप- | चार प्रकारसे विभक्त करके अन्वा- 


€ 
क्ज्ड १२ ] शाङ्रभाष्याथं ४१३ 
>--9- > >~ >9 > 8८ अ < 9 - | अ 9 --- - ऋ - + 


वन॒ आत्मानं प्रविमज्याव- 
स्थितः । तत्र य एष चन्द्रमसि 
पुरूषो दृशयते सोऽहमस्मि स 
एवाहमस्मीति पूववत्‌ । 


अन्नसंवन्धाज्ज्योतिष्रूसामा- 
न्याचान्वाहारयपचनचन्द्रमसोरे- 
कत्वं दक्षिणदिक्संबन्धाच्च । 
अपां नक्षत्राणां च पूरव॑वदनत्व- 
नैव संबन्धः । नक्षत्राणां चन्द्र- 
मसो भोग्यत्वप्रसिद्धेः । अपाम- 
न्नोतपादकत्वाद नत्वं दक्षिणाग्नेः 
पृथिवीवद्वाईपत्यस्य । समान- 
मन्यत्‌ ॥ १-२ ॥ 


हार्यपचनषूपसे स्थित है । उनमेसे 
चन्द्रमामे नो यह पुरुष दिखायी 
देता-दै वहम वदीर्भर्है- 
फेस पूववत्‌ समञ्लना चाहिये । 
अन्नसे * सम्बन्ध होनेके कारण, 
ज्योतिष्रमे समानता होनेसे तथा 
दक्षिणः दिशसे सम्बन्ध होनेके कारण 
अन्वा शा्यपचन ओर चन्द्रमाकरी 
एकता है | जल ओर नक्षत्रौका ते 
पूववत्‌ अत्ररूपसे दी सम्बन्ध हे, 
क्योकि नक्षत्र चन्द्रमाके मोग्य है, 
यह प्रसिद्ध है तथ। अन्नके उद्यत्ति- 
कर्ता होनेके कारण जर्छको भी इसी 
प्रकार दक्षिणागिक्रा अननत प्रपत दै 
ज्ञेसे प्रथिवौको गाह॑पत्यागनका । 
शेष अथं पूर्ववत्‌ है ॥ १-२ ॥ 


--ः (~ १-~-~ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये 
द्ादश्षलरण्डभाष्यं सस्पणम्‌ ॥ १२॥ 





१, दं-पूण॑मास यमे अन्वाहायपचन अथि हविष्य पकाया जाता है; 
तथा चन्द्रमाके विषयमे “चन्द्रमाको प्रास्त होकर अनन हो जाता है" एेसा श्रुति 
वाक्य है । इस्यि इन दोनोंका अन्नसे सम्बन्ध है । 

२. अन्वाहार्य॑पचनको दक्षिणाग्नि मी कहते हँ; तथा चन्द्रमाको भी 
दक्षिण मा्म॑से जानेवाले ही प्रास होते ई । इर्ये इन दोनोका दश्चिण 


दिशासे सम्बन्ध है । 


अ योःटक्ः शकर 


आहवनीयाग्निषिद्या 


अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आका 
योविदयुदिति । एष विद्युति पुरुषो इर्ये सोऽह- 
मस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥ 


तदनन्तर उसे आहवनीयाम्निने उपदेश किया--श्राण, भाकारा, 
यूरोक ओर विदत्‌ [ ये भेरे चार शरीर है ] । यह जो विधुतं प 
दिखायो देता है वह मँ ह वहीभ ह" ॥ १॥ 


स य एतमेवं विद्रानुपास्तेऽपहते पापछ्रत्यां खोकी 
भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरषाः 
्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिश्श्च लोकेऽमुष्मिरच 
य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ 


चह परप, नो इसे इस प्रकार जानकर इस ८ चतुर्धा विभक्त 
अग्न ) को उपासना करता हे, पापकर्मको नष्ट कर देता हे, लोकान्‌ 
होता हे, पूणं आयुको प्रात होता है तथा उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता 
दे । उसके पश्चाद पुरुष ( वंशन ) क्षीण नहीं होते तथा उसका इम 


इस कोक ओर पररोकरमे भी पारन करते है जो कि इसे इस भरकर 
जानकर इको उपासना करता हे॥२॥ 


काण्ड १६ | छाङ्करमाण्याथ ४१५ 
~> 8 ~ 9८ ~~~ 9 ~क त 8 ~ < ~~ ~क ~क: > ~< ~क ~क: ~ 


अथ हैनमाहवनीयोभ्लु शशास | तदनन्तर उसे आहवनीयाम्निने 


प्राण आका्चो चौरविद्युदिति | उपदेश क्रिया-- भ्रण, आकाश, 
, चयुरोक ओर विदयुत्‌-ये भेर भी चार 


शरीर है । यह नो विदयुतरम पुरुष 
विद्युत धपे शयते सोऽम- | दिखायो वेग दै १ शया 
अर्थ पहलेदीके समान होनेके कारण 
पूर्वत्‌ है । चुरोक जर आकाशके 
दिवाकाशयोस्त्वाभ्रयत्वा्रिुदा- | साथ विदत्‌ भर॒ भहकीयक 
भोगदूपसे ही सम्बन्ध दै, करयोक्ति 


ममाप्येताश्चतस्रस्तनवः । य एष 


स्मीत्यादि पूव॑वत्सामान्यात्‌ । 





हवनीययो भग्यत्वेनैव संबन्धः । | ये कमरा: इनके आधव दै । शेष 
समानमन्यत्‌ ॥ १-२॥ | अर पर्ववत्‌ हे ॥ १-२ ॥ 
नन क$--9 ~ 


इतिच्छान्दोग्यो पनिषदि चतुर्थाध्याये 
शरयोददाखण्डमाष्यं सम्पण॑म ॥ १३ ॥ 





चतुर्द् सरह 


आचायेका आगमन 


ते होच॒रुपकोसलेषा सोभ्य तेऽस्मद्वियासविया 
चाचार्यस्तु ते गति वक्तेत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचा- 
्योऽभ्युवादोपकोसर ३ इति ॥ ९ ॥ 


उन्दने कदा-“उपकोसर | हे सोम्य | यह अपनी विधा ओर 
आत्मवि्या तेरे भति कही । णाच तुचे [ इनके फलकी प्रापिका ] मागं 


बतसवेगे । तदनन्तर उसके आचार्यं साये । उससे आचार्यने कदा- 
उपकोसल ।› ॥ १ ॥ 


ते पुनः संभूयोचुहोपकोस- तव॒ उन्होने पुनः एक पाथ 


क कहा-उपकोसल | हे सोम्य | 
रषा सोभ्य ते तवासमदामिः यह हमने तेरे परति अपनी विचय 
९ भर्थात्‌ अगिविधा ओर आसविच। 
विद्येत्यथंः। आत्मविद्या पृवोक्ता = 16; ह 
प्राणो ब्रह कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति | सं नक्ष इत्यादि रूपते कही 4; 
> = कह दी । अव इस विद्याके 
। आचायस्तु तेग ~ 
् ° ति चक्ता पाके ज्यि आचार्यं तु मर्ग 
विचाफलम्रातय इत्युक्त्वो परु- | बतस्वेगे । देसा कहकर अम्निगण 
स्मयः । आजगाम हास्याचा्॑ः | उपरत दौ गये । कालान्तरे उसके 


= £ ग आचायं आये तव आचार्यने उस 
कालन । तं च शिष्यमाचार्यो- 


अपने रिष्यसे कदा--“उप- 
ऽभ्युवादोपकोसल २ इति ॥॥१॥ ` कोसल ॥ ॥ १ ॥ 





॥ 


खण्ड १४] शाङ्करमाष्वाथ ४१७ 
99 >8८ 8८ >8< >~ > >@< >< अ ¬ ¬ < >8८ 8 9 6८ 9८ 8८ < 9 
¢ #ीर 
आचाय ओर उपकोञ्चटका संवाद 


भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद्‌ इव सोम्य ते 
मुखं भाति को नु लानुशदासेति को नु माुशिष्याद्धो 
इतीहापेव निहत इमे नूनमीदशां अन्यादृशा इतोहा- 
म्नीनभ्युदे किं नु सोम्य किलऽते वोच्निति ॥ २॥ 


उसने भगवन्‌ | रेसा उत्तर दिया । [ भाचायं गोटे-- ] हे 
सोम्य | तेरा मुख ब्रहमवेत्ताके समान जान पड़ता है; तुञ्े किसने उपदेश 
किया है ९ अनी | सुद्धे कौन उपदेश करता, एसा कहकर क्ह मानो 
उसे छिपने ल्गा । [ फिर अगिनर्योकी ओर संकेत करके बोख-- ] 
“निश्चय इन्दनि [ उपदेश क्रिया है] जो अन्य प्रकारके थे ओर अब 
ठेते है-एेसा कहकर उसने अग्नर्योको बतलाया । [ तब आचार्यने 
पूछा-- ] हे सोम्य । इन्होनि त्ञे क्या बतलाया है ¢ ॥ २ ॥ 


` इदमिति ह प्रतिजज्ञे खोकान्वाव किर सोम्य 
तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपरश्च आपो 
न श्छिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कमं न शिष्यत इति 
व्रवीतु मे भगवानिति तस्मे होवाच ॥ ३॥ 


तव उसंने “यह बताया दै" एेसा कहकर उत्तर दिया । [ इसपर 
 आचारयने कहा-- ] ह सोम्य | उन्होने तो. वज्ञे केवरु रोका ही 
उपदेश किया दहै; अब र्मे तुञ्ञे वह बतरता ह जिसे जाननेवाकेसे 
पापकर्मका उसी प्रकार सम्बन्ध नहीं होता जैषे कमरुपत्रसे जलका 
सम्बन्ध नहीं होता /' वइ बोला-“भगवान्‌ मुञ्चे बतलावें ॥ तब 
भाचायं उससे बोटे ॥ २ ॥ 


४१८ 


छान्बोग्योचनिखल्‌ 


[ अभ्याय १४ 


9 क ~; ¬ 9 5: ~: ~ ~ ॐ ~ ~ 8 ~ 8-3-8८ ~ 8 2 > ॐ 


भगव इति ह प्रतिशुभ्राव । | 


ब्रह्मविद इव सोम्य ते भरुखं 
प्रसन्नं भाति, कोलु = 
परत्याह- ङो लु 
मानुश्िष्यादनुश्षासनं ङर्यान्नो 
भगवंस्त्वयि प्रोषित इतीहापेव 
निदहुतेऽपनिदूलु त इवेति व्यव- 
दितेन संबन्धः, न चापनिषठते 
न च यथाबदप्निभिरुक्तं॒ब्रवी- 
तीत्यभिप्रायः । 


कथम्‌ १ इमेऽग्रयो मया परि- 
चरिता उक्तवन्तो नूनं यतस्त्वां 
दृष्टा वेपमाना इवेदृश्ा दृश्यन्ते 
पषमन्यादृगाः सन्त इतीहाग्नी- 
नभयूद्ऽयुक्तवानकाक्ाभीन्द- 
यन्‌ । किंनु सोम्य किलि ते 
तुभ्यमभोचनग्नय इति पृष इत्ये- 
बमिद्पुकबन्त इदेव ह प्रति- 


सेत्युक्तः 


उसने भगवन्‌ | का 
दिया । फिर आचायंद्रारा द सौ | 
तेरा मुख तऋवेचाके समान प्त 
जान पड़ता है, सो तुक्ते किषने 
उपदेश क्षिया ह, पूसा के जानेए 
बह बोल--'भगवन्‌ | जपे 
बाहर चले जानेपर भला सुङ्ञे कौन 
उपदेश फएरता ?' इस प्रकार मानो 
वह [ अग्निके कथनका ] अपहृव- 
( गोपन ) सा करने खा । “भप. 
इव निह नुते, इसमे भप, उपसगंका 
“शवः केद्वारा व्यवधानयुक्त (निहनुते 
क्रियाके साथ सम्बन्ध है, अतः शप- 
निहनुते इव' देस समक्षना चाहिये । 
तात्पयं यह है कि वह अग्निके कथनको 
न तो ज्यो-का-त्यो बतलाता ही है 
शौर न उसे [सर्वथा] छिपाता ही दै । 

शसो कैसे £ देखिये भेरे दारा 
परिचर्या फिये हुए इन शग्नि्योनि हौ 
मुषे उपदेश्च किया है; क्योकि भव 
भापको देखकर ये इस प्रकार 
कपत हुए-से दिखायी देते है, जब 
फ पहले ये न्य प्रकारके थे' हस 
प्रकार ॒ककुवचन ८ व्यङ्गयोक्ति ). 
के द्वारा उसने अग्नर्योको बतसखया । 


/ फिर हे सोम्य | अग्नियेनि 


वक्षे क्था वतलया है ? ईस 
हार पू जनिपर्‌ ` यदौ कदा दै 


खण्ड १४ ] 


शाद्कस्माच्याय 


७१९ 


2 22 क 9 3 9 क 4 क क क न 4 = > 3 आ < 


जसे प्रतिक्ञातगान्प्रतीकमात्रं 
किञिनन सवं यथोक्तपग्निभिरु- 


कममोचत्‌ । 

यतं आष्टाचार्यो लोकान्वाव 
पृथिव्यादीन्हे सोम्य किर ते- 
ऽबोचन्न ब्रह्म साकल्येन । अहं 
तुते तुभ्यं तद्रह्म यदिच्छसि 
त्वं श्रोतुं वक्ष्यामि, शृणु तस्य 
मयोच्यमानस्य ब्रमणो जञान- 
आहार्म्वम्‌-यथा पुष्करपलाश 
पद्मपत्र आपो न श्िष्यन्त एवं 
यथा वक्ष्यामि ब्रह्ेवर॑बिदि पापं 


करमन शिष्यते न संबध्यत 


हत्येवसुक्तवत्याचायं आहोपको- 
सलो व्रवीतु मे भगवानिति 
तस्स होवा वाचार्यः || २-३ ॥ 


एेसा कहा, अर्थात्‌ कु प्रतीकमात्र 
ही बतलाया, अगििर्योका कहा इभा 
सारा उपदेश यथावत्‌ नही कहा । 
अतः जआचार्यने इहा-- 
सोम्य | अमिर्योने तश्च प्रथिवी भादि 
रोक ही बतलये है, बरहम पूण 
तया उपदे नही किया । मब 
तुचे उब ब्रह्मका उपदेश कणा, 
नसि कितु घुनना चाहता है।' 
मेरदरारां के जाते हुए उस ब्रहमके 
ञानका माहात्य ञुन-जिघ् प्रकार 
पुष्कर-पखश्--षएमकपत्रमे खरः 
शिष्ट-सम्बद्ध नही होता उस्ली 
प्रकार जैसे ब्रह्म मै उपदेश 
करगा उसे जाननेवालेमे पापकमका 
सम्बन्ध नही होता । आचायके इस 


प्रकार फहनेपर उपकोसलने कहा- 


“भगवान्‌ मुक्षे बतलावं । तव 
आचाय उद्से बोले ॥ २-३ ॥ 


इतिरछान्दोग्योयनिषदि _ तुथोध्याये 
चतदशखण्डभाष्य समभ्पणंम्‌ ॥ १७ ॥ 





इका उ० ९४- 


कञ्‌ सश 





आचार्यका उपदे - नेत्रस्थित पुरुषक्नौ उपासना 

य एषोऽक्षिणि पुरुषो हदयत एष आसति 
होवाचेतदमृतमभयमेतदृबरह्मेति । तयद्यप्यस्मिन्स- 

पिरवोदकं वा सिथति वर्मन एव गच्छति ॥ १ ॥ 
“यह जो नेत्रम पुरुष दिखाई देता दै यह मात्मा दै देसा उसने 
कहा ह अमृत है, अमय है जर ब्रह्म है ।' उस ( पुरुषके स्थानह्प 
नत्र) मे यदि धत या जल हके तो वह पलकों ही चला जाता ३ ॥१॥ 
य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते | जिनका वाद्य इन्द्रियमा निदरृ् 
हो गया है उन ब्रह्मचर्यादि साघन- 
निदृत्तचकषुभित्र्॑चर्यादिसाधन- सम्पन्न, शान्तात्मा विवेिर्योह(रा नो 
यह नेत्रके अन्तग॑त दृष्टिका द्रष्ट 
संप; शा्तैविवेकिभिदृट्र, | परू देखा जाता ष, ला ढि 
“वह चश्चुर्जंका चक्षु दै" पेसी 
"चक्षुः" (कै०ड० १।२ ) | भन्य. श्रतिसे प्रमाणित होता 
[ वह प्राणिर्योक्ठा मात्मा है- रेता 

इत्यादिभुत्यन्तरात्‌ । आचार्यने कडा । ] 

नन्वग्निभिरुक्तं विरथं यत | शङ्का-[ भाचार्के इस कथनसे 
= अनिनर्योका कथन मिथ्या प्रमाणित 
आचायस्त॒ तें गतिं वक्तेति | दोता दै, कर्योकि उन्होने तो 
“आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता रेसा 
गतिमात्रस्य वकतेत्वोचन्मनि, | कक “केवर गतिमात्र कदलवगे' 
पिस नभवि- | इना ही कहा था। तथा इससे 
अनिनयोका भविष्यदुविषयस्बन्धी 


पयदविषयापरिज्ानं चाग्नीनाम्‌ । | जान न होना सिद्ध होता दै । 


(पकप 


खण्ड १५ ] 


धछाहूरधाष्वाथे ४२१ 


9 क 9 9 9 9 5 ॐ > > ॐ > = 2 9 = > ॐ + > 4 


नैष दोषः; सुखाकाशस्ये- 
वाक्षिणि दृद्यत इति द्रष्टुरखः 
वादात्‌ । एष आत्मा प्राणिना- 
मिति होवाचैवघुक्तवानेतद्यदेवा- 
त्मतत्वमवोचाम एतदगतममर- 
णधरम्यविनाश्यत एवाभयं यस्य 
हि विनाशाशङ्ञा तस्य भयोप- 
पत्तिस्तदभावादभयमत एवैतद्‌- 


ब्रह्म बृहदनन्तमिति । 


किञ्चास्य ब्रह्मणोऽक्षि पुरुषस्य 
माहात्म्यं तत्तत्र पूरुषस्य स्थाने- 
ऽक्षिणि यद्यप्यस्मिन्सपिर्वोदक 
वा सिश्वति वत्म॑नी एव गच्छति 
पकष्मावेव गच्छति न च्ुषा 
संबध्यते पद्मपत्रेणेवोदकम्‌ । 
स्थानस्याप्येतन्माहात्म्यं किं 
पुनः स्थानिनोऽकिपुरुषस्य 
निरञ्जनत्वं वक्तव्यमित्यमि- 
प्रायः ॥ १ ॥ 


समाधान-यह कोई दोष नही 
ह, क्योकि ेसा कहकर आचारथने 
[ अभ्नियेकि वतलये हए ] 
सुखाकाशषूप द्र्टका ही “जो 
नेत्रम दिखायी देता हे" इस प्रकार 
अनुवाद्‌ किया दै । यह प्राणिरयोकषा 
आत्मा है “इति होवाचः इस 
प्रकार कहा । निक्त अल्मतच्का 
वर्णन हम पहठे कर॒ चुके टै वदी 
यह॒ अमरत-ममरणधर्मा यानी 
अविनाशी दै; दषीसे अमय भी है, 
वर्योकि जिसके नाश्चकौ शङ्गा होती 
हे उसीक्रो मय हो सक्ता दै; अतः 
उसका अभाव होनेके कारण यह्‌ 
अभय है । इससे यह ब्रह्म- 
बृहत्‌ यानी अनन्त दै । 
तथा इस ब्रह्म -नेत्रप्थ पुरुषका 
ठेसा मादाल्य है कि इस रुषके 
स्थानमभूत नेत्रम यदि घृत या जर 
डाखा जाय तो वह इधर-उषर 
पलकोमिं दी चला जाता पद्मपत्र 
से जरुके समान नेत्रसे उसका 
सम्बन्ध नदीं होता। जव ठि स्थानका 
भी एेसा मादास्य है तो स्थानीनेत्र- 
स्य पुरुषी निःसङ्गताके विषयमे तो 
, कहना ही क्या है १ यह इसका 
¦ अभिप्राय है ॥ १॥ 


[मि १-~-- 
०9. 


रद छान्डोन्योपनिषद्‌ [ मष्याख्‌ ७ 
&८ 85 >< >< >< < >< < -ढ< >< 9 < -धद। क >96 < 9८ 5-8-8८ >< ऋ 


पत<संयद्वाम इत्याचक्षत एतरहि सर्वाणि वामान्य 
भिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभितलंयन्ति य एवं वेद्‌ ॥२॥ 

इसे संयद्राम' ेसा कहते रै, क्योकि सम्पूरणं सेवनीय वसतु सब 

भोरसे इसे ही प्राप्त होती है; जो इस प्रकार जानता है उसे घम्पणं 


सेवनीय वहतुं सव ओरसे प्र होती र ॥ २ ॥ 


एतं यथोक्तं पुरुषं संयद्वापर 
इत्याचक्षते । कस्मात्‌ १ यस्मादेतं 
सर्वाणि वामानि वननीयानि 
संभजनीयानि शओोमनान्यभिसं- 
यन्त्यभिसंगच्छन्तीत्यतः संय- 
दवामः.। तथेव बिदमेनं सर्वाणि 
वामान्यभिसंयन्ति य एवं बेद 
॥ २॥ 


इध पूर्वोक्त पुरुषको (संयद्वाम 
पसा कहते है । क्यो १ क्योकि 
सम्पूणं वाम--वननीय-सम्भजनीय 
अर्थात्‌ शोभन पदां सव भरसे 
इसे ही प्रप्त हेते है, इसलिये यह 
संयद्वाम है । इक्षी प्रकार एषा 
जाननेवाले पुरषको--जो इते एसा 
जानता दै उसे,सम्पृणं सेवनीय पदाथ 


। सव ओरसे प्राप्त होते है ॥ २॥ 


--* © {~~ 


एव उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वामानि नयति 
सर्वाणि वामानि नयति य पवं वेद्‌ ॥ ३ ॥ 


यही वामनी है, क्योकि यदी सम्पूण वामा वहन करता दै । 
जो एेसा जानता है वह सम्पूणं वामोको वहन करता ष ॥ ३ ॥ 


एष उ एव वामनीयंस्मादेष 
हि सर्वाणि वामानि पुण्यकर्म 


फलानि पुण्यानुरूपं प्राणिभ्यो 
नयति प्रापयति वहति चात्म 
धमेत्वेन । विदुषः फलं सर्वाणि 


यही वामनी है, क्योकि यही 
अपने धमंखूपसे प्राणि्योके प्रति 
उनके पुण्यानुखार सम्प्णं वाम-- 
पुण्य कमफलोका वहन करता दै । 
इसके विद्रानूको मिरनेवाल फल 
जोपेसा जानता दै वह सम्पूणं 


ण्ड १५ ] ्ाङ्करभाष्वाथं ४२ 
192 ॐ 2 2 ॐ अ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ = ॐ = ॐ = = = 


वामानि नयति य एवं वेद |२॥। । बामोका ८ पुण्यकमंफलेङा ) वहन 
करता है ॥ ३॥ 


एष उ एव भामनीरेष हि सर्वषु खोकेषु भाति 
सर्वेषु रोकेषु भाति य पवं वेद्‌ ॥ ४॥ 
यही भामनी दै, क्योकि यष्ठी सम्पूणं लोको भासमान होता द। 
नो रसा जानता ह वह सम्पूणं छोकोमिं भासमान होता रै ॥ ४॥ 
एव उ एव भामनीरेष हि | यही भामनी दै, क्योकि समप 


यस्मात्सर्वेषु लोकेष्वादित्यचन्द्रा- रोम आदित्य, चन्द्र छलौर अगि 
दिह लादिके रूपमे यदौ मासमान- 


गन्यादिरूपंरमाति ० दीप्यते । | दीक्च होता है । ““उसीके प्रका्यसे 
““तस्य मासा सवमिदं विमाति'" | यह सब प्रकाशित है" इस शरुतिसे 
(क० उ० ५।१६) इति श्रते यही सिद्ध होता ै । भतः भामो 


( प्रको) छा वहन करता है 
अतो भामानि नयतीति स्न गल्नी'है अ 


भामनीः । य एवं वेदासावपि | जानता है वह भी सम्पूणं लोके 
सर्वेषु रोकेषु माति ॥ ४ ॥ । माखमान होता दै ॥ ४॥ 


~= © {~ 


बरह्मवेत्ताकी गति 

अथ यद चैवारिमञ्छव्यं कर्वन्ति यदि च नाचि 
घमेवाभिसंभवन्त्यचिषोऽदहरह आपप्रयमाणपक्तमाप्रूय- 
माणपक्षायान्षड़ दङ्डेति मासारस्तान्मासेभ्यः संव 
त्सरश्संवत्सरादादित्यमादित्याचन्द्रमसं चन्द्रमसो 
बिद्यतं तत्पुरुषोऽमानवः स॒ एनान्त्रह्म गमयत्येव 
देवपथो बह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावत 
नावतन्ते नावतन्ते ॥ ५ ॥ 


४२७ छान्डोम्बोपलिषष्‌ [ 


अव [ति पूर्वोक्त हवेत गति बतलाती दै-- ] इसमे छथि 
शवकषमं करे धथवा न ढरे, वह अवचिरभिमानी देदताको ही प्राप्त होता 
है। पिर भर्चिरभिमानी देवतासे दिवसाभिमानी देवताको, दिवकषाभि- 
मानीसे शुङ्पक्षामिमानी देवताको घौर ॒श्ठपक्षाभिमानी देवतासे उत्त. 
रायणके छः मासोँको पराप्त होता है । भसे संवत्सरको, संव्सरसे 
आदियको, आदित्यसे चन्द्रमाको बौर चन्द्रमासे विधतो प्राप्त होता 


अऽ्वाख ४ ` 
न 3 >~ > > 8509 


है । वसे जमानव पुरुष इन्दं 


देवमागं्हामारगं है । इससे जानेवाे परुष इक मानवमण्डलमे नहीं 


ररते नही; ररते ॥ ५ ॥ 

अथेदानीं यथोक्त ब्रह्मविदो 
गतिरुच्यते-यद्‌ यदि उचैवास्मि- 
मेवेविदि शव्यं शवक्म॑मते 
षन्ति यदि च न दुर्बन्ति 
ऋत्विजः स्वथाप्येवंवित्तेन 
शवकमणाङ़तेनापि प्रतिबद्धो न 
न ब्रह्म प्रामोति नच ढृतेन 
` रवकर्मणास्य कशनास्यधिको 
रोकः । “न कर्मणा वर्धते नो 
कनीयान्‌"' (ब्०् ४।४।२३) 
इति भ्रत्यन्तरात्‌ । 


रवकर्म॑ण्यनाद्रं दस॑य- 
न्वियं स्तोति न पुनः शवक 


९ व्यमिति 5 
विदो न कतं । अक्रिय- 


बरहमको प्राप्त क्रा देता है। यह 


अव उपयुक्त त्रहमवेत्ताकी गति 
बतलरयी जाती है--शस प्रकार 
जाननेवाटे इस उपासकषष्टके ख्यि 
। उतत सृतयु होनेपर्‌ ऋ लिगणण श्व- 
कमं करं भथवा न करं उस शव- 
कंमके न करनेसे भी हस प्रकार 
जाननेवाख वह॒ उपा्षक सर्वथा 
प्रतिबद्ध होकर ब्रह्मो प्रप्त न 
होता हो-एेसा नहीं होता ओर 
न उस शवकर्मके करनेसे इसे कोई 
नमसे उरकष्टलो$ ही प्रात होता दै; 
नेषा कि “यह्‌ कर्मसे न तो -बहता 
है ओर न षस्ता ही है" इस एक 
अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है । 
शवकमके प्रति अनादर भ्दर्धित 
करता हुजा यह मन्त्र केवट 
विदयाकी स्तुति करता ह, इस ध्रकार 
जाननेवालेका शवकर्म॑नही करना 
चादिये-- यह नी बतलाता । इस 


~ ~ ~. 


खण्ड १५ | 


€ 
श्द्र्मव्याय 


४२५ 


3 9 ॐ = क क क 2 = 5 ॐ 5 5 5.5 ॐ = 4 


माणे हि श्रवकमंणि कमणां 
फल्ारख्मे प्रतिबन्धः कश्चिदनु- 
सीयतेऽन्यत्र; यत॒ इह विद्या 
फलारम्भकाले शवकमं स्यादा 


न॒ वेति विद्यावतोऽप्रतिबन्धेन 
फलारम्भं दरयति । ये सुखा- 
कारामक्षिस्थं संयद्ामो वामनी- 
भामनीरित्येवंगुणघुपासते प्राण- 
सहितामग्निविद्यां च, तेषामन्यत्‌ 
१ © 
कमं भवतु मा वा भूत्सवेथापि 
तेऽचिषमेवाभिसंभवन्त्यचिरभि- 


मानिनीं देवतामभिसंभवन्ति 


प्रतिपद्यन्त इत्यथः । 
अर्चिषोऽचिर्देववाया अहरह- 
रभिमानिनीं देवताम्व आपूरय- 
माणपक्षं शुक्रपक्षदेवतामापूयं- 
माणपक्षाच्यान्षण्मासालुदङ्न्तरां 


विद्रान्‌के सिवा घन्य िसीके छथि 
ठो शवकमं न कटनेपर उसके 
कर्मफरके आरम्भे कुछ प्रतिबन्ध 
होनेका अनुमान किया जाता दै; 
क्योकि यहो श्रुति उपासनीका फर 
आरम्भ होनेके समय केवरु उपा- 
सकके ल्यि दी - उसका शवकमं 
किया जाय अथवा न किया जाय 
अपरतिबन्धपू्वक फलका आरम्भ 
दिखती है । जो लोग नेत्रम स्थित 
संयद्वाम, वामनी ओर भामनी इत्यादि 
गु्णोसे युक्त युखाकारकी उपासना 
करते है तथा प्राणसहितत अमिविद्याकी 
उपासना करते दै--उनका अन्य 
कर्मं हो अथवा न हो-वे सर्वथा 
अर्चिरमिमानी देवताको ह प्राप्त होते 
है- देसा इसका तात्य है । ` 
अर्चिः--अर्चिरमिमानी देवतासे 


सहः-अहरमिमानी ८ दिवक्षा- 
भिमानी ) देवताको, अहरमिमानी 
देवतासे यापूरयमाण पष - शः 
पकषदेवताको, शु्पक्षसे षड़दङ्-- 
जिन छः महीनोमे सूयं उत्तर दिशामे 
चर्ता है उन मदीनोको भर्थात्‌ 


दिशमेति सविता तान्मासानु- | उरायण-देवताको, उन उपराय 
त्तरायमदेवतां तेभ्यो मासेभ्यः । णके छः मदीनति संबत्सर-संबससरा- 


७२६ 


छाब्दोष्यौपनिषल्‌ 


{ बव्याव ७ 


> > >6८ >< 26 >8 > >9( -9< 9८ 5 28८ ८ ~ > 29 -8< भट -धट >< >~ 


संवत्सरं संवत्सरदेवतां वसः संब- 
त्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रससं 
चन्द्रमसो विध्यतं तततत्रस्थांस्तान्‌ 
पुरुषः कश्चिदूनष्ठलोरूदेत्यामा- 
नवो मानव्यां घृष्टो भवो मानवो 
न भानबोऽमानवः स पुरूष 
एनान्ब्रह्म सत्यलोकस्थं गमयति 
गन्दगन्तष्यभमरयितत्व यपदेश 
भ्यः । सन्मात्रव्रहमप्राप्तौ तदनुष- 
पत्तेः । ब्रह्मेव सन्ब्रह्माप्येति 
दि तत्र वक्तु न्याय्यम्‌ । सर्- 


मेदनिरासेन सन्मात्रप्रतिपति 


भिभानी दैवताको प्रा होते है । 
फिर संवस्षरसे भादित्यको, भादि्य- 
से चन्द्रमाफो ओर चन्दमासे विधुत- 
को प्राप्त होते दै । वहाँ स्थित हुए 
उन उपासर्ोको कोद अमानव-- 
जो मानवी इष्टि होता है उते 
“मानव्‌, कहते है जो मानव न 
हो उद्धीका नाभ “मानव है; 
रेषा कोरै अमानव पुरुष ब्रह्मरोक- 
से आकर स्त्यरछोक्म स्थित ब्रहषके 
पास पर्वा देता है, । गमन करने. 
वाले, गन्तव्य स्थान ओर गमन 
करानेवालेका उल्छेक्च होनेके कारण 
[ यँ कार्यतरह ही अमिपेत है ] 
क्योकि सखामात्र ब्रह्मी प्राति 
यह्‌ कुछ नहीं कहा जा सकता । 
वहाँ तो यदी कहना न्याय्य है कि 
"वह्‌ ब्रह्मरूप हुआ ही नक्षको प्राप्त 
होता है" । भागे छठे ( नध्यायमे ) 
श्रुति सम्पूणं मेदके बाघद्वारा सन्मात्र 
ह्मी प्रापिका उल्टेख करेगी ।# 
तथा निना देखा इअ [ एकलः 
खूप ] मागं॑तो मोक्षम उपयोगी 


वक्ष्यति । न चादृ्ो मागोऽ्ग- | ही नदीं हो सकता । जेघा कि 


, ® यहो यह शङ्काहोती हे कि जब्र परमा्थ॑तः जी ब्रह्म दीदैतो 
न उपासकका मी लोकान्तरमे चाना ठीक नहीं है । 


----~ 


उसका मी मोष्च दी 


हो जाना चाहिये । इसका समाधान करनेके च्यि मगेकी नात कहते ई । 


च्यैव्ड १५] 
>< ८ < -----5- 


धछयाङकरभाष्वा्ं 


४२७ 
"8-5२9-99 


ह ॐ ॐ ॐ ॐ - ॐ: ॐ : 8 
संनायोपतिष्ठते ।स एनमवि दितो| “बह (परमात्मा) विदित न हनेपर 


न भुनक्ति'" इति भरत्यन्तरात्‌ । 


एष देवपथः, देवैरविरादि- 
भि्॑मयितृत्वेनाधिकतैश्पितः 


पन्था देवपथ उच्यते। बरक्ष 
गन्तव्यं तेन चोपलक्षितं इवि 
त्रक्ञवथः । एतेन प्रतिपद्यमाना 
गच्छन्तो ब्रह्मं मानवं मनु संब- 
न्धिनं मनोः खुष्टिलक्षणमावतं 
नावतंन्त आवर्तन्तेऽस्मिज्ञनन- 
मरणप्रबन्धचक्रार्ढा धरीयन्त- 
वत्पुनः पुनरित्यावतंस्तं न प्रति- 
पद्यन्ते । नावरन्त इति द्विरुक्तिः 
सफखाया विद्यायाः परिसमाप्नि- 
परददनार्था ॥ ५ ॥ | 


इस अधिकारीका [ भुक्ति प्रदान 
करके ] पारन नहीं कत्रा" इस 
घन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है । 
यह देवमा है--उपासकको 
पहुंचानेके ल्यि भधिकारपाप् 
देवताभोँसे उपलक्षित होनेके 
कारण यह मागं देवमा कहता 
है, तथा तरक गन्तन्य ( प्राप्तव्य ) 
स्थान है, उससे उपलक्षित होता 
है, इसल्यि बह ब्रहममागं॑है । 
इसके द्वारा ब्रह्मको प्राप्त इए 
अर्थात्‌ जानेवारे उपासक ईस 
मानव-मनुसम्बन्धी अर्थात्‌ म्र 
की सृष्टरूप आवतं नहीं जोदते । 
जिसमे जन्म-मरणके प्रबाहरूप 
चक्रप्र चदे हुए प्राणी षटीयन्त्रके 
समान पुनः-पुनः आवर्तन करते दै 
उस्र इस रोकको “आवतः कहते 
है, इसे वे प्राप्त नहीं होते। 
(नावतंन्ते नावरन्तेः यह द्विरुक्ति 
फलके सटित ॒विदाकी परिसमापि 
मरदर्चित करनेके स्यि है ॥ ५॥ 


3 @ {=== 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि चतुर्थाध्याये 


पञ्चदराखरण्डभाष्यं सम्प्णम्‌ ॥ १५ ॥ 


--; ० *- 


यज्ञोपासना 
रहस्यप्रकरणे प्रसङ्गादारण्य- | रहस्य ( उपासना) के प्रकरणम 
< . | मरगोपदे्चका] प्रघङ्ग होनेके क्षारण, 
कत्व सामान्याच्च यज्ञे क्षेत उत्पन्नं [पूर्वोत्तर प्रकरणा] भरण्यकत्वमे 
सादृश्य होनेके कारण, ओर यम 
व्याहृतयः प्रायधित्तार्थां विधा- | कोई क्षत प्राप्त होनेपर उसके प्ाय- 
श्ित्तके ख्ये व्याहतिरयोका विधान 
तव्यास्तदमिक्स्य चस्विजो | करना ै-तथा प्रायश्चितको जानने- 
वाले चछविक्‌ ब्रह्मके ल्यि मोनक्रा 
विधान करना है--इसस्यि यह 
भ्यते-- प्रकरण जारम्भ किया जाता है- 


एष ह वे यज्ञो योऽयं पवत एष ह यन्निद शस्व 
पुनाति । यदेष यन्निद्‌<सर्व पुनाति तस्मादेष एव 
यज्ञस्तस्य मनद्च वाक्च वर्तनी ॥ १ ॥ 
यह जो चरता है निश्चय यज्ञ ही है । यह चरता हुआ निश्चय इस 
सम्पूणं जगत्‌को पवित्र॒ करता है; क्योकि यह गमन करता हुभा इस 
समस्त संघारको पवित्र कर देता है इसख्ि यही यज्ञ है । मन ओर 
वाक्‌--ये दोनों इसके मागं है ॥ १ ॥ - 
एवह बा एष वायुर्योऽयं | "एष ह वै"--यह वायु ङ 
पत्यं य्ः। ह बा इति | चर्श दे, यश है । द' जीर 
परसिदधा्थावद्योतको निपातौ । भ 


दै । श्रुति्ोमिं यह वायुरूप पर्षा 
वायुप्रतिषठो दि यत्तः प्रसिद्धः बाला दी भषिद्ध दहै । जेसा ङि 


ब्रह्मणो मोनमित्यत इदमार- 





खण्ड ९६ ] क्ाह्रमाण्यार्थं ७९९. 


रतिषु, “स्वाहा वाति धाः'* ] “यह्‌ वज्ञ णापके हाथमे सोपता ई । 
(यजु २।२१ तथा ८ । २१) | भाप इसे वायु देवतं स्थापित 
~ ह + |. ॥ ह्‌ निरचय यज्ञ ही है नो 


इत्यादिश्रुति्यः । बात एव दहि प्रमाणित होता दहै। चलनात्मकं 


तल स्वरूप गुणवाख दहोनेके कारण 
त्मकत्वाक्करियासमवायी बव वीव त 


“बात एब यत्ञस्यारम्भको वातः | है; जैसा कि श्रुति १ 
)) “वायु ही यज्ञका आरम्भक हे ओर 
्रतिष्ठा'" इति च ्रवणात्‌ । | बु हौ उसकी पत द |“ 
एव ह॒ यन्गच्छशलनिद्‌ से | यड चरता---गमन करता हुआ 
इस सम्पूणं जगत्‌को पवित्र-शुद्ध 
करदेता है। जो नहीं चरता 
न द्यचकूतः शुद्धिरस्ति । दोष- | अर्थात्‌ विदितः क्रियाका अनुष्ठान 
नि मै नहीं करता ] -उसकी शुद्धि नहीं 
निरसनं चरतो हिं दृष्टं न | होती । दोषनिदषि गतिदीलकी ` 
स्थिरस्य । यस्माच्च यत्नष इदं | ही देसी जाती दै, स्थिक नही 
४ देखी जाती; क्योकि यह चलता 
सवं पुनाति यस्मादेष एव यज्ञो | हुभा इस सम्पूणं जगतको पवित्र 
कर देता है इसल्यि यदी यज्ञ है, 
यत्पुनातीति । क्योकि पवित्र करता है । 
तस्यास्वैवं विशिष्टस्य यज्ञस्य | उस इसत पकरारकी विरोषता- 


मन्त 
वाक्च मन्त्रोच्चारणे व्याप्ता, वाटे यज्ञके म तोचरणमं प्रवृत्त 
1 ¦ वाणी ओर यथाथं वस्तुके ज्ञानम 
मनश्च यथाभूत व्याप्तम्‌, | प्रवृत्त मन--ये दोनों अर्थात्‌ वाणौ 


ते एते वाङ्मनसे वतेनी मार्गो । ओर मन वर्तनी"-मागं है । जिन- 


जगत्पुनाति पावयति शोधयति । 


१. इस मन्तरकी एक अर्धांटी इस प्रकार है-मनसस्यत इमं देव यज्ञ 
स्वाश वाते घाः' अर्थात्‌ “हे चित्तके प्रवतंकं देव ( परमेश्वर ) ! मै यह यज्ञ भापके 
हामि सोपता हू, अपि इसे बायु देवतमें स्य(पित करं । 


४० छान्दोग्यो पनिचद्‌ 


{ अन्याय ४ 
ऋ ` >< < < -5 --- < << 


व्व 
याभ्यां यस्तायमानः प्रवतंते | के द्वारा विप्तृत क्षिया हा यज 


तेवतंनी । म त होता दै उन रतनी कते 
है । “प्राण जर्‌ अपान इन दोक 
वरया हि वाचधित्तस्य बो्तरो- | योगसे जिनका परिचलन होता है । 
उन वाणी ओौर मनका जो पूर्वापर 
करम हे वही यन्न है"-ेसी एक 
= ; | दूसरी श्रुति कहती 2 । इस प्रकार 
न्तरम्‌ । अतो वाङ्मनसाभ्यां | पसरः शरु 
~ "अय वयोकि वाणी जौर मनसे यज्ञ रवृत 
यज्ञो वर्त॑ते इति वाङ्मनसे | होता है, इसस्यि वाणी ओर मन 
वतेनी उच्येते यज्ञस्य | १ ॥ | यक्के मागं के गये हे ॥ १॥ 
वह्यके मौनभङ्गसे यज्ञकी हानि 
तयोरन्यतरां मनसा सश्स्करोति बह्मा वाचा 
0 ० 
हाताध्वञुरद्वातान्यतरा<स यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा 
परिधानीयाया बह्मा उ्यववद्ति ॥ २ ॥ अन्यतरामेव 
५ [स दवजन्र 
वतनीसस्करोति हीयतेऽन्यतरा स यथेकपाद्रजन्रथो 
(व 
बकन चक्रेण वर्त॑मानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति 
यक्ञरिष्यन्ते यजमानोऽनुरिष्यति स इष्टा पापीयान्‌ 
भवति ॥ ३ ॥ 
उनसे एक मार्गका व्रह्मा मनक द्वारा संस्कार करता है तथा 
होता, जध्वं जर उदूगाता ये वाणी दवारा दूसरे माग॑का संस्कार करते है । 
दि शतरनुवाकरके आारम्म हो जानेपर॒परिषानीया चाके उबारणसे 
पूवं बह्मा बोर उठता है तो वह केवर एक मागंका ही संस्कार करता 
4, क्योकि मनस्ते चिन्तन कंक वार्णं 


स 
र से उच्चारण करनेवाला पुरुष दी 
इनके पूर्वापरभावसरूप कमपूवक यज्च-सम्पादन करता हे । 


तरको यद्ञः'' इति दि श्रुत्य- 





खण्ड १६ | शाङ्कश्मास्याथ ४३१ 


ह, दूसरा मार्ग नष्ट हो जाता है । जिस प्रकार एक पांवसे चरनेवाख 
पुटप अथवा एक पदहियेसे चरनेवाछा रथ नष्ट हो जाता है उसी प्रकार 
हस यज्ञ भी नाशको प्राप्त हो जाता ह । यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात्‌ 
यजमानका नाद होता है; इस प्रकारका यज्ञ कटनेपर वह जीर भी 
अधिक पापी हो नाता है ॥ २-३ ॥ 

तयोरवर्तन्योरन्यतशं वर्तनीं | उन दोनों मर्गोमिसे किसी एक 
मनसा विवेकस्ानवता संस्क- । माग॑का बकषानामकं ऋत्विक्‌ विवेक- 


^ ५ | ज्ञानयुक्त चिषद्रारा संस्कार करता दै 
रोति वरह्मसिवग्याचा वतन्या | तथा होता, अध्वरं जर उद्गाता 


होताच्वधुरु्रतितयेते त्रयोऽप्य- | य तीनो छलक, भी द्रे वार 


९. 
सिजोऽन्यतर बाग्लक्षणां वर्तनीं | गमक नागन वाणीके दवारा ही 
स्कार करते रै । अतः एसा होनेके 


ताचैव संस्तुवन्ति । तत्रैवं सति म 
ष कारण यज्ञम वाक्‌ ओर मन दोनों ही 
वाड्मनसे वतेनी संस्कायं यज्ञे । | मर्गोका संस्कार कना चाहिये । 


इसके वाद्‌ यह ब्रह्मा जिस कालम 


प्रातरनुवाक शख्का प्रारम्भ हो गया 
उपाकृते प्रारन्धे प्रातरनुवाके 
ॐच | ज्ञो उस समयसे परिमानीया चाके 


अस्रे पुरा पूवं परिधानीयाया वत 1 
ऋचो वह्मेतस्मिनन्तरे कारे | यदि मौन छोड़ वेड है तो एक 
भ्यववदूति मौनं परित्यजति | अर्थात्‌ वाकरूप माग॑का दी संस्कार 
यदि तदान्यतरामेव वाग्वतनीं | क्रत( है। इस प्रकार ब्रह्मद्वार 
संस्करोति । बह्मणासंस्कियमा- | संस्कारशूल्य आ एक मनङूप मागं 
णा मनोवर्तनी दीयते बिनस्यति| विनष्ट अर्थात्‌ ठिद्युक्त हो नाता है। 
दिद्रीभवत्यन्यतरा, स यज्ञो | तव वह यज्ञ एकमात्र बवातनीसे 
वाग्ठन्येवान्यतरया वतित॒मश्च- | ही रहनेमे असमथ दोनेके कारण 
वनुबर्रिष्यति । नष्ट हो जाता है । 


अथ स ब्रह्मा यत्र यस्मिन्काल 





७३२ 


छाम्दोभ्योपनिषल्‌ 


[ ध्याय ४ 


>< 9 < -9: ¬> >8< >8. >: >8. क: >: > 8 > > >9- >8- > >8- 8 ~ 3 > 5 


कथमिव ? इत्याह-स यथेकपा- 
पुरूषो व्रजन्गच्छनष्वानं रिष्य- 


ति, रथो वैकेन चक्रेण बठ॑मानो 
गच्छनिरष्यति, एवमस्य यजमा- 
नस्य कुत्रह्मणा यज्ञो रिष्यति 


विनयति । यज्ञं ॒रिष्यन्तं 
यजमानोऽनुरिष्यति; यज्ञभ्राणो 
दि यजमानः, अतो युक्तो यज्ञ 
रेषे रेपस्तस्य । स तं यन्ञमिष्ट 
तादृशं पापीयान्पापतरो भवति 
। २-२॥ 


किस प्रकार नष्ट हो जाता है! 
यह श्रुति वतलरती है- जिस प्रकार 
माग॑मं एक पाँवसे चर्नेवाखा भुय 
गिर जाता है अथवा एकं पहियेसे 
च र्नेवाख रथ नारको प्राप होता 
है उसी प्रकार कुत्सित ब्र्षके द्वारा 
इस यजमाना यज्ञ नष्ट हो नताहै | 
यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात्‌ यजमान- 
कामी नारहोता दै, क्योकि 
यजमाना तो यज्ञ ही प्राण है, 
इसस्यि यज्ञके नाश्च होनेपर उसका 
नाश होना उचित हौ है । बह इस 
प्रकारके उस यज्ञका यजन करनेपर 
पापीयान्‌--अधिकतर पापी होता 
है ॥ २-३॥ 





ब्रह्मके मौनपाठनसे यज्ञकी प्रतिष्टा 

अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानी- 
याया बह्मा व्यववदत्युभे एव वर्तनी सशस्कुवन्ति न 
हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥ स यथोभयपादूत्जन्रथो 
वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः धरतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञ 
भतितिष्ठति यज्ञं ्तितिटन्तं यजमानोऽलुप्रतितिष्ठति 

स इष्टा श्रयान्‌ भवति ॥ ५ ॥ 
ओर, यदि भातरनुवाक्का भारम्भ होनिके अनन्तर परिधानीया 


ऋचासे पव ब्रह्मा नहीं वोता ट तो [ समस्त ऋतिक मिटकर ] दोन 


दी मारगोका संस्कार कर देते है । तव को ॥ रोता । 
निघ भकार दोनों पैतेसे चर्नेवार। पुव ५ के ॥ ) 


“^~ 


१ 


सखण्ड १६ | 


श्ाङ्करभाष्याथं 


४२३३ 


~ >> 9-9-28 8 क < > ~~ 8 --->- ~ 
वाला रथ स्थित रहता है इसी प्रकार इसका यज्ञ स्थित रहता दै, यज्ञ 
स्थित रहनेपर यजमान भी स्थित रहता है । वह [एसा] यज्ञ करके श्रेष्ठ 


होता है ॥ ४-५ ॥ 


अथ पुनर्यत रहा विदवान्मौनं | किन्त॒ नहो दिद्ान्‌ ब्रा मौन 


(४) 0 
परिगृह्य वाग्विसगमङवंन्वतेते 
यावत्परिधानीयाया न व्यवव- 
दति तथेव स्व॑त्विज उभे एव 


वत॑नी संस्कुव॑न्ति न दीयतेऽन्य- 


तरापि। किमिव ? इत्याह पूर्वोक्त- 


विपरीतौ दृष्टान्तौ । एवमस्य 


यजमानस्य यक्ञः स्ववतंनीभ्यां 


वतमानः प्रतितिष्ठति स्वेनात्म- 
नाविन्यन्वरत॑त इत्यथः । यज्ञं 


प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतिति- 


छति। स यजमान एवं मौनविज्ञान 
वदव्रह्मोपेतं यज्ञमिष्टर भ्रेयान्भ- 
वति श्रेष्ठो भवतीत्यथः | ४-५॥ 


ग्रहण करनेके अनन्तर परिधानीया 
शचापर्यनतत वाणी उच्चारण न 
करता हुजा रहता हे, मौन त्याग 
नदीं करता; ओर उसीकी तरह अन्य 
सब ऋतिक्‌ भी [नियमवद्ध] रहते 
है, वरहो वे सव दोनों ही मार्गोका 
संस्कार कर देते है । तव कोई भी मागं 
नष्ट नहीं होता । किस प्रकार नष्ट 
नदीं होता, इसमे श्रति पहलेसे 
विपरीत दृष्टान्त देती है | ताप्य यह 
है कि उसी प्रकार अपने दोनो मर्गो 
द्वारा स्थित हुभा इस यजमानका 
यज्ञ प्रतिष्ठित होता हे, अर्थात्‌ अपने 
स्वरूपसे अष्ट न होता हआ वतमान 
रहता है । यज्ञके प्रतिष्ठित रहनेपर 
यजमान भी उसीकी तरह प्रतिष्ठित 
रहता हे । इस प्रकारके मौन- 
विज्ञानयुक्त ब्रह्मावाख वह यजमान 
यज्ञ करके श्रेयान्‌ होता दहे अर्थात्‌ 
रेष्ठ होता है ॥ ४-५ ॥ 





इतिच्छान्दोग्योपनिषदि 


चतुथोध्याये 


षोडश्खण्डभाष्यं सस्पूणंम्‌ ॥ १६॥ 
नीवीएड 


खषदक्र श्ट 

यन्न-दोषके प्रायध्ितस्यते व्याह्टतियोकी उपासना 
अत्र ब्रह्मणो मौनं विदितम्‌; | यहाँ बरहम मौनका विधान 
करिया गया, उसका अंश होनेप 
ब्रह्मत्व कर्मका विनाश होने अथवा 
स्मि होत्रादिकर्मरेषे व्याहति- | अन्य किसी होत्रादि कर्मका विनाश 
1 ९ | होनेपर व्याहृतिहोम यह ॒प्रायरिचत्त 
होमः प्रायधित्तमिति तदथं ह, के हे वातय वि 
व्याहृतयो विधातव्या इत्याह- | करना दै, इट्य श्रुति कहती दै- 
प्रजापतिखोकानभ्यतपत्तेवां तप्यमानानाश्रसान्‌ 
प्राब्रहदग्नि एथिव्या वायुमन्तरिश्चाद्‌ादित्यं दिवः॥१॥ 
भजापतिने लोकोको रक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया । उन तप 


किये जाते हुए ोकोँसे उसने रघ निकारे । प्रथिवीसे अग्नि, अन्तरिक्षसे 
वायु ओर दुरोकसे आदियको उद्धत किया ॥ १ ॥ 


प्रनापतिर्छोकानभ्यतपन्लोका- पजापतिने शोकोको अर्थ्‌ 


तद्रेषे ब्रह्मत्वक्म॑णि चाथान्य- 


8 सार 
ग्रहण करने की इच्छसे ध्यान 
तपं क्या । इस प्रकार तप्ये 
मानानां लोकानां रसान्सार्‌- | चते हए उन रोकोकि साररूप 


लल्ला ता रोको राड्‌, उद्धूत अर्थात्‌ 
नप्राष्ददुद्धूतवाञ्ज ‡ & 
पत्यथः || अद श्वा । किन ररसोक्ो रहण 


रक्षणं तपश्चकार । तेषां तप्य- 


कात्‌ ८ अग्नि रतं एथिन्याः, । म्वा £ प्रथिवी जम्निरूप रस ` । ४ 








ण्ड १७ ] शाद्करमाथ्याथं ४३ 


वायुमन्तरिकषात्‌, आदित्यं , अन्तरिक्षसे वायुूप रस ओर दुरोक- 
दिवः । १॥ से आदिव्यङप रस ग्रहण किया ॥१॥ 


--ज#क्छ--- 


स एतास्तिश्चो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमानाना 
रसान्पराब्हदग्नेक्रैचो वायो्यजूरषि सामान्यादित्यात्‌ ` 
॥ २ ॥ 

[ फिर ] उसने इन तीन देवताओंको रक्ष्य करके तप क्रिया । 
उन तप क्रिये नाते हुए देवता्भसि उसने रस निकाठे । अग्निस ऋक्‌, 
वायुसे थजुः ओर भादिव्यसे साम ग्रहण क्यि ॥ २॥ 

पुनरप्येवमेवारन्याद्याः स | किरि भी उसी प्रकार उसने 
एतास्तिस्रो देवता उदिश्याम्य- | अग्नि जादि तीन देवताओंको रक्षय 
तपत्‌ । ततोऽपि सारं रसं त्रयी- | बनाकर तप क्रिया । उनसे भी त्रयी- 
विद्यां जग्राह ॥ २ ॥ विदयाङप सार-रस ग्रहण किया ॥२॥ 


--: ० :~~ 


स एता त्रयीं वियाभभ्यतपत्तस्यास्तप्यमानाया 
रसन्ध्राडहद्‌भूरित्यग्भ्यो भुवरिति यजुभ्यः स्वरिति 
सामभ्यः ॥ ३ ॥ तदयद्यक्तो रिष्येद्भूः स्वाहेति 
गाहषत्ये जुदुयाटचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य 
विरिष्ट< संदधाति ॥ ४ ॥ 

[ तदनन्तर ] उसने इस त्रयीविदयाको रक्षय करके तप क्रा । 
उस तप की जाती हुई विद्यसे उसने रस निकाले । क्‌ श्रुति्येसि भूः, 
यजुःश्रति्योसि युवः तथा सामश्रतिर्योसे स्वः इन रसोको रहण किया । 
उस यज्ञम यदि ऋक श्रुतियोकि सम्बन्धसे क्षत हो तो भः स्वाहा ॥ 
ठेला कहकर गारहपत्यागनमे हवन करे । इस पकार वह छचा्थोके रससे 
च्चाओकि वीरयदरारा ऋक्सम्बन्धी यत्क क्षतकी पूर्ति करता है ॥२-४॥ 


छेदद छान्दोग्योषनिषव्‌ 


डः >< < ऋ > > ¬ ~< -8- > -- ~ , 1 = = [ भ्याष्‌ | 
र ए स्र ४. ; ऋ > 
स एता पृनरभ्यतपतत्रयीं | फिर उपने इस नवीन 


| लक्ष्य करके तप क्षिया | 

विद्याम्‌ । तस्यास्तप्यमानाया रभ य । उप मे 
म्‌ | क नाती इद विके श ५ 
भूरिति व्याहृतिखगस्यो जग्राह, | इष व्याहतिको ऋकभरतिेति रह 
किया । तथा भुवः इ यष. 
को यजुःश्रुतिर्योसे ओर छः ष 
स्वरिति व्याहृतिं सामभ्यः । | ववतो समति र 
४ _ ¦ किया । इसीसे ये महागयाहं 

अतएव लोकदेववेद्रसा गहाव्या- ¦ छोक, देव जर वेदी सारभूत ६। 
हृतयः अतस्तत्तत्र यज्ञे यदुक्त | इसलिये यदि उस यक ऋसे 
(बधार ~," ¡ ऋकके सम्बन्धसे -छकूके का 
ए 1 भ सिषिवतः शत प्रा हो ती "भूः स्वाहाः प 
भते प्राप्नुयाद्धःस्वाहेति गाहपत्ये] ककर गाहप्याम्िम हवन के 


~ | उप्त अवस्थानं वही प्रायरिचत्त दै। 
यहुयात्‌, सा तत्र प्रायश्चित्तिः । 


~ किस प्रकार १ ऋचाओकि ही सपर 
1 छचाभेव, तारत क्रया-| ऋचाओंके वी्य-जोनद्रारा इ 


विशेष = † न -सम्बन्धर रि 
णम्‌, रसेनचां वीर्थेणोजस- 9 अ त ८ ती ` 
चा यजतस्य ऋक्संबन्धिनो यज्ञस्य रि ह 0 त्‌ ` 
विरिष्टं विच्छिन्न सषतरूप्ुतपज्नं | १८ कता € । श 


क 4 इसमे (तत्‌ः यह ्रियाविदषण | 
+ २ । 


| 
यवरिति व्याहृतिं यजुर्मय, | 





==> 80 4 


मय यदि यजो ििशुवः स्वेत दक्षिने 
| जहवाचजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां 
यज्ञस्य विरिषट<संदधाति ॥ ५॥ । 


ह 


क्षण्ड १७ 1 ध्ाद्रभाष्याथे ४३७ 
> 8-99-5 3-29-9 9 ० ॐ ॐ ॐ - ॐ > ॐ ॐ ॐ 5 ॐ 3 


जोर यदि यजुःश्रुतियोकि कारण क्षत हो तो सुवः स्वाहा! पे 
कहकर दक्षिणाग्निमे हवन करे । ईस प्रकार वह यजुओंके रससे यजुभोके 
वीर््रारा यज्ञके यजुःसम्बन्धी क्षतकौ पूतं करता है ॥ ५ ॥ 


अथ यदि सामतो रिष्येत्स्वः स्वाहेत्याहवनीये 
जुहुयात्सास्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य 
विरिष्ठ श संदधाति ॥ ६ ॥ 


जौर यदि सामश्रति्योकि कारण क्षत हो तो स्वः स्वाहा' पषा 
कृकर आहवनीयाग्नम हवन करे । इस प्रकार वह सामके रससे सामके 
वीयं द्वारा यक्ञके सामस्बन्धी क्षतकी पूर्तिं करता है ॥ ६ ॥ 


अथ यदि यजुष्टो यजुनिमित्तं | ओर यदि यलुर्निमित्तक क्षत 
हो तो “सुवः स्वाहा" एेसा कहकर 

स्ष्िदधवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ दक्षिणाग्निमे हवन करे, तथा 
सामसम्बन्धी क्षत होनेपर (स्वः स्वाहा" 

जुहुयात्‌ । तथा सामनिमित्त रेषे | एेसा कहकर आहवनीयाग्निमे हवन 
करे। इस प्रकार वह पूववत्‌ 

स्वः स्वाहैस्याहवनीये जुहुयात्‌ । | ( ऋकसम्बन्धी क्षते कि हृएके 
म. अनुसार ) यक्क्षतकरी पूति कर र्ता 

त॒था पू्बदयज्ञ सद्धात । ब्रह्म हे | [ ये सब प्रायरिचत्त होता, 
उदुगाता ओर अध्क्थुदरारा होनेवलि 

निमित्ते तु रेषे रिष्वग्निषु ति- | कष्तोकी पूर्तिके रमि है । ] बरहमाके 
1 कारण यक्क्षत होनेपर॒तो तीनों 
सूमि्याहितिभिजहृयात्‌ । य्या | जम्न्ोम तीनो ्याहवियो द्वारा इवन 
करे; कयोकि [उसके दवारा होनेवाल] 

हि विद्यायाः स रेषः। “अथ केन। वह यकक्षत तो तरयौविदयाका दी क्षत 


७३८ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ 


-8>8- >< 5-33-8 > ~> ~> < < ऋ ~ 
ब्रकषत्मित्यनयेव त्रय्या विद्य 
षिद्ध होता है १ इत तीन 





या"! इति श्रतेः । न्यायान्तरं बा 





शरग्यं बहमत्वनिमित्ते रेषे ॥५-६।॥ दना चादिये ॥ ५.६ ॥ 
-‡ ० १ 


विद्वान्‌ बरह्माकी विशचि्टता 


ही" इस भ्रुतिसे सिद्ध होता है| | 
अवथा ब्रहमत्वके कारण होनिवर । 
यज्क्षतके लिये कोई भोर न्यप्र 


। 


४ | 
= > 9९ | 


हे । जैसा कि "ध्रहमव किप ह्‌ । 


तयथा खवणेन सुवणेसादध्यास्सुवर्णेन रजतः 
रजतेन पु त्रपुणा सीसशसीसेन रोहं ऊोहेन द्‌ | 
दारु चमंणा ॥७॥ एवमेषां ोानामासां देवतानाम 
स्याखरस्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टरसंदधाति 
भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रेवंविद््ह्मा भवति॥८॥ । 
इस विषयमे [ रसा समञ्ञना॒चाटिये फि ] जिस भकार खण ` 


( कार ) से घुवणंको, घुवणंसे चोँदीको, चँरीसे त्रपुको, त्रपुसे सीपेको 
सीसेतेठोदेको, ओर रोहसे कषक अथवा चमत काको नेहा 
जाता हे । उसी प्रकार इन रोक, देवता ओर त्रथीविदयाके वीर्ये यत्क 
कतक प्रतिसंषान किया जाता है । निस इस प्रकार जाननेवाला त्र 
होता है वह यज्ञ नि्वय ही मानो ओषधिर्ोदार संसृत होता दै ॥७-८॥ 

तद्यथा खणेन सुबणं संद- 
चाहिये किं ] जिस प्रकार खण 


न्यात्‌ क्षारेण टङ्णादिना । | टङ्कणादि क्षारसे सुवणको नोर्ह 


दुत्वकरं ह „ |जता दहै, क्योकि वह कलि | 

खरे मृ द तत्‌ । सुवर्णेन घवो कनकल 8. 
ए्जतमराक्यसंधानं संदध्यात्‌ से वचांँदीको- जिसका जुडना | 
द्‌। | अयन्त केटिन दै जोह 8 ५ 

इसी भकार चादीसि तपु (रगा १. 


रजतेन तथा त्रपु, बरपुणा सोसं 


उस सम्बन्धमे [ एेसा समश्षना 


। 
। 
॥ 
| 
| 


षण्ड. ९ ड 
्च्ड १७] ह्लाङ्रमाव्वा थ ४३९ 
838 >< >< >< >< < < < < < >< < < < > ऋ 8८ € 8८ < >ढ< >: 


सीसेन शह रोदेन दारु | त्रपुस सीसा, सीसेसे रोदा ओर 
दार चर्मणा चर्मवन्धनेन । | रोदे काष्ठ अथवा च चमक 
बन्धनसे काष्ठको जोडा जाता दै, 
उसी भ्रकार इन रोक, देवता भौर 
त्रयीविद्याके वीय--रससं्क ओज- 
से यज्क्षतकी पूर्ति करते है । एुशि- 
क्षित चिकिस्तकके द्वारा [ नीरोग 


एवमेषां छोकानामासां देवता- 

नाभस्याक्चय्या विद्याया वीर्येण 

रसाख्येनौजसा यज्ञस्य विर 

संदधाति । भेषजकृतो ह वा एष 

यत्तः, रोगातं इव पुमांधिकित्स- 

| सुदिकितिनेष यज्ञो मबति। यह यज्ञ निरचय ही मानो जोषधिर्यो- 
द्वारा सुसंस्कृत होता है- कोन यज्ञ? 


कोऽसौ ? यत्त॒ यस्मिन्यत्त | जहाँ अर्थात्‌ निस यक्ञमे इस प्रकार 
एवविचयथोक्तव्याहृतिहोमग्राय- | नाननेवाखा यानी पूवक्त व्याहतिः 


क्य इए ] रोगातं पुरुषके समान 


"~~~ 


यित्तमिदुनहलविग्भवति होमूप प्रायरिचत्त जाननेवाखा बह्मा 
त्वग्भवा 
श्त्तविदूब्रह्मत्विमभर्वाति स यज्ञ ऋलिक्‌ होता त 
५ 
इत्यथः ॥ ७-८ ॥ इसका तात्पयं हे ॥ ७-८ ॥ 
किं च- | तथा-- 


एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रवंविद्बह्या 

भवत्येवंविद९ह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत 
आवतते तत्तद्रच्छति ॥ ९ ॥ 

जहाँ इस प्रकार जानेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्परवण 

होता है ¦ इस प्रकार नाननेवाले बरक्षाके उदेरयसे दी यह गाथा प्रसिद्ध 

हे कि “जह जहो कर्म आदृत्त होता है वहीं वह पर्हैच जाता है ॥९॥ 

एष ह॒ वा उदकप्रवण उदल्‌- | जहो इस भकार जाननेवाल 

ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्पवण- 

निम्नो दक्षिणोच्छायो यज्ञो । उरी भोर का हमा भौर 


४४० छग्दोन्योवनिषल्‌ | 
र च = # 


^~ [9३ पत्तिरेत ^~ > > 
भवति, उत्तरमागंप्रतिपत्तहेतरि- | दक्षिण ओर ऊ इमम | 


उत्तरमागंकी प्रापक हेतु होत ६ । 
श्म भकार _ जाननेवले क्रा 
विदं ह वै ब्रहाणमतविजं तय | ऋषिक विषमे ही ऋ 
क स्तुति कनेवाटी यह अनुगाधा है 
पजुगाथा ब्रह्मणः पततिपरा-- | निस-निस देशे करम ह 
यतो यत आवतते कमं प्रदेशादृ- | दै अर्थात्‌ होता आदि भु: | 
0 १ यज्ञ॒क्षतय॒क्त होता उपस । 
त्वजा यज्ञ कषतीभवंस्तत्तदयञस्य | पर कतयु्त रीत द उम्‌ 


॥ - „~ _ | यजकेक्तकी भातत पूति कत । 
भतसूपं॒प्रतिसंद्धत्मरायधित्तेन | हया ब्रहम जाता है अर्थात्‌ ह 


गच्छति परिषाख्यतीत्येतत्‌ ।।९।॥ की सव भकार रक्षा कता दै॥ ९॥ | 


स्थथःयत्रेषबिद्बह्मा भवति । एवं- 





मानवो बह्मेबेक ऋखिकछुरुनश्वाभिरक्षव्येवंवरिद् वै । 
बरह्मा यज्ञं यजमानर<सर्वाशश्चत्िजोऽभिरक्षति तस्मादेवं 
विदमेव बह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंतिदम्‌॥१०॥ 


पकं मानव बह्मा ही चल्िक्‌ है । निघ पकार युद्धम 4 | 
यद्धार्ओंकी रक्षा करती हे उसी प्रकार पेसा लाननेवाला नवा थ | 
यजमान जर अन्य समस्त ॥छविजोकषौ भी सब भरसे रक्षा कता दै। | 
तः ₹घ भकार जाननेवलेको ही नद्या बनवे, पे न जाननेवहिकी । 
नही, देसा न जाननेवल्को नही ॥ १०॥ 


मान बो ब्रह्मा मोनाचरणान्म- | मोनाचरण करनेसे अथवा मतं 


करनेके कारण ब्रह्मा मानव & 
ननादवा ानवच्वात्ततो बहयवैक- | अतः ज्ञानवान्‌ होनेके श्र 


~ घ | 
पः ६ बरह्मा ही एक ऋषिक्‌ दै। न्ि 
प्लक्डु सन्कत्‌ तुच योद्धनारूटानश्चा पकार युद्धमे घोड़ी (कुखन्‌/-- 


क्षण्ड १७ ] 


द्याहृरथाष्वार्थ 


७४१ 


= ~ -9 < ~ >9 > >9; 9८ 9 8८ ~< >< 8 >< ~< < 8 ¬ 8 क ˆ >~ > ~< ~ 


बडवा यथाभिरक्षत्येवंविद्‌ इ वे 
ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वाश्चकर- 
सिविजोऽभिरक्षति तत्कृतदोषाप- 
नयनात्‌ । यत एवं विरिष्टो 
ब्रह्मा विद्वान्‌, तस्मादेवंविदम्‌ 
एब यथोक्तव्याहत्यादिविदं 


ब्रह्माणं कुवीत, नानेवंविदं 


कदाचनेति । द्विरभ्यासोऽध्याय- 


परिसमाप्त्य्थंः ॥ १० ॥ 


कर्ताभंकी यानी अपनी पीटपर्‌ चदे 
हुए योद्धार्भोी सब प्रकारसे रक्षा 
करती है उसी प्रकार एेसा जानने- 
वाला ब्रह्मा भी यज्ञ, यजमान ओर 
समस्त छविनोकी, उनके किये हुए 
दोर्षोकी निवृत्ति करके, सव ओरसे 


"रक्षा करता हे। क्योकि विद्वान्‌ 


ब्रक्षा एेस्ा विशिष्टगुणसम्पन्न होता 


है इसस्यि इस प्रकार--उपयुक्त 
व्याहति आदिका ज्ञान रेखनेवाले- 
को दही ब्रह्मा बनवे; इस प्रकार न 
ज्ञाननेवालेको कभी न वनवे । ना- 
नेवंविदं नानेवंविदम्‌ यह द्विरुक्ति 
अध्यायी समाधिके ल्थि हे 
॥ १० ॥ 


०9 @ {= 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि चतु्थाभ्याये 
सपद्दाखषण्डभाष्यं सस्पणाम्‌ ॥ १७॥ 


--+ क्म 


इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पज्यपादशिष्यस्य परमं सपरिनाजकाचौयस्य 
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतो ऊान्दोग्योपनिषद्ि 
वरणे चतुथोऽभ्यायः समासः ॥ ४ ॥ 





पञ्चम 


५ 
[र 


कथ्यः 


अध्याय 


+= ॥ 1 


~> ज~््2~-~ 


सगुणब्रह्मविद्याया 


गतिरुक्ता । अथेदानीं 
श्वमेऽध्याये पश्चा 


प्रिबिदो गृहस्थस्योर्वरेतसां च 
विद्यान्तरशीलिनां 
तामेव गतिमनूघयान्या दक्षिण- 
दिक्सबन्धिनी केवलकर्मिणां 
धूमादिरक्षणा पुनरादृतिरूपा, 
तृतीया च ततः कष्टतरा 
संसारगतिः, वैराग्यहैतोर्वक्तव्या 
इत्यारभ्यते। प्राणः शरेष्ठो वागा- 
दिभ्यः प्राणो बाब संवर्म इत्यादि 


उपक्रमः 


भद्रालूनां 


च बहुशोऽतीते ग्रन्थे प्राणग्रहण | “ 


छतम्‌, स कैथ श्रेष्ठो बागादिषु 


सयः सहत्यकारित्वाविशेपे, कथं 


उत्तरा | 


[ गते ध्यायसे ] घगुण ऋ 
विदयाकी उत्तर ८ उत्तरायण भर्ग 
रूपा) गति कह दी गयी । अब 
इसके ` अनन्तर पञ्चम अध्यायमे 
पञ्चाग्निवेत्ता गृहस्थ तथा अन्य 
विदाओम निष्ठा रखनेवाले श्रद्वा 
उध्वरेतार्भोकी उसी गतिकरा अनु 
वाद्‌ कर केवह कर्म॑परायण पुरषं 
की उससे भिन्न दक्षिण दिशचासे 
सम्बन्ध रखनेवाटी धूमादिरक्षणा 
पुनराद्त्तिरूपा गति ओर तीसरी 
उससे भी किल्टतर ॒संसारगतिका 
वैराग्यके छ्यि वर्णन करना टै- 
इसीसे आगेका म्रन्थ आरम्भ क्या 
जाता है । वागादिकी अक्षा प्राण 
ष्ठ है; क्योकि गत ब्रन्थरमँ श्राण 
ही संवगं है" इत्यादि अनेकों प्रकार- 
से प्राणका ग्रहण किया गय है । 
सवके साथ मिलकर कार्यं केम 
समानता होनेपर भी वह वागादि 
न्दि्योमि श्रेष्ठ क्यो है ? गौर करो 
उसकी उपासना करनी चाहिये ¢ 


क्षण्ड १) छ्ाङ्रमाष्याय ३ 


च तस्योपासनमिति तस्य श्रेष्- । इस शाङ्काकी निवृत्तिके स्यि उसके 
रे्ठत्व आदि गुणोका विधान करने- 
की इच्छासे यह भागेका प्रन्थ 
आरम्भ किया जाता है-- 


त्वादिशुणविधित्सयेदमनन्तरमा- 


रभ्यते- 


उयेषठशरेष्टादिगुणोपासना 
थो हवे ्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्यश्च ह वे 
्रेटश्च भवति ब्राणो वाव अयेष्श्च भे्ठश्च ॥ १ ॥ 


जो ज्येष्ठ जोर शरष्ठकतो जानता है वह्‌ उयेष्ठ ओर श्रेष्ठ हो जाता 
है । निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ जौर श्रेष्ठ दै ॥ १॥ 


यो ह वै कथिज्ज्यषठं च 
प्रथमं वयसा श्रेष्ठं च गुणेरभ्य- 
धिकं वेद, स व्येष्ठशच हवे 
्रष्श्च भवति । फरेन पुरुषं 
प्रलोभ्याभिभखीडत्याह ~ प्राणो 
वाव ज्येष्ठश्च वयसा वागा- 
दिभ्यः । गर्भस्थे हि पुरुषे 
प्राणस्य बृत्तिर्वागादिभ्यः पूव 
रुग्धात्मिका भवति, यया गँ 
विवधेते । चश्षरादिस्थानावय- 
वनिष्यत्तो सत्यां पशचाद्रागादीनां 
वृत्तिखाभ इति प्राणो ज्येष्ठो 
वयसा भवति । श्रेष्ठत्वं तु प्रति- 


जो कोई ज्येष्ठ--आयुमे प्रथम 
ओर श्रेष्ठ गुणोमे अधिकको 
जानता है वह निरचय ही चयेष्ठ 
ओर भेष्ठ हो जाता दै । इस प्रकार 
फलके द्वारा पुरूषको प्ररोमित कर 
उसे प्राणोपासनाके अभिमुख कर 
श्रुति कहती है--वागादिकी पेक्षा 
प्राण ही आयु ज्येष्ठ दै, क्योकि 
पुरुषके गर्भस्थ होनेपर बागादिकी 
अपेक्षा प्राणकी वृत्ति पहले रुन्ध- 
स्वह्प होती दै, जिससे क गभं 
बद़ृता है । वागादिकी वृत्तिर्योका 
छाम तो चक्रादि गोर्क जीर 
अवयवकि निष्पन्न हो जानेके 
अनन्तर होता है; इख्यि आायुकी 
दृष्टिसे प्राण ज्येष्ठ है । तथा उसकी 


७४७ छाग्दोग्योपनिषव्‌ [ मध्वा ५ 
= ॐ 
पादविष्यति सुय इत्यादिनि- | श्र्ठताका तो श्य" लाह 
दशनेन । अतः प्राण एव । द्न्तदटारा [ बारह मन्त्र 

करण | प्रतिपादन क्रिया जायगा । भत; 
ज्येष्ठ श्रषठश्नास्मिन्कायंकरण रस॒ का्करणसंबारमे भाण ह 


सते ॥ १॥ ज्येष्ठ जर श्रेष्ठ हे ॥ १ ॥ 
यो ह वे वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति 
वाग्वाव वस्तिष्ठ; ॥ २ ॥ 


जो कोई वसिष्ठको जानता है वह स्वनातिर्योम वसिष्ठ होता दै; 
निचय हौ वाक्‌ वसिष्ठ हे ॥ २॥ 
योह दे वसिष्ठं वसित तम-| जो कोई वसिष्ट--भवन्त 
माच्छदयिदठतमं : = | बसनेवाे भर्थात्‌ आच्छादन करने- 
| व | वालेको अथवा अत्यन्त ॒वघुमान्‌ 
योधरद्‌ स॒ तथेव सिष्ठो इ | ( षतवान ) छो जानता है 
भवति स्वानां ज्ञातीनाम्‌ । | उसी भकार भपने सनातम 
कस्तं वसिष्ठः १ इत्याह-- | वसिष्ठ होता है । सच्छा तो १ 
. ~ ति कहती £ 
तलत सिः ९, | कौन है £ इसपर श्र 
क  बाग्पनो निश्चय हौ वाक्‌ वसिष्ठ टै; करयो 
पुमा बसन्त्यभिभवन्त्यन्यान्व- , वाग्मी (श्रेष्ठ वक्ता ) कोग दी बसते 


समत्तमाश्च, अतो वाग्बसिषठ अर्थात्‌ दूसरोका परामव करते दै 
ओर अधिक धनवान्‌ भी होते दै 
५७० अतः वाक्‌ ही वसिष्ठ है ॥ २॥ 


यो ह वे पतिष्ठं वेद्‌ © ह॒ तिष्ठत्यस्मिश्थच 
क चक्षुर्वाव पतिष्ठा ॥ ३ ॥ 
भतिष्ठित होता है; र 8 ¢ ३॥ क न नीः 





€ 
व्ड १1] शार थाष्याथ ४९ 
८-9-०8 ~| २-2-92 ऋ = 


योह वै प्रतिष्ठां वेद सं| जो कोई प्रतषठाको जानता दे 
अस्सि्लोकेऽपुभ्मिश्च परे प्रति- | द इस रोक ओर्‌ प्ररोकर्म 
तिष्ठति इ । का तर्हि श्रव्षठा १ | भतिष्ठित होत दै । भन्छालो 
इत्याह--चक्षुबौव प्रविष्टा । तिष्ठा कया है ! इसपर श्रुति कतौ 
चकपा हि पन्समे च दग | ६ ६ श १ 

स | चक्षसे देखकर ही पुरुष घम जोर 
च प्रतितिष्ठति यस्मात्‌, अतः | विषम प्रदेशमे स्थित दोता रै, 


प्रतिष्ठा चक्षुः ॥ ३ ॥ इसल्यि च्च दी प्रतिष्ठा ै॥३॥ 
यो ह वे संपदं वेद सश्हास्मे कामाः पन्ते 
देवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव संपत्‌ ॥ ४ ॥ 
जो कोड सम्पदको जानता दै उसे दैव जर मानुष काम ( मोग ) 
सम्यक्‌ पकारते प्राप होते दं । श्रोत हौ सम्पद्‌ है ॥ ४ ॥ 
योह संपदं वेद तस्मा| नो कोई सम्पदो जानता दै 
अस्म दैवाश्च मानुषाश्च कामाः | उसे देव ओर मानुष भग सम्यक्‌ 


स प्कारसे प्राप्त होते है । अच्छा तो 
न्तेह। का तहिं संपद्‌ ! समद्‌ वया दै ६ इसपर शति कहती 


इत्याह- शरोत्रं वाव संपत्‌ । | ह श्रोत्र ही सम्पद्‌ दै, वर्थोकि 
यस्माच्छोत्रेण वेदा गृह्यन्ते | श्ोत्से वेद॒ ओर उनके अथक 
तदर्थविक्ञानं च, ततः कर्माणि | ध ८ ह, 

व ~ फर्‌ कमं किय जा र्‌ तद्‌- 
लिः 1 व । | नन्त भोगोकी भा दोती हे। इस 
इत्येवं कामसंपद्ेतत्वाच्छोतर | भकार भोगकर प्रािके हेत होनेके 
वा संयत्‌ ॥ ४ ॥ कारण श्रोत्र ही सम्पद्‌ ह ॥ ४ ॥ 





--* ० २- 


यो ह वा आयतनं ेदायतनः९ह स्वानां भवति 
मनो ह वा आयतनम्‌ ॥ ५॥ 


छ४द छान्दोग्योपनिषद्‌ [ जण्याय ५ 


> 8 9 
लो आयतनको जानता है वह स्वजाति्योका जायतन ( धर 
होता दै । निरुचय ही मन आयतन हे ॥ ५ ॥ 


योह वां आयतनं वेदायतनं | जो आयतनको जानता है दह 

, #  स्वन्नौका आयतन होता ह अर्थ्‌ 
ह ती 9 ~^ | उनका भाश्रय वन जाता है । 
त्यथः । कि तदायतनम्‌ १ इत्याह | 
त्यथः । कं तदापतनम्‌ * सत्पाह | आयतन क्था दै १ इसपर रति 


[4 आयत्‌ ~ ^ 
मनो इ वा आयतनम्‌ । इन्दर कहती है.--मन दी आयतन है । 


इन्र्योदारा खये हए एवं मोक्ताकै 
थानां प्रत्ययरूपाणां मन आय- | प्रस्ययरूप विपर्योका मन दी आयतन 
तनमाश्रयः; अतो मनोह वा | यानी आश्रय हे; इसक्मि मन हौ भवः 
आयतनभित्युक्तम्‌ || ५ ॥ । तन है--एेसा कडा गया दै ॥५॥ 


~~न ~ 


योपहतानां विषयाणां भोक्त्र- 


इन्द्रियो विवाद 
अथ ह प्राणा अहर्भेयसि च्यूदिरेऽहः 
~. त 
श्रेयानस्म्यरह श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥ 
एक बार प्राण ( इन्दर्यौ) श श्रष्ठह, मे त्रष्ठहै इसप्रकार 
अपनी श्रष्टताके ल्ि विवाद करने रगे ॥ ६ ॥ 
अथ ह प्राणा एवं यथोक्त- | णक वार इस पकार पूर्वोक्त 
गुणाः सन्तः अश्रेयसि (अहं | गुरणोसि युक्त प्राण अपनी शरेष्ठतके 
= (~ ०.८ चथ > 1 > त्‌ नन १ इष्‌ 
भ्रेयानसिमि अहं परयानस्मि' इत्ये । स्थि भे टह म शरेष्ठ £ 
(९ : अर्थात्‌ 
तलित्लौ ल जहति न | भयोजनसे विवाद करने रगे; 


विरा वहूत-सी विरुद्ध बाति 
विरुद्रं चोदिर उक्तवन्तः । ।६॥ । लगे ॥ ६ ॥ 





2 
-- 


खर्छ १] 


शाङ्करमास्याथं 


9४.3 


> > >< <: < ~: ~ ~ ~ > 9 < ¬. ~: ~ ~: ¬: ~< ¬ ¬ < ¬ ¬ त 
ग्रजापतिका निणय 


ते ह प्राणाः ्रजापति पितरमेस्योचुभेगवन्को 

नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्कान्ते शरीरं 
पापिष्ठतरमिव द द्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ 

उन प्राणोने अपने पिता प्रनापतिके पास जाकर कहा--^भगवन्‌ | 


हममे कोन श्रेष्ठ है  प्रनापतिने 


उनसे कहा--तुममेसे जिसके 


निकर जानेपर शरीर अत्यन्त पापिषठ-सा दिखायी देने रगे वही तुमे 


ष्ठ हैः ॥ ७ ॥ 
तेह ते हैवं विवदमाना 

आत्मनः श्रेष्ठ त्वविज्ञानाय प्रजा- 

पतिं पितरं जनयितारं कञि- 

देत्योचुरुक्तबन्तः- हे भगवन्को 

नोऽस्माकं मध्ये श्रष्ठोऽभ्यधिको 
गुणः ? इत्येवं पृष्टवन्तः । 

वान्पितोवाच ह-यस्मिन्वो 
युष्माकं मध्य॒ उत्क्रान्ते शरीर- 
मिदं पापिष्ठमिवातिशयेन जीव- 
तोऽपि सयुकरान्तप्राणं ततोऽपि 
पापिष्ठतरमिवातिशयेन दुश्येत 
कुणपमस्प्र्यमशुचि दुरयेत, 

स वो युष्माकं श्रेष्ठः, इत्यवोः | 
चत्काक्रा तद्दुभ्खं परि 

जिदीरषुः ॥ ७ ॥ 


इस प्रकार विवाद करते हुए वे 
अपनी श्रेष्ठताको विशेषरूपसे नाननेके 
स्यि प्रनापति-- अपने पिता यानी 
किस्ती उत्पत्तिक्रतकि पास जाकर 
बोे--हे भगवन्‌ | हम सवमें कोन 
रेष्ठ है ए अर्थात्‌ गुणो केक रण कौन 
सतवसे बदा-चदरा दे -एेषा पृछा । 
उनसे पिताने कदा-- 'तुमर्मेसे जिसके 
उत्रमण करनेपर यह शरीर अतिशय 
पापिष्ठ-सा अर्थात्‌ जीवित रहते हुए 
भी प्राणहीन तथा उससे भी अयन्त 
निङ्ृष्ट-सा दिखायी दे ओर शवके 
समान अस्प्र्य एवं अपवित्र जान्‌ 
पड़े वही तुममे श्रेष्ठ हे ॥ इस भकार 
उनके दुःखकी निदृत्ति चाहते हुए 
प्रनापतिने काकुसे [अर्थात्‌ स्वरभङ्ध- 
रूप उपायविशेषसे] उत्तर दिया ॥७॥ 


४४७८ छान्दोग्योपनिषद्‌ 


| 


[ भ्या ५ | 


~ 


वागिन्ियकी परीक्षा 
्ा्णके प्रति पिताद्ारा इष 
प्रकार कटे जानैपर- 
सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच 
कथमङाकततें मजीवितुमिति ? यथा का अवदन्तः 
प्राणन्तः प्राणेन पद्यन्तश्चक्षुषा श्रृण्वन्तः श्रोत्रेण 
ध्यायन्तो मनसेवमिति प्रविवेश ह वाक्‌ ॥ < ॥ 


उस वाक्‌ इन्द्ियते उक्तमण क्रिया । उसने एक वर्षं प्रवास करने 
ज॑नन्तर फिर ठोटकर पूछा भिरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ? 


तथोक्तेषु पित्रा ब्राणेषु- 


[ उन्होने कदा--)] “निस प्रकार गंगे रोग विना बोले प्राणते प्राणः | 
क्रिया करते, नेत्रसे देखते, कानसे घुनते ओर मनसे चिन्तन करते हुए | 


जीवित रहते है उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] ॥ रसा सुनक 
वाक्‌ इन्द्रिने शरीरम प्रवेश किया ॥ ८ ॥ 
सा ह वागुचक्रामोक्रान्त- 
वती । सा चोत्रम्य संवतसर- 
मात्रं प्रोष्य स्वव्यापाराननिवृत्ता ५ न 
1 अनन्तर--अपनं व्या 
सतौ धनः पत्यतरन््ाणाल- रहकर फिर लौटकर अन्य परणेपि 


वाच कथं केन प्रकारेणाशकत 
गक्तवन्तो यूयं मृते मां विना 
जीवित 2 रिति, 
ते होचुयथा कला इत्यादि । 


कला मूका यथा लोकेण्वदन्तो | 


वाचा जीवन्ति | कथम्‌ १ 


कहा--तुमछोग मेरे विना क 


किस प्रकारसे जीवित रह सके 
तव॒ उर्दोने जिस प्रकार 


इत्यादि उत्तर दिया । निस प्रकार | 


कलाः" -गंगेरोग संघारम वा 


बिना बेरे भी जीवित रहते टै~~ 
कसि प्रकार !- प्राणते प्राणत 


मृगे 1 | 


उस वाक्‌ इन्द्रिये उक्तमण | 
क्रिया| तथा उसने उक्तमण क 
केवर एकं वर्षं प्रवास करके | 





खण्ड १] शाङ्करमाष्वाथे ४४९ 
2-3-2८ < ल 5 ऋ ऋ ऋ 9 9 ऋ 


प्राणन्तः प्राणेन परयन्तश्वकषुषा | कसते हए, नत्रसे देखते हुए, कानसे 
श्रृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो | नते हए ओर मनसे चिन्तन करते 
मनसैव सर्वकरणचेष्टां वन्त | हए, तासपयं यह दै कि इस प्रकार 
इत्यथः; एवं वयमजीनिष्म- | समल इन्र चेशं ते हप 
जीवित रहते दै उसी प्रकार हम 
भी जीवित रहे। तब प्राणम षपनी 
बुद्धवा प्रविवेश द ॒वाक्पुनः | भग्रे्ता समक्षकर वाक्‌ इन्दिने 
स्वव्यापारे प्रवृत्ता बभूवेत्यथंः | पवेश किया; अर्थात्‌ वह पुनः अपने 
॥ ८ ॥ व्यापारे प्रवृत्त हो गयी ॥ ८ ॥ 


त्यर्थ; । आर्मनोऽशरेष्ठतां व्रणेषु 





चश्चुक्ी परीक्षा 
चलुरहोचक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच 
कथमशकततें मलनीवितुमिति ? यथान्धा अपदयन्तः 
प्राणन्तः भराणेन वदन्तो वाचा श्रण्वन्तः श्रोत्रेण 
ध्यायन्तो मनसेवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥ 

[ फिर ] चुने उक्तमण किया । उसने एक वषं प्रवा करनेके 
अनन्तर फिर लौटकर पूष्ा-भिरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ¢ 
[ उन्होने कडा-] “निष प्रकार अन्धे रोग बिना देखे प्राणसे प्राणन 
करते, वाणीसे बोकते, कानसे घुनते ओर मनसे चिन्तन करते हए 
जीवित रहते है उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ]। रसा घुनकर 
चद्षुने प्रवेश शिया ॥ ९ ॥ 

श्रोत्रकी परीक्षा 


श्रोत्र होचक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच 
कथमङकतते मनोवितुमिति ! यथा बधिरा अशरुण्वन्त 


७५० ` छन्दौग्योयनिषद्‌ [ ष्यांय ५ 


9-८-9८ > < ¬< < 6 ८ ~ 
प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पद्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो 
मनसेवमिति षविवेश इ श्रोजम्‌ ॥ ९० ॥ 


[ तदनन्तर ] श्रोत्रे उक्तमण करिया | उसने एक वै प्रवास 
करनेके अनन्तर फिर रट पृष्ा--भेरे बिना तुम कैसे जीवित एह 
सके 2 [ उर्दोने कदा-- ] निस प्रकार बहरे सनुष्य बिना सुने प्राणसे 
प्राणन करते, वाणीसे गोरते, नेत्रसे देखते जौर मनसे चिन्तन कसते हुए 
जीवित रहते है, उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] यह सुनक 
्रोत्रने शरीरम प्रवेद फिया ।! १० ॥ 


मनकी परीक्षा 


मनो टोचकाम तत्संवत्सरं पोष्य पर्येत्योवाच 

कथमरकततें मलीविलुमिति ? यथा वाखा अमनसः 
प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पदयन्तश्चक्षुषा 

श्रुण्वन्तः श्रोत्रेणेवमिति परविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ 
[. त्पश्वात्‌ | मनने उक्रमण किया । उसने एक वषं प्रवास फर | 
फिर रोरकर फहा- भेर बिना तुम कसे जीवित रह सके  [ उन्दनि | 
कहा-- ] “जिस प्रकार वच्चे, जिनका कि मन ॒विकषितं नहीं होत | 
पराणसे प्राणनक्रिया करते, वाणीसे बोरे नेत्रसे देखते जौर कानसे घनत । 
इए जीवित रहते है उसी प्रकार [ हम भी जीवित रटे ] । यह घन । 


मनने भी भरवेश क्रिया ॥ ११ ॥ | 
समानमन्यत्‌, चचुरहोच- / चष्घने उत्कमण क्या, धरत 


उच्रमण किया एवं मनने उक्तमण 

कराम श्रोत्रं होच्चक्राम यनो | किया इत्यादि शोष समस्त श्रुतियो- 
| 

। 


का तासं समान है । निस प्रकार 
। होच्चकरामेत्यादि । यथा | वारक 


“अमना--अप्रखढमन। 





खण्ड ९] शाङ्कर्माष्याथ ७५१ 
>>> 9 9 9-9-99 ~ 2-8-97 ऋऋ 


साला अमनसोऽप्ररूढमनस | भर्थात्‌ जिनका मन विकसित नर 
हुमा है देखा इसका तात्ययं है 
इत्यथः ॥ ९-११ ॥ ॥ ९-११॥ 


व्राणक्री परीक्षा जौर विजय 
एवं परीक्षितेषु वागादिषु-- ¦ इस प्रकार वागादिकी परीक्षा 
। हो चुकनेपर- 
अथ ह्‌ प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथा सुहयः षड्वी- 
शशङ्कन्संखिदेदेवमितरान्ध्राणान्समखिदत्तरहाभिस- 


५ 


मेसयोचुर्भगवन्नेषि तवं नः ्ोऽसि मोत्कमीरिति ॥१२॥ 
फिर प्राणने उक्तमण कानेकी इच्छा की । उसने, 'जिस प्रकार 
अच्छा घोड़ा अपने पैर बोधनेकी कौरोक्रो उखाड़ क्ता है उसी भकार 
अन्य प्राणोको भी उखा दिया । तब उन सवने उसके सामने जाकर 
कह 'भगवन्‌ | भप [ हमारे स्वामी ] रदे, आप ही हम सवम शर्ट 
दै, आप उक्रमण न करं" ॥ १२ ॥ 
अथानन्तरं ह स युख्यः प्राण | (व प मुख्य 
मिच्छन्कि- | भाणने उक्तमण करनेकी इच्छा 
उच्क्रमिषमुतकरमित्‌ करते हुए क्या फिया ? सो बत्रलाया 
भकरोत्‌ १ इत्युच्यते--यथा | नाता --रोकमे निल प्रकार 
लोके सुषयः शोभनोऽशवः षड्वी- | अच्छा घोड़ा अपनी क स 
ल्पादबन्धनकीलान्‌ परी- | चड़ इट सनुष्यदवारा चाबुकस म 
स ० = जानेपरः पैर॒रबाभनेकी कीलको 
उखाड डालता दहै उसी प्रकार 
सन्संखिदेत्सत्वनेत्सथुर्पाययेत्‌ | उसने वाक्‌ आदि अन्य प्राणे 
एवभितरान्वागादीन्प्राणान्सम- | उखाड़ दिया अर्थात्‌ [ शरीरसे ] 


खिदत्सथद्श्रतवाच्‌ । , | बाहर निकार ल्या । 
ते प्राणाः संचािताः सन्तः | [ इसी भकार | विचरति कर 
दिये जानेषर वे प्राण अपने गोरकेमिं 


स्वस्थाने स्थातुमनुरसदमाना | स्थित रहनेमं असमथ दोनेक कारण 


चछ० ० 9९५ ~ 


७५२ छान्दोभ्योपनिषद्‌ [ कष्वाब ५ 


9-8-63 र क 
अभिसमेत्य ख्यं प्राणं | मुस्यप्राणके सम्मुख जा उसे 
तमूचुः-हे भगवन्नेधि मव नः ! बोे--े मगवन्‌ । एमि'-जाप 
स्वामी, तस्माखं नोऽस्माकं ¦ हमरे स्वामी हो, क्योकि हम सने 
्रष्ठोऽसि; मा चास्मादेदादुक्- शा ष्ठ है तथा इस शरीरे 
मीरिति ॥ १२॥ । आप॒ उक्रमण न करः ॥ १२॥ 





इद्धियाद्रारा राणक स्तुति 
अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि खं 
तद्वसिष्ठोऽसी्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं पतिष्टास्मि 
तं तत्प्रतिष्ठासीति ॥१३॥ अथ हैन श्रोत्रसुवाच 
यदहरसपद्स्मि खं ततसंपदसीत्यथ हनं मन उवाच 
यदहमायतनमस्मि तं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥ 


फिर उससे वाक्‌ इन्द्रिये कहा--भे जो वसिष्ठ दसो तुष्टी 
वतिष्ठ हो ।' तदनन्तर उससे चक्चुने कदा- भे जो प्रतिष्ठा हसो 
तमी प्रतिष्ठा हो' ॥१३॥ फिर उससे श्रोत्रने कहाँ नो सम्पद्‌ ह 
सो तुम्ही सम्पद्‌ हो । तयश्चात्‌ उससे मन बोल-- चै जो आयतन 

ह सो तुम्ही जयतन होः ॥ १४ ॥ 

अथ दैनं वागादयः प्राणस्य ; तदनन्तर वैरयङोग निस प्रकार 
ठस्य का्येणापाद्यन्त आहु | राजक 8 

$रिमिव हरन्तो राज चिर , । | परार वागादि इन्द्रानि अपने करय 
वेिमिव हरन्तो राज्ञे विशः । (व र 
कथम्‌ ! वाक्‌ तावदुवाच-यदृहं | कहा । किस प्रकार कहा ^ -पहरे 
वसिष्ठोऽस्मि, यदिति क्रियावि- । बाणी बोरी--् जो वसिष्ठ ह, यहाँ 
` मूलम थत्‌' शब्द क्रिया-विदोपण दै, 


पणम्‌, यद्रसिष्ठलगुणास्मीस्य- | अर्थात्‌ श्रै जो वसिष्ट 


खण्ड ९] 


क्ाह्रमाष्याथं 


9धवे 


~ प > ऋ 9-9-89 


मः; खं तद्रसिष्टस्तेन वसिष्ठ 
स्वगुणेन खं तद्रसिष्टोऽसि तद्गु- 
णस्त्वमित्यर्थः । अथवा तच्छ- 
ब्दोऽपि क्रियाविशेषणमेव । 


` त्वत्छरतस््बदीयोऽसौ वसिष्ठत्व- 


गुणवारी ह सो तुम वसिष्ठ हो- 
उस वसिष्ठत्व गुणसे तद्रसिष्ठ हो 
अर्थात्‌ तुम्हीं उस गुणवाङे हो ।' 
थवा (तत्‌ शब्द्‌ भी क्रियाविदोषण 
ही है। तव इसक्रा यह्‌ तात्पयं 
होगा कि तु्दारा किया इभा 
अर्थात्‌ ` तुम्हारा जो यह वसिष्ट 
गुण है वह अज्ञानसे भिरा है एेसा 


गुगोज्तानान्ममेति मयामिमत | मैने समञ्च ल्या है ॥ इसी भकार 


इत्येतत्‌ । तथोत्तरेषु योज्यं भगेके चक्ष, श्रोत्र ओर मनक 


विषयमे योजना कर लेनी 
चजचुःशरोत्रमनःसु ॥ १३-१४॥ । चाहिये ॥ १३-१४ ॥ 


्रुतेरिदं वचो युक्तमिदं | वाक्‌ आदि इन्दियोद्वारा सख्य भाण- 

(~ (~~ ¢ ^ = (~~ 
वागादिभिश्रंख्यं प्राणं प्रत्यभि- | के प्रति कडा हुआ नो यह शरतिकरा 
दितं यस्मात्‌- । वाक्य है सो ठीक दी हे, ्योकि--- 
न वे वाचो न चक्षुरषि न श्रोत्राणि न मनाई 


सीत्याचक्षते भ्राणा इत्येवाचक्षते ध्राणो द्येवेतानि 
सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ 


[ ोकमे समस्त इन्द्ियोको ] न वाक्‌ , न चु, न श्रोत्र जीर न 
मन ही कहते है; परंतु श्राणः सा कहते दै, क्योकि ये सब प्राण 
ही है ॥ १५॥ 

न वै रोके वाचो न चक्लुषि | रकम इन वाङ्‌ आदि [समस्त] 
न श्रोत्राणि न मनांसीति वागा- | इन्दरियोको कोकिक अथवा शालज्ञ 
दीनि करणास्याचक्षते लोकिका । पुरुष न तो वाक्‌ कते हैँ जर न 


४५8 


छान्दोष्योनिषद्‌ 


[ मध्याय ५ 


4-9-9४ 8८ 8: >< 9 < 8 8८ < ¬ -9 ¬ 8 >< >>> ~ 


आगमज्ञा वा; कि तर्हि ! प्राणा 
इत्मेवाचक्षते कथयन्ति । यस्मात्‌ 


चष्ु, न श्रोत्र ओरन मनही 
¦ कहते है ! तो फिर क्या कहते है 
वस प्राणः पेसा ही कहते है । 


प्रानो हयवेतानि सर्वानि वागा- ¦ क्योकि प्राण ही यह समस्त वागादि 


दीनि करणजातानि भवत्यतो 
मुख्यं प्राणं प्रत्यनुरूपमेव वा- 
गादिभिरुक्तमिति प्रकरणा्थुप- 
संजिदीषेति । 

ननु कथमिदं युक्तं चेतना- 
वन्त॒ इव पुरुषा अदेशरष्ठतायें 
विवदन्तोऽन्योन्यं स्पर्थरन्‌ ? 
इति । न हि च्चुरादीनां बाचं 
प्रत्याख्याय प्रत्येकं वदनं 
संभवति; तथापगमो देदात्पुनः 
प्रवेशो ब्रह्मगमनं प्राणस्तुतिर्वो 
पपद्यते । 


तत्राग्न्यादिचेतंनावदेवताधि- 
षठितत्वाद्रागादीनां चेतनावच्वं 
तावस्सिदधमागमतः । ताकिक- 
समयविरोध इति वेदेह एकस्मि 


लनेकचेतनावच्वे, न, वरस्य 


इन्द्रियस्मुदाय हो जता दै, अत 
मुख्य प्राणके प्रति वागादि इरयो 
द्वारा ठीक ही कहा गया है--इस 
प्रकार श्रति इस प्रकरणके अथका 
उपसंहार करना चाहती हे । 

- किंतु यह किस प्रकार 
सम्भव है करि वागादि प्राणेन 
चेतनायुक्त पुरुपोके समान अपनी 
्रेप्ठताके स्यि विवाद करते हुए 
एक दूसरेसे स्पर्धा की क्योकि वाक्‌ 
के सिवा अन्य चक्षु आदि इन्रयोमेसे 
किसीका भी वोरना सम्भव नहीं 
है ओर न उनका देदसे चला नाना, 
उसमे पुनः प्रवेश करना, ब्रह्मके 
पास जाना अथवा प्राणकी स्तुति 
करना दी सम्भव हे । 


समाधान-उसमं हमारा यह 
कथन है किं अग्नि आदि चेतन 
देबतार्भोसे अधिष्ठित. होनेके कारण 
वागादि इन्दर्योकी चेतनता तो 
शाक्से दी सिद्ध ष्टै। यदि 
किं इख प्रकार एक ही देहे अने 
चेतनावार्नोके रहनेसे तार्किको 
कै मत्से विरोध होगा--तो 
एसा कहना दीक नहीं, क्योकि 


खण्ड १ ] 


परथाम्बाधं ४५५ 


2 9 9 2 3 ॐ 3 9 9 अ क 9 9 9 ॐ ॐ. > = 4 
निमित्तकारणत्वाभ्युपगमात्‌ । ये | उन्दनि ईश्वरकौ निमित्तकारणता 
तावदीश्वरमभ्युषगच्छन्ति वा्ि- | स्वीकार कौ दै । तारविकिलोग जो 


कासते मनजदिकायंकरणाना- 
माध्यात्मिकानां बाह्यानां च 
पृथिन्यादीनामीश्वराधिष्टिताना- 
मेव नियमेन ्रवृ्तिमिच्छन्ति 
रथादिवत्‌। न चास्माभिरुन्याघा- 
शेतनावत्योऽपि देवता अध्यात्मं 
मोक्त्योऽम्युपगसम्यन्ते;कि तदि ! 
कार्यकरणवतीनां हि तासां 
प्राणेकदेवतामेदानामध्यात्माधि- 
भूताधिदेवमेदकोटिविकल्पाना- 
मध्यक्षतामात्रेण नियन्तेश्वरो- 
ऽभ्युपगम्यते, स द्यकरणः । 
“अपाणिपादो जवनो ग्रहीता 


परयत्यचज्खः स श्रेणोत्यकणेः'' 


८ श्रे° उ० ३।१९ ) इत्यादि 
मन्ववर्णात्‌। ““हिरण्यगभं | 


जायमानम्‌" (श्वे उ० ४।१२)। 
८ = 1) 
दिरण्यगभ जनयामास पूवम्‌ 
(श्वे° उ०३।  ) इत्यादि च 


श्वेताश्चतरोयाः परन्ति । 


ईशरको स्वीकार करते है तोवे 
रथ आदिके समान ईश्वरसे धिष्ठित 
हुए ही मन आदि आध्यासिक भूत 
एवं इन्िर्योकी तथा पृथिवी आदि 
बाह्य पदार्थो नियत प्रवृत्ति मानते 
ह । तथा हमलोग तो अग्नि भादि 
चेतन देवताओंको भो अध्यास्‌ 
८ शरीरान्त्वती ) भोक्ता नदी 
मानते । तो क्या मनते है १-- 
हम तो अध्यात्म, भधिमूत ओर 
अधिदेवमेदसे करोड़ विकल्पोंबली 
एकमात्र प्राणदेवताकी भेदस्वरूप 
उन देदेन्दियवती देवताोंका ईेधर- 
को अध्यक्षतामात्रसे नियन्ता मानते 
है, क्योकि वह ८ ईधर ) अकरण 
८ इन्दियादिरदित ) दै । जैसा कि 
“ह्‌ बिना हाथ-पवके ही वेगवान्‌ 
ओर ग्रहण करनेवाला है तथा निना 
नेत्रवारा होकर भी देखता है ओर 
कर्णहीन होनेपर भी सुनता दै" इस 
मन्त्वरणसे प्रमाणित होता है । इसके 
सिवा श्वेताश्वतर शखावार्शका यह 
भी पाठ है कि-““उलत्न होते हण 
हिरण्यगर्भको देखो" तथा “हले 
दिरण्यगमको उतपन्न किया” इत्यादि। 


(क 
छह छान्डोम्योपांनेषल्‌ [ भष्याय ५ 
33334313 > 


भोक्ता कमेफलसंबन्धी देहे ¦ [इस शरीरे ] उन ईशर थैर 

देवतार्ओंसे विलक्षण कर्मफले 
तदिलृक्षणो जीव इदि वक्ष्यामः । | सम्बन्ध रखनेवाखा जीव भोका 
वागादीनां वेह संवादः कन्पितो, हेषा हम ( जागे ) पग | 


, | वागादिका संवाद तो यँ उपास- 
विदुषोऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां प्राण- | कर प्रति अन्वय एव॑ व्यतिरेके 


ष्ठा निरपारणार्थम्‌; यथा लोके| णको ्ण्ठताका निर्णय फरानेके 
ध ‡ _ | छ्यिकटिपित किया गया है । जघ प्कार 
हषा अन्योन्यमात्मनः श्र्ठताय| लोकम मनुष्य जपनी प्रेष्ठे समि 


विबदमानाःकचि द ण विशेषामित्ं | एक-दृरेसे विवाद करते हुए किसी 
पृच्छन्ति दो नः शरेष्ठो गुणैः १ | विरोष गुणकसे पूते हं कि "हमं 


इति तेनोक्ता एकेकश्येनादः 
कायं साधयितुमु्यच्छव, येनादः 


कायं साध्यते स बः श्रेष्टः, इतयु- 


क्तास्तथा षएवोद्यच्छन्त आस्मनो- 
ऽन्यस्य वा श्रेष्ठतां निधरयन्ति; 
तथेमं संग्यवहारं वागादिषु 
कल्पितवती श्रुतिः, कथं नाम 
विद्वान्वागादीनामेकेकस्याभावे- 


ऽपि जीवनं दष्टं न तु प्राणस्येति 


प्राणभरेष्ठतां प्रतिपद्येतेति । 


गु्णोकी दृ्टिसे फोन भ्रष्ठ है ¢ ओर 
उ्तके यह कहनेपर किं “इस कार्यको 
सिद्ध करनेकै स्यि तुम एक-एक 
करके उदयोग॒करो; निससे यद 
कायं सिद्ध हो जाय, वही त॒म 
रेष्ठ है' उसी प्रकार उद्योग करके 
अपनी या किसी दूसरेकी शे्ठताका 
निणेय करते है--उसी प्रकार श्रुति 
ने वागादिमे इस ग्यवहारकी कल्पना 
की है, जिससे कि "वागादिमसे 
एक-एकके अभावमे भी जीवन देखा 
गया हे किंतु प्राणके अभावे नहीं 
देखा गया, एसा देखकर उपाक्तक 
किसी प्रकार प्राणी श्रेष्ठता 
समज्ञ जाय । 


| य 
स्वण्ड १ | काडराष्याथ ४५७ 
>+ ४८ 9८ < 3८ ८ 9८ ~ < < क < 8-1-9८ > < ¬ ऋ अः 


तथा च श्रुतिः कौषीतकि- | री दी कौषीतकित्राह्मणोपनिषद्‌- 
की श्रुति मी है--“भनुष्य बिना 
| वाणीके जीवित रहता है, वर्योकि 
पयामो जीवति चञ्ञुरपेतोऽ- | हम गृगोंको देखते है; नेत्रके निना 
न्धान्दि पदयामो जीवति | जीवित रहता दै, बर्योकि हम 
४ # अन्धको देखते है; श्रोत्रके बिना 


श्रोत्रापेतो बधिरान्हि पदयामो | जीवित रहता ै, क्योकि हम 
बहूर्ोफो देखते टै; मनक बिना 


तो बालान 
जीवति मनोऽपेतो बाखान्दि | नीषि च 


परयामो जीवति बाहुच्छिन्नो | वालको देखते टै त्था भुना 


जीवत्यरुच्छिन्'!; ( कौ उ० | कट जानेपर जीवित रहता दै, ऊर 
च ( (जोँष) कट जनेपर जीवित 
२।३ ) इत्याद्या ॥ १५ ॥ | रहता दे" इत्यादि ॥ १५॥ 


"---- == -- 


नापू; “जीवति वागपेतो मूकान्दि 





इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 
प्रथमखण्डभाष्यं सस्पणम्‌ ॥ १॥ 





हितीयः रह 
ग्राणका जननिर्द्र 

स होवाच कि मेऽन्नं भविन्यतीति यक्किथि- 
दिदमा श्वभ्य आ शकुनिभ्य इति दो चस्तदरा एतद- 
नस्यात्नमनो ह वे नाम प्व्यक्षंन हवा एवंविदि 

किञनानन्नं भवतोति ॥ १ ॥ 
उसने कहा--*भेरा अन्न क्या होगा ® तव वागादिने कहा- कुततो 
ओर पयसि लेकर सव॒ जीवोका यह जो कुछ अन्न ह [सब तुण्हारा 
अन्न हे ], सो यह सव अन ( प्राण ) का अन्न है । अनः यह प्राणका 


भरलक्ष नाम दहै । इस प्रकार जाननेवलके ल्थि भी कुछ अनत् 
( भभक्ष्य ) नही होता है ॥ १ ॥ 


स होवाच युख्यः प्राणः कवि | उस सुरुष प्राणने कहा--भेरा 


मेऽन्नं भविष्यतीति । युख्यं 
प्राणं प्रष्टारमिव कल्पयित्वा 
बागादीनप्रतिवक्तनिव कल्प- 
यन्ती श्रुतिराह यदिदं 
लोकेऽनजातं प्रसिद्धमा श्वभ्यः 
श्वभिः सहा शङनिभ्यः सह 
शदनिभिः सर्वप्राणिनां यदन्नं 
तत्तवान्नमिति दोचुरवागादय 
इति । प्राणस्य सर्वम 
प्राणोऽत्ता 
प्रतिपत्तये कलन्पिताख्यायिका- 
रूपाढयाचरन्य स्वेन श्रुतिरूपे- 


सर्स्यान्नस्यत्येवं । 


उन्न क्या होगा ४ [ इस प्रकर | 
मुख्य प्राणको मानो प्रदनकर्ता 
बनाकर वागादिको उत्तरदाता-सा 
कल्पित करती हुईै॑ श्रुति कहती 
है- “इस लेकम कुतोके सहित 
ओर पकष्योके सदित समप 
पराणियोंका यह नो कुछ अन्न प्रसिद्ध 


हे वही तेरा अन्न हैः ठेसा वागादिने 
कहा । इस प्रकार सब कु प्राणका 
अन्न है जर प्राण इस मन्नका भोक्ता 


दै--इस वातकरो समञ्चनेके सियि 
कस्त आख्यायिकाद्पसे निवृत्त 


हो म्रन्थ अपने श्ुतिषूपसे कहता 


खण्ड २] शाङ्रथास्याथ ४५९. 
ह: ॐ 4 ~ ----~--------- 
णादह-तद्रा एतद्यत्कि्िन्नोके | है-- चह जो कुछ अन्न इस रोके 

र प्राणिरयोद्ारा भक्षित होता है वह 
प्राणिमिस्त्रमच्तेऽनस्य प्राणस्य | अन- प्राणका ही जनन ै; रथात्‌ 
र णसे ही ॥ 
तदन्न प्राणेनैव तदच्चत इत्यथः । वह ्णसे ही भित होता द 4 
प्राणका सव प्रकारकी चेष्टां 

सर्वप्रकारवेशव्यापतिगुणप्रद्ना-| व्यिद्प गुण मदर्डित कनके 


ह 9 13) 2 , 
मन इति प्राणस्य परतक्ष नाम | | छवि उक अन" यह भक्‌ नम ९, 

र्ते ह वक्षति क्योकि श्रः आदि उपसर्ग पूर्वम रहने- 
्राद्युपसगेपूवत्वे !ह ।वरपषगति- , पर उसकी विशेष गति दी सिद्ध होती 
रेव स्यात्‌ । तथाच सर्वान्ना- | है ।# इस प्रकार सम्पूणं अर्को 


नामनतुर्नामग्रहणमितीदं प्रत्यक्षं | भक्षण कप्ेवाटि प्राणका नाम्‌ भरण 
ह क्रिया गया है अतः उस॒क्रा “अनः 
नामान रात सर्वान्नानामततः यह्‌ प्रप्यक्ष नाम है; अर्थात्‌ -य॒हू 


साक्षादभिधानम्‌ । सरव्नभक्षी प्राणका साक्षात्‌ नाम हे । 
न ह वा एवंविदि यथोक्तप्राण- | इस प्रकार जाननेवाले-उपुक्त 
प्राणवे्तके स्यि, अर्थात्‌ जो यह 

बिदि प्राणोऽहमसिम सर्वभूतस्थः | जानता है कि भ समूर्णं भूलोम 
स्थित सरे अक्नोका भोक्ता प्राण 
ह उसके स्यि कुछ भी, समस्त 
ह वै किश्चन किञ्चिदपि प्राणि- | पराणिेद्वारा भक्षित हेनेवाख 
कोई भी न्न, जभक्षय नहीं होता । 
तार्प्यं यह दै किं इस प्रकार 


सर्वानानामत्तेति, ठस्मिनेवंविदि 


भिराद्यं सर्वेरननमनायं न मवति 


स्मेववि्यन्नं भवतीत्यर्थः; | नाननेवालिके ल्य सभी अन द, 


न 

क्षुः अन प्राणने" इस घातुपाटकर अनुधार अन' शब्द्‌ गतिशीकका वाचक 
ह । उसके परे प्र, अप, उत्‌ + आ,वि + आ इन उपसगोकि तथासमशब्दके 
लगनेसे क्रमशः प्राण, अपान. उदान, न्यान्‌ ओर समान शब्द सिद्ध होते है। 
इनके योगसे मुख्य प्राणका गतिभेद दी द्योतित होता है । 


७६० छाम्दोग्योषनिषद्‌ [ खभ्वाब ५ 


>~ ~ ऋ ब >< > 9-89-9 -- 
प्राणभूतलाद्विदुषः । श्राणा | कर्यो वह विद्वन्‌ प्राणस्वह्प हो 
जातादहै; जञै्ताकि एक द्री 

एष उदेति प्राणेऽस्तमेति" (ब्र° ्रुतिमे भी “प्राणे ही यह सुं 
उदित होता ओर प्राणम ही 
अस्त होता दै"” एेसा उपक्रम ए 
(“एवंविदो ह॒ वा उदेति घछरूयं | “इस प्रकार जाननेवठेसे ही पूय 
उदित होता दै ओर एसा जानने- 

एवं विच्स्तमेति'' इति भरुत्यन्त-| वतत ही अस्त दो नाता है [दा 


रात्‌ ॥ १॥ | उपसंहार किया गया है ] ॥ १॥ 
प्राणका वनि 


स होवाच किं मे वासो भविष्यती्याप इति 
होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाचचाद्भिः 


परिदधति छम्भुको ह वासो भवस्यनस्नो ह भवति ॥२॥ 

उसने कहा-- मेरा वशर क्या होगा ¢ तब वागादि बोटे-- "जर । 
इसीसे भोजन करनेवारे पुरुष भोजनके पूवं जीर पश्चात्‌ इसका जे 
आच्छादन कसते है । [ देसा करनेसे ] वह वख प्राप्त करनेवाला ओर 
भनग्र होता है ॥ २॥ 

स होवाच पुनः प्राणः, पूर्व | उ प्राणने पिरि कदा--यह 
षदेव कल्पना, कि मे वासो | कपना भी पदरेदीके समान दै-- 
भविष्यति { इति; आप इति | सेरा वस कया होगा ¢ इसपर 
दोचुर्वागादयः । यस्मासप्राणस्य वागादिने कदा-“जङ । वर्यो 
बस आपः,तस्माहया एतदरिष्य- | जक राणक वस हे इसीसे भोजन 
न्तो भोक्ष्यमाणा शक्तवन्त | करनेवारे विद्वान्‌ यह करते है 
ब्राह्यणा बद्धं एतद्ु्न्तिकिम्‌! कया करते ५ के पूं 
अद्धिवासस्थानीयाभिः ओर त 

* पुरस्ता- । ओर परचात्‌ बे वखस्थानीय जरते 


१।५। २३) इत्युपक्रम्य 


खण्ड २] शाङ्करभाष्याथे ४६१ 
> -- ० ल 3 9 8 ऋ 


द्रोजनासपूवशुपरिष्टाच भोजना- | सुख्य प्राणका परिधान (अच्छादन) 


ृष्वं च परिदधति परिधानं 
कुर्वन्ति मुख्यस्य प्राणस्य । 
लम्भुको छम्भनश्रीलो वासो ह 
मवति, वाससो रुब्धेव भवती- 
त्यर्थः । अनग्नो इ भवति, 


करते टै । [ प्सा करनेसे ] वह 
| लम्भुक- वस्ौका रम्भनकशची 
अर्थात्‌ वरखको प्रप्त करनेवाला दी 
होता है भौर अनग्न होता दै । 
वर्खोको प्राप्त करनेवाला होनेसे 


€. 
वाससो स= अनप्मता अर्थतः सिद्ध ही है; अतः 


अ भि य॒ यह्‌ 
ग्रतेत्यनस्नो ह भवतीद्युत्तरीयवान्‌ अन होता है । इसका अभिप्राय यह 


। होता दै। 
भवतीत्येतत्‌ । है किं उत्तरीय वसे युक्त होता दै 


भोजन रम्भ करनेवले ओर 
भोजन कर चुकनेवाठलेका नो आचमन 
ुद्धिके य्य विद्धित है उस वह 
प्राणका व हेः रेस दृष्टमात्रा 
प्राणस्य वास इति दर्नमात्र- | विषान करिया गा दे । 'जसे 
परिधान करता रै" रेता कहकर 

मिह विधीयते । अद्भिः परिदध- | किसी अन्य आचमनक्ना विधान 
नहीं करिया गया । जिस प्रकार 

तीति नाचमनान्तरम्‌ । यथा , लोकिक प्राणियोद्वारा भक्षित होने- 
वाखा अन्न प्राणका दै-यहां जिस 
तरह केवर दृष्टिमात्रका विधान 
व । क्रिया गयादहे उसी तरह इसे 

प्राणस्येति दशनमात्रम्‌, तदत्‌ । | समञ्लना चाहिये; क्योकि भेरा अन्न 
क्यादै? मेरा वल्ञ क्यादे 
इत्यादि प्रश्न जौर इनके उत्तर दोनों 
समान दै । यदि [ इस श्रुतिके 
| अनुसार ] प्राणके ल्यि अपूर्व 
य्याचमनमपूर्व तादर्थ्येन क्रियेत. नवीन आचमनका विधान मान 


भोक्ष्यमाणस्य युक्तवतश्च य- 


दाचमनं शुद्धयथं विज्ञातं तस्मिन्‌ 


लोकिकैः प्राणिभिरब्यमानमन्नं 





किं मेऽन्नं किं मे वास इत्यादि- 





्रभप्रतिवचनयोस्तुल्यत्वात्‌ । 


४६२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ ख्याय ५ 


~< ~ € 3८ ८ ¬ ८ ¬< ~ ¬ ¬ 6 ¬< ¬ 8 ~ ¬ > 96 > 8८ ऋ 
तदा कृम्याघन्नमपि प्राणस्येति | ट्या नाय तो छमि जादि जन्नका भी 


भ्ष्यसेन विदितं स्थात्‌ । तुन्य- | भाण भक्ष्रूपसे विषान समक्ष 


६ जायगा | इस प्रकार समानषूपसे 
यो्विज्ञानाथेयोः प्रभ्षप्रति- विज्ञाना्थ॑क प्रच ओर उत्तरका यह 


बचनयोः ध्र करणस्य विज्ञाना पभरकरण विज्ञानरूप प्रयोजनके लिपि 
त्वादधंजरतीयो त्यायो नं युक्तः दी ोनेके कारण यहाँ सघंजरतीय 
न्यायकीश्रः कर्पना फरना उचित 

कल्पयितुम्‌ । नही ह । 
तथापए्साजो कहा जातादै 
शशुद्धिके लि किया नानेवा 
प्रसिद्ध आचमन प्राणी नग्नताके 
निवारणके छ्यि नहीं हो सकता" 
लुच्यते उसके विषयमे हमे यह कहना हे क 

= ध 

भवतीस्ुचयते, न तथा बयमा इस प्रकार हम आचमनको दोनो 
नी 0 प्रयोजर्नोके ल्य नहीं बतलाते । तो 
चमतदुभयाय ब्रूमः; ए तहि { | पिर कया कहते है -हमारा कथन 
्राय्यार्थाचमनसाधनभूताआ- | ते बह है करि शद्धे लिय क 
जनेबाले भाचमनका साधनभूत नर 
प्‌ः प्राणस्य वास इति द्वन | पाणफा ल है--देसी दष्टा विधान 
= किया गया है । उसमे जाचमनके 
चोद्यत इति ब्रूमः । तत्राचमन- | दो प्रगोजनोकी सिद्धे लिये होने 
स्योभयाथलप्रसङ्ोपचोद्पालु रूप दोषकी शङ्का करना उचित नही 


४ दे। यदि कहो कि देसी दष्ट 
पपन्ना । वामो्थं एवाचमने | छरना तो तव॒ उचित होता जव 


2 1 कि अ ठ 
तद्शेनं स्यादिति चेत्‌ ? | खि ० 


यत्तु प्रसिद्धमाचमनं प्राय- | ङि 


त्याथं प्राणस्यानग्नताथं चन 


ही क्रिया जाता--तो 


~ ~ 


$ 
हे ठ किआभी गाय तो जवान दै ओर आधी षृटी 
"वाय कइत है । अतः = 0२ 3 
कि अनम तो केवल दष्टिमा्का विधाः तः सौ कल्पना नहीं करनी चाय 


न है; किल॒ आचमन नवीन विदित हं! 





खण्ड 2 ] शाङ्कर्माष्यार्थ छद 
~> > >9८ >-5< ¬< >> 9: -ः > < ~ ¬< ¬ ह: ¬< ¬ ह < < 3: < < >< 
न; वासोज्ञानाथेवाक्ये वासो- ¦ यह्‌ ठीक न्दी; क्योकि वखदृ्टिके 
लिये प्रवृत्त हुए वाक्यम वज्लके स्यि 

ऽर्थापूर्वाचमन निधाने तत्रानन- | नवीन आचमनका विधान ओर उसमे 
प्राणकी नग्नताके निवारणरूप 
प्रयोजनकी दृष्टिका विधान माननेसे 
स्य [ वाक्यमेदरूप दोष होगा, क्योकि 

भेदः । आचमनस्य तदचत्वम्‌ आचमनके वासो ऽथे ओर किंसी 

न्याथेत्वं चेति प्रमाणामावात्‌॥।२।॥| भन्धार्थलम कोई प्रमाण नदीं १।२॥ 


~ -व््खाकक~--- 


ताथेतवदष्टि विधाने च वाक्य 


प्राणकिद्ाकरौ स्तुति 


उस इस प्राणदशंनकी स्तुति की 
जाती दै; कि प्रकार ! 


तद्धेतव्सत्यकामो जावाखो गीश्रतये वेयाघपया- 
योक्स्वोवाच यद्यप्येतच्ुप्काय स्थाणवे बयाजायेरन्नवा- 
स्मिञ्याखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥ 


उस इस ८ प्राणदशन ) को सत्यकाम जागारने वैयाघ्रपद्य गो 
श्रतिके प्रति निरूपित करके कहा-“यदि इसे शुष्क स्थाणुके प्रति कटे 
तो उम शाखा उत्पन्न हो जायगी ओर पत्ते ¶ूट भावेगे ॥ ३ ॥ 


तद्ैतखराणद्वनं सत्यकामो व श 
जाबाख्ने गोश्चतनामकं तयाघ्र 
जावालो गोश्रुतये नाम्ना वेया- | _ न्दम पुत्रको वेयाघ्रप्य 
घरपद्याय व्याघरपदोऽपत्यं वेया- कहते है, उस ॒गोश्रुति नामवाटेसे 
घ्रप्यस्तस्मे गोश्रस्याख्यायो- | कहकर जर भी आगे कदा जानेवाला 
क्त्वोवाचान्यदपि वक्ष्यमाण | वचन कहा । उसने क्या कहा १ सो 
वचः । किं तदुबाच १ त्याद-- | बतकते दै--यदि भाणवेा_ पुरुष 
यद्यपि शुषाय स्थाणव एतद- | इ दशेनको डक स्यु भति 


तदेतस्राणदशनं स्तूयतेः | 
कथम्‌ ! 





४६४ इान्दोष्यो पनिषरह्‌ [ खष्याय ५ 
> न = क > प ~ ८ ~ अ >< ८ ~ ~ 8 <. 2८ 8 ~8--- 


दोनं व्रयासप्राणविजावेरन्नुत्पत्रे- ! कहे तो उक्ष स्थाणुर्मे शाखा उप्र 
रन्नेवास्मिन्स्थाणौ शाखाः प्रगे- ¦ दो नार्यै ओर प्ते निकर वे 
हेयुश्च पलाशानि पत्राणि । कि | यदि जीवित पुर्पसे कहे तव तो 
जीवते पुस्पाय ्रुयादिति ॥ ३१; | टना दी क्या है { ॥ ३॥ 
मन्थकमं 
 यथोक्तप्राणदर्नविद इदं ] उपर्युक्त प्राणद्ेनके ज्ञातके 
[सिय इस मन्थनामक कर्मका आरम्भ 

मन्थाख्यं कारभ्पते--- किया नता है-- 

अथ यदि महजिगमिषेदमावास्यायां दीक्षिता 
पोणमाध्याररात्रो संवोषधस्य मन्थं दधिमघुनोरुपमभ्य 
उयेष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यञ्नात्राज्यश्य हुत्वा मन्थे 
संपातमवनयेत्‌ ॥ ४ ॥ 


खव यदि वह महछको प्राप्त होना चाहे तो उसे अमावास्याको 
दीक्षित होकर पूर्णिमाकी रात्रिको सर्वौषधके दधि नर मधुसम्बन्धी 
मन्थका मन्थन कर्‌" ज्येष्ठाय प्रेष्ठाय स्वाहा" पेसा कहते हुए अग्ने घृतका 
हवन कर मन्थप्र उसका अवशेष डाख्ना चाहिये ॥ ४ ॥ 


अथानन्तरं यदि महन्महं | अव इसके पश्चात्‌ यदि वहं 
सिमििददमिनते हत महत्‌ यानी महत्वको प्राप्त होना 
म्‌ ॥ # छद (रे 
जगामपदन्तुमिच्छेन्महस्वं प्रा चहि अर्थात्‌ महत्तमासिकी कामना 
पं यदि कामयेतेस्यथः; तस्येदं | रखता श उसके लि & 
९. ~ „ | कमका विधान किया जाता 
कमं विधीयते । मत्वे टि सति क्योंकि मह ग्रा होनेपर ही रुक्मी 
श्रीरुपनमते । श्रीमतो दयरथप्रापं | समीप आती है, क्योकि श्रीमानूको 


। व घनतो 
धनं ततः क ततश त = क 


जि. 


खण्ड २] 


शाङूराष्याथे ४ 


क अक ॐ ॐ क ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ आ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 4 
देवयानं पितृयाणं वा पन्थानं | देवयान अथवा पितृयाण मागं प्रप 


प्रतिषर्स्यत 
ुररीषत्य मह्तप्रप्सोरिदं 
कथं न विषयोपभोगका- 
भक्ष । तस्यायं कारादिविधि- 
रुच्यते-- 

अमावास्यायां दीक्षित्वा 
दीक्षित इव भूमिशयनादि 
नियमं कृत्वा तपोरूपं सत्य- 
वचनं ब्रह्चर्यमित्यादिधमवा- 
नभतवत्य्थः । न पुनद्षमेब 
कर्मजातं स्व॑ुपादत्ते, अतद्ि- 
कारत्वान्मन्थाख्यस्य कमणः । 
“(उपसद्वती'' ( बर उ० 
६ । ३। १ ) इति भरुत्यन्त- 
रात्पयोमात्रमक्षणं च शुद्धि 
कारणं तप॒ उपाद्ते। पौणे- 
मास्यां रात्रौ कर्मारमते । सर्वो- 
षधस्य प्राम्यारण्यानामोषधीनां 
यावच्छकत्यल्पमन्पयुपादाय त- 
दितुषीकृत्याममेव पिष्टं द्धि 
मधुनोरोदुम्बरे कंसाकारे चम- 


इत्येतस्रयोजन- । दोना सम्भव है--श्स उदेश्यको 


लक्ष्यमे रखकर टी महच्वप्रा्तिकी 
इच्छवारेके य्यि-विषयोपमोगकी 
कामनावाठेके क्यि नही -यह कर्म 
आरम्भ किया जाता है। उसकी 
यह कालादि विषि कही जाती है- 

अमावास्यके दिन दीक्षित दो- 
दीक्षित पूरुषके समान मूमिशयन्‌ 
आदि नियम कर अर्थात्‌ तपःस्वरूप- 
सत्यक्चन, बरहमचयं इत्यादि घर्मवारा 
होकर पूर्णिमाकर रात्रिक इस कम 
का आरम्भ करता दै । [ इस कर्मं 
दीक्षित होनेवास पष ] दीक्षा- 
सम्बन्धी [ मोज्ञीवन्धनादि ] समस्त 
वर्मोका म्रहण नही करता, क्योकि 
यह ॒मन्थास्य कम॑ किसी अन्य 
कर्मक विकार नहीं दै । “उपसद्त्रती 
भूत्वा" पेसी अन्य श्रुति होनेके 
कारण वह ुद्धिका कारणमूत 
पयोमक्षणमात्र तप स्वीकार करता 
हे । सर्वोधध अर्थात्‌ यथाशक्ति म्म्य 
जर वन्य समस्त ओषधियोका थोड़ा- 
थोडा माग लेकर उन्दं तुषरहित 
क्र उसकी कची पिष्रीको एक भन्य 
्रतिके भनुसार ददी शोर मधुके 
सहित कंसाकार अथवा चमसराक्षार 


४६६ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ जध्याख ५ 


= ~ ~< ~ ~ < ¬ ८-८-81 9 2 9 > ८ < > 9 > ऋ ~ 


साकारे वा पत्रे भ्रत्यन्तरा- | गूलरके पात्रम डाछ्कर उसका मन्थन 
सखक्षिप्योपसथ्याग्रतः स्थापयि- | कर उसे अपने भागे रख च्येष्ठाय 
त्वा य्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहैत्यश्रा- | श्रेष्ठाय स्वाहा देसा कते हुए आव- 
वावसथ्य आन्यस्यावापस्थाने | सथ्या्चिमे आवापस्थानमे धृतकी 
हुत्वा सुवसंरुग्नं मन्थे संपात- भाहुति दे ओर सुव रगे हुए भवशिष् 
मवनयेत्संस्चवमधः पातयेत्‌ | हविफो मन्थमं खार दे अर्थात्‌ उ 
॥ ४ ॥ घृतकी धाराको मन्थे गिरा दे ॥४॥ 


~ © {- 


वसिष्ठाय स्वाहेत्यभ्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपा- 
तमवनयेसपतिष्ठाये स्वाहेस्यभ्नावाज्यस्य हूत्वा मन्थे 
संपातमवनयेत्संपदे स्वाहेर्यग्नावाज्यस्य हृत्वा मन्थे 
संपातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाञ्यस्य हला 
मन्थे संपातमवनयेत्‌ ॥ ५ ॥ 
[ इसी प्रकार ] 'धिष्ठाय स्वाहाः इस मन्त्रसे अभि धृताहुति 
देकर मन्थमे धृतका लाव उलि; प्रतिष्ठाये स्वादाः इस मन्त्रसे अभे 
घृताहुति देकर मन्थम धृतका साव उरे, 'संपदे स्वाष्टा' इस मन्त्से 


अग्निम घुताइति देकर मन्थमे घृता साव टारे तथा 'भायतनाय स्वाहा" 
इ मन्त्रसे जगनि पृताहुति देकर मन्थमे धृतका साव डाले ॥ ५ ॥ 


समानमन्यत्‌, वसिष्ठाय | शेष अथं पूर्ववत्‌ दहै; चसिद्ठाय 


रतषठायै संपद आयतनाय | षण्षठय, संपदे ठथा आयताम 


स्वाहाः दस्रा कहते इए प्रत्येक 

स्वाहेति प्रत्येक तथैव संपात- | मन्त्रके अनन्तर आहुति देकर उसी 
भकार धघृतका सा मन्थरे 

मवनयदुतवा ॥ ५॥ डले ॥ ५. ॥ स 


[य 
$ 9 न= 


¢ 
ण्डय ] शाङ्गरभाष्याय ४६७ 
ॐ. ॐ 4 ० क > # ॐ क ॐ = ॐ. ॐ गः 2 ऋ ऋ 


अथ प्रतिरूप्याज्ञखो मन्थमाधाय जपत्यमो 
नामास्यमा हि ते सवमिदश्स हि अ्येष्ठः भेषठो 
राजाधिपतिः स मा उयेष्ठ्यशशरष्ठ्यश्राज्यमाधिपत्यं 
[प ¢ 
गमयत्वहमेवेद्‌ < सवंमसानीति ॥ ६ ॥ 
तदनन्तर अग्निस कुछ दर हटकर मन्थको अज्ञस्मिं ठे वह “अमो 
नामासि' इत्यादि मन्तरका जप करे । [ अमो नामासि आदि मन्तरका 
घर्थ- ] हे मन्थ] तू “अमः नामवारा है, क्योकि यह सारा जगत्‌ 


[ जपने प्राणमूत ] तेरे साथ अवस्थित है । वह तू ज्येष्ठ, श्र, राजा 


( दी्िमान्‌ ) ओर सवषा अधिपति 


हे । वह तु सु गयेष्ठल, श्रेष्ठ, 


राज्य ओर आधिपलयको प्रात करा । म ही यद सवरप हो जाऊं ॥६॥ 
अथ प्रतिसप्याग्नेरीषदपस- | किर प्रतिसपण कर--अग्निसे 
त्याञ्चलो मन्थमाधाय जपतीमं । §ढ॒दय्कर॒मन्धको अञ्चि 


मन्त्रम्‌ अमो नामास्यमा हि 
ते। अम इति प्राणस्य नाम; 
अन्नेन हि प्राणः प्राणिति देह 
इत्यतो मन्थद्रव्यं प्राणस्या- 
न्रत्वातप्राणत्वेन स्तूयतेऽमो ना- 
मासीति । कृतः १ यतोऽमा सह 
हि यस्मात्ते तव प्राणभूतस्य 
सवं समस्तं जगदिदमतः स दि 
प्राणभूतो मन्थो ज्येष्ठः शरेष्ठ 
अत एव च राजा दीधिमानधि- 
पतिश्वाधिष्ठाय पाठयिता सवंस्य। 
स मा मामपि मन्थः प्राणो 


रख इस मन्तरको जपता है-“अम 
नामासि अमा हि तेः इत्यादि । अमः 
यह प्राणका नाम है, अन्नके कारण 
ही प्राण शरीरम प्राणनक्रिया करता 
ट; इसीसे मन्थदरन्य प्राणका अन्न 
होनेके कारण समो नामासि 
इत्यादि मन्त्रदवारा प्राणरूपसे स्तुत 
होता है । तु क्यो अमः नामवास 
है क्योकि प्राणमूत तेरे साथ 
ही यह सारा जगत्‌ दहै; अतः वह 
[ तू] प्राणभूत मन्थ ही ज्येष्ठ ओर 
रेष्ठ है । इसीसे तु राजा-दीषिमान्‌ 
जर अधिपति- सनका अधिष्ठान 
होकर पारन करनेवाख है । वह 


४६८ छाम्दोण्योपनिव्‌ [ यष्वाय ५ 
अ 0 3 3 < 5 > 
जयेष््ादिगुणपूगपात्मनो गम्‌- | मन्थर प्राण ुञ्ञे भी जपने जत 
यत्वहमेवेदं सवं जगदसानि | आदि गुणसमूहको प्राप कवे | 


। प्राणके समान अँ भी यह पूं 


भवानि प्राणवत्‌ । इतिशब्दो | जगत््वख्प हो जाओ । इति शबद 
मन्त्रपरिसमाप्त्यथं; || ६ | | मन्त्रकी समापिके सि ष ॥६॥ 


अथ खख्वेतयचां पच्छ आचामति । तत्सवितुः 
वरणोमह इत्याचामति । वयं देवस्य भोजनसमिव्याचा 
मति । श्रष्ठश्सवधातममित्याचामति । तुरं भगस्य 
धीमहीति सर्व पिबति । निर्णिज्य कश्सं चमसं वा 
पश्चादग्नेः संविराति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाच॑. 
यमाऽध्रसाहः । स यदि लियं पदये्सभरद्धं केति 
विद्यात्‌ ॥ ७ ॥ 
शर वह इस ऋचासे* पादः [उस मन्धकता] भक्षण करता है । (तस- 
विदुवृणोमहे पेसा कहकर भक्षण करता है; "वयं देवस्य भो ननम्‌ देता कह- 
कर भक्षण करता है; श्र -सरवपातमम्‌' पेसा कहकर भोजन करता 
तथा दुरं भगस्य पीमहि' पेसा ककर कंस (कोरे) या चमस (चम्मच) 
को घोकर सारा मन्बेप पी जाता षै । ततश्वात्‌ वह भग्निके पे 


चमं अधवा स्थण्डिल ( पवित्र यज्ञमूमि ) पर वाणीका संयम कर ( अनिष्ट 
स्वनदशनसे) अभिमत न होता हुमा शयन करता है । उस समय यदि 
चह [स्वम] खीको देसे तो वैसा समसे कि क्म सफल हो गया ॥७॥ 


जथानन्तरं खल्वेतया वक््य-| इसके अनन्तर वह इस कदी 
जानेवारी छचासे पादशः आचमन 

------- चाः मकण करता दै; अर्थात्‌ इ हे; अर्थात्‌ शष 
ॐ इस छचाका अर्थं 


इस, भकार दै --“इम प्रकाशमान सविताके उख 
सनविषयक श्रेष्ठतम भोजनकी प्राना करते देबताके 
स्वख्पका ध्यान करते ह । इ ओर शभ. ही सुविता देनताः 


माणय्चां पच्छः पादश आचा- 


दण्ड २] 


ह्ङ्रभाष्याथे ७६९ 


> 8 ~~ 4-8-83 9 9 4 


मति भक्षयति मन्त्रस्येकेकेन 
पादेनेकैकं ग्रासं भक्षयति । 


तद्धोजनं सवितुः स्वस्य प्रस- 


[क 


वितः प्राणमादित्यं चैकीडत्यो- 
च्यते, आदित्यस्य वृणीमहे प्रथं 
येसहि मन्थरूपय्‌ | येनानेन सा- 
वित्रेण मोजनेनोपश्ुक्तेन वयं सवि- 
तृसखरूपापन्ना भवेमेस्यभिग्रायः। 
देवस्य सवितुरिति पूर्वेण संब- 
न्धः श्रेष्ठं प्रशस्यतमं सर्वा्नेभ्यः 


सर्वधातमं शर्वश्य जगतो धार- 
यिततममतिश्चयेन विधाततम- 


मन्त्रके एक-एक पादसे एक-एक 
आस भक्षण करता दै । हम सविता 
-- सवका प्रसव करनेवाटे आदिव्य- 
के उस मन्थरूप भोजनी प्राथना 
करते ईै- यहाँ प्राण णौर आदित्य- 
को एक मानकर पसा कदा गया 
है- जि अन्न अर्थात्‌ सविता 
देवतासे उपमोग क्रिय हष 
भोननद्वारा हम स्स्वरूपको 
पर्त हँगे-रेसा इसका अभिप्राय 
हे । देवस्य सवितुः, इस प्रकार 
ेवस्यः पदका पहले [ सवितुः 
पद्‌ } से सम्बन्ध है । श्रेष्ठ -समस्त 
| अन्नो पक्षा भ्रस्यतम, “सवं- 
घातमम्‌'-- समस्त जगतके उच्कष्ट 
धारयिता अथवा सम्पूणं जगतके 
अतिशय विधाता ८ उत्पक्तिर्ता ) 
--इस प्रकार कुछ भी अथं किया 
जाय ] यह सर्व॑था भोजनका विशोषण 


ह । हम तुर-त्वर-तुणं अर्थात्‌ शीघ्र 


भिति बा । सर्वथा मोजनवरिरे- | ही भग- सविता देवताके स्वपा 
| 


षणस्‌ । त्रं त्वरं तृणं शीघ्रमि- 
त्येतत्‌ । मगस्य देवस्य सवितः 
स्वरूपमिति शेषः । धीमहि 
चिन्तयेमदि विरिष्टमोजनेन 
संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्त 
इत्यभिप्रायः । अथवा भगस्य 
भियः कारणं महं प्राप्तुं कमं 


: - -श्वरूप' शब्द यहाँ शेष दै-- 
[ अर्थात्‌ यह ऊपरसे खाना ` पड़ता 
ह ] ध्यान चिन्तन करते हैः 
तात्य यह हे छि उस विशिष्ट 
भोजनसे संस्कारयुक्त भौर शुद्धचित्त 
होकर हम उसके स्वरूपका ध्यान 
करते है । अथवा भग यानो श्रीके 
कारणमूत महत्वको प्राप्त करनेके 


वा 


४७० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ बष्वाव५ 


< >< 2 < 9८ 2८ < 86 >< < < ¬< < < < < +< >< € छत < ऋ अअ | 
कृतवन्तो बयं तद्धीमहि चिन्त- | स्यि कमं करनेवले हम उसका धयान । 


येमहीति सवं च मन्थेपं पिवति | --चिन्तन करते है । पेसा कका 
निर्णिज्य प्रक्षाल्य सं कसाखारं | कस- काकार अथवा चमघ॒-- 


चमसं चमसाकारं वोदुम्बरं | चमसराकार॒गूलरके पत्रको पेक्ष । 


पात्रम्‌ । सरे मन्थकेपको पी नाता है । 
पीत्वाचम्य प्रधादम्नैः प्रा मन्थेपको पीकर भाचमत 


(^ 9 [9 अनन्तर भमि ठे (;- 
कूमिराः संविशति चभंणि वाजिने करनेके अनन्तर अमिके पर 


[ सृगाद्की ] खाल्पर अथवा | 
स्थण्डिले केवलायां बा भूमौ, | स्थम्िर-केवल मूमिपर दी पूवी | 


] रि चंयम अर्थात्‌ | 
वाचंयमो वाग्यतः सन्नित्यथंः, | ओर शिर करके वा ति 


| संयतवाक्‌ होकर तथा अपरा 
अग्रसाहो न प्रसहयते नाभिभूयते | यानी इस प्रकार संयतचित्त होक 


रूयाघ्निषटस्वमदशेनेन यथा | फर जिसे सी जादि अनिष्ट छक । 


देखनेसे विङ्कत न हो जाय सो नतां | 
ष॒ एवंभूतो यदि खियं पर्येत्स्व- | दै । एेसी भवस्थामे यदि वह स्वप | 
प्नेषु तदा विद्यारसमृद्धं ममेदं | सीफो देखे तो यह समने किमे | 


तथा संयतचित्तः सन्नित्यर्थः, 


कर्मेति ॥ ७॥ यह कमं सखद्ध हो गया ॥ ७॥ 


तदेष ढ़ोको यदा कर्मसु काम्येषु लियरस्वमेषु 


तरि 
इस विषयमे 
देखे तो "उस ॒स्वप्नदरशेनके 
तदेतस्मिन्नथं एष शलोको 
मन्त्रोऽपि मवति । यदा कमसु 


॥ ८ ॥ 


होनेपर उख कर्म समृद्धि जने ॥ ८ ॥ 
उस इसी स्थे यह शोक 
मन्त्र भीदहे। जब कि काम्य 


परयति समद्धि तत्र॒ जानीयात्तस्मिन्स्वलनिदशे | 


यह. शोक है- जिस समय काम्यकमोमि स्वप्ने सीको | 


¢ 
छच्ड २] छ्ाह्करमाष्याथ ४७१ 


काम्येषु कामार्थ क्धियं स्वप्नेषु | कामनाभेकि स्थि कयि हए कमेमिं 
स्वभरदरनेषु स्वप्रङारेषु वा स्वप्नमे -स्वप्नदशचनमे णथवा स्वप्न- 


धि कार्म खीक़ो देखे तो उसमे मृद्ध 
परयति सम॒द्धिं तत्र जानीयात्‌ । | सम्ञ; अर्थात्‌ उन कर्मक फर 


कर्मणां फलनिष्यत्तिरभविष्यतीति | प्रा होगा--येखा जाने । ताल 
जानीयादित्यथंः । तस्मिन्‌ | %९ षै ढि उस सी आदि परशस्त 


स ९ स्वप्दर्शनके दोनेपर [ फरमकी 
दशं - 
र्यादिप्रस्तस्वमदने सती सफलता घमञ्ञे ] । (तस्मिन््वप्न- 


त्यभिपरायः । द्विरुक्तिः कर्म- | निदर्शने तस्मन्छप्ननिदरशनेः यह 
समाप्त्यर्था ॥ ८ ॥ | द्विरुक्ति कर्मकी समापिके स्यि दै॥८॥ 


~ र्ठ 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 
द्वितीयङण्डभाष्यं सम्पृणेम्‌ ॥ २ ॥ 





[> 


= (1 


५, 
१ © २ 


पा्चालोक्षी समामे श्वेतकेतु 


ब्ह्मादिस्तम्बपयन्ताः संसार- 


युभु्च॒पुर्षोके वैराग्यके स्थि ¦ 


ब्र्मासे रेकर स्तम्बपर्यन्त संसारी | 
गतयो वक्तव्या वैराग्यैतो्ुकष- | गवियोका वणन कना चाहिये । 


सील्यि यह आख्यायिका आसम 


णामित्यत आख्यायिकारम्यते- | की जाती है-- 


श्ेतकेतु्हरुणियः 


पञ्चाटानारसभितिमेयाय 


तह प्रवाहणो जेवछिरुवाच ुमारालु खाशिषप्पिते | 
त्यनु हि भगव इति ॥ १॥ 


आरुणिका पुत्र उवेतकेतु पच्चारुदेशीय रोगोकी समामे आय । 
उससे जीवरुके पुत्र प्रवाहणने कह¡--ह कुमार ! क्या पिताने त 
रिक्षा दौ हे । इसपर उसने कहा, भगवन्‌ ! | १ ॥ 


वेतकेतु नामवाल--€' द 


श्वेतकेतु्नामतः, इ इत्यै- 


तिदय, निपात एेतिद्यके टियि दै-भरणके 
गस्तस्यापत्यमारुणेयः पश्वा- | पनरको भारुणि कते हे, उसका पतर 
खानां जनपदानां समितिं | आर्णेय पञ्चाल देशके ररगोफी 

सभामेयायाजगाम । सभाम आया । उस आगे 
गत्न्त इ प्रवाहणो | पवाहण नामवारे जीवलके धुत 
नामतो व जेव- | नेवरिनि कंा- £ कुमार ! क्या 
। हे इमा- | पिताने तज्ञ लक्षित) 

धनु र ने वज्ञे अनुशासित (र 


प्वपपत्यता १ किमनुचिष्टस्त्वं 


किया है ? अर्थात्‌ वया पिताने 


सक्षयिकषा दी दै? पेता ष्टे ¦ 


ण्ड | ा्कुरभास्यार्थ न्व 
क 9 क + न 23 = ॐ= = = 4 
पित्रेत्यथः । इत्युक्तः स अ'इ- जानेपर उसने कहा-“शं, 


1 भगवन्‌ | मँ अनुद्यासित फियां गया 
अनुख्रिष्टोऽस्मि भग र 
अलु हि अलुच्ष्टोऽस्मि भगव ›-इस प्रकार सूचित करते हूए 


इति चयन्नाह ॥ १॥ उसने उत्तर दिया ॥ १ ॥ 
ग्रवाह्णके प्ररन 
तं दोवाच--यश्चटुि्टोऽसि, | _ उसने उससे कदा--थदि कच 
' रिक्षा दी गयी है तो-- 


वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति ? न भगव 
इति । वेत्थ यथा पुनरावतंन्त ३ इति ? न भगव इति। 
वेत्थ पथोदँवयानस्य पित्रयाणस्य च व्यावतना ३ 
इति ? न भगव इति ॥ २ ॥ 

“वया तुञ्े मालस है कि इस लोकसे [ जानेपर ] प्रना कहां जातौ 
हे ¢ [ इवेतकेतु--] “भगवन्‌ । नहीं ॥ [ प्रवाहण] क्या तू जानता 
है कि वह फिर इस रकम कैसे आती हे  [ खेतकेतु-- ] नही, 
भगवन्‌ | [ प्रवाहण--] देवयान ओर पितरयाण-इन दोनों मार्गेका 
एक दूसरेसे विरग होनेका स्थान तुजे माख्म है ¢ [शेतकेतु-] दी 
भगवन्‌ | ॥ २ ॥ 


वेत्थ यदितोऽस्माघ्नोकादधि | क्यात्‌ जानता है फि.यहसि 
ऊष्वं॑ चलना अयन्ति |= रोकसे परे प्रजा कहां जाती 
| है? तात्पर्यं यह दै कि क्या तञ 

यद्वच्छन्ति, तत्कि जानीषे ! | इसका पता है ¢ इसपर दूसरे 
इत्यथ; । न मगव इत्याहतरः, | ( श्तकेठ ) ने कदा--भगवन्‌ । 
न॒ जानेऽहं तदयत्पृच्छसि । | ८ ५ ५ 
् रि ¢ <| तह जानता । अच्छा ता;जस 
एवं तर्हि, वेस्थ ८ | तरद वह इस रोक गती है चट 
यथा येन प्रकारेण पुनराबतन्त | क्था ते माख्स है ¢ इसपर उसने 
इति न भगव इति प्रत्याह । । उत्तर दिया- भशवे । नरी ॥' क्या 








४ 4 0 8 8 "२५ 

(५ 
वेत्थ पथोमागयोः सदप्रयाण- | ते साथ-साथ जानेवारे देवया 
यो्देवयानस्य पिठ्याणस्य च | जोर पिवृयाण इन दोनो मग 
व्यावतेना व्यावतैनमितरेतर- | यातना व्यावतेन अर्थात्‌ इनप 


| ॐ साथ-साथ जनेवाले पूुरुषोके ए़ 
वियोगस्थानं सह गच्छताम्‌ ? दूसरेसे भलश होनेके स्थानकरा पता 


इत्यथः । न भगव इति ॥२। । दे १ भगवन्‌ | नही ॥ २ ॥ 


--:&:-- 


वेस्थ यथासौ खोको न संपूर्यत ३ इति न भगव 


इति । वेत्थ यथा पथभ्यामाहुतावायः पुरुषवचसो 
भवन्तीति ? नैव भगव इति ॥ ३ ॥ 


[ प्रवाहण] (तुञ्े मादम दै, यह पितृलोक भरता क्यौ नही ¢ 
(धेतकेतु-) भगवन्‌ | नही ॥ [ प्रवाहण] कया तू जानता है 
पोचवीं आहुतिके हवन कर दिये जानेप्र आप ८ सोमधृतादि रस ) शुर 
संज्ञको कैमे परा होते दै ¢ [ धेतकेतु] नही, भगवन्‌ ! नही ॥२॥ 


वेत्थ यथासो रोकः पितु- | च्या तू जानता है कि यह 
सम्बन्धी यं पराप्य पुनरावर्तन्ते, | पितृगणतम्बन्धी कोक, निसे श्राप 
मिः भद्रि होकर फिर लोट आते दै, बहर्ती 
0 त सरणेत जनेपर भी किस कारणसे नदीं 
न सम्यत इति १ न भगवत इति | भरता ? “भगवन्‌ | नही, एसा 
प्रया । वेत्थ यथा येन क्रमेण | उने उत्तर दिया । श्या त्ष 
पच्या पश्चसंख्याकायामाहृतौ | ४ 1 ध 
इतायामाहुतिनिष्त्ता आहुति- | आईतिके हुत होने पर आहुति 
साधनाश्ापः पुरुप्वचसः पुरुष | रहनेवारे आाहुतिके साधनमूत आप 


~ परुषवाची हो जाते है १ तात्य 
इत्येवं वचोऽभिधानं यासां हय- | यह दै फ़ि हवन किये जानेवारे 


खब्ड २] छाद्रभाष्वाथं ४७ 


मानानां क्रमेण पष्ठाहुतिभूतानां | जिन चटी आहुतिमू ॒दर््यका 
ताः पुहषवचसः ुरूपशस्दवाच्या | पप" यही कचन मानी नाम हवे 
पुरुषवाच कैसे हो जाते है १ अर्थात्‌ 
पुरुषसंज्ञा कैसे प्राप्त करते हँ 
इत्यर्थः । इत्युक्तो नैव भगव | पेखा कटे जनेपर उने यदी कडा- 
इत्याद, नैवाहमश्र॒किश्चन | भगवन्‌ | नही; अर्थात्‌ भँ इष 
जानामीत्यर्थः ।॥ ३ ॥ विषयमे कुछ भी नहीं जानता ॥२॥ 


भवन्ति पुरुषाख्यं ठमन्ते ? 


ग्रवाहणसते पराभूत अ अपने पिताके पास आना 

अथानु किमलुरिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न 
विदयात्कथश्सोऽनुशिष्टो व्रवीतेति। स हायस्तः पितुर- 
्धमेयाय तश्होवाचानलुरिष्य वाव किख मा भगवान- 
्रवीदनु स्वाशिषमिति ॥ ४ ॥ 

“तो फिर तू अपनेको शे रिक्षा दी गयी ड, पसा करो बोक्ता 
था १ जो इन बातोको नहीं जानता वह अपनेको रिष्ित कैसे कह सकता 
ह ¢ तव वह त्रस्त होकर जपने पिताके स्थानपर आया ओर उससे 
बोला--श्रीमानूने शक्ञे शिक्षा व्ि बिनादी कड दिवाथाङि मेने 
तञञे रिक्षा देदी है" ॥ ४॥ 

अथैवमक्ञः सन्किमनु कस्मा- | तो र इस भकार अज्ञ होने- 
्वमनुशिषटोऽस्मीस्यवो चथा उक्त-| ए भी तूने शु शिक्षा दी गयी हैः 
वानसि १ यो हीमानि मया | देवा कैत कडा £ जो ध 
ृ्टान्य्थजातानि न विद्यान्न | ई मेपू हरे तोश ची 
1 जानता वह विद्रानोमे शुञ्च शिक्षा 

विजानीयात्कथं स विद्वत्स्वलु- | दी गयी है, देवा कैसे कड सकता 
शिष्टोऽस्मीति ब्रुवीत ? इत्येवं स | है £ इस भकार राबासे आयस्त 
उवेतकेतं रा्ञायस्त आयासितः । पीडति शो वहं वेतकेतु अपने 


७७६ छान्दोग्योवनिव्‌ | जष्याव + 


द > 
सन्पितुरधंस्थानमेयायागतवान्‌ „| पिताके भधं-स्थानपर आया घौ | 
तं च पितरमुवाच---अननु- उस अपने पितासे बोका--श्रीमन्‌ | 
रिष्यालुशासनमङ्कतवैव मा मां | ने अनुशासन क्वि बिना ही एम | 
किङ भगवान्समावतंनकारेऽ्- | वतन संसारके समय सुते ऋ | 
वीदुक्तवाननु त्वाशिषमन्वरिपं | दिया था कि “मेने तुचे रिक्षा द 

त्वामिति ॥ ४॥ दीदहैः॥४॥ | 


यतः-- । क्योकि-- 

पञ्च मा राजन्यबन्धुः धरश्ानप्ा्षोत्तेषां नेकथना- 
शकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा खं तदेतानवदो | 

यथाहमेषां नेकथन वेद्‌ यदयहभिभानवेदिष्यं कथं ते 
नावक्ष्यमिति ॥ ५॥ 
“उस क्षत्रियनन्धुन सुकषसे पाँच प्रक पठे थे; कितु में उनमेते | 
एकका भी विवेचन नहीं कर सका ' उश्तने कहा-- तुमने उस समय 
(भति दी ) जसे य भरन शङ घुनाये दै उनमेसे मे एकको भी नह 
जानता । यदि मे इन्द जानता होता तो तुण्डे क्यो न बताता ¢ ॥५॥ , 
पञ्च पश्चसंख्याकान्प्ररनान्‌ | शराजन्यवन्धुने-राजन्य (क्षत्रि | 
धु उवे ¦ 
राजन्यबन्धू राजन्या वन्धवो- रोग ) जिसके बर्‌ हो | 
राजन्यबन्धुः कहते दै भरा | 
जो स्वयं दुराचारी है देसे ॐ 
इत्यथैः । अपरा्ीपटवान्‌ तेषां | राजन्ययन्धुने सु्से पौव~गिनतीके । 
ह पोच प्रन पेये; तुरम | 
्रनानां नेकश्चन एकमपि नारकं मदनोमेसे एक्का भी विवेचन ह । 
न ययाहं वव िपण- | भरद उम व 


क रूपसे भर्थतः निर्णय नहीं क! 
थेतो नि्गेतुमित्यर्थः । सद ॥ 


ऽस्येति राजन्यबन्धुः स्वयं दर्त्त 


खण्ड ६ | 


शाङ्करभाष्याथं ७७७ 


य हौवाच पिता--यथा मा 
माँ वत्स त्वं तदामतमात्र एषै- 
तान्‌ प्रशनानवद्‌ उक्तवानसि- 
तेषां नैकश्चनाशकं विवक्तुमिति, 
तथा मां जानीहि, स्वदीयाज्ञा- 
नेन लिङ्गेन मम तद्विषयमंज्ञानं 
जानीहीत्यर्थः । कथम्‌ ! 
यथाहमेषां प्ररनानामेकश्चनै- 
केमपिनवेद न जान इतिः; 
यथा त्वमेवाङ्गेतान्‌ प्रश्ना 
जानीषे तथाहमप्येतानन जान 
इत्यर्थः । अतो मय्यन्यथाभावो 
न क्न्य । कत एतदेवम्‌ १ 
यतो न जाने; यद्यहमिमान्प्ररना 
नवेदिष्यं विदितवानस्मि, कथं 
ते तुभ्य प्रियाय पुत्राय 
समावतेनकारे पुरा नावक्ष्यं 
नोक्तवानस्मि १ ॥ ५ ॥ 


तव उक्त पिताने कहा--हे 
वत्स | तुमने उस्र समय भाते ्टी 
जञेसे ये प्रन मुञ्चसे कहे है उससे 
मे एकका भी विवेचन नहीं कर 
सकता । पेशवा ही तुम ुश्चे समशो; 
अर्थात्‌ जपने ज्ञानरूप लिङ्गसे तुम 
उस॒ विषये मेरा अज्ञान समक्ष 
लो; रेस वर्या £ क्योकि इन प्रनो- 
मसे मेँ एकको भी नहीं जानता । 
तात्पर्यं यह है किह तात | जिस्‌ 
प्रकार तुम इन प्रश्नोको नदीं जानते 
उसी प्रकार मे भी नहीं जानता । 
अतः मेरे भरति तुरगे अन्यथाबुद्धि 
नहीं करनी चाहिये । किंतु यह्‌ 
बात रेसी कैसे समञ्ली जाय ए 
कर्याफि मे इन्द जानता नहीं है 
यदि मेँ इन प्रदर्नोको जानता तो 
पहर समावतंनसस्कारके समय 
अपने प्रियपुत्र तुम्हारे प्रति क्योन 
कहता | ॥ ५॥ 





पिता-पुत्रकना प्रवाहणके पास आन 
इत्युक्त्वा-- | पसा कहकर-- 


स ह गोतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मे ह ्रा्तायाहा- 
अकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तदोवाच मानुषस्य 
भगवन्गौतम वित्तस्य वरं वरणीथा इति। स होवाच तवेव 


४७८ छान्दोण्योदनिषव्‌ [ गध्या ५ | 
राजन्मानुषं वित्तंयामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथासा- ` 
मेव मे ब्रूहीति स ह छच्छी बभूव ॥ ६ ॥ 
तव वह गौतम राजाके स्थानपर आया । राजान अपने यहाँ अये 
हुष उसफी पूजा की । [ दूसरे दिन परात.कारु होते ही रानके समां 
पहुंचनेपर वह गौतम उसके पास गया । उसने उससे कहा-^£ 
मगधान्‌ गौतम | माप मनुष्यसम्बन्धी घना वर माँग ङीजिये । उसने 
कहा-- राजन्‌ | ये मनुष्यसम्बन्धी घन आपहीके पास ररह; मापने पैर 


पुत्रके प्रति जो बात [ प्ररनखूपसे ] कटी थी वही मुञ्चे बताये ॥ तव 
वह संकटे पड़ गया ॥ ६ ॥ 


स इ गोतमो गोत्रतः, राज्ञो 
जेवरधे स्थानमेयायागतवान्‌। 
तस्मे ह गौतमाय प्राप्ायार्हाम- 
देणां चकार कृतवान्‌ । स॒च 
गोतमः कृतातिथ्य उषित्वा 
परेयुः प्रातःकाले समभागे सभां 


वह॒ गौतम-गोत्रोखत्न सुगि | 
राजा लैविकि स्थानपर भया। | 
अपने यहाँ आये हुए उस गौतमी | 
उसने अर्हा-पूजा की । इस प्रकर | 
मातिथ्यसत्कारसे स्त वह गोत 
उस दिन निवासत कर दक्र दिगि | 
स्ेरे ही रानके समागत हेने- | 
समामे पुचनेपर उसके समी 


गते रास्युदेयाय । भजनं भागः 


पूजा सेवा सदह भागेन वतमानो 


वा समागः पूज्यमानोऽन्यै, 
स्वयं गोतम उदेयाय राजान- 
युदधतवान्‌ । 

तं होवाच गोतमं राजा- 
मादुपस्य भगवन्गोतम मनुष्य 
सम्बन्धिनो वित्तस्य ग्रामादेर्वर 


व्रणीयं कामं इृणीथा,प्राथयेथाः। 


गया | अथवा [ मागः प 
मानकर देखा भर्थं हो सकता दै- 


माग-भनन अर्थात्‌ पूना-सेवकी । 


कहते है जो भागसे युक्त भरात्‌ 
दूसरेसे पूनित था वह गौतम स्वग 
राजाके पास गया । 

उस गौतमसे राजाने का~ 


"हे भगवन्‌ | जाप भनुष्यसन्बन्धी 


र | आमादि धनका व्रण करने योग 
| व्र इच्छानुसार मोग रीनियि । 


खण्ड ह] 


स॒ होवाच गौतमः- तवैव 
तिष्ठतु राजन्मालुष वित्तम्‌; 
यासेव कुमारस्य मम पुत्रस्यान्ते 
समीपे वाचं पशचप्रक्षलक्षणाम- 
भाषथा उक्तवानसि वामेव वाचं 
मे मं जूहि कथयेत्ुक्तो गोत- 
मेन राजा सद छृच्छी दुःखी 
बभूव--कथं न्विदमिति ॥६॥ 


ष 
छ्ाङ्खल्माचव्वाय 
~~ ~~ ८ 9८ 9 8 4 9 9 ~ 9 9 > 8 ~ 


७.७९. 


उस गौतमने कहा-- हे राजन्‌ । 
यह॒ मनुष्यसम्बन्धी घन तुम्हारे 
ही पास रहे । तुमने कुमार 
अर्थात्‌ मेरे पुत्रके प्रति जो पच 
पररनरूप बात कही थी वही -सुञ्षसे 
कहो । गौतमक इ रकार कहने- 
प्र्‌ वह राजा यह कहता हुभा कि 
“ह्‌ कैसे हो सकता दै? इृच्छरी 
--दुखी हो गया ॥ ६॥ 


-! ० ¦~ 


प्रवाहणक्रा वरप्रदान 


स ह कृच्छीभूतोऽप्रत्याख्ययं 


इस प्रकार दुखी हुए उस राजा- 
ने न्नाह्मणका प्रत्याख्यान नहीं करना 


ब्राह्मणं मन्वानो न्यायेन विद्या | चाये" यह मानते हुए तथा “विदया- 


वक्तव्येति मत्वा- 


का नियमानुसार ही उपदेश्च करना 
चादिये' यह समस्ते हुए - 


तरह चिरं वसेत्याज्ञापया्चकार तरहोवाच यथा 
मा त्वं गौतमावदो यथेयं न भाक्‌ त्वत्तः पुरा विद्या 
बराह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु रोकेषुक्षत्रस्येव प्रा 
सनमभूदिति तस्मे होवाच ॥ ७ ॥ 

उसे "यहाँ चिरकार्तक रहो" ेसी आज्ञा दी, ओर उससे कदा- 
शे गोतम | निस प्रकार तुमने युक्षसे कहा है [ उससे त॒म यहं समज्ञो 
कि ] पूर्वकारमे तमसे परे यद विदा ब्राह्मणोके पास नहीं गयी | 
इसीसे सम्पूणं लोकम [ इस विादरारा ] ्षतर्योका ही [रिष्येकि भति 
शनुदासन होता रहा है । एसा कर्कर वह गौतमसे बोखा-॥ ७ ॥ 


तं ह गोतमं चिरं दीधेकालं 
वसेत्येवमाज्ञापयाश्चकाराज्ञप्र- 


उस गौतमको उसने थ्वी 
चिरकालतक रहो' एेसी अज्ञ दी । 


वान्‌ । यल र्याख्यातवान्याजा। राजाने षले नो विदय भला- 


४८० 


विधां यच पश्वाच्धिरं बसेत्यज्ञ- 
एवान्‌, तन्निमित्तं ब्राहमणं क्षमा- 
पयति हेतुवचनोक्त्या । 


तं होवाच राजा सवविचयो 
ब्राह्मणोऽपि सन्यथा येन प्रका- 
रेण मा माँ है गोतमाषदस्सवं 
तामेव विद्यालक्षणां वाचं मे 
बृहीत्यज्ञानात्तेन त्वं जानीहि । 
तत्रास्ति वक्तव्यं यथा येन प्रका- 
रेणेयं विद्या प्राक्‌ तत्तो ब्राहञ- 
णान्‌ गच्छति न गतवती । न 
च ब्राह्मणा अनया विद्ययानुशा- 
सितवन्तः । तथेतत्प्रसिद्धं रोके 
यतस्तस्मादु पुरा पं सषु लोकेष 
कषत्रस्यव क्षत्रजातेरवानया 
विद्यया प्रशासनं प्रशास्त 
शिष्याणामम्‌हवभूव । पत्रियप्र- 
म्परयंवेयं बिदयेतावन्तं कालमा- 
गता, तथाप्यहमेतां तुभ्यं 
वक्ष्यामि खत्सम्परदानाद्‌ष्वं ब्रा- 
हणान्गमिष्यति । अतो मया 
यदुक्त ततकन्तुमहसीत्युक्त्वा 
तस्म होवाच व्रां राजा ॥७। 


इति ग्योपिष ® १-- 
छन्दो वानोपनिषरि 


छान्दोग्योदनिचहु 


>8<>8८ < 5८ < ऋ 8 € < < 6८ < ¬< 5८ +< < <> 8 € 


[ लभ्याय ५ 


ए्यान करिया ओर्‌ फिर उपे शचि 
कार्तक दहो" सी जज्ञ दै, 
उसका कारण बताते हुए बह 
तरह्मणसे क्षमा कराता है । 
राजाने उसे कहा- सर्व. 


न्च + | 


विघासम्पन्न ब्राह्मण होनेपर भी है ¦ 
गौतम | तुमने नित प्रकार पुक्षे | 
'उस्॒विदयारूप वाणीको हीमेरे | 
प्रति कहो" इख प्रकार अजञानपूक | 


कहा है इससे तुम यह्‌. जनो | 
उसमे यह कारण बतलाना टै 
जिससे यह विधा तुमसे पे 
बराह्मणम नहीं गथी तथा इस विदाः 
द्वारा बाक्ष्णोने उपदेश ही नी 


किया; क्योकि इस प्रकार यह बति | 


इस लोकम सिद्ध है इसी पूवंकास 


समस्त ोकमिं क्षत्रियका दी-- | 
क्षत्रियनातिका ही इस वि्यके द्वार । 


शि््योका शासन --शिक्षकृतव रदा 
ह । अर्थात्‌ क्षत्रियोकी परम्परसे 
ही इतने समयतकं यह विद्या भाथी 


है । तथापि मै तम्हारे भ्रति इसक्र | 
उपदेश कष्ंगा । तुम्हे देनेके पशात | 


यह ब्राहम्णोके प्रास जायगी । ईस. 
स््यिर्मेने जोकुछछ कदा है उसे क्षमा 
करना । एसा कहकर राजनि | 
वि्याका उपदेश्च किया ॥ ७ ॥ 





< पञमाव्याये 


व ( ॥ ३॥ 


चतुथं करड 


पञ्चम प्ररनकरा उत्तर 


पश्चम्यामाहुतावाप इत्ययं अव पोचषीं भहुतिमे अप 
(जर) पुरषसं्क क्यों हो नाते है 

प्ररनः प्राथम्येनापाक्रियते | तद्‌- | इस परशनका सबसे पहले निराकरण 
किया जाता है, क्योकि उसका 
पाकरणमन्वितरेषामपाकरणमलु- | निराकरण होनेपर अन्य प्रनोका 
निराकरण सुगम हो जायगा । 

कूलं भवेदिति । अग्निहोत्राहुस्योः | अगनदोत्रकी [ प्रात कालिकं ओर 
सायंकार्कि ] दोनों आहुतिर्योका 

कार्यारम्भो यः स॒ उक्तो वाज- | जो कार्यरम्भ है वह॒ वाजसनेयो- 
पनिषदूमे बतला दिया गया है । 

सनेयके। तं प्रति प्रदनाः, | वह उस ८ कार्यरम्भ ) के विषयमे 
उन दोनों आहुतिर्योकी उक्तान्ति, 

उक््रान्तिराहुत्योर्मतिः प्रतिष्ठा | गति, तिषा, ठप, पृनराइतति तथा 
लोकोक प्रति उत्थान करना-ये छः 

वर्तिः पुनराव््तिरोकिं प्रत्युत्था- | प्ररल हँ । वहीं उनका निराकरण 
भी इस प्रकार बतलाया गया है- 

यीति । तेषां = ८वे ये आहुतियाँ हवन किये जनेपर 
‡ [ पूर्वरूप होकर उक्तमण करते 
तत्रैव-ति वा एते आहुती इते | हए यनमानको आदृत कर उसके 
साथ] उक्रमण करती इई 

उतरामतस्ते अन्तरिक्षमाविद्चतस्ते। अन्तरिक्षलोके पवेश करती है 
सर अन्तरिक्षरोकको दी आहवनीय, 

अन्तरिक्षमेवाहवनीयं ङुवति वायुं वायुको समिध तथा किरण 


७८२ छाव्टोष्योरनिचषु 


क 29 + 2५ 


[ बष्याष ५ | 


समिधं मरीचीरेव शुक्छामाहुतिं | शुक्र आहति नाती है, इ व | 


अन्तरिकशषरोकको तृप्त कती है 
ते अन्तरिक्षं ॒तषेयतस्ते तत | फर्‌ वहसे [ यजमानके उक्त 


उत्करामतः'"इत्यादि; एवमेव पूरव 


वदिवं तथेयतस्ते तत आवर्तते 1 


इमामाविदय तथेयित्वा पुरूष- 


माविशतः । ततः स्ियभाविरय 
रोकं प्रत्युत्थायी भवतीति | 


तत्राग्नहोताहृत्योः कार्था- 
, रम्भमात्रमेवप्रकारं भवती्युक्त- 
` मू्‌। इह ठ॒ तं कायारम्भमग्न- 
| | होतापृवेबिपरिणामलक्षण पथ्चधा 
भविमज्याग्नित्वेनोपासनयततर- 
माधरतिप्िसाधनं विधित्स- 
` जाई । असो वाब लोको गोत- 
 माग्निरित्यादि। 


करनेपर ] वे उक्तमण कती है" | 
इ्यादिषूपसे इसी तरह पहरेहीके । 


समान धुरोकको [ घरलोक 
यजमानको फरुप्रदानद्वारा ] त 
करती हं । तत्पश्चात्‌ [ परारन्यक्षय 
होनेपर यजमानके पुनरावत॑न 
करनेपर ] वे वहोँपे लोट भाती है, 


तथा इस रोके प्रवेश कर इपे त । 


करनेके अनन्तर (रेतःसेकमें समध 
पुरुषमे प्रवे करती हं । भि 
सीमे भवे कर वे परलोके प्रति 
[ लोकिकं कर्मं कराती हु ] उथत्‌ 
करनेवारी होती है । † 

वहाँ 


( वाजघषनेयोषनिषद्मे) 


तो यह बतलाया गया था कि जनिः 


होत्रकी आाहुति्योका केवर र्थ 
रम्भमात्र इस प्रकार हेता टै; पि 


यहाँ भग्निहोत्रके पूवक विपरिणाग 


रूप उद का्यरिम्भकेो पांच १ 

विभक्त कर उनम उत्तरमारगकी प्रि 
के साधनभूत अग्निभावसे उपाघन 
का विधान करनेदी इच्छति शू 
“यसौ बाव लोको गोतमामि" 


इत्यादि कृथन करती दै। 


` बन्गज्तसननत- ~ 
गर्भरूपसे न्सुख करती दै । 
, म्रासि ५ दाय पारो, इए, यजमानकौ कर्मानषठानमे खम दे 


शमन करती ई | 


कमं कराती हुई उखका प्रोकके रि 


खण्ड छ ] 


& 
शआाद्रभाण्याथ ४८३ 


ऋ 9 ट 9 3 9 ट ~~ 9 2 >> ~ 


इह सायंप्रातरम्निहोत्राहुती 
हुते पयआदिसाधने शरद्धापुरः- 
सरे आहवनीयाग्निसमिद्धूमाचि 
रङ्गारविस्फुलिङ्गमाविते कत्रादि- 


कारकमाविते चान्तरिकषक्रमेणो- 
त्म्य चुलोकं प्रविषशन्त्यौ 


घषष्मभूते अप्समवायित्वादष्श- 
ब्दवाच्ये श्रदधाहेतुत्वाच्च श्रद्वा 
शब्दवाच्ये । तयोरधिकरणोऽग्निः, 


अन्यच तत्संबद्रं समिदादीत्यु- 


इस रोके जरु आदि निनके 
साधन है, जो श्द्धपूर्वक निष्प 
की जाती है, जिनमे आहवनीय 
सभि, समिघ्‌ , घूम, अचि, अङ्गार 
जौर विस्फुरिन्नकी तथा कर्ता आदि 
कारककी भावना की गयी है, वे 
अग्निहोत्रकी साय॑काकिक एवं प्रात- 
कालिक दो आहुतिं भन्तरिकष- 
क्रमसे उक्तमण कर युरोकर् प्रवेश 
करती हुई सुक्ष्म एवं जपू-समवायिनी 
८ जङंमयी ) होनेके कारण अप्‌! 
शब्द्ठी, वाच्य हँ ओर श्रद्धाजनित 
होनेके कारण श्रद्धाः शब्दकी 
वाच्य हैँ । यहाँ उनके आश्रयमूत 
अग्नि जीर उससे सम्बद्ध जो समिष्‌ 
आदि है उनका वणन किया जाता 
है तथा उन आहुतिर्योम लो भग्न 


च्यते। या ऋसावग्न्यादिभावना | आदिक भावना है उसका भी उसी 
हत्योः स।पि तथैव निर्दिश्यते । | भकार निर्ध किया जाता है । 
लोकरूपा अग्निविद्या 
असौ वाव रोको गओोतमाग्निस्तस्यादित्य एव 


समिद्रदमयो भूमोऽहरचिश्वन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि 


विस्फुलिङ्गाः ॥ १॥ 


हे गौतम | यह प्रसिद्ध [ धु-] रोक हौ अग्नि है। उसका 
आदित्य ही खमिष्‌ है, किरणें धूम है, दिन ज्वा दहै, चन्द्रमा शङ्गार 
ह भर नक्षत्र विस्पुलिङ्ग ( चिनगारियो ) है ॥ १ ॥ ` 


च्छा उ ९ 1 ~ 


४८७ 


छान्दोन्योनिवद्‌ 


[ अण्याव ५ 


>>> ~ ~ ~ ८ ~ ¬ >^ > > < ८ >< >8८ ¬ >> ~ ~8 ह > 


असो वाव रोकोऽग्निह गौतम 
यथाग्निरोत्राधिकरणमाहवनीय 
इद।तस्यागेधलोकाख्यस्यादित्य 
एव समित्‌, तेन दीद्धोऽसौ 
लोको दीप्यते अतः समिन्ध- 
नात्समिदादित्यः। रदमयो धूम- 
स्तदुत्थानात्‌, समिधो दि धूम 
उत्तिष्ठति । अहरचिः प्रकाश 
सामान्यात्‌,आदित्यकायत्वाच । 
चन्द्रमा अङ्गाराः, अह'प्रशमे- 
ऽभिव्यक्तेः अचिषो हि प्रशमे- 
ऽङ्गारा अभिव्यज्यन्ते । नक्षत्राणि 
विस्फुलिङ्गाधनद्रमसोऽवयवा इव 
विपरकीणेत्सामान्यात्‌ || १ ॥ 


<~ ८ 
° 


हे गौतम | जिस प्रकार इष 
लोकम आहवनीयाग्नि अगिहोत्रका 
अधिकरण है उसी प्रकार यह 
परसिद्ध रोक ही अन्निहै। उक 
युरोकस्ञक अग्निका आदिय ही 
समिष्‌ है; उससे सम्यक्भकारसे दीप 
हभ ही यह लोक देदीप्यमान होता 
हे; अतः सम्यक्‌ प्रकारसे इन्यन 
( दीपन ) करनेके कारण आदि 
ही समिध्‌ ( इन्धन) दै । उससे 
निकरनेके कारण किरणे धूम है, 
क्योकि समिधूसे दी धूम निकला 
करता है । प्रकारामे समानता भौर 
आदित्यका कायं होनेके कारण 
दिन ज्वाखा है। चन्द्रमा अङ्गार 
ह, क्यों कर यह्‌ दिनके शान्त होनेपर 
अभिव्यक्त होता हे; ौक्रिकं अङ्गार 
भी ज्वारके शान्त हौनेपर्‌ दी 
प्रकट हुजा करते है | तथा चन्द्रमा- 
के अवय्वोके समान नक्षत्रगण 
विस्फुलिङ्ग है, कर्यो इधर-उधर 
ठिटके रदनेमे [वि्पुरिङ्नोकि साध्‌] 
उनको समानता है ॥ १ ॥ 


भ कक 


तसमन्नेतसमजञग्ो देवाः शरद्धां जहति तस्या 
आहुतेः सोमो राजा संभवति ॥२॥ 


खण्ड ७ | 


< 
शाङडकरमाव्याथ 


४८५ 


क 5 3 = क 3 9 9 = = 4 > > क = 3 ऋऋ 
उस इस [च॒रोकरूप्‌] अग्निम देवगण श्रद्धाका हवन करते दँ । उस 
भाहुतिसे सोम राजाकी उल्ति होती है ॥ २ ॥ 
तरिमन्नेतस्मिन्यथोक्तरक्षणे- | उष इस उपयुक्त र्षणवाे 


अनौ देवा यजमानप्राणा अग्न्या 


{-| अग्ने देवगण-[भध्यामदृष्टिसे] 


यजमानके प्राण तथा अधिदेवत- 


दिरूपा अधिदेवतम्‌ । ठ रूपसे अग्नि आदि देवगण श्रद्धाका 


होत्राहुतिपरिणामावस्थास्ूपाः 

घस्मा आपः श्रद्धाभाविताश्रद्धा 
उच्यन्ते । पश्चम्यामाहुतावापः 
पुरुषवचसो मवन्तीत्यपां होम्य- 
तया प्ररे श्रुतत्वात्‌ । श्रद्धा वा 
आपः, शरद्धामेवारभ्य प्रणीय 
प्रचरन्ति, इति च विज्ञायते । तां 


शरद्धामनरुपां जुह्वति । 

तस्या आहुतेः सोमो राजापां 
भरद्धाश्ब्दवाच्यानां दलो काग्नौ 
हतानां परिणामः सोमो राजा 


संभवति । यथर््वेदादिपुष्परसा 
ऋछगादिमधुकरोपनीतास्त आदि- 
त्ये यञ्चआआदिकायं रोहितादि- 


[ हवन करते है ] । भग्निदोत्रक 
आहुतिर्योकी परिणामावस्थारूप सुक्ष्म 
जल श्रद्धारूपसे भावित होनेके 
कारण श्रद्धा कहा जाता दे। 
[ यहाँ श्रद्धाः शब्दसे जर्का 
उल्टेल इसटिये किया गया है ] 
क्योकि पाँचर्वी! आहुति देनेपर 
जल पुरुषः शब्दवाची हो जाता 
ह" इस प्ररनम जल होम्द्र्यरूपसे 
सुना गया था । इसके सिवा यह 
परसिद्ध भीर किश्रद्धा दही जलह 
तथा श्रद्धासे आरम्भ करके दी रोग 
सामम्री जुयकर क्म करते दै" । उस 
जलरूपा श्रद्धाका वे हवन करते है। 

उस आहुतिसे राजा सोम होता 
है अर्थात्‌ श्रद्धा शब्दवाच्य जल- 
का चुरोकरूप अग्निम हवन किय 
जानेषर उसका परिणामरूप वी्ि- 
मान्‌ चन्द्रमा होता है । जिस प्रकार 
(अ० ३खं० १) यह कडा . 
गया है कि “चछग्वेदादि पूष्पके रस 
च्छगादि मधुकरोंदरारा छे जाये जानेपर 
मादित्यमे निस प्रकार रोहितादिरूप 


४८६ 


छान्दोग्योपनिषत्‌ 


[ मण्वाव ५ 


१ 9 94 9 9 = क 9 3 0 9 क 5 2 


रूपरुक्षणमारभन्त इत्युक्तं तथेमा | यश मादि कायं आरम्म करते है, 


अग्निरोत्राहुतिश्षमवायिन्यः 
पक्माः श्रद्धाश्ब्दवाच्या आपो 
यलोकमनुप्रविश्य चान्द्रं कारय 

मारभन्ते फलरूपमगप्निदोत्राहुत्योः। 
यजमानाश्च तत्कर आहुति- 
मया आहुतिभावनाभाविता 
आहुतिरूपेण कमंणाृष्टाः भरद्धा- 
प्समवायिनो द्लोकमलुग्र विश्य 
सोमभूता भवन्ति । तदथं हि 
तेरग्निहोत्रं हुतम्‌ । अत्र तराहुति- 
परिणाम एव पृश्चाग्निसंबन्ध- 
क्रमेण प्राधान्येन विवक्षित उपा- 
सनाथं न यजमानानां गतिः । 
तां त्वविदुषां पूमादिक्रमेणोत्तस्र 
वक्ष्यति विदुषां चोत्तरां विद्या- 
कृताम्‌ ॥ २ ॥ 


उसी प्रकार अग्निहोत्रकी आहुति 
सम्बद्ध ये ्रद्धा' शब्दवाच्य सुषक्ष 
जल यलोक प्रवेश कर अग्िहोत्रकी 
आाहुतिर्योका फर्प चन्द्रमासम्बन्धी 
कार्यं भारम्भ करते हे । 

तथा उस हवनके करनेवाले 
यजमान आहुतिमय-जहुतिकी 
मावनासे भावित आहुतिरूप फमेसे 
आकर्षित हो श्रदधारूप जरसे पूणं 
दो दयरोकमे प्रवेश कर चन्दरमार्प 
हो जाते दै, क्योकि उसीके लिथि 
उन्होने अग्निहोत्र किया था; रितु 
यहाँ तो उपासनाके खिये प्रधानतया 
पाँच अग्नियोकि सम्बन्धसे आहुतियो- 
का परिणाम दही बतरना अभीष्ट 
हे, यजमार्नोकी गति नही; उसका 
तो श्रुति आगे चलकर धूमादिक्रमसे 
अविद्वरनोकी गतिका तथा विघयासे 
प्रात होनेवारी विद्वारनोकी उत्तर- 
मागीय गतिका वणेन करेगी ॥२॥ 


=-=; 9 °= 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि 


पञ्चमाध्याये 


चतुथसण्डमाष्यं सम्पण म्‌ ॥ ४ ॥ 


=: 9 <= ~ 


कञ्चः खण्ड 


~+ 


पर्जन्यह्पा अग्निविद्या 


द्ितीयह्यमपर्यायार्थमाद-- । ` रति व्विीय होमके पया 
| याथका वणन करती है-- 


पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो 
बिदुदचिरशनिरद्गाा हादनयो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ 


हे गौतम ! पर्वन्य ही म्न है; उसका वायु ही समिष्‌ है, बादर 

धूम दै, विचत्‌ जवास दै, वज्र अङ्गार हे तथा ग्न विसपुरिङ्ग है ॥१॥ 
पर्लन्यो वाव पर्जन्य एव | हे गौतम । भर्मन्यो वाप्य 
न ही अनि द बृष्टके जो साषन हं 
गौतमाग्निः पन्यो नाम बृष्टयु | उनके अभिमानी देवताविरोषका 
पकरणाभिमानी देवतानिरषः । | नाम शनन दै । उसका वयु ही 
तस्य वायुरेव समित्‌ । समिष्‌ दै, क्योकि पञन्यरूप अग्नि 
८ ९ वायुसे दी प्रदीप होता है, लसा कि 
९ पञजन्योऽग्नः पूवींय वायु आदिक प्रवर्त होनेषर 
समिष्यते, पुरोबातादिप्राषन्ये १ होती देखी सिद्ध होता 
धिद््न । धमका कायं होने तथा धूमवत्‌ 
वृषटद्दीना । अभ्र भूमो धमः | देखा जानिके कारण बद्र ` षू 
का्तवाद्‌धूमवच्च र ्यमाणत्वा हे । भरकारामे समानता होनेके 
कारण विद्युत्‌ ( बिजली ) ज्वाख 
3 „ | दै) कठिनताके कारण अथा 
नयात्‌ । भनिरङ्गाराः, काटि | दुतसे सत्बन्ध रसनेके कारण 
न्याद्वि्युत्म्बन्धादवा । हादनयो । वज जञा है । दादनय विस्मुरिङग 





त्‌ । विद्युदचिः, प्रकाश्सामा- 


४८८ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्या ५ 
> 4 2. ॐ 9 4 य क क थ >~ > 9 >> 
विस्फुलिङ्गाः, हादनयो गजित- | है; मेषोकी गजंनाके शब्दको 
द्ादनिः कहते ठै; विप्रदीर्णव 
(इधर-उधर फे रहने) मे समानता 
मान्यात्‌ ॥ १ ॥ होनेके कारण वे विस्फुरिष्ग है ॥१॥ 


तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नो देवाः सोमश्राजानं लुहति 
तस्या आहूते्वषेश्संभवति ॥ २ ॥ 


[क = ¢ 
शब्दा मेधानां विप्रकीणंत्सा- 


उस अग्ने देवगण राजा सोमका हवन करते है; उस आहुति 
वर्षा होती है ॥ २॥ 
तस्मिन्नेतर्मिन्नग्नौ देवा; | उस इस अगिन देवगण पूववत्‌ 
1 १) [वे न 
ूषैवत्सोमं राजानं जहति । तस्या राना सोमका हवन करते दै । उप 
आहुतेवेषं संमवति । श्रद्धाख्या ४ पा 1 | क 
¢“ 4 61 य प 
आपः सोमाकारपरिणता द्वितीये | पच्छ अपि 9८ £ 
स „ | सोमके भकारं परिणत हो पज- 
पर्याये पजन्याग्नि प्राप्य वृष्टि न्यागनको प्रात होकर वृष्टिरूप 
त्वेन परिणमन्ते ॥ २॥ परिणत दो जते है ॥ २॥ 


~जकक~-- 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 
पज्च मखण्डमाभ्यं सम्पणम्‌ ॥ ५ ॥ 


(ल 


क्र खस 





पृधिवीरूप अग्निविद्या 
प्रथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्या; सांवत्सर एव 


समिदाकाशो धूमो रा्रिरचिदिशोऽद्गारा अवान्तर 


दिश्चो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ 


हे नौतम ! प्रथिवी ही अग्नि दै । उसका संवसर ही समिध दै, 
अ ४ 
आक्थ धूम दै, राति ज्वारा दै, दिशां अङ्गार दै तथा अवान्तर 


दिशाँ विष्ुरिङ्ग दै ॥ १ ॥ 
पृथिवी वाव गौतमाधिरि- 
त्यादि पूववत्‌ । तस्याः पएथि- 
व्याख्यस्याग्नेः संवत्सर एव 
समित्‌; संवत्सरेण हि कालेन 
समिद्धा पृथिवी ब्रीद्यादिनिष्प- 
त्ये भवति । आकाशो धूमः, 
पृथिन्या इवोत्थित आकाशो 
दृश्यते; यथाग्नेधंमः । रात्रि- 
रिः, परथिव्या हयप्रकाशात्मि- 
काया अनुरूपा रात्रिः; तमो- 
रूपत्वात्‌, अग्नेरिवानुरूपमचिः। 


टे गोतम | प्रथिवी ही अग्निद" 
इत्यादि पूर्ववत्‌ समञ्चना चाहिये । 
उस प्रथिवीसंज्ञक अग्निका संवत्सर 
ही समिध्‌ है,. क्योकि संवससररूप 
कार्ते समिद्ध॒होकर अर्थात्‌ पुष्ट 
लाम करके ही पृथिवी धान्यादिकिी 
निष्यत्तिमे समं होती हे । माका 
धूम दै,कर्योकिं भाक एथिवीसे उठा 
हुआ-सा दिखायी देता ह,निस प्रकार 
कि जग्निसे धुँ उठता दिखायी देता 
हे। रात्रि ज्वाला हे; अप्रकाशासिका 
पृथिवीके अनुप ही रात्रि ज्वाख 
है, क्योकि -वह तमोरूपा दै; 
अतः [ परथिवीरूप ] अग्निक समान 
यह्‌ उसके अनुरूप ज्वाल हे । 





४९० छान्दोभ्योषनिषद्‌ 


> भ 
दिशोऽङ्गारा, उपशान्त्वसा- | उपशान्तिमे समानता होनेके कारण 
मान्यात्‌ । अवान्तरदिशो | दिशँ मङ्गरे है तथा श्ुद्रवमे समा- 
विस्फुलिङ्ाः, क्षद्रत्वसामा- । नता होनेके कारण अवान्तर-दिशाे 
न्यात्‌ ॥ १ ॥ | कोण) विलिङ्ग है ॥ १॥ 


` [ अष्याय ५ 





तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नो देवा व्ष॑जुहति तस्या 
आहुतेरन्न संभवति ॥ २ ॥ 


उस इस अग्निम देवगण वर्षका हवन करते दै; उस आहुतिसे 
सन्न होता हे ॥ २॥ 


तस्मिन्नित्यादि समान्‌ । ¦ तप्मिननेतस्मिन्‌ इत्यादि शरुतकि 
तस्या आहुतेरन्नं व्रीहियवादि । अर्थं पूर्वत्‌ है । उस आहुतिसे ब्रहि 
संभवति ॥ २ ॥ | यवादिरूप भन्न होता हे ॥२॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाण्याये 
षष्ठख्ण्डभाष्यं सम्पूणंम्‌ ॥ ६ ॥ 





ख्य 


सखण्ड 


~~ ०० {- 


पुरुषरूपा अग्निकिदा 
पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समिसपराणो 
धूमो जिह्वाचिशचक्षुरङ्काराः त्रं विस्फुलिङ्गाः ॥ ९ ॥ 


हे गोतम | पुरुष ही अमि है । उसकी वाक्‌ ही समिध्‌ दे, भाण 
धूम दै, निहा ज्वास दै, च्च अङ्घारि जोर श्रोत्र विस्फुरिङन है ॥१॥ 


पुरूषो बाव गौतमाः । | 
तस्य वागेव समित्‌, वाचा 
हि खेन समिध्यते पुरुषो 
न मूकः । प्राणो भूमः, भूम 
इव यखानिगंमनात्‌ । निहा- 
चिम हितत्वात्‌ । चशुरङ्गाराः, 
मास आश्रयत्वात्‌ । भोर 
विस्फुरिङ्गाः, विप्रकीणेव- 


साम्यात्‌ ॥ १ ॥ 


हे गौतम । पुरुष दी अनि है । 
उसकी वाक ही समिध दै, वर्योकि 
वाणीरूप मुखके द्वारा ही पूरुष 
घुशलोमित होता दै, मूक परुष 
श्ञोमित नहीं होता । भाण धूम है, 
क्योकि वह॒ धूमके समान मुखसे 
निकरुता है; काल होनेके कारण 
जिहा उ्वाटा दै; प्रकारका आश्रय 
होनेके कारण नेत्र जङ्गारे है तथा 
विपरकीर्णलमे समानता होनेसे 
श्रोत्र विसफुरिङ्ग है ॥ १ ॥ 


"न्नी 


तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नो 
आहुते रेतः संभवति ॥ २ 


देवा अन्नं जुह्वति तस्या 
॥ 


४९२ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय ५ 


उस इस अग्ने देवगण जन्नका होम करते दँ । उस गहुतिसे 
वीयं उन्न होता है ॥ २ ॥ 


समानमन्यत्‌ । अन्नं जुह्वति ¦ रेष अर्थं पूर्ववत्‌ है । देवगणः 
इसमे ब्रहि आदिसे सम्यक्‌ प्रकारे 
्रद्यादिसंस्कृतम्‌ । तस्या | तैयार किये हुए अन्नका हवन कते 


| है । उस अआहुतिसे वीयं उस्न 
आहुते रेतः संभवति ॥ २॥ | होता हे ॥ २॥ 


--- श व्वन्~9- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 
सत्तमख्ण्डमाष्यं सम्प्णंम्‌ ॥ ७ ॥ 





~ ----~- नकम 


षमः शण्ड 


५ ` 
$ 9 > 


स्त्रीरूपा अग्निविद्या 


योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समि- 
दयदुपमन्त्रयते स ॒पभ्रूमो योनिरचियदन्तः करोति 
तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः ॥ १९ ॥ 


हे गौतम | की ही अग्नि दै । उसका उपस्थ दही समि है, 
पुरुष जो उपमन्त्रण करता दै वह धूम है, योनि ज्वाला है तथा जो 
भीतरकी जर करवा है वह अङ्गारे है नौर उससे नो घुल होता है 
वह विस्पुरिङ्ग दै ॥ १॥ 
योषा वाव गौतमाभिः || दे गौतम | खी दी अम्नि है । 
तस्या उपस्थ एव समित्‌, उपस्थ ध ह 
उससे वह पुत्रादि उसत्न करनेके 
वेल षा ॥ स्थि समिद्ध होती है । पर नो 
समिध्यते । यदुपमन््रयते स | उपमन्त्रण करता है वह धूम दै, 
धूमः, स्रीसंभवादपमन्त्र- | क्योकि उपमन्त्रणङ़ी भृति सीसे 
णस्य । योनिरिलोित- | दी होती दै। ० दोन 
~ कारण योनि वाखा है तथा जो 
तवतू स करोति ९८ भीतरकी ओर करता है वह अग्निके 
इङ्गारा अभ्िसंबन्धात्‌ । अमिन- | सबन्धके कारण अङ्गरि है ओर 
न्दाः सुखलबा विस्पुणिङ्गाः | अमिनन्द--सुखके कणमात्र क्षुद्र 
खुद्रत्वात्‌ ॥ १ ॥ होनेके कारण विस्पुलिङ्ग दै ॥ १॥ 


---१ > ८: 


४९७ 


छान्दोभ्योपनिवष्‌ 


[ बभ्याव ५ 


9८ 8८ >< < &८ 8 8 9८ 2: >9; ¬ 8 9 ¬ ¬< -ढः ¬< 8: 26 6 9-96-8 ॐव 


तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ 


देवा रेतो जुति तस्या 


आहूतेगेभः संभवति ॥ २ ॥ 


उस इस ग्नम देवगण वीर्य॑कञा हवन करते है, उस भाहुतिते 


गम उत्पन्न होता है ॥ २ ॥ 
रसननेतस्मसपौ देवा रेतो 
जुह्वति, तस्या आहुतेगभैः 
संभवतीति; एवं श्रद्धासोमवषा- 
नरेतोदवनपर्यायक्रमेणाप एव 
गर्भीभूतास्ताः । तत्रापामाहु- 
तिसमवायित्वासप्राधान्यविवक्षाः 
आपः पञ्चम्यामाहुतौ पुरुषवच- 
सो भवन्तीति। न त्वाप एव 
केवलाः सोमादिकायंमारमन्ते, 
न चापोऽत्रिइत्कृताः सन्तीति । 
त्रिवृत्छृतत्वेऽपि विशेषस्ञालामो 
ृ्टः पृथिवीयमिमा आपोऽयम्‌- 
तिरिव्यन्यतमादुन्यनिमि्ः। 


उस इस अग्निम देवगण वीर्थका 
हवन करते दै; उस आहुतिसे गमं 
उलन्न होता दै-इस प्रकार श्रद्वा 
सोम, वर्षा, अन्न जर रेतःरूप 
आहुति्योकि हवनके पर्यायक्रमसे वह्‌ 


जल दी गर्भरूपमे परिणत शेता १। 
उनम आहुति्ोसे सम्बद्ध होनेके 
कारण श्रुतिको जलो ही प्रधानता 
बतलानी अभीष्ट दै, इसीसे उसने 
क्दा है कि पांचवी आहुति जल 
पुरुषवाची हो जाता है । केक्ल 
जरु ही सोमादि काय भारम्म 
कर देते हों--यह बात नही दै, 
ओर न ज्ञङ भत्रिवृ्करृत ( प्रथिवौ, 
जरु ओर तेज इन तीनोके सम्मिश्रणसे 
रदित ) ह- सी ही बात ६ै। 
त्रिवृत होनेपर भी एक-एक मूती 
बहुर्ताके कारण छनमेसे प्रत्येको 
"यह थिवी है, यह जर दै,यह भग्न 
हः इस भकार मिन्न-मिन्न नाम प्रा 
होता देखा अता है । भवः जल्दी 


वषड ८ ] 


छाङूरभाष्वाथं 


४९५ 


तस्मात्सम्रदितान्येव भूतान्य- 
व्बाहुन्यात्कर्मसमवायीनि सो- 
मादिकायरिम्भकाण्याप इत्यु- 
च्यन्ते । दश्यते च द्रववाहुन्यं 
सोमव्ष्टथनरेतोदेदेषु । बहदरं 
च शरीरं यद्यपि पार्थिवम्‌ । तत्र 
पश्चम्यामाहुतौ हतायां रेगे- 
रूपा आपो ग्भीभूताः ॥ २॥ 


बहुरुता होनेके कारण कर्मे 
सम्मिक्ति हुए समी मूत सोमादि- 
कायै आरम्भ करनेवाले "जल' कटे 
जाते है । इसके सिवा सोम, वषट, 
अन्न, वीर्य ओर देम प्रवत्वकी 
बहुरुता भी देखी ही जाती है । 
शरीर यद्यपि पार्थिव होता है, तो 
भी उस्म द्रवकी अधिकता होती 
है । उनमें पोचवीं भाहुतिके हुत 
होनेपर वी्य॑रूप जक ग॑म परिणत 
हो जाता है [अर्थात्‌ पुरुष ब्द . 
वाची हो जाता है ]॥ २॥ 


क्क 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमान्यायेऽ- 


षमखरण्डभाष्यं खमस्पूणम्‌ ॥ ८ ॥ 


(न -~- 


नक्क स्कल 


पञ्चम आहूतिमे पृरषत्वको प्राप्त हए जलकी गति 


इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भव 

न्तीति स उल्वाटृतो गर्भो दद्य वा नव वा मासा- 
नन्तः शयिखा यावद्वाथ जायते ॥ १ ॥ 

इस भकार पांचवौं आहूतिके दिये जानेपर भाप 'ुरष' शब्दवाची 

हो जाते है । वह जरायुसे वृत हुमा ग्भ दस या नौ महीने अथवा 


जवतक़ [ पूर्णज्ग नहीं॑होता तवतकं माताक कुक्षिके ] भीतर ही यन 
करनेके अनन्तर फिर उत्वन्न होता है ॥ १ ॥ 


इति त्वेवं तु पञ्चम्यामाहुता- 
वापः पुरुषवचसो भवन्तीति 
व्याख्यात एकः प्रभः यत्तु 
दरूलोकादिमां रत्याडृत्तयोराहु- 
त्योः पृथिवीं पुरुषं सिय कमे 
णाविश्य लोकं प्रत्युत्थायी 
भवतीति वाजसनेयक उक्तं 


ततप्रासङ्गिकमिदोच्यते । इह च । भी 


प्रथमे प्र उक्तम्‌ वेत्थ यदि- 


तोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति १ 
त॒स्य चायञुपक्रमः । 


इस प्रकार पांचवीं आहुतिं 
जर पुरुषवाची हो जता है--इस 
एक प्रभ्नकी व्याख्या हुदै । तथा 
वाजसनेय-्रुतिमे जो दुरोकते 
परथवीको जोर भायी हुदै दो 
आहुतिर्योके विषयमे यह कहा गया 
है किवे क्रमशः परथिवी, पुरुष भीर 


सीमे प्रवे कुर परङोकके प्रति 


त्थान करनेवारी होती दै, उघका 
मसङ्गवद्य यहाँ वणेन कर दिया 
जाता है । यहां जो पहले परमे 
छृहा गया है किं “क्या तुम जानते 
हो डि यह्‌ भरना [मरनेके भनतर्‌] 
यहोसे कदां जाती है ? उका 
यह्‌ उपक्रम्‌ है । 


खण्ड ९, | 


शाङ्करभाष्याथं ४९७ 


क 4 क स 9 9 क == ॐ = = ॐ = > = 5 = ॐ 3 


स गर्भेऽपां पश्चमः परिणाम- 


आहुतिकरम॑से सम्बद्ध श्रद्धा" 


^ ~ ४ यिनीन + 
विशेष आहुतिकमंसमवायिनीनां | शब्दवाच्य र्का पञ्चम परिणाम- 


श्रद्धाशञब्दवाच्यानारल्वावृत 
उन्वेन जरायुणाव्रतो वेष्टितो दश्च 
वा नव वा मासानन्तर्मातुः 
कुक्षौ शयित्वा यावद्रा यावता 
कालेन न्यूनेनातिरिक्तेन वाथा- 
नन्तरं जायते । 


उल्वराघरत इत्यादि वैराग्य- 
हेतोरिदमुच्यते । कष्टं हि मातुः 
क्षो मूत्रपुरीपवातपिततशषेभ्मा- 
दिपू्णं तदनुङिक्स्य गर्भस्यो- 
ल्व्रालुचिपटाधरश्य लोदितरेतो- 
ऽशुचिवीजस्य मातुरशितपीतः 
रसालुप्रवेशेन  विवध॑मानस्य 
निरुदरशक्तिवलवीय॑तेजः प्रज्ञा 
चेष्टस्य शयनम्‌। ततो योनिढा- 
रेण पीढ्यमानस्य कष्टतरा निःच- 
ति्जन्मेति वैराग्यं ग्राहयति । 


मुहूतं मप्यसद्यं दश वा नवा 


विदोष वह गभं उद्वावृत--उर्व 
अर्थात्‌ नरायुसंज्ञक गर्वेष्टन चमसे 
घवृत-वेष्टिति हुआ दश यानौ 
मासतक सथवा जितने भी न्यू 
या अधिक समयमे पूरणा्ग हो, माता- 
की कुक्षि शयन करनेके अनन्तर 
फिर उत्पन्न होता है । 


उ्बरावरृत इत्यादि यह सब कथन 
वैराग्यके छ्य है । उस्वहूप अपवित्र 
वसे छिपटे हुए, रज ओर वीयंरूप 
अपवित्र बीनवाटे, माताके खाये-पीये 
पदार्थोकि रक्षके प्रवेशसे बढ़नेवाटे 
तथा निसके शक्ति, बर, वीयं,तेन, 
बुद्धि ओर ॒वेष्टा-ये सब निरुद्ध 
८ घविकसित ) रहते है उस गभका 
मताक्षी मल-मूत्र-वात.पिति एवं 
कृफादिसे भरी हुई कुकषिमं शयन 
करना कष्टमय ही है । उससे भी 
अधिक कष्टभदं योनिद्वारसे पीडित 
हुए गर्भका बाहर निकलनाखूप जन्म 
है; इस प्रकार श्रुति वेराग्यक्र ्रहण 
कराती है । इ्षके धिवा जो एक 
ुहूरचके स्मि भी भ्य है उख 
मातृकु्षिमे दश या नौ मासक 


९.८ छाग्दोम्योपनिषलू [ मश्याख्‌ घ 


~ > ल ल > ८ 1 9 ट ऋ १ = 


मासानतिदीधकारमन्तः शयि- | दीधकारपयन्त शयन करनेके 
| अनन्तर [ जन्म लेना भी वेराग्यकषा 
तवेठि च ॥ १॥ दीदेवष्ै]॥१॥ 


भ © य 


स जातो यावदायुषं जीवति तं षेतं दिष्टमितो 

ऽ्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति ॥२॥ 
इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुपय॑न्त जीवित रहता  । फर 
मरनेपर कमव पररोकको प्रस्थित हुए उद्व जीवको अग्निके परति दी 
ठे जाते है, जहांसे कि वह आया था जौर जिञ्से उसन्न हुभा था ॥२॥ 


स एवं जातो यावदायुषं पुनः 


पुनधेटीयन्त्रवद्रमनागमनाय 


ब्नडुरालचक्रवद्ा तियग्भरम- 
णाय याबत्कमंणोपात्तमायुस्वाब 
जीवति । तमेनं क्षीणायुषं प्रेतं 
सृतं दिष्टं कमेणा निर्दिष्टं पर- 
लोकं भ्रति यदि चेजीवन्धेदिके 
कमणि जाने वाधिकृतस्तमेनं 
गृतमितोऽस्माद्‌ ग्रामाद्रयेऽन्य- 


थमृतिजो हरन्ति पुत्रा वान्त्य- 


इसन प्रकार उत्पन्न इभा वह 
जवतक भयु होती है षटीयन््रके 

समान पुनः-पुनः भावागमनके ल्मि 
अथवा कुार्चक्रके समान चातो 
ओर चक्कर काटनेके स्थि कम॑ 
करता हुभा करमदवारा जितनी घायु 
प्राप्त की होती ह उतना जीवित 
रहता है। फिर जिसकी आयु क्षीण 
हो गयी है पसे इस प्रेत- भृत एवं 
दिष्ट कर्मद्ारा प्ररोकके प्रति 
निचुक्त किये हुए इस जीवको- 
क्योकि यदि वह॒ जीवित रहता तो 
कमं अथवा ज्ञानका अपिकारी होता 
अतः उस मरे इए प्राणीको य्हसि 
ष प्रामसे ऋलक्‌ अथवा 


1 


ण्ड ९ | शाङ्करमाष्वाथं ७२९ 


कर्मणे । यत एवेत आगतोऽनेः | पुत्रगण अन्ते कर्मके स्यि जन्न- 


सकासाच्छ दवायाहृतिक्रमेण, 0 ^ ४ 


यतश्च पश्चभ्योऽग्निभ्यः संभृत | ययँ भाया था तथा जिन पाच भम्नयोसे 


उत्पन्नो भवति, तस्मा एवाग्नये । च उत होता दै,उस भनिके प्रति 
ही वै ससे ठे जति है । तासयं यह है 


हरन्ति सा योनिमग्निमा- | [क उसे लपनी योनिभृत भग्िको 
पादयन्तीत्यथंः ॥ २॥ ही प्राप करा देते ई॥ २॥ 





दतिच्छान्दोश्योपनिषदि पञ्चमान्याये 
नवमलण्डमाष्यं सम्पणेम्‌ ॥ ९ ॥ 


1. = 

८२ 6 €= <> 94 
~> ^ 1 + 

(4 4 6०> 





दमः खण 

प्रथम व्ररनक्रा उत्तर 
वेत्थ यदितोऽधि प्रजा प्रय- अव, क्यातू जानता दैक 
इस रोकसे परे प्रना कहाँ नती 


ध हे प्सा यह प्रश्च निराकाणके 
कतन्यतया । स्यि प्रस्तुत किया जता । 


तद्य इथं विदुः । ये चे मेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते 
तेऽचिषमभिसंभवन्त्य्विषोऽहरह आपूर्यमाणपक्षमा्ः 
्यमाणपक्ायान्षदुदङ्ेति मासारस्तान्‌ ॥ १॥ ` 
मासेभ्यः संवत्सर< संवस्सरादादित्यमादिव्याचन्द्रमसं ` 


चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स॒ एनान्बह्म । 
गमयत्येष देवयानः पन्या इति ॥ २ ॥ 


न्तीत्ययं प्रधः प्रसयुपर्थतोऽपा- 


वेजोकि इ पकार जानते है तथा वे जोकि वमे श्रद्वा भै 
तप इनकी उपासना करते दै [ प्राणप्रयाणके अननत ] अर्चिके अमि | 
मिमानी देवताभोंको मात होते हे, अर्थिक अभिमानी देवताति विव" 
मानी देवताओंको; दिवसाभिमानियेसि श्कप्षाभिमानी देवताभोको; श 
पकषाभिमानिोसे निन छः महीने सूये उत्तरकी ओर जाता दै, उन 8 
त ॥ १ ॥ उन महीनेसि संबसखरको, संबःसरसे आदिक) 
मनो ( विुत्को पराप्त होते है । वरी 


रह्म ( का्ंत्रह देता दै। 
यहं देवयानमागं है ॥ २ ॥ ) को प्राप्त करादे 


खाण्ड १०] , शाह्रमाच्यार्थ ५०१ 


० क = = क. = व 3 5 7 7 4 क 9 5 = न 


| इस रोकके प्रति उत्थित 
इए अधिकारी गृहरस्थमं जो इस 
प्रकार यानी उपयुक्त पश्चामिविद्या- 
कोजानते है अर्थात्‌ जोरेसा 
समते रै कि युरोकादि भग्न्योसे 
करम्चः उरनन हुए हमरोग जग्निस्व- 
खूप यानी पञ्चाम्निमिय दै [वे 
अर्चिके अभिमानी देवतार्जोको प्रप्त 
होते है ]। 

शङ्ा-'इत्थं विदुः, इश [सामान्य 
निर्देश ] से यह कैसे जाना गया 
कि यहाँ गृदरस्थोके विषयमे ही का 
गया है, जैौरोके स्यि नदीं £ 
समाधान-गृदस्थमिं जो एेसा 
जाननेवाठे नहीं रै, बल्कि केवल 
इष्टापू्ंएवं दत्त करममिं दी कगे 
रहते है वे धूमादिके द्वारा चन्दरमा- 
को ही प्राप्त होते है रेसा श्रुति 
अगे कदेगी; तथा जो “अरण्य! पद्‌- 
से उपरक्षित वानप्रस्थ एवं संन्यासी 
श्रद्धा ओर तपः इनकी उपासना 
क्रते है उनका तो इस प्रकार 
 जाननेवारेकि साथ गमन रना 
श्रुति जागे फटेगी; भतः परिरोषसे 
ओर अम्नहोत्रकी आहुतिर्योका सम्बन्ध 
कारण भी “इत्थं विदुःःइस कथन- 
से गृहस्थश्च दी अहण होवा है । 


तत्तत्र रोकं प्रसयुत्थितानाम- 
गदस्थेषु विड्‌- धिदरतानां गृहः 
षामुत्तरमागः मेधिनां य इत्थ- 
कर्भिणां च दक्षिण-मेवं यथोक्तं 
मा इति स्थापनम्‌ पश्चाग्निदशेनं 
युलोका्ग्निभ्यो वयं क्रमेण 
जाता अग्निस्वरूपाः पश्चा- 
गन्यात्मान इत्येवं विदु- 
जानीयुः । 


कथमवगम्यत इत्थं विदु- 
रिति गृहस्था एवोच्यन्ते नान्य 


इति १ 
गरस्थानां ये त्वनित्थंविदः 


केवरेष्टापूर्तदत्तपरासते धूमादिना 
चन्द्रं गच्छन्तीति क्षयति । ये 
चारण्योपलक्षिता वैखानसाः 





























परिव्राजकाश्च श्रद्धा तप इत्यु- 
पासते तेषां वेत्थंविद्धिः सदा- 
चिरादिना गमनं वक्ष्यति 
पारिरोष्यादग्नदोत्राहुतिसंबन्धाच 
गृहस्था एव गृह्यन्त इत्थं विदु- 
रिति । 





५०२ छान्डोम्योचमिवतू [ मभ्याय ५ 


>< 4-48-8 ~ > 8 त 9-60-9 9 
ननु बह्मचारिणोऽप्यगृददीता | शङ्का-जिनक्ा प्रामभरुति बौर 


्रमश्रत्यारण्यश्र्या चालुप- | अरण्यश्ूति दनद भ्रण न्ह 


= , ~ | होतावे बरक्षचारी लोग भी णेह 
छक्षिता विद्यन्ते कथं पारिशेष्य- बति द, भिर क 


सिद्धिः । सिद्धि कैसे हो सकती दै ! 

नेष दोषः, पुराणस्यृति- | समाधान-यह कोई दोषनक् है 
्रामाण्यादू््वरेतसां नेष्ठिकबरह्म- | पुराण ौर स्तियोसे उर्वरत 
चारिणाघुत्तरेणार्यम्नः पन्थाः | नेक क्षवारि्ोका परयसम्ब्ध 
रसिद्धः। अवस्तेऽप्यरण्यबासि- | उतर मागं प्रिद दै, भतः १ 


मिः सह गमिष्यन्ति । उपरवा रण्यवापियोके साथ ही नायेगे | 
5 तथा उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी तो 
णकास्तु स्वाध्यायग्रहणाथा दत स्वाध्यायगरहणके लि होते है जत; 


न विशेषनिर्देशः । वे विरोष निर्देशके योग्य नहीं है। 
ननृष्वेरेतस्त्वं बेदुत्तरमागं- शङ्का-यदि पुराण जीर स्तौ 
प्रतिपत्तिकारणं पुराणस्पृति- | प्रमाणतासे उत्तरायणकी प्रका 
रामाण्यादिष्यत इत्थं वित्वम- | कारण उर्वरा होना माना न 
न्थकं प्रापम्‌ । १. 
९ १ विघाका ज्ञान व्यथ सिद्ध होता है? 
न; गहस्थान््रत्यथवत्वात्‌ ।, समाधान-पेद्ी बा नहीं है, 
अनिरथविदसत वयोफि गृहस्थोके लिथि वह सार्थक 
ये गृहस्था ट ट| नो गृहस्य देता जाननेवरि 
स्वमाषतो दिणो धूमादिः | नी दै उनके स्थि स्वभाव 
४ धूमादि दक्षिण-माग॒॑प्रसिद्ध 
पन्था, प्रसिदधस्तेषां य॒ इत्थं | तु उनमे जो सा जाननेवालि द 


त अथवा जो इनसे भिन्न सगुणतरहमके 
विदु सगुण वान्यदूरह्मविदुः, ८4 उपासक ह वे (ख° | १५ | ५ 


शाडर्माण्योख 


~< 9८८ 9-3८-9 3-3-99 999 


यहु चैवास्मिञ्छव्यं इरवन्ति | के ) “इस ( सगुण जहोपाघक ) 


के रिि प्रेतक्षम करं मथवा न करं 


यदि च नाचिषमेवः' इति | वह अर्चिरादि मामको ही प्राप्त होता 


लिङ्गादुत्तरेण ते गच्छन्ति । 
ननूष्वरेतसां गृहस्थानां च 
समान आश्रमित्वे उभ्वैरेतसामे- 


है” इस श्ुतिरूप लिङ्गके नुसरार 
उत्तर मा्गसे ही जते है । 
शङ्ला-उध्वं रेता घौर गृहस्थ-- 
ये दोना आश्रमी होने समान ही 
३ । भतः उनमें केवर ऊध्वं रेता्णो- 


वोत्तरेण पथा गमनं न गृहस्था- | आ ही उत्तरायणमामंसे गमन होता 


है, गृहस्थोका भग्नोतरादि वेदिक 


नामिति न युक्तमग्निहोत्रादि- | कर्मोकी बहुरूता होनेपर भी नी 


वैदिककर्मबाह्ये च सति । 
नैष दोषः, अपूता हि ते। 


होता--यह ठीक नही है । 


समाधान-यह कोई दोष नहीं 
वरयोकि वे पित्र होते है । 


५ शतरुमित्रसंयोग ४ 
` न नि शत्रु जोर मित्रक संयोग ॒रहनेके 
कसां च उत्तर- मित्तं हि तेषां राग- | कारण उनम राग-दवेष रहते दै तया 


माग एव देषो तथा धर्माधर्मौं 
दिसानुग्रदनिमिननो । 


हिसा जोर कृपाके कारण पर्माधमं 
भी रहते ही है । उनके स्यि दिसा, 


हि- | अदत, कपट शौर भत्रहचयं आदि 


बहुतसे अशद्धके कारण अनिवायं 


सानृतमाया्रह्चर्यादि च बह्- | दी दै; इसख्यि वे अपवित्र 


शुद्धिकारणमपरिदहायं तेषाम्‌ , 


अतोऽपूताः । अपूतत्वाभोत्तरेण | द 


दै । अपवित्र ८१ कारण 
उनका उत्तर मागंसे गमन नहीं 
घकता । क्रतु दूरे वान- 
प्रस्थादि हिसा, अनृत, माया ओर 


पधा गमनम्‌ । हिंसानृतमाया- | जग्रह्मचय॑का त्याग कर देनेके कारण 
जह्मचर्यादिषरिदाराच बुद्धातमा-। शुचि हो नते अल 





५५०७ 


छब्दोन्योवनिषल्‌ 


>< 8८ ~ 9८9८ 8-9८-5८ 9-8८-8 27 5 5.4 


[ मष्याय ५ 
"ऋऋऋ अ 


नो हीतरे शनरुमितररगदवेषादि- | मत्रसप्बन्धी भाव भौर रगे 


परिदाराच्च विरजसस्तेषां युक्त 


उत्तरः पन्थाः | 
तथा च पौराणिकाः “ये 
प्रजामीषिरेऽधीरास्ते इमवा- 


नानि भेजिरे । ये प्रजां नेषिरे 
धीरास्तेऽसरतत्वं्॑ि भेजिरे” 
इत्याहुः । 

इत्थंविदां गृहस्थानामरण्य- 
वासिनां च समानमार्गतवऽम्रत- 
त्वफरे च सत्यरण्यवासिनां 


विधानथंक्य प्राप्तम्‌ । वथा च | 
भ्रुतिविरोधः “न तत्र दक्षिणा | 


यन्ति नाविदवंसस्तपस्विनः'” 
इति “स॒ एनमविदितो न 
नक्त” इति च बिरुदम्‌ । 
न्‌; आभूतसप्लवस्थान- 
स्यागृतत्वेन विवक्षित- 
त्वात्‌ । त्रवोक्तं पोरा 
णिकरः--“आभूसंप्टव स्थान- 


त्याग कर देनेसे वे मल्हीन हो 
जाते हैः घतः उनके लियि उत्त 
मागे ठीक दही है। 
तथा पौराणिक लोग भी रेसा 
कहते है कि “जिन मन्दमति पु 
ने संतानकी इच्छा की वे इमशान- 
को ही प्राप्त हुए, श्रितु जिन 
बुद्धिमानोनि संतानकी इच्छा नहीं 
की वे अमरत्वको ही प्रप्त इए" । 
शाङ्का-इस प्रकार जाननेवले 
गृहस्थ ओर वनवाियोको समान- 
मागं ओर अमूृतत्वरूप फल प्रप 
होनेपर तो वनवासियोके जानकी 
व्यथेता सिद्ध होती है भर रेषा 
होनेसे “वँ दक्षिणमागीं शौर 
अज्ञानी तपस्वी नहीं जाते" इत 
श्रुतिसे विरोष आता है तथा “अपना 
ज्ञान न होनेपर वह ८ परमातमा ) 
इस जीवका [ मोक्षदानदवारा | 
पारन नही करता” यह कथन भी 
विपरीत हो नाता है । 
समाधान-नही, क्योकि यहां 
अम्रतत्वसे मू्तोके प्रल्यपर्यन्त रहना 
ही अमिप्रेत दै । इसी सम्बन्ध 


पौराणिकषोने कहा है कि “भूतोके 
परस्यपय॑न्त रहना अमतत ही 


खण्ड १० | 


शाङ्ूरआष्याथं 


७०५ 


व 3 93 9 > 5 3 = 5 5 ॐ > 9 


ममृतत्वं हि भाष्यते" इति । 
यच्चात्यन्तिकममृतत्वम्‌ तद्‌- 
पक्षया “न तत्र दक्षिणा यन्ति"! 
“स एनमविदितो न युनक्ति" 
इत्याद्याः श्रुतयः, इत्यतो न 
विरोधः । 

“न च पुनरावतंन्ते'' इति 
“इमं मानवमावतं नावर्न्ते'' 
( छ० उ० ४ । १५।५) 
इत्यादिश्ुतिषिरोध इति चेत्‌ । 

न; इमं मानवम्‌" इति विशे- 


पणात्‌ "तेषामिह न पुनराड- 
। यदि 


हयकान्तेनैवनावर्तेरनिमं मान- 


तिरस्ति इति च 


वमिति च विरोषणमनथंकं 
स्यात्‌ । इममिरैत्याढृति- 
मात्रुच्यत इति चेत्‌, न; 
अनाव्रत्तिशब्देनैव नित्याना- 
ृ्यर्थस्य प्रतीतत्वादाङृतिक- 


ल्पनानथिका । अत इममिहेति 


कहता है ।» तु जो आलयन्तिक 
अमृतत्व है उसकी उपिक्षासे “वरहा 
दक्षिणमागीं नहीं नाते" “अपना ज्ञान 
न होनेपर वह ( परमासा ) इस 
जीवका (मेोक्षप्रदानद्रारा] पलन नहीं 
करता” इत्यादि श्ुतियां दै; अतः 
इससे कोई विरोध नहीं हे । 

शङ्ा--कितु [ एसा मान तो ] 
“वे फिर नदीं कोटते" “इस मानव 
आवतम फिर नहीं आते" इत्यादि 
्रतिसे विरोध अता हे । 


समाधान-पेसा कहना ठीक नहीं 
द; क्योकि ¢इमं मानवम्‌, एसा विरो- 
षण 2, तथा यह भी कहा गया 
किउनकी यँ पुनरावृत्ति नहीं होतीः। 
यदि उनकी सर्वथा पुनरावृत्ति न होती 
तो (हमं मानवम्‌ तथा ¶इदहः- ये 
विरोषण व्यर्थ हो जाते । यदि कटो 
कि (इमम्‌ जोर इह" इन शब्दस 
आङ्कतिमात्र बतकायी गयी है [ भर्थात्‌ 
किसी देश्यकारविदोषका नियम 
न करके उसके निय मोक्षका प्रति- 
पादन किया गया है ]- तो एसा 
कृहना ठीक नही); करयोकि नित्य अना- 
वृचतिरूप अर्थकी प्रतीति तो “भना- 
वक्तिः शब्दसे ही हो जाती दहै; अतः 
उसमे आङ्कतिकी कल्पना निरर्थक दी 








विरेषर्णोकी सा्थकताके यि उक्ष 
कल्पनीया । न्यत्र भादृति माननी चाहिये 


न च सदेकमेवादितीयम्‌' | इसके सिवा निनद पष् सुभव 
आस्मविदोऽन- इत्येवं प्रत्ययवतां | है फि "एकमात्र अद्वितीय सत्‌ ही ह 
्रन्तनि्पणम्‌ भधैन्यनाव्याचिः| उनका क्ीषस्यानीय नीद जिः 
रादिमारगेण गमनम्‌, शरद्य | रादि मार्गते गमन मी नही होता 
सन्त्रह्माप्येति'” ( ब्र ° इ० ४ । | जैसा कि “वह त्र ही होकर ऋक 
४। ६) । “(तस्मात्तत्सवमभवत्‌'!| परा होता है” “इससे यह सव कृ 
( ब० उ० १।४। १०) |, हो गया “उसके प्राण उक्तमण 
“न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति । | नहीं करते, यही टीन दो जते दै" 
अत्रैव समवरीयन्ते'"(ज०उ०४। | इत्यादि सेद शरुतिथोते प्रमाणित 
४।& ) इत्यादि भ्ुतिश्रतेभ्यः । | होता ह । 


नलु तस्माजीवादुधिक्रमिषोः | शङ्का --यदि इष श्रुतिक्ा एष 


उक्तमण 
` प्राणा नोत्क्रामन्ति सहव अर्थं पाना जाय कि 


गच्छन्तीत्ययसर्धं करनेकी इच्छावाले उस जीवके पास 
~ कर्य इति से भाण उक्तमण नहीं करते, बक्ति 


चेत्‌ ! -उसके साथ ही जते दै, तो ! 
न; ७ग्रेव समवलीयन्ते" इति | समाधान- यसी बात नहीं है, 
9 क्योकि टसा माननेसे धीं शन 
विशेषणानथ्यात्‌, ““स प्राणा | हो जाते है यह विरोषण व्यथं ह 
जायगा । तथा इद्के सिवा “सव 


अनूत्क्रामन्ति" (बृ० उ० ४ | | प्राण उसका अनुगमन कते ईं” 
क सका अनुगमन कत दै”. 


9 अचिमागंम बानेन परपद इस कोके तो आइसि नदीं होती 
कितु. ब्रह्मलोके ही एसे कद ोक र जिनमे वह अपने तपके प्रमावसे 
द 4 मः, जनः, तपः ओर सत्य--ये चारों ही लोक ब्रह्मलोकके 
अन्तरत द| साषक अपनी साघनाके परमावसे इनत किसी एक ठोकर् 
जाता है ओर फिर वहसे शानद्ारा उरो्तर लोकर्भ जत! हुआ सत्यढोकष 
प़चकर मुक्त हो जाता है । यह्‌ ही उसकी अन्यतरः आति है । 


कष्ड १० ] 
। २) इति च प्राणसनस्य 
परा्सवात्‌ । वस्मादत्करामन्तीत्य- 


नाशङ्वेषा । 
यदापि मोक्षस्य संसारगति- 


वैरक्षण्यास्राणानां जीवेन सहा- 
गमनमाशङ्य तस्मान्नोत्ाम- 
न्तीत्युच्यते, तदाप्यत्रैव समव- 
लीयन्त इति विशेषणमनर्थकं 
स्यात्‌ । न च प्राणे्वियुक्तस्य 
मदिरूपपद्यते जीवत्वं वा । सरव- 
गतत्वात्सदात्मनो निरवयवत्वात्‌ 
प्राणसंबन्धमात्रमेव क्षग्निविस्मु- 
लिङ्गवजीवत्वमेद्कारणभित्यत- 
स्तद्धियोभे जीवत्वं गबा न 


शक्या परिकन्पयितुं भ्ुतयश्च- 


तसप्माणम्‌ । 
न च सतोऽणुरवयवः स्फूटितो 


जीवाख्यः सद्रुपं॑च्द्रीडवंन्‌ 
गच्छतीति शक्यं कल्पयितुम्‌ । 


इस्थाष्याथं 
>>> 8 कक 2 क क क ॐ ॐ 2 4 7 ॐ ॐ: ॐ ॐ ॐ 4 


९५०७ 


इस श्रतिसे प्राणोके सहित जीवका 
गमन सिद्धभी होता दै । णतः 
प्राण उक्रमण करते है" ६स विषयमे 
कोई शङ्का नदीं हो सकती । 
इसके सिवा संसारगतिसे माक्ष 
की विरक्षणता होनेके कारण जब 
किं जीवके साथ प्राणोके न जनेकी 
आशङ्का करके एसा कहा जाता दे 
करि बे उससे उक्रमणदी नहीं 
करते [ घर्थात्‌ जीव प्राणोकि बिना 
ही चल नाता है ] तो उस.समय 
“वे यही डीन हो जलि है" यह 
विश्चेषण व्यर्थं हो जाता है, क्योकि 
प्राणेसि वियुक्तं इए प्राणीकी गति 
अथवा जीवत्व सम्भव ही नही है । 
कोक सदात्मा तो स्वगत भौर 
निरवयव है; प्राणसे सम्बन्ध होना 
ही अम्निके विस्फुटिक्गोकि समान 
जीवभावरूप भेदका रण है । 
अतः यदि श्रूतिको प्रमाण माना 
जाय तो प्राणका वियोग हो जानेप्र 
चिदात्माके जीवत्व भथवा गतिकी 
ल्पना नहीं की जा सकती । 
इसके सिवा रेसी कत्पना भी 
नहीं फी जा सकती कि सषदासाका 
उससे अरग हुआ अणुमात्र अवयव 
जीवसंजञक दै घौर वह सदात्ाको 
ठिद्युक्त करता इमा जता है । 


५०८ छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अष्याय ५ 


> 8 ८ 8 3 3८-9८-८४ >< 3८४८ -<-96 अ 


तस्मात्‌ ““तयोष्व॑मायननमरतत्व- 
मेति" इति सगुणब्रहमोपास- 
कस्य प्राणेः सह नाव्या गम- 


नम्‌, सापेक्षमेव चाम्रततम्‌, 
न साक्षान्मोक्ष इति गम्यते; 
“तदपराजिता पूस्तदेैरं मदीयं 
सरः” इत्याद्युक्त्वा तेषामेवैष 
ब्रहलोकः'" इवि विशेषणात्‌ । 


` अतः पृश्वाग्निविदो गृदस्था 
ये चेमेऽरण्ये वानप्रस्थाः परि- 
चाकाश सद नेष्ठिकनह्मचारिभिः 
शरद्धा तप हइत्येवमाद्युपासते 
भरदधानास्तपस्िनधेत्यर्थः । 
उपासनशब्दस्तात्प्या्थ,,'“इष्टा- 
पूतं दत्तमित्युपासते" इति यदत 
भुत्यन्तराघ्े च सत्यं जहम 
दिरण्यगर्माख्यमुपासते ते सरवे 
ऽचिषमचिरभिमानिनीं देवताम- 
भिसंभवन्ति प्रतिपद्यन्ते । समा- 


अतः “उस मूर्धन्य नादीसे उप 
ओर जाता हुभ वह अमरघको प्रप 
होता है" इस प्रकार सगुण ्रह्मोप- 
सकका प्ररणोके साथ मूर्धन्य नाडीसे 
नाना सपक्ष अमृतत्वही दै, सक्षात्‌ 
मोक्ष नदी है--यह जाना जता है 
कोक श्रुतिने “वह अपराजिता पुरी 
है, वह हर्पोल्ादक सरोवर दै" एसा 
कहकर “उन [ सगुण बक्षोपासकों | 
को ही यह बरह्मरोक मिलता दै" 
देसा विरोषण दिया है । 


अतः पञ्चाभिवेत्ता गृहस्थ भौर 
जो ये वनवासी - नैष्टिक त्र 
चारि्यके सहित वानप्रस्थ ओर 
संन्यासी श्रद्धा ओर तपः हत्यादिकी 
उपासना करते दै अर्थात्‌ श्रद्वु 
एवं तपस्वी है । नसा किं ‰ईइष्टपूतत 
दत्तमित्युपासते" इस श्रुतिम दहै 
उसीके समान यहाँ !उपासनः शब्द 
तत्परताके अर्थम है । तथा एक भन्य 
श्ुतिके भनुस।र जो हिरण्यगरभसंजञकं 
सलत्रहमकी उपासना करते है वे 
सन अर्चि यानो अर्चिके अमिभानी 
देवताको प्राप्त होते है । रोष सब 
चतुथं अध्यायके अन्तर्गत [ उप- 
कोसल विद्याम ८ छा० ४।१५।५ 


काण्ड १० ] शाङ्रमाष्याथं ५०९, 
र ~~ > ऋ > < ऋ 
नमन्यचचतुथंगतिव्याख्यानेन । | मँ ) बतलायी हुई ] .गतिकी 


एष देवयानः पन्था व्याख्यातः | व्याख्याके समान दै |यह सल्यलोकमे 


सत्यरोकावसानः,नाण्डादुबदिः, | समाप्त ॒दोनेवले देवयानमागृकी 


व्याख्या कौ गयी; इस मागंकी 
्रह्माण्डसे बाहर गति नहीं दै; जैसा 

बृ०उ०६।२।२) इति किं जो “पिता ८ धुरोक ) जर 
| माता ( प्रथिवी ) के बीच है" 
मन्त्रवर्णात्‌ ॥ १-२ ॥ इस मन्त्रसे सिद्ध होता दै ॥१-२॥ 


“'्यदन्तरा पितरं मातरं च 


ततीय प्ररनका उत्तर 
( देवयान ओर धूमयानका ऽ्याघतेनस्थान ) 

अथ य इमे थाम इष्टाप्ते दत्तमित्युपासते ते धूम 
मभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिशरात्रेरपरपक्षमपरपक्चायान्षड्‌ 
दक्षिणेति मासाशस्तान्नैते संवत्सरमभिधराभुवन्ति ॥२॥ 
तथा जो ये गृहस्थलोग ग्रामे इष्ट, पूर्तं ओर दत्त-शेसी उपासना 

करते है वे धूमको प्रा होते है; धूमसे रात्रिको, रात्रिसे हृष्णपक्षको 
तथा ङृष्णपक्षसे निन छः महीने सूयं दक्षिणांसे जात है उनको 

राप होते है । ये रोग संवत्सरो प्राप नहीं होते ॥ २ ॥ 9 

अथेत्यर्थान्तरपरस्तावनारथः, य | अथः यह ६ दूसरे विषयकी 

~ , प्रस्तावनाके स्यि दै, जो ये गृहस्थ 

८. ए 0 ₹० | गण आमे निस भरकर “अर्म 
गृहस्थानामसाधारणं विशेषण- | यह वानमस्थ जोर ॒पर्राजक्नौका 


मरण्यवासिम्यो व्याङत्यर्थम्‌ , | गदसयोस व्यि करनेके स्थि 
| असाधारण विशेषण था, उसी 


यथा, वानप्रस्थपरिव्राकानाम- | प्रकार श्रामः यह वनवासियसे 
रण्यं विशोषणं गृहस्थेभ्यो व्या । व्याति करनेके स्थि गृहस्थो 


५१० छान्दोग्योवनिषद्‌ [ अध्याष ५ 
क > > 3 9 9 5 5 2 2 ॐ 4 
व्यभम्‌, तदत्‌; इतं इष्टमग्नि-| जसाधारण विरोषण दै । पू 

वेदिकं ¢ श 
होत्रादि वेदिकं कम, पत वाषी- “इष्टः कहते है तथा वापी, कृ 


षतडागारामादिकरणम्‌ ; दन्तं | तदाग एवं बगीचे मदि कगवगेक 


खग्निहोत्र सादि वैदिक के 


ह नाम पूतं है; जर वेदीसे बह | 
बहिपेदि यथाशक्तय्भ्यो दरव्य- | दानपात्र व्यक्ति्मोको यथाशक्ति पन ` 


देना "दत्त कहराता है। इष 


त्तम्‌ ; इत्येवंविधं 
0 हमः स प्रकार जो परिचर्या ( गुरुश ) 


परिचरणपसितराणाद्युपासते, इति- | एवं पखिरण ( पर्मक्ष ) मद्वि | 


तत्ररतापू्वक सेवन करते दै - 
क्योकि यहाँ इति, शब्द अनुष्ठाना 
ते दर्षनवलितत्वादुभूमं॒धूमा- | भकार पदि करने ल्म दै - 


शब्दस्य प्रकारदशेनार्थतवात्‌ । 


भिमानिनीं देवतामभिसंभवन्ति 


प्रतिपद्यन्ते । होते हैं । 


वे उपासनाशु्य॒होनेके काण | 
धूम--धूमामिमानी देवताङ़ो भर | 


तयातिबाहिता धूमाद्रात्रिं उस धूमामिमानी देवतसे | 


अ जये जति) , 

रात्रिदेवतां रात्रेरपरपक्षदेवता- | अतिवाहित ( आगेले ना 
¢ हुए वे धूम॒से रात्रो रात्रिदेबत- | 
भेव इष्णपकषामिमानिनीमपर्‌- को, रात्रिसे अपरपक्ष यानी कष्ण । 


पक्षाद्यान्षण्मासान्दक्षिणा । पक्से जिन छः महीरनेमिं सूये दक्षिण | 


दिशाकी बोर होकर चरता दै अ 


दिशमेति सविता, तान्मासान्दक्षि। महोनेको भर्थात्‌ दक्षिणा 


णायनपण्मासाभिमानिनी्वता; | कः महीक भमिमानी देवको | 


वति मरा होते है- रेखा इसका ताछ" 
न्त इत्यथः । संषचारिण्यो । है । ये षण्मास्ामिमानी देवता ए 


खण्ड १० ] 


शाङ्करथाष्या्थे 


५११ 


०3 ॐ 2 क क 9 क क ॐ 9 2 9 2 2 4 


हि पण्मासदेवता इति मासा- 
निति बहु वचनप्रयोगस्तासु । 
नैते कर्मिणः प्रकृता संव- 
त्सरं संवत्सराभिमानिनीं 
देवतामभिप्राप्लुवन्ति । 3 
कुतः पुनः संवत्सरप्राप्ति- 
प्रसञ्खो यतः प्रतिषिभ्यते ! 
अस्ति दहि प्रसङ्गः;संवत्सरस्य 
देकस्यावयवमभुते दक्षिणोत्तरा- 
यणे, तत्राचिरादिमागंप्बृ्ताना- 
मदगयनमासेभ्योऽवयविनः संव 
त्सरस्य॒प्राप्रिरुक्ता । अत 
इष्ापि तदवयवभूतानां दक्षिणा- 
यनमासानां प्राप्तिं श्रुता 
तद्वयविनः संबत्सरस्यापि पूव 
वत्प्रा्तिरापनाः; इत्यतस्तत्परा्िः 
प्रतिषिभ्यते नेते संवत्सरमभि- 
प्राप्नुवन्तीति ॥ ३ ॥ 


संधमें रहनेवाटे दै; इसणियि उनके 
ङ्य मासान्‌ पसा बहुवचनका 
प्रयोग क्रिया गया है। याँ 
जिनका प्रकरण है, वे ये कम॑ 
काण्डी संवत्घरको-संवत्सरामिमानी 
देवताको प्राप नहीं होते । 
शङ्भ--ितु यहं संवत्सरप्रा्ति- 
का प्रसङ्ग ही कहां था जो प्रतिषेष 
किया गया ? 
समाधान- हो, प्रषज्ग दे; 
दक्षिणायन ओर उत्तरायण-ये एक 
ही संवत््ररके दो अवयव है, उनमें 
भिं आदि माग॑से जनेवले पुरुषे- 
की उत्तरायणके महीर्नोसे अपने 
अवयवी संवत्सरकी प्रापि बतलयी 
गयी थी । इसलियि यहाँ भी उससे 
अवयवभूत दक्षिणायनसे महीनोकी 
प्राति घुनकर पूववत्‌ उनके भवयवी 
संवत्रकी भी प्राति हो नाती ै, 


इसीसे वे संवत्सरको प्राप नही होते" 
-ेसा कदकर उसकी प्राक्षिका 
प्रतिषेष किया जाता है ॥ ३ ॥ 





मासेभ्यः पितृलोकं पितरखोकादाकाशमाकाशा- 
चन्द्रमसमेष सोमो राजा तदेवानामन्नं तं देवा 


भक्षयन्ति ॥ ४॥ 


५९ छान्दोष्योचनिषव्‌ 


ह क 9 क क कक 4 > क. क 2 क 4 3 ॐ > ॐ 4 

दक्षिणायनके महीनोसे पितृोकको, पितृोकसे आकारो शर 

मकाशसे चन्दरमाको पर्त होते है । यह चन्द राजा सोम षै । क 
देवताओंका अन दै, देवतारोग उसका भक्षण करते है ॥ ५ ॥ 


[ मध्याय | 


मासेभ्यः पितलोकं ॒पित- 
लोकादाकाशमाकाशाचन्द्रमसम्‌ । 
कोऽसौ पस्पैः प्र प्यते चन्द्रमाः १ 
य एष ॒दृरयतेऽन्तरिक्षे सोमो 


राजा ब्राह्मणानाम्‌, तदन्नं देवा 
नाम्‌, तं चन्द्रमसमन्नं देवा 
इन्द्रादयो भक्षयन्ति । अतस्ते 


भूमादिना गत्वा चन्द्रभूताः 
कर्मिणो देवैभे्षयन्ते । 
नन्वन्थायिष्टादिकरणं यद्य 


भूता देवैभश्येर्‌ । 
नेष दोषः-अन्नमित्युपकर- 
णमात्रस्य विवक्षितत्वात्‌; न हि 
ते कवलोततेपेणदेवेभै्यन्ते,कि 
तर्हिउपकरणमात्रं देवानां भवन्ति 


ते स्रीपशुभेत्यादिवत्‌। दृष्टश्ानन- 


वे दक्षिणायनके हीनेति सि. । 


= 5 5 अ | 


रोको, पितररोकते भक्षो | 
जीर आकाश्चसे चन्दरमाको प्रप 
होते है । उनके द्वारा बो प्रप | 
किया जाता है वह यह चन्म 


कौनष्ै£ यह नो अकाश 
दिखायी देता तथा जो षोम 
ब्राक्षणोका राजा है, वह देवताफ। 
अनन दै; उस चन्द्रमा छतो 
इन्द्रादि देवता भक्षण करते हं। 
अतः धूमादि माग॑से जाकर चन्द्रमः 
खूप हुए वे कमीं देवता्भोसे मित 
होते है । 

शङ्धा-- यदि वे भन्नरूप हो 


देवताोद्ारा भक्षित ते दै ते | 


इष्टादि कर्मोका करना अनथैके ही 
स्यि दहै? 
समाधान-- यह दोष नही ह 


क्योकि 'अन्न' इस राब्दसे केवह 


उपभोगकी सामप्री ही विवक्षि 


हे। वे देवताओं प्री 
तरह उठाकर नहं खाये जते, त 
फिरिक्याहोता दै! वेस, पट 
एवं सेवकादिके समान देवतामोरि 
केवर उप्करणमात्र होते दै । अन 





खण्ड १० | 


शा इरमाप्याथे 


५१३ 


~ ४ < 9-9-८8 >. 9८ > 9८ < > ८ >< 9 8 ~ 


शव्द उपक्रणेषु चियोऽनर 
पशवोऽन्रं विशोऽन्नं राज्ञामि- 


त्यादि । न च तेषां स्यादीनां 
पुरुपोपभोग्यत्वेऽप्युपभोभो 
नास्ति | सस्मा्छरभिणो देवा- 


नाभरुपभोगषा अपि सन्तः 
सुखिनो देवैः क्रीडन्ति | शरीरं 
च तेषां सखोपमोगयोग्यं 
चन्द्रमण्डल आप्यमारभ्यते । 
तदुक्तं पुरस्तोत्‌-श्रद्राशब्दा 


आपो ब्ुलोकाग्नौ हुताः सोमो 
राजा संभवतीति 

ता आपः कम॑समवायिन्य 
इतरे भूतैशवुगता दचुरोकं 
प्राप्य चन्द्रत्दसापनाः शरीरा- 


दयारम्भिक्ा इ्टाचुपास्षकानां 
भवन्ति । अन्त्यायां च स्रीरा- 
हुतावग्नौ इतायामग्निना 


दद्यमाने शरीरे तदुत्था आपो 
धूमेन सहध्वं यजमानः 
मावेष्टय चन्द्रमण्डल प्राप्य 
कुशस॒त्तिकास्थानीया बाद्य- 


रव्दका उपढरर्णोरमं भी प्रयोग 
देखा हयो जाता दै; जैषे रानार्भोका 
सियाँ अन्न दै, पञ अन्न है, वैशय 
अन्न है" इत्यादि। पुश्पके उपभोग्य 
होनेपर भी उन खी आदिको उप- 
भोग प्राप्त न होते हो-रेसी बात 
नदीं है। भतः कमीं छोग देवताभेकि 
उपभोग्य होनेपर भी पुखी होकर 
देवताअकि साथ क्रीडा करते है । 
तथा उनका सुखोपभोगणयोग्य नरीय 
करीर चन्द्रमण्डले आरम्भ होता हे। 
पहले यह बात कदी भी जा चुकी 
हे कि श्रद्वा शब्दवाच्य जलक्रा 
युरोकरूप अग्निम हवन किये जनि- 
पर सोम राजाकी उपति होती हे । 


वह्‌ कर्मसम्बन्धी जल अन्य 
भूतेसि अनुगत हो बलोकमे पर्हच- 
कर चन्द्रभावको प्राप हो इष्टादि 
कर्मोकी उपासना करनेवाटे पुरषकं 
शषरीरादिक्रा आरम्भ करनेवाला 
होता ह । फिर शारीरख्प अन्तिम 
आहुतिके हुत होनेपर जब अभ्रद्रारा 
शरीर द्ध होने क्गता हे तो उससे 
उन्न होनेवाला जल धूमके साथ 
यजमानको आच्छादित कर उपर 
चन्द्रमण्डले पर्ुचकर कुशं एवं 


` ५१७ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अभ्याय ५ 
>> >< ><: >< >< >< + > >: > = 2 
दयशरीरारम्भिका भवन्ति । | ृत्तिकास्थानीय बाह शरीर 
आरम्भ करनेवारा होता है । उसे 
तदारब्धेन च श्गीरेणेष्टादिफल- | गारम्म हुए शरौरसे हौ ३ इदि 
| कर्मोका फल भोगते हुए वहो रहते 
यपचञ्ञाना आस्ते ॥ ४॥ | ईै॥ ४॥ 
=: धः .- = 
द्वितीय प्ररनका उत्तर 
( पुनराव्तनका क्रम ) तव 
तस्मिन्यावस्संपातसुषिसवाथेतमेवाध्वानं युननिवतं 
<> ० © 
न्ते यथेतमाकाशमाकाराद्रायुं वायुभूंसवा धूमो भवति 
धूमो भूखास्रं भवति ॥ ५॥ 
वहाँ कर्मोका क्षय दहोनेतक रहकर वे फिर इसी मागंसे नि 
मकार गये थे उसी भकार लौटते दै । [ वे पले ] आकाशको प्राप हेत 
दै जीर आकाशसे वायुको, वायु होकर वे भूम होते है ओर धूम होकर 
अभ्र होते दै ॥ ५॥ 
यावत्तदुपभोगनिमित्तस्य | जवतक उ चन्द्रलोके उप- 
भोगोकि निमित्तमूत कर्मका क्षय 
होता है--जिखके द्वारा घ्य 
संपातः कर्मणः क्षयो यावत्संपातं | होता दै उसे सम्पात अर्थात्‌ क्र 
ठ क्षय कते है, यावत्समपात अर्थत 
यावकमणः क्षय इत्यथः; ताव- | जवतक कर्मक क्षय ोता है तवक 
र कर 
तरसमिधनदरमण्डल उपित्वाथान- | उत चन्द्रमण्डलम्‌ निवास 
त ` प्वान | पथात्‌ इस आगे कट जनिवर 
नतरमेतमेव वश््यमाणमध्वानं मां सर्गम दी पिर जट भति ॥ | 
(= सि 'पुनर्तिवतन्तेः डोर आते दै) 
पुननिवतनते । पुननिवर्तन्त शति । ृननिवतम्त' (फर रं 
४ 2 ` ; देस प्रयोग दोनेसे यद जाना नात 
भयोगालूमप्यतङच्न्द्रमण्डल| दै कि प्रे भी कई गार चनः 


९ व क येनेति 
कर्मणः क्षयः, सपतान्त येनेति 





| 
॥ 
| 
1 
॥ 


क्ण्ड १० ] छार भाच्याथे ५१५ 
८ (0-०८-9 9 9 8 ल (ऋ अऋ--ः 


गता निटृत्ताथासन्निति गम्यते । | मण्डलको मा होकर रर चुके हः 
अतः वे हस रेोक््मे इष्टादि कम॑ 
तस्मादिह लोकं इशादिकमोपि- | करके चन्द्रमण्डर्को प्राप्त होते हे; 
चित्य चन्द्रं गच्छन्ति, ततषये तथा उनका क्षय होनेपर्‌ फिर रीः 
आतेहं। उस समय वर्होकी 
चावर्तन्ते; क्षणमात्रमपि तत्र | स्थितिके निमित्तभूत कर्मक 
क्षय हो नानेके कारण उ स्थानपर 
स्थातुं न छभ्यते, स्थितिनिमित्त- उन्का एक क्षण भी ठहरना नही 
8 _ | हौ सकता,जिस॒ प्रकार क तैरका 
कमक्षयात्‌) सनेदक्षयादिव | क्य हो जनेपर दीपक नही ठर 
प्रदीपस्य । | सकता । 
तत्र फं येन कर्मणा चन्द्र- | पूवं ०--निस कर्मके दवारा बह 
कर्मक्चय्य यण्डलमाष्टस्तस्य चन्द्रमण्डरूपर आरूढ होता है क्या 
सावरेपलं पवस्य क्षये तस्मा- | उस सवका क्षय होनेपर वह उपसे 
निरवशेषत्वं वा ? दवरोहति छि वा | ऽतरता दै अथवा कुछ शेष रह 





सावशेष इति । | जानेपर ही उतर भता है ? 
| सिद्धान्ती--इ्से दे श्या 
किं ततः ! | सेना दै? 


ति , ण. | पूर्वं०--यदि सारे ही कर्मका 
यदि सर्वस्यैव क्षयः कम॑ण | व श 
| रहते हुए ही उसका मोक्ष सिद्ध 
| हो जाता है, ओर ववं रहते 
हुए दही मोक्ष होता दहै या नही 
होताः इस विचारको रहने भी 
दिया नाय तो भी वहसे आनेपर 
इस रोकमे उसके शरीरोपभोग 


इरीरोपभोगादि न संभवति । | मादि सम्भव नहीं हो सकते तथा 
छा०° उ° ९७- 


शन्द्रमण्डखस्थस्येव मोक्षः 
प्राप्नोति, तिष्टतु तावकत्रैव मोक्षः 


स्यान्न वेति, तत आगतस्येहं 


५९६ 


छाम्दोष्योपनिषद्‌ 


[ कष्याव ५ 


>< < < 9८ < ८ < € ८ 8८ < >< < ८ -8८ .9 &< ४८ >. -आ 
ततः शेषेणेत्यादिस्मृतिविरोधथ | ^ततः शोषेण ८ युक्तावशेष कर्मेति 


स्वात्‌ । 


नन्वषटापूतंदत्तव्यतिरेकेणापि 


मनुष्यलोके शरीरोपभोगनिमि- 
त्तानि कर्माण्यनेकानि संभ- 


बन्ति, न च तेषां चन्द्रमण्डल 
उपभोगः, अतोऽक्षोणानि तानि। 


यनिमित्तं॒चन्द्रमण्डलमारूट- 
स्तान्येव क्षीणानीत्यविरोधः । 


शेषरब्दश्च सर्वेषां कमंत्वामा- 
न्यादविरुद्धः । 

अत एव च तत्रेव मोक्षः 
स्यादिति दोषाभावः; विरु- 
द्वानेकयोन्युपमोगफलानां च 
कर्मणामेकैकस्य जन्तोरारर्म- 
कत्वसंभवात्‌ । न चैक 
स्मिञ्चन्मनि सबेकर्मणां क्षय 
उपपद्यते, बहहत्यादेधेकै- 
कस्य॒ कर्मणोऽ्नेकजन्मार- 
म्भकत्वस्मरणात्‌ । स्थाव्‌- 


जन्म ठता दै) इ्यादि स्परतिसे भी 
विरोध होता है। 
सिद्धान्ती--इसर मनुष्यलोके 
इ९, पूतं भौर दत्त--इन कमो 
भिन्न लौर भी अनेको शरीरोप- 
भोगके निमित्तभूत कर्म हो सकते है; 
उनका चन्द्रमण्डलमे फरोपभोग भी 
नहीं होता, इसख्यि वे भक्षण ही 
रहते हैँ । जिन कर्मेकि कारण वह 
चन्द्रमण्डकपर आखूढ़ होता दै 
उरन्दीका वरहो क्षय भी होता है-- 
हस प्रकार इसमे कोद विरोध नदी 
है । सब कर्मो कर्मत्व समान 
होनेके कारण [ उप्त स्मृतिर्मे ] 
(शेष शान्दका प्रयोग क्षिया गया है। 
इसल्यि वह भी अविष्दर दौ है । 
इसीलियि "उसका वहीं मोक्ष हो 
जाना चाहिये एसा भी दोष नदी 
घा सकता, कयो कि एक-एक जीवके 
एसे करमोका भारम्भकत सम्भव हो 
ही सकता है जिनके फल अनेकं ,. 
विरुद्ध योनिम भोगे जायं । एक 
दी जन्मे समस्त कर्मोका क्षय हो 
जाना सम्भव भी नहीं है, क्योकि. 
स्प्रतियोमं 'बक्महत्या आदि एक 
एक करम अनेक जन्मोके आरम्भक 
हैः एेसा बतलाया गया है | तथा 


खण्ड १० ] शाहर्माष्याथं ५१७ 
~> < >< >< < ल ल < << < < 
रादिद्राप्नानां चात्यन्तमूटानाभर- | नो स्थावरादि योनियोको भरा हए 
अयन्त मूढ़ जीव है उनके उक्कर्के 
हेतुमूत कर्मोक्रा आरम्भकत्व तो 
संमवात्‌ । गर्भभूतानां च | जसम्भव दी है । [ इसके सिवा 
| = श कोईै-कोई एेसा भी समञ्चने रगेगे 
संसमानानां कर्मासंभवे संसारा- | कि ] गर्भूप होकर क्षीण हूए 
| जी्वोके कोद क्म न होनेके कारण 
_ | उन्द संसारकी प्रपि होना दही 
करिमञनम्मनि सर्वषां कर्मणामु- | असम्भव दै । मतः एक दी जन्म 

समस्त कर्मोका उपभोग नहीं हो 
पभोगः । सकता । 


€, 
त्कर्षहेतोः कम॑ण आरम्भकत्वा- । 


नुपपत्तिः । तस्मान्नै- 


कुछछ ोर्गोका जो पसा कथन 

है कि ( संचित-) कमं प्रायः 
श्रयोपमर्देन प्रामेम कर्मणां | सम्पूणं [ प्रार्य ] कमक आश्रव 
[ शरौर ] का नाश करके 

जन्मारम्भकत्वम्‌ । तत्र कानि- | जन्मके आरम्भक होते है; उस 
अवस्थामे ऊक कमं तो जन्मके 

चित्कर्माण्यनारम्भकत्वेनेव तिष्ट- | अनारम्भकलपते ही स्थित ते 


त दै जीर कुछ जन्मका भारम्भ 
न्ति कानिचिज- इति | करते है यह बात सम्भव नहीं 


हे, वर्थोकिं मरण तो अपने विषयके 
अभिव्यज्ञक दीपकके समान सारे 
ही कर्मोक्रा अभिव्यज्ञक है !- 


सर्वस्य सर्वात्मिक्वाभ्युपगमात्‌ । | सर्वासकल स्वीकार किया गया 


यतत कैशिदुच्यते सर्वकर्मा 


नोपपद्यते; मरणस्य सर्वकर्मा 
भिव्य्ककस्वास्स्वगोचराभि- 


५९१८ 


छन्दोष्योपनिवह्‌ 


[ खष्याथ ५ 


>> 9८ ~~ 9८ > ~ ~: = >8: 8८ ~ >~ > > >> > 


न दि सवैस्य सर्वात्मकत्वे देश- 
कालनिमित्तावशुद्सास्सर्बारम- 
नोपमर्दः कस्यचित्वचिदमि- 
व्यक्तिर्वा सर्वारमनोपपद्यते । तथा 
कर्मणामपि साश्रयाणां भवेत्‌ । 
यथा च पूरवालुभूतमलुष्यम- 
यूरमकंटादिजन्मामिसंस्कृता वि- 
रुद्रानेकवासना मकटतवप्रापकेन 


कर्मणा मकंटजन्मारभमाणेन 
नोपमृद्यन्ते तथा कर्माण्यप्यन्य- 
जन्मप्रापिनिमित्तानि नोपभृ्यन्त 
इति युक्तम्‌ । यदि हि सर्वाः 
© 
पू्जन्मानुभववासना उपम्रयेर- 
~ मित्त ९ 
न्मक्टजन्मनिमित्तन कर्मणा 
मकटजन्मन्यारन्पे मकेटस्य जात- 


® इसका तात्पयं यह है कि सः 
सत्ता रदती हं । प्रत्येक पदार्थकी अभि 





हे# । अतः सवका सर्वामकल 
होनेषर देश, कार ओर निमित्से 
अवरुद् होनेके कारण किसी प्दारथ 
का सर्वथा नार श्रथवा सर्वथा 
| अभिव्यक्ति कभी नहीं हो सकती | 
| देसा ही कर्म॑ ओर उनके आश्रयके 
विषयमे भी होगा [ अर्थात्‌ उनका 
भी सर्वथा नाश अथवा सवधा 
आविभवि नहीं हो सकता ]। 

जिस प्रकार पटे अनुभव किये 
हुए मनुष्य, मयूर एवं वानर आदि 
जन्मोमे सम्पादित की हुई अनेकों 
विरुद्ध वासना वानरत्वकी प्राप्ति 
करानेवारे वानरजन्मके मरम्भक 
करमसे क्षीण नदीं होतीं उसी प्रकार ` 
७न्य॒जन्मोँकी प्राप्तिके निमिततमूत्‌ , 
कमं मी क्षीण नदीं होते-- यह ठीक 
ही है । यदि वानरजन्मके निमित्तः 
मूत॒कर्मसे पूरवेजन्मोके अनुभवकी 
समस्त वासनाए" क्षीण हो जाती तो 
वानरजन्मका आरम्भ होने 
तत्का उतपन्न हुए वानरको माताके 





मस्त पदार्थोमिं न्मूनाधिकलूपसे सभीकौ 


यक्ति ओर विनाशके कारण मी मिन्न-भिन्न 
दै । अतः एक ग्यक्तिकी मृत्यु किन्दी-किन्दी 


भी सबकी अभिव्यक्ति नदं कर सकती । 


संचित कर्मोकौ अभिग्यञ्जक दोनेपर 


सलियि व भि- 
व्यञ्जक्त निमित्तकी प्रासितकं न त 


आरम्भक दी होते ह । 


हीं होते ओर न वे आगामी जन्मक 


खण्ड १० | 


मात्रस्य मातु 


प्षाद्राष्याथ ५१९ 


शाखायाः | एक शालासे दृसरी शखापर जाते 


समय उसके पेटसे चिपके रहने 


लाखान्तरगमने मातुरुद्रसंर- | आदिकी कुशरता प्रप्त न होती; 


गनत्वादिकोौशरं न प्राप्नोति, 
इह॒ जन्मन्यनभ्यस्तत्वात्‌; न 
चातीतानन्वरजन्मनि मकैटत्व- 
मेवासीत्तस्येति शक्यं वक्तुम्‌, 
‹^तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते 

९ 2) 
पूवप्रज्ञा च'' ( ब्रु° उ० ४। 
४ । २ ) इति श्रुतेः । तस्मादा- 
सनावन्नाक्षेषकर्मोपमदं इति केष- 
कृर्मसंभवः । यत एवं तस्मा- 
च्ेषेणोपथुक्तात्कर्मणः संसार 
उपपद्यत इति न कथिद्विरोधः । 

कोऽसावध्ना यं प्रति निवत॑न्ते! 
इत्युच्यते--यथेतं यथागतं नि- 
वर्तन्ते । 

नयु मासेभ्यः 
गमनागमन पितृरोकादाकाल- 
क्रमयोेद आक्षेपः 

` माकाशाच्चन्द्रमस- 


पितलोकं 


कर्योक्गि इस जन्ममे तो उसका 
अभ्यास हुभ नहीं ओर एसा भी 
कहा नहीं जा सकता कि इसके 
पर्ववर्तीं जन्मम भी उसे वानत 
ही प्राप्त था। “विद्या ओर कमं 
उसका अनुगमन करते है तथा 
पूर्वजन्मकी वासना भी? इस्‌ श्रुतिसे 
मी यही सिद्ध होता है। मतः 
वासनाके समान समस्त कर्मोका 
भी क्षय नही हो सकता, इषल्यि 
शेष कमोका रहना सम्भव दै । 
क्योकि रेसी बात है इसस्यि 
उपमुक्त हुए करमोति बचे हुए कम- 
द्वारा संसारकी प्राप्ति होना उचित 
ही है- इस प्रकार कोर विरोध 
नहीं आता । 

वह कोन मागं है जिसके प्रति 
ये छोरते हे £ इसपर श्रुति यह 
कहती है कि जिस मांसे गयेथे 
उसीसे रोरते है । 

शङ्खा-गमनका क्रम तो इस 
प्रकार बताया गया था कि मासोसि 
पित्रृलोकको, पितररोकसे आकाराको 
ओर आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त 
होता दै, कितु निवृत्ति इस प्रकार 


५२० छान्दोष्योपनिषद्‌ [ सध्याय ५ 
= ८-39-8 


मिति गमनक्रम उक्तो न तथा | नही बदटायी नाती। तो कते 
वतलायी जाती दे -आकार्से 
निवृत्तिः । फं तर्हिं १ आकाशाायु-| वाको प्राप्त होता है इत्यादि खूपते 
वतलायी जाती है; फिर निस 
मा्म॑स्े गये ये उक्षीसे ोटते है 
फे कैसे कहा जाता है ? 
समाधान-- यह कोई दोष नही 
है, कर्कि आका्चकी प्राप्ति भौर 
परथिवीकी प्राप्ति ये दोनों दशार्भोमि 


समान है । इसके सिवा इसमे एेसा 


मित्यादि, कथं यथेतमित्युच्यते! 
नेष दोषः, आकाशग्राे 

स्तुल्यत्वात्पृथिवी- 
ततरिहारः ब्राप्तेश | न चत्र 


नियम भी नहीं है कि जिस मा्मसे 
गये थे उससे कोटं, किसी जन्य 
प्रकार भी ीटदही प्के दै। 
नियम तो केवर इतना ही है कि वे 
फिर लते ह । अतः “निस माग॑से 


गये ये इत्यादि कथन केवर उप- 
रक्षणमात्र हे | अतः भौक्कि 
आकाशको तो वे प्राप्त होते ही है । 


यथेतमेवेति नियमोऽनेवंविधमपि 


+ 0 © > 
निवतन्ते पुननिवतेन्त इति तु 
नियमः। अत॒ उपलक्षणाथमेत- 


द्यथेतमिति अतो मोतिकमाकाशच 


तावतप्रतिपद्यन्ते । 


यास्तेषां चन्द्रमण्डले शररीरा- | चन्दमण्डल्े जो उनके शरीरका 
रम्भिका आप आसंस्तास्तेषां | आरम्भ करनेवाला जरः होता है 
५ | वह वहाके उपमोगके निमितचमूत 

तत्रोपभोगनि म 
मोगनिमिततानां कर्मणा कर्मोक क्षय होनेपर विलीन हो जाता 
हे, जिस भकार कि अग्निका संयोग 
वामनिसंयोगे । ता विलीना अन्त. | हनेषर तका पिण्ड विरीन हो जाता 


> ह । वह अन्तरिक्षस्य जरु विरीन 
परस्या जक्राशभूता इव घूमा । होकर अकाशभूतके समान सूक्ष्म 


क्षये विलीयन्ते, धृतसंस्थानमि- 


ण्ड १० 1] शाङ्करभाष्याथे ७५२१ 
> >&८ ->- < >< < 3: >< ¬< >< < 9 < < >: > 8 ४ >< > ऋ 


सृवन्ति । ता अन्तरिकषादरायुर्भ- | हो जाता दै । अन्तरिक्षसे वायुरूप 
= हो जाता है। वह वायुम स्थित 
वन्ति । वायुश्रातष्टा चूत | होकर वाधुरूप हुमा इधर-उधर रे 
इतश्रायुतधोदमानास्ताभिः सह | नाया जाता दै तथा उतकेदी साथ, 
क्षीणकर्मा वायुभूतो भवति । | जि्के कमं क्षीण हो गये है यह 
४ एय १ | जीव वायुरूप हो जाता दहै । वायु 
५९ ८ सव धूमो- | होकर बह उ जरे सहित ही धू 
भवति । धूमो भूतवान्रम्‌ अन्भ- | हो जाता है तथा धूम होकर्‌ अज्र 
रणमात्ररूपो भवति । ५ ॥ । जलमरणमात्रहप हो नाता द।५॥ 
--:ॐ-- 
अभ्रं भूता मेघो भवति मेधो भूत्वा प्रवर्षति त 
इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिखमाषा इति जाय- 
न्तेऽतौ वै खट दुर्निष्प्रपतरं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः 
सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥ 
वह अभ्र होकर मेष होता दै, मेष होकर बरसता है । तव वे 
जीव इस रोकम धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिक्‌ घौर उड़द अदि 
होकर उसन्न होते है । इस प्रकार यद निष्कमण निश्चय दी , अयन्त 
कामद ह । उस अनो जो-नो मक्षण करता है ओर नो-जो वी्सेचन 
करता है, तद्रूप हौ वह जीव हो नाता है॥६॥ 
अभ्रं भूत्वा ततः सेचन- ! अभ्र दकए उसके पश्चात्‌ वह 
$ वर्षा करनेमे समर्थं मेव द्रोता है । 
समथो मेषो र मेषो फिर मेध होकर ऊँचे स्थानीय 
भूतवोजतेषु मदशष्बथ प्रवपति; | करता है अर्थात्‌ कर्कि शेष रहने- 
वषधागारूपण रोपकर्मा॒पत- | के कारण वर्षा्नो धाराओकि खूषमे 
तीत्यथः । तइ व्रीहि | भिर्‌ जाता दै। वेजीव इष रोक 
यवा ओषपधिवनस्पतयस्तिछ- । धान, जो, ओषधि, वनघ्पति, तिर 


५९२ 


छाज्देग्योवनिषद्‌ 


[ ब्वष्यास्‌ ५ 


माषा इत्येवंप्रकारा जायन्ते । 
(९ 
क्षीणकमणामनेकत्वाद्बहु वचन- 
निर्देशः । मेघादिषु पूरवेष्वेक- 
कपत्वादेङवचननिर्देशः । 
यस्मादविरितरदुगनदीसश्दरा- 


रण्यमरुदेशादिसंनिवेश्चसषटस्राणि 
वषधाराभिः पतितानाम्‌, अत- 


स्तस्माद्धेतोवं खलु दुनिष्प्रपतर 
दुरनिष्करणं दुर्निःसरणम्‌ । यतो 
गिरितिटादुदकस्रोतसोद्यमाना 

नदीः प्राञ॒बन्ति,ततः समुद्रं ततो 
मकरादिभिर्भशष्यन्ते; तेऽप्यन्येन; 
तत्रेव च सह॒ मकरेण समुद 
विरीनाः समुद्राम्भोभि्जलधरे- 
राकृष्टाः पुनवषधारामिर्भरुदेशे 
शिखातटे वागम्ये पतितास्तिष्ठ- 


न्ति, कदाचिट्व्यालमरगादिषीता 


ओर उडद इत्यादि पकारे उतर 
होते है । क्षीणकर्मा लीवेोंदी अनेकता 
होनेके कारण यहाँ [ ^ते जायन्ते 
इत्यादि रूपसे ] बहुवचनकषा निर्देश 
किया गया है; इससे पहले मेष 
आदिमे एकष्पं होनेके कारण 
एकवचन निर्दे हुमा दै । 


वरयो्रि वषकिी धाराओद्वारा गिरे 
हुए जीवक पर्वततट दुगं, नदी, 
समुद्र, क्न॒ एवं सरुस्थल आदि 
सहस्तो स्थान है, अतः इन सव 
कारणोंसे उनका यह दुर्निष्परपतर्‌-- 
दुर्निष्कमण अर्थात्‌ केष्टमय निःसरण 
हैक कि नरके प्वाहद्वारा गिरितट- 
से ङे जये जाति हए वे ( जीव ) 
नदीको प्रात होते दै जौर उससे 
समुद्रो; तथा उसके पवात्‌ मक 
रादिसे खाये नाते हँ जर वे भी 
दूषरोसे भक्षित होते हैँ । तथा वहाँ 
समुद्रम दी यदि मकरके साथ ीन 
हो गये तो समुद्रके जरके साथ 
म्ोसे आकर्षित होकर फिर वर्षाकी 
धाराोंद्ारा मसमूमि, रिलातट 
अथवा अगम्य स्थानों गिरकर प 
रहते हे; कभी सर्पं एवं मृगादि 
पोख्यि जाते ह अथवा अन्ध 


ण्ड १० ] 

[० ऽप्यन्यैरित्येवं ० 
भक्षिताधान्येः; वेऽप्यन्येरित्येवं- 
प्रकाराः परिवर्तेरन्‌, कदाचिद्‌- 
भश्येषु जातास्तत्रेव शुष्येरन्‌; 
भश्येष्वपि स्थावरेषु जातानां 


रेतःसिण्देदसंबन्धो दुम एव, 


बहुत्वात्स्थावराणाम्‌ इत्यतो 
दरनिष्कमजत्वमर । 


बादुदुनिष्पतरं दुर्निगंमतरम्‌ । 
दर्निष्प्रपतरभिति तकार शको 
लुपो द्रटव्यः । बीहियवादिभाबो 
दुरनिष्प्रपतस्तस्मादपि दुनिषर- 
पताद्रेतःसिग्देदसंबन्धो दुनिष्प्- 
पततर इत्यर्थः; यस्माद्‌ स्व॑रेतो- 
भिर्बालः पुस्त्वरषटितैः स्थविरेवा 
क्षिता अन्तराले शीर्यन्ते, 
अनेकत्वादन्नादानाम्‌ । कदाचि- 
त्काक्तालीयब्स्या रेतःसिभिमि- 


श्ाङ्करभाग्याथं ५२३ 


जीरवोद्रारा भक्षित होति हँ ओरवे भी 
किन्ही अन्य जीवद्वारा खा स्यि जाते 
है [ इख प्रकार वे अनुशयी ीव 
परिवर्तित होते रहते हँ ] । कभी 
अभक्ष्य उतन्न होनेपर वे वह 
सुख जातं हे ॐ क्षयम मो स्थावरो- 
मै उन्न हुए जीरको वीर्यसेचन 
करनेवाले शरीरषा षम्बन्ध पराप्त होना 
तो कठिन ही है, क्योकि स्थावरोकी 
संख्या बहुत है । इल्यि अनुशयी 
जवक्ठा निष्कमण दुःखमब ही हे । 


अथवा यो समलो किइस त्रीहि- 
यवादिमावसे जौवकां दुटकारा हना 
बहुत कठिन है । दुरनिष््पतम्‌! 
इस पद्म एक तकार ठत समञ्चना 
चाहिये । अतः त्ययं यह है कि 
्रीहियवादिमाव दुर्ष्पिपत है ओर 
उस दुनिष्पपतसे भी वीयं सेचन ९रने- 
वलि श्रीरा सम्बन्ध दुर्निष्प्रपततर 
है, क्योकि अन्न भक्षण करनेवाले 
अनेक होमके कारण उर्वरेता, 
बाख्क, नपुंसक अथवा वृद्ध पुरस्मी- 
द्वारा खाये जनेपर वे पेटके भीतर ही 
नष्ट हो जते हैँ ।# जिस समय काङू- 
तालीयन्यायसे वे कभी वीर्यसेचन 
करनेवाले पृर्षोद्ारा भक्त स्रि 


® इन दोनों स्थानोंपर जो जीवके सूखने ओर नष्ट होनेकी बात कही 
है, बह वैराग्यद्रदिके उदर्यसे स्वर्मावरोश्णकी अतिशय दुःखरूपता श्रदश्चित 


कृरनेके लियि है । 


९९२७ 


छाग्दोग्योयनिषष्‌ 


[ खण्वाव ५ ्‌ 


अंश्यन्ते यदा, तदा रेतःसि- 
ग्मावं गतानां कर्म॑णो इत्ति- 
कामः | 
कथम्‌ १ यो यो दयन्नमत्य- 
दुशयिमिः संक्लिष्टं रेतःसिक्‌ , 
यश्च रेतः सिश्व्युतुकाले योपिति 
तद्भय एवतदाकृतिरेव भवति; 
तद्वयवाङृतिभूयस्त्व भूय 
इत्युच्यते, रेतोख्पेण योषितो 
गर्भाशयेऽन्तःप्रविष्टोऽनुञ्यी रेषसो 
रेतःसिगाडृतिभावितत्वात्‌, 
` (मयोश्गम्यसतेजः संभूतम्‌” 
(ए०उ०४।१) इति दहि 
शरुत्यन्तरात्‌ । अतो रेतःसिगा- 
तिरेव भवतीव्यथः । तथा 
दि-पुरुपातपुरुपो जायते मोर्गबा- 
कृतिरेव न जात्यन्तराक्रतिः, 
तस्मादयुक्तं तद्भय एव भवतीति । 


जाते दहै उसी समय वीर्यसेचक- 
रूपताको प्राप्त हए उन जीर्वोको 
कर्मो वृत्तिका रभ होता है । 
किस्त प्रकार्‌ वृत्तिम होता 
हे --जो-नो वीर्यसेचक्‌ अनुदेयी 
सीसे युक्त अन्न भक्षण करता है 
जोर फिर ऋतुकारमे सीमे वीरय 
सेचन करता है वह जीव तदय 
अर्थात्‌ उसीके आकारका हो जाता 


। दै । उसके अवयवो आकृतिकी 


अधिकता होना (भूयः रेसा का 
जाता है। इस प्रकार वीर्यरूपसे 
खीके गर्मा्यमें प्रविष्ट हुमा जीव 
तद्य हो जाता हैः क्योकि 
वीय वीर्यसेचन करनेवाटेकी 
आङृतिसे भावित होता दै,नैषा $ 
“वीयं पुरुपके सम्पूणं अङ्गोसे उलन 
हुआ तेज होता दै” इष अन्य 
रुतिसे प्रमाणित होता है । इष 
स्थि तापय यह दहै कि वह वीयं 
सेचन करनेवालेकी दी आङ्ृतका 
हो जाता है । इसीसे पुरुषसे पूरुष 
ओर वैरुसे वेरुके आकारवाखा दी 
प्राणी होता दै, अन्य जाती 
आङ्कतिवाख नहीं होता । अतः 
वह्‌ "तद्भय! दी होता है-- य 
कथन ठीक ही है । 


ण्ड १० ] 
ये त्वन्येऽनुशयिभ्यश्वनद्र- 
मण्डरमनारुचेहैवपापकममिर्षो 


` रैत्रीहियवादिभावं प्रतिषयन्ते, न 


पुनभ॑नुष्यादिभावय्‌, तेषां नालु- 
शयिनामिब । दुर्निष्प्रपतरम्‌ । 
कस्मात्‌ १ कर्मणा तेत्रीहिय- 
वादिदेह उपात्त इति तदुषभोग- 
निमित्तक्षये वरीद्यादिस्तम्बदेह- 
विनाशे यथाकमाजितं देदान्तरं 
नवं नवं जलूक्ावत्संकरमन्ते 
सविज्ञाना एव; (“सविज्ञानो 
भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रा- 
मति" (बृ° उ० ४।४।२) 
इति भरुत्यन्तरात्‌ । यद्यप्युपसंहु 
तकरणाः सन्तो देदान्तरं 


गच्छन्ति तथापि स्वप्नवदेहान्तर 
परा्तिनिमित्तकमोद्धावितवासना- 


छाद्र्माष्याथ ८२९ 
कक क कक 5 > क ॐ क = क >. = = 3 > 


कितु जो घनुशयी जीरवोसे भिन्न 
प्राणी भपने घोर पापक्मेकि कारण 
चन्द्रमण्डल्पर भारूढ हुए बिना ही 
व्रीहियवादि मावको प्रप्र होते है, 
मनुष्यादि भावको प्राप्त नहीं होते, 
उनका ब्रीहि-यवादि भावसे निष्कमण 
होना बहुत कष्टमद नहीं ्ै । क्यो 
नहीं षै १ क्योकि उरन्दोनि कर्मके 
कारण ही ब्रीहि-यवादि देह पराप्त किया 
है; अतः उस उपमोगके निमित्तका 
क्षय होनेपर त्रीहि भादि स्तम्बदेहका 
नाच हो जानेके कारण वे जान-वूञ्षकर 
एकं तिनकेसे दुसरे तिनकेप जने- 
वारी जोकके समान अपने कर्मानुसार 
उपार्जित अन्य नवीन-नवीन शरीरमे 
विज्ञानयुक्त रहकर ही संक्रमण करते 
है; लसा कि “वह सविज्ञान 
होता ै ओर सविज्ञान रहता 
हा हौ अन्य शरीरे संकमण 
करता हे" इस अन्य श्रुतिसे भी सिद्ध 
होता है । ययपि जीव इन्द्र्योका उप- 
संहार (हृदयम ख्य) हो ननेपर ही 
देहान्तरे जते दै, तथापि इस श्रुति- 
प्रमाणसे वे स्वप्नके समान देहान्तरी 
्रा्िके निमित्तमृत कर्मसे उत्पतन द॑ 


ज्ञानेन सविज्ञाना एव देहान्तरं | हुई बासनाके विजञासे सविज्ञ हप 


गच्छन्ति, भरतिप्रामाण्यात्‌ । 


ही देदान्तरको माप्त होते है । 


प्रद 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ बष्याय ५ 


~ 9 99 6 ~ 9 1 < 3 > 39 8 ~ 


तथाचिरादिना धूमादिना 
च गमनं स्वभ्र इवोद्धुतवि- 


चानेन, रग्धवृत्तिकम॑निमि- 


त्तरवाद्रमनस्य । न तथानुक्ष- 
यिनां व्रीद्यादिभावेन जातानां 
सविज्ञानमेव रेतःसिग्योषिदेद- 
संबन्ध उपपद्यते, न हि वरीद्या- 


दिखवनकण्डनपेषणादो च सवि- 
जानानां स्थितिरस्ति । 


ननु चन्द्रमण्डलादप्यवरोइतां 
दशपूतादि- देहान्तरगमनस्य तु- 

कग्षगतेडु.स्वस्प- ल्यत्वाजलकावतस 
व्वाच्छाख्रानय- विज्ञानतैव युक्ता 
क्यभिव्यक्षेपः तथा सति घोरो 
नरकानुमव इष्टापूर्तादिकारिणां 
चन्द्रमण्डलादारमभ्य प्राप्नो याव- 
दुव्राह्मणादिजन्म; तथा च सत्य- 

` नर्थायेव्पूरताद्युपासनं विहितं 
स्यात्‌; श्रतेशवाप्रामाण्यं प्राप्म 
वैदिकानां कमणामनर्थालु बन्धि- 
त्वात्‌ । 


इसी प्रर उपासकोका अर्चि आदि 
माग॑से ओर सकाम कर्मियोका घूम 


आदिमारगसे जो गमन होता दै वह 
भी स्वप्रके समान उद्भूतवासना- 
सकविज्ञानसे सविज्ञान हुए नीर्वो- 
काही होता दै; क्योकि वह गमन 
न्धन्ति ८ अपना फर देनेके लिय 
उन्मुख ) क्के कारण होता है । 
कितु त्रीहि यवादिषरूपसे उपपन्न हुए 
अनुशयी जीरवोका जो वीरयका 
आधान करनेवाले पुरुष अथवा स्लीके 
दहसे सम्बन्ध होता है वह उनके 
सविज्ञान रहते हुए ही हो, यह सम्भव 
नहीं है;क्योज्गि वीहि आदिके काटने, 
कटने अथवा पीसनेमे सविज्ञान 
जीवको स्थिति नही रह सक्ती । 

शङ्का - चन्द्रमण्डले उतरनेवारे 
लीरवोका देहान्तरगमन भी वेसा ही 
होनेके कारण उनकी भी कके 
समान सविज्ञानता ही माननी उचित 
हे। पसा होनेपर इष्ट-पूतं भादि 
कमै करनेवारलोको चन्द्रमण्रते 
टेकर जबतक बाक्षणादिजन्मकौ 
पराप्ति होगी तबतक घोर . नरका 
अनुमव होना सिद्ध होगा । री 
अवस्थामे इष्टूत्तं आदि उपासना 
अनथके ज्यि दी विहित मानी 
जायगी ओर इस प्रकार वैदिक 
कमेके अनर्थकारी होनेके कारण 
श्रुतिकी अप्रामाणिकता सिद्ध होगी। 


हण्ड १०] 


शाङ्करभाष्याथ 


५२७ 


क क क 3 क क न न = क क य = 4 


न्‌, वृक्षारोहणपतनवदिशेष- 
संभवात्‌ । देहादेहा- 


प्रतिपित्सोः 


आश्षेप- 

न्तरं 
परिहारः 

¢ ~ 
कमणो छन्धष्त्तित्वा- 
भ (~~ (~ 

त्कमेणोद्धावितेन विज्ञानेन 
सविज्ञानतवं युक्तम्‌ । वृक्षाग्रमा- 
रोहत इव फलं जिघृक्षोः, तथा- 
चिरादिना गच्छतां सविज्ञानत्व 
मवेत्‌; धूमादिना च चन्दरमण्ड- 
लमारुरुक्षताम्‌ । न तथा चन्द्र 
मण्डरादवरुरुक्षतां बृक्षाग्रादिव 
पततां सचेतनत्वम्‌ । 


यथाच ुद्ररा्यभिहतानां 
तदभिघातवेदनानिमित्तसंमूच्छि- 


तग्रतिबद्धकरणानां स्वदेहेनैव 


देशादेशान्तरं नीयमानानां 


विज्ञानशन्यता दृष्टा, तथा चन्द्र- 
मण्डलान्मालुषादिदेदान्तरं प्र्य- 


समाधान-फेसी बात नदी दै, 
कर्योफि वृष्षपर चद़ने ओर उससे 
गिरनेके समान इन अवस्था्भोमिं 
अन्तर्‌ रहना सम्भव है । एक देहसे 
दूसरे देहो पराप्त करानेकौ इच्छा- 
वले कमं रुञ्धवृत्ति होनेके कारण 
उन कमेदवारा उन्न कयि हए 
विज्ञानसे उस जीवा सविज्ञान 
रहना उचित है । फर लेनेकी 
इच्छासे वृक्षपर चदनेवाे मनुष्यकी 
निस प्रकार सविज्ञानता सम्भव हे, 
इशी प्रकार अर्चिरादि मागंसे जाने- 
वारे तथा धूमादि माग॑से चन्द्र 
मण्डलपर आरूढ होनेवाले जीवोकौ 
भी सविज्ञानता सम्भव हे । रितु 
इसी तरह वृक्षप्रसे गिरनेवाे 
पुरुषोकि खमान चन्दरमणडरसे गिरने- 
वार्छोकी सचेतनता सम्भव नहीं है। 

जिस प्रकार छि सुदगरादिसे आहत 
पुरुष जिनकी सम्पूणं इन्द्रियां उनके 
आघातोकी वेदनाके कारण मूच्छित 
अथवा प्रतिबद्ध (कुण्ठित) हो गयी है, 
अपने देहसे ही एक स्थाने दुसरे 
स्थानपर छे जाते समय विज्ञान 
शूत्य ८ अचेत ) देखे मये दै, 
उसी प्रकार स्वर्गभोगके निमित्त 
मूत कर्मोका क्षय हो नानेसे 
जिनके जटीय शरीर नष्ट हो गये 


८५२८ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ ख्याय ५ 


वरुरक्षतां 


स्व्गभोगनिमित्त- | है तथा सम्पूणं इन्दियाँ अवहद्‌ हो 


गयी है उन चन्द्रमण्लुपे मनुष्यादि 


५ ४ [> 9 
कम॑क्षयान्प्रदितान्देहानां प्रति- | देहान्तरे रति गिरमेव अनुराथी 


वद्धकरणानाम्‌ । अतस्तेऽपरि- 
सयक्तदेदमीजभूताभिरद्धिमू चिता 
इवाकाशादिक्रमेणेमामवरद्य 
कमनिमित्तजातिस्थावष्देहैः 
सं्िष्यन्ते । प्रतिबद्ध करणतया- 


जुद्धतविन्ञाना एव । 
तथा छ्वनकण्डनपेषणसं- 


स्कारभक्षणरसादिपरिणामरेतः - 
सेककारेषु मूखितिवदेव, देडा- 
न्तरारम्मकस्य कर्मणोऽरब्धवर- 
ततित्वात्‌ । देदबीजभूताप्संबन्धा- 
परित्यागेनैव सर्वास्ववस्थास 


तन्त इत जलकावचेतनावखं 


न विरुभ्यते । अन्तराले त्ववि- 


ज्ञानं मूछितवदेवेत्यदोषः । 





जीरवोँकी [ विज्ञ(नशुर्यता उचित ही 
ष ] । अतः देहके बीनभूत जर्के 
परियक्त न होनेसे वे उसके सहित 
ही मूच्छित हुएके समान भकाशा- 
दिक्रमसे इस्त प्रथिवी उतरकर 
अपने कर्मानुपार नातिवाटे स्थाव्‌- 
शरीरम मिरु नतेहै ओर इन्दर्योकि 
प्रतिबद्ध रहनेके कारण अनुदधूतविज्ञान 
( अचेत) ही रहते दै । 


इसी प्रकार वे काटने, कूटे 
पीसने, पकाने, खाने, रसादिरूपमे 
परिणत होने ओर वीर्थसेचनके 
समय भी मूर्च्छिते ही रहते दै 
क्योकि उनका देहान्तरका सभारम्भ 
करनेवाखा कमं अरन्धनरृत्ति रहता 
है । वे समस्त अवस्थाभमिं देहके 


। बीनमूत जलो सम्बन्ध न छोडते 


हुए ही विमान रहते दै, अतः 
जोकके समान उनके चेतनायुक्त 
होनेमे भी कोई विरोध नदीं जता । 
बीचमें जो विज्ञानशूलय दशा रहती 


हे वह मूच्छितके समान दै; इस 
स्यि उसमे कोई दोष नदीं हे । 


खण्ड १० ] शाहूर्माष्याथे ५२९ 
9८ >9८ €< < >< अ > < ८ अ > < 9८ 9 2: 8 6८ ८ ¬ > 


न च वैदिकानां कमणां ्िसायुक्तस्वेनोमयहैतुत्वं छक्य- 
मनुमातम्‌, हिंसायाः शा्नचोदितत्वात्‌ “अर्दिसन्सवेभूतान्यन्यत् 
तीर्थेभ्यः” इति श्रतेः शाञ्लचोदिताया दिखाया नाधमंहतुखम्धुप 
गस्यते । अम्युपगतेऽप्यधमेदेतुत्वे मन्त्ैविंषादिवत्तदपनयोप- 
पत्ते दःखका्यरिम्भकत्वोपपत्तिवेदिकानां कमणां मन्त्रेणेव 
विषभ॑क्षणस्येति ॥ ६ ॥ 


अनुशयी जीवोक्ी कमवप गति 


तय इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रम 
णीयां योनिमापयेरन्त्राह्यणयोनि वा क्षद्रिययोनि वा 
वैदययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याश ह चत्त 
कप्रयां योनिमापयेरऽश्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा 
चण्डाख्योनि वा ॥ ७ ॥ 
उन ( अनुशी नी ) म जो शच्छै आचरणवलि होते दै व 
्चीघ्र ही उत्तम योनिको प्राप्त होते है । वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि 
अथवा वैदययोनि पराप्त करते है तथा जो अश्म आचरणवले होते है 


वे तत्का अञ्ुम योनिको प्रा होते है । वे कुततेकी योनि, सुकरयोनि 
अथवा चाण्डाख्योनि प्राप्त करते हें ॥ ७ ॥ 


५६० 


छाल्दोष्योनिवद्‌ 


[ खल्याय ध्‌ 


~ 9 38८ 3 2-8-89 8८ 8: 9: >9--8 > 6८-98-8८ > 5 2--->8--- 


तत्तत्र तेष्वनुश्चयिनां य द 
लोके रमणीयं श्रोभनं चरणं 
श्रीं येषां ते रमणीयचरणा 
रमणीयचरणेनोपलक्षितः शोभ- 
नोऽनुशचयः पुण्यं कमं येषां ते 
रमणीयचरणा उच्यन्ते। कोर्या- 
नृतमायावर्जितानां हि शक्य 
उपलक्षयितुं शुभावुश्यसद्धावः। 
तेनालशयेन पुण्येन कर्मणा 
चन्द्रमण्डले शुक्तशेषेणाभ्याशो 
ह क्षिप्रमेव, यदितिकरियाविशे- 
षणम्‌, ते रमणीयां कौर्यादि- 
वजितां योनिमापदयरन्पराप्लु- 
युत्राह्मणयोनि वा क्षत्रिय 
योनिं वा वैश्ययोनिं बा स्व- 


कर्मानु [लु स्पेन 1 


अथ पुनय तद्विपरीताः कष्‌ 
यचरणोपरक्षितकर्माणोऽशुभालु- 
शया अभ्याशो ह यत्ते कश्यं 
यथाकमं योनिमाप्चेरन्कपूया- 
मेव धमंसंबन्धवर्जितां जुगुप्सितां 
योनिमापचेरज्धयोनि वा 


तत्‌-वहँ उन॒ सनुश्चयी जीवेम 
जिनका इस्त लोकम रमणीय~्ुभ 
चरण-शीरू होता है वे श्ुदधाचारी 
जीव --जिनकछा रसणीयचरणसे 
उपरक्षित श्युभ अनुराय यानी पुण्य- 
क्म॑होता है-वे रमणीयचरण 
कहलाते दै । जो छोग कररता, 
असय जोर कपटसे रदित है उन्दीमिं 
शुभानुशयकी सता' देखी जा 
सकती दै । चन्दरमण्डलके 
भोगसे बचे हुए उस पुण्य अनुशय 
यानी क्से बे अभ्याञ्च--श्ीघ्रदही 
रमणीय--क्रुरता आदिसे रहित 
योनिको प्राप्त होते है । हँ “यत्‌ 
शब्द ॒क्रियाविरोषण है । अपने 
करमोके अनुसार बे बाह्मषणयोनि, 
कषत्रिययोनि अथवा वैहययोनिको 
प्रा करते है । 


कितु उनसे विपरीत जो कपूय- 
चरणसे उपलक्षित कर्मवले अर्थात्‌ 
अशुभ अनुशायवले होते है वे दरीघर 
ही अपने कमना कपययोनिको 
पराप्त होते हे । कपूय-- पर्मसम्बन्ध 
से रहित अर्थात्‌ निन्दनीय योनिकषो 
दीप्र होते है। वे भी भपने 


ण्ड १० ] 


शाङ्ुरमव्याथ 


` भट 


> > ८ 3 9 9 9 9 8-9-89. 9 


ष्रकरयोनि वा 
योनिं वा 


णेव ॥ ७॥ 


चाण्डाल- | क्कि ही शनुसार कुततेकी योनि, 
स्वकर्मालुरूपे- | सूकरयोनि अथवा चाण्डाख्योनि 


्रा् करते हैँ ॥ ७ ॥ 





चतुथं परस्नका उत्तर 


( यश्ाल्नीय प्व चिवारोकी गति } 


ये तु रमणीयचरणा दिजा- 


तयस्ते स्वकर्मस्थाश्ेदिशदिका- 
रिणस्ते धूमादिगत्या गच्छ- 
न्त्यागच्छन्ति च पुनः पुनर्ष- 


कितु नो शुभाचरणशीक 
द्विजाति है वे यदि अपने करमेमिं 
स्थित रहकर इष्टादि क्म करनेवले 
होते है तो घटीयन्त्रके समान 
धूमादि मागसे पुनः-पुनः आते-नाते 
रहते हँ ओर यदि उन्द [उपासना- 
त्क] विधाकी प्राप्ति हो जाती हे 


टीयन््रवत्‌ ५ विधां चेत्माप्लु- | तो अर्चि भादि मागि जते है । 
युस्तदाचिरादिना गच्छन्ति । यद्‌ा| भौर निश्च समय वे न तो उपाषना 

विद्यसे . | करनेवले होते हँ भौर न इष्टादि 
तु ९ बिद्यारेविनो नापीष्टा कर्मोक्चा ही सेवन करते ह उस 
दिकमं सेवन्ते तदा-- समय-- 

अथेतयोः पथोन कतरेण च न तानीमानि कषुदरा- 
ण्यसङ्ृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व भ्रियस्वेत्ये- 
तत्ततीयशस्थानं तेनासौ लोको न सम्प्रूयते तस्माञ्जु- 
य॒प्सेत तदेष शछोकः ॥ < ॥ 

इनमेसे किसो मर्गदरारा नही नाते । वे ये ्षुद्र भौर बारम्बार 

अनि-नानेवाटे प्राणी होते है । “उदन्न हभ भौर भरो" यही उनका 
तृतीय स्थान होता है । इसी कारण यह परलोक नही भरता । अतः 
[इस संसारगतिसे] धृणा करनी चाहिये । इस विषयमे यह मन्त्र है-॥८॥ 


५६२ छान्दोग्योपनिषद्‌ 


अथेतयोः पथोयंथोक्तयोर- ¦ 
चिधृमादिलक्षणयोनं कतरेण 
अन्यतरेण च नापियन्ति । 
तानीमानि भूतानि राणि 
दंशमश्चककीटादीन्यसषृदावतीनि 
भवन्ति । अत उभयमार्भपरि- 
भ्रष्टा द्यसकृज्जायन्ते भ्रियन्ते 
चेत्यथंः । तेषां जननमरण- 
सन्ततेरनुकरणमिदगुच्यते । 
जायस्व म्रियस्वेतीश्वरनिमित्त- 
चेष्टोच्यते | जननमरणक्षणेनैव 
काल्यापना भवति, न तु 
क्रियासु शोभनेषु भोगेषु वा 
कारोऽस्तीत्यर्थः । 

एतत्ुद्रजन्तुलक्षणं ठतीयं 
पूर्वोक्तो पन्थानावपेक्ष्य स्थान्‌ | 
ससरत, येनैवं दक्षिणमार्गगा 
अपि पुनरागच्छन्ति, अनधि- 
कृतानां ज्ञानकमंणोरगमनमेष 


दक्षिणेन पथेति, तेनासौ रोको 
न सम्पूर्यते । 


“ # तात्य यह है कि उन जं 


[ अध्याय ५ 


>< >>> <> 
वे इन पूर्वोक्त अचि दि शै 
धूमादि मागेमिसे किसी भी एके 
द्वारा नहीं जाते । वे ये क्षुद्र रषी 
ठास, मच्छर ओौर कीड़े दि 
बारम्बार भाने-बनेवे जीव होते 
है । घतः तात्पयं यह ै कि वेहून 
दोना ही म्गेसि परिभिष्ट होक 
बारम्बार जन्भते-मरते रहते है | 
यह उनके जन्म-मरणकी भविच्छिन्न 
परम्पराक्ा अनुकरण कहा जाता दै; 
'जन्म रो ओर मरो' यह दैधर- 
सम्बन्धी चेष्टा बतलयी जाती दहै 
अर्थात्‌ उनका समय जन्म लेने ओर 
मरनेमे ही जातादहै, कमं करने 
अथवा सुन्द्र भोग भोगनेके शवे 
उन्दँ भवका ही नहीं मिस्ता | 
जन्म-मरण-परम्परामे पड़ हए 
डीवका पहले दो मार्गोकी भकष 


(| 


यह्‌ दर जीवरूप तीरा स्थान है। 
क्योकि इस प्रकार दक्षिणमरगगामी ' 


लोट अति टै तथा ज्ञान भर 


कर्मके अनधिकारिोका तो दक्षिणः 
मासे वर्ह जाना भी नहीं होत, 
इसक्यि यह परलोक नहीं मरता । 





ीवोको दोनों 


खच्छ १० ] 


शा ह्ुरमाष्वाथं 


५३१ 


8-96-58 ~ >> >< >9: ऋ: > 90 ~ >> > > >~ -  < 


पश्चमस्तु ब्र्नः पञ्चात्नि- 


[ उपयुक्त प्रदनरमेसे ] पोच 
प्ररनक्षो ग्याए्या पश्च ग्निविद्याद्रारा फी 


विच्या व्याख्यातः । प्रथमो | गयी; प्रथम प्रदनका अपाकरण दर्षिण 


दक्षिणोत्तरमागोभ्यामपाकृतः । | 
दक्षिणोत्तरयोः पथोर्व्यावतं- 
नापि-मृतानामग्नो प्रक्षेपः 
समानः, दतो व्यावर्तना, | 


अन्येऽचिरादिना यन्ति, अन्ये ¦ 





धूमादिना, पुनरुततरदश्षिणायने 
षण्मासान्प्राप्लुवन्तः संयुज्य 
पनर््यावतेन्ते, अन्ये संवत्सर- 
मन्ये मासेभ्यः पिरलोकम्‌-- 
इतिं व्याख्याता । पुनराशृतति- 
रपि क्षीणानुशयानां चन्द्रमण्ड- 
लादाकाशादिक्रमेणोक्ता । 
अभरुष्य लोकस्यापूरणं स्वशन्दे- 
नैवोक्तम्‌, तेनासौ रोको न | 
सम्पूयंत इति । 

यस्मादेवं कष्टा संसारगति- 


स्तस्माज्जगुप्सेत । यस्माच्च 


एवं उ्तरमार्भके वणंनसे क्रिया गया। 
तथा-मरे हुए उपासक शौर कमठ 
इनको भग्निमे डालना एक समान्‌ 
होता दै, वहे भागे उनकं वियोग 
होता है, उनमेसे एक अचि भादि 
मार्मसे जते है भोर दुसरे 


। धूमादि मार्गसे; र उत्तरायण सर 


दक्षिणायन--इन छः-छः मासो 
पाप होर वे एक वार मिख्कर 
फिर बिल जाते दँ । उनसे एक 
तो संबसरको प्राप्त होते दै ओर 
दूसरे मास्ामिभानी देक्ताओसि पितर 
लोको जाते है- इस प्रकार दक्षिण 
ओर उत्तर मार्गोकी व्यावर्तना-- 
व्यावृत्तिकी सी व्याख्या की गयी । 
जिनका अनुशय ( करम ) क्षीणो , 
गया है, उन जीरवोकी चन्द्रमण्डलसे 
आकाशादि क्रमसे पुनरावृ्ि भी 
बतला दी गयी । इस परलोककौ 
अपूर्तिका ठो तेनासौ रोको न 
सम्ूरयते' पसे प्रयक्ष॒शब्दसि ही 
उ्टेख कर दिया गया । 

क्योकि इस प्रकार संसारगति 
अलन्त कष्टमयौ रै, इसय्यि उषसे 
घणा करनी चादिये । र्याकि 


५३७ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ मष्याय ५ 


96 86 8 ¬< ~ -- 9 ~ ~ ~ 9 9 >. 29 --- >< ऋऋ 


जन्ममरणजनितवेदनानुभवकृत- 
क्षणाः शुद्रजन्तवो ध्वान्ते च 
घोरे दुस्तरे प्रषेशिताः सागर 
हवागाधेऽ्प्छवे निराचाथोत्तरणं 
प्रति; तस्माच्चैवंविधां संसार- 
गतिं जुगुप्सेत बीभत्सेत घृणी 
भवेत्‌, मा भूदेवंविधे संसार- 
महोदधो घोरे पात इति । 
तदेतस्मिनथं एष शोकः पश्वा- 
प्रिविद्यास्तुतये ॥ ८ ॥ 


जन्म-मरणसे होनेवारी वेदक 
अनुभवमे ही जिनका समय जाता 
है वे कद्र जीव नौकाहीन गाध 
सागरके समान, जिसे पार रने 
वे निराश रहते रै, जति दुस्तर घोर 
अज्ञानान्धकारम प्रविष्ट कर दिये 
जाते है; इसख्यि इस प्रकारक 
संसारगतिमे जुगुप्सा--वीभत्सा 
अर्थात्‌ घणा करनी चाद्ये कि इस 
परारके घोर संसार महापतागरमे 
हमारा पतन न हो । उसी अर्भे 
पश्चाग्निविद्याकी स्तुतिके स्यि यह 
मन्त्र है ॥ ८ ॥ 


पांच पतित 
स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिव युरोस्तल्पमावसन््- 
ह्महा चेते पतन्ति चतवारः पथमश्चाचरःस्तैरिति ॥९॥ 
घवणंका चोर, मघ पीनेवाल, गुरुखीगामी, नहाहत्यारा य चात 
पतित होते है जोर पचबँ उनके साथ संसर्गं करनेवाला भी ॥ ९ ॥ 


स्तेनो दिरण्यस्य ब्राह्मणसु- 
बणेस्य हर्ता। सुरां पिबन्त्राद्मणः 
सन्‌ । गुरोश्च तल्पं दारानाव- 
सन्‌ । बकषष्टा ब्राह्मणस्य हन्ता 
चेत्येते पतन्ति चत्वारः पृश्व- 


` मश्च तैः सदाचरन्निति ॥ ९ ॥ 


एुवर्णका चोर अर्थात्‌ ब्राह्मणका 
सोना चुरानेवाखा, ब्राह्मण होक 
मदिरा पीनेवाखा, गुरुके तदप यानी 
पतनीसे सहवास करनेवाला ओर 
रषषदा- ब्राह्मणी हत्या करनेवारा 
-ये चार पतित होते ह भौर 
पंचव उनके साथ आचरण 
( व्यवहार ) करनेवाला ॥ ९ ॥ 


==-2 ¬ 


शच्ड १० ] 


४ 
ज्ाद्धरमाव्याय 


५३५ 


~< > >< >< >< ८ >< 8 2 > > ~: ¬< ¬ ~ ~ ऋ ~ => 9-9८-8 
पश्चाग्निविद्याका महत 


अथ दह्‌ य एतानेवं 


पञचाग्नोन्वेद न सह्‌ तेर- 


प्याचरन्पाप्मना छिप्यते शुद्धः प्रतः पुण्यलोको 
भवति य एवं वेद्‌ य एवं वेद्‌ ॥ १० ॥ 


किन्तु जो इस प्रकार इन पञ्चाभियोको जानता है वह उनके साय 
आचरण ( संसर्गं ) रता हा भी पापसे र्पति नही होता । वह शुद्ध 
पवित्र छोर पुण्यलोका भागी होता है, नो इस प्रकार जानता दै, जो 


इस प्रकार जानता & ॥१०॥ 


अथ ह पुनर्यो यथोक्तान्प- | 


श्वा्ीन्वेद, स तैरप्याचरन्मष्ा- 
पातकिभिः सष न पाप्मना 
किप्यते, शुद्ध एव । तेन पश्चा- 
भरिदशेनेन पावितो यस्मातपूतः, 
पुण्यो लोकः प्राजापत्यादिरयस्य 
सोऽयं पुण्यलोको मवति । 
य एवं वेद यथोक्तं समस्तं 
पश्चभिः प्रभैः पृष्टम्थजातं वेद । 


दिरुक्तिःसमस्तप्रभनिणंयप्रद- | 


कितु जो उपयुक्त पश्चानिर्योको 
जानता है वह उन महापापियोके 
साथ आचरण ( व्यवहार ) करता 
हमा भी पापसे रिक्त नहीं होता, 
शुद्ध ही रहता दै; क्योकि उस 
पञ्चाग्निविद्यासे वह पवित्र हो नाता है 
इसलिये पण्यकोक- जिसे ब्रह्मलोक 
आदि पवित्र रकी प्राति होती है 
एसा पुण्यलोकं हो जाता दहै; जो 
किं इस प्रकार जानता है अर्थात्‌ 


! पच प्ररर्नोह्ारा पे हुए उपर्क्त 


समस्त॒विषयको जानता है । 
रुक्ति समस्त प्रहनोंका निर्णय 


नार्था ॥ १० ॥ ।प्रदर्धित कनेक स्थि हे ॥१०॥ 
<~ ॐटक- ् 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 


द्शमलण्डमाष्यं सम्पूर्णम्‌ ॥ १० ॥ 


--; ५ :-- 


एकादश रह 


------ 


दक्षिणेन पथा गच्छतामन्न- 
भाव उक्तः-- (तदेवानामन्नम्‌! 
ठं देवा भक्षयन्ति इति; चुर 
जन्तुलक्षभा च कष्टा संसार- 
गतिरुक्ता । तदुभयदोषपरि 
जिहीषया वैानरात्तमावभ्रति 
पर्यथसुत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते, 
अन्स्यन्न॒परयसषि प्रियम्‌" 


इत्यादिलिङ्गात्‌ । आख्यायिका 
तु सुखावबोधार्था विद्यासंप्रदा- 
नन्यायग्रद्चेनार्थां च । 


"वह देवेताओक्षा सन्न दै! देव- 
गण उसका भक्षण रते है रेषा 
कहकर दक्षिणमार्गते ननेवालके । 
अन्नमावका भतिपादन क्या गया 
तथा श्षुद्रजन्तुरूप सं्तारकी फष्टमथी 
गति भी बतलायी गयी । उन दोनो 
दोर्षोको त्यागनेकी इच्छसे वैधानर 
संज्ञक मोक्तुतवकी भ्रापिके लिये भागे- 
का म्रन्थ आरम्भ किया जाता दै- 
जेठा कि ` (तु मन्न भक्षण कत्ता दै, 
प्रियको देखता है इत्यादि लिङ्गे 
जाना जाता है । याँ जो भाष्या- 
यिका है वह सरलतासे समञ्ञानेके 
स्मि ओर विचाप्रदानकी उचित 
विषि प्रदर्यित करनेके ब्ि दै। 


जोपमन्यव आदिका आत्ममीमांसािषयक् श्रस्ताव 


पाचीनशारु ओपमन्यवः 


सत्ययज्ञः पोट्धषिरिन््र- 


धम्नो भाछ्वेयो जनः शारषराष्यो बुडिर आश्वतरा 


श्चिस्ते 
अकरः को 


उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल 
पा पुत्र इनद्रयुम्न, 


हैते महाशारा महाश्रोचरियाः समेत्य मीमाश्सा 
न आत्मा कि ब्रह्मेति ॥ १९ ॥ 


पुषका पुत्र सत्ययज्ञ, भल्रविके 


यकराक्षका पुत्र जन ओरं अश्चतर्‌श्वका पुत्र 


खण्ड १९ ] छाद्ल्वाष्या्यै ५६७ 


2-6८-9 6 4946 398 9 9-9-99 > 9 


बुदिर- ये महागृहस्य भौर प्रम श्रोत्रिय एकत्रित होकर परस्पर विचार 
करने लगे छि हमारा आसा कौन दै ओर ब्रहम क्या दै १॥ १ ॥ 
प्राचीनशाक इति नामत उप- | जो नामसे प्राचीनशार था वह 
अन्योरपत्यमौपमन्यवः । सत्य- | उपमन्युका पुत्र ओपमन्यव, पूष 
यत्नो नासतः पुटुषस्यापत्यं | का पुत्र पौटपि जो नामसे सत्ययज्ञ 


पोटुषिः । तथेन्द्र युम्नो नातो 
भल्लवेरपत्यं भाल्नविस्तस्यापत्यं 
भाद्लवेयः । जन इति नामतः 
शर्कराक्षस्यापत्यं शाकंराक््यः ] 
बुदिलो नामतसोऽशतराश्वस्या- 
पत्यमाश्वतराशिः । पश्चापिते 
हैते मष्ाश्राला महागृषस्था वि 


था, मट्रविके पुत्रको मार्कव कहते 
हे, उसका पुत्र भाररवेय जो नामसे 
इन्द्रयम्न था, जन रसे नामबारा 
शरवाराक्षकषा पुत्र श्चाकंराक्ष्य तजा 
बुटिकं नानकं सशतराश्चकां पुत्र 
आश्वतराशचि-ये पचो ही महा- 
शार- बड़ कुटुम्बी भर्थात्‌ विस्तृत 


स्तीर्णाभिः श्ाराभियुक्ताः संपना| शाख्भोसे युक्त तथा महाघ्रोत्रिय 
इत्यथः । महाश्रोत्रियाः भवा- | सर्थात्‌ श्रुत यानी श्नाप्ययन्‌ 
ष्ययनघरत्त संपन्ना इत्यथः । व | ओर सदाचारसे सम्पन्न थे । इघ 


एवंभूताः सन्तः समेत्य संभूय 
क्रचिन्मीमां सां विचारणां चक्रः 
कृतवन्त इत्यथः 

कथम्‌ १ को नोज्स्माक- 
मात्मा ? किं ब्रह्म ? इत्यात्म- 
ब्रह्शचब्दयोरितरेतरविशेषणविशे- 
ष्यत्वम्‌ । बरक्षत्यश्यात्मपरि 
च्छिन्मात्मानं निबतयत्या- 
त्मेति चात्मव्यतिरिक्तस्या 
दित्यादिब्रह्मण ` उपास्यतं 


प्रकारके वे सब किसी समय 
आपसे मिलकर मीमांसा अर्थात्‌ 
विचार करने रुगे । 

किस प्रकार विचार करने 
लगे हमारा भामा कौन दै 
ब्म क्या है ? यहाँ आत्मा नौर 
श्रह्मण श्दोका परस्पर विहोषण- 
विरोष्यभाव  । श्रक्ष' शस शब्दसे 
्रति देह-परिच्छिन्न आत्माके मरहणका 
निवारण करती है तथा “आत्मा, इस 
शब्दसे आमासे . भिन्न आदित्यादि 
ब्रह्मके उपास्यत्वकी निवृति करतो 


निवतेयति । अभेदेनात्मेव बरह्म हे। भतः दोर्नोका अभेद होनेके 


८६८ छान्दोन्योषनिचल्‌ [ बध्याय ५ 


र. 
बर्ेवास्मेलयवं स्वारा वैश्वानरो | दारण ासा ही ह है भोर रं 
बरह्म स आस्मेत्येतत्सिद्धं भवति! | दी आत्मा है;जतः सवासा धान्‌ 
(५ वी ना 
उ० ५।१२।२) (अन्धोऽभ- | हे # ध क मव 

विष्यः (५।१३।२) | गिर नाता “तू जन्धा हो जाता" 

इत्यादिलिङ्कात्‌ ॥ १ ॥ इत्यादि लि्गोसे जानी नातीदै#॥१॥ 


न 
जपमन्यवादिका उहालकके पास अना 
ते ह संपादया्कुरुदारको वे भगवन्तोऽयमारुणिः 
संभ्रतीममात्मानं केश्वानरमध्येति तरहन्ताभ्यागच्छा- 
मेति तरहाभ्याजम्मुः ॥ २ ॥ 


& आगे य दिखटाया गया है कि आरणिकरे सहित ओपमन्यवादि प 
मुनि राजा अश्वपतिके पास गये ओर उससे वैश्वानर आत्माका उपदेश करनेके 
लि प्राय॑ना कौ । तव अश्वपतिने उन्मेस प्रत्येकसे अरग-अलग यष प्रन किया 
कि तम किसे वैधानर ( विराद्‌ रुष ) समचचकर उपासना वरते हो १ इसपर 
ओपमन्यवने करा कि म युटोकको वैश्वानर खमशचता ह| तन अश्वपति बोला- 
यह्‌ वेदवानर शात्माका मस्तक दे । इसकी तुम समस्त वैशवानर-बुदधिसे उपाषना 
करते दो इर्ये ययपि तुम्हारे यज्ञ-यागादि-सम्बन्धी सामग्रीकी बहुकता है 
तथापि यदि मेरे पासन आते तो इस अन्यथाग्रहणके दोषसे ठम्हारा मस्तक 
गिर जाता । इसके पश्चात्‌ उसने सत्ययज्से पूछा तो बह बोला-- भे आदित्यको 
कन समहकर उपासना करता दरं इसपर अश्वपतिने कहा--'्ह उदा 
केवल नेत्र है; इसकी समस्त बुद्धिस उपासना करनेके कारण यद्यपि तम्हारे पास 
अनेक प्रकारकी सम्पत्ति दिखायी देती है तथापि यदि तुम मेरे पाड न अतितो 
अन्धे हो जाते ॥ इसी भकार अन्य मुनियोंसे भी पूजा गया ओर यह देखकर कि 
उनसे भ्रत्यक ही वैश्वानर आरमाके किसी-न-किसी अङ्खकी दी उपासना करता 

उसने उनकी व्यस्तोपासनाके परिणामे उनके उन्दी-उन्दीं अङ्गो भग होनेका 


या है किं भेदोपासनाम धरति 


भय प्रद्शित करती है; इसख्यि उसे आत्मा ओर ब्रहमका अभेद ह अभिमत रै। 


खण्ड ११ | 


& 
शाङ्कर्म्वाय ५३९. 
न 3 9 > 4 


उन पूननीर्योनि स्थिर किया कि यह भरुणका पुत्र उदारक इस 
समय इस वैश्वानर आस्माक्ो जानता है; अक्षः हम उसके पास चलं । 
रेखा निश्चय कर वे उद्टके पास आये ॥ २ ॥ 


ते इ मीभांसन्तोऽपि निश्वय- 


विचार करनेपर भी कोर निश्चय 


मलथमानाः संपादयाश्चकुः सं- | न॒ शोनेए॒ उन पूनावानोनि 


पादितबन्त आत्मन उपदेष्टा 
रम्‌ । उदाल्को वै प्रसिद्धो 
नासतो भगवन्तः पूजावन्तोऽय- 
भार्णिररूणस्यापत्यं संप्रति 
सम्यगिममात्मानं वैश्वानरम- 
स्मदमित्रेतम्येति स्मरति । 
तं हन्तेदानीं मभ्यागच्छामेत्येवं 
` निशित्य तं हाभ्ाजग्ुरगतव- 
` न्तस्तमारुणिकम्‌ ॥ २ ॥ 


सम्पादन किया--भपना उपदेशक 
स्थिर किया । [वे बोले-- ] “इस 
समय उदङ्क नामसे प्रसिद्ध यह 
अरुणका पत्र भरणि इस हमारे जमि- 
प्रेत वैश्वानर आत्मो भध्येति-- 
स्मरण रखता यानी जानता है । 
अच्छा तो, अब उसके पास चरे ।' 
इस प्रकार निश्वयकर्‌ वे उस 
आरुणिके पसर भये ॥ २ ॥ 


*०:-- 


उदालक्षका ओौपमन्यवादिके सहित अश्वपतिके पास आना 
स ह संपादयाकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महा- 
शाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सवंमिव भरतिपरस्ये 
हन्ताहमन्यमभ्यनुरासानीति ॥ ३ ॥ 
उसने निश्चय किया ये परम शोत्रिय महागृहस्थ सुञ्चसे प्रन 
करेगे, तु भ हन्द पूरी .तरहसे नदीं बतला सकरुणा अतः चै उन्द 


दूसरा उपदेष्टा बतला द ॥ ३ ॥ 
स ह तान्दृष्टैव तेषामागमन- 


प्रयोजनं बुद्ध्वा संपादया- 





न्द देखते ही उसने उनके आने- 


का प्रथोजन समक्षकर [चित्तम] स्थिर 


किया । किस प्रकार स्थिर किया ए 


श्चकार; कथम्‌ १ प्रक्ष्यन्ति मां | ये महागृहस्य ओर' परम भरोत्रि 
वैश्वानरमिमे महाशाखा महा- । सुससे वैधानरके विषयमे पूगे । 


४५६० छाम्बोन्योपनिवत्‌ [ बष्याब ५ 


्रोत्रियास्तेम्योऽहं न स्वमिव | रत भे इन्दं सनकीपूी हुई 
पूरी तर्द नहीं बतला सुकरा | 

= अतः म इस समय इन्हे के 
अतो हन्ताहमिदानीमन्यमेषाम- | उपदेदयके च्वि न ध 
भ्युश्ासानि वश्याम्युपदेष्टार- | ह अर्थात्‌ इन्द दूरा उपदेशक 
मिहि ॥ ३॥ बतरये देतारहै॥ ३॥ 


---‡ ©० ४- 


एवं संपाच- | रेसा निश्चय कर-- 
तान्होवाचाश्वपतिवें भगवन्तोऽयं कैकेयः संप्रती- 
ममात्मानं वेश्वानरमध्येति तरहन्ताभ्यागच्छामेति त 
हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥ 
उसने उनसे कशा--हे पूजनीयगण | इ समय केशयुमार 
जशवपति इस वेश्वानरसंञक भाताको भच्छी तरह जानता है । आदये, हम 
उसीके पास चरुं ॥ पेसा कहकर वे उसके पास चले गये ॥ ४ ॥ 
` तान्दोवाच--अश्वपतिव ना- | उसने उनसे कदा-£ 
मतो भगवन्तोऽ्यं केकयस्याप- | भगवन्‌ ! इस. समय केकयका प 
स्यं केकेयः संप्रति सम्यगिममा- | भश्वपति नामवाला कैकेय इस वैधा- 
त्मानं वेश्वानरमष्येतीत्यादि स- | नर आालाको अच्छी तरह समकषता 
मानम्‌ ॥ ४॥ । है" इत्यादि अर्थ पर्ववत्‌ है ॥ ४॥ 
-अ्थी्दृ०- 


अश्वपतिद्रारा मुनि्योका स्वागत 
तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः प्रथगरहाणि कारयाअकार स 
हं भ्रातः संजिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न 
कदटुर्यो न मव्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान्नस्वेरी स्वेरिणी 
यक्ष्यमाणो बे भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा 


षं प्रतिपत्स्ये वक्तुं नोत्सहे । 





ण्ड १९ | शाङ्करसाष्याथ ५४१ 
9-2-8८ 9-9-89 9 > > 9 ~ ~ 


ऋलिजे धनं -दास्याभि तावद्धगवद्भयो दास्यामि 
वसन्तु भगवन्त इति ॥ ५॥ 

अपने पास आये हुए उन ऋषिर्योका राजाने धर्ग-णरग सक्कार 
कराया [दूसरे दिन] सवेरे उठते ही सने कहा-- भरे राज्यम कोई 


चोर न्ह है तथा न मदाता, न मदय१, न अनाहितागि, न विद्वान्‌ जर 
न परल्ञीगामी ही है; किर कुल्टा ली तो आयी ही कहांसे ? हे पूज्यगण | 


मने भी यज्ञ करनेवाा है । म एक-एक श्छल्विकको जितना घन दूंगा 


उतना ही आपको भी दगा; अतः भापरोग यहो टहरिये' ॥ ५ ॥ 


तेभ्यो ह राजा प्राप्ेभ्यः 


पृथक्पृथगर्हाण्यहंणानि पुरोदि- 


तथैते कारयाश्चकार कारित- 
वान्‌ । स हान्येच्‌ राजा प्रातः 
संजिष्टान उवाच बिनयेनोपग- 
भ्येतद्धनं मत्त उपादष्वमिति । 
तैः प्रत्याख्यातो मयि दोषं 
परयन्ति नूनं यतो न प्रतिगू- 
हृन्ति मत्तो धनमिति मन्वान 
आत्मनः सद्वृत्ततां प्रतिपिषाद्‌- 
यिषन्नाह- न मे मम जनपदे 
स्तेनः प्रस्वष्टतां विद्यते । न 


कदर्योऽदाता सति विभवे । न 
मद्यपो दिजोत्तमः सन्‌ । नाना- 


अपने पास्च आये हुए उन 
ऋषियोँका राजाने पुरोहित ओर 
सेवकोसे अक्ग-ल्ग सत्कार 
कराया । दूसरे दिन राजनि प्रातः- 
काल उठते दी उनके पस जाकर 
विनयपूर्वक कहा-आपलोग समुञ्जसे 
यह्‌ धन म्रहण कीजिये । तब उनके 
निषेष करनेपर यह स्नोचकर कि 
निश्चय ही ये मुकषमे दोष देखते दै, 
क्योफि मुञ्चसे घन नहीं ठेते, अपने 
सदाचारका प्रतिपादन फरनेकी 
इच्छासे उसने कडा--भेरे राज्यम 
कोई चोर-दु्षरेका धन हरण 
करनेवाला नहीं है, न कोई कदय 
- सम्पत्ति रहते हए दान न 
करनेवाला दै, न कोई द्विनष्रष्ठ 
मदयपान करनेवाख है, न सौ 
गोर्ओवाला होकर अनाहिताम्नि दै 


दिताग्निः शतगुः । नाविद्वानधि- । न अपने धिकारके नुप कोट 


५७२ 


कारानुरूपम्‌ । न स्वैरी परदा- 
रेषु गन्ता। अत एव स्वैरिणी 
कुतो दु्चारिणी न संभव- 
तीत्यथः | 

तेश्च न॒ वयं धनेना्थिन 
इत्युक्त आहान्पं म्वेते धनं न 
गृहन्तीति । यक्ष्यमाणो वै कति- 
भिरहोभिरहं हे भगवन्तोऽस, 
तदथं क्लृप्तं धनं मया याबदे. 
केकस्मे यथोक्तमृखिजे धनं 
दास्यामि तावस्प्त्येकं भगव- 
द्भ्योऽपि दास्यामि । वसन्तु 
भगवन्तः परयन्त॒॒च मम 
यागम्‌ || ५॥ 


छाम्दोग्योवनिवद्‌ 
= > ध धः 


[ बध्वाय्‌ ५ 


= > 
अविद्वान्‌ है सौर न श्ोई सेरी 
परि्योकि प्रति गमन करेवा 
है; सतः स्वैरिणी भी कते हे 
सकती है ? अर्थात्‌ कोई दुराचारौ 
ली होनी भी सम्भव नही है ॥ 


फिर उनके यह कहनेपर ङि 
हम धनके अथीं नहीं है" यह 
समज्ञकर किं ये रोग थोड़ा मान 
कर धन नहीं ठेते, उसने कहा-ह 
पूज्यगण | कुछ दिनम म यज्ञ 
युष्ठान करनेवाला दह, उसके लिथि 
मेने घना संकृट्प कर दिया है । 
उस समय शाखाजञानुसार मे नितना- 
जितना धन॒ एक-एक ऋतिक 
दूंगा । उतना ही आप्मसे परेको 
भी दूंगा । अतः आपलोग यहीं ए- 
रिये लर मेशा॒यज्ञ देखिये" ॥५॥ 


~ 


अश्वरपतिके प्रति मुनियोकी प्राथंना 


इत्युक्ताः - 


इस प्रकार कहे जनेपर-- 


ते होन देवार्थेन पुरुषशवरेतशहेव वदेदात्मान. 
 मेवेमं वश्वानर<सं्र्यध्येषि तमेव नो बृहति ॥ ६ ॥ 


वे बोले--“निस प्रो 
करि जपते उसी प्रयोजनको 


जानते है, उसीका भाप हमारे परति 


जने कोर पुरुष कदी जाता दै उसे चादिये 
। इस समय आप वैरवानर आत्मको 
वणेन कीनिये ॥ ६ ॥ 


ग्ड ११] 


शाङ्करभाष्यं +| 


>9< >< >< >< > 9 > > 9 >< 9 9 >: > ¬. 8 < 9 ऋ ऋ 8 


ते दोचुः--येन 
प्रयोजनेन यं प्रति चरेदच्छेत्पुरु- 


र्षस्तं रैषाथं वदेत्‌, इदमेव 
प्रयोजनमासमनस्येत्ययं न्यायः 
सताम्‌ । वयं च वैश्वानरज्ाना- 
थिनः । आत्मानमेवेमं वैश्वानरं 


हैवार्थेन | 


वे बोरे-जिस अथं यानी 
प्रयोननसे कोई पुरुष किसीके पास 
जाय उसे अपना वह प्रयोजन 
बतख देना चाहिये कि भेरे आने- 
का केवरं यही प्रयोनन टै 
सदुर्पाका पेसा ही नियम हे।. 
हमलोग भी वैरवापरको जाननेकी 
इच्छावारे हैँ । इस समय आप इस 
वैरवानर आत्मको अच्छी तरह 


संप्रत्यध्येषि सम्यग्जानासि । नते 8 
अतस्तमेव नोऽस्मभ्यं ब्रूहि ।॥६&।| । वणेन कौनिये ॥ ६ ॥ 
राजाके प्रति मूनियोक्नी उपततत्ति 


इयक्तः-- 


इस प्रकार कटे नानेपर- 


तान्होवाच पातर्वः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समितपा- 
{नि न. न 
णयः पूर्वाह्न प्रतिचकमिरे तान्दालुपनीयंवतदु वाच ॥७॥ 
वह उनसे बोखा-“णच्छा, यै प्ातःकाक आपलोर्मोको इसका 


उत्तर दूगा ' तब दसरे दिन वे पूर्वाह्न हाथमे समिषा रकर राजाके 
पास गये । उनका उपनयन न करके ही रानाने उस विधाका उपदेश 


क्षिया ॥ ७ ॥ 
तान्दोवाच~-प्रातर्ो युष्मभ्यं 
प्रतिवक्तास्मि प्रतिवाक्यं दाता- 
स्मीत्युक्तास्ते ह॒ राज्ञोऽमिप्राय- 
ज्ञाः समित्पाणयः समिद्धारदस्ता 
अपरे्ुः पूर्वाह्ने राजानं प्रति- 
चक्रमिरे गतवन्तः। 


वह॒ उनसे बोल--भें आप. 
ोर्गोको इसका उच्चर प्रातःकार 
द्‌गा। इस प्रकार कहे जानेपर 
राजाके अभिप्रायक्रो जाननेवाले 
वे मुनिगण दूसरे दिन पूर्वाहमे 
समित्पाणि--हार्थोमें समिधाए' स्यि 
राजाके पास आये । 


प 


यतः एवं महाशाला महाश्रौ- 
त्रिया बराह्मणाः न्तो महा- 
शारुतबा्यभिमानं दिता समि- 
द्वारष्स्ता जातितो दीनं राजानं 
विद्याथिनो विनयेनोपजग्ु, 
तथान्येविचोपादित्सुभिभं वित- 
व्यम्‌ । तेभ्यशादाद्िद्यामनुप- 
नीयेबोपनयनमङरतवैव । तान्यथा 
योग्येभ्यो विद्यामदात्तथान्ये- 
नापि विद्या दातव्येत्याख्या- 
यिका्थः । एतद्ेधानरविजञान- 


युवाचेति वक्ष्यमाणेन संबन्धः 
! ७ ॥ 


छान्दोग्योपनिषह्‌ [ 


> ~ ~ 9 ~ 3 > ८-9८-८ ~ ८ ट ~ ट "ऋ ऋः 


मध्याय ५ 
ऋऋ ३ 
वथोकि इस पकार महागृहं 
ओर्‌ परम्रोतरिय ब्राहमण हेन्‌ 
मी वे महागृहस्थल आदिके मामि. 
मानक छोड़कर दाम परिषां 
ठे विदां बन भषनेसे होन नाति- 
वारे राजाके पाञ्च बिनयपूर्वक गमे धर 
इसलिये विघोपा्जमक़ी इच्छाव 
अन्य पुरर्षोछो भी प्सा हीहोना 
चाहिये । तब राजाने उनका उप. 
नयन न करके ही उन्हें विया दं 
दी । अतः इस आचख्यायिकाका यही 
तात्पर्यं है कि जिस प्रकार उन्‌ यो 
विदयार्थियोको राजने विदादी थी 
उसी प्रकार दूसरोको मौ विदयादान 
करना चाहिये । [ मरके “एतत्‌ 
राग्दफा ] तद्‌ वेशानरविरिमू 
उवाचः हस प्रकार आगे कहे नानेवार्‌ 
वैशवानरविज्ञानसे सम्बन्ध है ॥ ७॥ 


--‡ ° =-= 


इतिच्छान्वोग्योपनिषदि 


पञ्चमान्यष्ये 


र्काद्‌शकण्डमाष्यं सस्पूणंम्‌ ॥ ११ ॥ 





न 


दाहक खण्डं 


न ९ नकद 9 


अश्वपति ओर ओपमन्यवका संवाद 
स॒ कथमुवाच १ इत्याद-- | उपने किस भकार उपदेश दिथा ? 
सो बतङते दै- 


ओपमन्यव क खमार्मानमुपास्स इति। दिवमेव 
भगवो राजन्निति होवाचैष वे सुतेजा आस्म वेरवानरो 
यं तवमात्मानसुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं 
कुरे दयते ॥ १ ॥ 


[ राजा-- ] हे उपमन्युकुमार | ठम किस आलमाकी उपासना 
करते हो ¢ हे पूज्य राजन्‌ | युरोककी ही उपसना करता ह' देसा 
उसने उत्तर दिया । [ राजा-- ] वम निस आस्माकी उपासना 
करते हो यह निश्चय ह, शतेना नामसे प्रसिद्ध वैध्वानर भास्मा हे, 
इसीसे तुम्हारे दुरम घत, परत ओर आघत दिखायी देते दैः ॥ १॥ 

ओपमन्यव हे कमात्मानं | ह भौपमन्यव | तुम किंस 
वै वैश्वानरं त्वभरपास्स इति | वैश्वानर आस्माकी उपासना करते 

पप्रच्छ । हो ¢ पसा रानाने पूषा । 
नन्वयमन्याय आचार्यः स- | ` शङ्का-क्रितभाचायं॑होकर 
भी शिष्यसे पूता है--यह तो 

च्शिष्यं पृच्छतीति । . अनुचित दै । 

नैष दोषः; यद्रे तेन | समाधान--यह कोद दोष 
नहीं है; क्योकि “जो छ तृ जानता 
| है उसे बताकर तु मेरे परति 
मोपसीद ततस्त ऊध्वं वक्ष्यामि" । उपषन्न हो; तव॒ उससे आगे मँ 


५४६ ए्डोण्योदनिवहु [ बण्वाव 


८ = 0९ | 
इति न्यायदशनात्‌ । अन्यत्राप्या-] दन्ञे वतलङेगा' दे च्य देख । 
जाता है| इसके सिवा अन्त्र भ 
आचायं अजातशयुका अपने प्रतिमा 
भोत्यादनाथेः प्ररनो दृष्टो ऽजात-| श्य रिष्ये प्रतिमा उपत्र कानके 
स्यि तो फिर यह कहँ उहत्र 
हुआ, ओर कँसे आया? दे 
दागात्‌! इति । रश करना देस्रा नाता दै । 


चायंस्याप्रतिमानवति शिष्ये प्रति 
शत्रोः, कवे तदाभु्ुत एत- 


दिवमेव दयुलोकमेव वैश्वानर- ^हे पूज्य रानन्‌ | मँ धुरोक्फ़ 
ही अर्थात्‌ युोकरूप वेानखी 
ही उपासना करता है स उप्ते 

उत्तर दिय [तिव कहा- 
कोन] 
सोभ्य तेजा इति प्रसिद्ो बरा. | तेन शोभन दै रेता बह तेज 

नामसे प्रसिद्ध वानर आमा है । 
नर आत्मा आत्मनोऽवयवभूत- क्योकि आसाका अवयवभूत दै 


निस॒भात्मा अर्थात्‌ भातमकि ए 
त्वात्‌ । य त्वमात्मानमात्मेकदेश-| देशकी तुम उपा्ना करे हो 


& उसी सुतेजा वेश्वानरकी उपन्‌ 
स्स तसमातसुतेजसो वैधानर- करनेसे य्हो--तग्हार ऊटर्मे शह 
स्योपासनात्तव सुतमभिपुतं सो- गण ( एकाहादिशूप ज्योतिष्टोम । 

आदभे शुतः--अभिघुत (निकल 
मरूपं करमणि ्रसुतं प्रक्पेण च | इथ) सोमप रताद्रव्य, [ शह, 


9 कमम भ्षुत-- विशेषरूपसे निकर्श 
सतमासुत चाहगणादिषु तव | हुभा व्य तथा [ सनम ] आघत 


क हमा 
१ न्याय > 
अह वाव छा° ७। .१।७ मं खनक्कुमारकी उक्तिसे जाना जाता £ै। 


युषासे मगो राजनिति होवाच | 


खण्ड १२] शछाड्लमाष्या्ं ५७७ 
क क क क क ॐ क क 4. ॐ क ॐ क ॐ ॐ - ॐ ऊ ॐ-क र ॐ 


ङे दुरयतेऽतीब क्िणस्त्व- | (सर्वतोभावेन निकास हुभा) सोमरस 
अधिक देखा जाता टै। तायं 
< यह है कि तुम्हारे कुटम्बी बहे दी 
तुलना इत्यथः ॥ १ ॥ कर्मनिष्ठ दैः ॥ १ ॥ 


= * © ›=~ 


अत्स्यन्नं पयसि षियमस्यन्नं पदयति भ्रियं 
भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं करे य एतमेवमात्मानं वेदवानर- 
मुपास्ते मूर्धा सेष आत्मन इति होवाच मूधा ते 
उयपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ 


(तुम अन्न भक्षण करते हो जौर मियका दर्थ॑न करते हो । नो इस 
वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है बह अन्न भक्षण करता 
है, प्रियका दशन करता है गौर उसके कुमे ब्र्मतेन होता है । यह 
वैधानर माका मस्तक है । पसा रानाने कहा, ओर यह भी का 
कि-'यदि तुम मेरे पास न भाते तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता, ॥२॥ 

अत्स्यन्नं दीप्राप्निः सन्प-| तुम दीप्तानि होकर अन्न भक्षण 
इयसि च पुत्रपौत्रादि प्रिय- करते हो। तथा धुत्र-पौत्रादिरूप 
प्रिय इष्टका दशन करते हो । जोर 
भी जो कोर इस उपयुक्तं वेधानरक्री 
च प्रियं भवत्यस्य सुतं प्रसुतमा- | इ भकार उपासना करता है वह 
„ „ , ‰ ०. | भी अन्न भक्षण करता है, प्रिया 
सुतमिरया!द्‌ कर्मत्वं ब्रह्मवचंसं | दर्शन करता है जोर उसके कुमे 
कुरे यः कथिदेतं यथोक्तमेवं | खत, प्रुत एवं आघत इत्यादि 
कर्मित्वरूप त्रहतेज होता दै । कितु 
वश्वानरघुपास्ते । मूधा त्वात्मनो यहवैशवानर ज 
वेश्ानरस्यष न समस्तो वेशवानरः ॥ सम्पू वेधानर नहीं दै; अतः इस- 
छा०उ० ९८-- 





मिष्टम्‌ । अन्योऽप्यत्यन्नं परयति 


५७८ छान्दोष्वोपनिबद्‌ [ लघ्वाव ५ 
= ~ 996 ल 9 9 9-8-88 ~ ८-9८-8 >9-- ऋ 


अतः समस्तबुद्धया वैशवानरस्यो- | की समस्त बुद्धिसे उपासना कनके 
पासनान्मूर्धां शिरस्ते विपरीत- | कारण विपरीत प्रण करनेषरे 
ग्राहिणो व्यपतिष्यद्विपतितम- | उदारां मस्तकं गिर॒ जाता, धदि 
भविष्यत्‌, यद्यदि मां नागमि- | ठम मेरे पस न आते अर्थात्‌ मेर 
ष्यो नागतोऽभषिष्य; । साष्व- | पसर आगमन न करते । तार 
काषीयन्मामागतोऽसीत्यभि- | यह है कि तुम मेरे पास चरे अये 
प्रायः ॥ २॥ यह अच्छी क्यि॥२॥ 





इतिच्छान्दोग्यो निषदि पञ्चमाल्याये 


दादशखण्डभाभ्यं सस्पृणम्‌ ॥ १२॥ 


पद 


च येदक्तः सकणड 


"क~~ 


अस्वपति ओर सत्ययज्ञका संवाद 


अथ होवाच सत्ययज्ञं पोटुषि प्राचीनयोग्य कं 
त्वमात्मानमुपस्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति 
होवाचैष वे विद्वरूप आत्मा वेदवानरो य॑ सखमात्मान- 
सुपास्से तस्मात्तव बहु विदवरूपं कुर टर्यते ॥ १॥ 
फिर उसने पुपके पुत्र सव्ययज्ञसे कहा-- प्राचीनयोग्य ! 
तुम किस आस्माकी उपाघना करते हो ® वह बोा--!हे पूज्य 


राजन्‌ | भ आदिव्यकी ही उपासना करता हँ | [ रानाने कहा- ] 
“ह॒ निश्चय ही विवरूप वैरवानर आत्मा हे, निस आत्माकी तुम 


उपासना करते हो; इसीसे वुग्हारे 
दिखायी देता हैः ॥ १ ॥ 


अथ होवाच सत्ययज्ञं पोलु- 
पिं हे प्राचीनयोभ्य कं त्वमा- 
त्मानषास्से ? इत्यादित्यमेव 
भगवो राजन्निति होवाच । 
शुक्लनीलादिरूपत्वादिरूपत्व- 
मादित्यस्य, सवरूपताद्वा, स- 
वाणि स्पाणि दहि व्वाष्राणि 
यतोऽतो वा विश्वरूप आदित्यः; 


कुलम बहुत-सा विरवरूप साधन 


र उसने पुटषके पुत्र सत्ययज्ञ- 
से कदा-'हे प्राचीनयोग्य | तुम किस 
आत्माकी उपासना करते हो ® तब 
उसने हे पृ्य राजन्‌। मँ जादित्य- 
की ही उपासना करता ह" एेसा 
उत्तर दिया । शुक्लनीखादिरूप 
होनेके कारण आदिव्यकौ विधङ्पता 


| दै, अथवा स्॑ङूप होनेके कारण; 


यासारे रूप दष्टाके ही रहै, इ 
स्यि आदित्य विद्वषूप हे । उसकी 


५५० छाम्डोग्योपनिषद्‌ [ सध्या ५ 
ऋ-9- 9 >- 9-9-99 0 < ८ 9-2-6८ < 1 
तदुपासनात्तव बहु विश्वरूपमि- | उपासनाके कारण तु्हारे कुसुमे बहुत- 
हाुत्राथेमुपकरणं दशयते बुरे | सा विश्वरूप दिक ओर पारोक 
| १ ॥ साधन दिखायी देता हे ॥ १॥ 
किंच तामनु-- | तथा तुम्डारे पीडे 
प्रबत्तोऽङइवतरीरथो दासीनिष्कोऽस्स्यन्नं परयति 
प्रियमन्नं परयति पियं भवस्यस्य बह्मवचंसं कुठे य 
एतमेवमासरानं वेश्वानरमुपास्ते चकषुष्रेतदार्मन इति 
होवाचान्धोऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति ॥ २॥ 
वरिस जुता हभ रथ ओर दपिके सहित हर परदरृत है । 
तुम अन्न भक्षण करते हो ओर प्रियका दशन करते हौ । नो इस प्रकार 
इस वेधानर॒ आस्माकी उपासना करता टै वह अन्न भक्षण करता है 
प्रियक्रा दशन करता है ओर उसके कुमे ब्रहमतेन होता है । किंतु यह 
आसाका नेत्र दी है। रेसा राजने कष्टा जोर यह भी कदा--'यदि 
तुम मेरे पस न आते तोपेहो नातेः॥२॥ 
्रबृत्तोऽ्चतरीभ्यां युक्तो रथा-! अश्वतरीरथ-दो सचरिोसे 
ऽश्वत्रीरथो दासीनिष्को दासी- | युक्त रथ जर दासीनिष्क-दासिरथो 
भियुक्तो निष्को हारो दासी- | से युक्त निष्क यानी हार भरवृत्त है । 
निष्कः । अस्स्यननमित्यादि | भलस्यन्नम्‌ः इत्यादिका तात्प 
समानम्‌ । च््वैशवानरस्य तु | पूर्ववत्‌ है। एत॒ वुं वेधानरका 
सविता । तस्य समस्तवुद्धथोपा- ‹ नेत्र ही रै । उसकी समस्त बुद्धिसे 
सनादन्धोऽमविष्यश्वकुदीनोऽभ- | उपा्तना करनेके कारण, यदि तुम 
विष्यो यन्मां नागमिष्य इति | मेरे पास नजते तों अन्धे हो जति' 
५ देसा पूववत्‌ जानना चाहिये ॥ २॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि 
जयोदशकण्डमापयं स्यू माय 


चतुद णड 


अश्चपति ओर इनद्रयुम्नका संवाद 


अथ होवाचेन्दरदयुम्नं भाष्छवेयं वेयाघ्रपद्य कं ख- 
मात्मानसुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचेष 
वे पृथग्वमार्मा वेरवानरो यं खमात्मानमुपास्ते तस्माचां 
प्रथग्बलय आयन्ति प्रथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥ 


तदनन्तर रानाने भाल्खवेय इन्द्रुम्नसे कहा-हे वैयाघ्रपद्य | तुम 
किस आत्माक्ी उपासना करते हो ? वह वोला- शे पूज्य राजन्‌ | मँ 
वायुकी दी उपासना करता ह । [ राजाने कहा- ] जि स्त आत्माकी तुम 
उपाघना करते हो वह निश्चय दी प्रथग्वर््मा वैश्वानर आत्मा दे; इसीसे 
त्रे प्रति प्रथक्‌ पथक्‌ उपहार आते दै ओर ्हारे पीठे एथक्‌ प्रथक्‌ 
रथकी पङक्तियो चरती हैः ॥ १ ॥ 


अथ होवाचेन्दरद्युम्नं भाल्लवेयं | तदनन्तर राजने भार्र्वेय इन्द 


वैयाघ्रपद्य कं स्वमात्मानयुपस्से | धमस कहा--ह भेयघ्रपय । ठम 
स | लं क्रिस आत्माकी उपासना करते हो ¢ 
त्वाद्‌ समानम्‌ । 91१८ | इल्यादि पूर्ववत्‌ समञ्ञना चाहिये । 


नाना वर्त्मानि यस्य वायोराव- | परथमा जावह, उद्वह आदि 
होदहादिभिभेदर्वतंमानस्य सोऽय मेदोसे विमान जिस वायुके अनेकों 
मागं है वह वायु ए्रथग्व्स्मा है । “अतः - 
र परथग्बर््ा वैश्वानर आत्माकी उपासना 
त्मात्मनो वेश्वनरस्योपासनास- | करनेके रण तुम्हारे पास प्रथक्‌ 


पृथगबत्मां वायुः । तस्स 


५५२ छाल्दोम्बोयनिषत्‌ [ ण्याय ५ 


9-3-0८ 8 2-888-88 9 8-99-9 880 -ः 
थडनानादिकास्तवां रयो वस्ना- , - नाना दिशाओंसे वल्ल एवं 
ननादिलक्षणा बय आयन्त्या- | अन्नादिरूप उपहार आते है; तथा 
गच्छन्ति । परथग्रथश्रेणयो रथ- | प्रथक्‌ पथक्‌ रथग्रेणिय -रथकी 
पड्क्तयोऽपि तामलुयन्ति।।१॥ ` पड्क्तियाँ भी त्रे पी चरती दै! 


-~--: ० ~~ 


अस्स्यन्नं पद्यसि श्रियमच्यन्नं परयति प्रियं 
भवस्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य॒ एतमेवमात्मानं वेद्वा- 
नरमुपास्ते घाणस्त्वेषं आसन इति होवाच प्राणस्त 
उदकमिष्यव्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ 

(तुम अन्न भक्षण करते हो जर प्रियका दर्शन करते हो । नो कोई 
इस प्रकार इस वेशवानर आस्माकी उपासना करता दै वह्‌ अत्न भक्षण करता 
है, श्रिया दशन करता है ओर उषके कुलम बरहतेज होता है । तु 
यह आस्माका प्राण ही है'- रेखा राजाने कहा ओर यह भी कहा कि 
“यदि तुम मेरे पाक्ष न भति तो वुण्डारा प्राण उक्तमण कर नाता ॥२॥ 

अर्स्यन्नमित्यादि समानम्‌ । | (अल्स्यननम्‌' इत्यादि वाक्यका 
प्राणस्त्वेष आत्मन इति दोवाच | ५ ७६ 1 


भासाक्रा प्राण ही दै" ेसा रानाने 

प्राणस्ते तबोदकरमिष्यदुतरान्तो- | कहा ओर यह भी कहा कि दि ` 

~ ५ 2 म्‌ आति तो तुम्हारा 
ऽमविप्यद्यन्मां नागमिष्य इति |< ५ 

प्राण उत्करृमण कर जाता अर्थात्‌ 


॥ २ ॥ उत्करान्त हो जाताः ॥ २ ॥ 


इति न्दोम्योपनिषदि प्चमाण्याये 
चतुदंशखण्डमाष्यं सम्पणम्‌ ॥९४॥ 


--~-जकन्यै--- 


फञ्कदक्लः खणड 


== ¢ *-- 
अश्वपति ओर जनका संबाद्‌ 


अथ होवाच जनश्शाक॑राक्ष्य कं तमात्मानसु- 
पास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचेष वै 
वहुरु आत्मा वेरवानरो यं तमास्मानमुपास्से 
तस्माच्च बहु खोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥ 
तदनन्तर रानने जनसे कहा-!हे शाकराक्ष्य | तुम किस 
आसाकी उपासना करते हो ¢ उघने कहा -हे पूज्य रानन्‌ | म 
आकाराकी हौ उपासना करता ह ।' [ राजा बोख- ] "यह निश्चय दी 
बहुलसंज्क वेशानर आत्मा है जिसकी क तुम उपासना करते हो । 
इसीसे तुम प्रना ओर धनके कारण बहुर हो" ॥ १ ॥ 
अथ होवाच जनमित्यादि स- फिर उसने ननसे कहा 
मानम्‌ । एष वै बहुल आत्मा | शादि शर पूववत्‌ दै । यह निश्चय 
्ैधानरः । बहुरुतरमाकाशस्य ही बहुरसं्ञकं वेशधानर मास्मा है । 


6 स्वगत होनेके कारण तथा बहुक- 
सवेगतत्वाद्वहुलगुणोपासनाच। | गुणूपसे उपाषित होनेके कारण 


आकाशा बहुख्तर ८ पूर्णत ) दै । 
इ्षीसे तुम पुत्र पौत्रादिरूप प्रजा 
ओर घुवर्णादि ध्रनसे बहुल 
८ परिपूणं ) हो ॥ १ ॥ 


त्वं बहुलोऽसि प्रजया च पुत्र- 
पोत्रादिलक्षणया धनेन च दहि- 
रण्यादिना ॥ १ ॥ 


अस्स्यन्नं पदयसि प्रियमच्यन्नं परयति श्रियं 
भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुरे य एतमेवमात्मानं वेदवानर- 


भच छान्होग्योवनिषद्‌ [ लष्याष ५ 


ॐ > ~ = 5 ~ 9 ~ 9 > 6: > > ¬ > ८ ~ > 9 ८-99-8 
मुपास्ते संदेहस्त्वेष आत्मन इति होवाच संदेहस्ते 
उयरीर्थयन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ 


(तुम अन्न भक्षण कर्ते दो ओर प्रियक। दशन करते दो । नो 
इख प्रकार इस वेदवानर आतमाकी उपास्नना करता हे वह अन्न भक्षण 
करता दै, प्रियका दशन करता है ओर उसके कुरे ब्रहमतेन होता दै । 
कितु यह आताका संदेह ८ शगीरका मध्यभाग ) ही है । एसा राजने 
कहा जोर यह भी कदां किं ध्यदि तुम मेरे पास न अतितो तुम्हार 
संदेह ( शरीरक। मध्यभाग ) न्ट हो जाताः ॥ २ ॥ 


संदेहस्त्वेष संदेहो मध्यमं ¦ रितु यह वैदवानरका संदेह 
ही दहै । शरीरके मध्यभागको 

शरीरं वैश्वानरस्य । दिहेर्पच- | सदेह कहते है । कथोकि दि 
धातु उपचय ( वृद्धि ) अथवा है 
ओर शरीर मांस, रुधिर एवं अस्थि 
श्च बहुलं शरीरं तत्संदेहः, ते तव आदिमे बहुल ८ उपचित ) दै इस- 
स्मि वह संदेह दै, तुम्हारा वहं 

शरीरं व्य्ीयच्छीर्णममविष्य- | सदेह अर्थात्‌ शरीर नष्ट हो नात, 


यदि तुम मेरे पास न 
यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ । अति ॥ २ ॥ 


[ष 0) नप्र 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 
पञ्चदशखण्डमाष्यं सम्पूणंम्‌ ॥ १५ ॥ 


र्म 


याथतवान्मांसरूधिरास्थ्यादिभि- 


फोट क्र शण्ड 
अश्वपति ओर बुड्ल्क्रा संवाद 
अथ होवाच बुडिरमादवतराङव वेयाघ्रपद्य कं 
त्वमात्मानसुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति 
होवाचेष वे रयिरात्मा वैदवानरो यं स्वमात्मानसुपा- 
स्से तस्माच्छ रयिमान्पुष्टिमानसि ॥ १ ॥ 
फिर उसने भर्वतरारवके पुत्र बुदिसे कहा--'हे वैयाघ्रपद्य | तुम 
किस आत्माकौ उपासना करते हो ¢ उसने कटा--!हे पूर्य राजन्‌ | 
मँ तो नल्की ही उपासना करता ह । [ राना बोल-] (निखकी तुम 
उपासना करते हो वह निश्चय ही रयिसंज्ञक वैरवानर आत्मा है; इससे 
तुम रयिमान्‌ ( षनवान्‌ ) भौर पुष्टिमान्‌ हो' ॥ १ ॥ 
अथ होवाच बुडिलमाश्च-| (तदनन्तर राजाने अरवतरार्वके 
तराधिमित्यादि समानम्‌ । एष | पत्र बुदिरूते काशादि अर्थ 


वै रयिरात्मा वैश्वानरो धनरूपः, | ए दे ॥ वहं निश्चय ही षन- 
रूप रणिसं्क्‌ वैश्वानर भाता है; 


अद्भथोऽं ततो धनमिति । | क्योकि जलते भज होता है जोर 


तस्माद्रयिमान्‌ धनवांस्त्वं | भन्नसे धन । इसीसे तुम रयिमान्‌ 
सः = यानी धनवान्‌ हो तथा शरीरसे 
पृषटिमांश्च शरीरेण, पूष्टेषा- ष्टन्‌ हो, कथो टि जल 
न्ननिमित्तत्वात्‌ ॥ १ ॥ कारण हभ करती है ॥ १ ॥ 
अत्स्यन्नं पदयसि भरियमत्त्यन्नं परयति प्रियं 
भवत्यस्य बह्यवर्चसं करे य एतमेवमात्मानं वेरवानर- 


५५द छान्कोम्योषनिषव्‌ [ जष्याव ५ 


क क 93 9 9 9 9 9 9 १ 3 2 ॐ = 


मुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते 
व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ 


तुम अन्न मक्षण करते हो जीर प्रियका दशन करते हो । जो 
पुरुष इस वेशानर॒ आस्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह्‌ भन्न 
भक्षण करता है, प्रियका दशेन करता है ओर उसके कलमे ब्रहते 
होता है । किंतु यह आत्माका बस्ति दी है-रेसा राजाने कहा भौर 
यह भी कहा कि यदि तुम मेरे पास् न आति तो तुम्हारा बस्िस्थान 
फट जताः ॥ २ ॥ 

बस्तिस्त्वेष आत्मनो वैश्वा- | यह वैश्वानर आत्माका वस्त है 
नरस्य वस्तिभूत्रसंग्रदस्थानं | बस्ति मूत्रसंग्रहके स्थानको कहते 
बस्तिस्ते व्यभेरस्यद्धिनोऽम- | दै । थदि तुम मेरे पास न अते तो 
विष्यद्यन्मां नागमिष्य इति | वग्हारा वस्ति भिन्न--विदीणं हे 
॥ २॥ जाताः--णेप्ता राजाने कटा ॥२॥ 


-*-9 छण 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 
षोडशखण्डभाष्यं सम्पृणम्‌ ॥ १६ ॥ 


रदक्त शकश्ड 





अङ्वपति ओौर उदहालकका वाद 
अथ होवाचोहाखुकमारुणि गोतम कं तमात्मान- 


० 


सुपास्स इति प्रथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचेषवें 
प्रतिष्ठाता वैश्वानरो यं स्वमात्मानसुपास्से तस्मात्तं 
प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १ ॥ 

तत्पश्चात्‌ राजाने अरुणके पुत्र उदाख्कसे कदा-- दे गौतम | तुम 
किस भात्माकौ उपासना करते हो ® उसने कहा--हे पूज्य राजन्‌ | 
मे तो प्रथिवीकी ही उपासना करता दँ ॥ [ राना बोटा-- ] “निसकी 
तुम उपाश्चना करते हो यह निश्चय ही प्रतिष्ठासंज्ञक वैश्वानर आत्मा है । 
इससे तुम प्रजा जोर पञ्युभोंके कारण प्रतिष्ठित दोः ॥ १॥ 

अस्स्यन्नं पद्यसि भ्रियमस्यन्नं पदयति श्रियं 
भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमासानं वेश्वानर- 
सुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यस्छा- 
स्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ 

(तुम न्न भक्षण करते दो ओर प्रियका दर्शन करते हो। नो 
कोई इस वैश्वानर आतमाकी इस भकार उपाखना करता है वह्‌ अन्न 
भक्षण करता दै, प्रियका दशन करता है ओर उसके कुरमे बरहमतेन 
होता है । किंतु यह आके चरण हौ है" एषा उसने कहा ओरं 
यह भी कहा किं यदि तुम मेरे पस न अते तो त्दारे चरण ्चिथिल 
हो जते, ॥ २ ॥ 


५५८ छान्दोग्योपनिषषु [ मष्याय ५ 
> 9-59-9 9-8-80 ~8८ 5 ~ £< 8८ > ~: ~~ ~क ¬ 


अथ होवाचोदारुकमित्यादि | फिर उदारकसे कदा इदि 


समानम्‌ । पथिवीमेव भगवो | + (तव दै । दारके का-] 
3 € पूर्य राजन्‌ | म प्रथिवीकी ही 
राजन्निति होवाच । एष॒ वे | उपासना करता द [ राना बोस] 
प्रतिष्ठा पादौ वैश्वानरस्य । पादौ 'यह निश्चय ही वैरवान्‌ आत्माकौ 
ज प्रतिष्ठा यानी उसक्रे चरण है। 

ते व्यम्हास्येतां विम्लानावम- | यदि ठुम मेरे पासन तित 
विष्यतां शछधीभूतौ यन्मां | वुष्दारे चरण विशेषरूपसे म्लान 
नागमिष्य इति ॥ १-२॥ । अर्थात्‌ सिथिल हो जते ॥१-२॥ 


---; ० :‡- 


दइतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाभ्याये 
स्तदशखण्डभा्यं सम्पृणेम्‌ ॥ १७ ॥ 





ऋष्टादच् दह्क्णड्‌ 
अस्वपतिका उपदेश्च-वेरवानरक्ी तमस्तोपासनाका फट 
भ १ 
तान्होवाचेते पे खट यूयं पएथगिवेममास्मानं 
वेद्वानरं विद्राश्सोऽन्नमत्थ यस्तेतमेवं प्रादेश 
मात्रमभिविमानमास्मानं वेद्वानरसंपास्ते स सर्वेषु 
लोकेषु स्वेषु भूतेषु सर्वेष्वास्मस्न्नसत्ति ॥ १ ॥ 
राजने उनसे कदा- "तुम ये सव रोग इस वैरवानर आत्मानो 
जरुग-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। जो कोद यही है इस 
प्रकार लभिमानश्ा विषय होनेवाठे इस प्रदेशमात्र वैरवानर आत्माी 
उपास्नना करता है वह समस्त रोको, समस्त प्राणियेमिं ओर समस्त 
जातमा्मिं जन्न भक्षण करता हैः ॥ १॥ 
तान्यथोक्तवैरवानरद्शैनवतो | यहाँ वै' भर "खटः ये दो 
नाततो ‡ खनव निपात अर्थश्ूलथ दहै । उन उप्यक्त 
17 40 ~ म वैरवानर दृष्टिवारोसे राजनि कहा- 


नथकौ, यूयं पृथगिवाप्रथक्सन्त- ये तुमरोग भपनेसे अभिन्न होनेपर 

हः , ५ | भी इस वैखानर आस्माको प्रथक्‌ 
मिममेक वेश्वानरमात्मानंविद्वा _| सा जानकर अन्न भक्षण करते हो ] 
सोऽनमत्थ, परिच्छिनात्म- ¦ ताये यह द किं जन्मान्ध पूरषो- 
बुद्धेत्येतत्‌-दस्तिदशन इव | के ह्तिदर्शनके समानश्तुम परि- 





जात्यन्धाः । च्छिन्न भप्मवुद्धिसे उसे जानते हो । 





® अथात्‌ जिस प्रकार कुक जन्मान्ध, जिन्दने हाथीको कभी नहो देखा, 
उसके आकारका अनुमान करने लगे तो उनमेसे जो पुरुष हाथीके स्‌ड, शिर, 
कान अथवा योग आदि [जस अवयवका स्पशं करता है वह उसे ही हाथीका 
समप्रल्प समन्नने ठगता है, उसी प्रकार ठम सबकी भी वैरवानरके अवयवे 
खमग्र वैषवानरधुद्धि हो रदी है । 


० > > 3 ~> = 3 
यस्त्वेतमेवं यथोक्तावयवेगभर्धा- | फित॒ जो को चुलोकरूप मप्तके 
लेकर एथिवीरूप पादपर्यन्त इतन 
पूर्वोक्तं अवयवोँसे युक्त एक प्रादेश- 
मात्र--जो प्रत्यगात्मा दी युमूधसि 
लेकर परथिवीपादपर्यन्त प्रेशर 
मित होता दै अर्थात्‌ जाना जाता 
मीयते ज्ञायत इति प्रादेगमाव्रम्‌। | है, उस प्रादेशमात्र आतमा 
मुखादिषु वा कणेप्वचतुतवेन | [पसन करता है] । मथवा स 
मीयत इति प्रादेशमात्रः । लो. आदि कर्णोमि भोक्ताूपसे मित 


9 “ 2 | होता है इसलियि प्रदेशचमात्र है। 
कादिपृथिव्धन्तप्रदेशपरिमाणो वा 


या युटोकसे लेकर प्रथिवीपरयन्त 
प्रादेशमात्रः । प्रकर्पेण शासरेणा- | प्रदेश ही उसका परिमाण है इस- 


दिदयन्त इति प्रदेशा युोका- | रिय भरद्शमात्र है | अथा श 
द्य एव ताबत्परिमाणः प्रादेश- दारा प्रकर्पसे आदिष्ट होते है इस 
युखोक आदि प्रादेश दै उतने दी 
भ्रात । | परिमाणवाला होने प्रदेशमे । 
शाखान्ठर तु मूर्थादिरिचघुक- ` अन्य शाखा तो मृघसि लेकः 


व र चिलुकपर्न्त प्रतिष्ठित हे इसलियि 
भति इति प्रादशमातरं कन्प- । उत प्रादेशमात्र कल्पत करते दै, 


यन्ति, इह तु न तथामिप्ेतः, | मिति यँ वह इस भकार 


दिभिः प्रथिवीपादान्तेर्विरिष्र- 
मेकं प्रादेशमात्र्‌, परदेरोयुूर्भा- 
दिभिः प्रथिवीपादान्तेरध्यात्मं | 








| , अभिप्रेत नही है, क्योकि उस ईप 
सस्य हब एतस्यातमनः इत्या | भामा | युरोकं ही मूर्धा है } 

= इत्यादि [ सार्वास्य- ] रूपसे उप 
दयुपसंदारात्‌ । 


संहार छया गया है | 

्रत्यगात्मतयामिविमीयतेऽह- , वह प्रयगातमरपसे अभिविमान 
क्रिया जाता है अर्थात्‌ भे" इस 
भकार जाना लाता दै; इखलमि 


मिति ज्ञायत इत्यभिविमानस्तमेत-| अभिविमान है, उस इख वान 


खण्ड १८] शाङ्करमाष्याथं ५६१ 
>< 9 >< < < < >< << < < < ८ 8-3-38 
मात्मानं वैशवानरम्‌-विश्वा्रान- आत्माकी--यह सर्वात्मा ईख्वर 


णे नरको पुण्य-पापानुरूप 
यति पुण्यपापानुरूपां गतिं सर्वा क लगड स वं 
त्मेष ईरवरो वैश्वानरो विश्वो नर | सर्वास होनेके कारण विरव (सव) 
नरस्वरूप दै इसल्यि, 'वैदवानर दै, 

| या समस्त नरोद्रारा भपने प्रयगात्- 
नरे; प्रत्यगात्मतया प्रविभज्य | रपसे विभक्त करके छे जाया नाता 
है इसल्यि वेदवानर' है-उसकी जो 
इस प्रकार उपासना करता हे वह अन्न 
स्ते यः,सोऽदन्नन्नादी; सर्वेषु छो.| भक्षण करता हुमा मन्नादी ( भन्न 
खानेवाला) होता है, चुरोकादि समस्त 

केषु चुरोकादिपु सर्वेषु भूतेषु | लोको, समपू्णं चराचर भूमि तथा 
चराचरेषु सर्वेष्वात्मसु शरीरे- | शरी इन्दिय, मन भौर उदर्य 
समस्त आत्मामं -करयोकि इन्दीमं 

न्द्रियमनोबुद्धिषु तेषु द्याल्मक- | श्राणिकी आलकरपनाका निदेश 
ल्पनाव्यपदेशः प्राणिनाम्‌, अन्न- | किया जाता है--अन्न भक्षण करता 


हे । तात्पयं यह हे किं वैरवानरवेत्ता 
मतत, वश्वानरवित्सरवामा सन्न- | सर्वाम होकर अत्र भक्षण करता 


न्नमत्त, न॒ यथ्ञः पिण्डमा- | है अज्ञानि्योके समान पिण्डमत्रमे 
त्राभिमानः सन्नित्य्थः ॥ १ | | भमिमान करके अन्न नहीं खाता ।१। 


एववा सर्वात्मत्वात्‌, विवव 


नीयत इति वेश्वानरस्तमेवश्रपा- 


वैरवानरका त स्वरूप 
कस्मादेवम्‌ ? यस्मात्‌-- | रेसा क्यो है £ क्योकि- 
तस्य ह॒ वा एतस्यात्मनो वेरवानरस्य मूर्धेव सुते 
जाश्क्ुरविरेवरूपः भ्राणः एथग्व्मात्मा संदेहो बहुलो 
बस्तिरेव रयिःप्रथिव्येव पादावुर एव बेदिर्खोमानि वर्हि 
हृद यं गाहपत्यो मनोऽन्वाहायपचन आस्यमाहवनीयः।२। 


भदे 


छान्दोग्योचनिवदह्‌ 


[ अध्याय ५ 


>>> >>> > ऋ >> > ~< > ~ > ट ~ 
उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक दी सुतेजा ८ बुरोक ) दै, 
चक्ष बिशवरूप ( सूर्यं ) है, प्राण पृथ्व्मा ८ वायु ) दै, देहका मध्य- 
भाग बहु ( आकाश ) है बस्ति ही रि ( जल ) दै, थिवी ही 
दोनों चरण है, वक्षःस्थल वेदी ह, रोम दभं है, हदय गा्हपयानि 
है, मन अन्वादार्यपचन है ओर सुख आहवनीय है ॥ २ ॥ 


तस्य ह वै प्रक़ृतस्येवैतस्या- 
त्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुते- 
जाशकषुविधरूपः प्राणः पृथम्ब- 
त्मौरमा संदेहो बहुलो बस्ति- 
रेव रयिः पृथिव्येव पादौ । 
अथवा विध्यर्थमेतदचनमेवु- 
पास्य इति । 

अथेदानीं वैश्वानरविदो भो- 
जनेऽग्निदोत्रं संपिपादयि- 


सन्ाह-एतस्य वैश्वानरस्य । < 


 भोकतुरुर एव बेदिराकारसा- 
मान्यात्‌ । . लोमानि वर्हर्े्या- 
मिवोरसि रोमान्यास्तीर्णानि 
द्यन्ते । हदयं गार्हपत्यो 
हृदयाद्वि सनः प्रणीतमिबान- 
न्तरीभवत्यतोऽन्वाहार्यपचनोऽ- 
ग्नि्नः । आस्यं ुखमाहव- 


नीय इवाहवनीयो हृयतेऽस्मि- 
न्ननमिति ॥ २ ॥ 


शतिच्छान्दो्योपनिषदि ` 


उस इस प्रकृत वेदवानर आसा- 
का मस्तक ही सतेना दै, चष 
विरवखूप हे, प्राण प्रथग्बमाहूप 
वायु हे, शरीरा मध्यभाग बहुल 
ह, बस्ति ही रयि है जौर परथिवी 
ही चरण हैँ । अथवा यह वाक्य 
विधिके स्यि द; अर्थात्‌ इस प्रकार 
उसकी उपासना करनी चाहिये । 

अव इससे आगे वैदवानरवेत्ाके 
भोजनम अग्निहोत्रका निश्चय करने- 
की इच्छासे राना कहता दै-इस 
वेरवानर यानी भोक्ताका वक्षःस्थल 
ही आक्रमं समान होनेके कण 
वेदी है, छोम कशां है क्योकि 
वदी विछ हुए कुक समान वै 
वक्षःस्थर्पर बि हुए दिखायी देते 
है, हृदय गार्हपत्याम्नि दै क्योकि 
मन ॒हदयसे ही उदन्न-सा होकर 
उसका अन्तर्वतीं होता दै; इसीस्ि 
मन अन्वाहायंपचन अगमि है तथा 
आस्य-- मुख  आहवनीयाग्नके 
समान आहवनीय है वर्योकि इसमे 
अन्नकरा हवन होता हे ॥ २॥ 


पञ्चमाध्याये 


सम्पणाम्‌ ॥१८॥ 


एष्छोककिक्त खणड 





भोजनकी अग्निहोत्रत्वतिदधिके लियि श्राणाय सखाहाः इस 
पहली आहुतिका वर्णन 


तव्यद्धक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमोय<स यां प्रथमा 
माहृतिं जुहुयात्तां जञहुयात्माणाय स्वाहेति प्राणस्त्‌- 


प्यति ॥ १ ॥ 


अतः जो जनन पके आवे, उसका हवन करना चाहिये, उस 
समय वह भोक्ता नो पहली आहुति दे उसे श्राणाय स्वाहा" एसा कद- 
कर दे । इस प्रकार प्राण तृप्त होता हे ॥ १ ॥ 


तत्त्रैवं सति यद्धक्तं भोजन- 
काल आगनच्छेद्धोजनाथंम्‌ , 
तद्धोमीयं तद्धोतग्यम्‌, अग्नि- 
दोत्रसंपन्मात्रस्य विवक्ितत्वा- 
ननाग्नहोत्राङ्गेतिकतंव्यताप्रा 
भिरि; स भोक्ता यां प्रथमा- 
माहूतिं ज॒हयात्तां कथं जहु- 
यात्‌ १ इत्याह-प्राणाय स्वा 
त्यनेन मन्त्रेणाहुतिशन्दादवदा- 
नप्रमाणमननं प्रकिपदित्यथेः । 


तेन प्राणस्तृप्यति ॥ १ ॥ 


अतः एसा होनेके कारण भोजनके 
समय जो भात (अन्न) आवे उससे 
हवन करना चाहिये । यहां अभि- 
होत्रकी कर्पनामातर विवक्षित है इश- 
स्यि अग्निहोत्रकी अङ्गमूत इति- 
कर्तव्यता ( सहकारी गाधनों ) की 
प्राति नहीं दे । वह भोक्ता जो परी 
आहति दे उसे कि प्रकार दे £ सो 
श्रुति बतलती है-श्राणाय स्वाहाः 
इस मन्तरसे, यहां (हुति शब्द 
होनेके कारण अवदानप्रमाण 
( जितना कि आहतिमे विदित है 
उतना ) अन्न [ सुखे ] उठे-रेसा 
इसका तात्ययं है । उससे प्राण 
तृप होता है ॥ १॥ 


६७ छान्दोभ्यो पनिषद्‌ [ मध्याय ६ 
> ¬ ऋ ऋ 8८ 3: 9८ ८ 9८ ऋ ८ ऋ ऋ < ऋ. 9 ऋ >< ऋ< > ऋ रू 
प्राणे तप्यति चलतुस्तरप्यति चक्षुषि तप्यत्यादित्य- 
सतृष्यव्यादिप्ये तप्यति यौस्तप्यति दिवि तृप्यन्यां 
यक्तं च योशचादिव्यश्चाधिति्ठतस्तन्तप्यति तस्यानु 
तसं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नायेन तैजसा बहमवच 
सेनेति॥ २॥ 
माणक तृत होनेप नेत्रनिय तृ होती है, नेत्रेनदियकर वृ होनेप 
पं तृ होता है, सू्के तृप्त दोनेपर ुरो$ तृप्त होता ह तथा धुोक- 
के तृत होनेपर निस ` किप युरोक ओर आदिव ( स्वामिभावे ) 
अधिष्ठित हे बह तृप होता दै ओर उसी तृति होनेपर स्वयं भोक्ता पना, 
प, अनाच, तेन ओर त्रहमतेजके दवारा तृत होवा दै ॥ २ ॥ 
प्राण तृप्यति चशषुस्प्यति, | प्राणके तृप्त होनेपर नेत्रेन्ि 
तृत होती है, इस रकार नेत्र्य, 
आदित्य, युरोक इत्यादि तृप हते 
यच्चान्यद्दयौश्वादित्यथ स्वामि- | ह तथा ओर भी निष क्िसीप 
द्य रोक ओर आदित्य स्वामिभावसे 
सेनाधिति्ठस्वच्च तप्यति, तस्य | जुिष्ठित है बह सव तृ होता दै। 


 सञ्ञानस्वरप्यत्येवं | तथा उसकी तृक्िके परचात्‌ स्य 

धभ स इलव भोजन करनेवाला भी वक्त होता 
रत्यक्म्‌ । किच प्रजादिभिश्च | | दै--यह तो प्रत्यक्ष ही दै । यदी 
र नहीं, भोक्ता प्रजादिके द्वारा भी 
तनः शरीरस्या दीपिः, उज्ज्व- | तृप्त होगा दै । शरीरस्य दी, 
उञ्ज्वख्ता थवा प्रगल्भतार्का 

छत्वे ्रागन्म्यं वा; बदावर्चसं । नाम "तेल, है तथा सदाचार नी 
| स्वाध्यायके कारण होनेवाल तेन 

अनम्वाघ्यायनिमित्ं तेजः ॥२॥ | श्रहतेजः हे ॥ २ ॥ 


--:&ः-- 
इविच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चामाभ्याये 
९ र 'नाचयकण्डमप्यं सम्पूर्णम्‌ ॥ १९ ॥ , 
-:०:- 


चक्ुरादित्यो चयोऽचेत्यादि दृप्यति 


=--------- ------------ ------- -- --- ------ 


विं खण्ड 


“व्यानाय स्वाहा" इस दूसरी आहुतिका कणन 


अथ थां द्वितीयां जहुयाद्वयानाय स्वाहेति 
व्थानस्तप्यति ॥ १ ॥ व्याने तुप्यति श्रोत्रं तप्यति 
श्रोत्रे तप्यति चन्द्रमास्तप्यति चन्द्रमसि तप्यति 
दिङस्तप्यन्ति दिषु तृप्यन्तीषु यत्कि च दिराश्च 
चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तप्यति तस्यानु तृषि तृप्यति 
जया पशुभिर्नायेन तेजसा ब्रह्मवचसेनेति ॥२॥ 


तत्पश्चात्‌ जो दुसरी आहुति दे उसे “व्यानाय स्वाहाः रेसा 
ढटकर देना चाहिये । इखसे न्यान तृ8 होता है ॥ १ ॥ व्यानके तप्त 
होनेपर श्रत्रन्द्िय तृष होती है, श्रोत्रके त्त होनेपर चन्द्रमा चृत होता 
है, चनद्माके तृ होनेपर दिश तृप्त होती है तथा दिशा्कि तृप 
होनेपर निघ द्िसीपर चन्द्रमा ओर दिशां [ स्वामिभावसे | 
अषिष्ठित है वह तृ्त होता है । उसकी तृपतिके पश्चात्‌ वह भोक्ता भरना 
९, भनाय, तेज जर ब्रतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥ 





इतिच्छान्दोग्योपनिपदि पञ्चमाध्याये 
विंशचसखरण्डः सम्पणः ॥ २० ॥ 


~ ~तो 


एककिक्ल खणड 


9 वकच््छक-+- 
अपानाय स्वाहाः इस तीसरी जआहुतिका वर्णन 


अथ या तृतीयां जुहुयात्तां जुहुयादपानाय खाः 
हैत्यपानस्तृप्यति ॥ ९ ॥ अपाने ठप्यति वाक्तप्यति 
वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तप्यत्यननो तृप्यति प्रथिवी 
तृप्यति एथिष्यां तप्यन्त्यां यक्कि च परथिवी चामि- 
श्राधितिष्ठतस्तततप्यति तस्थालु तपिं तृप्यति भ्रजया 
पशुभिरन्नाद्येन तेजसः ब्रह्मवर्चसेनेति ॥२॥ ` 

किर जो तीसरी आहुति दे उसे “अपानाय स्वाहा एसा ककर 
देना चाहिये; इससे अपान तृप होतः है ॥ १ ॥ अपानके तृत दोनेएर 
वागिन्दिय तृत होती दै, वाकके तृ होनेपर अग्नि तृ होता दै, 
भ्नके तृ होनेप ध्रथिवी तप्त होती है तथा प्रथिवीके तप्त हीनेपर 
जिस किसीपर ष्थिवी ओर अग्नि [ स्वामिभावे ] अधिष्ठित दै वह त 


होता हे, एवं उघकी तृपिके पात्‌ भोक्त मजा, पशु, अनाद्य, तेज 
जर बरहतेजके द्वारा तृत होता हे ॥ २ ॥ 


= ०० १-~-- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 
प्कविंशखण्डः सस्पणेः ॥ २९१९ ॥ 


नीषु 


[> ष 
द्वा्किक्छ खण्ड 
“समानाय स्वाहा" इस चौथी आहुतिका वर्णन 


अथ यां चतुर्थी जुहूयात्तां जहुयात्समानाय खा- 
हेति समानस्तप्यति॥१॥ समाने तप्यति मनस्तृप्यति 
मनसि तप्यति पजन्यस्त॒प्यति पज॑न्ये तप्यति वियुक्त 
प्यति विद्यति तप्यन्त्यां यक्कि च विद्युच्च पजन्य- 
श्चाधितिष्ठतस्तत्तप्यति तस्यानु तपि तप्यति प्रजया 
पशुभिरन्नायेन तेजसा बह्मवच॑सेनेति ॥ २ ॥ 

तदनन्तर जो चौथी आहुति दे उसे समानाय स्वाहा" ेसा कहकर 
देना चाहिये, इससे समान तप होता है ॥ १ ॥ समानक तृप होने 
मन तप्त होता है, मनके तृप्त दीनेपर पजन्य तृप्त होता है, पजन्यके 
त होनेपर विदयत्‌- तप्त होती है तथा विदयुतके तप्त होनेपर जिस 
किसीके ऊपर विद्युत्‌ ओर पजन्य अधिष्ठित है वह तृ होता दहै, एवं 
उसकी तृपतिके अनन्तर भोक्ता प्रजा, पञ्च, अन्नाद्य तेज ओर बरह्तेजके 
द्वारा. होता है ॥ २ ॥ 


== @ २ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 
दाविंशखण्डः सम्पण; ॥ २२ ॥ 


- कवक 


योक्त शड्‌ 


उदानाय स्वाहा इस पांचवी जाहुतिका वर्णन 


अथ थां पचमी जुहुयात्तां जुहृयाहुदानाय खाहे 
खुद्‌ानस्तृप्यति ॥ १ ॥ उदाने तप्यति तक्तुप्यति 
त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ त॒प्यव्याकारस्त 
प्यत्याकारो तप्यति यक्कि च वायुश्वाकाशशाधितिष्ठ 
तस्तत्तृप्यति तस्यानु तसिं तृप्यति प्रजया पशुभिरः 


=> 


न्नायन तेजसा बह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ 


क जो पवी आहुति दे उसे उदानाय च्वाहा' दता कक 
देना |चाहिये, इससे उदान तृप होता हे ॥ १ ॥ उदानके तृप्र हनेएर 
लचा व होती दै, त्वचाके तृप्त होनेपर वायु तृप्त होता हे, वायुके 
तृ होनेपर आकाश तृप होता है तथा आकाशके तृप्त होनेपर निघ 
करसीपर वायु ओर आकार (स्वामिभावसे] अधिष्ठित है वई तृप्र होता 


दै, भोर उपद् वृधिके पशात सवय भोक्ता प्रना, पञ, अन्ना, तेन 
ओर ब्रषतेनके द्वारा तृ होता हे॥२॥ 


अथ यां द्वितीयां ठतीयां। “अथ यां द्वितीयां त्तीयां चर 
चतुर्थी पञ्चमोमिति समानम्‌ | प्मोम्‌। इत्यादि श्ुतिोका अर्ध 
॥ ५॥। २०--९& | २३ ॥ समान है॥५। २०--५।२३॥ 
` भव्टन-9_ _ 
इतिच्छानदोन्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 
जयोविंशखण्डभाष्य सम्पृणम्‌ ॥२३॥ 


न्व 


@------ -------------~ 


हरवि क शह 
चति खणड 
-; ® :-- 


अविद्रानुके हवनका स्वरूप 


स य इदमविद्रानशिोत्रं जुहोति यथाङ्गारान- 
पोद्य भस्मनि जुहुयात्ताहक्तसस्यात्‌ ॥ १ ॥ 


वह लो करि इस वैशवानरविद्याकरो न जानकर हवन करता ह 
उसका वह हवन रेखा है, जैसे जारको कर्‌ भस्मे इवन 
करे ॥ १॥ 


सयः कशिदिदं वैश्वानर | वह, नो को कि इ उपक 
दनं यथोक्त मविद्रान्सन्नमनिदोतर वैश्वानर-वि्याको न जाननेवाका होकर 
टी लोकसिद्ध अमित्र करता दै 
उसका वह हवन वैश्चानरोपासकके 
अग्रिहोत्रकौ अपेक्षा पेसा है अर्थात्‌ 
र व दके सदश है जैसे करि आहुतियोग्य 

< ज अङ्गारोको हटकर कोर आहति न 
स्यादश्वानरविदोऽधिदोत्रमः । देनेयोग्य॒स्थान--भस्म गाहति 
पेश्येति प्रसिद्धाभिहोत्रनिन्दया | दे । इस प्रकार प्रसिद्ध अ्रिहोत्को 
वेदवानरविदोऽग्निहोत्रं स्तूयते | निन्दादवार वैश्वररोपसकके अग्न 
| १॥ | होत्री स्त॒ुतिको जाती है ॥ १॥ 


प्रसिद्धं जदोति,यथाङ्गारानाह- 
तियोग्यानपोद्यानाहुतिस्थाने 





~~ 
विद्वानुके हवनका फल 


अतशरेतद्वशिष्टमग्निोतम्‌ । | इसल्यि भी यद विशिष्ट अमि- 
कथम्‌ ! होत्र हे; किषस्यि- 


५७० छन्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय ५ 

अथ य एतदेवं विद्वानगनिहोन्नं जहोति तस्य स्वेषु 
कोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हृतं भवति ॥ २ ॥ 
क्योकि जो इस ( वैशानर ) को इस प्रकार लाननेवाड पल 
अग्निहोत्र कता है उसका समस्त रो, सारे भूत ओर समे 
आलार्मिं हवन हो जाता है ॥ २ ॥ 
अथ य एतदेवं विद्वान- | क्योकि जोहृसे इस प्रकार जानने- 

[ वाला पुरूष अभमिहोत्र करता है उष 

| ग्नहोतर जुहोति तस्य अधाकतः उपयुक्त वेधानर वियावानृकषा वषु 
वेश्वानरविन्ञानवतः सवषु | लोकेषु" इत्यादि शब्दो अर्थं पे 
रोकेष्वि्याचयुक्ताथम्‌ । | (छा० ५।१८। १ के माय) 
मततीत्यनयोरकातवात कहा जा चुकता हे, क्योकि यहोकि 
1 कायत्वात्‌ (हुतम्‌, ओर बह के अन्नम्‌ अपति, इन 
॥ २ ॥ दोनो पोका एक ही भं है ॥२॥ 


(त 0 


किंच--- । तथा- 


तथथेषीकातूरमम्नो भतं भटूयेतेवहास्य सवे 
पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्रानग्निहोत्ं जहोति॥॥ 


इस विषयमे यह दृष्टान्त भी है--निख प्रकार सीकका अपरमाग 
अग्निम घुषा देनेसे त्कार जल जाता है उसी प्रकार जो इस प्रकार 


निहोत्र करता है उसके समस्त पाप भस्म हे, 
जाते है ॥ २ ॥ 


तथयषीकायास्तलमगरमगनौ इस विषयमे -यह द्टान्त दै-नि 
प्रोतं भकष परद्येत रद्य | भकार पीक तूङ-अपरभाग भनि" । 


ह 


खाब्ड २४ ] शाङ्करष्याथे ५७१ 
८-8-69 998 888 9-9-89 9 9 >> 9 ऋ ¬ 


क्षिप्रमेव हास्य विदुषः सर्वात्म | मँ आल्नेपर तुरन्त ही जर जाता 


भूतस्य सर्वा्ानामनुः सवे 
निश्वरिशः पाप्मानो धर्मा- 
धर्माख्या 
इद, च प्राम्तानोत्यततर्ञानसह- 
भाविनथ प्रदूयन्ते प्रद्र 


अनेकजन्मसश्चितां 


ल्वतमानश्चरीरारम्भकपाप्म- 
वम्‌; रक्ष्यं प्रति शुक्तपुवस्र- 
वृत्तफरृत्वात्तस्य न दाहः । 


य॒ एतदेवं विद्रानग्निहोत्र 
जुहोति द्क्तं ॥ २ ॥ 
तस्मादु हैवंविद्यद्यपि 


है उसो प्रकार सबके अन्तरात्मभूत 
ओर समस्त अरन्नोके भोक्ता इस 
विद्वान्‌के अनेको जन्मो संचित 
हुए तथा इस जन्मभे जञानोतपत्तिसे 
पूर्वं जीर ज्ञानके साथ-साथ दहोने- 
वाले धर्माधमेसंज्ञक समस्त- 
निष्रोष पराप दग्ध हो जाते ठै; 
केवर वर्तमाद शरीरा आरम्भ 
करनेवाले पाप रह जाते दै, व्याक 
रक्षयके प्रति छोडे हुए वाणके सुमान 
फल देनेमे प्रवृत्त हो जानेके कारण 
उनका दाह नहीं हो सकता है । जो 
इस (वैश्वानरदशन ) को इस प्रकार 
जाननेवाला होकर हवन करता यानी 
भोजन करता है [ उसे उपयुक्त फर 
मिक्ता हे ] ॥ २॥ 


चण्डाखायोच्छिष्ठं पयच्छे- 


दातमनि हैवास्य तदवश्वानरे हृतस्यादिति तदेष 


श्छोकः ॥ ४ ॥ 


अतः वह इस प्रकार जाननेवास यदि चाण्डाल्को उच्छिष्ट भी दे 
तो मी उसका वह भन्न वैधानर आत्मामं ही हुत होगा । इस विषये 


यह्‌ मन्त्र है ॥ ४॥ 
स यद्यपि चाण्डारायोच्छ्ष्ा- 
नर्हायोच्छिष्टं 


वह॒ यच्पि उच्छिष्टदानके ¦ 


परयच्छेदुच्छिषटं | अयोग्य चाण्डार्को उच्छिष्ट भी दे 


दद्यात्मतिषिद्धुच्छिष्टदानं यद्यपि । अर्थात्‌ प्रतिषिद्ध उच्छिष्टदान भी 
/ ९ 


७ म्याद्‌ 
9८ 96 966 > ट ल 3 9 -क्~-9 4 
द ४ 
ुर्यादात्मनि , हैवास्य च- | करे तो भौ वह चाण्डे दक 
ण्डादेदस्थे वैश्वानरे तद्धुतं | स्थित वेधानर आसा ही 
प्यान्नाधमनिमित्तमिति वि्या- | होगा, भपर्मका देतु नह होग ~ 
मेव स्तोति। तदेतस्मिन्सतुत्यथं | एेसा ककर श्रुति विकी ही तुति 
दलोको मन्त्रोऽप्येप भवति | करती दै । उप्त इस स्तुतिके विषयमे 
॥ ४॥ | यह छक यानी मन्त्र भी है ॥४॥ 
--:®ॐः-- 1 
| ५५ 
यथेह क्षुधिता बाङा मातरं पयुंपासतत एवश्सर्वाणि 
भूतान्यग्निहोत्रसुषासत इत्यग्निहोत्रमुपास्तत इति॥५॥ 
निस प्रकार इप्त लोकम्‌ भूखे बारुक सव प्रकार माताकी उपाष्नना 
करते ह उसी प्रकार सम्पूणं प्राणी इस ज्ञानीके भोजनरूप अमिरोतऋी 
उपासना करते है, अग्निहोत्रकी उपासना करते है ॥ ५ ॥ 
यथेह लोके क्षुधिता बुुक्षि- , जिस प्रकार इस लोके ्ुधित- 
ता बाला मातरं पयुपासते कदा | भृखे बालक संच प्रकार माता उपू- 
नो मातां प्रयच्छतीति, | सना (भतीक्षा) करते दै कि मातां 
६ यें | उन्न 
एवं सर्वाणि भूतान्यमादान्येवं- | 9" जन द { अ 


व भक्षण करनेवाटे समस्त प्राणी इ 
विदोऽग्नहोतरं॑भोजनष्ुपासते प्रकार नाननेवाछेके अग्निहोत्र अर्थात्‌ 
` कदा न्वसो भक्ष्यत इति; | भोजनकी उपासना कते दै हि 
त्क क्तो , | यह कब भोज्नन करेगा, क्योकि 
जगत्सवं जनेन तृप्तं | विद्वान्‌के भोजन करनेते सारा जगत्‌ 
भवतीत्यथः । दिरुक्तिरष्यायप- ६। 1 र 
9 ९ ह्‌ ् 
रिसमाप्त्यर्था ॥ ५ ॥ अध्यायकी समाप्िके स्वि है।॥५॥ 


टि 
इतच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये 
षराखण्डभाष्यं सभ्पर्णं 
त ड सभ्पणेम्‌ ॥२४॥ 
द्ग नन्द्मगवतपूञ्यपादशिष्यस्य परमहसपरि्राजका चार्थस्य 
+ कृतो छान्दोग्योपनिषदि 
वरण पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ५ ॥ 


म 


षष्ठ अध्याय 


प्रथमः 


रवण्ड 





आङूणिका अपने पुत्र खेतकेतुके प्रति उपदेश 


दवेतकेतुर्दीरणेय आसेत्याद्- 
ध्यायसंबन्धः-'सवं 


पूरवेतः सम्बन्ध- 
प्रदशेनम्‌ 


खन्विदं ब्रह्म ठ- | 


जलान्‌" इत्युक्तम्‌, कथं तस्मा- 
ज्ञगदिदं जायते तस्मिन्नेव च 
ीयतेऽनिति च तेनैवेत्येतदक्त- 
व्यम्‌ । अनन्तरं चेकस्मिन्थुक्त 
विदुषि सवं जगततप्तं भवतीलयु- 
क्तम्‌ , तदेकत्वे सर्यात्मनः 
सर्वभूतस्थस्य उपपद्यते नात्म- 
भेदे । कथं च तदेकत्वमिति 
तदर्थोऽयं  पष्ठोऽघ्याय 
आरभ्यते । पितापूत्राख्यायिका 


विद्यायाः सारिष्खप्र- 


द्शनार्था । 


श्वेतकेतुदस्णिय आस्र इत्यादि 
मन्त्रसे आरम्भ होनेवले अध्यायका 
सम्बन्ध इस प्रकार है--उपर्‌ यह 
कदा जा चुका है किं “यह सव 
निश्चय ब्रह्य ही है तथा उसीसे 
उतपन्न हुआ है, उसीमे लीन होने- 
वाल है ओर उसीमं चेष्टा कर 
रहा है । अव यह बतरना हे किं 
यह्‌ जगत्‌ किंस प्रकार उससे उन्न 
होता है, कैसे उसमे रीन होता 


¦ है जोर किप तरह उसीके दवारा 


चेष्टा कर रहा है १ अभी-भी यह्‌ 


। बतलाया गया हे कि एक विद्रानके 


भोजन करनेपर सारा संसार तृप्त दो 
जाता है। एेसा सम्पूणं मूते 
स्थित आत्माका एकत होनेपर दी 
हो सकता दै, आत्माक्ा मेद्‌ होने- 
प्र नहीं हो सकता । उसका एकत 
किस प्रकार दै १ इसीके यि यद 
छटा अध्याय आरम्भ किया जता 
है; यहांजो पिता ओर पुत्रकी 
आख्यायिका है बह इस विद्याका सार- 
तमल प्रद्यित करनेके स्मि दै । 


४५,७७ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


= > >< < > ह ¬< 8 8 ~ 5८ ~~ ~प -8 -8८ ¢ ॐ ॐ 4 


[ अध्याय ६ 


>~ ® 4 > 


रवेतकेतुहारणेय आस तश्ह॒ पितोवाच येत. 
केतो वस ब्रह्मचर्॑म्‌ । न वै सोम्यास्मत्छुलो नोऽननूचय 
ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥ 


अरुणका सुप्रसिद्ध॒पौत्र उवेतकेतु था, उससे पिताने का- £ 
खवेतकेतो | तु त्रचर्यवास कर; वयोग सोम्य | हमारे कुमे उलन 
हुआ कोई रुप अध्ययन न करके बदावन्धु-सा न्वं होता, ॥ १ ॥ 


इवेतकेतुरिति नामतो हेत्यैति- 
चार्थः आरणेयोऽरुणस्य पौत्र 
आस बभूव । तं पत्रं हारुणिः 
पिता योग्यं विद्याभाजनं मन्वा- 


नस्तस्योपनयनकालात्ययं च 
प्रयन्युबाच-दे इषेतकेतोऽुरूपं 
गुरु रस्य नो गत्वा वस बरह्म 
चरथ । न चैतययक्तं यदस्मस- 
रीनो हे सोम्यानन्‌च्यानधीत्य 
नक्मन्धुरिव मवतीति ब्राह्मणान्‌ 
बन्धून्न्यपदिशति न॒ स्वयं 
ाह्मणवृत्त इति ॥ १ ॥ 


“उवेतकेतु" एसे नामवाख, ९ 
यह्‌ निपात रेतिद्यका द्योतक दै; 
आरुणेय--अरुणका पोत्र था । उ 
पुत्रसे पिता आरुणिने, उसे योग्य-- 
विद्याका पात्र जानकर ओर उसके 
उपनयनसंस्कारके समयका अति- 
क्रम होता देखकर, कहा--€ 
उवेतकेतो । त्‌ हमारे कुरुके सुर 
गुरुके पास जाकर ब्रह्मचयवाप 
कर । हे सोम्य | यह उचित नी 
हे कि हमारे कुलम उत्पन्न शेकर 
कोई अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु 
साहो जाय। जो ब्राहमण 
अपना बन्धु बतलाया है कितु स्वय 
ब्राहमणो आचरण नहीं कृता 
उसे ब्ह्मन्धु कहते दै ॥ १॥ 


न= 


शण्ड ९ | शाङ्राष्याथे ५७ 


` > > > ॐ अः ड. तः > ~ ~ 9 ~ ¬ 9 >. ~ 8 ऋ 


तस्यातः प्रवासोभ्नुमीयते | इस प्रसगसे एेसा अनुमान होता 
# | | हे किं उसका पिता धरसे बाहर 
पितुः । येन स्वयं गुणवान्सन्पुतरं | जानेवाख दै, इसीसे गुणवान्‌ 
होनेपर भी वह स्वयं पुत्रका 
नोपनेष्यति । उपनयन नहीं करेगा । 

स ह द्वादशवर्ष उपेप्य चतुर्विश्शतिवष; सर्वान्‌ 
वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तच्च एयाय। तह 
पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचान- 
मानी स्तन्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥ 

वह्‌ दवेतकेतु बारह वर्धकी अवस्थामे उपनयन कराकर चौबीस वरषक्र 
होनेपर समप वेदोका अध्ययन कर अपनेको बद बुद्धिमान्‌ ओर व्यास्या 
करनेवाला मानते हुए उदण्डभावसे घर कोटा । उससे पितिनि कदा 
दे सोम्य | तू जो एेसा महामना, पण्डतम्मन्य ओर अविनीत हे सो 


क्या तूने वह आदेश पूछा है ॥ २ ॥ 


स पित्रोक्तः उवेतकेतुरं दवाद- 
शवः सन्नुपेत्याचायं यावच्चतु- 
विंशतिवर्षो बभूव, तावत्सर्वान्‌ 
वेदांशतरोऽप्यधीत्य तदथं च 
बुद्ध्वा महामना महद्रम्भीरं 
मनो यस्यासममात्मानमन्येम- 
न्यमानं मनो यस्य सोऽयं महा- 
मना अनूचानमान्यनूचानमा- 
त्मानं मन्यत इत्येवंशीलो यः 
सोऽनूचानमानी स्तन्धोऽप्रणत- 
स्वभाव एयाय गृहम । 


पिताक कहनेपर॒ वह उवेतकेतु 
बारह वर्की अवस्थां गुरुके समीप 
लाकर जवतक किं चौबीस व्ष॑का 
हुमा तबतक सम्पूणं वेदोका मध्ययन 
कर जर उनका अथं समञ्ञकर 
महामना--निसक्ा मन महान्‌ 
अर्थात्‌ गम्भीर हो यानी जिसका मन 
अपनेको दूसरेके समान न समञ्चने- 
वाटा हो उसे महामना कहते रै, 
अनूचानमानी-अपनेको बडा 
प्रवक्ता माननेवाखा अर्थात्‌ जो एेसे 
स्वभाववाखा हो उसे अनूचानमानी 
कहते है, ओर स्तम्ध-अविनीत- 
स्वमाव होकर षर जैग। ` 


५७६ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय ६ 


तमेव॑भूतं हात्मनोऽनदुरूप- | उस्र जपने पुत्रको इत पका 
री स्तव्धं मानिनं पत्र दृष्टा | अर्थात्‌ अनेते विपरीत छम 


वाख, उद्‌ण्ड ओर अभिमानी हुषा 


पितोवाच सद्रमावतारचिकी- | देखकर उसमे सद्धमकी दृति के 
पेया । श्वेतकेतो यन्न्विदं | की इच्छसे पिताने कहा- श्र. 
महामना अन्‌चानमानी 


केतो { तू जो एेसा महामना, भन्‌ 
चानमानी जर स्तन्ध हो रहा हैसो , 


स्तन्ध्ासि कस्तेऽतिशयः प्राप | तुञ्ञे अपने उपाध्याये पेषी क्य ` 
उपाध्यायात्‌ ए उतापि | विशेषता प्राप्त हो गथी दै? त | 


तमादेशमादिश्यत इत्यादेशः 


केवलशाल्नाचार्योपदेशगम्यभि- । ऊढते है; इससे यह सिद्ध होता दै 
त्येतत्‌, येन वा परं | रि त्न केवर शस ओर गुर 

व उपदेशसे ही ज्ञेय है | अथवा जिसके 
ब्रह्माद्श्यतं स॒ आदेशस्त- 


९ | द्वारा परब्रह्मका उपदेश क्रिया जाय 
ममराल्यः ष्टवानस्याचायम्‌ | उसे आदेश कते है-सो क्या तून 


॥ २॥ | वह आचायंते वृषा है-॥ २॥ 
तमादेशं विक्िनटि- | उस आदेरके रियि शरूति विश 

| षण देती है- 
त येनाधरुतसुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञात 


। कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३॥ 


निके द्वा जश्ुत शरुत हो जाता ह, अमत मत हो जाता है 
र धीविज्ञात विशेषदूपसे ज्ञात हो जता हे ॥ [ यह घुनकर उेतकेठ- 
ने पूा-- ] भगवन्‌ | वह्‌ गदश कैषादहे१॥३॥ 


तूने बह आदेश पूछा है-नितका ` 
उपदेश किया जाता हे उसे भदेश ' 


ण्ड १] 


ह्ाङ्करथाष्या्थं 


८.७. 


४-9-98 9-399-89 ऋ < ऋ ऋ 


येनादेशेन शरुतेनाभ्रुतमप्यन्य- | 


च्छुतं भवत्यमतं मतमतर्वितं | 


तर्कितं मवत्यविज्ञातं विज्ञातम- 
निशितं निशितं भवतीति ¦ स- 
वानपि वेदानधीत्य सवं चान्य- 


दे्मधिगम्याप्यकृताथं एव 
भवति यावदार्मतच्वं न जाना- 


तीव्याख्यायिकातोऽवगम्यते । 
तदेतदद्भुतं श्रुत्वाह कथं न्वेतद्‌- 
प्रसिद्धमन्यविज्ञानेनान्यद्वि्ञातं 


भवतीत्येवं मन्वानः प्रच्छति कथं 
नु केन प्रकारेण हे भगवः स 


आदेशो मवतीति ॥ ३ ॥ 


(लिप्त अदेशके द्वारा अन्य 
बिना सुना हुभामभी घुनाद्भादो 
लाता दहै, अमत भर्थात्‌ बिना 
विचार किया इभा मत--षिचारा 
हुमा हो जाता है ओर अविज्ञात-- 
निश्चित विज्ञात-- निश्चित हो 
जता टै इस भष्याथिकासे 
यह जाना जाता है फि समस्त 
वदोका अध्ययन जोर जन्य सम्पूण 
ज्ञेय पदार्थोका ज्ञान प्राप्त करनेपर 
भी जबतक पुरुष भातमतत््वको 
नहीं जानता, तबतक अङ्ृताथं ही 
रहता दै । इस विचित्र प्रश्को 
सुनकर शतकेतुने यह सोचते हए 
कि यह शप्रसिद्ध बात कैसेहो 
सकती दै कि अन्य वस्तुक ज्ञामसे 
छन्य समस्त पदार्थाका मी ज्ञान हो 
जाय, कहा-/हे मगवन्‌ | वह 
अदेश कैसा- किंस प्रकारका 
है॥२॥ 


1 यं 


यथा स॒ आदेश्लो भवति ¦ पिता-वह भदेश जिस पकार 


तच्छृणु-- 


है सो घुन-- 


| यथा सोम्येकेन सपििण्डेन सर्व ्नन्मयं विज्ञात . 
स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं सत्तिकेत्येव सत्यम्‌॥४॥ 


५७८ छल्दोव्योयनिषद्‌ 


[ अष्याय ६ 
नऋ 


हे सोम्य | जिस प्रकार एक गृतिकाके पिण्डके दवाा सपं 
मृन्मय पदार्थोका ज्ञान हो जाता है कि विकार केव वाणीके आश्रयमू 
नाममात्र दै, सत्य तो केवर पृत्तिका ही हे ॥ ४ ॥ 


हे सोभ्य यथा रोक एकेन 
मृतिपण्डेन करककम्भादिकारण- 
4 विज्ञाते (४) 
भूतेन विज्ञातेन स्वेमन्यत्तदि- 
कारजातं मृन्मयं सदिकारजातं 


विज्ञातं स्यात्‌ । 
कंथं मृतिपण्डे कारणे विज्ञाते 


कार्यमन्यद्विज्ञातं स्यात्‌ ? 
नैष दोषः कारणेनानन्य- 
¢ 
त्वात्कायस्य । यन्मन्यसे- 
ऽन्यस्मिन्विज्ञातेऽन्यनन ज्ञायत 
इति, सत्यमेवं स्यात्‌, यचन्य- 
त्कारणात्कायं स्यान्न त्वेवमन्य- 
त्कारणात्कारयम्‌ । 
कथं तीदं रोक इदं कारण- 


मयमस्य विकार इति १ 
शृणु; वाचारम्भणं वागा- 


हे पोम्य | लोकम जिस परा 
कमण्डट ओर घट आदिक कारण- 
भूत एकं भृचिण्डके जान छिथि 
जानेपर दही उसका विक्षरनात 
सम्पूणं मृन्मय॒धर्थात्‌ मृक्षा 
कायंसमूह जान ख्या जाता है । 
शङ्ा-- शृत्तिकाके पिण्डह्प 
कारणका ज्ञान होनेपर अन्य काथ 
वर्गका ज्ञान कैसे हो सक्ता है ! 
समाधान-यह कोई दोष नदी 
है, क्योकि कार्यं अपने श्रारणते 
अभिन्न होता है । तम लो पसा 
मानते हो किं शन्यका ज्ञान होने 
अन्य नहीं जाना जा घ्कता, षो 
यह वात उस॒समय तो ठीक 
जव कि कारणसे क्षा्यं॑मिन्न हेता! 
रितु इस प्रकार कायं 
कारणसे मिन्न है नहीं । 
शङ्का-तो फिर रोकमे षा वध 
कहा नाता ्ै कि यह कारण 
जौर यह इसका विकार है ! 
समाधान--घुनो, यह वाचा 
रम्मण--वागारम्मण भर्थात्‌ वाणीः 


खण्ड १] श्ाङ्करमाष्याये ५७९ 
८-9८-9 9 2८ 8-9-99 > 2 9 91 8 9 99 9 9 ड: 9: ¬ ¬ >9 


रम्भणं वागारम्बनमित्येतत्‌ । | पर दी अवलम्बित दै । कौन १ नाम- 
कोऽसौ १ विकारो नामधेयं | घेय विकार- “नामधेयः पदम नाम 
स्वाथे धेयप्रत्ययः । बागा- | शब्दे स्वाम वःय हुआ है। 
लञ्बनमात्रं नामेव केवलं न वस्तुतः विकार नामी कोई वस्तु 
विकारो नाम वस्त्वस्ति परमा- | नदीं दै, यह तो केवल वाणीपर 
थतो अत्तिकेत्येव मृत्तिकैव तु | भवरम्बित नाममात्र ही है । सत्य 
सत्यं वस्त्वस्ति ॥ ४ ॥ वस्तुतो एकमात्र मृत्तिका ही ६ै।४॥ 
~~: ॐ‡- ध 
यथा सोम्येकेन लोहमणिना सर्वं रोहमयं 
विन्ञातशस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं रोह 
मित्येव सत्यम्‌ ॥ ५ ॥ 
हे सोम्य | निस प्रकार एक ॒लोहमणिका ज्ञान होनेपर सम्पूण 


लोहमय ८ सुव्णंमय ) पदाथ जान िमि जाते दै, वरयोकिं विकार वाणी- 
पर्‌ भवम्बित नाममात्र है, सत्य केव घुवणं ही दै ॥ ५ ॥ 
यथा सोम्यैकेन लोहमणिना | दहे सोम्य । 1 निस प्रकार एक . 

सुवणैपिण्डेन सर्वमन्यद्विकार- न व 
ना कटकणुटकेयूरादि ुडधटये क स।रा विकारजात जान ख्या जाता 
स्यात्‌ ॥ बावार्मगान वाचारम्भणम्‌ इत्यादि शब्दो 
समानम्‌ ॥ ९५ ॥ ' अर्थं पूर्ववत है ॥ ५ ॥ 

यथा सोम्येकेन नखनिक्रन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं 
विज्ञातरस्याद्वाचारस्भणं विकारो नामधेयं छृष्णायसमि- 
त्येव सत्यमेवश्सोम्य स अदेशो भवतीति ॥ & ॥ 


छा० उ० ९९ - 


५८७ छान्दोग्थोपनिषत्‌ [ जस्याष ६ 


र 

दे सोम्य | निस प्रकार एक॒ नसृन्तन ( नहना ) के श्ानसे 

सम्पूणं केके पदाथ जान ल्ि जते है, कर्मो विकार वाणीपर 

सवलम्बित केवर नाममात्र है, सत्य केवर रोहा ही द; हे सोम्य | ए 
ही बह अवेश्च भी है॥ ६॥ 


यथा सोम्येकेन नखनिहृन्त- | ह सोम्य ! जिस प्रकार एकं 
नेनोपलक्षितेन कृष्णायसपिण्डे- | नखछ्ृन्तनसे अर्थात्‌ उससे उपक्षि 
नेत्यर्थः, सव॑कार्ण्णायसं कृ- | रोहपिण्डसे समप कार््णायस-- 

७ (> ते ॥ 
प्णायसविकारजातं विज्ञातं व व न 
स्यात्‌; समानमन्यत्‌ । अनेक- | आत। € । + ९ क 

ल्त त जो अनेकं ष्टन्त स्यि गये दै 

७ ५५८ ध दाष्टन्तके अनेक मेर्दोका गोध ओर 
मेदालुगमाथं दुटगप्रतीत्यथं च,- 


र टद प्रतीति करानेके ल्यि रै- हे 
एवं सोम्य स॒ आदेशो यो | सगय | पेसा ही वह धादे है नो 


मयोक्तो मवति ॥ ६ ॥ किर्मेनेक्हादैः॥ ६॥ 





इत्युक्तवति पितयाहितर!- | पिताके हत प्रकार कहनेपर 
दूसरा ( शेतकेतु ) बोका- 


न वे नूनं भगवन्तस्त पतद्वेदिषुर्यद्येतदवेदि- 
व्यन्‌ कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवारस्त्वेव मे 
तद्बवीखिति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ 


“निश्चय दी वे मेरे पूज्य गुरुदेव इसे नहीं जानते ये | यदि वे जानते 
तो युक्स क्यो न हते । व भाप ही मुञ्चे वह॒ बतसा्ये | तव 
पिताने कहा-- अच्छा, सोम्ब | बतखता है ॥ ७ ॥ 


खाण्ड २ ] 


शाङ्करभाष्यं ` 


५८ 


८ >: >~ ~ ~ >> 9 ~ ~ 5 5-9-98 9 8 8 8 हः 


न वै नूलं भगवन्तः पूजा- 
वन्तो गुरवो मम ये त एवद्यद्ध- 
वदुक्तं वस्तु नावेदिषुनं विक्ात- 
वन्तो नूनम्‌ । यद्यदि छवेदि- 
ष्यन्विदितवन्त एतद्स्तु कथं मे 
गुणवते भक्तायादुगताय नाव- 
क्यनोक्तवन्तस्तेनाहं मन्ये न 
विदितबन्त इति । अवाच्यमपि 
शरोन्यगमावमवादीतपुन गुरुकं 
प्रति प्रषणमयात्‌। अतो भगवां - 
स्त्वेव मे मद्यं तदस्तु येन सव 
ज्ञत्वं ज्ञातेन मे स्यात्तदुनवीतु 
कथयचित्युक्तः पितोवाच तथा- 


स्त॒ सोम्येति ॥ ७ ॥ 


निरचय ही, मेरे जो पूज्य गुरुदेव 
ये, वे आपकी कदी हुदै इस बातको 
नहं जानते थे । यदि वे जानते 
अर्थात्‌ उम्हं हस बातिका पता होता 
तो सु गुणवान्‌ भक्त एवं भपने 
अनुगत शिष्यके प्रति क्यो न 
कहते । इससे मँ समज्चता ह उन्हं 
इसका पता नहीं था । कने योग्य 
न होनेपर भी उसने फिर गुरुकुल्को 
मजे जानेके भयसे गुरुफा रुत्व 
कृह डाला । अतः अब आपही 
मेरे प्रति उस वस्तुका वणन कीजिये 
जिसका ज्ञान दोनेपर मुञ्े सवत्र 
प्राप्त दो नाय । इस प्रकार कदे ` 
जनेपर पिताने कदा-सोम्य | 
अच्छा, पेता दी हो'॥ ७ ॥ 


~ रनछ ग 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये 


प्रथमच्ण्डभाभ्यं 


सम्पणैम्‌ ॥ ९ ॥ 


((-, 


# ५९ 
0 
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¢ न" 


द्विकीयः शकर 


अन्य पक्षक खण्डनपूवक जगतकी सद्रपताका समर्थन 


सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्‌ । तदधेक 
आहुरसदेवेदमभ आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः 


सजायत ॥ १॥ 


हे सोम्य | आरम्भमे यह एकमात्र अद्धितीय सत्‌ ही था । उसके 
विषयमे किन्दीने पूसा भी कहा कि आरम्भे यह एकमात्र अद्वितीय असत्‌ 
ही था । उस जसतृसे सतो उतपतति होती दै ॥ १ ॥ 


सदेव सदित्यस्तिवामात्र 


वस्तु क्ष्मं निर्विशेषं सवगत- 


मेकनिरञ्ञनं निरवयवं विज्ञानं 


सदेवः-- त्‌" यह अस्तित्व- 
मात्र वस्तुका बोधक दहै, नोकिं 
सम्पूणं वेदान्तोसे सक्षम, निर्विरोष 
सवगत, एक, निरञ्जन, निरवयव 


यदवगम्यते सयवेदान्तेभ्यः । | जोर विज्ञानस्वल्प जानी नाती है। 
| 


एवशब्दोऽवधारणाथः । कि 


` तदवभ्रियत इत्याह--इदं जग- 


नामरूपक्रियाबद्विकृतयुपलभ्यते 
यत्तससदेवासीदित्यासीच्छब्देन 
संबध्यते । 


कदा सदेवेदमासीदित्यु- 
च्यते १ 


एव' शब्द्‌ निश्वयार्थक है । इससे 
किंस वस्तुका निश्चय किया नाता 
हे-यह [ आहणि ] वतरत है - 
यह जो नामरूप एवं क्रियावान्‌ 
विकारी जगत्‌ दिलायो देता है 
“सत्‌, ही था-इस प्रकार (भीत्‌ 
(था) शब्दसे सत्‌, शब्दका 


सम्बन्धं है । 


शङ्ा-यह किं समय सत्‌ ही 
था-रेसा कहा जाता है १ 


खण्ड २ | 


शाङ्करभाष्यं 


८८३ 


० 9 9 9 9 9 9 9 9 9 > 9 9 = = 4 


अग्रे जगतः प्रागुत्पत्तेः । 
किं नेदानीमिदं सथेनाग्र 


आसीदिति विशेष्यते १ 
न। 
कथं तर्हि विस्ेषणम्‌ १ 
इदानीमपीदं सदेव किं त॒ 
जगतः सदेव नामरूपविरेषणव- 


सन्मातत्व सदेतु- दिदंशब्दबुद्धि- 
दष्टन्तप्रदशनम्‌ 
विषयं चेतीदं च 


भवति । प्रागुत्पत्तेस्तवग्रं केवल- 
` सच्छन्दवद्धिमात्रगम्यमेवेति 

सदेवेदमग्र आसीदित्यवधायंते । 
न दि प्रागुतपत्ेनामवद्रपवदेद- 
मिति अरदतं शक्यं वस्तु सुषुप्त 
काल इव । यथा सुषुप्नादुस्थितः 
सरवमत्रमवगच्छति सुषुते स- 


स्मात्रमेव केवकं वस्त्विति तथा 


प्रागुसपत्तरिस्यमिप्रायः । 


समाधान-भागे भर्थात्‌ जगत्‌- 
की उलपत्तिके पूवं । 

शङ्ा- तो क्या इय समय यह 
सत्‌ नदी है जो “आरम्भमे थाः 
इस प्रकार विरोषण दिया गया है £ 

समाधान नही देसी बात नहींहै। 

सङ्ञा- तो फिर यह विरोषण 
क्या दिया गया है ? 

समाधान-इस समय भी यह 
सत्‌ ही है; पितु नामरूप विशेषण 
युक्त तथा इदं शब्द ओर इदं बुद्धि- 
का विषय होनेके कारण “इदमः 
यह) इष प्रकार भी निर्देश किया 
जाता है । किन्तु उत्पत्तिके पूरव 
आरम्भे केवर सत्‌ शब्द्‌ भौर 
सदबुद्धिका ही विषय होनेके कारण 
“यह पटे सत्‌ हौ था' इस प्रकार 
निश्चय किमा जाता है । सुषुप्कार- 
के समान उत्पत्तिसे पूर्व यद नाम- 
यक्त अथवा रूपयुक्त है इस प्रकार 
वस्तुका ग्रहण नहीं क्यिजा 
सकता । जिस प्रकार सोनेसे उटा 
हुआ पुरुष ॒वप्तुकी सत्तामात्रका 
अनुभव करता दै अर्थात्‌ केवर 
इतना जानता है कि सुषुप्ते केवर. 
सन्मात्र वस्तु थी, उसी प्रकार 
उदत्तिसे पवं जगत्‌ था-प्सा 
इसका अभिप्राय ह । 


८५८७ 


छा्दौम्योएनिषद्‌ 


[ मघ्याय्‌ ६ 


8 9-8-88 4 6-9-8८ 9 3-5८-8 5.55 


यथेद्ुच्यते लोके पूर्वा 
घटादि सिसुक्ुणा इरन 
ग्रतिषण्डं प्रसारितशुपलभ्य 
ग्रामान्तरं मत्वा प्रस्यागतोऽषराहे 
त्रैव धटशरावा्यनेकमेदभिननं 
कायंषुपलभ्य मृदेषेदं षरशरा- 
वादि केवलं पूर्वाह्न आसीदिति 
तथेदाप्युच्यते सदेवेदमग्र आसी- 
दिति। एकमेषेति, सकार्य- 
पतितमन्यमास्तीत्येकमेवेत्युच्य- 
ते । अद्ितीयमिति, मदयति. 
रेकेण;दो यथान्यद्षटाच्ाका- 
रेण परिणमयित्ङलाादिनिमि- 
कारणं दृष्टं तथा सद्वथतिरेकेण 
सतः सहकारिकारणं दवितीयं 
वस्त्वन्तरं प्रां प्रतिपि्यतेऽदि 
तीयमिति, नास्य द्वितीयं वस्त्व- 
न्तरं विद्यत इत्यद्वितीयम्‌ । 


निस प्रकार लोकम षयि 
वननेकी इच्छावले दुम्हाद्रार 
पर्वाहमे यृततिकाके पिण्डक पलाषा 
हआ देखकर कोर पुरुष फी जनय 
थामस नार्‌ मध्याहोत्तरकामें 
ोटनेपर उसी स्थानमे धट-शराव 
आदि अनेको भदोँवलि मृततिकाके 
कार्यको देखकर यह कहता है कि 
ूर्वाहमे ये घट-शरावादि केवर 
स्तिफा ही थे उसी प्रकार यहाँ भी 
'यह आरम्भर्मे केवर सत्‌ ही था 
फसा कहा जाता है । यह एक ही 
था; अर्थात्‌ जपने कायंवर्गमे पतित 
कोई दूरा नहीं था, इसलिये ए 
हीथाः रसा कहा जाता है। 
ओर अद्वितीय था; मृत्तिकासे 
अतिरिक्त [ दूसरी वस्तु नक्ष थी] 
जिस प्रकार सृ्तिकको धटदि 
आक्रारमे परिणत करनेवाङा कुल 
आदि निमित्तकारण देखा नाता दै 
उसी प्रकार सत्‌से भिन्न सतका 
सहकारी कारणदूप कोई अन्य पदाथ 
पराप्त होता दे, उसका “अद्वितीय था" 
फेसा ककर प्रतिषेध किया जाता है । 
अर्थात्‌ इससे भिन्न को$ दृ्री वस्तु 
नहीं थी, इसण्यि यह अद्धितीय था। 


खण्ड २ ] शाङ्रभाष्याथ ५८५ 


नलु वैशेषिकपक्षेऽपि सरसा- | शङ्ा-र्रितु सत्के साथ सबका 
सामानाधिकरण्य तो वैशेषिक मतमें 
। भी सम्भव है; क्योकि द्रव्य एवं 
पद्यते, द्रव्यगुणादिषु सच्छब्द्‌- | गुण भादिमे सत्‌-रब्द भौर सद्‌- 
बुद्धथतुवृ्तेः; सदद्रव्यं सन्गुणः | 1 ६ 
सत्कर्मेत्यादिदशेनात्‌ । | कर्मः इत्यादि प्रयोरगोमिं देखा जाता ै। 

सत्यमेवं स्यादिदानीम्‌, प्राः; समाधान -टीक दै, वर्तमानं 
वैशेमिककल्पितात्‌ गुत्यत्तस्तु नेषेदं 


फार्म तो रेषा हयी है, ईति 
सतोऽत्र भेदः कायं सदेवासी- | उलत्तिसे पूवं यह कायं सत्‌ दी 
प्रदशंनम्‌ दित्यभ्युपगम्यते 


था-पेसा वैदोषिक मतावरम्बर्योको 

वैशेषिकैः; प्रागुत्त्तः कारयस्या- | मन्य नही है, वरयोकि उससे 

चैकमेव | पूव % कायका भव स्वीकार 

पा 9 (ज ध करते दै । उत्पत्तिसे पूवं एकमात्र 
सददितीयं प्रागुतपत्तेरिच्छन्ति । 

तस्मादवेशेषिकपरिकन्पिठात्सतो- 


अद्वितीय सत्‌ ही था-पेञ्चा मानना 
उन्दं अभी नही है । अतः भृक्तिका 
ऽन्यत्कारणमिदं सदुच्यते म्रदा- 
दिदृष्टान्तेभ्यः । 


आदिके दष्टान्तोसे यह वैरोषिका्रारा 
तत्र॒हैतस्मन्प्रागुखततेवस्तु- 


॥ 
परिकसिपत सत्की अपेक्षा भन्य 
वेनाशिकमतम्‌ निरूपण एके वेना- 





मानाधिकरण्यं सर्वस्योप- 


सत्‌ फारण बतलाया जाता हे । 
लिका आवसत्‌ 


इस विषयमे अर्थात्‌ उत्पत्तिसे 
पूवं वस्तुका निरूपण करनेम एक 
यानी वैनाशिक ८ बोद्ध ) वस्तुका 

निशूपयन्तोऽसत्सदमावमात्र प्रा 

गुत्पत्तेरिदं जगदेकमेवाग्रेऽद्विती- 

यमासीदिति । सदभावमात्रं हि 


निरूपण करते हुए कहते रै-- 
“उत्पत्ति से पूवं आरम्भे यह जगत 
्रागुतप्ेस्तच्चं कल्पयन्ति 


दक अद्वितीय असत्‌ अर्थात्‌ सतक 
अभावमात्र दी था। वैद्ध लोग 
उत्तिसे पूवं सत्क अभावमातरकरो 


भ<दे 


छान्दोष्योवनिदय्‌ 


[ लष्याथ ६ 


०७८ 8 84 ~ 2 ~ 


१4 
बौद्धाः । न तु सखरतिदन्द वस्त्व दी तत्त्व मानते दै । बे सत 


न्तरमिच्छन्ति; . यथा सचास- 


विरोधिनी कोई अन्य वस्तु नह 
मानते; जैसा क्रि नैयायिका मत 


दिति गृह्यमाणं यथाभूतं तदहिष- हे कि गृहीत होनेवारी यथामूत 


रीतं तखं मवतीति नैयायिकाः। 

नयु सदभावमात्रं प्रागुत्पत्ते 
वेनारिकमत- चेदभिप्रेतं वैना- 
समीक्षणम्‌ क्िकैः, कथं प्रागु- 
त्पत्तेरिदमासीदसदेकमेवादितीयं 
चेति कालसंबन्धः संख्यासंव- 
न्धोऽद्वितीयत्वं चोच्यते तैः | 

वाटं न युक्तं तेषां भावाभाव- 
मात्रमभ्युपगच्छताम्‌ । असच्छ- 
मात्राभ्युपगमोऽप्ययुक्त एव, 
अभ्युपगन्तुरनभ्युपगमानुपपत्तः। 
इदानीमभ्युपगन्ताभ्युपगम्यते न 
प्रागुत्पेरिति चेत्‌ १ न; प्रागु- 
त्पत्तेः सदभावस्य प्रमाणाभा- 
वात्‌ । प्रागु त्पत्तेरसदेवेति कन्प- 
ना पपत्तिः । 


वस्तु ओर उससे विपरीत त्व ये 
क्रमशः सत्‌" ओर असक्‌ है । 
शङ्का-यदि वैनाश्चिक उतपत्िसे 
पूवं सत॒करा अभावमात्र हौ मनते 
है तो 'उदत्तिसे पूवं यह एकमत्र 
धद्वितीय असत्‌ ही था एसा कह 
कर वे उसका कालसम्बन्ध, संख्या- 
सम्बन्ध ओर अद्वितीयत्ल कते 
निङ्पण करते है ए 
समाधान-टीक दहै, सतकी 
असत्तामात्र माननेवाले उन रोगोका 
ठेसा कहना उचित नहीं है । इसके 
सिवा उनका अघत्तामात्र मानना 
भी अनुचित ही है; क्योकि जोएिा) 
माननेवाख दहै उसका न मानना 
सम्भव नहीं है । यदि कहो कि दष 
समय तो माननेवारा भना दी जता 
उतत्तिसे पूवं ही नहीं माना नात, 
तो एसा कहना ठीक नही; क्योकि 
इस प्रकार उत्पत्तिसे पूवं सतक 
अभावो सिद्ध करनेवाला कोद 
प्माण नही रहता, ओर 
उसससि पूव अघत्‌ ही था! देती 
कर्पनाका होना सम्भव नहीं होता । 


ण्ड २ |] 


ननु कथं वस्त्ाकृतेः शब्दां 
तवेऽसदेकमेवाद्वि तीयमितिपदा्थ- 
बाक्यार्थोपपत्तिः, तदनुपपत्तौ 
चेदं वाक्यमप्रमाणं प्रसज्येतेति 


चेत्‌ ? 

नैष दोषः, सद्ग्रहणनितति- 
मीमां सकोद्धावित-पुरत्वाद्वाक्यस्य । 
दोषनिराकरणम्‌ स॒दित्ययं तावच्छ- 


ब्दः सदा तिवाचकः । एकमे- 
वाद्वितीयमित्यैतौ च सच्छब्देन 
तथेदमासी 

दिति च। तत्र नञ्‌ सदाक्ये | 


समानाधिकरणो; 


सदवा्यमेवावस्नय सदराक्याथं- 
विषयं बद्धं सदेकमेषाद्वितीयमि 
दमासीदित्येवंलक्षणां ततः सदा- 


क्यार्थानिवतंयत्यश्वारूढ इवाश्चा- 
लम्बनोऽशवं तदमिग्रुखविषयानि- 
वतेयति तद्वत्‌ । न ठ पूनः सद्‌- 


४५ 
श्ाङ्करभाष्याथं ५८७ 
3-9-94 >>> 8-4-89 9 98 8 


मीमांसक-कितु शाब्दका अर्थ 
तो वस्तुकी आक्रति ही होती है, 
एसी जवस्थारमे एकमात्र अद्वितीय 
असत्‌ दी था, इन पदोका शथवा 
इस वाक्यका अर्थं कैसे ठीक दहो 
सकता है ! ओर ठीक न हो सकने- 
पर्‌ तो यह [ शरुतिका ] वाक्य दही 
अप्रामाणिक सिद्ध होगा । 

सिद्धान्ती- यहाँ यह दोष नही 
आता; क्योकि यह वाक्य केवलः 
सत्को ग्रहण करनेकी निवृत्ति करने 
मात्रम ही तासप्यं रखता है । “सतह 
शब्द तो सतक आहृता वाचक 
हे ही । "एकमत्र अद्वितीयः ये दोनों 
शब्द घत्‌' शब्दके साथ समानाधि- 
करणरूपसे प्रयुक्त हैँ । इसी प्रकार 
इदम्‌" भर “आसीत्‌, शब्द्‌ भी 
समानाधिकरण है । एेसी अवस्थामे 
सद्‌-वक्यमे प्रयोग क्षिया हा 
नञ्‌ › सद्‌-वाक्यको ही सालम्बन 
करके (एकमात्र भर्वितीय सत्‌ दी 
थाः रेसी सद्‌-वाक्याथसम्बन्धिनी 
जुद्धिको, निस प्रकार कि घोडेपर 
चदा हुआ पुरुष घोड़का ही आश्रय 
लेकर उसे उसके अभिमुख विषयोंसे 


फेर देता है उसी प्रकार, सद्‌-वाक्यके ` 


असे निवृत्त कर॒ देता दहै । वह 





१. “असत्‌ शब्दम जो “अः हे उसीको "नञ्‌ कदो गया ३। 


५८८ छाण्दोन्वोवनिवत्‌ [ जष्वाल ६ 


भावमेवाभिधन्ते । अतः पुरुषस्य | सतके अभावका ही निरूपण नह 
| करता अतः पुरुषके विपरीत अणक 
निवृत्तिके रियि दही "यह्‌ भसत्‌ ही 
सदेवेत्यादि वाक्यं प्रयुज्यते । | था, इत्यादि वाकयक़ा प्रयोग श्वा 
क त ~ , | गया ह । विपरीतमहणको दिल 
दशयित्वा हि विपरीतगरहणं | कर ही उससे. निवृत्त करना सम्भव 
ततो निवर्तयतु शक्यत इत्यर्थ | हे । इस भ्रार असत्‌ आदि वाक्य 
साथक होनेके कारण उसका श्रोत 

वच्वाद्सदादिवाक्यस्य श्रौतत्वं | जर प्रामाण्य सिद्ध ही है | अतः 
॥  _ | इसमेकोदै दोष नदी दहै। उप 
भरामाण्यं च सिदधमित्यदोषः । | सर्वामावरूप असतूसे सत्‌ भरत्‌ 
तस्मादसतः सर्वाभावसूपात्पदटि- | विद्यमान कार्यनात उद्पत् 0 । 
[मूलम 'सज्जायतः के स्थानम्‌ सत्‌ 

दयमान जायत ॒सयुत्पन्नम्‌ । | अनायत एसा होना चाहिये था, 


सो (जायतः इस क्रियापदं | 
अडभावरछन्द्सः ॥ १ ॥ । अक्षा अभाव वैदिक है ॥ १ ॥ 


छ २० 


विपरीतग्रहणनिवृत्यथंपरमिदम- 


तदेतद्विषरीतग्रहणं महावै- | इस भकार यदह विपरीतमहणस्प 
नािकपकषं दशेयित्वा प्रति | महावेन शिकका पक दिखलाक्रं जव 
पेधति- [ आरुणि ] उक्षका प्रतिषेध करता दै- 

कृतस्तु खट सोभ्येवरस्यादिति होवाच कथम- 
सतः सज्नयेतेति । सत्रेव सोभ्येदमम आसीदेक- 
मेवाद्ितीयम्‌ ॥ २ ॥ 


“कितु हे सोम्य ! पेसा कैसे हो सकता है, भल ॥ 

स , भरा असतसे सतर 
उत्पत्ति केसे हो सकती है १ अतः हे सोम्य | आरम्भे 9 एकमात्र 
अद्वितीय सत्‌ दी था' देसा [ आरगिने 1 कदा ॥ २ ॥ 


खच्ड 2] 


छाह्करथाष्वा्थे 


१८९ 


~ (~ (र र ऋ + 


कुतस्तु ब्रमाणात्खलु हे सो-, पिति हे सोम्य | देषा फिप 


वैनाशिकमत- ्यैवं स्यात्‌, असतः 
खण्डनम्‌ सज्ञायेतेत्येवं इतो 
वेत्‌ १ न इतधित्प्रमाणादेवं 
संमवतीत्यर्थः । यदपि बीजोप- 
मर्दङ्करो जायमानो दृष्टोऽमावा- 
देवेति, तदप्यम्युपगमविरुद 
तेषाम्‌ । कथम्‌ १ ये तावद्बी- 
जावयवा बीजसंस्थानविशिषटास्ते 
इदकुरेऽप्यनुवर्तन्त॒ एव, न 
तेषाग्रपमर्दो ङ्कुरजन्मनि । यत्पु- 
ननीजाकारसंस्थानम्‌, तद्बीजा- 
वथवण्यतिरेकेन वस्तुभूतं न 


वैनारिकैरम्युषगम्यते, ्‌ 


न्मन्युपमृधेत । अथ तदस्त्यवयव- 


व्यतिरिक्तं वस्त॒भूतम्‌, तथा 
च सत्यभ्युपगमविरोधः। 
अथ संबृत्याभ्युपगतं बीज- 


प्रमाणसे हो सकता है ? भर्भात्‌ 
असत्से सत्‌ उखन्न होरे कैसे 
हो सकता है १ तालपयं यह है किं 
एसा ्ोना किसी भी प्रभाणसे 
सम्भव नहीं षै तथा वेरोग नो 
यह मानते है किं बीनक्ता नाश 
होनेपर भमावदीसे अङ्कुर उस्न 
होता देखा गया है वह भी उनके 
ही सिद्धान्तके विद्ध है । किस 
प्रकार विरुद्ध है १ बीजके आकारसे 
युक्त जो बीजक भवयव हँ उनी 
अनुवृत्ति अङ्कूर भी होती दी दै; 
अद्ुरके उन्न होनेपर उनका नाश 
नही हो जाता । तथा जो बीजाकार- 
का संस्भान है उसे तो वैनमलिक 
मी बौजके भक्यवोसे मिक्त कोर 
वस्तु नह मानते; जिघष्ठा किं 
अदकरकी उत्पत्ति होनेप्र नाश हो । 
यदि कहो कि बीनावयरवोसे ग्यति- 
रिक्त वह वास्तविक स्वखूपसे हे तो 
यह्‌ उनकी ही मान्यताके विरुद्धहोग। 


य॒दि कहो किं संवृति ( ीक्रिक 
व्यवहार ) द्वारा माना गया बीज- 
संस्थानका ख्य नष्टदहोता दै तो यह 


संस्थानरुपघुपभद्यत इति चेत्‌ १ । बतो किं यह संहति कथा 





५९० 
केयं संवरृतिनाम-किमसावभाव 
उत भाव इति ? यच्यभावः, दृष्टा- 
न्ताभावः। अथ भावः, तथापि 
नाभावादङकरोसपत्तिः; बीजावयवे- 
भ्यो हङ्कुरोरपत्ति । 

अवयवा अप्युपमूद्यन्त इति 
चेत्‌ १ न; तदवयवेषु तुल्य- 
स्वात्‌ । यथा वैनाशिकानां 
बीजसंस्थारूपोऽवयवी नास्ति, 
तथावयवा अपीति तेषामत्युप- 
मर्दायुपपत्तिः । बीजावयवाना- 
मपि ष्ष्मावयवास्तदवयवाना- 


मप्यन्ये दरक्ष्मतरावयवाः इत्येवं 


छान्दोग्यो पनिषद्‌ 
> > 9 ८ 3 9 1 3-८-9८ 2-3-2८ 8-8८-2 >< ऋ 


[ बण्याथ ६ 
६.4 ॐ 3 
चीन ह । यद भाव दै या जमाव? 


यदि अमाव है तो [अमावस भाक 
उतयत्ति होने ] कोर इष्टनत नही 
है 1 [ अतः अभावह्पा सूरि 
बीजक सत्ताकी साधिका नही हो 
सकती ] ओर यदि भावद्ैतोभी 
सभावसे अ्कुरी उत्पत्ति होना 
सिद्ध नहीं होता, क्योकि अङ्क 
उत्पत्ति तो बीजके अवयवस ही 
होती है । 

ओर यदि रेषा मानँ कि भव- 
यरवोका भी नाश्च हो नाता दै 
तो रसा कहना ठीक नहीं, कर्ोढि 
यह दोप अवयवीके समान दही 
उसके अवयवोँमे भी है । निसं 
मकार वैनाशिक मतम बीन 
संस्थानरप अवयवी नही है उसी 
पकार अवयव भी नदीं है; अतः 
उनका नाश होना सम्भव नहीं है। 
वीजावय्वोके भी सुक्ष्म सवयव होने 
चाहिये ओर उन अवयर्वोके भी 
दूसरे सृकष्मतर अवयव होने चादिये- 
इस प्रकार प्रसङ्गकी अनिवृत्त 
( अनवस्था दोष ) होनेके कारण 


+ गा € । 
प्रसङ्खस्वानिवृत्तेः सर्व्ोपमरदानु- | सवत्र नाञ्च होना सम्भव नहीं है 


पपत्तिः । सदूयुद्धथनुत्ते स- 
त्वानिदृ्तिधेति तद्वादिनां सत 


| तथा सर्वत्र सदूगद्धि्ी अनुदरति 


होनेके कारण स्वकौ निवृत्ति नहीं 
होगी । इस प्रकार सद्रादिर्योी 
मानी हुई सतूसे सती उलि 


खण्ड २ | 


चशाङ्रभाष्याथ 


५९१ 


>~ 8-८-9८ ८ 9 ८ 9 (ऋ 9 ट ऋ ऋ ऋ 9 ऋऋ 


एव सदुत्पत्तिः सेर्स्यति । न | दी सिद्ध शेगी । असतूसे सत्क 


त्वसद्वादिनां दष्टान्तोऽस्त्यसतः 
सदुतत्तः। मृतिपण्डाद्बटोततति- 
दश्यते सद्वादिनां तद्भावे भावा- 
तदभावे चाभावात्‌ । 
यद्यभावादेब धट उत्पद्येत 
घटार्थिना सृत्िण्डो नोपादी- 
येत । अभावशब्दबुद्धथुदृत्तिश् 
घटादौ प्रसज्येत न त्वेतदस्त्यतो 
नासतः सदुत्पत्तिः । 
यदप्याहद्‌बद्विषंयवदधेनि 
मित्तमिति द्बद्विभव्ुदः 
कारणमुच्यते, न तु परमाथत 
एव सरद्षटो वास्तीति; तदपि 
मृबरुद्िर्वि्यमाना विद्यमानाया 


एव षटबुद्धेः कारणमिति नासतः 


खदुत्पत्तिः । 


उत्पत्ति होनेमे असद्वादिर्योके पास 
कोई दृष्टान्त भी नरी है । षद्रा- 
दिर्ोकि म्मे मृत्तिकाके पिण्डसे 
धटक्री उसत्ति होती" देखी गयी है; 
क्योकि उसकी सत्ताके रहते हुए 
घटी भी पत्ता है भौर उसका . 
अभाव होनेपर घटका भी भाव 
हो जाता है। 

यदि भभावसे ही घटकी उस्पत्ति 
होती तो घट बनानेकी इच्छावाले- 
को मृततिकाकरा पिण्ड केनेकी आव- 
इयकता न होती तथा षटादिरमे 
अमाव, शाब्द ओर भमाव-बुद्धिकी 
अनुवृत्तिका भी प्रसंग उपस्थित 
होता । किंतु पेसा है नह । इसख्ि 


असत्ूसे सतक उसत्ति नही हौ 


सकती । ` - “` ` 

इसके सिवा वे रोग जो पसा 
कहते है कि मृरिकाबुद्धि षटगद्धि- 
का निमित्त दै; भतः मृदूबुद्धि ही 
धटबुद्धिका कारण कंदी जाती है, 
वस्तुतः मृत्तिका अथवा घट कुछ 
मी नदौ दै" इसके अनुसार भी 
विद्यमान मृद्बुद्धि ही विमान षट- 
बुदधिका कारण दै; अतः अघ्तूसे 
सती उत्ति सिद्ध॒नही 
होती । 





५९२ छान्दो ग्योपनिषष्‌ [ बण्या ६ 


~अ 9 ¬ ~: ¬ > ऋ: ऋ 7 ८ + >: >< > >< 5 ॐ >8ऋ< 
मृदूघटबुद्थोनिमित्तनैमित्ति- | यदि कटो कि पृदूबुदधि तथाषः. 
कतयानन्तयंमात्रं न तु का्य- | बुद्धिका निमित जौर नैमितिकषे 
कारणत्वमिति चेत्‌ १ नः; जानम््मान हैः काय कारण मा 
धीनां तैरन्तये गम्यमाने नहीं है तो एेसा कहना भी दीकनहीं 
९ क्योकि इन बुद्धियोकीौ निरन्तरताका 
वनारिकाना. बहिदृनता- ज्ञान करानेमे वैनाशिक पस 
मावात्‌ । कोई बाह्य दष्टन्त नही || 
अतः इतस्तु खलु सोम्येवं | (भतः हे सोष्य ! पेल कते हे 
सकता है ? एता आरुणिने कहा । 
अर्थात्‌ असत्‌से सत्‌की उलत्ति 
कैसे- कि प्रकार हो सकती दै। 
तासयं यह्‌ दै कि अप्तूसे सत्क 
उत्पत्ति होनेमे कोद भी दृ्टान्तका 
प्रकार नही हे । इस तरह अस- 


स्यादिति दोवाच कथं केन 
प्रकारेणासतः सज्जायेतेति । 
असतः सदुत्यत्तौ न कश्चिदपि 
दषटान्तप्रकारोऽस्तीत्यमिप्रायः । 


"~~~ -------~---------------- ~. 


एवमसद्रादिपकषमन्मथ्योपसंह- | दादीके पक्षका उन्मन्थन (निरसन) 

कर आरणि €े सोम्य | भारभ 
रति स्वैव सोम्येदयग्र आसी- | यह सत्‌ ही था' इच पकनर भके 
दिति स्वपक्षसिद्धिम्‌ । | पक्षक सिद्धिका उपसंहार करवा दै । 


नलु सद्वादिनोऽपि सतः| शङ्ा-कषितु स॒द्रादीके ॥ 
'उत्परि ती 
सदुत्यद्यत इति नैव दृषटान्तो- सतसे सतकी `उपत्ति हरत 


९ | इसमे भी तो कोई दृष्टान्त नी 
ऽस्ति। घराद्घटान्तरोत्पत्यदश्च- $ ग्य पक पठते दृषरे षर 


नाद्‌ । उस्न होती नही देखी नाती । 
(ता दाता ना दसा ना 


8 अयात्‌ पटे म॒द्‌ ड - यस वित 
बा द्बुद्धि होती है उसके बाद घयबुद्धि- यदी भू 

‡ बोडमवावल्बी बा पदा्थोकी सता नह मानते; अतः उनके चिद. 
न्तानुसार मूद्बुद्ध, घयबुदधि आदि भौ असत ये नका नैरन्तर्यं 
अथवा निमित्त-नैमित्तिकत्व बतलाना $ | ई (लिः सत 


खण्ड २] 


शाहृष्माष्याथे 


५९३ 


सत्यमेवं न सतः सदन्तर- 


मुत्पद्यते किं तरिं ? सदेव संस्था- 


समाधान-यह ठीक हे, एक 
सतूसे दूसरे सत्‌की उत्पति नहीं 
होती। तो फिर क्या होता है 


नान्तरेणावतिषएते । यथा सपः | सत्‌ दी एक दूसरे आकारमे स्थित 
रलः र दो जाता है, निप प्रकार किं सषं ही 
इण्डलाभवति । यथा च चच्वृग| कु्डी हो जाता है चौर जैसे 


पिण्डधटकपालादिप्रभेदेः । 
यदेवं सदेव स्प्रकारावस्थं 
कथं प्रागुरपत्तरिदमासीदित्यु- 


च्यते | 
नलु न श्रुतं त्वया सदेवेस्य- 


वधारणमिदंशब्दवाच्यस्य 
प्राप तर्दिं प्रागुत्यत्तरसदेवा- 
सीन्नेदंशब्दवाच्यमिदानीमिदं 
जातमिति । 

न; सत॒ एवेदंशब्दुद्धि- 
विषयतयावस्थानाद्यथा गदेव 


पिण्डघटादिशचब्दयुद्विविषयत्वेना- 


वतिष्ठते तद्त्‌ । 
ननु यथा गृदरस्त्ववं पिण्ड- 


| सृरिका ही चृणे, पिण्ड, घट, कपालादि 
| दोसे स्थित हो जाती दै । 
शङ्ा-यदि रेसी बात है तो 
सम्प प्रकारोमे स्थित सत्‌ दी है 
फिर यह क्यों कहा जाता है कि यह 
उत्पत्तिसे पूवं था ! 
समाधान -भरे । क्या तूने नहीं 
सुना कि सदेव" यह पद्‌ इदशब्द- 
वाच्यका निरचय करानेके यि है । 
शङ्ा-तव तो यह सिद्ध होता 
है कि उत्पत्तिसे पूवं भसत्‌ दी था, 
इदं शब्दवाच्य नहीं था, यह अभी 
उन्न हुभा है । 


समाधान-एेसी बात नदीं है, 
वर्योकिं जिष प्रकार सिका ही 
पिण्ड एवं घटादि शब्द ओर बुद्धि- 
का] विषय होकर सिद्ध होती है उसी 
प्रकार सत्‌ ही इदंशन्द ओर इदं- 
बुद्धिके विषयखूपसे स्थित होता दै । 


शक्क-कितुि ज्कि प्रकार 





५९७ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मध्याय ६ 


घटाधपि तदरत्सद्बुद्धन्यबुद्धि- | मृति क्तु है उती प्रकार पष 
| ओर घयादि भी है । उनहीके 
विषयत्वात्कारथस्य सतोऽनयद- | भौर पदि भी हं । उनके षमा 


स्तवन्तरं स्यात्कार्यनातं यथा- 


स्वादोः | म 
न; पिण्डघटादीनामितरे- 
तरव्यभिचारेऽपि सृचाव्यभि- 


चारात्‌ । सद्यपि घटः पिण्डं 
व्यभिचरति पिण्डश्च घटं तथा- 


पि पिण्डधटौ सृखं न व्यभि- 
चरतस्तस्मान्प्रन्मात्रं पिण्डघटौ 
व्यभिचरति त्वद्वं गौरद्वो वा 
गास्‌ । तस्मान्म्रदादिसंस्थानमात्र 
घटादयः । एवं सत्संस्थानमात्र- 
मिदं स्वमिति युक्तं प्रागुत्पत्तेः 

सदेवेति; बवाचारम्भणमात्रता- 
दविकारसंस्थानस्य । 

नलु निरवयवं सत्‌, “निष्कं 

निष्कियं शान्तं निरवद्यं निर- 
्नम्‌'' ( दवेता०उ० ६।१९) 


| सतका काथं सद्ुद्धिसे जनयवुद्धि 
का विषय होनेके कारण वह सत 
अपेक्षा कोई अन्य वतु होना 
चाहिये, लिस प्रकार क अधे गो। 
समाधान-एसी बात नहीं है, 
क्योकि पिण्ड ओर षटादिका पए्रघ्रर 
भ्यमिचार होनेपर भी उनमें मतत 
कालका व्यभिचार नदीं है । यद्यपि 
षट पिण्डसे प्रथक्‌ रहता है ओर 
पिण्ड षल्से, तो भी पिण्ड ओर 
षट दोनों ही मृत्तिकात्से फभी 
पथक्‌ नहीं होते । भतः पिण्ड भौर 
घट आदि तो ृत्तकमात्र ही दै। 
कितु भरव गौको ओर गौ 
अस्वक प्रथक्‌ करते है; इसस्मि 
घटादि केवर मृततिकादिके संस्थान 
(भकार) मात्र है । इस 
प्रकार यह सारा जगत्‌ सत्‌का संध्था- 
नमात्र॒ दहै । अतः उत्य्तसे पूवं 


सत्‌ ही था-यह कथन ठीक ही 
है, क्योकि विकारसंस्थान तो कैव 
वाणीके ही आधित दै । 


शङ्का-क्रितु “पुरूष निष्कट, 
निष्किय, शान्त, निरमरु, निरेप है" 
तथ्‌ दिव्य,अमूरत, बाहर-मीतर वृर्त- 


ध 
ह्लण्ड १० श्ाङुल्मास्याथ ४९९ 
~ >< > >< >8८ 9८ > ¬< -9८ >&८ -2: -8 ¬> < ~ 9 9 ~ 9-8-82 


“दिव्यो मूतं पुरुषः सबाद्या- | मान ओर जन्मा दहै" इत्यादि 
भ्यन्तरो द्यजः"*्रु०उ०२।१।२)| शरुतियोके अनुसार खत्‌ निरवयव है । 


इ्यादिथुतिभ्यो निरवयवस्य | 
कथं विकारसंस्थानश्रुपपदयते । 
नैष दोषः, रज्ज्वा्वयवेभ्यः 
सर्पादिसंस्थानववबुद्धिपरिकल्पि 
तेभ्यः सदबयवेभ्यो विकार- 


उस निरवयव सत्‌का विकार संस्थान 


दोना त सम्भव है? 


इसमे कोई दोष नही 
ट, क्योकि रज्जु णादिके भवगर्से 
सर्पदि आकारकी प्रतीतिके समान 
बुद्धिसे कपना छिये हुए सत्के 


अवयर्वोसे विकारसंश्थानक् प्रतीत 
होना सम्भव है; जेवा फिकदा है- 
“विकार वाणीके आधित केवल ` 
नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है । 
इसी प्रकार 'सत्‌ ही सत्य है" इस 
श्रतिसे प्रमाणित होता है । वस्तुतः 


संस्थानोपपत्तेः (“वाचारम्भणं 
विकारो नामधेयं ृत्तिकैत्येव 
सत्यम्‌" ( छा०उ०६। १।४) 
एवम्‌ “सदेव सत्यम्‌" इति भरुतेः। 
एकमेवाद्वितीयं परमार्थत इदं- | इदंुद्धिके समय भी वह एकमात्र 
बुद्धिकाठेऽपि ॥ २ ॥ अद्वितीय ही है ॥ २ ॥ 
तदैक्षत बह स्था प्रजायेयेति तत्तजोऽखजत । 
तत्तेज फेक्षत बह स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसजत । 
तस्माद्यत्र छ च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव 
तदध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥ 
उत ( सत्‌ ) ने ईक्षण किया रँ बहुत हो जाऊ-नेक प्रकारसे 
उत्पन्न होऊं” । इस प्रकार [ दैक्षण कर ] उसने तेन उत्पन्न किया । 
उस तेजने षण किया भे बहुत हो जाञं- नाना भरकारसे उलन्न 
होऊं । इस प्रकार [ रक्षण कर ] उसने जरुकी रचना की । इघरीसे 


जहो कीं पुरुष शोक ८ संताप ) करता है उसे पसीने जा जते है । 
उस समय वह तेजसे दी जली उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥ 





५९द छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मष्वाव ६ 


न >< 1 < ह 80 
तत्सदकषतक्षां दशनं कृतवत्‌ । ¦ उस सतूने ईक्षण रिया, षण 


+, “ | अर्थात्‌ दशन किया । इसत हि 
अतश्च न प्रधानं सांख्यपरि- | होता है कि सास्यङ्गा कल्पना 


कल्पितं जगत्कारणम्‌; प्रधान | किया इ परषान जगता का 

| न्ह ह, क्योकि प्रपान अचेतन 
स्याचेतनत्वाभ्युपगमात्‌, इदं तु | माना गया है भौर यह सत्‌ वण 
सच्चेतनमीकषिटत्वात्‌। तत्कथ. | करनेके करण चेतन है | उषे 


१ किस प्रकार ईक्षण शरिया सो श्रि 
भत ! इत्याह-बहु प्रभूतं सथां | बताती है- भ बहु--अधिकदो 


भवेय प्रजायेय प्रकरणोतप्ेय । | जाऊ" शरनायेय' -भकष्॑े उन 
| होऊ, जिस्र प्रकार कि षटि 
पथा छद्षटा्याकारेण, यथा आकारसे भृतका अथवा वद्धि 


~. | क्पना किये हुए सर्पदि भकरारमे 
रन्वादि सर्पाचाकारेण इुदि- | रच उदन दनो द । 
परिकल्पितेन । शङ्का-तव तो रज्जु निस प्रका 
असदेव तहिं सवं यद्गृह्यते | सर्पादि' आकारसे ग्रहण की जाती 
हे उसी प्रकार जो कु ग्रहण किय 
रज्जुरिव सर्पाद्याकारेण । | जाता है वह सत्‌ ही है । 
` न; सत एव देतभेदेनान्य-| समाधाननं, दमारा तो वह 
यु कथन दै कि दरैतमेदूसे सत्‌ 
यायृद्माणत्वानासचवं कस्यचि-| अन्यथाूपसे गृहीत होनेके का 
चिदिति कभी किसी पदार्थकी भसतता सही 
त्क ; सतो- 
त्कचिदिति बूमः । यथा सतो 11 


ह अधिक स्पष्ट करते है- ] निस 
°न्यद्वस्त्वन्तरं परिकल्प्य पुनस्त- भकार तार्किकं रोग सतस मिन 


स्वव रागस्ते भष | किसी अन्य पदार्थ कपना क 


दक पि उलस्ति पूर्व ` जर नक 
सत्वं बरुवते तारका न तथा- परात्‌ उसकी असत्ता वतलाते 


खच्ड २] शाङ्करमाष्यार्थं ५९७ 
> ~8< ८ >8 < 9८ 9 < 9 ८-8-9८ >9८ 8 ८ अ 9 - 
स्माभिः कदाचि्कचिदपि स- उसी प्रकार हमरेद्रारा कभी कदी 

प ह ; भी सतसे भिन्न किसी नाम अ 
तोऽन्यदभिधरानममिघेये वा वस्तु म 
¦ नामकी विषग्रमूते वस्तुक कल्पना 
परिकल्प्यते । सदेव तु सव्‌- | नदी की नाती । सारे नाम ओर 
न { नो अन्धवुद्धिसे कदे जति है वे 
मभिधानम च यदन्यः | सरि ह सतही दे, निष वकर 
बुद्धा । यथा रखनुरेव सै. कि, नेकं र ही सपवद्धसे 
| (फं द प्रकार कदी जाती ह 
क अधवा जिस प्रकार मृत्तिकासे अन्य- 


पिण्डघटादिशब्देन अभिधीयते । पण्ड एवं षट आदि शब्दसे पुकारा 

„ , (जाता दै। जिस प्रकार रज्जुका 
लोके । रज्जविवेकद्रीनां ठ | विवेक करके देसखनेवाोकौ दृष्टे 
सर्फामिधानवुद्धी निवतंते यथा च | सप शब्दं ओर सधवदध निशत हो 


__ | नतिदै तथा पृ्तिकका विवेक 
द्िषकदधिनां षयादिब्द्‌- करके देखनेवाखकी द्मे घटादि- 


बुद्धी तद्त्सदविवेकद्विनामन्य- | श ओर तत्सम्बन्धिनी बुद्धिका 
_ „ | निरास हो जाता है, उसी भकार 
विकारशब्दवद्ी निवरतेते । | सतक विवेक करके देखनेवारकि 
“यतो वाचो निवसन्ते अप्राप्य | ल्य अन्य विकारसमन्धी शब्द 
ओर बुद्धि निकृत्त हो नाते दै, जेता 
कि “जहांसे मनके सहित वाणीः 
न परहुचकर लौट अती है" “जो 
वाणीका अविषय ओर अनाश्रय है 
उसमे” इत्यादि श्रुतिरयोसे प्रमाणित 


तिभ्यः । ' हयता हे । 


बुद्धा सपं इत्यभिधीयते यथा 


मनसा सह” (तै° उ . २।४) 
इति । “अनिरुक्तेऽनिर्यने' 





(तै उ०२।६। ११ श्त्याहि | 








९९९८ छान्दोग्योपनिषद्‌ ॥ ख्याय & 
>< 8८ ८ व (8-८८-8 55 2 


एवमीक्षित्वा तत्तनोऽचजत 
तेजः चुष्टवत्‌ । | 
नु "तस्माद्रा एतस्मादात्मन 


ऋ 
इस प्रकार रक्षण कर उसे 


तेजक्री रचना की | 
रुङ्का- फितु “उस इश्न भाता 
आकाश उतनन हुआ [तथा 
४ सआकाश्चसे वायु ओर वासे तेज 
आकाशः संभूतः" (तै० उ० त 
ष ॥ हमा ]" एेखी भी श्रुति दै । कि 
इति भूतिमिहं कथं प्राथम्येन | उसीसे सबसे षे तैज रचा गबा 
तस्मादेव तेजः घुञ्यते तत एव | णीर उसीसे आकफारा-यह विरुद 
चाकाशमिति बिरुदम्‌ । | कथन क्यो किया नाता है ! 
` नैष दोषः; आक्राशवायु-, समाधान-यदह कोई दोष नहं 
। दै, क्योकि यँ देसी कल्पना भी 
सरगानन्तरं तत्सत्तजोऽघृजतेति- कीजा सकती है कि आकार भौर 
१ प । वायुकौ रचनाके भनन्तर उक्‌ 
कल्पनोपपत्तः । अथ वाविशकषित | सतन तेजकी रचना की । अथव 
लत 0 गँ घष्टि- 
इद सुषटिक्रमः। सत्कार्यमिदं सरव.| यह भी सम्भव दै कि गं ए 
क्रम बतलाना इष्टन हो। यह 
व का कायै, 
मतःसदेकमेवाद्वितीयमित्येवद्वि- | चण _ जगत्‌ सत्‌ 
५६ 9 दि इसल्यि एकमात्र अद्वितीय सत्‌ ही 
५ है-- यही बतलाना इष्ट दो, क 
ब्ितम्‌, मरदादिदृषटन्तात्‌ । | करि यह सूरि आदिका चन्त 
वरिदृत्करणस्य दिया गया हे! अथवा त्रिवृक्कण 
९ विवक्षित | विवक्षित होनेके कारण श्रुति तेज, 
स्वाततेजोऽन्नानामेव सुष्टिमाचषट| अप्‌ जर अन्ती ही दधिका 
= निरूपण करती है । तेज--यह 
तेज इति प्रसिद्धं रोके दश्ध पक्त | द्य करनेवाला, पकानेवाल, 
€ = 
परकाद्चक ओर कुछ कार रका. 
प्रकाशकं रोहितं चेति । रोकमे प्रसिद्ध है । 





खण्ड २] लाश्ल्मस्याथ ५९९९. 
~9>9 > >< >< >< > > >< -9 >< >&< >8: 9: 8 ¬< ~< 9८ 8 < 4-9-98 ऋः 


तस्त्यृष्टं तेज रेक्षत तेजोरूप- | सतके रचे हुए उस॒तेनने 
ईक्षण किया; अर्थात्‌ तेनके रूपमे 
4 स्थित सत्‌ने भँ बहुत हो जाऊ - 
सां प्रजायेयेति पूववत्‌ । तद्‌- | जने परकारसे उन्न होऊं इष 


संस्थितं सदेक्षतेत्यथंः । बहु 


प्रकार पूर्ववत्‌ ईक्षण क्रिया । उतने 
जलरी रचना कौ ; जरु द्रवूप, 


रोके । यस्मात्तेजसः कार्यभूता | इ प्रर लोकम परसिद्ध दै । 

 _ _. | वर्योकि जरु तेजका कार्यमूत है, 
आपस्तस्माद्त्र क्व च देशे कारे | स = 
वा शोचति संतप्यते स्वेदते ¦ कामे पशष सोक-संताप करता है 
१ ६ | तो पीनसे युक्त हो नाता है । उप्त . 
भरस्वियते वा पुरुषस्तेजस एव | तमय तेजते दी जली उसरि 


पोऽस्जत । आपो द्रवाः स्निग्धाः 


तत्तदापोऽधिजायन्ते ॥ २॥ | होती दै ॥ ३॥ 


ता आप रेक्षन्त बहयः स्याम प्रजायेमहीति 

ता अन्नमस्जन्त । तस्मायत्र क च वषति तदेव भूयिः 
छमन्नं भवव्यद्ध च एव तदध्यन्नादय जायते ॥ 9 ॥ 
उद जने दैक्षण श्रिया हम वहत हो जायं--अनेक रूपसे उसन्न 

रह ॥ उसने अन्लकी रचन की । इससे जहां क वर्षाहोती है वही 
बहुत-सा अन्न होता है । वह अननाय नखं ही उत्पन्न होता है ५४॥ 
ता आप देक पूर्वदेवाबा- | उत॒ लने ईष्षण क्राः अर्थात्‌ 
„` 3 ~ 5 | ष्टटेहीकै समान जर्पमं स्थित 
कारसास्थत सदक्षतत्यथः | सते ईक्षण क्रिया । हम बहुत 3 
वह्यः प्रभूताः स्याम भवेम | अपिक हो जाय, भक उदन 
प्रनायेमलुसथेमदीति। ता अन्न ह ॥ उत धथिवीरूप अन्न 





&०© 


मदुजन्त॒ पथिवीलक्षणम्‌ । 
पाथिवं छन्नं तस्माद्यत्र क च 
वर्षति देशे तत्त्रैव भूयिष्टं 
प्रभूतमन्नं भवति । अतोऽद्धय 
एव॒ तदन्नामच्यधिजायते । ता 
अन्नमसृ जन्तेति प्रथिष्धुक्ता 
पूर्वमिह तु दृशन्तेऽ्नं च 
तदाद्यं चेति विशेषणादव्रीहिय- 
वाद्या उच्यन्ते । अन्नं च गुरु 
स्थिरं धारणं कृष्णं च रूपतः 
प्रसिद्धम्‌ | 

ननु तेजःप्रमृतिष्वीक्षणं न 
गम्यते द्िंसादिप्रतिषेधाभावा- 





क 


लरासादिकार्यानुपलम्भाच । तत्र 
कथं तत्तेज रेक्षतेत्यादि । 

नैष दोषः, ईशषिठ्कारणपरि- 
णामत्वात्तेजः प्रभृतीनां सत्‌ 
एवेक्षितुनियतक्रमविरिष्टकारयो- 
रपाद्कत्वाच्च तेजःश्रमतीक्षत 


इवेक्षत इत्युच्यते भूतम्‌ । 


छान्दोगयोवनिषद्‌ 


> 8-5-96 8८ 











[ सष्याय ६ 
ऋ 
रचना की । अन्न एवो 
ह, इसल्यि जहौ कहीं वरप होती 
है वही बहुतसा अन हो जात 
है । अतः वह अन्नाध नर्ते ह 
उत्पन्न होता है । “उसने न्नर 
रचना को, एेसा कहकर पहटे तो 
श्रुतिने अन्नः शब्दसे प्रथिवी की 
है ओर अव दष्टान्तम वह अन 
ओर आय ठेस विङ्ेषण देनेके 
कारण [ आद्य शब्दसे ] धान, 
नो आदि कहे ठै । अन्न भारी, 
स्थिर, धारण करनेवाल घौर 
खूपसे कृष्णवणं होता दै- रेषा 
परसिद्ध है । 

शङ्ा- कितु तेन आदि ते 
ईक्षण होना समञ्चमे नहीं अता; 
क्योकि उनमें हिंस्ादिके प्रतिषेधक 
अभाव है जर प्रास जदि कायं भी 
नदीं देखे जाते | फिरि श्रतिने 
(तेजने ईक्षण किया" इत्यादि कथन 
कैसे किया? 

समाधान- यह कोई दोष नही 
हे, कयि तेन आदि भूत दैकषण 
करनेवाले कारणके परिणाम है । 
ईक्षण करनेवाला सत्‌ दी नियठ. 
क्रमविशिष्ट होकर कार्यका तनन 
करनेवारा दोनेसे तेज आदि भूतेन 
मानो ईक्षण किया रेसे अरर 
&कषण किया, रेता कदा जात ३। 


शण्ड २] 


€ 


श्ाद्भरमाष्याथं ६०१ 


9 5 > 5 5 9 


नतु सतोऽप्युपचरितमेषेक्षि- 


वतम्‌ । 

न; सदीक्षणस्य केवलशन्द- 
गम्यत्वान्न शक्यश्ुपचरितं 
कल्पयितुम्‌ । तेजःप्रभृतीनां 
त्वनुमीयते धख्येक्षणाभाव 
इति युक्तयुपचरितं कल्प- 
यितुम्‌ । 


नु सतोऽपि मृद्रत्कारणत्वा- 
दचेतनत्वं शक्यमनुमातुम्‌ । 
अतः प्रधानस्येवाचेतनस्य सत- 
शरेतनाथत्वान्नियतकारक्रम- 
विशिष्टका्योत्पादकलवाच्चेक्षतेवेक्ष- 
तेति शक्यमनुमातुयपचरित- 
मेवेक्षणम्‌ । दष्टश्च लोकेश्चेतने 
चेतनवदुषचारः । यथा क्रुटं 
पिपतिषतीति तदरत्सतोऽपि 


स्यात्‌ । 
न; तत्सत्यं स॒ आत्मेति 


तस्मिन्नात्मोपदेशात्‌ । 


शङ्ा-फितु सत्‌का ईक्षण भी 
तो उपचारसे ही है १ 

समाधान- नी, सत्का ईक्षण 
केवल शब्दगम्थ है; ईसरिये वह उप- 
चारसे हे-रेषी कल्पना नही की ना 
सकती। तेज आदिके मुख्य ईैक्षण- 
का जमाव तो अनुमानसे सिद्ध दै; 
इपलियि उसे उपचरित मानना टीकदै। 

शङ्का-परतु ृिकाके घमान 
कारण होनेसे सत्‌के अचेतनत्वका 
मी अनुमान करिया ना सकता हे । 
अतः अचेतन प्रधानखूप जो सत्‌ दै 
वह चेतनके प्रयोजनके लिये है भोर 
नियतकारक्रमसे विशिष्ट कायका 
उत्पादक दै, इस कारण उसीने ईक्षण 
करनेके समान ईक्षण किया-इस प्रकार 
उका क्षण उपचरित ही है, एेसा 
अनुमान किया ही जा सकता है । 
लोकम भचेतनमें चेतनके समान उप- 
चार होवा देखा हौ जाता है, जिस 
प्रकार “किनारा गिरना चाहता है 
एसा कदा जाता है उसी प्रकार 
त्का ईक्षण भी ओपचारिक हो 
सकता है । 

समाधान-रेसा नहीं हो सकता, 
क्योकि, "वह सत्य है" वह आत्मा 
है, एेसा कंकर उसी जलाकर 


| उपदेश कियागया दहै । 


६०२ 


छान्दोष्योपलिदद्‌ 


[ अध्याय ६ 


>~ 9 > 9 8-6-22 28 >~ < ऋ ऋ > 4 


आतमोपदेश्नोऽप्युपचरित इति 
चे्था ममात्मा भद्रसेन इति 


सर्वाथंकारिण्यनात्मन्पात्मोष- 


चारस्तदत्‌ । 
न; तदस्मीति सरषस्याभि- 


संधस्य (तस्य तावदेव चिरम्‌" 


इति मोक्षोपदेशात्‌ । 
सोऽप्युपचारं इति चेत्‌, 
प्रथानात्माभिसंधस्य मोक्षसा- 
मीप्यं वतत इति भोक्षोपदेशो- 
ऽप्युपचरित एव; यथा लोके 
ग्रामं गन्तुं प्रस्थितः प्राप्तवा- 
नहं ग्राममिति ब्रूया्वरापेक्षया 
तदत्‌ । 

न; येन विततातेनावि्तातं 
विज्ञातं भवतीत्युपक्रमात्‌ । स- 
त्येकस्मिन्विजञाते सवं विज्ञातं 
मवति तदनन्यत्वात्सर्वस्यादवि- 
तीयवचनाच । न चान्यद्िज्ञा- 


शङ्ा-यदि भद्रसेन मेश भला 
' इस वाक्यम जिस प्रकार आके 
सम्पूणं कां करनेवारे अनास 
भालका उपचार शिवा गया है 
उसी प्रकार यह भाल्मोपदेश भी 
उपचारसे हो है एसा मानं तो ! 
समाधान-एेसा कहना ठी 
नही,- वर्योकि वहत्‌ मटै 
इश्च प्रकार सतम ददर अभिनिवेश 
करनेवारेके स्यि "उसके मोक्षम 
अभीतक देरी है [ जबतक ङ 
शरीरपात नहीं होता ] इस प्रकर 
मोक्षका उपदेश किया गया है । 
शङ्का-यदि यह भी उपचार शी 
हो तो £ निस प्रकार लोकम गोव 
की ओर जनेवाडा पुरुष अपनी 
ी्ताकी जपेक्षासे कह देता ह 
कि तो गोम पर्व गया उपी 
रकार प्रधानम आलमबुद्धि के- 
वल्के ल्यि मोक्षी समीपता 
होनेके कारण यह मोक्षका उपदेश 
भी उपचारसे ही हो तो ! 
समाधान-नही, क्योकि जिसे 
जान लेनेपर बिना जाना हु भी 
जान ल्या जाता दे--एसा उपकर 
कतिया गया हे। एक सतक जान्‌ 
लेनेपर ही सव कुछ जान 
जाता है, वयोकि सव उससे अमिन 
हे ओर उसे अद्वितीय भी बत्य 


खण्ड २] 


शाङ्रभाष्या्थं दण 


तव्यमवरिष्टं रावितं शरुत्याजु- 
लिङ्गतोऽस्ति येन 
मोक्षोपदेश्च उपचरितः स्यात्‌ । 


सेयं वा 


सर्व॑स्प च प्रपाठका्थस्योपच- 
रिव्रत्वपरिकल्पनायां वृथा श्रमः 
परिकन्पयितुः स्यातपुरुषा्थसा- 
धनविज्ञानस्य सकेणेवाधिगत- 
त्वात्तस्य । तस्माद्ेदप्रामाण्यान 
युक्तः श्रुता्थपरित्यागः । अव- 
श्ेतनावतुक्षारणं जगत इति 
सिद्धम्‌ ॥ ४॥ 


गया है । उसके पिवा कोर ओर 
विज्ञातव्य न तो श्रुतिसे घना गवा 
षै बौरन किञ्ची हिन्नसे ही अनु- 
मान कियां जा सकता दै, जिषके 
कारण इष मोक्षोपदेको उपचरित 
माना जाय । तथा सारे प्रपाटकका 
उपचरितत्व माननेर्मे तो इस प्रकार- 
की कल्पना करनेवाटेका श्रम व्यथं 
ही होगा, क्योकि उघके सिद्धान्ता- 
नुषार पुर्पार्थका साधनभूत विज्ञान 
तो तक॑से दी षिद्ध हो जाता दै। 
अतः वेदद़ी प्रमाणता होनेके कारण 
इस श्रुत (भषिद्ध) भर्थका त्याग कटना 
उचित नहीं है । इष्य यह सिद्ध 
हुआ कि संसारका चेतन फरण है॥४॥ 


--! ० :~- 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि 


बष्ठाघ्याये 


द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पणंम्‌ ॥ २॥ 


स्यन्द 


~ ४: 








तृती छश 


सिका कम 
तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भव- 
न््याण्डजं जीवजमुद्धिलमिति ॥ १॥ 
उन इन [ पक्षी आदि ] प्रसिद्ध प्राणिर्योके तीन ही बीन हेते 
है भाण्डज, जीवन घोर उद्धिज्ज | १ ॥ 


तेषां जीवाविष्टानां खल्वेषां । जीवद्वारा आविष्ट उन इन पक्षौ 
(वादीनां जदि प्राणिर्योके--यौँ एषाम्‌ 
1 ॥ तानाम्‌) एषाः ठेसा प्रत्यक्ष निर्देश होनेके कारण 
मिति प्रत्यक्षनिर्देशान्न त॒ | [न पक्षी आदि मूतेकिः देता 
तेजःप्रभृतीनां तेषां त्रिवृत्कर- भृति मूलके रेता गथ कलना 
ठीक नही, कर्योकिं अगे त्रिवृक्रण- 
त्करणे प्रत्यक्षनिर्देयानुपपत्तिः । 

ह ५ म ्ितकरणके हुए बिना ही प्रलष 
देवतारब्दप्रयोगा्च तेजः- निदे वन नह सकता । इसके 
६ तिस्रो देवताः, इस प्रकार देवता, 
इति । तस्मात्तेषां खन्वेषां शब्दका प्रयोग होनेसे भी [ यहा 
विवक्षित ॒दै ]--अतः - इन 
त्रीण्येव नातिरिक्तानि बीजानि । प्श, पञ्च एवं स्थावर आदि भसद्धं 

कारणानि भवन्ति । अधिक वीज-कारण नहीं है। 











अथं करना चाहिये ] “उन तेनः- 
णस्य वक्ष्यमाणत्वादसति त्रिब- 

का वणेन किया जानेवाला दै ओर 
प्रभृतिष्विमास्तिखो देवता | सिवा तेज्रभृतिके ल्य शमाः 

1 ) ड ही 
भूतानां पक्षिपशुस्थावरादीनां भूतः शब्दसे पक्षी आदि 

मूतोक्रि तीन ही बीन दै, इसे 





खच्ड ३ ] शाङ्करभाष्वायं १०५ 


कानि तानि ? इत्युच्यन्ते, | वे कौनसे टै सो बतराये 
जाते है-आण्डन--अण्डसे उतपन्न 
हुएक्ो अण्डज कते दै, सण्डज 
अण्डजमेवाण्डजं पक्ष्यादि । | ही आण्डन है, अर्थात्‌ पक्ष 
पक्षिसर्पादिस्यो हि पक्िसर्पा- | आदिः क्योकि पक्षौ एवं सरदि 
१ पक्षी ओर सर्पादि उसत्र होते देखे 
दयो जायमाना दृरयन्ते । ग है ग 
तेन पक्षी पक्षिणां बीजं सष; | रै ओर सकि सर्प । इसी प्रकार 
अण्डेसे उतपन्न हुए अन्य जीव भी 
अपनी-अपनी जातिके बीन दै- 
तज्ञातीयानां बीजमित्यर्थः । | एेसा इसका तासर्य है । 
नन्वण्डाजावमण्डजञुच्यते- | शङ्भा- तु अण्डेसे उन्न 
हुएको अण्डज कदते है; इसल्यि 
अण्डा ही बीन दहै--पेसा कना 
उचित है; फिर अण्डको बीन 
कर्यो कहा नाता है £ 
सत्यमेवं स्थात्‌, यदि तदि-| समाधान यदि शति दुदारी 
, । इच्छाके भधीन होती तो सचमुच 
च्छातन्त्रा श्रुतिः स्यात्‌; ता ही होता; भि श्रत ललन 
स्वतन्त्रा तु शरुतिः, यत | ह, क्योकि उसने भण्ठन आदिको 
आदहाण्डजाचेव बीजं नाण्डा- | बीन वतछया है, अण्डे-आवकि नहीं 
< बतलाया । यदी बात देखी भी नाती है 
दीति । दृश्यते चाण्डजा- | कि मण्डन आदिक भाव होनेपर ही 
बरभावे तज्ञातीयसन्तत्यमायो | उस नातिकी संततिका अभाव हीत 


हे, अण्डे आदिका अमाव होनेपर 
नाण्डाद्यभावे । अतोऽण्डजादी- | नहं । अतः जण्डनादिके बीन 


न्यव बीजान्यण्डजादीनाम्‌ । | भण्डजादि ही टै । 


आण्डजमण्डाज्जातमण्डजम्‌ , 


सर्फागां तथान्यदप्यण्डाज्जातं | 


ऽतोऽण्डमेव बीजमिति युक्तं 





कथमण्डजं बीजयुच्यते । 











६०६ 


छान्दोन्योवनिवद्‌ 


[ मध्याय ६ 


= क -8 + ~ 9 8८ > >8- 8 >> > 


तथा जीवाञ्जातं जीवजं 
जरायुजमिव्येतत्पुरुषपश्चादि । 
उद्धिन्जग्ुद्धिन्तीत्युद्धिःत्स्थावरं 
ततो जातश्चद्धिन्जं धाना बो- 
द्धित्ततो जायत इत्यद्धिज्जं 
स्थावरबीजं स्थावराणां बीज- 
मियर्थः । स्वेदजसंसोकजयो- 
रण्डजोद्धिज्जयोरेव यथासंभव- 
मन्तर्मावः । एं द्यवधारणं 
त्रीण्येव , 
भवति ॥ १ ॥ 


बोजानीद्युपपन्नं 


इसी प्रकार जीवसे उदन्त हुम 
जीवज यानी जरायुज पुरूष एवं पश 
आदि तथा उद्धिज्ज-नो पृथिवी. 


| को ऊपरकी भोर मेदन करता है 


उपे उद्भिद्‌ यानी स्थावर कहते है 
टससे उत्यन्न हुएका नाम उद्विनब 
है; अथवा धाना ( बीज ) उदि 
है उससे उतपन्न हुभा उद्धर 
स्थावरवीन अर्थात्‌ स्थावरोका बीन 
है । स्वेदन जर संशोकन (ऊषापे 


। उत्पन्न होनेवारे) जीर्वोका यथासम्भव 


अण्डज जर उद्विज्जोमिं ही अन्तर्भाव 
होगा, क्योकि एसा माननेषर ही. 
तीन दही बीज दै यह निश्वय 
उत्यन्न हो सकता है ॥ १॥ 


~: 9 :-~ 


सेयं देवतेक्षत हन्तादमिमास्तिखो देवता अनेन 
, जीवेनात्मनानुधविश्य नामरूपे ठयाकरमाणीति ॥२॥ 


ऽप इस [ सत्‌' नामक ] देवतान ईक्षण क्रिया, “भं इस नीवाम- 
समसे" इन तीनों देवता्ेमिं अनुपवेश कर नाम ओर रूपकी अभिव्यक्त 


कर? ॥ २ ॥ 
सेयं प्रकृता सदाख्या तेजो- 


उस इस सत्‌ नामक तेन, = 


ओर अन्नके टोनिमूत॒ पृक्त 
देवताने,. जा कि पले ईकण 
क्रियाथा कि भ्न बहुत हो नार 
उसी प्रकार, ईक्षण क्षिया । वह 


ऽवन्नयोनिर्दवतोकते्षते्षितवती 


` यथां बहु स्यामिति । तदेव 


काण्ड २] 


शाङ्करशाष्याथं 


६०७ 


>8< >< >8‹ ¬< ऋ >8. 8. 85 ¬> = ¬: < >9: > ¬ >< ¬. ¬ >< >: ¬ >. 8 ¬ ~ 


बहुभवनं प्रयोजनं नाचापि 
निश्ैतमित्यत ईक्षां पुनः कृत- 
वती बहुभवनमेव प्रयोजन- 
युररीकृत्य । 


कथम्‌ ? हन्तेदानीमहमिमा 
यथोक्तास्तेजआग्यास्तिसो देवता 
अनेन जीवेनेति स्वबुद्धिस्थं पूवं 
सृष्टवदुभूतप्राणाधारणमात्मान- 


मेव स्मरन्त्याहानेन जीवेनात्म- | 


६ 


नेति । प्राणधारणकरत्रात्मनेति | 
वचनात्स्वात्मनोऽव्यतिरिक्तेन 
चेतन्यस्वरूपतया वििष्ेनेतये- 
तदशषेयति । अलुप्रविर्य तेजोऽ- 
बमभूतमात्रासंसर्गेण रन्धविशे- 
ष्विक्चाना सती नाम चसूपं च 
नामसूपे व्याकरवाणि विस्पष्ट- 
माकरवाण्यसौ नामायमिदसूप 
इति व्याढुर्यामित्य्थः । 

नु न युक्तमिदमसंसारिण्याः 


सर्वज्ञाया देवताया बुद्धि 
पू्कमनेकशतसदसरानरथाश्रयं 





1 कि, 


बहुत होनारूप प्रयोजन अभीतक 
समाप्त नहीं हुमा था, इसल्मयि 
बहुत होनाखप प्रयोजनको ही मनमें 
रखकर उसने फिर रक्षण किया | 


किस प्रकार ईक्षण किया ? “भव 
म हन उप्यक्त तेन आदि तीन 
देवताओंमे इस नीवहूपसे- एेसा 
कहकर श्रुति पूर्वस्मै अनुभूत 
प्राणघारी आत्माक्रा स्मरण करती 
हुई ही कहती है कि इस नीवा- 
त्मरूपसे- प्राण धारण करनेवाले 
अत्माके द्रारा-इस्त कथनसे श्रुति 
यह दिखलती है कि अपने आसासे 
अभिन्न अर्थात्‌ चैतन्यस्वरूपतया 
आत्मासे अविशिष्ट जी वरूपसे अनु- 
पवेश कर अर्थात्‌ तेन, भप्‌ ओर 
अन्न॒ इन भूतमात्राओँके संसर्गसे, 
जिसने विरोप विज्ञान प्रत करिया दै, 
फसा होकर मेँ नामरूप-नाम जोर 
रूपाका भ्य क्रण -व्यक्तीकरण कख; 
अर्थात्‌ यह इस नामवाछा है जर इस 
ख्पक्ा है-एेसा अभिव्यक्त कं ।' 


शङ्गा -र्वितु स्वतन्त्रता रहते 
हुए भी असंसारी सवज्ञ देवताका 
बुद्धिपूर्वकं पसा संकल्प करना 
सैडो-हनारों अनथेकिं 


&०८ 


छान्दोग्योषनिषद्‌ 


[ भष्याब ६ 


> 9 9 8 9 9 8 ऋ त > [9-8८-9 ~ 8 -8--9 ऋऋ 


देदमनुप्रविश्य दुःखमनुसदि- 
ष्यामीति संफल्पनमनुप्रवेशचश्च 
स्वातन्त्ये सति । 


सत्यमेवं न युक्तं स्याद्यदि 
स्वेनैवाविकृतेन स्पेणानुप्रवि- 


शेयं दुःखमनुभवेयमिति च| 


संकल्पितवती, न त्वेनमू; कथं 
तहिं १ अनेन जीवेनात्मनानु- 
प्विरयेति वचनात्‌ । 


जीवो हि नाम देवताया आ- 
भासमात्रम्‌ । बुद्धवादिभूत- 
 मात्रासंसगंजनित आदश इव 
प्रविष्टः पुरुपप्रतिषिम्बो जला- 
दिष्विव च प्रर्यादीनाम्‌ । 
अचिन्त्यानन्तशक्तेमत्या देव- 
ताया बुद्धयादिसंबन्धधैतन्या- 
मासो देवतास्वरूपविवेकाग्रहण- 
निमित्तः सुखी दुःखी मूढ इत्या- 
दनेकविकल्पप्रतययहेतुः । 


आश्रयभूत शरीरम अनुप्रवेश करके 
दुःखका अनुभव कर्ओर पर उपर 
अनुप्रवेश करना सम्भव नही दै । 


समाधान -टीक है, यदि वह 
ठेस संकट्प करता कि अपने भरि. 
कृतखूपसे ही अनुप्रवेश कहं भोर 
दुःखका अनुभव कष्टं तव तो एसा 
करना ठीक नही था, तु एषी बत 
हैनहयी। तोरििक्या दहै 
(दस जीवात्माखूपसे अनुप्रवेश कष" 
एसा वचन होनेके कारण [ उसका 
साक्षात्‌ प्रवेश सिद्ध नदी होता ]। 


जीवे तो उस देवताका भभा 
मात्रै, जो द॑णमें प्रविष्ट हुए 
पुरुषके प्रतिनिम्बके समान तथा जह 
दिर भविष्ट हुए सुर्के आभासे 
समान बुद्धि आदि भूतमात्राभेकि 
संस्ग॑से उतपन्न हुभा दहै । अविन्द 
एवं अनन्त शक्तिसे युक्त उस देवताः 
का वुद्धि आदिते सम्बन्यश्प नो 
चेतम्याभास है वही उस देवक 
स्वरूपका विवेकं ग्रहण न कके 
कछारण सुखी, दुःखी; मूढ इत्यादि 
अनेकों विक्पोंकी प्रतीतिका क्ण 
होवा है । 





खण्डे ] 


शाङ्खराष्याथं 


६०९. 


>“ 28८ >< > < < -9< < 8: 9 (ऋ < 99 ८ ऋ 


छायामात्रेण जीवस्पेणायु- 
[द ग भ 
प्रविष्टतवारेवता न देहिकेः स्वतः 
सखदुःखादिभिः संबध्यते । 
यथा पुरूपादित्यादय आदर्शोद- 
कादिपृच्छायामात्रेणानुप्रविष्टा 
आदशेदकादिदोषैनं संबध्यन्ते 


तद्वद्‌ देवतापि। “घर्योयथा | 


लोकस्य चक्षुनं रिप्यते चालु 
पर्बाहमदोपेः । एकस्तथा सव 
भूतान्तरार्मा न छिप्यते लोक 
दुःखेन बाह्यः" (क० उ० २। 
२।१२ ) । “आकाशवत्सवंग- 
तश्च नित्यः” इति हि काठके । 
“ध्यायतीव लेलायतीव” (बृह 
उ०४।३।७) इतिच वा- 
जसनेयके । 
ननुच्छायामात्रश्ेज्ञीवो बू- 
पैव प्राप्तस्तथा प्ररोकेदलोकादि 


च तस्य । 
नैष दोषः; सदात्मना सत्य- 


त्वाभ्युपगमात्‌ । सव च नाम- 


| छयामात्र जीवरूपसे अनुप्रिष्ट 
| होनेके कारण वह देवता स्वयं देहके 
पुष-दुःखादिसे सम्बद्ध नहीं होता | 
निम प्रकार दर्पण ओर जर आदिम 
छायामात्रसे अनुप्रविष्ट हुए मनुष्य 
ओर सुरथं आदि दर्पण ओर जर 
आदिके दोपोसे लिप्त नहीं होते 
उसी प्रकार वह देवता भी निर्िप्त 
रहता दै । “ज्ञि प्रकार सम्पूणं 
लोकका चश्च सु्ं॑चक्ुषप्बन्धी 
वाह्य दोर्षोसे रिति नहीं होता उसी 
प्रकार समस्त प्राणियोका एक दही 
अन्तरात्मा छोक्रिक दुःखोसे र्पि 
नहीं होता बल्कि उनसे बाहर रहता 
है” “तथा वह आक्राश्के समान 
सर्वत्र व्याप्त एवं नित्य है" इस 
प्रकार कठोपनिषदूमे तथा “मानो 
ध्यान करता दै, मानो चेष्टा करता 
है" इस प्रकार बरहदारण्यकोपनिषदूमे 


भी कहा है । 
शङ्ा-यदि जीव॒ छयापात्र ही 


हेतो बह मिथ्याही सिद्धदहोतादहै 
तथा उसके पररोक, इहरोक्र आदि 
भी मिथ्या ही ठरते है? 
समाधान--एेसा दोष नहीं हे, 
क्योकि सतस्वषटपसे उसकं। सत्यत्व 
स्वीकार किया गया है। सारा 





६१० छान्दोग्योपनिषत्‌ [ मध्याय ६ 


> ¬ 9 9 ~ > 9 9 6 >< > 2 | 9-869-88 1 | 
रूपादि सदात्मनैव सत्यं विका- | नम रूपादि विकारनात सतव 
ष ही सप [3 स्वयं तो वह मिथ 
रजातं स्वतस्तनूतमेव । धाचा- | ही है, क्योकि वमर तो केक 
रम्भणं विकारो नामधेयम्‌! इत्यु- | कहनेके क्ये नाममात्र हैः द 
क्तत्वात्‌ । तथा जीबोऽपीति । | कदा जा चुका दै रेस हैव 
र भी हे । जैसा यक्ष वेपन हौ षरि 
यक्षानुरूपो हि बिरिति न्याय- 
रि ९ | यह न्याय प्रिद्धहीदहै। भतः 
रतिद्धः । अतः सदात्मना सब॑- | सरवरूपते संपूण गवार भै 
व्यवहाराणां सवेविकाराणां च | सारे विकारोकी सता है तथा 
स्थत खतसे प्रथक्‌ माननेपर॒ उनश्न 
सस्यत्वं सतोऽन्यत्वे चाचृतत्व- व तिनि 
मिति न कशिदोपस्तार्षिकैरिहा- | द्वारा इल विषय किसी दोष 
नष्तं शक्यः । यथेतरेतर- | भङ्ग नहीं उपस्थित क्वि ज 
विरुद्धदेतवादाः स्वबुद्धिषिकल्प- | सकता, जेता कि हम कद सकत 
दै कि एकं दूप्षरेसे विरुद दरतवाद 
अपनी ही वुद्धिके विकल्मातर भीर 
वक्तुम्‌ ॥ २ ॥ अतत्वनिष्ठ है ॥ २ ॥ 


मात्रा अतच्छनिष्ठा इति शक्यं 


0 ~ 


सेवं तिस देवता अनुप्रविश्य | इस ध्रकार उसने उन्‌ ४ 


स्वातमावस्थे देवता भनुपवेश कर नौर ई 
४ नीजभूते अन्याकृते | प्रकार ईक्षण कर कि ह श 
स्वरूपम स्थित. अव्या? ॥ 


नामस्पे व्याकरवाणीतीित्वा- ख्पोका व्याकरण कङ*-- 

तासां तरितं निव्रतमेकेकां करवाणीति सेय 
देवतेमास्तिखो देवता अनेनैव जीवेनात्मना नुप्रविदय 
नामरूपे ज्चाकरोत्‌ ॥ ३ ॥ 





खण्ड ६ ] शाहुरआष्याथ ६११ 
>< 9: >८ 29८ 39 8 >9८ >8< > ¬< 5 < 8 9 9: > >8 9 ८-6-99 9 = 


“ओर उनसे एक-एक देवताको तरिषृत्‌्रिृत्‌ क" पेसा विचार कर 
उस इस देवताने इस जीवातमरूपते दही उन तीन देवतार्भोमिं अनुप्रेशा कर 
नामरूपका व्याकरण क्रिया ॥ ३ ॥ 

तासां च तिचृणां देवताना- | “ओर उन तीनों देवताओमसे 
एक-एककरो त्रिवृत्‌.दरिषृत्‌ कष ।' 
एक-एक देवताके त्रिष्रकरणम एक- 
एककी प्रधानता ओर दो-दोक़ी 


मेकैकां त्रिधतं त्रिधतं करवाणि । 
एकैकस्याः प्राधान्यं हयोद्वयो- 


(ध (~ 

गुणमावोऽन्यथा हि रज्ज्वा 

इवैकमेव तिदत्करणं स्पात्‌, न | [र्डवारी] रस्सीके समान एक ही 
‡ ? | त्रिवृ्रण होता । तीनों देवतार्ओं- 


त॒ तिद्णां प्रथकथवित्र्त्करण- ¦ का॒पएथक्‌-एथक्‌ त्रिदृककरण नहीं 
| होता । इस म्रकार ही तेन, अप्‌ 


मिति । एवं दि तेजोऽबन्नानां | जरं अजको "हतेन ध तत 
पृथद्नामप्रत्ययलाभः स्यात्तेन | दै, यह अन्न दै एसे पृथक्‌ एक्‌ 
॥ „_ नाम ओर प्रतीतिकी प्रप्ि हो 
इदमिमा आपोऽमिदमिति च | सकती दै, ओर धर्‌. नम 
तथा प्रतीतिकी प्राप्ति होनेषर 
ही देवतार्ओंके सम्यक्‌ व्यहारकी 
सिद्धप भ्रयोजनकौ पूर्तिं हो 
प्रसिद्धिः प्रयोजनं स्यात्‌ । सकती हे । 
६ : : ~ | इस पकरर क्षण कर उस देवता- 
एवभीकित्वा सेयं॑देवतेमा- | न इन तीनो देवताओमिं इष उप्यक्त 
स्तिसनो देवता अनेनैव यथोक्ते- | नीवूपसे दी सूर्यविम्बके समान 
वि मतर परवेशच कर अर्थात्‌ पठे विराट्‌ 
नैव जीवेन यीवरम्बवदन्तः- | पिण्डम ओर उसके पश्चात्‌ देवादि 
अ्रविदय वैराजं पिण्डं प्रथमं | पिण्डं अनुभवे कर अपने संकल्प 
देवादीनां च पिण्डाननुप्रविश्य | कै अनुषारं ही नामरूप 
छा० उ० २०- 


सति च परथल्नामप्रत्ययलामे 
देवतानां- सम्यण््यवहारस्य 


गौणता रहती दहै, न्ष तो तीन . 


# 


० क ००9 


६१२ [ जण्वाव ६ 
क तदक 


यथासंकल्पमेव नामरूपे व्या- | वयाकरण क्या । अर्थात्‌ द 
पदाथं इस ॒नामवाख ओर इष 
रूपवारा है-- इ प्रकार पदार्थो 
हति ॥ ३॥ व्यक्तीकरण क्रिया ॥ २ ॥ 


करोदसौ नामायमिदंहूप 


=> © ५ 


तासां ज्िदृतं ्िदतमेकेकामकरो्यथा तु खलु सो. 


म्येमास्तिछ्लो देवतालिव्रलिवरदेकेका भवति तन्मे 
विजानीहीति ॥ ४ ॥ 
उप्त देवताने उनमें प्रतेकको त्रिवत्‌.तरिवृत्‌ किया । हे सोम्य | 
बिस प्रकार ये तीनों देवता एक-एक करके प्रत्येक निवरत्‌-त्रिषत्‌ है वह 
मेशद्रारा जान ॥ ४ ॥ 
तासां च देवतानां गुणप्रधान-| <स देवताने उन देवता्भिसे 
भावेन व्रतं त्रिदृतमेकेकाम- | एक-एककनो गुण-्धानमावसे निः 
करोतकृतवती देवता । तिष्ठतु | नित किया । अभी, नामत 
तावदरदेवतापिण्डानां नामरूपा- | व्यक्त हए देवता भादि पिण्के 
भ्यां व्याढृतानां तेजोऽन्नमय- | तेज, भप्‌ जोर नूपसे 4 
त्वेन त्रिधात्वं यथा तु बहिरिमाः | की शा स ५ 
देवतास ^. बाहुर्‌ न्‌( ठव्व ह 
तो (^ करके किस प्रकार त्रिवृत्‌-त्िवृत्‌ दं 
ददेकंका मवति तन्मे मम सो मेरे कथनद्वारा जान भरथात्‌ 
निगदतो विजानी चिसप्टमव- | उदहरदरारा जच्छ स 
धारयोदाहरणपः ॥ ४ ॥ समञ्च ठे ॥ ४ ॥ 
~: ® :- 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्टाध्याये 
ठलीयसण्डमाभ्यं सम्पुरणंम्‌ ॥ ३ ॥ 


~ = जन्वङ०- 


चतुथं खणड 
एकके ज्ञाने सवका ज्ञान 

यत्तरेवतानां त्रिषृत्करणशरुक्तं ¦ उन देवतार्भोका नो त्रवृत्रण 
, | का गया दै, उसका उदाहरण 
तस्येबोदाहरणम्ुच्यते, उदाहरणं | दिया जाता दै । उदाहरण उपे 
| कहते है, जो एक देशकी प्रसिद्धि- 
| दार सम्पूणं देशकी प्रसिद्धिके ल्य 
¦ हा जाता है । श्रुति वही उद्‌- 

थंगदाहियत इति । तदेतदाह-- । इरण देती दै-- 
यद्रे रोहितशरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुङ्गं तदपां 
यत्करष्णं तदन्नस्यापागादभ्रेरग्नितं वाचारम्भणं 
विकारो नामधेयं ओणि रूणणीत्येव सत्यम्‌ ॥ १ ॥ 
अग्निका जो रोहित ( लल ) खूप दै वह तेजका ही खूप है, जो 
शुक खूप है वह नलका है ओर जो इष्ण है वह भन्का है । इष प्रकार 
सग्निसे भम्नितव निवृत्त हो गया, कोक [ अग्निरूप | विक्र्‌ वाणीसे 
कहनेके रियि नाममात्र टै; केवर तीन रूप है--इतना दी सव्य है ॥१॥ 
यदग्नेिव्रतकृतस्य रोदितं रुपं | शोकम त्रिकृत ( तीन तत्त्वौस 
परसि दितः मिश्रित ) अग्निका जो रोहित खूप 
प्रसिद्धं लोके व 5) 
तेजसो रूपमिति विद्वि । तथा | तनक ङ्प ह-एेखा जानो । तथ। 


यच्छुक्लं सूपमग्नेरेव तदपामव्रि-| उस अगिका ही जो च प दै 
कृतानां यत्कृष्णं तस्यैवाग्ने | कह तीन तत्वोकि सम्मश्रणसे रहित 
) पि केवर जख्का है भौर उसीका जो 
ङ्प तदनस्य प्राथव्या अत्रिवर- कृष्ण खूप है वह मन्नका-भत्िवरृत्रत 
त्छृताया इति विद्धि । परथिवीका प है-पेसा जानो । 


नामेकदेरग्रसिद्धयारोषप्रसिद्धय- 





६१७ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अण्याय ६ 


8८ -८ ¬< ८ ल ऋ >. < < 3: >< >< >< ८ ------ <> 
तत्रैवं सति सूपत्रयव्यातिरेकै- | रेखा दोनेषर, तू जो समह 

| थाक्रि अग्नि इन तीनों सपेम 
| सग मी कोई क्तु ैसोरष 
ग्तरधित्वमिदानीमपागादपगतम्‌। अग्निका अग्निस अव चदा गया | 
तायं यह हे कि इन तीनों श्पेका 
विशेष ज्ञान होनेसे परवेतेरीनो 
बद्िरासीत्ते साग्निबुदिधरपग- | अग्नवुद्ध थी वह अमिबुद्धि भौर 
“अग्नि शब्द्‌ अव निवृत्त हो गये | 
जिस प्रकार दिखायी देते हुए खल 
मानरक्तोपधानसंगुक्तः स्फटिको | रंगके उपान (समीपवर्ती दाथ) से 
| मिख हआ स्फव्कि प्राप्त होनेपर 

गृह्यमाणः पञ्चरागोऽयमिति- | उपधान ओर स्कय्किका पर्थक 
ज्ञात होनेसे पूर्व “यह प्राग दै' 
इस प्रकारके शब्द ओर बुद्धिका 
्रागुपधानस्फटिकयो्विवेकविज्ञा- प्रयोजक होता हे, शंत उनका 
्विवकवि पार्थक्य ज्ञात होनेपर उसमे उष 
नात्तद्िवेकविज्ञाने तु॒पञमराग- | पार्थ्ज्ञानीके पद्मराग ब्द भोः 
््दबुद्धी निवतेते तद्विवेक- | पद्मराग-बुद्धि दोनों निरव शे नति 
है उसो प्रकार [ छ्पत्रयका विवेक 

विन्ञातुस्तदरत्‌ । । होनेपर॒ अग्निका अग्नितव तिरत 

| दो जता दे ]। 


णाग्निरिति यन्मन्यसे खं तस्या- 


्राग्रुपत्रयविवेकविक्ञाना्ययि- 


ताभ्रिशब्दश्त्य्थः । यथा दुर्य- 


शब्दबुद्धयोः प्रयोजको भवति 


ननु किमत्र बुद्धिश्न्दकल्प- ४ 
क्प शङ्का-फतु यहो ( इस अग्िके 


= सम्बन्धं ) अग्निबुद्धि ओर अग्ि- 
नया क्रियते प्राग्रुपत्रयविषेक- | शब्द ेसी अधिक कल्पना करके 


ररणादभिरेवासीतदगेरनसय क्या लेना है १ रूपत्रयका विवेक 
ं । करसे पूर्वं अम्नि ही था । व 


खर्ड ४] ज्ञाङ्करधाभ्याथं ६१५ 
क क क कक # क र क कक क = क ॐ क = ॐ. 4 


रोहितादिरूपविवेककरणादपा- | अग्निका अग्नि रोहितादि रूपका 
गादिति युक्तम्‌; यथा तन्तवपक- र (1 
1 इतना ही कहना उचित है, जिस 

षणे पटामावः | प्रकार कि तन्तुर्भोको निकार ठेने 
पर पटका अभाव हो जाता हे । 

नेवं बुद्धिशब्दमात्भेव हयग्नि| समाधान-पेसो बात नही दै, 
यत आह वाचारम्मणमग्निरनमि | क्म अग्न तो जनि ओर 
अम्िशब्दमात्र ही है, कारण श्रुति 

विकारो नामधेयं नाममात्रमि- | कहती है “अग्निरूप जो विकार है 


त्यथः । अतोऽग्निबुद्धिरपि सृषेव वह॒ वाणीपर अवङम्बित नामधेय 
ह अर्थात्‌ नाममात्र ही है ।' इसल्यि 


किंतरि तत्र सत्यम्‌! त्रीणि । अभ्निुदधि भी मिथ्या ही हे । तो 
फिर उसमे सस क्या हे ए बस, तीन 


णीत्येव सत्यम्‌, नाणुमात्रमपि | खूप ही सतय ॒दै- यह कथन इस 


व बातक्रो निश्चित करनेके स्थि दहे 
ख्पत्रयव्यतिरेकेण सत्यमस्तीत्य- कि तान, सपक मति 


कुछ अणुमात्र मी सत्य नहीं है ॥१॥ 


>" © ˆ -- 


तथा-- | इसी प्रकार-- 
यदादित्यस्य रोहितःरूपं तेजसस्तद्रुपं यच्छङ्ग 
तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादादित्यादादित्यत्वं वा- 
चारम्भणं विकारो नामेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्‌। 
॥२॥ यचन्द्रमसो रोहितरूपं तेजसस्तद्रपं यच्छुङ्ग 
तदपां यक्करष्णं तदन्नस्यापागाचन्द्राचन्द्रलं वाचार- 
म्भणं विकासे नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्‌॥३॥ 


वधारणा्थंः ॥ १ ॥ 








६९६ छान्दोग्योपनिषत्‌ [ मध्याय ६ 
>9 > < ¬ 8: > 9 -2-- अ्् ऋ > 
यद्िद्यतो रोहितश्ख्यं तेजसस्तदरुपं यच्छुक्रं तदपां 

1.6 [३ ५ 
यच्छृष्णं तदन्नस्यापागाहिद्युतो वियु वाचारम्भणं 
विकारौ नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्‌ ॥ ४॥ 

आदिल्यका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप दहै, नो शु रूप है 
वह जलका है ओर नो छृष्णरप है वह अन्नका है । इस पक्नार आदिल 
से जदिव्यत्व निघृत्त हो गया, कर्मोढि [ आदिवयष्टप ] विकार वाणीपर 
अवलम्बित नाममात्र हे, तीन रूप है--इतना ही सय दै ॥ २॥ 
चन्द्रमाका जो रोहित खूप हे बह तेनका खूप दै, नो शुक षप है ब 
लल्का है ओर जो कृष्ण रूप है वह भन्नका है । इस प्रकार चन्द्रमसे 
चन्द्रत्व निदत्त हो गया, क्योकि [ चन्द्रमाख्प ] विकार वाणीपर भव- 
रम्बित नाममात्र हे, तीन खूप है--इतना ही सय हे ॥२॥ विचयतकषा 
जो रोहित सूप हे वह तेजकासख्पर ह, जो शुक्छ रूप है वह जलका दै 
ओर जो हष्ण रूप हे वह अन्नका है । इस भ्रकार विचुतूसे विचुवकी 
निवृत्ति हो गयी, क्योकि [ विदुत्रूप ] विकार वाणीपर्‌ मवलम्बित 
नाममात्र है, तीन रूप है-- इतना ही सय दै ॥ ४ ॥ 


यदादित्यस्य यच्चन्द्रमसो | जो आदि्यका, जो चनमा, 
जो विधुतकरा इव्यादि अथं पूववत्‌ 
यदव्य इत्यादि समानम्‌ । | समन्ञना चाहिये । ` 


ननु यथा त॒ खलु सोम्येमा- 
स्तिसरो देवतासिडन्विवरदेकेका 
भवति तन्मे विजानीदीत्युक््वा 
तेजस एव चतुभिरप्युदाहरणेर- 
गन्यादिभिखिवृत्करणं दशितं 
नावदयोरुदाहरणं दशितं 


त्रिवृत्करणे । 


शङ्का-रकितु दे सोम्य | निघ 
प्रकर ये तीनों देवता एकक 
करके प्रयेकं तिवृतत्रिवृत्‌ है वह 
मेरे्रारा जानः एेसा कहकर अग्नि 
आदि चारों उदाहर्णोसे तेनका 
ही त्रिवृ्करण दिद्धलाया गरणा है, 
्रिृत्करणमे जल ओर अन्करा तै , 


उदाहरण प्रदर्चित किया ही नही 
गया । 


कण्ड ७ ] 


शाङ्करभाष्यं ६१७ 


>< >< >< त >< >8< >8< >95 95 8: > ८ > 8 ¬ ~ 


नैष दोषः; अवन्नविषयाण्य- 
प्युदाहरणान्येवमेव च द्रष्टन्या- 
नीति मन्यते श्रुतिः, तेजस 
उदाहरणशुपलक्षणार्थम्‌ । रूपव- 
च्वात्स्प्टाथ॑त्वोपपत्तेध । गन्ध- 
रखयोरनदाहरणं तरयाणामसंम- 
वात्‌; न दि गन्धरसौ तेजसि 
: । स्पशशब्दयोरनुदाहरणं 
विभागेन दशैयितुमशक्यतवात्‌ । 
यदि सवं जगस्िवृकृतमि- 
त्यगन्यादिवल्रीणि रूपाणौस्येव 
सत्यमग्नेरग्नित्ववदपागाञ्जगतो 
जगम्‌ । तथान्नस्याप्यष्मुङ्ग- 
त्वादाप इत्येव सत्वं वाचारम्भ- 
णमात्रमन्नम्‌ । तथापामपि तेजः 
शुङ्गत्वाद्वाचारम्भणतवं तेज इत्येव 
सत्यम्‌ । तेजसोऽपि सच्छजगत्वा- 
दराचारम्भणत्वं सदित्येव सत्य- 
मित्येषोऽथं विवक्षितः । 


समाधान-यह कोई दोष नहीं 
हे । श्रुति रघा मानती है कि जर 
ओर अन्नविषयक उदाहर्णोको भी 
इसी प्रकार जानना चाहिये । तेन- 
का उदाहरण उनका उपलक्षण 
करानेके स्यि ह । इसके सिव, 
रूपवान्‌ होनेके कारण उसके 
द्वारा स्पषटाथ॑ता भी सम्भव है। 
गन्ध जौर रसक्रा उदाहरण इसख्यि 
नहीं दिया गया कि इन तीनोमें 
उनका होना असम्भव है; तेनमें 
गन्ध ओर रस हैँ ही नहीं । तथा 
[ त्रिविध ] स्पशं ओर [ त्रिविध |] 
शब्दको अल्ग करके नहीं दिखाया 
जा सकता इसल्यि उनका भी 
उदाहरण नहीं दिया । 

यदि सारा ही जगत्‌ त्रिवृत 
हे ओर भग्नि आदिके समान केवर 
तीन दही खूप सव्य है तो अग्निक 
भग्ितके समान संघारका संसाशत्व 
भी निवृत्त हो गया । तथा अन्न 
जलका कार्यं है, इसख्यि जरु ही 

सत्य है, अन्न केवर वाचारम्भणमत्र 
ह; तथा तेजका कायं होनेके कारण 
जरु भी वाचारम्भणमात्र ही हे 
तेन ही सय है भोर तेज भी सतका 


कार्यं हे इसल्यि वह भी वाचारम्भण 
ही है, केवरु सत्‌ ही सय हे। 
इस प्रकार ईससे यदी अथं 
बतलाना अभीष्ट है । 





६१८ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ बभ्याब ६ 


2908-8 > ~ < >< >> 


नलु वाय्वन्तरिक्षे तत्रि 
कृते तेजःप्रभृतिष्वनन्तभूतत्वा- 
दवरिष्येते । एवं गन्धरस- 
शब्द्परशाश्वावरिष्टा इति कथं 
सता विज्ञातेन स्वमन्यद्‌- 
विज्ञातं विज्ञातं भवेत्‌ १ तदि- 
जाने वा प्रकारान्तरं वाच्यम्‌ । 

नैष दोषः; रूपवद्‌द्रव्ये सर्व- 


स्य दशनात्‌ । कथम्‌ १ तेजसि 
तादद्रुपवति शब्दस्पशेयोरप्युप- 
म्माद्राय्वन्तरिक्षयोस्तत्र स्पश- 
शब्दगुणवतोः सद्धाबोऽनुनीय- 
ते । तथाबन्नयो रूपवतो रस- 
गन्धान्तमाव इति । रूपवतां 
त्रयाणां तेजोऽन्नानां त्रिधृत्क- 
रणपरदेनेन सव तदन्तूत 
सद्विकारत्वात्रीण्येव सूपाणि 
विक्तातं मन्यते भिः । न दि 


राङ्का- किंतु वायु भोर अन्त 
रिध तो तेज दिके न्तत त 
होनेके कारण अत्रिवृत्कृत ही रह 
जाते है । इसी प्रकार गन्ध, रस 
शब्द ओर स्पशं भी वच रहते है 
फिर एकमात्र प्तत्‌को जान ठेनेएर दी 
ओर सव अज्ञात पदार्थो ज्ञान ङ 
प्रकार हो सकता दै । मथवा उनका 
ज्ञान होनेके श्ये श्रुतिको कोई 
दूसरा प्रकार बतलना चाहिये । 

समाधान~यह कोई दोष नरी 
हे, क्योकि शूपवान्‌ दरव्यम सब 
गुण देखे जा सकते है । कि 
प्रकार १ [ सो बतलते है--] 
रूपवान्‌ तेम शब्द ओर स्पशी 
भी उपरन्धि होनेके कारण उ 
स्पशं ओर शब्द गुणवलि वायु नीर ` 
आकाशके सद्धावका भी अनुमानं 
किया जाता है। तथा रूपवान्‌ 
जरु जर अन्नम रस एवं गन्धा 
अन्तर्भाव हो जाता है । इस परकर 
तेज, जरु ओर अन्न--इन तीन 
रूपवानका त्रिवृत्करण 
करनेसे श्रति रसा मानती 
उनके अन्तर्गत साराका स॑ 
सतकरा दी कार्यं॑होनेके कर 
तीनरूप ही सय जाने गये टै 


लण्ड४ं ] शाङ्करभाष्या्थं ६१९ 
> > > ¬ ८ ~ध ~ ८ 9 9-9-98 ८ >+ > ॐ ॐ 


मूतं रूपवद्द्रव्यं प्रत्याख्याय ¦ व्थोकि रूपवान्‌ मूस॑पदार्थोञो 


छो 
वाग्वाकाशयोस्तद्गुणयोर्गन्ध- | कर बु भोर भका तभा 
उनके गुण एवं गन्ध ओर र्का 


प बद त्रि महण हौ नहीं हो सकता । 

रूपव व्क- 

रणं प्रदशेना्थमेव मन्यते क 1 (५ 
श्रुतिः । यथा तु त्रिवृत्कृते | ही ल्य मानती है । जिस प्रकार 
त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्‌ , | तव्रकरणमे तीन खूप ही सत्य है 
तथा पश्चीकरणेऽपि समानो | उसी प्रकार पश्लीकरणमे भौ समान 


¦ व नियम ही समञ्ञना चाद्ये । इख 
न्याय इत्यतः सवस्य सद्वि ममार सव ङढ सतम ही बशर 


कारत्वात्सता विज्ञातेन सव- होनेके कारण सतके ज्ञानसे यह 
मिदं विज्ञातं स्यात्सदेकमेवा- | साराका सारा जान य्य नाता 
दवितीयं सत्यमिति सिद्धमेव | दै । अतः एकमत्र अद्वितीय सत्‌ 


__ ~ | ही सय है यह सिद्ध ही दै। 
भवति । तदेकस्मिन्सति विज्ञाते, क 011 


सवमिदं विज्ञातं मवतीति | उत कको जान लेनेप यह सव 
घरक्तम्‌ ॥ २-४ ॥ जान छ्या जाता है ॥ २-४ ॥ 
==-‡ ०० $ 
एतद्ध स्म वे तद्विद्रास आहः पूवे महाशाखा 
महाश्रोत्रिया न नोऽय कश्चनाश्चुतममतमविज्ञातसुद्‌ा- 
हरिष्यतीति द्येभ्यो विद्ाथकरुः ॥ ९ ॥ 
इस ८ त्रिवरृकरण ) को जाननेवाटे पू॑वतीं महागृहस्थ ओर महा- 
भ्रोतरियोने यह कहा था कि इस समय हमारे कुमे कोई बात अश्रुत, 
अमत अथवा अविज्ञात दै-एेसा कोई नदीं कद सकेगा, क्योकि इन 
अग्नि आदिके ष्टन्तद्वारा वे सब कुछ जानते थे ॥ ५॥ 


६२० 


छान्दोग्योपनिषष्‌ 


[ मष्याष ६ 


9 >> > < 9८ < > 9-8-9८ 99 ऋ ॐ ॐ ॐ 4 


एतद्वद्वंसो विदितवन्तः पूर्व 


इस ( त्रिदृक्तरण ) को जानने. 


€ 
ऽतिकरान्ता महाशाला महा- | वारे पूववर्ती अर्थात्‌ अतीकालीन 


श्रोत्रिया आहं स्म वै किरु । 
किषुक्तवन्तः १ इत्याह--न नो- 
ऽस्माकं बुरेऽेदानीं यथोक्त 
विज्ञानवतां कथन कश्िदप्य- 
भ्रुतममतमविज्ञातयदाहरिष्यति 


नोदादरिष्यति, सवं विज्ञातमेबा- 
स्मुलीनानां सद्विज्ञानवखादि- 
व्यमिप्रायः । 
ते पुनः कथं सवं विज्ञात- 

वन्तः १ इत्याह-एभ्यस्िभ्यो 
रोहितादिरूपेभ्यस्िष्कृतेभ्यो 
विज्ञातेभ्यः 
मेवेति विदाश्चकररवि्तातवन्तो य- 
स्मा्स्मातसर्वज्ञा एव सदिज्ञा- 
नात्त आसुरित्यथंः । अथचैभ्यो 
 बिदाच्क्रुरिस्यग््यादिभ्यो वृष्टा- 
न्तभ्यो विजञातेभ्यः सर्वमन्यदि- 
दाश्चकररित्येतत्‌ ॥ ५ ॥ 


महागृहस्थः ओर महाश्रोतनियेनि का 
था। क्याकहाथा? सो बतलते 
दै “उपयुक्त विज्ञानको जाननेवाटे 
हमलोगोकि कुरमे आज-इस समय 
कुछ भी अश्रुत, अमत अथव भविज्ञात 
हो, एेषा कोई भी नहीं बता सकेगा। 
तादय यह दहै कि सत्‌ विज्ञाने 
युक्त होनेके कारण हमारे कुटुम्विरयो- 
को सव कुछ ज्ञान दी दहे । 

कितु उन्होने किस प्रकार सब 
कुछ जाना हे, सो श्रुति बतसती 
है--्वर्योकिं इन तीन अर्थात्‌ 
[ इस प्रकार ] जाने हुए त्रित 
रोहितादि रूपोद्ारा, जन्य अवशिष्ट 
पदार्थं भो रेसे ही दै-रस प्रकारे 
जानते दै, अतः सत्‌के विकञानके 
कारण वे सब सर्वज्ही हो गवे 
है देसा इसका तासयं दै। 
अथवा “एभ्यः विदाश्चकुः" ईका 
यह भी तात्पर्य॑हो सकता टै ढि 
विज्ञात हुए इन अग्नि आदि 
च्टन्तोद्रारा वे ओर सवको भी 
जान गये दै ॥ ५॥ 


~; ० “~ 


खण्ड ४ ] श्ाङ्करभाष्याथं ६२१ 
> ~< >>: 9८8८ 9-8८-८ ऋ ¬ >< ८ 9८ 9 ¬: ¬~ ¬: 9-9८-9 9 9 
कथम्‌ ? । किस प्रकार जान गये है! 


यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रपमिति तदिदा- 
खक्ुयदु शुङ्गमिवाभूदिस्यपाशरूपमिति तद्विदाथकरुयंहु 
छृष्णभिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्िदाचकुः ॥ ६ ॥ 
यद्विज्ञातमिवाभूदित्येतासलामेव देवताना<समास इति 
तद्विदाचकरुर्यथा लु खल सोभ्येमास्तिखो देवताः 
पुरुषं ्राप्यं रिच स््िढदेकेका भवति तन्मे विजानी- 
हीति ॥ ७॥ 
जो कुछ रोदित-सा है वह तेजका रूप दै-पेसा उन्न नाना 
है; नो श्ु्टसा है वह नल्का रूप ॒दै-ेसा उन्दोनि नाना है तथा 
जो ङष्ण-सा दै वह अननक रूप दै-रेसा उन्होने नाना दै ॥ ६ ॥ 
तथा नो कुछ विज्ञात-सा दै वहं इन देवता्का ही समुदाय है-रे्ा 
उन्न जाना है । हे सोम्य| अवतृ मेरेद्वारा यह जान किं क्रिस 
प्रकार ये तीनो देवता पुरुपको प्राप्त होकर उनमेसे प्रतेक त्रि्रत्‌-तरित्‌ 
हो जाता है॥ ७॥ 
यद्न्यद्रपेण संदिह्यमाने क-। [ अग्नि आदिक्वी अपेक्षा ] 
४; अन्य रूपसे संदेह फरिे जते हुए 
पोतादिरूपे रोदितमिव यद्गृहय- | कपोतादिरूपम जो उन पूषंव्त। 
ब्रहमवेत्ताओद्रारा रोदहित-सा ग्रहण 
किया जाता था वह तेजका खूप 
दै_ रेखा उन्होने जाना | तथा जो 
श्ुक्-सा हण किया जता था 
तथा यन्छक्रमिवाभूद्गयमाणं | वह जका रूप दै ओर जो इष्ण- 
4 , |सा ग्रहण क्षिया जाताथा वह 
तदपां रूपम्‌, यत्कृष्णामवगृद्यमाण | जन्तका रूप दै- सा उन्दने 


वदमस्येति विदारकः । एवमेवा- “नाना । इसी भ्नर॒नो भवनत 


माणमभूतेषां पूवेषां ब्रहविदाम्‌ , 


तेजसो रूपमिति बिदाचक्रुः । 





ददद्‌ छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय ६ 


>< ~ 5 95 8 9-8-95 >8- >8 2 -2-8 >< >9 > ऋ 


त्यन्तदुरध्यं यदु अप्यविन्ञात- 
मिष विशेषतोऽगृह्यमाणमभूत्त- 
दप्येतासामेव तिसृणां देव- 
तानां समासः सुदाय इति 
विदाश्चक्रुः । 

एवं तावद्बाद्यं वस्त्वग्न्या- 
दिवद्िज्ञातम्‌, तथेदानीं यथा 
त खलु हे सोम्येमा यथोक्ता- 
स्तिस्रो देवताः पुरूपं शिरः- 
पाण्यादिलक्षणं कार्यकरण- 
संघातं प्राप्य पूुरुषेणोपयुज्य- 
मानाखिदृलिघ्रदेकेका भवति, 
तन्मे विजानीहि निगदत 
इत्युक्त्वा ॥ ६&-७ | 


दुरक्ष्य ओर अविज्ञात-सा अर्था 
विरोषरूपसे हण नहीं किया जा 
सकता था वह भी इन तीन 
देवतार्भोका ही समूह है- पषा 
उन्होने जाना था । 

इस प्रकार तो बह्म वस्तुं 
अग्नि आदिके समान नानी गीं | 
अव, हे सोम्य | निस प्रकार वै 
उपयुक्त तीनों देवता मस्तक भर 
हाथ आदि अङ्गोवाठे शरीर एवं 
इन्दर्योके संधातरूप पुरुपको प्रा 
होकर पुरूषसे उपयोग कौ जाती 
हर पस्येक त्रिवृत्‌ नदत्‌ हो जती 
हे वह मेरे द्वारा-मेरे कथन 
करनेपर तु जान । रसा क्फ 
वह कहने रगा ॥ ६-७ ॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये 
९ 
चतुथखण्डमःघष्यं सम्पणेम्‌ ॥ ४॥ 


कञ्चम्‌ 


स्वर 





अत्र आदिक तरिविघ परिणाम 
अन्नमशितं षा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो 
धातुस्तप्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्माश्सं योऽणि- 


स्तन्मनः ॥ १ ॥ 


खाया हुभा अन्न तीन पकारका हो जाता है । उपतका जो अयन्त 
स्थूल भाग दोता दै, वह मल हो जाता दै, नो मध्यम भाग है बह मांस 
हो नाता है जीर जो भवन्त सूक्ष्म होता है वह मन हो जाता दै ॥१॥ 


अन्नमशितं क्तं त्रेधा विधी- 


यतते जाटरेणापरिना पच्यमानं | दो जात॒ दै मर्थत्‌ 


त्रिधा विभज्यते । कथम्‌ १ 
तस्यान्नस्य त्रिधा विधीय- 
मानस्य यः स्थविष्ठः स्थूलतमो 
धातुः स्थूलतमं वस्तु विभक्तस्य 
स्थूछोऽशः, तत्पुरीषं भवति; 
यो मष्य्मोऽशो धातुरनस्य, 
तद्रसादिक्रमेण परिणम्य 
मांसं भवति; योऽणिष्टोऽणुतमो 
धातुः, स॒ उध्वं हृदयं प्राप्य 
बरष्मासु दिताख्यासु नाडीष्व- 
युप्रविरय वागादिकरणसंबातस्य 


खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका 
जठगमिद्रारा 
पचाये नानेपर वद तीन भार्गोमे 
विभक्त दो जाता है । सो क्रिस 
प्रकार तीन भार्गो विभक्त 
होते इए उस णना जो स्थव््ठ- 
स्थूलतम धातु- सबसे स्थूरु कस्तु 
यानी विभक्त हुए अन्नका जो स्थूल 
अं होता हे वह मर हो जाता हे । 
तथा जो अन्नका मध्यम अंश यानी 
मध्यम धातु होता दै वह रसादि 
क्रमसे परिणत होकर मांस हो जाता 
है जीर जो अणिष्ठ--अणुतम 
घातु होता है वह ऊपरको मोर 
हृदयम पर्हुचकर हितां नामको पुक्ष्म 
नामं प्रवे कर वायु शादि 








द२४ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ ध्याय १ 
ध अ 9 8 ~ ¬ 7 > (9 - ¬ - --७--अ- ऋऋ 
स्थितिष्ुत्पादयन्मनो भवति । | इन्द्रिथसमूहकी स्थिति उसत्न कता 
मनोरूपेण विपरिणमन्मनस | हआ मन हो नाता हे | ह मनहपते 
विपरिणाम८( विकार ) को प्राप होत्‌। 

उपचयं करोति । हु मनका उपचय करता है | 
ततश्वान्नोपचितसवान्मनसो दस कारण ५ होना हौ 
भोतिक्षल्मेव; न वैशेषिकतन््रो- | सिदध दोनेसे मनका भोतिक होना द 
“५ तिद्ध होता है । वह वैशेषिक दशैन- 
क्तलशक्षणं नित्यं निरवयवं चेति | के के हुए रक्षणवाला निय घौर 
गृह्यते । यदपि (मनोऽस्य दैवं निरवयव दहै-एेसा नहीं स्वीकार 
शिया जाता । आगे (छा° ८।१२। 
चक्षुः इति वक्ष्यति तदपि न | ५ म) जो कहा जायगा ज्रि भुन 
त इसका दैव चक्षु है" वह भ मनके 
नित्यत्वापेक्षया; किं . तिं १ | निलयत्वको अक्षास नदी दै । तो 
0 तादिस्वर फिर किस दृष्टिसे है ? वहं कथन 
सरकष्मव्यवदहितविप्रहृष्टादिसर्वेन्दरि- सूम, व्यवदति नर (1 

यविषयव्यापकत्वापे इत्यादि समी प्रकारके इन्दि 
व्व पाता । | विषयमे व्यापक होनेकी भवशत 
यजचन्येन्द्रियविषयपेक्षयानित्य- | दै । तथा जो धन्य इन्दो, अपः 
क्षासे उसका न्यत्र दै वह भी 
अपेक्षिकं ही है--फेसा हम भगे 
चरक्र करेगे, क्योकि “सत्‌ एक 


त्वम्‌, तदप्यापेक्षिकमेषेति 


वक्ष्यामः । “सत्‌ “** एकमेषा- 
17111 
इति भूतेः ।॥ १॥ परमर्थ-सलय नही हो सकता] ॥१॥ 
- “अ क-०्---- 
तथा-- । इसी प्रकार-- 
आपः पोताखरेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो 


धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यस्तष्टोहितं योऽणिष्ठः स 
भ्राणः ॥ २॥ 





खण्ड ५ ] शाङकरभाष्याथ ६२५ 
> >< 9 > > < 9 ¬ (क 8 (9 ऋ 


पीया हुभा ज तीन प्रकारका हो जाता है । उसका जो स्थूल्तम 

भाग होता है वह मूत्र हो जातादै, जो मध्यभाग है वह रक्त हो 
जाता है जीर नो सृक्षमतम भाग है वह प्राण हो नाता है॥ २॥ 

आपः पीताच्वेधा विधीयन्ते | | षीया हुआ जर तीन प्रकारका हो 

जाता दै। उषका नो स्थूख्तम 

भाग होता है वह मूत्र हो जाता दै, 

तन्पूत्रं मवति । यो मध्यमः, | नो मध्यम भाग है उह क््तहो 

वालिं ग जाता है ओौर नौ सूक्ष्मतम भाग दै 

' | वह प्राण हो नाता दै । भागे श्रुति 

स प्राणो भवति । वक्ष्यति दहि यह्‌ कटेगी भी किं राण जठभय 


(आपोमयः प्राणो न पिवतो | दै, जपान करते हुए तेरा प्राण 
विच्छेत्स्यते इति ॥ २॥ | विच्छिन्न नहीं होगा ॥ २ ॥ 
तथा- । पसे ही-- 
तेजोऽशितं तधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो 

धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मजा योऽणिष्ठः 
सा वाक्‌ ॥ ३॥ 

खाया हा [ घृतादि ] तेन तीन भरकारका हो जत है। उसका 
जो स्थूखतम भाग होता दै वह हड़ी हो नाता दै, जो मध्यम भाग है 
वह्‌ मज्जा हो जाता है भौर जो सूक्ष्मतम भाग है वह वाक्‌ हो 
जाता हे ॥ २॥ 


तेजोऽशितं तैरघ्रतादि भ-| खाया हमा तेन भर्थात्‌ भक्षण 
किया हआ तैल-घरत आदि तीन 


क्षितं ्रेधा विधीयते । तस्य यः | भकार हो जाता दहै । उसका नो 
स्थविष्ठो धातुः, तदस्थि मवति । । ्थूरुतम अंस होता दै वह हड़ी हो 


तासां यः स्थविष्ठो धातुः, 











दर छान्डोव्योषनिषदू [ बच्याय ६ 
ए 4 > 8 9 ~ > > >6 9 9 9 8 8-26-6 
यो मध्यमः, स मजास्थ्यन्तगतः | जाता है जो मध्यम भाग ह वह्‌ 
मज्जा--इड़ीके भीतर रहनेवास 
कजिग्ध पदां १ जत्ता है भर्‌ जो 
सक्ष्मतम अंशा है वह वाक्‌ हो जाता 
तैरुषुतादिभक्षणाद्वि वागिशदा ह । तवव मिन 
भाषणे समर्था भवतीति प्रसिद्धं | वाणी विशद भर्थात्‌ भाषणरमे समथं 
होती है-एेसा रकम प्रसिद्र 

रोके ।( ३॥ ही है॥३॥ 


=": &:-- 





स्नेहः । योऽणिष्ठः, सा वार्‌ । 


` यत एवम्‌-- । वर्योकि पेसा है-- 


अन्नमयश्हि सोश्य मन आपोमयः प्राणस्तेजो- 


मयी वागिति भूय एव मा भगवान्विन्ञापयलिति 
तथा सोभ्येति होवाच ॥ ४ ॥ 

[ इसलियि ] हे सोम्य | मन अन्नमय है, प्राण जरमय है जौर वाक्‌ 
तेजोमयी है । एेसा कहे जनेपर श्वेतकेतु बोका--भगवन्‌ | आप्‌ सुने 
पिर समन्ञाइये ॥ तव णारुणिने च्छा सोम्य | देषा कहा ॥ ४॥ 

-. अमय हि सोम्य मन आपो- | [ इर्य ] ह सोम्य | मन 
अन्नमय ह, प्राण कमय दै जर 
मयः प्राणस्तेजोमयी वार्‌ । वाक्‌ तेजोमयी है । 
नज केबलाममक्षिण आलु- | शङ्का--ितु केवर भन भक्षण 
प्रभृतयो वामिमनः प्राणवन्तश्च | ऋनेवले बहे जादि वाक 
स ओर प्राणवान्‌ देखे नाते है त्था 
समुद्रम रहनेवाटे केवल जलपात्र 
मीनमकरप्भृतयो मनस्विनो | भक्षण करनेवाले मय एवं 


घादि मन जोर वाणीसे युक्त होते 
बाभ्मिन, तथासनेहपानामपि । है, इसी परर ृतादि न लाने" 


तथान्मात्रमल््याः सायुद्रा 


खब्ड ५ ] 


त्राणवच्ं मनस्वित्वं चादुमेयम्‌; 
यदि सन्ति, तत्र कथमनमयं हि 
सोभ्य मन इत्याद्युच्यते १ 


नैष दोषः, सर्वस्य त्रि्रस्छत- 
स्वात्सर्त्र सर्वोपपत्तः; न हत्रि- 
वृत्कृतमनमश्नाति कश्चित्‌, भाषो 
वातरिवृत्छृताः पीयन्ते, तेजो 


वात्रिच्रसछृतमश्नाति कशिदित्य-. 


जादानामासुप्रभृतीनां बागिमितं 


प्राणवचवं वेत्याघविरुद्म्‌ । , 
इत्येव प्रत्यायितः शवेतकेतुराद 

भूय एव पुनरेव मा मां भगवानः 

न्रमयं हि सोभ्य मन इत्यादि 


विज्ञापयतु दृष्टान्तेनावगमयतु । 
नाद्यापि ममास्मिन्रथं .सम्यड्‌ 


निश्वयो जातः। यस्मात्तेजोऽवन्- 


` मयस्वेनाविरिष्टे देह ए्कस्मितुप- 
युज्यमानान्यन्नाप्सनेदजातान्य- 


श्ाहुरमाष्याथ ६२७ 
>>: >< >< >< >< > >3८ 8८ 2 9८ >< >: >@: >9( ¬ 8-8-8८ ऋ 8-9-9८ 9 


वार्छोका भी प्राणवत्व ओर मन- 
स्वित्व॒भनुमान किया जा सकता 
है। जबपेसेमी जीवै तो 
सोम्य | मन अन्नमय है, इत्यादि 
कथन कैसे किया नाता है ? 


समाधान-यश कोर दोष नही 
दै, क्योकि सव दुख तष होनेके 
कारण सबका सब व्तुर्ओमिं होना 
सम्भव) है । कोई भी जीव अत्रिवृ्ृत 
अन्न भक्षण नहीं करता, न अत्रि 
ृत्कृत जल ही पीया जाता है ओर 
न कोई अ्रिवरृृत तेनदीको खाता 
है । इसीसे अन्नादि भक्षण कने 
वलि चृहे जदिक्ञा वाक्त ओर्‌ 
परणयुक्त होना मादि विरुद नह है । 


इस प्रकार प्रतीति कराये हृष 
इवेतकेतुने कह। - "टे भगवन्‌ । 
(सन्नमयं हि सोम्य मनः' इयादि 
कथनको आप मुञ्चे फिर समज्ञाइये- 
हसे दृष्टान्त देकर युके र 
हृदयङ्गम कराइये । इस विषयमे 
अभीतकं भेरा ठीक निश्चय नहीं 
हुञा । कर्थोकि तेन, ज ओर 
अन्नमयख्पते एक देहम कोई 
विक्षता न होनेपर भी एक ही 
देहम उपयोग किये इए अन्न, जर 











६२८ छाग्दोग्योषनिवष्‌ [ अष्याय १ 


= - 
णिष्ठधात॒रूपेण मनःप्राणवाच | यर स्नेह आदि अपनी जातिका 
अतिक्रम न करते हुए सम 
उपचिन्वन्ति स्दजात्यनतिक्रमे- | रूपते मन, प्राण॒ बौर वाक 
पोषण करते दै यह जानना 
गेति दुविंेयमित्यमिप्रायः;अतो| बहुत कठिन - रेषा ल 
अभिप्राय है । इसीसे उने शू 
भूय एवेत्याह । एव' इत्यादि कहा है । 
तमेवभुक्तवन्तं तथास्तु सो- इस प्रकार कहनेवाले उष 
८ धेतकेतु ) से पितिने कहा-- 
हे सोम्य | जच्छा, जोकुतू 
दृष्टान्तं यथेतदुपपदचते यत्पृच्छसि | पूता दै वह जि् प्रकार उपत् 
हो सकता है इस विषमे टन 
॥ ४ ॥ श्रवण कर्‌, ॥ ४ ॥ 


=: ०23 


इतिच्छान्दोग्योपनिषपदि षष्ठाच्याये 
प्चमखण्डमाष्यं सस्पूरणैम्‌ ॥ ५॥ 


स्येति होवाच पिता-ृण्वत्र 


(> 


कल र्डं 
अन्न जादिकता सूक्ष्म माग ही मन जादि हेताहै 
दध्नः सोम्य मभ्यमानस्य योऽणिमा स उ्वंः 
(~ £ 

समुदीषति तत्सपिभेवति ॥ १ ॥ 

हे सोम्य | मथे जाते हुए दंहीका जो सूक्ष्म माग होता है बह 
ऊपर इकष्रा हो जाता है; वह धृत होता है ॥ १॥ 

दध्नः सोभ्य मथ्यमानस्य | दे सोम्य | मथे जाते हुए दही- 
योऽणिमाणुभावः स॒ ध्वे; | का नो अणिमा सुक््मांश होता हे 
स्ुदीपति संभूयोध्वं नवनीत- | बह॒र्वः सदी 
मावेन गच्छति तस्सर्पिमवति | होकर नवनीतहपसे ऊपर भा नाता 
॥ १॥ है । वह घृत होता हे ॥ १॥ 


यथायं दष्टान्तः-- । जैसा कि यह दृष्टान्त है-- ` 
एवमेव खट सोभ्या्नस्यादयमानस्य योऽणिमा 


स उर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ २॥ 
उसी प्रकार हे सोम्य ! खाये हुए जनका जो सृकष्म अरा होता दै 
वद्‌ समयक्‌ भकारे उपर भा जाता दै, वहं मन हता है ॥ २ ॥ 
एवमेव खलु सोमभ्यात्नस्यौद्‌- | उसी भकार हे सोम्य | अरयमान 


| न अर्थात्‌ भक्षण किये जाते हुए भात 
नादेरदयमानस्य शज्यमानस्य- | आदि अन्नका नो सुक्ष्म मग 


दर्येणाग्निना बायुसहितेन खजेने हता है बह मथानीके समान 
मभ्यमानस्य योऽणिमा स ऊष्वेः | वायुसदहित नटरानिद्वारा मथे 
समुदीषति;तन्मनो भवतिः : । जानेपर उपर आ जाता दै, वहं 





६६० छान्दोग्योपनिषद्‌ | मध्याय ६ 


न 
ऽवयवरः सह संभूय मन उपचि- | मन होता दै, अर्थात्‌ मने णद 

यवके साथ मिकुकर मनी पुष 
नोतीरयेतत्‌ ॥ २ ॥ करता हे ॥ २ ॥ 


-- (1 >---> 
त्था-- । तथा- 


अपाश्सोभ्य पीयमानानां योऽणिमा स॒ उर्ध॑ः 
समुदीषति स प्राणो भवति ॥ ३ ॥ 
दे सोम्य । पीये हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता दै वह इक 
होकर ऊपर आ जाता है, वह प्राण होता है ॥ २ ॥ 
अपां सोभ्य पीयमानानां | हे सोम्य षीम हए जा ब 


८ 5 ~ | सक्ष्मभाग होवा है वह इकट्म होकर 
ऽणिमा ‡ ५ र 
योऽणिमा स ऊष्वः सुदीषति ऊप आ नाता ब प्रान ह 
स प्राणो भवतीति ॥ ३॥ | है-रेसा [ भारुणिने कहा ]॥२॥ 


एवमेव खलु-- । ठीक इसी पकार-- ह 
तेजसः सोभ्यादथमानस्य योऽणिमा स उवः 
समुदीषति सा वाग्भवति ॥ ४ ॥ 
हे सोम्य | मक्षण कयि हुए तेजका जो सूक्ष्म भाग होता वह 
इकट्ठा होकर उपर मा जाता ष जोर वह वाणी होता है ॥ ४॥ 
सोम्य तेजसोऽश्यमानस्व | हे सोम्य | मक्षण सि 


होता 
योऽणिजा ष उर्व, समुदीषति | तेनका नो सूक्ष्म अश 

ष बह इकटा कर ऊपर भा नता 
सा वाग्भवति ॥ ४ ॥ है जीर वह वाणी होता है ॥४॥ 


2 


खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्याथं ६११ 
>2८ > 9-8-92 ऋ 99 - ॐ ॐ ॐ. ॐ ॐ ॐ ॐ 4 


अन्नमयरहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्ते- 
जोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतिति 
तथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥ 


[ इस प्रकार ] हे सोम्य | मन॒ अन्नमय दै, प्राण जलमय है 
ओर वाणी तेनोमयौ है-रेसा [ आरणिने कंहा ]। [ तब खेतकेतु 
बोला-- ] "भगवन्‌ | सुञ्े फिर समञ्ादये' इसपर आरुणिने कदा-- 
“सोम्य | अच्छा ॥ ५ ॥ 


हे सोम्य | मन अन्नमय दै, 
प्राण जकमय दै ओर वाक्‌ तेजोमयो 
है-द्स प्रकार मेरा यह कथन 
युक्तमेव मयोक्तमित्यमिप्रायः । | ठीक ही है-येसा इसका अभिप्राय 
7 है [ इसपर उवेतकेतु गोख-- ] 
द्‌ 
अतोऽप्तेजसोरस्सवेतत्सवमेवम्‌, क 1 ल 
मनस्तन्नमयमित्यत्र नैकान्तेन | तेजके विषयमे तो भरे दी सब ङछ 
ए , कंतु अभीतक मुञ्चे 
मम निश्चयो जातः । अतो भूय | पसा हो ही; 
५ इस बातका पूरा निश्चय नहीं इभा 
एव मा भगवान्मनसोऽन्नमयत्वं | किं मन॒ अन्नमय हे। अतः हे 
५ भगवन्‌ | सुज्ञे मनका अन्नमयत् 
दृष्टान्तेन विन्ञापयत्िति । तथा | चलम समहय ॥ तव 


सोम्येति होवाच पिता ॥ ५ ॥ ! पिताने कडा सम्य | अच्छा ॥५॥ 


-----"कन्---- 


` अन्नमयं हि सोभ्य मन आपो- 
मयः प्राणस्तेजोमयी वागिति । 





इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्टाष्याये 
षष्टस्षण्डभाष्यं सम्बूणंम्‌ ॥ & ॥ 


क~ ~, 








खकय 


रण्ड 


=<> 


षोडशञकलाविधथिष्ट पुरुषका उपदेश 


अन्नस्य शक्तस्य योऽणिष्टो 
धातुः, स मनसि शक्तिमधात्‌ । 


सानोपचिता मनसः शक्तिः 
षोडदधा प्रविभज्य पुरुषस्य 


कलात्वेन निर्दिदिक्षिता । तया 
मनस्यन्नोपचितया शक्त्या षोड- 
शधा प्रविभक्तया संयुक्तस्त- 


दवान्काय॑करणसंधातलक्षणो जीव 
विशिष्टः पुरुषःपोडशकल उच्यते; 


यस्यां सत्यां द्रष्टा श्रोता मन्ता 
बोद्धा कतां विज्ञाता सर्वक्रिया- 
¢ 
समथः पुरुषो मवति;दीयमानायां 
च यस्यां सामध्यंहानिः। वक्ष्यति 
च-“अथामस्यायंद्र्टा"' ( छा० 
उ० ७।९। १ ) इत्यादि । 
सर्वस्य कार्यकरणस्य सामथ्यं 
मनःछृतमेव । मानसेन हि बलेन 


खाये हुए अन्ना नो सक्मतम 
अंश॒ था उसने मनम शक्ति 
संचार किया। अन्नद्रारा सुण्न 
इई उस मनकी शक्तिका सोह 
परकारसे विभाग कर्‌ पुरषकी कल. 
रूपे निर्देश करना इष्ट है । मनम 
अन्नके द्वारा उपचित तथा सोह 
मागमे विभक्त इई उस शक्तिसे 
संयुक्त उस्र शक्तिवाल्‌ देह भौर 
इन्दि्योका संघातद्प जीवविदिष्ट 
पुरुष पोडशकर ८ सोरह कलभ- 
वाला ) कटा जाता दै; न्घ. 
दाक्तिके रहनेपर ही पसप दष्टा 
श्रोता, मन्ता, बोद्धा, कर्ता, विज्ञाता 
तथा समस्त क्रियाम समथ शेता 
ह भोर निसके क्षीण होनेपर 
उसकी शक्तिका हास हो नाता दै 
आगे चरूकर श्रुति यह कदेगी भी 
कि “जिसको अन्नकी प्रपि हती 
है वही पुरुष [ शक्ति बन्न 
होनेसे ] दष्टा दै" सम्पूणं * 
लोर इन्दर्योकी शक्ति मनके ही 
हारा है । रोक मनोब्से समयन 





अण्ड ७ |] शाङ्कराष्याथं १३३ 


संपन्ना विनो दुदयन्ते लोके | पस बखवान्‌ देखे जते है तथा 
ध्यानादाराथ केचित्‌, अन्नस्य | कोई-कोई केवर ध्यानहयरी भौ 


सर्वात्मकत्वात्‌, अतोऽन््ृतं देले जते दै, थोक जन्न 
स्वप है; अतः मानसिकं बरु 


मानसं वयम्‌ | अत्नसे ही होता दै । 

षोडशकः सोम्य पुरुषः पथदशाहानि माशीः 
काममपः पिबापोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत 
इति ॥ १॥ 


हे सोम्य । पुरुष सोर्ह कलाभोवारा हे । तु प्रह दिन भोजन 

मत कर, केवर येच्छ जकपान कर्‌ । प्राण॒ ज्म हे; इसलियि जल 
पीते रहनेसे उसका नाश नदीं होगा ॥ १॥ 

पोडश् कला यस्य पूरुषस्य सोऽयं सोद कल जिस पुरषकी दै 

| वह पुष्प सोर कलामाला हे । 

षोडशकलः पुरुषः; एतच्चेसपरतयक्षी| वदि तू इस बात भ्रलक्ष करना 

कतमिच्छसि पचचद्कत सया न ज प ५ 

न्यहानि माशीरशन भा का | यच्छ॒ जलपान कर, बरयोकि रु 

कामभिच्छातोऽपः पित्‌; यस्मान | पौते रहनेसे तेरा प्राण विच्छिन नही 

पिवतोऽपस्ते प्राणो विच्छेत्स्यते | होगा अर्थात्‌ नारको प्रा नही 


विच्छेदमापरस्यते यस्मादापो- | होगा, करण पहले हम कह चुके 
मयोऽन्विकारः प्राण इत्यवो- | दै कि भण जरमय यानी जलक्ना 


चाम । न हि कायं स्वकारणोपः | विकार है ओर कोई भी कार्य 
अपने कारणके आश्रय बिना 


टम्भमन्तरेणाविभ्रशमान स्थाठु- | अविन्र्पसे स्थित नहीं 
। सकता ॥ १ ॥ 


°= 
५ 


मुस्सहते ॥ १ ॥ 


--; ० 








६४४ छान्दोष्योपनिषषू [ लध्याच ६ 
> >8->8८ 28: >9८ 24 ~ >8 न 
स॒ह पञ्चदशाहानि ना्ञाथ हैनसुपल्साद कि 
बवीमि भो इत्यचः सोभ्य यजूषि सामानीति स 
होवाच न वे मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २॥ 
उसने प्रह दिन भोजन न्ट क्रिया । तत्वात्‌ वह्‌ क: 
( जारुणि ) के पात आया [ जर बोका-- ] "भगवन्‌ | क्या बो ¢ 
[ पितने कहा-- ] हे सोभ्य | ऋक्‌, यजुः ओर सामका पाठ करो-- 
तव्‌ उसने कहा--भगवन्‌ | सुस उनका प्रतिभान ( सुरण ) नहीं 
होता" ॥ २ ॥ 
स हैवं भरुतवा मनसोऽन्नमयतवं ¦ उतने देता घनक मनक त 
त्यक्षीकतुमिच्छन्पश्वदशादानि | मयताफो परयकष करनेकी इच्छति 
४ , पंद्रह दि हीं किया । फि्‌ 
नाशाशनं न कृतवान्‌ । अथ | पद दिन भोजन न 


हनं सोखवे दिन वह अपने पताके 
पोडशेऽ्नि दैनं पितरगुपससा- पा आया भौर आकर बोल-- 


दोपगतवाुपगम्य चोवाच-किं | पिताजी ! क्या बे ¢ इपर 
बरवीमि मो इति। इतर आह - | पिताने कहा--े सोम्य | शक, 
ऋषः सोम्य यजूषि सामान्यधी- | यजुः तथा सामवेदके मनत्र्च पढ 
षवेति । एवमुक्तः पित्राह-न वै | करो । पिताके इस प्रकार कहने 


3 | वह॒ वोला--^हे भगवन्‌ | सुच 
धा सानि तिभान्त भग ऋगादिका प्रतिभान नदी होत; 


मनसि न दृर्यन्त इत्यथो हे भो | तालं यह्‌ है कि मेरे मनमे उनक 
भगवन्निति ॥ २ ॥ प्रतीति नहीं होती ॥ २ ॥ 


एवघुक्तवन्तं पिताह-शृणु | इस प्रकार कते हुए उष ्ः 

। पिताने कहा-- इस सम्बन्धं 
तत्र कारणं येन ते तान्युगादीनि कारण घुन, निरते कि व ५ 
न प्रतिभान्तीति । ष्छगादिका प्रतिमान नही होता । 


] 
हण्ड ७ ) शाह्करभाष्याथं ६३९५ 


तश्टोवाच यथा सोभ्य मह तोऽभ्याहितध्येकोऽङ्गारः 
खध्योतमाच्ः परिशिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहू दहे- 
देवश्सोश्य ते लोडदानां करानामेका करातिरशिष्टा स्या- 


तयैतर्हि वेदान्नाजुभवस्य्ानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥२॥ 

वृह उश्वसे बोख--दे सोम्थ ! जिस प्रकार बहुत-से ईधनसे भजवर्ति 
हुए अज्निका एक जुगनृक्रे बराबर अङ्गाश रह नाय तो वह उससे 
अधिक दाह नहीं कर सकता, उसी प्रकार हे सोम्य | तेरी सोलह 
कृखओंमिसे केवल एक कला रह गयी दे । उसके द्वारा इस समय त्‌ 
वेदका अनुभव नहीं कर सकता । अच्छा, अव भोजन कर तव तु 
भेरी बात समञ्च नायगा' ॥ ३ ॥ 

तं होवाच यथा रोके हे। उससे आरुणिने कहा--ि 


सोभ्य महतो महत्परिमाणस्या- सोम्यं ¡ लोकम जि प्रकार हैषनसे 

| करि हुए-वद़राये हुए बहुत 
स्यादिवस्योपचितस्यन्धनेरनेर बड़े परिमाणवाले अमिका, उसके 
कोऽङ्गारः खद्योतमात्रः खच्योत- | शान्त हो जानेपर कोई खयोतमात्र- 
परिमाणः शान्तस्य परिशिष्टोऽव- | सचोतके बराबर परिमाणवाला 


शिष्टः स्याद्भवेत, तेना इ्ारेण ततो. अंगारा रह जायगा तो उस अंगारेके 
1 द्वारा उससे-उसके परिमाणसे 


ऽपि तत्परिमाणादीषृदपि न बहु | धोड-सा भी भिक दाह नहीं का 


दहैत्‌;एवमेव खु सोभ्य ते तवा- | जा सकता, उसो प्रकार हे सोम्य | ` 


न्नोपचितानां षोडशानां कखाना- 
मेका कलावयवोऽतिशिषटावशिष्टा 
स्याद्‌तया तवं खदयोतमात्राङ्गार 
तुल्ययैतदीदानीं ेदान्नालुमवसि 


न प्रतिपद्यसे श्रुत्वा च मे मम 


तेरी अन्नसे उपचित हई सोह 
कृररभमिंसे केवर एक कला-एक 
भाग रह गयी है । उस खचोतमात्र 
अंगारक समान एक करसे तु इस 
समय वेरदोका अनुभव नीं कर्‌ 
सकता-इस समय तचे उनका ज्ञान 








६३६ छान्दोग्यौपनिषव्‌ [ मध्याय ६ 


वाचमथारेष धिजञास्यस्यशान | न दो सकेगा । अव प्र तू 
भोजन कर्‌ तव मेरा वचन सुनकर 
युडक्ष्व तावत्‌ ॥ ३ ॥ तू सव जान्‌ जायगा ॥ ३॥ 


--! ० १--~ 


स हाश्चाथ हैनमुपससाद तह यकि च पषच्छ 
स्वर प्रतिपेदे ॥ ४ ॥ 


उसने भोजन स्रि श्र फिर उसके ( आरुणिके ) पास अय।। 

तब उसने जो कुछ पूछा वह सव उसे उपर्थित हो गया ॥ ४॥ 
सदह तथेवाश्च अुक्तान्‌। | उसने उसी प्रकार ( पिकि 
कथनानुसार ) भोजन क्या । 
अयानन्तर हनं पत्तर सुश्रपुरू उसके पश्चात्‌ वह युननेकी इच्छपे 
पससाद । त होपगते पुत्रं यत्कि- | उस अपने पिताके समीप भया । 
चरादिषु पप्रच्छ ग्रन्थरूपमरथं- | उसने पास आये हुए उस पतत 
जातं वा पिता, सश्रेतकेतुः | पिताने ऋगादिम नो कुछ ग्रन्थ 


0 ९. | रूप अथवा अ्थसमूह पृष्ठा वहं 
सव ह तत्प्रतिपेद्‌ ऋगाद्यथंतो | सव ऋगादि तकेतने भरन्तः 


ग्रन्थतश्च ॥ ४ ॥ तथा अथतः नान ल्या ॥ ४॥ 
होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्थैकमङ्गारं 
खयोतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय धाञ्वलयेत्तेन 
ततोऽपि बहु दहेत्‌ ॥ ५ ॥ 
उससे [ आर्णिने ] कहा- हे सोम्य | निस प्रकार बहुतसे 
इधनसे बढ़ हुए अग्निका एक सयोतमात्र अङ्गारा रह जाय ओर्‌ उते 


तृणसे सम्पन्न कर परज्विति कर द्या जाय तो वह उसकी ( अपने पूवं 
परिमाणक्र ) अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता हेः ॥ ५ ॥ 


खण्ड ७ ] शाङ्करभा्याथं ६३७ 
4 क 9 2 क क क 9 > क #. क > = ॐ = र 4 
तं होवाच पुनः पिता यथा| किर उससे पिताने कहा- 
हितस्ेत्ादि सोम्य | निस॒प्रकार-महतो ऽ- 
सोम्य सहतोऽभ्याहितस्पेत्यादि भ्याहितस्यः इत्यादि प्दोका अर्थं 
पूवैवत्‌ समञ्ना॒चादिये-- शन्त 
हुए अग्निका एक खयोतमत्र अंगारा 
ख्ोतमात्रं परिशिष्टं वणेदवुरणे| र जाय ओर उसे तृण तथा 
[लकद्ियोँके ] चूरेसे सम्पन्न करके 
श्चोपश्चमाधाय ्राञ्वल्ये्येत्‌ | प्रज्वङिति क्रिया जाय अर्थात्‌ बल्या 
जाय तो वह उस दीप्त हुए अंगारे- 
तेनद्धनाङ्खारेण ततोऽपि पूर्वपरि- | से उस अपने पूवं परिमिणकी 
अपेक्षा भी अधिक दाह -कर 

माणाद्बहु दहेत्‌ ॥ ५ ॥ सकता दैः ॥ ५ ॥ 


समानभू्‌,एकमङ्गारं शान्तस्याग्रः 


=== 0 १- 


एव सोम्य ते षोडक्रानां कखानामेका कठाति- 
शिष्टामूत्सान्नेनोपसमाहिता भ्राञ्वारी तयेति वेदानचु- 
भवस्यन्नमयःहि सोभ्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी 
वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ £ ॥ 


(इसी भकार हे सोम्य । तेरी सोच कलर्स एक कख अवरिष्ट 
रह गयी थी । वह अनद्वारा, वृद्धो पराप्त अर्थात्‌ प्रज्वछ्ति कर दी 
गयी | अव उससे त्‌ वेरदोका अनुभव कर रदा हे । अतः है सोम्य | 
मन अनमय द, पराण जकमय दै ओर वाक्‌ तेजोमयी दे ।' इस भरा 
[ उवेतकेतु ] उसके इस कथनको विरोषूपसे समक्ष गया, समच 
गया ॥ ६ ॥ 


एवं सोम्य ते पोडशानामन्न-| ₹सी भकार हे सोभ्य । 
कलानां सामथ्य॑रूपाणामेका | तेरी सामथ्येलपा अत्रक सोह 


ददे८ छान्दोग्योपनिषद्‌ 
>>> > ¬ 9 ४ -अ -द 


कलातिरिष्टाभूदतिशिष्टासीत्‌ 
पश्चदशाषान्यथक्तवत एकेके- 


नाष्ेकेका कला चन्द्रमस इवा- 


परपक्षे क्षीणा, सातिशिष्टा कजा 


तवान्नेन युक्तनोपसमाषिता 
वर्धितोपचिता प्राज्वाली, देश्यं 


छान्दसम्‌, प्रज्वलिता बधितेत्यर्थः। 


्ाज्वारीदिति वा पाठान्तरम्‌, तदा 
तेनोपसमाहिता स्वयं प्रज्यलित- 
वतीत्यथंः । तया वधितयेतषटौ- 
दानीं वेदाननुभवस्युपलभसे । 
एवं व्याब्ृच्यनुड़त्तिभ्यामन्‌- 
मयत्वं मनसः सिद्धमित्युप- 
संहरति-भनमयं हि सोम्य मन 
इत्यादि। यथैतन्मनसोऽन्नमयलं 


तव सिद्धं तथापोमयः प्राण- 
स्तेजोमयी वागित्येतद्पि सिद्ध- 
मेवेत्यभिप्रायः । तदेतद्धास्य 


[ मध्याय ६ 
भक कत अत 
कला मरमसे केवर एक्‌ कला अव्‌. 
रिष्ट रह गयी थी । ए दिन 
भोजन न कटनेसे कृष्णे 
चन्द्माके समान एक-एक दिनपर 
तेरी एक-एक कला क्षीण हो गौ 
थी । वह वची हुई कला तेरे भक्षण 
क्ये हुए अननदराश उपसमाहित_ 
वर्धित, पुष्ट अर्थात्‌ प्रज्वरिति क 
दी गयी । शराञ्वालीः इस प्र 
दीघं ईकार छान्दस है अथवा 
श्राज्वारीत्‌ एसा पामन्तर समङ्मना 
चाहिये । उस अवस्थामें इसका एेसा 
अथं होगा कि उसके द्वारा भधान हौ 
जानेप्र्‌ वह स्वयं प्रज्व्ति हे 
गयी । उस बृद्धिको प्रा की हई 
करसे ही तु इ समय दोक 
अनुभव करता है अर्थाव्‌ त्ष 

| उनकी उपलब्धि होती है । 
इशत प्रकार व्यादृत्ति ओर अवु- 
वृ दोरनोहीके द्वारा मनकी अन. 
मयता सिद्ध है । इसीसे अन्नमयं 
हि सोम्य मनः इत्यादि वाक्यप्र 
| श्रुति इसका उपसंहार करती दै । 
निस प्रकार तचे यह मनकी जनल 
मयता सिद्ध हुदै है उसी प्रर 
भाण जलमय दै ओर वाक्‌ तेनोमयी 
दै--यह भी सिद्ध ही दै--वा 


£ 
दाण्ड ७ ] शाद्कर्माष्याथं ६३९ 


पितुरूक्तं मनआदीनामन्नादि- | इसका तात्पयं है । इस प्रकार 
पितावे कदे हुए इस मन भादिके 
अन्नादिमयत्वको उेतकेतु विरोष- 
खूपसे समक्ष गया । विजज्ञौ इति" 
इन परदोङ्गी द्विरुक्ति त्रिवृत्छरणके 
करणसमाप्त्यथः ॥ & ॥ प्करणकी समापिके ल्य &।६॥ 


~~~ 


मयत्वं विजज्ञौ विज्ञातवाञ्दवेत- 


केतुः 1 दिरभ्यासस्तिवत्करणप्र- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये 
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पणम्‌ ॥ ७ ॥ 





ऋष छ्कर्ड 


[१ 
(1 


© २. 


घुषृपिकालमें जीवकी स्थितिका उपदेश्च 


यस्मिन्मनसि जीवेनात्म- 
नानुप्रविष्टा परा देवता-- 
आदरं इव परुषः प्रतिविभ्बेन 
जलादिष्विव च ष्रर्थाद्यः प्रति- 
रिपः, तन्मनोऽनमयं तेजोऽम्म- 
याभ्यां वाक्प्राणाभ्यां संगत- 


मधिगतम्‌ । यन्मयो यस्स्थश्च 
जीवो मननदशेनश्रबणादिव्यव- 


द्णमे प्रतिविम्बरूपते प्रकि 
हए पुरुष ओर जलादिकमें जमा 
रूपमे प्रविष्ट हुए सूर्यादिकके समान 
निस मनम परदेवता जीवामहे 
अनुप्रविष्ठ हुआ है ओर निष 
स्थित हुआ तथा निससे तादास्यको 
प्राप्त हुमा जीव मनन, दन एवं 
श्रवणादि व्यपारभ समर्थं होता है 
तथा जिसके निवृत्त होनेपर वह 
अपने परदेवताखूपको ही प्राप हे 
जाता है वह मन सन्रमय है भौर 


हाराय कल्पते तदुपरमे च स्वं | तेनोमथी वाक्‌ एवं जलमय प्राक 


देवतारूपमेव प्रतिपद्यते । 
तदुक्त भुसयन्तरे-“4ध्याय- 
तीव लेलायतीव सधी; खष्नो 
भूत्वेमं लोकमतिक्रामति" (व° 
उ० ५।३।७) "सस वाअय- 
मात्मा ब्रह्म विरानमयो मनो- 
मयः"! ( बर०उ० ४।४। ५) 
इ्यादि “खप्नेन शारीरम्‌” 
(इ० उ०४।३। ११ ) 


| साथ सम्बद्ध है- रेस ज्ञात हभ 


इस विषयमे अन्य ( वाजसनेय) 
भरुतिमे भी रेस कहा है-¶ मन 
जर प्राणसे सम्बद्ध इभा व 
आतमा ] मानो ध्यान-सा करता है, 
चेष्टा-सी करता है, वह वासनयुत्त 
हजा स्वप्नरूप होकर इस रीका 
अतिक्रमण कर जाता है" "वह 
यह आत्मा ब्रह्म विज्ञानमय भोर 
मनोमय है” इत्यादि, तथा “स्वन 
शरीरको [ निशयष्ट कर |” 





ण्ड ८ | शाङ्करभाष्याथे ६४१ ` 
>~ ~ >< > >~ 8 2 ~ ऋ ऋ ¬ 9 ~ 8 अ क 9 9 अर 9 हः 
इत्यादि “प्राणमेव प्राणो नाम | एवं “वद आता प्राणनक्रियां करनेसे 
भवति" ( बरु० उ० १।४।७)| प्राण नामवाख हो जता दै" 
इत्यादि च । इत्यादि भी कहा है । 

उस इसत मनःस्थित-मनसंज्ञाको 
प्राप्त हए तथा मनक निवृक्तिके द्वारा 
गतस्य सनउपशमद्रारेणेन्द्रिय- | इन्दियेकि विप्योसे निद्र हए 


विषयेभ्यो निदत्तस्य यस्यं परस्या नीवा नो अपने स्वहपमूत 
परदेवतामे स्थिते होना दै, उसका 


देवतायां सवात्मभूतायां यद्ब- | भगे पुत्रके भरति वर्णन करकी 
स्थानं तत्पत्रायाचिख्यासुः-- । इच्छवाटे-- 

उदाखको हारुणिः खेतकेतं पुत्रमुवाच स्वान्तं 
मे सोभ्य विजानीहीति यत्रेतत्पुरुष; स्वपिति नाम सता 
सोभ्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनई 


स्वपितीत्याचक्षते स्वशद्यपीतो भवति ॥ १ ॥ 
उदालकके नामसे प्रसिद्ध अरुणके पुतन अपने तर उवेतकेतसे कटा- 
८हे सोम्य | तु पेरेदयारा स्वरान्त ( सुषुप्ति अथवा स्वप्नके स्वरूप ) को 
विरेषरूपसे समश्च ठे; जिस अवस्थामं यह पुरुष सोता है" एसा कहा 
जाता दै, उस समय हे सोम्य | यह सतसे सम्पन्न हो नाता है--यह 
अपने स्वरूपको प्रा हो जाता दै । इसीसे इसे ्वपिति' रेखा कहते है; 
वयोर उस समय ह स्व-अपनेको ही भपीत-- मा हो नाता है॥१॥ 
उदालको ह किलारूणिः | उदारक नामसे प्रसिद्ध अरुणके 
व पत्रने अपने पुत्र शवेतकेतुसे कदा- 
रवेतकेतुं पत्रठवाचोक्तवान्‌-- | स्वमान्त--सवपनका। मध्य, श्वपन 


स्वभानतं स्वममभ्यम्‌, स्वर इति | यद दशंनदृति [ अर्थात्‌ जिसमे 
दनतः स्वभस्याखूया, तस्य । वासनारूप विष्के बशनकी इति 


तस्यास्य प्रनःस्थस्य मनआख्यां 


६७२ छान्दोग्योपनिचव्‌ [ प्याय ६ 


2. + ~ > 8 > > > ~ ~~ 3 3 ऋ 
मध्यं स्वान्तं सुपृ्षमित्येतत्‌ । | रहती है उस ] स्का ना 1 


अथवा स्व्रान्तं ¦ 
मित्यथः । तत्राप्य्थातसुुरमेव 


भवति; स्वमपीतो भवतीति वच- 


नात्‌ । न दन्यत्र सुषुप्रात्स्वम- 


पीतिं जीवस्येच्छन्ति बक्मपिदः । 
तत्र ्ादशौपनयने पुरुषप्रति- 
विस्व आदशेगतो यथा स्वमेव 
ुरुषमपीतो भवत्येवं मनओचु- 
परमे चेतन्यप्रतिबिस्बरूपेण जीवे- 
-नात्मना मनसि प्रविष्टा नाम 
रूपव्याक्रणाय परा देवता सा 
स्वमेवात्मानं प्रतिपद्यते जीव- 
रूपतां मनआख्यां हिता । अतः 


सुषुप् एवं स्वभान्तश्ब्दवाच्य 


इत्यवगम्यते । 


यत्र तु सुघ्ठः स्वभ्रान्पश्यति 


तत्स्वाप्नं दशनं सुखदुःखसंयुक्त- | 


उसके मध्यको स्वप्नान्त मथ्‌ 
एषु कहते है । अथवा प्त 
इस शब्दका तापय ्प्रका तख 
प्साभी हो सकता । पेष 
माननेपर भी अर्थतः घुषुप् ही पिदर 
होता हे; कर्यो स्वमपीतो भवति 
८ अपने स्वहूपको प्राप्त हो नता 
हे ) रेस श्रुतिका वाक्य दै; ऋ. 
वेत्तारोग पुषुप्तावस्थाक्ो छोडकर 
ओर किती दशमे जीवकी छप 
प्राति स्वीकार नदीं करते । 

जिस प्रकार दर्षणको हय हेन्‌ 
दरपणमें स्थित पुर्षका प्रतिविम्ब स्वयं 
परूषको दी प्राप्त हो जाता है उसी 
प्रकार उस दुपुपतावस्थामें ही मन 
आदिकी निवृत्ति हो जनेपर चैतन्यके 
प्रतिविम्बहपसे जीवात्ममावसे नामः 
रूपी अभिव्यक्ति करनेके स्थि 
मनम प्रविष्ट हुआ वह॒ परदेवता 
मनस्क जीवहूपताको वयागकर 
स्वयं जपने स्वहपको ही प्रा हो 
जाता ह । भतः इससे यह विदित 
होता है कि 6: शब्दका 

च्य सुपृक्षः ही है । 
प 4 अवस्थाने सोया 
हुए पुरुष स्वम्र॒देखता दै वह 
स्वप्न सुख-दुःदसे युक्त शेता 


ण्ड ८ | 


शाङ्करमाच्या्यं ६७३ 


> > ~~~ > 
भिति पुण्यापुण्यकायम्‌। पुण्या- | ह; इसख्यि वह पुण्य-पापका कामं 


पुण्ययो्िं सुखटुःखारम्भकत्वं 
प्रसिद्धम्‌ । पृण्यापुण्ययोश्वाविद्या- 
कामोपष्टम्मेनैव सुखदुःख तदशेन- 
कार्यारम्भकत्वष्पपचते नान्य- 
येत्यविद्याकामकमंभिः संसार- 
हेतभिः संयुक्त एव स्वन इति 
न स्वमपीतो भवति अनन्वागतं 
पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि 
तदा सर्वाञ्छोकान्हुदयस्य 


भवति" ( च ° उ० ४।३।२२ ) 
^ तृह्वा अस्येतदतिच्छन्दाः"" 


८ ब ० उ० ४।३। २१ ) “एष 
परम आनन्दः” ( ब्र ° उ० ४। 
३। ३३ ) इत्यादिभरतिभ्यः । 
सुषुप्त एव स्वं देवतारूपं जीवत्व- 
विनिर्भुक्तं दशेयिष्यामीत्याह-- 
स्व्नान्तं मे सम निगदतो है 
सोभ्य विजानीहि विस्पष्टमव- 
धारयेत्यथः । 

ऋा०उ० २९ 


है, क्योकि पुण्य-पाप ही क्रमशः 
सुख-दुःखके भारम्भक रूपमे प्रविद्ध 
है । तु पूण्य-पापक्षा जो घुख, 
दुःख ओर उनके दशच॑नरूप कायंका 
आरम्भक है वह अविद्या नौर 
फामनाके आश्रये ही सम्भव है, 
जर किसी प्रकार नही, इसस्यि 
स्वप्र संसारके देतुभूत अविधा, 
कामना जोर कमं इनसे संयुक्त ही 
है; अतः उस अवस्था्मे जीव 
अपने स्वरूपको प्रा्ठ नहीं होता; 
जैसा कि “[ उस अवस्थामें ] वह 
पुण्यसे असम्बद्ध, पापसे अम॒म्बद्ध 
तथा हृदयके सम्पूणं शोकोको पार 
किये होता है” “इसका वह यह 
रूप अतिच्छन्दा (काम, धर्माधमं तथा 
अविदयासे रहित ) है” “यह परम 
आनन्द है” इत्यादि श्रुति्योसे सिद्ध 
होता है । अतः शै घुषुपिमें दी 
जीवभावसे रहित अपने देवताङूप- 
को दिखरऊंगाः पेसा भरुणिने 
कहा । हे सोम्य | पेरे कथन करने- 
से तृ स्वभान्त ८ घुषुप्ावश्था ) को 
विदोषरूपसे जान ठे अर्थात्‌ स्पष्ट 
तया समञ्म ठे । 


६४७७ 


छान्दोण्योवनिषल्‌ 


[ मध्या ६ 


>8< ¬< 2८ -&< < > < < >8: -ह< ~ >< < ¬< >इ< 8 8 < 9८ > 9८8 -ट >४८ > 


कदा स्वप्नान्तो भवति १ इ्यु- 


च्यते-यत्र यस्मिन्कार एतना- 


म भवति पुरुषस्य स्वप्स्यतः प्रसिद्ध 


हि खोक स्वपितीति | गौणं चेदं 
नामेस्याह-यदा स्रपितीस्युच्यते 
पुरुषः, तदा तस्मिन्काल सता 
सच्छब्दवाच्या प्रहरतया देष- 
तया सम्पन्नो भवति सङ्खत एकी 
भूतो भवति । मनसि प्रविष्टं 
मनआदिसंसगंकृतं जीवरूपं 
परित्यज्य स्वं सद्रपं यत्परमाथ- 
सत्यमपीतोऽपि गतो भवति । 
अतस्तस्मात्स्वपितीत्येनमाचक्षते 
लोकिकाः । स्वमापानं हि 
यस्मादपीतो भवति । गुणनाम- 
परसिद्धितोऽपि स्वात्मप्राम्तिर्म- 
म्यत इत्यभिग्रायः। 

कथं पुनलोकिकाना प्रसिद्धा 
स्वात्मसम्पत्तिः। जाग्रच्छुमनि- 


मित्तोद्वस्वारसवापस्यतयाहुः । 


जागरिते दि पुण्यापुण्यनिमित्तसुख 


(तलन्तः त्त 


स्वान्त होता क्वहै? सो 
वतलाते है जिस समय सोनेवाे 
पुरुषका (स्वपिति पसा नाम होता 
है । छोकमें स्वपिति (सोता दै) रेषा 
प्यवहार प्रसिद्ध है। तथा यह्‌ नाम 
गौण (गुणसम्बन्धी) है-दप्त आशयसे 
कहते दै-जिसत समय यह पर्ष 
स्वपिति, एसा कहा जाता है उस 
समय यह्‌ सतस -प्रकरण प्राप्त "पत्‌! 
शब्दवाच्य देवतासे सम्पत्त--संगत 
अर्थात्‌ एकीमूत हो जाता है । यह 
मनम प्रविष्ट हुआ मन आदिक 
संसगसे प्राप्त हुए जीवहूपकरो व्याग 
कर अपने सद्रूपको, जो किं परमाथं 
सत्य हे, प्राप हो जाता है । इससे 
लोकिकं पु्ष इसे श्वपिति' रसा 
कहकर पुकारते दै; वयोकि यह 
स्वम्‌--आत्माको (अपीतः प्र 
हो जाता है। तात्पर्य यह ॒दै $ 
इस गौण नामक प्रसिद्धिसे भी अपने 
आसमाकी प्राति ज्ञात होती दै । 
ङ्गितु छीकिक पुरुषोको स्वाला- 
की प्राति कैसे परसिद्ध इई ? [एसा 
प्ररन होनेपर] आचारयनि कशा दै 


क्योकि सुषुति जाग्रत्‌ अवस्थाके 
श्रमके कारण होती दै [ इसटिये 
उसे रोकमे स्वालप्राति कहते है || 
नाग्रत्‌ अवस्थामे पुरुष पृण्य-पापके 


ण्ड ८ | 
दुःखाद्नेकायासानुभवाच्छान्तो 
भवति; ततध्रायस्तानां करणा- 
नामनेकव्यापारनिमित्तमलानानां 
स्वव्यापारेभ्य उपरमो भवति । 


रुते श्राम्यत्येव वाक्‌ धा- 
म्यति चज्ञुः"' ( ° उ० १। 


५। २१ ) इत्येवमादि । तथा 
च “गृहीता वाग्‌ गृहीतं चज्ञ- 
यहीतं श्रोत्रं दतं मनः'” (बर° 


उ० २।१। १७) इत्येवमादी- 
नि करणानि प्राणग्रस्तानि; प्राण 


एकोऽ्रान्तो देहे इये यो 
जागति, तदा जीवः श्रमापुत्तये 
स्वं देवतारूपमात्मानं प्रतिपद्यते। 


नान्यत्र स्वरूपावस्थानाच्छुमापः 
नोदः स्यादिति युक्ता प्रसिद्धि- 
लौकिकानां स्वं क्वपीतो भवतीति। 


& 
श्ाङ्करमाष्याथ दण 
थ 9-99-9 ~ 4-98-8 > 2 6 ऋ 


कारण दहोनेवाठे सख-दुःख आदि 
अनेक प्रकारका श्रम अनुभव करनेसे 
थक जत्‌ है। उक्तके कारण 
पीडित अर्थात्‌ अनेकं भकारके 
व्यापारद्प निमित्तसे शिथिल हुई 
इन्दरियोंकी अपने व्यापारो नित्ृत्ति 
हो जती है। “वाक्‌ भी थक 
जाती है ओर चक्षु भी थक जाती 
है'” इत्यादि श्ुतिसे भी यदी सिद्ध 
ह्येता है । इसी प्रकार “[ सुषुपतिम 
विज्ञानमय आत्माद्वारा ] वाक्‌ गृहीत 
हो जाती है, चक्षु गृहीत हो जाती 
है, श्रोत्र गृहीत हो नाते दै ओर 
मन गृ्ठीत हो जाता है" इस प्रकार 
ये सब इन्दि प्राणसे गृहीत हो 
जाती दै; एक प्राण ही अश्रान्त 
रहता है नो कि देहरूप षम 
जागता रहता है । उस्र समय जीव 
श्रमकी निवृत्तिके स्यि अपने 
स्वाभाविक देवतारूपको प्र हो 
जाता है, क्योक्नि स्वरूपम स्थित 
होनेके सिवा ओर कदीं श्रमकी 
निवृत्ति तदी हो सकती--इसल्थि 
उस समय वह अपने स्वखूपको 
प्रह जाता दै, एेसी रकिकि 
ुरपोकी प्रसिद्धि ठीकदही दै। 


दै४दे छान्दोण्योपनिषष्‌ [ अध्याय ६ 


द्यते दि लोके ज्वरादि- ¦ रोके ज्वरादि रोगेसे अर्त हए 
रोगग्सतानां दिनो सवा- | णक उनसे इकर गि 

स्वस्थ होकर विश्राम करते दा भी 
त्मस्थानां विश्रमणं तद्रदिदापि | नता ही दै; उषी प्रकार यहो भी 
स्यादिति युक्तम्‌ । ““तद्यथा | हो सकता दै, अतः यह परिद्धि 


न टौकदही दहै । यही वात “निष 
श्येनो वा ुपणों बा मिपरिपत्य | भ्रकार बाज अथवा कोई दूसरा पी 


भ्रान्तः'' ( ब° उ० ४।३।१९ ) 
इत्यादिश्रुतेश्च ॥ १ ॥ 


सब भोर उहकर थक जनेपर" 
इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध होती दै।॥१॥ 


~; ० :- 


तत्रायं दृष्टान्तो यथोक्तेऽथे-- | उस उपयुक्त अर्थम यह द्टन्त 
है 





स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिं पति- 
त्वान्यत्रायतनमलञ्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु 
सोम्य तन्मनो दिशं दिशां पतितान्यत्रायतनमलञ्ध्वा 
प्राणमेवोपश्रयते प्राणवन्धन९हि सोम्य मन इति॥२॥ 

निप प्रकार डोरीमे वेषा हुभा पक्षी दिशा-विदिशाभोमि उद़कर 
अन्यत्र स्थान न मिलनेपर णपने बन्धनस्थानका ही आश्रय लेता दै इसी 
भकार निश्चय ही हे सोभ्य | यह मन दिशचा-विदिशामं उड़कर अन्यतर 
स्थान न मिङनेसे प्राणका ही आश्रय लेता हे, क्योकि हे सोम्य | मन 
प्राणङ्प बन्धनवाखा ही है ॥ २ ॥ 
स यथा शनिः पक्षी शङ्खनि- | निस प्रकार ॒चिद्रोमारके हाथमे 
घातकस्य इस्तगतेन इतरेण | पी हुई शोरीसे भधा इना 
उसमे फंस्ाया हुमा पक्षी उस 
्रबद्धः पाशितो दिशे दिं | बन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छते 


दण्ड < ] 


क्ाहरमाभ्यार्थं 


६४७ 


> 9 > > > 8: >< 8: ~ ड 8 4 > 9८ ऋ < < 9 अ ऋः 


बन्धनमोक्षा्थी सन्प्रतिदिशं पति- 


हवान्यत्र बन्धनादायतनमा- 


थं विभमणायाहग्ध्वाप्राप्य 


बन्धनमेवोपश्रयत । एवमेव 


यथायं दृष्टान्तः--खल हे सोम्य 
तन्मनस्ततप्रकृतं पोडश्षकलमनो- 
पचिवं मनो निर्धारितम्‌, त- 


सप्रविषटस्तरस्थस्तद्पलक्षतो जीव- 
स्तन्मन इति निर्दिश्यते । मश्चा- 
क्रोशनवत्स मनआख्योपाधिजी- 
वोऽविद्याकामकर्मोपदिषटां दिशं 
दिज्गं सुखदुःखादिलक्षणां जाग्र- 
तस्वभ्रयो; परतिता गतवानुमूये- 
त्यर्थः, अन्यत्र सदाख्यात्खरा- 
त्मन आयतनं विश्रमणस्थानम्‌- 
लध्व प्राणमेव, प्राणेन सर्व 
कायकरणाभ्रयेणो पलक्षिता प्राण 
इत्यु्यते सदाख्या परा देवता, 





® जिस प्रकार "मञ्चाः क्रोशन्ति ( मञ्च बोलते ह ) इस वाक्यमें मञ्चः 


दिश्चा-विदिशा्ओमें उहकर विश्राम 
कृरनेके र्थि बन्धनके सिवा कोद 
जर मायतन--भाश्रय न पनेपर 
बन्धनघ्थानका ही भवलम्ब शेता 
है; उषी प्रकार, जषा कि यह 
दृष्टान्त दै, हे पोम्य | निश्चय ही 
वह मन - वह सोरुह कलार्भोवाला 
प्रहृत मन जो कि अन्नसे उपचित 
हभ निश्चय किया गया है, उरसर्मे 
प्रमिष्ट होकर उसमे ध्थित हो, उसके 
ही द्वारा उपलक्षित होनेवारे जीब- 
का ही वहां "तन्मनः, ( वह मन ) 
इस कथनके द्वारा निदंश किया 
गया हे । मञ्चके आक्रोश (बोरने)# 
की भांति वह मनसंज्ञक उपाधि- 
वाला जीव नाग्रत्‌ ओर स्वभ्रके 
समय अविद्या, कामना ओर कमं 
द्वारा उपदिष्ट॒घुख-दुःखादिरूप 
दिश्चा-विदिश्षाम उइकर- जाकर 
अर्थात्‌ उन्दं अनुभव कर अपने सत्‌- 
संज्ञक स्वापमासे अतिरिक्त ओर कदी 
आश्रय--विश्रामस्थान न पाकर 
प्राणको ही सम्पूणं कायं जौर करण- 
के आश्रयभूत प्रणद्रारा उपरक्षित 
इआ सत्‌-संिका परादेवता यहाँ 


शब्दूसे उसपर बैठे हए रोगौँका र होता है उसी ध्रकार यहां मन" शब्दसे 
मनम स्थित-मनरूप उपाधिवाढा जीव उपठक्षित होता ई । 


६७८ छम्दोग्योपनिषद्‌ [ अध्याय ६ 


<> 8 + 8 < < > ऋ >6< >< >< 56८ 8-8८-8 > ~ > 


'्राणस्य प्राणम्‌" (ब्रृ०उ० %| | (प्राणः कहा गया हे जैसा कि उस्‌ 
प्ाणके प्राणको [ नो जानते है #' 
४।१८ ) "प्राणशरीरो भा- | “वह प्राणशारीर ओर पाश 
रूपः” ( छ उ० २। १४। | है" इत्यादि शरतिसे सिद्ध होता १ 
२) इत्यादिश्रुतेः । अतस्तां | अतः उस प्राण अर्थात्‌ प्राणास्य 
देवतां प्राणं प्राणास्यामेबोप- | देवताको ही आध्रय कात है 
श्रयते । प्राणो बन्धनं यस्य | वर्योकि हे सोम्य | प्राण जिका 
मनसस्तस्राणवन्यनं हि यस्मा- बन्धन है वह मन प्राणवन्धन है 
सोभ्य मनः प्राणोपरक्षितदेव- | तापय यह है कि मन यानी उप्ससे 
ताश्रषम्‌, मन इति तदुपलक्षितो | उपलक्षित होनेवाला जीव प्राणोप- 
जीव इति | २ ॥ ¡ लक्षित देवताके ही आश्रित है ॥२॥ 


एवं स्वपितिनामभ्रसिद्धिदारेण | इस प्रकार 'स्वपिति' इस नामकी 


जी ) लौ परसिद्धिद्टारा जीवका जो सत्यसव 
यज्ञावस्य सत्य ग 
8 रूप जगत्‌का मूक है उसे पुत्रको 


मूलम्‌, तत्पुत्रस्य दशायलाहान्ना| दिखलाकर अन्नादि कार्यकारण 
(दकायकारणपरम्परयापि जगतो | परम्परासे भी जगतके मृखमूत तको 
मूर सदि दशेयिषुः दिखानेकी इच्छसे भरणिने कहा 


अशनापिपासे मे सोस्य विजानीहीति यत्रेतस्पुरुषो 
ऽरिरिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तव्यथा गो 
नायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽङना- 


येतितत्रेतच्ुङ्गमुर्पतित< सोभ्य विजानीहि नेदममूं 
भविष्यतीति ॥ ३ ॥ 


लंण्डे ८ ] शाङ्करमाष्याथं ६४९ 

> आ 9 9 9८-8८-9८ 2-8-89 + 
हे सोभ्य | तु मेरे्रारा अशना ( भूख ) घर पिपासा ८ प्यास ) 

को जान । निस समथ यह पुरुष अरिरिषति ८ खाना चा्ता दै ) 
पेसे नामवाला होता है, उस समय जरु ही इसके भक्षण करिये हुए 
अन्नको ठे नाता है ? जिप्त प्रकार रोकमँ गौ ठे जनेवल्क्रो] गोनाय, 
[ भश्च ले जनेवारको ] अशनाय ओर [ परूषोकरो ठे जनेवले राजा 
या सेनापतिको ] पुरुषनाय कहते है । उसी प्रकार जरको अशनायः एेसा 
कहकर पुकारते ह । हे सोम्य | उस जल्पे ही तू इस [ शरीर्प |] 
शुङ्ग ८ अङ्क ) को उत्त हुभा समञ्च, कोरि यह निम ( कारण- 


रहित ) नहीं हो सकता ॥ ३ ॥ 
अशनापिपासे अशितमिच्छा- 


शना, यालोपेन; पातुमिच्छा 
पिपासा ते अशनापिपासे अश- 
नापिपासयोः सत्वं विजानी- 
दीत्येतत्‌ । यत्र॒ यस्मिन्काल 
एतन्नाम पुरूषो मवति, किं तत्‌! 
अशिरिषत्यशितमिच्छतीति तदा 
तस्य पूरुषस्य फिंनिमित्तं नाम 
भवति ! इत्याह--यत्ततपुरुषे- 
णार्चितमन्नं कठिनं पीता आपो 
नयन्ते द्रवीकृत्य रसादिभावेन 
विपरिणमयन्ते, तदा अक्त मनं 


अङानापिपासे-अशन ( भक्षण ) 
की इच्छाको अशनाः कहते है, 
ध्या का ोप करनेसे अशना शब्द 
वनता दहै [ व्तुतः यह “अश- 
नायाः शब्द दै] ओर पीनेकी 
इच्छा "पिपासा कहलाती है । ये 
ही अशना-पिपासा है; इन अशना- 
पिपासाका तत्व तू नान ले-रेसा 
इसका तात्ययं॑है । जब अर्थात्‌ 
जिस समय यह पुरूष इस नामवार 
होता है, किस नामवाख !- 
अशिशिषति, अर्थात्‌ खाना चाहता 
है; उस समय पुरुषका यह नाम 
कि कारणसे होता है! सो 
वतलाते है--उस परुषद्रारा खाया 
हआ जो कठिन अनन होता है उसे 
उसका पीया हुआ जरु द्रवीमूत 
करके ठे जाता है अर्थात्‌ रसादि 
खूपसे परिणत कर देता है । तभी 


६५० छन्दोग्योवनिषद्‌ 


०8८ > 9८ 8 9 < 9 < >< >< >> >> > 9 


जीय॑ति । अथ च भवत्यस्य 
नामाश्षिशचिषतीति गौणम्‌ । | 
जीर्णे घन्नेऽश्ितुभिच्छति सर्वो 


हि जन्तुः । 
तत्रापामशिवनेत॒स्गादश्नाया 


इति नाम प्रसिद्धभित्येतस्मि- 
न्थ । यथा गोनायो गां 
नयत्रीति गोनाय इत्युच्यते 
गोपालः, तथाश्चा्यतीत्यश्च- 
नायोऽश्वषारु इत्युच्यते, पुरुष- 
नायः पुरुषाज्नयतीति राजा 
सेनापतिर्वा, एवं तत्तदा 
आचक्षते लोका अञ्जनायेति 
विसजेनीयलोपेन । 

तत्रैवं सत्यद्धी रसादिभावेन 


नीतेनाशितेनान्नेन निष्पादित- 
मिदं शरीरं वटकणिकायामिव 


[ ध्याय ६ 
उसका भक्षण क्रिया हुभा अन्न 
पचता है । तत्श्वात्‌ उसका 
“अश्िक्िषति, दे गौण नाम 
होता दै, कर्योकि सभी जीव मत्रे 
जी्णं हो जनेपर ही भोजन 
करनेकी इच्छा करते है । 
अशित ( भक्षित अन्ने ) का नेता 
(के जानेवाला ) होनेके कारण 
जलका "अशनाया एसा नाम प्रधिद्ध 
हे । [इस विषयमे यह दष्टन्त है] 
जिस परकर “गोनायः, गोको ले जाता 
है इसल्यि ग्वाला गोनायः कहा 
जाता है, तथा अर्धको ले नाता हे 
इसख््यि अश्वपार अश्वनायः, एसा 
कहा जाता है योर पूरको ठे 
जाता है इसल्यि राजा या सेना- 
पति पुरुषनाय" कलता दै । 
इसी परार उस समय [ अरितको 
ठे जानेके कारण ] लौकिक पष 
जलको “भशनाय' रसा विसगंका 
लोप करके कहते है [ अर्थात 
“अनायः” इस पदके विसग॑का ® 
करके “भशनायः पसा कहते दै |। 
रसा नेप ही जलदाय 

रसादिभावको प्रा हए अन्या 


निष्पन्न हुमा यह ॒शरीरङूप अङक 
वटके बीजसे उतपन्न होनेवारे अङई(- 


= ५ 
ण्ड ८ ] शाहर्माष्याथ ६५९१ 
>ध>8< 9 3 6 ल 9 99 9 9८ 8 ¬ 8 ~ -अ--+-+ 


शुङ्गोऽङ्कर उत्पतित उद्वतः; | के समान उत्नर हज दै । हे 
तमिमं शुञ्गं कायं शरीराख्यं | सोम्य | वादिके अङ्करके समान 
बटादिपङ्गवदुतपतितं ह सोभ्य | अयन ए, उस इस शरीरसंजञक 


~ | शंग-श्नायंको त जान । उद्भ 
विजानीहि । रि तत्र विज्ञ क्या विञेयं हे ? सो बत्लाया जाता 


वभू ! व इ्यु्यते-शरण्विदं | है- एन, भङ्कुरके समान कार्ल 
श्रवत्कायत्वाच्छसर्‌ नामूर | होनेके कारण यह शरीर गमूल-- 
भूकरदितं भविष्यति | २ ॥ | कारणरहित नही हो खकता ॥ २ ॥ 

इत्युक्त आह ॒शवेतकेतः- | [ आठणिदवारा ] इस भकार कदे 


यदेवं समूखमिदं शरीरं वटा- | जनेपर श्वेतकेतु बोला “यदि इस 


प्रकार वटादिके अल्छुरके समान 
दशृ्कततस्यास्य रीरस्य क यह शरीर समूरु है तो इसका 


-भूरं स्याद्धवेदित्येवं पृष्ट आह | मू कदां दो सकता है £ इस 
पिता- प्रकार पूछे जानेपर पिताने कदा- 
तस्य क मृररस्यादन्यत्राज्नादेवमेव खलु 
सोम्यान्नेव शुद्भेनापो मूखमन्विच्छाद्धिः सोभ्य 
शङ्गन तेजो मूलमन्विच्छ ॒तेजसा सोम्य शुङ्गेन 
सन्मूरुमन्विच्छ सन्मूखाः सोम्येमाः सर्वाः भजाः 
सदायतनाः सत्यप्रतिष्ठाः ॥ ७ ॥ 
खनको छोद़कर इका मूर ओर कों हो सकता हे ! इसी प्रकार 
दे सोम्य तू अन्नरूप श्ंगके दवारा जरह्प मूको लोन जर हे सोम्य | 
जकरूप शुनके द्वारा तेनोरूप मूरको सोन तथा तेजोरूप शुकगके दारा 
इदुरूप मूलका अनुसंघान कर । हे सोम्य | इस भकार यह सारी पना 
सन्मूलक़ है तथा सत्‌ ही इसका आशय दै ओर सत्‌ ही प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥ 


दषर 


छाण्डोन्योपनिषत्‌ 


[ अध्याय ६ 


>< 9८ ८ ¬< € ¬< < >< < -9< > < >< ॐ 9 >&८ € ¬< ८ 8८ -9 8८ ¬ > 


तस्य क भूल स्यादन्यत्रान्ना- 
दन्नं मूरमित्यभिप्रायः । कथम्‌ { 
अशितं हयममद्धद्रंवीडृतं जाठ- 
रेणाभिना पच्यमानं रसभावेन 
परिणमते । रसाच्छोणितं शो- 
णितान्मांसं मांसान्मेदो भेद्‌- 
सोऽस्थीन्यस्थिभ्यो मज्जा मज्ञा- 
याः सुक्रम्र्‌ । तथा योषिद्भुक्त 
चान्नं रसादिक्रमेणेवं परिणतं 
लोहितं भवति ! ताभ्यां बुक्र- 
सोणिताभ्यामन्नकार्याभ्णां संयु- 
क्ताभ्यामन्नेनैवं प्रत्यहं सुज्य- 
मानेनापूयमाणाभ्यां ङुड्यमिव 
मृत्पिण्डः प्रत्यहयुपचीयमानोऽ- 
न्नमूलो देहशुङ्गः परिनिष्पन्न 
इत्यथः । 
यत्तु देदशुद्स्य मूरमन्नं 
निदिं तदपि देहवद्विनाशोत्प- 
त्िमच्वात्कस्माचिन्मूलादुर्पति- 


तं शुङ्ग एवेति कतखाद-यथा 


अन्नको छोड़कर इसका मूल 
ओर करटो हो सकता है £ तात्य 
यह है किं अन्न दी इसका मूर 
क्रिस प्रकार १ क्योकि खाया हुभा 
अन्न ही जल्के द्वारा द्रवीभू 
होकर जटरामि द्वारा पचाया जने- 
पर रसरूपमे परिणत हो जाता है। 
वह रससे रक्त, रक्तसे मासि, मांससे 
मेद, मेदसे अस्थि, अस्थिसे मन्ना 
ओर मञ्जास्े वीर्यम परिणत 
होता है। इसी प्रकार सीद्ररा 
खाया हुभा अन्न ॒रसादिके करमसे 
परिणत होकर रज बनता है । उत 
परस्पर मिरे हुए अन्नके कायं तथा 
प्रतिदिन खाये जानेवाटे भन्ने 
पुष्ट हुए वीयं ओर रजसे मृत्तिककि 
पिण्डसे भीतके समान प्रतिदिन 
पुष्ट॒होनेवाल यह भन्नमूर्क 
देह्य अङ्कुर निष्पन हुभा है- 
फसा इसका तात्य हे ? 
इस प्रकार जो देहरूप अङ्कु्का 
मूर अन्न बताया गया दै वह भी 
देहके समान उदत्ति-नाशवाशा 
होनेके कारण किसी मूसे उलन 
हा अङ्कुर ही है--एेसा मानक 
अशणि कहता है --!है सोम्ब | 


| 


खण्ड ८ | 


€ 
शाङःरमाष्याय ६५३ 
> 9 > ० 4 >>> 89८ > 99 ~ 


देशुद्धोऽन्नमृर एवमेव खलु | जिस प्रकार देहरूप अङ्कुर अन्न- 


सोभ्यानेन शुद्धेन कायंभूतेनापो | 


मूरमन्नस्य शुङ्गस्यान्विच्छ प्रति- 
पद्यस्व । अपामपि विनाशोतप- 
त्तिमत्वाच्छुङ्त्वमेवेति, अद्धिः 
सोभ्य शुद्धेन कार्येण कारण 
तेजो भूलमन्विच्छ । तेजसोऽपि 
विनानो्पत्तिमचखाच्छुङ्गत्वमिति, 
तेजसा सोभ्य सुङ्गेन सन्मूर- 
मेकमेवाद्वितीयं परमाथंसत्यम्‌ । 

यस्मिन्सर्वमिदं वाचारम्भणं 
विकारो नामघेयभनृतं रज्ञ्वा- 
मिव सर्पादिविकल्पजातमध्यस्त- 
अविद्यया तदस्य जगतो मूलमतः 
सन्मूलाः सत्कारणा हे सोम्येमाः 


स्थावरजङ्गमरक्षणाः सर्वाः प्रजा 
न केवलं सन्मूला एवेदानीमपि 
स्थितिकाले सदायतना सदाश्रया 
एव । न दहि मृदमनाश्रित्य 
घटादेः सस्व स्थितिर्वास्ति। अतो 
मृदरत्सन्मुटत्वात्रजानां सदाय- 


मुल्क है उसी प्रकार कार्यमूत 
अन्नरूप जङ्कुरके द्वारा त्‌ अन्नरूप 
अङ्कुरे मूल जलो खोन-प्ात 
कर । जर भी उत्पत्ति-नाशवान्‌ 
होनेके कारण अङ्कुररूप ही है; 
अतः हे सोग्य | नख डुंग यानी 
कार्यके द्वारा तू उसके मूर कारण 
तेजको खोन । न।शोतत्तिमान्‌ 
होनेके कारण तेजका भी शयंगत्व 
ही दै; भतः हे सोम्य | तेजरूप 
शगके द्वारा तु एकमात्र अद्वितीय 
परमाथं सय सद्रूप मूलकी 
शोध कर | । 

जिस सद्रप मूलम यदी वाणी- 
खूप मआश्रयवाला नाममात्र विकार 
रज्जुमे स्के समान अविद्ये 
अध्यस्त है वही इस जगत्‌का मू 
है । अतः हे सोभ्य | यह स्थावर- 
जंगमखूप सम्पूणं प्रना सन्मूखक 
तथा सद्रप कारणवाली है । यह्‌ 
सन्मूरुक ही नहीं, ईस समय 
स्थितिकारमं भी सदायतना अर्थात्‌ 
सदृरप आश्रयवारी दी हे, कर्यो 
मृत्तिकाको आश्रय कि निना 
घटादिकी सत्ता अथवा स्थितिं 
हे ही नहीं । अतः मृत्तिके 
समान सन्मुर्क होनेके कारण 


६५५७ छान्डोग्योपमिषल्‌ [ बष्पाय ६ 


तनं यासां ताः सदायतनाः | निक्ष प्रनाका सत्‌ हौ भग्न 
प्रजाः, अन्ते च सस्प्रतिष्टाः 


सदेव प्रसिष्ठा कयः समाप्िरव- 
सानं परिक्िषो यासां ताः 


सप्रतिष्ठाः ।॥ ४ ॥ 


( णाश्रय ) है वह प्रजा घदायत। 
है तथा अन्तम ससहिष्ठा ै- 
ही जिसकी प्रतिषठा- हयस्मान- 
समापि-भवम्तान भर्थात्‌ परिशेष 
है रे षह भरना तिषठ ह।४॥ 


अथ यत्रेतरपुरषः पिपासति नाम तेज एव तपीतं 
नयते तयथा गोनायोऽश्वनायः पुशूषनाय इत्येवं तत्तेन 
आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुद्गसुत्पतित्सोम्य विजा- 

नीहि नेदममूं भविष्यतीति ॥ ५ ॥ 
अव; जप्त समय यह पुष "पिपासति ८ पीना चाहता है ) एसे 


नामवाला होता हे तो उसके पीये हुए जल्को तेन ही ठे जाता द । 
अतः जि प्रकार गोनाय, अश्चनाय एवं पुरुषनाय कहलति दै उती 
भकार उस तेजको उदन्या" एेसा कहकर पुकारते है । हे सोम्य | उ 
( जरप मूल ) से यह शरीररूप अङ्कुर उतपन्न हुजा दै रसा जान, 
वथोकि यइ मूलरटित नहीं हो सकता ॥ ५, ॥ 


यथेदानीमपृशुङ्गदारेण स- 
तो मूरुस्यानुगमः कारय 
इत्याह -यत्र॒यस्मिन्कारु एत- 
नाम॒ पिपासति पातुमिच्छ- 
तीति पूरुषो भवति । अशि 
रिषतीठिवदिदमपि गौणमेव 


नाम मवति । द्रवीकृतस्या- 
शितस्यानस्य नेत्य आपो- 


अब~ इस्त समय जरुरूप अदे 
द्वारा सदख्प मृक्षा ज्ञान कराना 
दै, इस अभिपरायसे आरुणि क्त 
है- “जिस समय यह पह 
“पिपासति-पीना चाहता है ट 
नामवाा होता है । अशिषिषति 
इस नामके घमान यह भी उष 
गोण नाम ही है। मक्षण 
हुए द्रवीकृ जनको ठे ननिवाण 


लण्ड ८ | 


शाङ्करभाष्याथं 


६५५ 


ऽग्रं देहं क्रेदयन्त्यः शिथि- | 


लीङ्रन्धाहुल्याद्यदि तेजसा 
न शोष्यन्ते । नितरां च 
तेजसा शोप्यमाणास्वप्सु देह- 
भावेन परिणममानासु पातु- 
मिच्छा पुरुषस्य जायते । तदा 
पुरुषः पिपासति नाम । 
तदेतदाद--तेज एब तत्तदा 
पीतमवादि शोषयदेदगतलोदित- 
प्राणमावेन नयते परिणमयति । 
तद्यथा गोनाय इत्यादि समान- 
मेवं तत्तेज आचष्टे लोक उदन्ये- 
त्युदकं नयतीत्युदन्यम्‌ । 
उदन्येतिच्छन्दसं तत्रापि श्वं 
वत्‌ अपामप्येठदेव शरीराख्यं 
ङ्गं नान्यदित्येवमादि समान- 


मन्यत्‌ ॥ ५ ॥ 


जल, यदि उसे तेजके द्वारा शोषित 
न किया जाता तो भपनौ बहुकूताके 
कारण अन्तके अद्कुरम्‌त दैहको 
भाद्रं करके शिथिर कर देता | 
देहभावमे परिणत होते इए नखके 
तेद्वारा सबेथा ज्ञोषित किये नाने- 
पर ही पुरुषो जर पीनो इच्छा 
होती है । उसी समय पुरुष "पिपा- 
सति इस नामवाखा होता है । 


उसी बातक्रो श्रुति इस प्रकार 
कहती दै-उस समय पीये हुए जल 
आदिको तेज दी घुखाकर देहगत 
रक्त एवं प्राणभावको ठे नाता है 
अर्थात्‌ उसे रक्त एवं प्राणरूपमे परि 
णत कर देता दै | उसे निप प्रकार 
कि गोनायः आदि शब्द है उसी 
प्रकार कोक उस तेनकरो “उदन्या 
उदकको ले जानेके कारण “उदन्य 
कहते है । तेजके अर्थम भी 
“उदन्या यह प्रयोग पूर्ववत्‌ (नरके 
अर्थमे अशनाया'के समान) छन्दस 
है । जलका भी यह शरीर नामक 
अङ्कुर दी हे-उससे भित्र नहीं है- 
इत्यादि रेष अथं पूववत्‌ है ॥५॥ 


[वि 0 + नी 





दषे 


[ अप्या ६ 
> ¬ ऋ ~ > > ऋः >| >< ~ > 9 हः > ८-८-8८ > ध ४८ ८ ‰ -४अ 


तस्य क मूलरस्यादन्यत्राद्धयोऽद्धिः सोभ्य शुङतन 
तेजो मूरमन्विच्छ तेजसा सोभ्य शुङ्गेन सन्मूलमचिच्छ 
सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वा; प्रजाः सदायतनाः सस्पतिष्ठ 
यथा नु खट्ट सोम्येमास्तिखो देवताः पुरुषं प्रापय तिर 


ल्निषदेकंका भवति तदुक्तं युरस्तादेव भवतरस्य सोभ्य 
पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सस्पदयते मनः प्राणे 
प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम्‌ ॥ ६ ॥ 

हे सोम्य | उस ८ जलके परिणामभूत शरीर ) का जल्के पिवा 
ओर कहां मूल हो सकता है ? हे पिवदर्शन ¡ नकल भङ्कके दर 
तृ तेजोरूप मूलक सोन कर ओर हे सोम्य | तेनोरूप णङ्कके द्वारा 
सूप मूलक शोष कर । टे सोम्य | यह सम्पूणं प्रना सन्मूलके तथा 
सदरुप ायतन भौर सदर प्रतिष्ठा ( ख्यस्थान ) वारी है । है सेोष्य | 
जिस प्रकार ये तीनो देवता पुरषको प्राप्त होकर उनमेसे येक तरवत्‌ 
रिवत्‌ हो जाता वहरभेने पहले ही कह दिया | हे सोम्य मरणो 
पराप्त होते हए इस पुरुषकी वाक्‌ मनम रीन हो नाती है तथा मन प्राणम 
भाण तेने शौर तेज परदेवता लीन हो जाता हे ॥ ६॥ 

सामथ्यात्तिजसोऽप्येतदेव श- । त्िृतकरणके सामर््यसे यह त 

~ | होतादै कि तेजका भी यही शरीर 

रास्थं सङ्गम्‌ । अतोऽपश्गन संज्ञक शृङ्ग (कार्य) हेः 0 
ध जके कार्यभूत देहद्रारा उ 
देहेनापो मूरुं गम्यते । अद्धिः मूक जलका ज्ञान होत। है, ग 
देन ते ¦ गम्यते ) | र्यसे उसके मूर तेनक्रा 

1 “44 | है तथा तेनो 18 
तेजसा शुङ्गेन सन्मृरं गम्यते | उषके मरु सत्का ज्ञान होता दै- 
द फेसा पूर्ववत समञ्चना वा 


© = श 4 
श्चत्‌। एव दि तेजोऽ्व्नमयस्य | इस प्रकार तेज, जक भौर 


शाङ्करभाष्याथं ६५७ 


न क क ॐ = 4 


खण्ड ८ | 
देहशुङ्गस्य वाचारम्भणमात्रस्या- 
न्ादिपरम्प्रया परमार्थसत्यं 


सन्मूरममयमसतरासं | 
सन्सूलमन्विच्छेति पुत्रं गमयि- 
त्वाशिशिषति पिपासतीति नाम- 


प्रसिदधिद्वारेण यदन्यदिदास्मिन्प्र- 
करणे तेजोऽन्नानां पुरूषेणोप- 


युज्यमानानां का्यकरणसंधा 
देदशुङ्कस्य स्वजास्यसाङकर्येणोप- 
चयकरत्वं वक्तव्यं प्राप्तं तदि- 
दोक्तमेव द्रष्टव्यमिति पूर्वोक्तं 
व्यपदिश्चति । 

यथा लु खलु येन प्रकारेणेमा- 
स्तेजोऽबन्नाख्यास्तिस्रो देवताः 


पुरुषं प्राप्य तरिसिषदेकेका 
भवति तदुक्त पुरस्तादेव भवत्यन्न- 
मितं त्रेधा विधीयत इत्यादि 


विकार वाचारम्भणमात्र देहरूप 
कार्यके प्रमाथं सत्य निर्भय निस 
घौर निराया सद्रूप मूल्को 
अन्नादि परम्परासे नान--पेसा 
पुत्रको समक्षाकर भौर इसके सिवा 
अशिशिषति भौर पिपासति, इन 
ना्मोक्षी प्रसिद्धिके द्वारा इस 
प्रकरणम जो पुरुषद्वारा उपभोगे 
लाये जानेवाले तेज, जर भौर 
अन्नका अपनी नातिका सांकयं न 
करते हुए भूत॒ ओर इन्दियोकि 
संधातमूत इस शरीरका पोषक 
बतलाना प्रप्त होता था वह भी 


उपर बतला ही दिया गया दै. - 


रसा जानना चादिये- यह बतरानेके 
स्यि आरुणि पहले कहे इए 
प्रसगका दी निर्दे करता दै । 


हे सीम्ब | निस प्रकार ये 
तेज, जल ओर अननसंजक तीनों 
देवता पुरुषको प्रात होकर इनमेसे 
भतयेक त्िवत-त्िवृत्‌ हो जाता है 
वह पहरे ही कदा जा चुका दै । 
“खाया हुभा णन्न तीन प्रकारका हो 
जाता है" यह बात वहीं कही गी 


तप्रो । अादीनामश्ितानां| द । बहा यह्‌ भौ बाया गगा । 


ये मध्यमा भातवस्ते साप्ठषातुकं | कि भक्षण 


कि हुए नादिका जो 


&८ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ यण्याय ६ 


> 3969-८ 3 36 ~< 6 < 8 8 9 9 > < ष ह 
शरीरघुपचिन्वन्तीत्युक्तम्‌ । मांसं | मध्यम भाग होता है वह सात 


सबति रोहितं भवति मजा 
मवत्यस्थि भवतीति । ये त्वणिष्ठा 
धाठ्वो मनः प्राणं वाचं देहस्या- 
न्तःकरण संघातय्ुपचिन्वन्तीति 
चोक्तम्‌-तन्मनो भवति स प्राणो 
भवति सा वाग्भवतीति । 

सोभ्य प्राणकरणसंघातो देहे 
विशे देहान्तरं जीवाधिष्ठितो 


येन करमेण पूरदेदाखच्युतो 
गच्छति तदाहास्य हे सोभ्य 
परुषस्य प्रयतो म्रियमाणस्य 
बा्मनसि सम्पवते मनस्ुप- 
संहियते । अथ तदाहक्ञातयो न 
वदतीति । मनःपूर्वको हि बा- 


ग्यापारः, “यदे मनसा ष्यायति 


त 9 ज नात मनसा शरीरके खा 
अस्थि ओर वीयं ॥ 


रू घात घाद य हवः 


घातुर्भोवटेश्व्लरीरका पोषण करता 
है; यथा-'मांस होता दैः, रोहित 
होता दहै, मन्ना होता ह, “अस्थि 
होता दै इत्यादि । तथा यह मी 
वतलया गया है कि उनका जो 
सक्ष्मतम भाग होता है वह मन, 
प्राण ओर वाक्‌ इस देहके जन्तः- 
करणसंघ।तका पोषण करता हे । 
यथा-- वह मन होता हैः, वह 
पाण होता हैः "वह वाक होती है 
इत्यादि । 

वह यह प्राण घौर इन्दियका 
संघात देहके नष्ट होनेपर जीवते 
अधिष्ठित हुभा जितस रमसे पूव 
देसे च्युत होकर अन्य देहको 
प्रा होता है उसका वर्णन आरुणि 
करता है--हे सोम्य | इ पुरुष 
के मरते समय वाणी मनक्षो प्रा 
हो जाती है अर्थात्‌ वाणीका मने 
उपसंहार हो जता है । उस्र समय 
जातिवाटे कहा करते दै किं चह 
नही बोर्ताः क्योकि वाणीका 
भ्यापार तो मनपूर्वकृ ही होता है; 
नसा कि “जो वात मनसे सोचा 


रक्त, मांस, मेद्‌, मजा 


कच्ड ८ ] ह्ाङ्करथाष्या्थं ६५९ 
~> >< >< 9 ०: 29 कक क => => > = 4 > ऋ ऋः 


तद्वाचा वदति" (चृ° एता है वही वाणीसे बोर्ता है शष 
उ० १।१) इति भृतेः। ्ुतिसे सिद्ध होता है । 


४ वाणीका मनम उपसंहार हो 
बाच्युषसंहवायां मनसि मनो 
४ जानेपर मन केवर मननन्यापार 


¢ 

मननव्यापारेण केवलेन वतते । | करता हुमा वर्तमान रहता दै । 
संह जिप्त समय मनका भी उपसंहार 

मनोऽपि यदोपसंहियते तदा | होता हे उ समय मन प्राणम रीन 
मनः प्राणे सम्न्नं | हो नाता दै । तव आस-पास बेटे 
कार इव; तदा पार्स्था ज्ञातयो | हए जातिवाटे कते दै “अव यह 
पहचानता नहीं दैः उस समय, 

न विजानातीत्याहुः । प्राणश्च | जिसने बाह्य इन्दियोका अपने 


, | उपसंहार कर ज्या है वह प्राण 
तदोर्ष्वोच्छवासी स्वातमन्युपसहृत ऊर््वोच्छवासी होकर- क्योकि 


न संवग विदामेश प्राण, वागादिको 
बाह्करणः संबगंवि्ायां दश- | अपम ठीन क ठेता ह~ रेषा] 
दिखलखया गया दै--हाथ पौव 
ज पकता हुभा मानो मर्मस्थनोका 
नानि निङघन्तननिव उत्छुजन्क्रमे- | छेदन करता बहिर्गत होनेके स्थि 
गापसंहतस्तेजसि सम्पद्यते । तद्‌-| करमशः उपसंहत होकर तेजमे लीन 

1 ५ हो नाता है । तव नातिवाले कहते 
रातयो न चलतीति । सतौ | दै-अव हिरुडर_ नही सकता" । 
फिर यह शङ्का करते इए कि अभी 

नेति वा विचिकित्सन्तो देद- | मरा है या नहीं वे देहका स्प 
। करते है ओर देहे उष्णता देखकर 

मालभमाना उष्णं चोपल ममाना | कहते है “अभी शरीर उष्ण है, 
देह उष्णो जीवतीति । यदा | अतः जीता हे" । निष खमय 
 --- 


® दे खिये छान्दोग्य ४। ३ । २। 


नाद्धस्तपादादीन्दिक्षिपन्मर्मस्था- 


६६० छाम्दोग्योपनिषहु [ न्याव ६ 


तदप्यौष्ण्यलिङ्खं तेज उपसं- | उष्णता ही जिसका लिङ्ग बह 
तेन भी उपसंहत हो जाता षै तव 
वह॒ तेन परदेवता प्रशन 
देवतायां प्रशषास्यति । होता है। 
तदेवं करमेणोपसंहूत स्वभूटं | तन इस प्रकार क्रमशः उपसंहृ 
< होकर मनके अपने मूमूत पर 
राप्तं च मनसि तत्स्थो जीवोऽपि देवताको परा होनेपर उम स्थि 
जीव भी घुपु्कालके समान भपे 
निमित्त [ मन ] का उपहार हो 
संहियमाणः सन्सत्याभिसन्धि- | जानेके कारण उपसंहत होता हभ 
ॐ यदि सव्यानुसंधानपू्वक उपसंहृत 
पूवक चेदुपसंहियते सदेव सम्पद्यते होता है तो सतक्तो दी प्रप हो 
न पुनरदहान्तराय सुषुप्तादियो- | जाता है; सोनेसे जगे हुए पुरपके 
< समान फिर देहान्तरको प्राप्त नीं 
तिष्ठति । यथा लोके समये दे होता; जिस प्रकार किं रोक 
बतंमानः कथ्िदिवाभयं देशं | यूं देशम रनेवास कोमणी 
्रिसी प्रकार अभय देशम पर्व 
ाप्तस्तदवत्‌ । इतरस्तनत्मज्ञस्त। जनेपर [ फिर उससे नही रटत] 
उसी प्रकार [यह भी नहीं रौरता]। 


रितु अन्ध जो अनात्मज्ञ है वह 
~ सोनेसे जगे हए परुषके समान 

स्वा नदहजालमाविश्चति < 
नरहजारमाविश्ति | मरनेके अनन्तर उस पने मृढ्ते 
स्नान्भूरादुत्थाय देहमाविशति| जि मूते कि जीव उठकर दें 
भवेश करता द, उठकर किष 
देदपारमें भवेच करता है ॥ ६ ॥ 


हियते तदा तत्तेजः परस्यां 


= 


स्मादेव भलातसुषुप्तादिबोस्थाय 


जीवः ॥ & ॥ 


~ च, 
+ 


संण्ड ८ | 


प्ाडइस्माष्यार्थ 


६६१ 


स य एषोऽणिमेतद्‌ासम्यमिदश्सव तत्सत्यश्स 
आहमा तत्वमसि उवेतकेतो इति भूय एव मा भगवा- 
न्विज्ञापयचिति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ 

वह जो यह भणिमा है एतद्रप ही य घब है । वह सत्य है, बह 
जाला है जोर दे दरवेतकेतो | वही तू दै [ मारुणिके इस प्रकार कहने 
पर इवेतकेतु वोका--] “भगवन्‌ | सुञ्ञे फिर समज्ञाद्ये | [ तब 
आरणिने ] अच्छा, सोम्य †' पुसा कहा ॥ ७ ॥ 


स यः सदाख्य एष उक्तो- 
ऽणिमाणुमावो जगतो भूरमेत- 
दारम्यमेतत्सदास्मा यस्य 
सर्वस्य तदेतदात्म तस्य भाव 
रेतदातम्यम्‌ । एवेन सदाख्ये- 
नात्मनात्मवस्सवेमिदं जगत्‌ । 
नान्योऽस्त्यस्यात्मा संसारी 


(“नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट नान्यदतो- 


ऽस्ति ओत" (ब०उ० ३। 4 
११) इत्य1दिश्रुत्यन्तरात्‌ । 

येन॒ चात्मनात्मवत्सवंमिदं 
जगत्तदेव सदाख्यं ऋरणं 
सत्यं परमाथंसत्‌ । अतः स 
एवात्मा जगतः प्रत्यसूस्वरूपं 
सतत्वं याथासम्यम्‌ । आस्म- 
शब्दस्य निरुपपदस्य प्रत्यगा- 


यह जो सत्संज्ञक भणिमा-- 
अणुता जगत्‌कां मक बतखायी 
गयी है "तदास्य, यह सब है- 
जिस सवकी एतत्‌ ( यह ) सत्‌ 
आत्मा है उसे एतदात्म' कहते दै 
उसका भाव “पेतदाल्य' है; अर्थात्‌ 
इस सत्सं्ञक आत्मासे यह पारा 
जगत्‌ आत्मवान्‌ हे । इसका आत्मा 
कोई ओर संसारी नहीं हे; जेता 
“इससे अन्य कोई द्रष्टा नही हे 
इससे अन्य कोई श्रोता नहीं है 
इस अन्य शरुतिसे प्रमाणित होता है। 

जिस आलासे यह सारा जगत्‌ 
आसवान्‌ दै वही ससंजञक कारण 
सत्य अर्थात्‌ परमाथं सत्‌ हे । मतः 
वह॒ शसा दी जगत्‌का प्रत्यक्‌ 
स्वरूप सतत्व अर्थात्‌ याथाल्य 
हे, क्योकि जिस प्रकार गो आदि 
शब्द वेक, गाय आदि अथेमे खूढ़ 


ददै 


छाण्दोग्योवनिवत्‌ 


[ बध्याव ६ 


9४ ल 9 8 8 < 8 ८ 8 8 ~ 8 > > >8८ अ ऋ ऋ >> 


स्मनि गवादिशब्दवन्निरूटत्वात्‌ । 


अतस्तस्ससमसीति हे श्वेतकेतो । 


इत्येवं प्रत्यायितः पुत्र आह 
भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु 
यद्भवदुक्तं तत्संदिग्धं ममाहन्य- 
हनि सर्वाः प्रजाः सुप्ते सत्सं- 
पद्यन्त इत्येतद्येन सत्सम्पद्य न 
विदुः सत्सम्पन्ना वयमिति । 
अतो दृष्टान्तेन मां प्रत्याय- 


वित्यथ; । एवुक्तस्तथास्तु 


है उसी प्रकार उपपद्रहित असा 
शाब्द प्रत्यगासमें ख्ट ह । अत; 
हे सवेतकेतो | वह्‌ सत्‌ तृ हे । 


इस प्रकार प्रतीति कराये हु 
पूत्रने फिर कह(--'भगवन्‌ | आप 
सञ्े किर सम्चाहये । आपने जो 
कहा है उससे अभी मुने संदेह 
ही दै--सम्पू्णं प्रजा रोज-रोन 
सपि सतो प्र होती है) 
अतः इस ॒विषयतें मुञ्चे संदेह दी 
है फि वह यह कैसे न 
जानती कि हम सतो प्राप्य 
गये है । इसस्यि तापं यह दै 
कि आप सुञ्े इष्टान्त देकर 
समञ्ञादयेः इष प्रकार के जानेपर 


पिताने श्वोम्य | भच्छा' देमना 
सोम्येति होवाच पिता ॥ ७ ॥ | कडा ॥ ७ ॥ 
` = 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये 
-श्मण्डमाष्यं सम्पूण ॥ ८ ॥ 


ह 


ककः खर 


दुषृतिमे 'सत्की प्रापिका ज्ञान न होनेमे मधुमग्खियोका दष्टान्त 
यत्पृच्छस्यहन्यहनि सस्सम्पद्य | तू जो पूछता किभ्रजाजो 
प्रतिदिन सत्को प्राप्त होकर भी 
यह नहीं जानती किं हम सत्को 
प्राप्त हो गये है, सो उसका यह 
अज्ञान किस कारणसे है !-इस 

तत्कस्मादित्यत्र शृणु दष्टन्तम्‌- । विषयम दृष्टान्त श्रवण कर 
यथा सोम्य मधु मधुतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां 
बर्षाणाश्रसान्समवहारमेकता <रसं गमयन्ति ॥ १ ॥ 
हे सोम्य ! जिस प्रकार धमकियां मधु निष्पन्न (तैयार) करती है 
तो नाना दिशा धरक्षोका रस कर एकताको प्रात करा देती है ॥१॥ 
यथा लोके हे सोभ्य मधुकृतो | दे सोम्य । निस प्रकार ोकमं 
मधु वन्तीति मधुतो मधुक | षतम्‌ कती द पल्य 
नि जो मधुकृत कही जाती है । वे मधु- 
मक्षिका मधु निस्तिष्ठन्ति मधु | मदलमौ तर होकर मध तैयार 
निष्पादयन्ति तत्पराः सन्तः । | करती है । किस प्रकार तैयार 
कथम्‌ १ नानात्ययानां नाना- | करती है १ नानालयय नाना गतिर्ो- 
गतीनां नानादिकानां व्क्षाणां व (५ स ) विविष 
वकता. | विशम स्थि दृकोके रस सकर 
रसान्समवहार समाहत्यकतामे- | उन रोको मूषुरूपते पङ्को 
कभावं मधुत्वेन रसान्गमयन्ति | प्राप्त करा देती है अर्थात्‌ मधुरको 

मधुत्वमापादयन्ति ॥ १॥ । प्राप्त करा देती दै॥ १॥. 


--: ° :- 


न विदुः सस्सम्पन्नाः स्म इति 


ददे छन्दोष्योपलिचदू [ बष्याब्‌ ६ 


= 5 4 न. 
ते तथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽसुष्याह शक्षस्य रतो 
ऽस्म्यमुष्याहं इक्षस्य रसोऽस्मीत्येव खट सोभ्येभाः 
सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सस्पयामह 
इति ॥ २॥ 
वे रघ जिस प्रफार उस मधम दस प्रकारका विवेक प्राप्त नही क 
सकते कि भव इतस वृक्षका रस ह गौर भे इस वृका रस है हे सोभ्य 


ठीक इसी प्रकार यह सम्पूणं प्रना सतो प्रात ह्ोकर्‌ यह्‌ नहीं जानतो 
कि म त्को प्राप्त हो गये ॥ २ ॥ 


ते रसा यथा मधुेनैकतां । मधुरूप्से पकताको प्रा हुए 


गतास्तत्र मधुनि षिवेकं न 
रभन्ते । कथमघुष्याहमाम्रस्य 
पनसस्य बा दक्षस्य रसोऽस्मीति 
यथा हि लोके बहूनां चेतनावर्ता 
समेतानां प्राणिनां विवेकलामो 
भवत्यष्ष्याहं पुत्रोऽुष्याहं 
नप्तास्मीति । ते च खच्धविवेका 
सन्तो न संकीत॑यन्ते न तम- 
हनेकप्रकारक्षरसानामपि मधु- 
राम्खतिक्तकट्कादीनां मधुवे 
नेकतां गतानां मपुराडिभायेन 
विवेको गृह्यत इत्यभिश्रायः | 
यथायं दृष्टान्त इत्येवमेव 
खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा 


9 


वै रस॒ निस प्रकार उस मधुमे 
[ इस प्रकारका | विवेक प्राप्त नीं 
करते- किक पकारका {कि 
इस आम अथवा कटहर्के वृक्ष 
प्सरः निक्ष प्रकार कि रेक्षमँ 
बहुत-से चेतन ॒प्राणिर्योके एकत्रित 
होनेपर इस भकार विवेक हुआ 
करता है कि भे इसका पत्र 
इसका नाती दै" इत्यादि ओर 
प्रकार विवेक रखनेके करण वे 
आपस नही मिरुते, उसी प्रकार 
यहां मशुरूपसे एकताको प्रप्त इए 
अनेको बृक्षोके मीठे, सय्‌टे, तीखे 
अथवा कद्व रसोका मधुर आदि 
रूपसे विवेकं ग्रहण नहीं किया 
जता ेसा इसका अभिप्राय हे । 

नसा कि यह दन्त है टक इष 
भकार हे सोम्य | यह्‌ सम्पूर्ण प्रजा 


| 


खण्ड ९] (वत्वा ६६५ 
> ऋ > ~ ~ ह क ॐ क ॐ 3 
अहन्यहनि सति सम्पद्य सुपुि- | निलय प्रति सुषुप्ति, सूय तथा प्रस्य- 
कारे मरणप्रलययोश्च न ॒विदुनं | कषास्मे सत्क पराप होकर यह नदीं 
विजानीयुः- सति सम्पद्यामह | जानती कि हम सतको प्राप हो 
इति सम्पन्ना इति वा ॥ २॥ | रहे है लथवा हे गये है ॥ २॥ 
यस्माच्चैवमात्मनः सूद्रुप- | कोकरि इस भकार वे पनी 
तास्तात्वैव सत्सम्पद्यते, | सदरपताको विना जाने ही त्को 
अतः- म्रा होते दै इसस्यि-- , 
त इह व्याघ्रो वा सिद वा दको वा वराष्टो 
वाक्षीटो वा पत्वा दश्डो वा मशको यद्य 
वन्ति तदाभवन्ति ॥ ३ ॥ 
वे इस लोकम व्याघ्र, सिंह, भेद्या, शक्र, कीट, पतङ्ग, ठस 
अथवा मच्छर नो-नो भी [ घुषुति आदिसे पूवं ] होते है वे ष्टौ एनः 
हो जते है ॥२॥ 
त इह लोके यत्कर्मनिमिततां | वे इस रोक्मं जिस-जिस कके 
= आसु कारण व्याप्रादिर्मेसे जिक्न-निस 
याँ यां जातिं वि आसु- | जातिको श व्याघ्र ह च िष् 
व्याघादीनां व्याधो सिंहोऽ्द- | इस भकारके अमिनिवेशसे प्राप 
मित्येवं ते तत्कमंज्ञानवासना- | हए ये उस कर्म॑ जर ज्ञानक 
ङ्ताः सन्तः सविषा अपि | वासनासे अङ्कित हृष वै सत 
तद्धवेनैव पुनराभवन्ति पुनः प्रविष्ट होनेपर भी उसी मावसे फिर 


उत्पन्न हो नति है; अर्थात्‌ सत्से 
सत आगत्य व्याधो बा सिंहो | दुन लोखकर व्याध, सिह, वृक 


वा वरृको वा वराहो वा कीटो वा | वराह, कीट, पतंग, डस अथवा 
पतङ्गो वा दंशो बा मशको वा | मच्छर जो $छ वे पहले इस लोके 


8 
यद्यसू्मिह रोके भषन्ति बभू- | ये बहौ पिर लौ हो जते ह | 
ुरित्यथंः, तदेव पुनरागत्य हैक म ने 

हक्वकोटथन्तरि. | युगोका भन्तर॒प भी 
भवन्ति य संसारी जीवोकी जो पूर्ति 
तापि संसारिणो जन्तोर्या पुरा 


वासना होती है व्ह नष्टकही 
भाविता वासना सा न न्य- होती । “जन्म पूर्वं वासने अनुसार 


तीत्यथेः । “यथाप्रं हि स | ही हेति है» रस एक़ दूती 
म्भवाः'” इति भ्रुत्यन्तरात्‌ ।॥३॥ | श्रतितेभौ यहो सिद्ध होता है॥२॥ 


(किरी 21 


बाः प्रजा यस्मिन्परविश्य | निस परेश्च करके वह प्रजा 


पुमरािभेवरि चितोल्ये | एनः आविर्ूत होती है, तथा उने 
८ ष अन्य जो सद्र घल्यातमामे अमि- 
निवेश रखनेवले है वे जि षणु 
सदात्मानं भाव मर्थात्‌ रत्यासामे प्रवेश रके 
त्मान प्रविश्य नावत॑न्ते | पिर नह लोरते-- 


त य एषोऽणिमेतदात्म्थमिदश्स्धं तत्लत्यश्स 

"ग्म तत्वमसि श्वेतकेतो इति भृथ एव मा भगवा. 
खिति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ 

इद चो यह्‌ भणिमा है पतप ही यह सुव ह । वह सत्य दै, बह 

मासा है ओर हे श्वेतकेतो | बहीतू है। [ आरुणिके इस पभम 


कहनेप्र शतकेतु बोख- ] .मगवः  [ तव 
1 जच्छ सोत न्‌ 1 मुञ्चे फिर समज्ञाहये । | 


स य एषोऽणिमेत्यादि व्या- 


सत्यत्यात्मामिसन्धा यमणुभावं 





| र य॒एषोऽणिमाः 
स मन्त्रके व्यास्या पहले की जा चु 
स्यातम्‌ । तथा रोके स्वकीये दे । [ धरेतकेवु बोला- ] निस 
भकार लोकम अपने धरम सोया 
इजा पुरुष उठकर प्रामान्त्म 





गृहे सुप्र उत्थाय ग्रामान्तरं गतो 


जानाति स्वगृहादागतोऽस्मी- | जानेपर यह जानता है छि भँ पने 
त्वेवं श्रत आगतोऽस्पीति च | षरसे जया ह, इसी पकार जीरवोको 
जन्तूनां कस्मादवि्ञानं न भव- | रसा डान क्यो नदी होता किरम 


~ | सत्के पाघ्ठसे आया रहै, अद्गः है 
तीति पू एव मा भगवान्व- | भगवन्‌ | भुञञे फिर समडाहये । 
ज्ञापय स्वित्युक्तस्तथा सोम्येति | इष प्रकार कहे जानेपर पिताने 


होवाच पिबा ॥ ४॥ कहा--श्घोम्य | अच्छा ॥४॥ 


~ सक्छ के 


रतिच्छान्दोण्योपनिषदि षष्ठाध्याये 
नवमखण्डमाष्यं सस्प्णम्‌ ॥ ९ ॥ 





नदीके दष्टान्तद्रारा उपदेश्च 


शृणु तत्र दृष्टान्तं यथा-- 


इस विषयमे दृशन्त श्रवण कर । 


¦ निस प्रकार- 


इमाः सोभ्य नयः पुरस्तास्पराच्यः स्यन्दन्ते पश्चा 
स्रतीच्यस्ताः समुदरात्समुदरमेवापियन्ति स समुद्र एव 
भवतिता यथातत्रन विहुरियमहमस्मीयमहभस्मीति।। 


ह सोम्य | ये नदिया पूरववादिनी होकर पूर्वकी भोर बहती ह तथ 
पशचिमवाहिनी होकर पश्चिमकी ओर । वे घमुदसे निकल्कर पिर सये 
ही मर नाती द गौर वह सघुदर ही हो जाता है । वे सब नित भका 
वहो ( सुम ) यह नहीं जानती कि वह भ ह्र यहे ॥ १॥ 


सोम्येमा नघो गङ्घाद्याः 
पुरस्तासपूरवां दिं प्रति प्राच्यः 


भरागच्चनाः स्यन्दन्ते प्लवन्ति | । 


पातरतीचीं दिशं प्रति 
सिन्पमा्याः प्रतीचीमन्ति 
गच्छन्तीति अतीव्यस्ताः सभु 
दरादस्मोनिषेजैरधरैरासिकताः 

५ पतिता गङ्गादि- 
न्‌ पण्यः पुनः स द्रमम्भो- 
निधिमेवापियन्ति र १ 
एव मवति । ता नयो यथा 


हे सोम्य | ये गङ्गा भादि नदिं 
माच्य पूरववाहिनी होकर पुरस्तात्‌ 
पूवे दिशाकी ही जर बहती है तथा 
सिन्धु आदि, जो पश्चिमको ओर जाती 
है भतः परतीच्य (पथिमवाटिनी) हं 
पश्चिम दिशाके प्रति बहती है । व 
समुद्र--जलनिधिसे मेधो 
आङ्कष्ट होकर वृष्टद्धपसे बरस्क 
गङ्ञादिरूपमे फिर समुद्रम. 8ी 
मिरु जाती है जोर वह समुद्र दी 
हो जाता है । निस प्रकार समुद्रम 
समुद्ररूपसे एकताको प्राप्त इई वै 





खच्ड १० | शाङ्त्मास्या्थं ६६९ 
> 9 > 229 < ८ 9 8 ~ 9 ~ ~ 9-8८-9 -9- ऋ क~ ऋ ऋ ४ 


गता न विदन जानन्तीयं | नदियों यह नही जानती कि "यह 


गब्गाहमस्मीयं यश्घुनाहमस्मीति | मे गङ्ख हैः यह भ बसुना 
|| १॥। | इत्यादि ॥ १ ॥ 


~ ^-छ रए 


एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः भ्रजाः सत 
आगभ्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याधो 
वासिश्टोवा वराहौवा कीटो वापतङ्खोवा दश्शो 
वा मशको वा यद्यद्धवन्ति तदाभवन्ति ॥२॥ स 
य एषोऽणिमेतद्‌ार्यमिद शस्व तत्सत्यश्स आत्मा 
तक्तमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवाचिज्ञा- 
पयखिति तथा सोभ्येति होवाच ॥ ३ ॥ 
ठीक इसी प्रकार हे सोम्य | ये सम्पूणं प्रजाप सत्‌से अनेपर यह 
नहीं जानतीं क्ति दम सत्के पासे अयी दै । इस टोक्रये वे व्याघ्र, 
सिह, शकर, कीट, पतङ्ग, डं स अथवा मच्छर जो-नो भी होते हैँ वे हो 
फिर हो नाते दहै ॥ २॥ वह जो यह अणिमा है, एतद्रप ही यह सव 
हे । वह सत्य है, वह अत्मा है ओरं हे धेतकेतो | वीत्‌ है । 


[आरुणिके इस रकार कटनेपर श्वेतकेतु बोल--] “भगवन्‌ | सुक्षे फिर 
समज्ञाइये । [ तब आरुणिने ] अच्छा, सोम्य एसा कहा ॥ ३ ॥ 


एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः | ठीक इसी प्रकार दहे सोम्ध ! ` 


= व ये सम्पूणं प्रनाए क्योकि सते 
ग्र (- = € 
जा यस्मास्सति सम्पद्य न विड | लीन होकर [ अपना पार्थक्यक्ञान 


स्तस्मात्सव आगम्य न विदुः सत । नहीं रहता, इसल्यि ] उस्र सते 


&७० 


89८८ 3-८18-३८ 8८-४८-86 


आगच्छामह आगता इति वा । 
त इह व्याघ्र इत्यादि समान- 
मन्यत्‌ । दष्टं छोके जके वीचि 
तरङ्गफेनवुदृषुदादय उत्थिताः 
पुनस्तद्धावं गता विनष्टा इवि । 
जीवास्तु तत्कारणभावं प्रत्यहं 
गज्छन्तोऽपि सुषुपे मरणप्रलय- 
योश्च न विनर्यन्तीस्येतद्‌ । भूय 
एवे मा भगवान्विज्ञापयतु 
दृष्न्तेन । तथा सोम्येति 
होवाच पिता ॥ २.३ ॥ 


[ बध्वाय 

३ 
लोटनेपर यह नही जानती (] 
हम सत्क पासे भायी है । 5 
इह व्याधः इत्यादि शेष व्यक 
अथं पूर्ववत्‌ दै । | इवेव 
बोला-] रोके यह देला गया ह 
कि ल्मे उठे हृए भवर, तरंग, पेन 
एवं बुदूबुद भादि पनः नङूप हे 
जानेपर नष्ट हो नते दै; तु 
जीव तो प्रतिदिन सुषुप्ताव्यामर 
तथा मरण सौर प्रख्यके समय 
अपने कारणमावक्ो प्राप्त होक 
भी नष्ट नहीं होते-सो हे भगवन्‌ | 
इस बातको मुञ्चे दृष्टन्तद्वारा फिर 
समञ्ञोह्ये । तव पितने कहा- 
“सोम्य | अच्छा ॥ २-३ ॥ 


[र 0 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये 
रशमखण्डभाष्यं सस्पणैम्‌ ॥ १० ॥ 


८ | 
ला 


©, 





एकलू शकरड 


= * 93 * ~~ 
वक्षे दष्टन्तद्वाया उपदेश 


शृणु दृष्टन्तमस्य-- [ इस विषयमे ] ए टष्टान्त 
नो- 
अस्य सोस्य महतो वक्षस्य यो मूटेऽभ्याहन्या- 
ज्नीवन्छवेयो मध्येऽभ्याहन्याजीवन्लवेयाऽमेऽभ्याह- 
न्यालीवन्छवेतंस एष जीवेनास्मनानुप्रभूतः पेपोयभानो 
मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥ 
हे सोम्य | यदि कोई इस मन्‌ वृक्षके मूर्मे आधात करे तो यह 
जीवित रहते हुए दी केवर रसल्लाव करेगा, यदि मध्यमे आधात करे 
तो भी यह जीवित रहते हुए केवर रस्ाव करेगा ओर यदि इसके 
अग्रभागे आधात करे तो भी यह जीवित रहते इए ही रसक्षाव करेगा । 
यह वृक्ष जीव --आत्मासे ओतपरोत है . ओर जर्पान करता इभा 
आनन्दपूर्वक स्थित दै ॥ १ ॥ | 
हे सोम्य महतोऽनेकश्चाखा-, दे-सोम्य | [इस प्रकार सम्बोधित 
दियुकतस्य वृ्स्यासयेत्यगरतः करके] सामने स्थित वृक्षो दिखलते 
क „_ | इए कहते है इस महन्‌--अनेकं 
स्थितं वृक्षं दशयनाह--यदि यः शाखोदिसे युक्त वृक्के मूम यदि 
| कोई कुर्दाड़ी- आदिसे आधात करे 
| तो एक ही आधातसे यह सूख नही 
श्ादिना सढृद्धातमात्रेन न | जाता, वर्कं लीवित ही रहता है; 


जीवन्नेव उस घमय केवर इसका कुक रस 
शुष्यतीति जीवमेव भवति तदा | निक्रढ जाता है । तथा यदि कोई 


तस्य रसः स्रवेत्‌ । तथा यो । मध्यम आवात करे तो भी बह 


कशिदस्य मूकऽभ्याहन्यात्पर- 


६७२ छान्दोग्योपमिवव्‌ [ 


> 9 > ¬ ८ 1 ¬> > ~ 38 अ ८-8८-9: >= -ढ- ~ 
मध्येऽम्याहन्याज्जीवनस्वेत्तथा | जीवित रहते हुए ही रसला क्‌ 
९  ॥ जवरेरत ‹ देता दै जर यदि णम्रभागमे भाषा 
योऽगरऽभ्याहन्याज्जीवन्घवेरस करे तो भी यह जीवित हत ह 
एष वृक्ष इदानीं जीवेनात्मनाु- | ही रसस्लाव करता है । इद समब 


यह वृक्ष जीव-भात्मासे नुपरमूत- 

व्याप्तः पेपीयमानो- | 
अभूवोभतव्यापः पे पूणतः व्याप्त है भौर अयन 
ऽत्यथं पिवन्नुदकं भौमां | जरपान करता हभा तथा भप 


फ त ष | जडदवारा एथिवीके रसोको प्रण 
वानो, 8 करता हुभा-- मोदमान होता-- 
प्राप्लुवस्तिष्ठति ॥ १ ॥ हषं पाता हआ स्थित है ॥ १॥ 

अस्य यदेका< शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति 
द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा 
शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यति ॥ २ ॥ 

यदि इस वृक्षकी एक ॒शाखाको जीव छोड़ देता है तो वह पू 

नाती हे; यदि दूसरीको छोड़ देता दै ततो वह सूख जाती दै भैर 
तीसरीको छोड़ देता है तो वह भी सूरं जाती दै, इसी प्रकार यदि 
सार इको छोट देता दै तो सारा कृ तूख जाता है ॥ २॥ 

तस्यास्य यदेकं शाखां, उस इस वृक्षकी यदि 
रोगग्रस्तामाहतां वा जीवो जषा. | रोगग्रस्त भथवा जात शाला 
| छोड देता है- उस शाखामिं 
घ्या जीवां उपसंहत शो ह 
मात्मांशम्‌, अथ सा ष्यति हतो वह सूस जाती ह; क्यौ 
त । ६५ वाणौ, भन, प्राण तथा इन्विष- 


अष्याक्‌ ६ 


स्युपसंहरति शाखायां विप्रसृत- 


4 5 म 


व्‌ 
न.प्राणकरणग्रामानुप्रवि्टो मामे नीव भनुमबिष्ट £ एषि 





खज्ड १९१ ] 


छाङ्करभास्थाथ 


६७२ 


> < >< (< >< >< ¬< ¬ > >< 9८ >< र 9: 9 8 8 8८ 9८ ८-88-9 
हि जीव इति तदुपसंहार उपसं- | उनका उपसंहार ॒होनेपर वह भी 
हियते । जीवेन च प्राणयु्ते- | उपसंहत दो नाता ्ै । प्ाणयुकत 


नाशितं पीतं च रसतां . गतं, 


जीववच्छरीरं वृक्षं॑च वर्धयद्र- 
सरूपेण जीवस्य सद्भावे णिङ्ग 
भवति । अश्चितपीताभ्यां हि देहे 
जीवस्तिष्ठति ते चाश्चितपीते 
जीवकर्मायु्ारिणी इति । 
तस्येकाङ्गवेकल्यनिमित्तं कमं 
यदोपस्थितं भवति तदा जीव 
एकां ्ञाखां जहाति शाखाया 
आत्मानश्वुपसंहरति । अथ तदा 


सा श्चाखा शुष्यति । 
जीवस्थितिनिमित्तो रसो 


जीवकर्माक्षिपठो जीवोपसंहारे न 
तिष्ठति । रसापगमे च शाखा 
ञञोषषुपेति तथा सवं वृक्षमेव 
यदायं जहाति तदा सर्वोऽपि 


बक्षः शुष्यति । वृक्षस्य रसखवण- 


जीवके द्वारा भी भक्षण तथा पान 
किया हा अन्न-जल रसभावको 
प्रा होता दै; वह रसखूपसे जीव- 
युक्त शारीर तथा सजीव वृक्षकी वृद्धि 
करता हुभा जीवके सद्ध(वमें लिङ्ग 
है । खये-पीये हुए अन्न-नर्से दी 
जीव देहमे रहता है । वे खानपान 
जीवके कर्मानुसार होते है । जिस 
समय उसके एक अङ्गी विकरता- 
का निमित्तमूत कमं उपस्थित होता 
है उस समय जीव एकं शाको 
छोड़ देता 2--उस एक शाखासे 
अपना उपसंहार कर टेता है । इसके 
पश्चात्‌ त वह शाखा सूख जाती है । 

जीवके कर्मानुप्ार प्राप्त इभा 
तथा जीवकी स्थितिके कारण रहने- 
वाख रसन जीवका उपसंहार होनेपर 
नदीं रहता; ओर रसके निकर 
जनेपर शाखा सूख जाती है ।. 
इसी प्रकार जव यह सारे वृ्षको 
छोड देतादै तोसारा ही वृक्ष 
सूख जाता है । वृके रसलाव एवं 
शोषण आदि शिक्गसे उसकी 


सजीवता सिद्ध होती है तथा [ 


जञोपणादिलिङ्गाज्जीबवततं दृष्टा- । एष वृक्षः जीवेन आत्मना भनु- 


६७४ छान्दोग्योचनिषद्‌ 
9-9-25 त ८ 3: 9 2८ 6-8-०८ < 3८ -ट (3 
न्तभतेश्च चेतनावन्तः स्थावरा | परमूतः ] इस टषटान््रुतिते यह 
र निशित होता ह कि स्थावर 
चेतनायुक्त होते है जीर इसे यह 
स्थावरा इत्येतदसारमिति दितं | भौ भदित हो नाता दै प्यव 
चेतनाजञु्य होते दै, देस बौद्ध भोर 

भवति ॥ २॥ काणादमत सारहीन है ॥ २॥ 

~: ० :- 


यथास्मिनवृकषदृषटान्ते द्रिं 


इति बौद्धकाणादमतसचेतनाः 


जिस प्रकार कि हस पृष्षके 


ङ दृष्टान्ते यह दिखलया गया है छि 
जीवेन । क्तो इषोऽष्को जीवसे युक्त वृक्ष अशयुष्ठं भौर 
रसपानादियक्तो जीबरीत्ु- | रपानादिसे धुक्त॒ इता दै 

इसख्यि "वह जीवित है! पेष 
च्यते तद्पेतश्च भ्रियत इत्यु- | कहा जाता है तथा उस ( जीव ) 
से रहित हो जानेपर “मरं जाता 
च्यते - है पैसा कहा नाता दै- 
एवभेव खट सोभ्य विद्धीति होवाच जीवापेतं 
वाव क्लेदं भ्रियते न जीवो त्रियत इति स य एषोः 
ऽणिमेतदारम्यमिद्‌ <सर्व तत्सत्यश्स आमा तत्वमसि 
शवेतकेता इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयविति 
तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ 
हे सोप्य ! टीक्‌ इसी प्रकार तू जान कि जीवसे रहित हीनेप 
यह शरीर मर नावा दै, जीव नही मरताः- रसा [ आरूणिने ] क 


वह जो यह्‌ अणिमा है एतद्रेप ही यह्‌ सब है ¦! वह सव्य है, वह 


५६ हे उवेतकैतो ¡ वही तू है। [ आरणिके इस क 
७९०१२ रवतकेतु बोरा-- ] भगवन्‌ | सुते किर समञ्ञाहये ॥ [ 6 
जारण ] अच्छा, सोम्य | रेस कहा ॥ २॥ 


[ मध्याय ६ | 





खण्ड ११] 


ज्ञाङ्करमाष्याथं 


६७५ 


~~ >>> > 99 3 < 3 


एवमेव खल सोध्य विद्धीति 
होवाच । जीवापेतं जीववियुक्तं 
वाव किदं शरीरं म्रियते न 
जीवो भ्रियत इति । कार्यशेषे च 
~ ममेदं © 
सु्ोस्थितस्य ममेदं कायशेषम- 
परिसमाप्तमिति स्प्रत्वा समापन- 
दशनात्‌ । जातमात्राणां च 
जन्तूनां स्तन्याभिराषमयादि- 
द््च॑नाच्चातीतजन्मान्तरासुभूत- 
स्तनपानटुःखालुभवस्द्रतिर्भम्यते 
अभिरोत्रादीनां च वैदिकानां 
¢ ¢ ~~ 
कमणामथेवान्न जीवो प्रियत 
इति । स य ॒एषोऽणिमेत्यादि 
समानम्‌ । 
कथं पुनरिदमत्यन्तस्थूल 
पृथिव्यादि नामरूपबजगदत्य- 
न्तशकष्मात्सद्रपान्नामरूपरदहितात्‌ 
# + 
सतो जायत इत्येतद्दुष्टान्तेन 
भूय एव मा भगवान्विज्ञापय- 
सिति । तथा सोग्येति होवाच 
पिता ॥ ३॥ 


हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार 
तू जान किं जीवापेत- जीवसे 
वियुक्त हुआ यह शरीर ही मरता 
है जीव नहीं मरता पसा [मारूणि- 
ने] कटा, कर्ोकि कार्यं रोष रहने- 
परही सोकर उठे हुए पुरुषको 
भेरा यह काम रोष रह गया थाः 
ेसा स्मरण करके उसे प्षमाप्त 
करते देखा जाता दै । तथा तक्ताङ 
उत्न्न हुए जीर्वोको स्तनपानकी 
अभिलाषा सौर भय भादि होते देखे 
जानेसे पूरवैजन्मोमे अनुभव स्यि 
इए स्तनपान तथा दुःखनुभवकी 
स्मृतिका ज्ञान होता है । इसके 
सिवा अञ्चिहोत्र आदि वैदिक कर्मो 
सार्थकता होनेके शरण भी जीव 
नहीं मरता । (स य एषोऽणिमाः 
इत्यादि वाक्यका अथं पूर्ववत्‌ है । 

करतु यह अत्यन्त स्थूर पृथिवी 
आदि नाम ओर रूर्पोवाल संसार 
व्यन्त सूक्ष्म, सप्‌, नामरूपरहित 
सतसे किस प्रकार उपपन्न होता 
ह ? इस बातको हे भगवन्‌ | सुञ्चे 
दृष्टान्तद्रारा फिर समक्चादये-एेसा 
उवेतकेतुने कहा । तब पिताने 
कहा-- सोम्य | अच्छा ॥ ३ ॥ 





इतिच्छान्दोश्योपनिषदि षष्ठाघ्याये 
पकादशाखण्डमाष्यं सस्पणेम्‌ ॥ ११ ५ 





छा- ० २२- 


दद्दर खस्ड 
न्यग्रोधफलके टष्टान्त द्वारा उपदेश 


यदेतसतयक्षीकतमिच्छसि- | यदि तू इस बातको प्रलक् 
। फरना चाहता है तो-- 
न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्द्धोति 
भिन्नं भगव इति किमत्र पदयसीत्यण्ड्य इवेमा धाना 
भगव इत्यासामद्धेकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति 
किमत्र पदयसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥ 


इस (सामनेवाटे वटवृक्ष) से एक बड़का फर ठे भा । इवेतकेत्‌- 
“भगवन्‌ | यह ले भाया ॥ [ आरुणि ] ¶से पोड़' [ खेत०-- ] 
-मगवन्‌ | फोट दिथा । [ आरुणि- ] इसमे क्या देखता है ? 
[शवेत०-] भगवन्‌ | इसमे ये अणुके समान दाने रै । [भारुणि-] 
'भच्छा वसस | इनमेसे एकको फोड़ । [उवेत० ¬] “फोड़ दिया भगवन्‌ ! 


[ आरुणि-- ] €समे क्या देवता ै ? [ खवेत०-- ] (कुछ नही 
भगवन्‌ | ॥ १ ॥ 


अतोऽस्मान्मइतो न्यग्रोधात्‌ | इन महान्‌ वलडृषसे षक फल 
ठे आ । पसा कटे लानेपर उसने 

स्लमेकमाहरयुक्स्तथा चकार वैसा ही किया [ जोर बोल-- | 
स इदं भगव उपहृतं फलमिति | भगवन्‌ ! भ यद फर टे भाया! 
6 इस प्रकार फर दिश्वसनेवाले उश्से 

दितवन्तं प्रत्याह फं मन्दधी- | [ आरुणिने ] कष्ा--/इष फरो 
६ फोड़ | इसपर उवेतफेतु बोर 
ति भिमित्याहेतरः । तमाह | रोड दिया उससे पिताने क~ 


हः इसमे त्‌ क्या देखता है ¢ श 
पिवा किमत्र प्श्यसीत्युक्त आ- मरक्मर कहे जानेपर वेतकेतु बो्~ 








खण्ड १२ ] श्षाङकरभाव्या्थं &७७ॐ 
999८-8 ~ 3 ~ 9 ~ ८-- > ~ 32 -~3  9--क 


दाण्व्याऽणुतरा इवेमा धाना | भगवन्‌ | मेँ इसमे ये अणु-अणुरर 
अत्यन्त छोटे दाने- बीन देखता 
ह ॥ [ आरुणि-- ] € वत्स | 
आसां धानानामेकां धानामङ्धं | इन धानोमिंसे तू एक घानेको 
फोट ।' इस प्रकार कहे जानेपर वह 
हे रत्य निन्द्यत आई बोखा-'भगवन्‌ | फोड़ दिया ॥ 
भिन्ना भगव इति । यदि भिन्ना | [ आरुणि- ] अच्छा, यदि तूने 
१ ति धाना फोड़ दिया तो उतत कटे हुए 
धाना तस्यां भिनायां किं | धनिमे तू क्या देलता दै ¢ रेखा 
पदयसीत्युक्त आइ न किश्वन | कटे जानेपर बह बोरा-भगवन्‌ | 
प्रयामि भगव इति ॥ १॥ | भ ङछ नीं देवतः ॥१॥ 


--: ° ~ 


बीजानि पदयामि भगव इति । 


तश्होवाच यं वे सोभ्येतमणिमानं न निभाख्यस 
एतस्य वे सोभ्येषोऽणिम्न एवं महान्न्ययोधस्तिष्ठति 


श्रद्धत्स्व सोम्येति ॥ २ ॥ 
तब उससे ( आरुणिने › कडा-हे सोम्य | इस वरबीजकी निस 
अणिमाको तू नहीं देखता हे सोम्य | उस अणिमाका दी यह इतना बड़ा 
वयवृक्ष खड़ा हा दै । दे सोम्य । त्‌ [इस कथने] शद्धा करः ॥२॥ 
तं पुत्रं होवाच बटधानायां | उस तसे ( आरुणिने › कडा- 
निन्य यं बटमीलाणिमानं हे सोम्य | वटके दनिके टृटनेपर 
(८ 1 यं, ४४... 1 095 
देसं ५ निभालयसे न | देता, तथापि हे सोम्य | देख, 
पश्यसि । तथाप्येतस्य वे किर | निश्चय उसी बीजकी दिखायी न 
सोम्येष महान्नयग्रोधो बीजस्था- | देनेवारी सूक्ष्म अणिमा कर्थमूत 


६७८ 


छाग्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अन्याय ६ 


~अ 9-9-9८ 8-८-91 <~ > 
गिम्नः घरप्मस्यादरयमानस्य | यद मोटी-मोटी शाखा, कन्ध, फर 


का्भूतः स्थूलाखास्कन्ध- | भोर परतौवाख महान्‌ वक स्थिः 


फलपलाशवां स्ति्ठव्युत्पनः सन्यु- 
(५) 

तिष्ठतीति वोच्छब्दोऽध्याहायंः । 

अतः श्रद्धत्स्व सोभ्य सत्‌ एवा- 


हे--उपन्र होकर खड़ा हुभा है 
इस प्रकार यहो "तिष्ठति, क्रियाके पूव 
उत्‌, शब्दका अध्याहार करना 
चा्िये । इसलिये टे सोम्य विश्वास कर 


णिम्नः स्थूल नामरूपादिमत्कायं किं नाम-रूपादिमान्‌ स्थूल जगत्‌ 


जगदुत्पन्नमिति । 
यद्यपि न्यायागमाभ्यां निर्धा- 


रितोऽथेस्तथेवेत्यवगमभ्यते तथा- 
प्यत्यन्तघहषमेष्व्थेषु बाद्यविषया- 
सक्तमनसः स्वभावप्रबत्तस्या- 
सत्यां गुरुतरायां श्रद्धायां 
दुरगमत्वं स्यादित्याद- 
भद्धत्स्वेति । भरद्धायां तु सत्यां 
मनसः समाधानं बुयुत्सि- 
तेभ्य भवेत्ततश्च तदर्थावगतिः 
(अन्यत्रमना अभूवम्‌'' (ज० 
° १।५।२ इत्यादिरतेः॥२॥ 


अत्यन्त स्म सतसे दी उपत्न हुदै ॥ 


यद्यपि युक्ति ओर राख--इन 
दोनोसे निधित हुआ अर्थं एे्ा दी 
है; तथापि गुस्तर श्रद्धाके न होने- 
पर॒ बाह्य विषर्योम आसक्तचित्त 
स्वभावसे दी भ्रवृत्तिशील पुरुषका 
[ एेसे ] अघ्यन्त सूक्ष्म विषर्योमे 
मवे होना वडा ही कठिन दै- 
सा समक्षकर आरुणिने कदहा- 
श्रद्धा कर ।' क्योकि श्रद्धाके हेने- 
प्र ही जिज्ञाित विषयमे मनका 
समाधान हो सकता दै ओर तमी 
उस्र विषयका ज्ञान होना सम्भव 
है; जैसा कि “भेरा मन दूसरी जर 
था [ इसयियि मँ नहीं देख सका / 
इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित होता 
दै॥ २॥ 








खण्ड १९ ] 


श्ाङूरभाष्या्थे 


६७९ 


मे 

स थ षएषोऽणिमेतदास्म्यमिद<सव तत्सत्यश्स 
आत्मा तच्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भग- 
वान्‌ विज्ञापयतिति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ 

वह जो यह भणिमा है एतद ही यह सव दै । वह सत्य दै वह 
घात्मा है घौर हे उवेतकेतो | वदी तू दै। [ आरुणिके इस प्रकार 
कटनेपर उेतकेतु बोड- ] भगवन्‌ ! मुञ्चे फिर समक्ञाश्ये ।' 
[ तब आरुणिने ] भच्छा, सोम्य | पसा का ॥ २॥ 


स य इत्यायुक्तार्थमू्‌ । यदि 
तत्सज्गतो मूं कस्मान्नोप- 
लभ्यत इत्येतद्दृषटान्तेन मा 
भगवान्भूय एव॒ विज्ञापय- 


स्विति । तथा सोभ्येति होवाच 
पिता॥ ३॥ 


५ 
3 


इतिख्छान्दोम्यो पनिषदि 


0 


“स॒ यः इत्यादि श्रुतिक्ा स्थ 
पहले कहा जा चुका दै । “यदि वह 
सत्‌ जगत्का कारण दै तो उपलन्ध 
क्यों नही होता १ हे मगवन्‌ | इस 
बातको आप दष्टन्तद्वारा सुञ्ञे फिर 
समज्ञाहये' एेसा [उवेतकेतने कहा] । 
तब पिताने सोम्य | अच्छा" ता 
उत्तर दिया ॥ ३ ॥ 


५ 
~ 


षष्ठाध्याये 


द्ादशख्ण्डमाभ्यं सम्पूर्णम्‌ ॥ १२॥ 


योद छर्ड 

लवणके दष्टान्तद्रारा उपदेश्न 
विद्यमानमपि वस्तु नोप-| विधमान होनेपर भी [ को$ 
को ] वस्तु उपरन्ध नहीं होती । 
हा, प्रकारान्तरसे उसकी उपरुध्‌ 
इति शृण्वत्र दृष्टान्तम्‌ । यदि | हयो सकती है । इस विषयमे दृष्टान्त 
श्रवण कर्‌, यदितु इश्च वक्ति 

चेममथं प्रत्यक्षीकतमिच्छपि- | प्लक्ष करना चाहता हो तो-- 

खवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरूपसीदथा इति 
सह तथा चकार तश्टोवाच योषा छवणसुद केऽवाधा 


अङ्ग तदाहरेति तद्धावस्रदय न विवेद ॥ १८ 
इस नमकको जल्मे डालकर कर प्रतःकार मेरे पास भना । 
आरुणिके इस प्रकार कहनेपर उवेतकेतुने वैसा ही किया । तव आरुणिने 
उससे कहा- वरस | रावं तुमने जो नमक ज्म डाल था उसे ठे 

भाषो ॥ किंतु उसने द्र दुनेपर उसे उसमे न पाया ॥ १ ॥ 
पिण्डरूपं लबणमेतद्रटादा- | इस ॒पिण्डरूप नमकको घटे 
बुदकेऽवधाय प्रक्षिप्याथ मा मां | आदिमे कमे डारुकर कल प्रतःकाठ 
श्वः प्रातरुपसीदथा उपगच्छेथा | मेरे पस आना । इवेतकेतुने पिता- 
इति। सह पित्रोक्तमर्थंप्रतयक्षी- | कौ कदी हुई बातको प्रक्ष करनेकी 
कतमिच्छस्तथा चकार । तं इच्छासे वेसा ही किया। दूरे 
होवाच परेचुःप्ातय॑ल्लवणं दोषा | (५ < ही आरुणिने उससे 
त्राुदरेध्ाथा निसिश्वान- कहा--/हे वस | रात तुमने जो 


नमक ॒पानीमे डाला थाउसेे 
# त 
स्जग ह पत्स तदाहर्युक्तस्त- | मामो ॥ ` इ भकार क जानेमर 


भ्यते प्रकारान्तरेण तुषरृभ्यत 








कार्ड १६ ] छ्याङ्करथाष्याथं ६८१ 
9८ > >< ८ 9८ > >< ¬ ऋ ऋ (9 ~~ अ 


ल्रवणमाजिदीरषदं च उसने उस नमकको ठे अनेकी सच्छा- 
से ज्म ्टोरा, तु उसे न पाया, 
दकेन # न विज्ञातवान्‌ यथा| कयो बम व 
तल्लवणं विद्यमानमेव सदस्सु | पर भी जलम रीन हो गयाथ 
लीनं संश्लिष्टमभूत्‌ ॥ १॥ | भर्थात्‌ जरं ही मिर गया था॥१॥ 
--3 ०० ‡-- 
यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्ताद्‌ा चमति कथमिति 
रवणभिति मध्यादाचामेति कथमिति ख्वणमित्यन्ता- 
दाचामेति कथमिति खवणमित्यभिप्रास्येतदथ मोपसती- 
दथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वस्संवरतते तर्होवा- 
चात्र वाव किर सत्सोम्य न निभार्यसेऽत्रव 
किङेति ॥ २॥ ं 
[ आरुणि-] “निस प्रकार वह नमक इसमें विरीन हो गया है 
[ इसल्यि तू उसे नेत्रसे नदी देख सकता, उसे यदि जानना चाहता है 
तो ] इस जलको ऊपरसे आचमन कर । [ उसके आचमन करनेपर 
आशूणिने पूछा] कैसा है ® [ उवेत० ¬] नमकीन है । [आरुणि] 
“वीच्ेसे आचमन करः (अव कैषा है ¢ [ खेत ०-] 'नमकीन है ॥ 
[ आरुणि-- ] "नीचेसे आचमन कर' अव कैषा है १ [ शवेत०-| 
(नमकीन ह  [भरणि-] (अच्छा, अब इस जलो फंककर मेरे पास 
आ । उसने वैसा ही किया, [ ओर बोल- ] “उस जरम नमक सदा 
ही विद्यमान था ।' ठव उससे पिताने कहा-- हे सोम्य | [इसी प्रकार] 
बह सत्‌ भी निश्चय यहीं विमान है, त उसे देखता नहीं दै; परंतु बह 
निरचय यहीं विद्यमान दैः ॥ २ ॥ 
यथा विलीनं ख्वणं न वेत्थ ¦ निस प्रकार वह नमक विीन 


3 ९ दो गया है इसस्यि तू उसे नदी जान 
तथापि तचद्खषा स्पश्नन च सकता । तथपि वह पिण्ड्प ख्वण 


पिण्डरूपं खणमगृद्यमाणं विद्यत । दिखायी न देनेपर भी ह न्मे ही, 


६८९ । छाल्दोच्योकनिकद्‌ [ ष्वाच्‌ ६ 


9-9-99 ८ 9 > 6 >> 9 >~ >ह ८ 
एवाप्सु, उपलभ्यते चोपायान्तरे-। ओर एक दूसरे उपायसे उषी 
उपन्धि भी हो सकती है- इष 
बात्तकी पुत्रको प्रतीति करानेकी 
ादाङ्गास्योदकस्यान्तादुषरि शृदी-| इच्छसे आरुणिने कदा--€ व | 

१ दृष्ठ नरके अन्त-- ऊपरी भागसे 
त्वाचामेतयुक्तवा पत्रं तथा छत ठेकर॒भचमन फर ॥ पे ककर 


न्तप्वाच- ॥ पुत्रके उसी प्रकार करनेपर वह 
परवाच-कथमिति; इतर आह नि 
रुणं स्वादुत इति । वथा मध्या तवादमे नमकीन है ॥ [ पिति-- 
„ | ओर जल्कै मध्यभागसे भी ठेकर 
दुदकस्य गृहीत्वाचामेति, कथभि- आचमन कर, (का हे ? प्र 
ति, र्वणमिति । तथान्तादधोदे-| 'नमढीन दै ॥ [पिता--] जच्छ, 


न -नीचेके मी केकर 
शादुगृहीतवाचाभेति, कथमिति, | भन्त-नीचेके भागसे ५ 
त जाचमन कर कै्ा दै! 

लबणमिति । [ पुत्र-- ] (नमकीन है । 
यदेवम्‌, अमिप्रास्य । [ पिता] वदि देवा हैते 
तदुद्कमाचम्याथ मोपसीदथा | इस जरको पककर आचमन फरने- 
इति । तद्ध तथा चकार । वणं | के अनन्तर मेरे पास आ ॥ ६ 
रत्यज्य पि वैसा ही किया, अर्थात्‌ उस नमक" 

पारत्यज्य पितृसमीपमाजगामे- 8 

+ कसमीपमाजगामे क 
स्वथः, इद वचनं बुवन्‌-तल्ल- | हुआ पिताके पास आया कि रा 
¡ तस्मिन्न था 
वणं तस्मन्ेवोदकेयन्मया रात्रौ | मने जो नमक उस नरे च ध 
कषिप्रं शश्वननित्यं संवर्तते विद्य- | वह उसमं शशवत्‌-नित्य वतमान 
मानमेव सस्सम्यग्बतंते । , | अर्थात्‌ उसमे विमान हुआ ह 

सम्यक्परकारसे वतमान है । 
इष प्रकार कदते हुए उष तरस 


ण-इत्येततपुत्रं प्रतयाययितुभिच्छ- 


इत्येवणुक्तवन्तं तं दोवाच 





हज्ख १३] 


शाङ्करथाष्याथै 


६८३ 


6८29 >< >< > 9 8 8: 8 8 ~ 9 9-9-8८ 4 9 9 9 8८ < ऋऋ < 


पिता-ययेदं वणं ददनस्पश- 
नास्यां पूवं गृहीतं शर 
विलीनं 
विद्यत शएवोपायान्तरेण निह- 


योवलसभ्यमानत्वात्‌ । एवमेवातर 
वास्मिनेव तेजोऽवनादिकारये 
शङ्के देहे, वाव किलेत्याचार्यो- 
पदेशस्मरणग्रदशनारथौ, सत्तेजो- 
ऽबनादिशुङ्गकारणं बटबीजाणि- 
मवद्वि्यमानमभेवेन्द्ियेनोपलभसे 


न, निमाख्यसे यथात्रेबोदके 
दशेनस्पश्ेनाभ्यामनुपलम्यमानं 


कषणं विद्यमानमेव जिहयोपल- 
न्धवानसि, एवमेवात्रेव किल 


विद्यमानं सजगन्मूलशुपायान्त- 
रेण ख्वणाणिमवदुषरण्स्यस 


इति वाक्यशेषः ॥ २ ॥ 


पिताने कहा--“निस् प्रकार यह 

नमक पहले दश्च॑न ओर स्पशनसे 

गृहीत होता हुआ भी फिर जलम 

विरीन होनेपर उनसे गृहीत न 

होनेपर भी उसमं विद्यमान हे ही, 

करयोकि उपायान्तरसे अर्थात्‌ निहा- 
दारा उसकी उपरुव्ि होती है; 

इसी प्रकार यहो -- तेज, मप्‌ ओर 
अन्नके कभूत इस शरीरषूप 
शुकम - यहाँ "वाव, ओर (किर 

ये दो निपात आचार्योपदेशका स्मरण 
्रद्चित करनेके स्यि है-- तेज, 
जर ओर अन्नादि शुङ्गके कारणभूत 

सतो तू वटबीनकौ अणिमाके 
समान विमान रहते हुए मी इन्दर्यो- 
से उपरुन्ध नही करता-तुञ्षे षह 

दिखायी नहीं देता । जिस पकार किं 
यदीं जलमें दशन ओर स्पशंनसे उप- 

ल>्ध न होनेवारे बिधयमान नमकको 

तूने जिह्ासे उपलब्ध करिया है उसी 

प्रकार निचय यहीं विद्यमान 

जगतूके मूलमूत सतक तु ख्वणकी 

अणिमाके समान अन्य उपायसे 

उपलब्ध कर॒ सकता है- यह _ 
वाक्यशेष है ॥ २ ॥ 


क @ कण 


६८४ न्डोग्योयनिषल्‌ [ मच्याष ६ 


~ ~ 9 9 8 9 9 9 ~ 9 ऋ 

स य एषोऽणिमेतदात्म्यमिद्‌ ९ सव॑ तत्सत्यश्स 

आतमा त्छमसि उेतकेतो इति भूय एव मा भग 
बाचविज्ञापयखिति तथा सोभ्येति होवाच ॥ ३ ॥ 


वह जो यह अणिमा है एतद्रष दी यह सव है । वह्‌ सव्य दै, वह्‌ 
आत्मा है ओर हे श्वेतकेतो | वही तु हे । [ आरणक इ प्रकार कहने 
पर श्वेतकेतु बोख-- ] “भगवन्‌ | खसे फिर समज्ञादये ॥ [ तब 
आरुणिने ] अच्छा, सोम्य | एस। कहा ॥ ३ ॥ 


स य इत्यादि समानम्‌ । स यः इद्यादि श्रुतिका अथं 
_ | पूववत्‌ है । "यदि इस प्रकरा 
यदेवं रुबणाणिमवदिन्द्रियेरयु- | खवणकी अणिमाके समान इन्दिोसे 
उपरञ्ष होनेवाख न होनेपर भी 
वह जगत्‌का मूलमूत पत्‌ किसी 
पायान्तरेणोपरब्धुं शक्यते यदु- | दूरे उपायसे उपरन्ध हो सकता 
६ है, निस्रकी उपरब्िसे कि मेँ ताथ 
परम्भाचछृताथः स्यामनुपरुम्भा-| हो सकता ह मौर॒निसे उपरग्ध 
५ लतत © करनेसे अङ्कतार्थ ही रगा, तो 
चाकृताथः स्यामहम्‌, तस्येबोप- 
4 उसकी उपरन्धिके खयि क्था उपाय 
सन्धौ कं उपाय इत्येतद्भय एव | दै--इख बातको हे च 
आप ष्टान्द्वारा मुञ्चे फिर 
मा मगवान्वि्ापयतु दृष्टान्तेन 3 


समङ्ञाहये ॥ [ तब भारुणिने | 
तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ | 'सोप्य ] अच्छा रेसा कदा ॥३॥ 


क~ 
इतिच्छान्दोम्योपनिषदि षष्ठाध्याये 
जयोद्शसण्डमाष्यं सम्पण म्‌ ॥ १३ ॥ 


हरी 


पल्भ्यमानमपि जगन्म सदु- 








© 
चतुद स्कणड 
अन्यघ्रसे लाये हए पुरषके दष्टान्तद्वारा उपदेश 
यथा सोभ्य पुरुषं गन्धरेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय 
तं ततोऽतिजने विखजेत्स यथा ततर प्राङ्‌ वोदङ्‌ वाध 
राड्‌ वा प्रत्यङ्‌ वा प्र्मायीताभिनद्धक्ष आनीतोऽभिः 


नद्धाक्षो विष्टः ॥ १ ॥ 


हे सोम्य | जिस प्रकार [ कोई चोर ] निकी ओंलं बंधी हुई हो 
देसे किरी पुरुषको गान्धार देशसे ककर जनञूलय स्थानम छोड़ दे । 
उस जगह मिष प्रकार वह पूरव, उत्तर, दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर 
मुख करके चिषये कि सुन्चे लें बोधकर य्ह लाया गथा है जोर 
असिं वये हुए ही छोड दिया गया हैः ॥ १ ॥ 


स्य पुरूपं यं | दे सोम्य | ठोकमे निस्र प्रकार 
पवा कोई द्रष्य हरण करनेवाला चोर 


कथिद्न्धारेभ्यो जनपदेभ्योऽभि-| किसी पुरुपको नो अभिनद्वाक्ष हो 


नद्धां बद्ध चक्षषमानीय द्रव्य- | भर्थात्‌ निकी खं ष दौ गयी 
वा = हो, गान्धार देशसे ककर वनरमे 
दत्‌ तस्करसतुममिन द्धा व | ओर उसमे भी जो अतिनन-- 


बद्धहस्तमरण्ये त्रोऽप्यतिजनेऽति अतिगतजन अर्थात्‌ अत्यन्त जनः 


दषे वि- | च्य हो एसे देशमे ओंसं घोर . 
गतजनेऽ्यन्तविगतजने हाथ वेधे हए ही छोड दे तो उश्च 


सुजेत्स तश्र दिगमोपेवो यथा जगह कह ॒दिग््मते दुकू इभा 
१ प्रादषलो श्राङ्‌ वा'--पूरेकी मोर जाता हुआ 
वेत्यभः । तथोदङ्वाधराङ्वा | अर्थात्‌ पूर्वामिसुल हआ तथा उत्त, 
प्रत्यङ्वा प्रष्मायीत शब्दं डुर्या- दक्षिण थवा पञ्चिमकी जर इल 


६८६ ऊाम्दोग्योषनिषद्‌ [ अच्याय ६ 


ऋ >~ ~ 3 > > 9 9 = ~ ध > 2 ~~~ 9 9 
द्विकोरेत्‌, अभिनद्भक्षोऽदं | करके इस प्रकार शब्द कटै अर्थ्‌ 

। विष्ठा कि मुञ्चे गान्धार देसे 
गन्धारेभ्यस्तस्करेणानीतोऽभिन- | आंखें बँधकर यदहो चोर छे माया 
| है जर ओघे वधे हए ही छो 

द्राक्ष एव विसृष्ट इति।॥ १॥ | दिया है ॥ १॥ 


-: ०9 :- 


एवं विक्रोशतः- । इस प्रकार चिष्ठानेवले- 
तस्य यथाभिनहनं पसुच्य परब्ूयादेतां दिशं ` 
गन्धारा एतां दिशं चजेति स॒ माद्यां एृच्छन्प- 
म 
ण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पदय तैवमेवेहाचायवा- 
नपुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ 
सम्परस्य इति ॥ २ ॥ 
उस पुरुषके बन्धनको खोखकर जैसे कोर कहे कि “गान्धार देश 
इस दिशामे हे, अतः इसी दिशाको जा, तो वह बुद्धिमान्‌ ओर 
समदा पुरुष एक प्रामसे दूसरा ग्राम पूता हआ गान्धारे ही पर्व 
जाता दे, इसी प्रकार इस रोके आचार्यवान्‌ पुरुष ही [सतो] नानता 
हे! उसके छ्यि [ मोक्ष होनेमे ] उतना ही विम्ब दहै नवतक कि वह 
[ देहवन्धनसे ] युक्त नही होता । उसके परचात्‌ तो वह॒ सस्सम्प्न 
( ब्रहमको प्राप्त ) हो जाता है ॥ २॥ 
तस्य यथामिनहनं यथा बन्धनं | उस ॒पुरुषके अभिनदन-- 
अष्ुच्य मुक्त्वा कारुणिकः | बन्धनको खोलकर निस प्रकार 
कंविदेतां दिशणत्तरतो गन्धारा | को कृपा पुरुष कदे क इस 
एतौ दिश वनेति भरनूयासस एवं | विम उक नौर गान्भा 
देश दहै; अतः इख ॒दिशाकी भोर 
कारुणिकेन बन्धनान्मोक्षितों 


। जा॒तो इस प्रकार उघ हृपाठ 
धमा्ामान्तरं पृच्छन्पण्डित | पुखद्वारा बन्धने ङुदाया इ 








खण्ड १४ ] 


शाङ्करयाष्यथं 


६८७ 


298 9 < ¬ ~ 8 9 9-9-99 9 9 ~ 9-9-9८ ~ 


परोपदिष्ट- 


्रासप्रवे मार्गावधारणसमर्थः 


उवदेश्षवान्मेधावी 


सन्गन्धारानेवोपसम्पदयेत, नेतरो 
मूढमतिर्दैशान्तरदशेनठड्वा । 
यथायं दृष्टान्तो वणितः, 
स्वविषयेभ्यो गन्धारेभ्यः पुरुष- 
स्तस्करेरमिनद्ाक्षोऽविवेको दि 


इमूढोऽ्नायापिपासादिमान्न्या 


घ्रतस्करानेकभयानथवरातयुत- 


मरण्यं प्रवेचितो दुःखार्तो | 
शन्बन्धनेभ्यो ुु्ुस्तिष्ठति स 
कथञ्चिदेव कारुणिकेन केनचि- 
नमोक्षितः स्वदेशान्गन्धारानेवा- 
पन्नो नितः सुख्यभूत्‌- 
एवमेव सतो जगदात्मस्वरू- 


पात्तेजोऽवन्नादिमयं देदारण्यं 


वह॒ पण्डित--उपदेशवान्‌ ओर 
मेधावी -दूसरोके बतलये हुए प्राम- 
म भ्रवेश करनेके मार्गको ठीक-ढीक 
समञ्ने्मे समथं पुरूष एक गोँवसे 
दूसरे गवो पूछता हभ गान्धार 
देशम ही पैव नाता - दूसरा 
मूटढमति थवा देशान्तर देखनेकौ 
तृष्णावाला नहीं प्च पता । 

जिर प्रकार यह दृष्टान्त वर्णन 
किया गया है भर्थात्‌ अपने देश्च 
गान्धारसे चोरोद्रारा ओंखं धकर 
लाया जानेके कारण विवेकशुल्य 
दिड्मूढ तथा भूख-प्याससे युक्त 
होकर व्याघ्र-तस्कर आदि अनेक 
भय ओर अनर्थसमूहसे सम्पन्न वनमें 
प्रेरित. क्रिया हुभा पुरुष दुःखातं 
होकर चिह्ठाता हुआ बन्धर्नोसे मुक्त - 
होनेके स्यि उस्युक था शौर वह 
किसी कृपाटद्रारा उन बन्धनोसे हुडा 
दिये जानेपर किसी प्रकार अपने 
देश गान्धारे पहुंचकर ही कताथ - 
यानी घुखी हुआ । 


ठीक इसी प्रकार संघारके 
आतमस्वरूप सतूसे तेन, जर नौर 
अन्नादिमय देरूप वन्मे जो कि 
वात, पित्त, कफ, रुधिर, मेद, 


वातपित्तकफरुधिरमेदोमां सास्थि- मांस, अस्थि, मला, शुक्र, कृमि 


६८८ 


छाब्दोग्योयनिषद्‌ 


[ अष्याय ६ 


3 य क~त > 


मजागुक्रकृमिमूतरपुरीषवच्छीतो- 
न्णा्यनेकद्रनदसुखदु ःखवच्चेदमो 


छीर मरम्‌ तरसे पूणं तथा शीतोष्णादि 
अनेकों इन्दर ओर सुख-दुःखे युक्त 
है, यह जोव मोऽरूप वते बभेहुए 


हपटाभिनद्वा्षो मार्यापत्रमित्र- । नेत्रवाा होकर तथा ज्ञी, एत्र, मित्र, 


पशुवन्ध्वादिदृ्टानेकविषयद्ष्णा- 
पारितः पुण्यापण्यादितस्करः 
प्रवेशितः 'अष्टमुष्य पुत्रो ममेते 
बान्धवाः सुख्यहं दुःखी मूढः 
पण्डितो धार्भिको बन्धुमाज्ञातो 
मृतो जीणेः पापी पूत्रो मे शृतो 
धनं मे नष्टं हा हतोऽस्मि कथं 
जीविष्यामि कामे गतिःकिंमे 
त्राणम्‌ १ इ्येवमनेकशतसदसा- 
न्थजालवान्वक्रोन्कथश्चिदेव 

पुण्यातिशयात्परमकारुणिकं क- 
श्चित्सदतरह्मास्मविदं विमुक्तबन्धन 
ब्रहिष्ठं यदासादयति । तेन च 
ब्रह्मविदा कारुण्याददितसंसार- 
विषयदोषदशेनमागों विरक्तः 


संसारविषयेभ्यः (नासि त्वं 
4 ¢ (~ 

संसायदष्य पत्रतादिधरम- 
वान्‌ किं तिं १ सद 


यत्तच्वमसि' इत्यविद्यामोदप्‌- 
 ठामिनहनान्मोक्षितो गन्धार पुरुष्‌ 


पद्य ओर बन्धु आदि ष्ट तथा दृष 
अनेकों विषयतृष्णाओंसे जकड़ा नार 
पुण्य-पापरूप चोरोदरारा प्रवेशित 
कर्‌ दिये जनेपर थे इसका पुत्र 
ये मेरे बान्धव है, म घुल, दुखी, 
मूढ, पण्डित, धार्मिक अथवा बन्धु- 
मान्‌ हु, मँ उपन्न हुआ ह मरता 
रह, जराम्रस्तर्, पापी, मेरा पत्र 
मर गया हे, धन नष्ट हो गया है, 
हा | म मारा गथा, अव कैसे जीवित 
र्गा £ मेरी क्या गति. होगी ? 
अव मेरा रक्षक कौन है? इसी 
प्रकारके अनेकों सैकड़ा अनथनासि 
युक्त होकर रोता हुजा जव पुण्यकी 
अधिकता होनेसे किप प्रकार किसी 
परम छपा सदुत्रह्षातज्ञ॒ बन्धः 
नक्त ब्रह्मनिष्ठ महापुरपको प्रा 
होता है ओर उस ब्रह्मवे्ताद्वारा 
दयावश सांसारिक विषयेकि दोष- 
दशेनका मागं दिखाये जानेपर 
ससिारिक विषयो. विरक्त हो जात। 
है तथा (तू संसारी नदीं हैजीरन 
इसके पुत्रवादि पर्मबार ही षै ` 
तो कौन है “जो सत्‌ त है 
वही त्‌ हैः इस प्रकारके उपदेशसे 
अविद्यामय मोहरूप वसके बन्धनसे 
इडाया जाकर गान्धारदेश्ीय पुष 








खण्ड १४ छ इर्माण्वा्ये ६८९ 
वच्च स्वं सदात्मानघुपसंपय् | के समान अपने सदात्माके प्राप्त होकर 


नि्ैतः स्यादित्येतमेवार्थमाहा- 
चार्यवान्‌ पुरुषो वेदेति । 


तस्यास्यैवमाचाय॑वतो युक्ता 
विद्यामिनहनस्य तावदेव तावा- 
नेव कारधिरं क्षेपः सदातमस्व- 
रूपसम्पत्तेरिति वाक्यशेषः । कि- 
यान्कारुधिरम्‌ १ इस्युच्यते- 
यावन्न विमोक्ष्ये न विमोक्ष्यत 
इत्येतत्‌ पुरुषव्यत्ययेन, साम्यात्‌; 
येन शरीरमारब्धं 


तस्योपभोगेन 


© 
कमणा 
क्षयादेहपातो 
यावदित्यथंः । अथ तदेव सत्स- 
3 ¢ 
स्पतस्ये सम्पत्स्यत इति पूववत्‌ । 


न हि देहमो्षस्य सत्सम्पततेध 

कालभेदोऽस्ति, येनाथशब्द 
(६ 

आनन्तर्याथः स्यात्‌ । 


घुखी ओर शान्त हो जाता है- इसी 
वातको [ आहणिने ] आचाय 
वान्पुरूषो वेद' इस वाक्यसे कहाहै । 
इस प्रकार आचाय॑वाम्‌ तथा 
अविद्यारूप बन्धनसे सुक्त हुए उस 
पुरुषके स्थि सदासमस्वषूपकी 
परा्तमे--इतना वाक्यरोष नोहना 
चाहिये- उतने ही समयतक देर 
अर्थात्‌ कारकषेप करना है- कितने 
समयतक देर है? सो बतलाया 
जाता है--जवतक ्ि वह [ देह- 
बन्धनसे ] मुक्त न हो जाय । यहां 
प्रसंगके सामर्थ्यसे 'विमोक्षये' को 
धविमोक्षयतेः इस प्रकार प्रथम 
पुरुषमे बदल्कर अथं कना 
चाहिये । तात्पयं यह है कि जिस 
कर्मे उसके देका आरम्भ हुजा 
था उसक। उपभोगद्वारा क्षय होकर 
जबतक दहपत होगा [ तभीतक 
देर है ]। देदपात होनेपर तो वह 
उसी समय स्तको प्राप्त हो जायगा । 
(सम्पत्स्ये, के स्थानम सम्पत्स्यते” 
ठेसा पूर्ववत पुरुषपरिवतेन कर 
ठेना चाहिये । देहपात ओर सतष़्ौ 
परिम कालका अन्तर नहीं टै, 
निससे कि (अथः शाब्द आनन्तयं 


। अर्थवाची हो । 


# अथ शन्द्का मुख्य अथं "अनन्तर" है, इसलिये अथ सम्पसस्ये' का 
यह अर्थ हो सकता है किं देहपात होनेके अनन्तर ( बाद्‌ ) वह सत्‌" को प्रास 


होगा । परत भाष्यकार यह कहते ह कि यषां 


"अथः शब्दका अथं “उसी समयः 


६२० 


छन्शोग्योपनिषष्ू 


[ बष्याय ६ 


ननु यथा सद्िज्ञानानन्तरमेव ¦ पूय कितु जिस प्रर परावष- 


जानानथक्यो- दे्टपातः सत्सस्प- 
द्भावनम्‌ त्तिश्च न भेवति 
कर्मशेषवशात्‌, यथाप्रवृ्फलानि 
्राग्ानोरपततेजेन्मान्तरसशिता- 
न्यपि कर्माणि सन्तीति तत्फलो- 
पभोगाथं पतितेऽर्मिञ्धरीरान्तर- 
मार्ध्यम्‌ । उत्पन्ने च ज्ञानि 
यावजीवं विहितानि प्रतिषिद्धानि 
वा कर्माणि करोस्येवेति तत्फ- 
रोपभोगाथं चावरयं शरीरान्त- 
रमारन्धव्यम्‌; ततश्च कर्माणि 
ततः शरीरान्तरमिति ्ञानानरथ- 
क्यं कमणां फए्वस्वात्‌ । 
अथ ज्ञानवतः क्षीयन्ते कर्मा- 
शानाकम्॑षयाज्ञी- णि तदा ज्ञान- 
करेऽतुपपत्ति- प्राप्तिसमकारूमेव 
मदनम्‌ ज्ञानस्य सत्सम्प्‌- 
त्िदेतुत्वान्मोक्षः 
शरीरपातः स्यात्‌ । 
चाचायभाव इत्याचारयवान्पुरूपो 


है जयात्‌ देप अथात्‌ देहपात होनेके ही समय 
जर त्की पराप्तम कछ कालका 


कमं अवशिष्ट रहनेके कारण सत्का 
ज्ञान होनेके वाद्‌ ही देहपात जर 
सत्की प्रापि नहीं होती उसी प्रकार 
्ञानोरपतिसे पूवं तथा जन्मान्तरे 
किये हए ओर भी रेसे संचित कमं 
हैदही जो अभी फर देनेमे प्रत्त 
नही इए । अतः उनका फक भोगने- 
के रिय इक्त श्षरीरका पतन होनेपर 
दूसरे शरीरका प्राप्त होना आवहयक 
है। ज्ञान उन्न हो जनेप्र भी 
पुरुष जीवनपयैन्त विहित अथवा 
प्रतिषिद्ध क्म करता ही है, अतः 
उनका एर भोगनेके ल्यि भी देहा- 
न्तरकी प्राप्ति अवद्य होनी चाहिये, 
उस समय किर करम ॑होगि भौर 
उनसे फिर देहान्तरकी प्राति होगी । 
इस प्रकार कर्मोकि फलयुक्त होनेके 
कारण ज्ञानकी व्यर्थता सिद्ध होती दै। 

ओर यदि यह मानो कि ज्ञानीके 
कमं क्षोणदहो ज्ञाते है तो ज्ञान 
सल्सम्पत्तिका देतु होनेके कारण 
ज्ञानप्राप्िके समय ही मोक्ष ही 
जायगा, अतः उसी सरमय देहपात 


स्यादिति । हो जाना चाहिये । सा होनेपर 
तथा { आचायेका अमाव हो जायगा धतः 


(आचार्यवान्‌ परप ज्ञान होता £" 


` यह वाक्य अनुपपन्न होगा त्था 


वह सत्को प्राप्त हो जायगा । यहि देदपात 


| अन्त्र ¢ 1 किबा 
जाता, पर रेखा है नदी अतः यहाँ ३ कन न्द ६ अय किव 


खण्ड १७ | 


श्ा्कराष्याथं ` ६९१ 


८5 > > द 9 9 98 9 9 -95 28 8 


वेदेव्ययुपयत्तिर्तानान्पोक्षामावग्र- 
सङ्गश्च । देशान्तरप्राप्त्युषाय- 
जञानवदनैकान्तिकफर्त्वं वा 


ज्ञानस्य । २ 
न; कमणां प्रवृ्ताप्रवृत्तफ- 


पूर्वोक्तदोषः लस्वविरेषोपपततेः । 
परिष्टरः यदुक्तमप्रबृत्तफरा- 


नां कर्मणां धरुवफरवच्वादुबर्मविदः 


शरीरे पतिते श्षरीरन्तरमारन्ध- 
व्यभप्रबृत्तकर्मफलोपमोगा्थमिति, 


एतदसत्‌; विदुषः “^तस्य तावदेव 
चिरम्‌” इति भरते प्रामाण्यात्‌ । 
नलु “पुण्यो वै पण्येन कर्मणा 


्ञानसे मोक्षपा्तिके णमावका प्रसङ्ग 
उपत्थित होगा । अथवा देश्ान्तरकी 
परा्िके साधनेकि क्ञानके समान 
ज्ञानका व्यभिचारिफख्युक्त होना 
सिद्ध होगा ।# 

सिद्ध ल्ती-रेसा कहना ठीक 
नदी; क्योकि कर्मोमं प्रवृत्तफढतव 
ओर अग्रवृत्तफरुत्व यह बिदोषता 
होनी सम्भव है । अतः तुमने जो 
कहा किं अप्रवृत्तफङ कमं भी निश्चय 
फरु देनेवाले है, इसस्यि देहपात 
होनेके परात्‌ उन अपवृत्तफक 
कर्मा एङ भोगनेके छ्ये देहान्तर- 
का प्रात होना अवदथम्भावी है-सो 
ठीक नही; क्योकि “उस विदवानूके 
मोक्षम तो उतना ( देहपात होनेतकक़ा ) 
ही ,विरम्ब दै"--यह श्रुति 
प्रमाण है। 

पू कितु ^ुण्यकर्मसे पुरुष 


भवति" ( व° उ० ३।२।१३ ) | ्यवान्‌ होता दै” बह श्रुति भी तो 
इत्यादि श्रुतेरपि प्रामाण्यमेव । | प्रामाणिक ही हे । 


सत्यमेवम्‌, तथापि प्रवृत 


सिद्धान्ती-सचणुच पेसा ही दै । 


फलानाम्रवृत्तफलानां चकर्मणां। तो मी ्रृतफल ओर भपृत्- 


___--------- --~ 





® अर्थात्‌ जिस भरकार देशान्तरकी प्रान्तरे खाघन धोड़े आदि कों बिशेष 
विष्न न होनेपर ही अपने गन्तव्य स्थानपर पर्ूचते ह उसी रकार जिनके करम्‌ 
सीण हो गये ह उन्दी शानिर्योका मोस हो सकेगा--सबका नहीं । । 


६९२ 


छाम्दोभ्योपनिवत्‌ 


[ जभ्याय ६ 


> @ 9 क = > + ॐ 4 ॐ क 9 9 ॐ 47. 4 9-9-9८ 


विरेषोऽस्ति । कथम्‌ १ यानि 
[4 (^ न्दे विं 
प्रवृत्तफङानि कर्माणि प्रेविद्र- 
च्छरीरमारन्धम्‌, तेषामुपभोगेनैव 
क्षयः । यथारन्धवेगस्य लक्ष्य- 
[व [ (~ (~ ¢ 
मुक्तष्वादेवेगक्षयादेव स्थितिनंतु 
लष्यवेधसमकारमेव प्रयोजनं 
नास्तोति तदत्‌ । अन्यानि त्व- 
प्रवृत्तफलानीह प्राम्ञानोत्पत्तेध्वं 
च कृतानि वा क्रियमाणानि 
वातीतजन्मान्तरछ़ृतानि वाप्र- 


वृत्तफानि ज्ञनेन ददन्ते प्राय- 
शिततेनेव । 'श्तानाप्निः स्व॑ 


कर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा" 
(गीता ४।३७) इति स्तेश । 


“क्षीयन्ते चास्य कर्माणि"' इति 
चाथवणे । 


अतो ब्रह्मविदो जीवनादि 


फलकरमेमिं कुछ विशेषता दै [ 
किसर प्रकार !--जो प्वृत्तपरक 
है जिनसे क्कि विद्वान्‌के श्रीका 
आरम्भ हज है उनका क्षय 
फरोपभोगके द्वारा ही हो सक्ता 
है; जिस प्रकार नप्ता वेग सूर 
हो गया है उस क्ष्यक़ी ओर छोड 
हुए बाणकी स्थिति उसके वेगका 
क्षय होनेपर दही हो सकती है, 
रक्ष्यवेध करते ही उसे [ अगे 
जानेका ] कोई प्रयोजन नीं 
रदता-पेसी वात नहीं दै; उषी 
भकार यँ समकञना॒चादिय | 
ज्ञानीके जो भव्य अप्रृत्तफरकम 
ज्ञानोतपत्तिसे पूवं किये हुए भव 
उसके परचात्‌ क्रिये जनेवारे हते 
है मथवा नो पूं लनम व 
हुए अप्रदृत्तफर्क्म॑होते हैव 
परायङ्चितसे परपेकि समान नपे 
द्ग्ध हो जति द । “तथा ज्ञनामिं 
समपुणं कर्मोको भस्मीमूत कर देव 
है इस सरिते गही परमाः 
होता है, ओर “इसके कम क्षीण 
हो नति है" रेस अथर्वण 
भी कहा हे । 

जतः ब्रहमवे्ाकषो जीवनादि 


भयोजनामावेऽप भृत्तफ़लानां । प्रयोजन न॒होनेपर॒भी प्रृततफः 


शण्ड १४ | 
कर्मणामवर्यमेव षलोपभोगः 

` स्यादिति शक्तषुवत्‌ तस्य 
तावदेव चिरम्‌ इति युक्तमेवो- 
क्तमिति यथोक्तदोषचोदनानु- 
पपत्तिः । ज्ञानोत्पतेरूध्वं च 
ब्रह्मविदः कर्मामावमवोचाम 
(्रह्मसंस्थोऽमरतसवमेति' इत्यत्र 
तच्च स्मतमर॑सि ॥ २ ॥ 


श्ाङरभाष्याथं । ६९३ 
> > < 8 8८ ८ ८-8८-9 ˆ 8८ > 8 ऋः 29 8८ 5८ 9८ ८ >< 9८ ~ ऋ 


कर्मोक्रा फरोपभोग॒ अवदय होना 
हे इसल्यि छोदे हुए वाणक्रे समान 
“उसे [ सत्री प्रा्िमे ] तभीतक्र 
विलम्ब है जनक कि वहं 
देहबन्धनसे नहीं द्ृटत।' रे 
ठीक दही कहा दै, अनः उपयुक्त 
दोषकरी राङ्का करना ठीक नही । 
श्रहमसं्थो उमृतत्वमेति इसत वाक्यकी 
व्याख्याके समय ज्ञानोक्तिकं परशात्‌ 
तो हमने त्रह्मवे्ताकरे कर्मकरा अमाव 
प्रतिपादन किया है, उसे इस सम 
स्मरण करना चाहिये ॥ २ ॥ 


सख य एषोऽणिमेतदालम्यमिद <सवं तत्स्य <स 
आत्मा तच्छमसि खेतकेतो इति भूय एव मा भग 
वान्‌ विज्ञापयतिति तथा सोम्येति होवाच ॥ २ ॥ 
वह जो यह अणिमा हे एतद्रूप दी यहं सव है । वह सव्य है, 
वह आसमा है ओर हे खेतकेतो । वही तु हे । [ आरुणिके इस रकार 
कृहनेपर उवेतकेतु बोा--] भगवन्‌ | सुञ्षे एर समञ्ञादये ॥ [ तव 
आरुणिने ] अच्छा, सोम्य | ेसा कहा ॥ २ ॥. 


स य हइत्याचयुक्ताथम्‌ । आ 
चा्यवान्विद्ान्येन करमेण सस्स- 
स्पदे तं क्रमं॒दुष्टान्तेन भूय 
एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति । 
तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ 


(स यः इत्यादि मनका अर्थ 
पटे कहा जा चुका दै । ह भगवन्‌ ! 
आचार्यवान्‌ विद्वान्‌ जिस॒क्मसे 
सतर प्रा होता है वह क्रम सु 
दृष्टन्तद्ारा फिर समश्चाश्ये' एसा 
ङवेतकेतुने कहा । तव॒ आरुणिने 
कहा “सोम्य } अच्छाः ॥ २ ॥ 


इतिच्छाम्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये चतुदेशखण्डमाप्य सम्पर्णम्‌ ॥९५॥ 


(ीीणीीरै 


फएञ्चटठ सकर 


मूष पुरषे णष्टान्तद्रारा उपदेश 
पुरुषश्सोम्योतोषतापिनं ज्ञातयः पपाते 


जानासि मां जानासि मामिति । तस्य यावत्न वाड्‌ 


मनसि सम्पद्यते मनः पाणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां 
देवतायां तावजानाति ॥ १ ॥ 


हे सोम्य | [ ज्वरादिसे ] संतप्त [ मुम्‌ ष ] पुरषको चारौ भरसे 
वेरकर उसके बान्धवगण पूछा करते दै क्या तु भुञ्े जानता दै ! 
क्या त्‌ मुञ्चे पटहचानता दै ® जवतक उसकी वाणी मनमे लोन नहीं होती 
तथा मन प्राणे, प्राण तेजमें ओर तेन परदेवतार्मे छीन नही होता 
तबतफ वह पहचान लेता है ॥ १ ॥ 
पुरुषं हे सोम्योतोपतापिनं | हे सोम्य | उपतापी--ज्वरादि- 
ञ्वराद्युपतापवन्तं ज्ञातयो बा- से ; अव्यन्त॒संतघ्त 4 ११ 
न्धा ज्ञातिजन-वान्धवगण धेरकर्‌ 
न्धवाः परिवार्योपासते भमूष॑म्‌- | ` 
एवायापासते धूपम्‌ समू परुषसे क्या तू सुश्च अपने 
जानासि मां तव॒ पितरं पुत्रं | पिता, पुत्र जथवा ईको पहचान 
| है इष प्रकार पूते हुए 3 
जातर्‌ वा-- च्छन्तः ८ 
इति पृच्छन्तः । चारों ओर बैठ लाते है। घ 
` वस्य धुूपोर्याव्न बाडूमनसि | मूक जचतक़ वाणी ममर ली 


` सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि | नदी होती तथा मन प्राणे, १ 
। वताम र 
तेजः परस्या देवतायामित्येतदु- तेजमे ओर तेन परदेवता ् 
क्ताथम्‌ । नहीं होता इत्यादि वाक्यकरा 
। १॥ पडले कदा ना चुका हे ॥ १॥ 


~क 


च्ड १५ | शाङ्करभाष्यं ६९५ 


संसारिणो यो मरणक्रमः स । संघारी जीवका जो मरणक्रम 
॥ 
४. १ ह वही विदरानूकी सत्सम्पत्तिका करम 
एवायं विदुषोऽपि सस्सम्पत्तिक्रम 
है- -इसी वातकरो आरंणि बतढाता 


इत्येतदाद-- । है-- 
अथ यदास्य वाड्‌ मनसि सम्पयते मनः प्राणे प्राण- 
स्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २॥ 
फिर जिस समय उसकी वाणी मनम रन्‌ ध जाती ह तथा मन 
प्रणमे, पराण तेन जोर तेजन परदेवतामे लीन हो जाता है तब वह नहीं 

. पहचानता ॥ २ ॥ 

परस्यां देवतायां तेजसि सम्प- | परदेवतां तेजके रीन हो जने- 
न्नेञ्थन जानाति । | पर फिर यह नहीं पह चानता । कितु 
सत्सम्पततिक्रमः जो अविद्वान्‌ होता है वद तो सते 
अविद्वांस्तु सत | उच्थित होकर पठे भावना कयि §ए 


उत्थाय प्रागभावितं व्यादि" | यावि भ इ 
माके परे करता द; श्रि विद्वन्‌ 


9 देवमनुष्यादिभावं वा | शाञ्च ओर आचायंके उपदे्जनित 
विशति । विद्वांस्तु शाब्वाचार्यो- | ज्ञानदीपकषसे भरकाशित सदनक्षरूप 
पदेयजनिवक्ञानदीपप्रकाशितं स- | मामनि , भरवेशक ए न 
दलदयातमानं प्रविदय नावतैत | रेषता दी साति कष है । 
इत्येष सतसम्पत्िक्रमः । कुछ. .खन्य मत[वरम्बयनि जो 
अन्ये तु मूर्धन्यया नाब्यो- | क हे कि मुर्ैन्ध नाडीसे उक्तमण 

क्रम्यादित्यादि- | कर अदिलादिद्वारा ` सत्री प्र् 

होता दै, वह ठीक न दै, करि 

| इस प्रकारका गमन तो देश, कार, 
| निमित्त ओर फरक अभिनिवेश 


मतान्तरनिराखः 
दारेण सद्दच्छ- 


न्तीत्याइ!, तदसत्‌; देशका 


६९६ छान्दोग्योपनिषद्‌ [अष्याय ६ 


>< > >& >< >< 39 < 8 < < >< < < 8 << > 5 > >> 


निमित्तफलाभिसंधानेन गमन- ¦ पूवक देखा जाता है ओर सदास् 
का एकत्व देखनेवाले सयक 
विद्वानॐो देश, कारु, निमि ओर 
दरिनः सत्याभिसन्धस्य देशका- | परु आदि असद स्तुका अभिनिवेश 
लनिमित्तपलायनृतामिसंधिरूप- | शौय सम्भव नदीं दै, वर्यो 
2. १ | उस ( सव्यनिष्ठा ) से विरोष दै। 
पद्यते, विरोधात्‌। अवद्याकाम- | गमनके निमित्तभूत अविधा, कामना 
कमणां च गमननिभित्तानां ¦ ओर कर्मोकि सद्विज्ञानहूप अग्निसे 
= ह भ्म हो जानिके कारण उक 
सद्ि्ानहुताशनविप्ुटलादम- | गमद अनुपपि द है । शू 
नानुपपत्तिरेव, ““पर्याप्कामस्य | काम ॒कृतछ्रय॒पुरूपकी सम्पूणं 
कृतातमनस््व सव प्रविलीय. कामनाणं यदीं रीन हो जी ह" 
ठेसा अथर्वण श्रुतिमे कहा है; भौर 
इसके लिवा॒नदी-समुद्र-दटन्तौ 
नदीसयुद्रदृष्टान्तश्रुतेध | २ ॥ | श्रुति भी है # ॥ २॥ 
--: ४ :-- 
स य एषोऽणिमेतदप्म्यमिद सर्वं ॑तस्सत्यस 
आत्मा तत्वमसि उवेतकेतो इति भूय एव मा भगवा 
न्वज्ञापयखिति तथा सोभ्येति होवाच ॥ २ ॥ 


वह जो यह अणिमा हे एतद्रप ही यह सव दै । वह सघ दै, 
आसा हे ओर दे श्वेतकेतो | वही तू है । [ आरणिके इष प्रक 
कहनपर्‌ सेतकेतु बोला--] “भगवन्‌ | सञ्च फिर समक्ञाद्ये ॥ [> 
आरुणिने ] "अच्छा, सोम्य } देसा कहा ॥ २ ॥ 


नि~~ --- 
४ देखिये मुण्डक० 


दशनात्‌ । न हि सदार्मकल- 


न्ति कामाः” इत्याद्याथर्वणे | 


६ ॥ ‰ ॥ 


कीण्ड १५ ] 


शाङरभाष्वाथ ६९७ 


8 < < 8-8-86 < ६ >> > >&८ < 8 ~ 9 8. 9 ¬ -&८ 8८ €< ¬: ड: < 


स॒ य इत्यादि समानम्‌ । 
यदि मरिष्यतो कषतश्च तुल्या 
सत्सम्पत्तस्तत्र विद्वान्सस्सम्पन्नो 
नावर्तत आवतते त्विद्रानि- 
त्यत्र कारणं दृष्टन्तेन भूय एव 
मा भगवान्विज्ञापयत्िति। तथा 
सोम्येति होवाच।। ३। 


“स य” इत्यादि श्रुतिकरा अथ 
पर्ववत्‌ है । यदि मरनेवले ओर 
सुु्चुकी सम्पत्ति एक जैसी हे 
तो विद्वान्‌ तो सतक्रो प्राप्त होकर 
नहीं लोरता ओर अ्रि्रान्‌ रता 
है इसम जो कारण है उसेहे 
भगवन्‌ | दष्टान्तद्रारा सृङ्ञे फिर 
समज्ञादये' [ -एेसा उेतकेतुने 
कहा ]। तव अरुणिने कदा- 
“सोम्य | अच्छा" ॥ ३ ॥ 


--: ® :-- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये 
पञ्चदशलण्डभाग्यं सस्पूणंम्‌ ॥ १५॥ 


--ॐ*3 ॐ 





कोइक्ल शकश्ड - 


चोरके तप्त परशु घहणके दष्टान्तद्रारा उपदेश्च 


शृणु यथा-- 


पुरुष सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षस्सिय- ' 
मकार्षीप्परशुमस्मे तपतेति स यदि तस्थ कर्ता भवति ` 


सुन, जिस प्रकार-- 


तत एवाचतमाल्ानं करते सोऽकताभिक्षन्धोऽनृते. | 
नात्ानमन्तधाय परशुं तप्तं प्रतिण्हाति स दह्यतेऽथ | 


हन्यते ॥ १ ॥ 


हे सोम्य | [ राजक्मचारी ] रिसी पुरूषो हाथ बँक लते | 
है [ जोर कहते है ] “इसने धनकां भपहरण किया है, चोरी की दै , 
इषके ल्यि परञ्च तपाभो ।' वह यदि उसका (चोरीका) करनेवास हेता , 
हे तो अपनेको मिथ्यावादी प्रमाणित करता है । वह मिथ्यामिनिवेशवाल 
पुरुष भपनेको मि्यासे छिपाता हआ तपे इए परश्च रहण करता दै 
तु वह उससे दग् होता है ओर मारा जाता दै ॥ १॥ 


सोम्य पुरुषं चोयंकरमणि सं- 
दिद्यमानं निग्रहाय. परीक्षणाय 
बोतापि हस्तगृहीतं बद्धहस्तमा- 
न षन्ति राजपुरुषाः । किं डृत- 
वानयमिति पृषटाधाहुरपहाषी- 
दनमस्यायम्‌ । ते चाहुः कि- 
मपहरणमात्रेण बन्धनमर्हति १ 


हे सोम्य | निस पृरषके विषय 
चोरी करनेका संदेह शेत ट 
उसे राजकर्मचारी दण्ड देने अर्थवा 
उसकी परीक्षा करनेके ल्यि हतः 
गृहीतः-हाथ वधक कते £। 
“इतने क्या किया है ¢ इस भरकर 
पे जानेपर वे कहते है कि षने 
इस पुरुषका धन स्या दै । ® 
वे (न्यायाधीश) कहते है कया ध! 
लेनेमात्रसे यह बन्धनके योग्य 
गया; तब तो अन्य किसी 


कच्छ १६ | 


28 6 < 3 6-8-88 


अन्यथा दत्तेऽपि धने बन्धनप्रस- 
ङ्गात्‌; इत्युक्ताः पनराहुः-स्तेय 
भकाषींदौर्येण धनमपहाषीदिति। 


तेष्वेवं वद्स्स्वितरोऽयद्‌यते 


नाहं वत्कतेति । 
ते चाहुः संदिद्यमानं स्ते- 
यमकाषीस्त्वमस्य धनस्येति । 
तस्मिधापदलुवान्‌ आहुः परलु- 
मस्मे तपतेति शोधयत्वात्मान- 
मिति । स यदि तस्य स्तैन्यस्य 
- कर्तां भवति बदिशापुते स 
एवं भूतस्तत एवाृतमन्यथाभूतं 
सन्तमन्यथात्मानं इरुते। स 
तथानुवाभिसन्धो ऽदठेनात्मान- 
मन्तर्धाय व्यवहितं इृत्वा परल 
तपं मोहासरतिगृह्णाति स द्चते- 


ऽथ हन्यते राजपुरुषैः खक़ृते- 
नानृताभिसन्धिदोषेण ॥१॥ 








प्रच्य ६९९ 





9 ॐ ॐ ॐ ॐ @ = 4 
धन देनेपर भी उसे लेनेवालेको 
वन्धनका प्रसंग उपस्थित होता 
है ॥ इख प्रकार कदे जानेपर वे 
फिर कहते है-हसने चोरी की है 
अर्थात्‌ चोरीसे षन ल्य है 
उनके इस प्रकार कहनेपर वह 
पुरुष श्रे चोरी करनेवारा नी है 
पूसा कहकर अपने कर्मको 
छिपाता है । 

तव वे संदेह श्रिये जानेवाले 
पुरुषस कहते है--^तूने इसके 
धनकी चोरी अवश्य की है । एदि 


भी उस्सके छिपानेपर बे कहते 


है इसके लियि परञ्च तपाओ- 
इस प्रकार यह अपनेको निर्दोष 
सिद्ध करे ।' यदि वह उस 
चोरीका करनेवाला होता है ओर 
ऊपरसे छिपाता है तो णा होनेपर 
वह्‌ भपनेको भृत भर्थात्‌ अन्यथा 
( चोर ) होनेपर भपनेको अन्यथा 
( साह ) प्रदर्शित करता है । 
इस प्रकार मिथ्यामिनिवेशवाल 
होकर वह अपनेको मिथ्यासे अन्त- 
हित करता- छिपाता हुमा मोहक 
तपे हुए परश्चको अहण करता ओर 
जल जाता है । तब अपने किये हुए 
मिथ्याभिनिवेशूप दोषसे वह राज- 
पर्पोद्वारा मारा जाता है ॥ १ ॥ 


> कगे 


ए 








\88@ 


| छम्दोग्योपनिव शू 


[ भष्याय ६ 


>£ > ~ 9 9८ 8: 9: >8< 9 >: -@< -8 >| >>> 9 अ 9 वट ऋऋ ऋ ३९-४ 
अथ यदि तस्याकतौ भषति तत एव स. 
मात्मानं रुते स सत्याभिसन्धः सस्येनास्ानमन्तर्षाय 
परशं ततं प्रतिख्हाति स न दह्यतेऽथ सुत्ये ॥२॥ 
ओर यदि वह उस (चोरी) का करनेवाला नही होतात 

उसीसे वह अपनेको स्य प्रमाणित करता है । वह सव्याभिषन्ध अपनेको 


स्यसे आत्रृत कर उस तपे हुए परशुकरो पकड़ लेता दै । वह उपते 
नदी जश्ता ओर तकार छोड़ दिया जाता है ॥ २ ॥ 


० ¢ © 
अथ यदि तस्य कमंणोऽकतां 


मवति, तत एव सत्यमात्मानं 
कुरते। स सत्येन तया स्तैन्याक- 
तेतयात्मानमन्तर्धाय परशुं तं 
प्रतिगृह्णाति । स सत्याभिसन्धः 
सन्न द्यते सत्यव्यवधानात्‌, 
अथ च्यते च मृषाभियोक्तभ्यः। 


त्षपरशुहस्ततरुसयोगस्य तु- 
ल्यतवेऽपि स्तेयकतकत्रोरृता- 


भिसन्धो दहते न तु सत्यामि- 


सन्ध; ॥ २॥ 


र 


जओर यदि वह उस कर्मक 
क्रनेवाखा नहीं होता तो उष 
८ चोरीके अक्ल ) के दी द्रार 
वह अपनेको सत्य प्रमाणित करता 


है । वह उस चोरीकी अकतृतार्प | 


स्यसे अपनेको अन्तर्हित कर उप 
तपे हुए परश्ुको ब्रहण कता दै 
जोर ` सत्याभिसन्ध होनेके काण 


सत्यका व्यवधान दो जानेसे वह 


उससे नहीं जङता | तब मिथ्या 
अभियोग ॒रगानेषारे उसे तकता 
छोडदेते दै । इस प्रकार तपत ए 
ओर इ्थेरीके संयोगमें समार॥ 


होनेपर भी चोरी करने जीर १ | 


करनेवाकोम मिथ्यामिसन्ध शः 
बाडा जरु जाता दै नौर सरली 
मिन्ध नहीं जता ॥ २ ॥ 








काण्ड १६ ] दाएङ्कर्मध्यिय ७०१ 
०.54 + 4 = 3 8८ >~ 8: >8८ 9८ > >< 29: -&८ 8: 9८ ~~ < 9८ ~ ऋ 6: 9 


स यथा वन्न नादाय तैतदा्म्यमिदश्सवं तत्सत्यं 
स आस्मा तत्वमसि श्रेतकंतो इति तद्धास्य विजनज्ञा- 
विति विजज्ञाविति ॥ ३॥ 


वह्‌ जिप्ष प्रकार उप्त [ परीक्षके ] समय नहीं जरुता [ उसी 
प्रकार विद्ान्‌का पुनरावर्तन नहीं होता ओर. भविद्रानका होता दै 
यह सव एतदरूप दी है, वह सस्य है, वह आत्मा हे ओर टे इवेतकेतो | 
वही तू है । तब वह (इवेतकेतु) उसे जान गथा-उमे नान गया ॥२॥ 


स यथा सत्याभिसन्धस्तप- 
परशुग्रहणकमंणि सत्यव्यवदित- 
हस्ततरुखानादाद्येत न ददे 
तेत्येतदेवं सद्रह्मसत्याभिसन्धी- 
तरयोः शरीरपातकाले च तुल्या- 
यां सस्पभ्पत्तौ विद्वान्सर्सम्पद्य 
न पुनर्व्याघ्रदेवादिदेदग्रहणाया- 
वतंते । अविद्वांस्तु विकारानृता- 
भिसन्धः पुनर््याघादिमावं देव- 
तादिभावं बा यथाकमं यथाश्रुतं 


प्रतिपद्यते । 
यदात्माभिसन्ध्यनभिसन्धि- 


कृते मोक्षबन्धने यच मूलं जगतो | 


वह॒ सव्याभिसन्ध पुरूष निस 
प्रकार उश्च तप्त परड्ुको ग्रहण 
करनेके कमम हयेलीके स्यसे 
व्यवहित रहनेके कारण नहीं जलता 
उसी प्रकार देहपातके समय सद्रक्म- 
खूप सत्यमे निष्ठा रखनेवलि ओर 
उससे भिन्न अपन्निविष्ट पुरुषको 
सतसम्पत्तिमं समानता होनेपर भी 

विद्रान्‌ है वह व्याघ्र अथवा 
देवादि रारीरोको अहण करनेके 
स्यि नहीं रौरा, किंतु अविद्वान्‌ ` 
विकारखूप अनृतमे अभिनिविष्ट होनेके 
कारण अपने कर्मं ओर ज्ञानक 


अनुसार पनः व्धाघ्रादिभाव 
अथवा देवादिभाव्को प्रप दो 
जाता है । 


निक्त आसारो अभिक्तनि ओर 
अनमिसन्धिके कारण मोक्ष ओर 
बन्धन होते दै, जो सं्ारऊ़ा मू 





७०२ 


छाम्डोभ्योरनिख्ल्‌ 


[ अध्याय ६ 


9 > > 9 ¬ 6 द ८ 9 > ~ 9 ८ 8 ~ ढः ऋ अ क 


यदायतना यस्रतिष्ठाथ सर्वा। 
प्रजा यदात्मकं च सवं यचाज- 
ममृतमभयं शिवमद्वितीयं तस्स- 
त्यं स आत्मा तवातस्तत्वमसि 
हे इवेतकेतो इत्युक्ताथंमसकृदा- 
क्यम्‌ । 
कः पुनरसौ उवेतकेतुस्त्वं 
रब्दाथः । योऽहं शवेतकेतरुदार- 
कस्य पुत्र इति वेदात्मानमादेशं 
भ्रुतवा मत्वा विज्ञाय चाश्रुतम- 
मतमविन्ञातं विज्ञातुं पितरं 
पप्रच्छ कथं नु भगवः स आदेश्षो 
मवतीति। स एपोऽधिकृतः रोता 
मन्ता विज्ञाता तेजोऽवनमयं 
ष ठि (~ 
कायकरणसङ्कातं प्रविष्टा प्रैव 
देवता नामरूपव्याकरणाया- 
© 
द्रं इव पुरुषः पूर्यादिरिव 
जलादौ प्रतिविम्बसूपेण स आ- 
त्मानं कायंकरणेभ्यः प्रविभक्तं 
सद्रपं॒सर्वातमानं राक्‌ पितुः 


1 


है, सम्पूणं भना जिसके णाभि 
भौर निमे प्रतिष्ठित ह, सरा 
संसार जिस ॒स्वरूपवाला तथा 
जो अजन्मा, भमत, भभय, शिव 
ओर्‌ अद्वितीय है वही सत्य है भौ 
वही तेरा आसा है; अतः है 
रवेतकेतो | त्‌ वह है । इष परक 
इस वाक्यका अर्थं कद बार इहा 
जा चुका हे । 

[ अव यँ प्रन होता है कि 
तवं शब्दका वाच्य यह इवेतकेतु 
कोन दै १ [ उत्तर-- ] नोभ 
इवेतकेतु उदाल्कका पुत्र ह॑ पषा 
अपनेको जानता था तथा निने 
[अपने पिताके}उस अदिशका श्रवण, 
मनन जोर ज्ञान प्राप्त करके भू 
अमत जर भविजञातको नानेक 
ल्यि पितासे पूषा था कि “भगव । 
वह॒ आदेशा किल प्रकार है! 
वह॒ यह अधिकारी ¢ 
ओर विज्ञाता दर्पणमे भ 
हुए पुरुष ओर जलादिमे प्रिव 
रूपसे प्रविष्ट हुए सूर्यादिके म 
तेन-ज जनम देदेन्द्ियसंपर्त ए 
नाम-रूपकी अभिव्यक्ति कके 
स्यि विष्ट हई परदेवता ही ६। 
बह पिताक उपदेश नेसे ९ 





` ण्ड १६ |] शाङ्करथाष्याथं ७०३ 
+ 9 क क क > = ॐ = = > = अ क क 


भ्रवणान्न विजज्ञौ । अथेदानीं | अपनेको देह भौर इन्दर्योसे मिनन 
॥ 
पित्रा प्रतिबोधितस्त्वमसीति- | 1. द 
| ओर हेतुपूवैक पिता्रारा समक्ञाये 
जानेपर वह पिताके इस कथनको 
किरोक्त सदेवादमस्मीति विजज्ञौ किभ्रेसत्‌ ही हर समञ्च गया | 
“विजज्ञौ इति' इस पदकौ द्विरुक्त 
अध्यायद्ठी समाप्ति सूचित करनेके 
परिसमाप्त्य्थम्‌ । ल्यि दै। 
घिं पुनरत्र षष्ठे वाक्यप्रमाणे- | पूं ° कति इस छठे अध्यायं 
वाक्यप्रमाणसे आत्मामं व्या फ 
न जनितं एरमात्मनि ? इमा ! 
करत्वभोक्ठतयोरधिङृतस्व- | सिद्धान्ती- दमने अविज्ञातके 
षषठाध्यायवाक्य- विक्ञाननिवृत्तिस्त- विज्ञानरूप फरक ल्यि श्रवण भैर 
भमाणनन्य- स्यफलं यमबोचाम | मगन करनेमं अत (जित लम्‌ 


॥ स ९ | शब्दवाच्य अर्का वर्णन किया दै 
कल्द्श्नम्‌  रवञब्द्वाच्यम्‌य | उसके अपनेमे ( आसोप्ति ) कर्ठरव 


श्रोतुं मन्तुं चाधिङृततमवि- भोक्तृवके अधिङ्तत्व-विज्ञानकी 
ज्ातविज्ञानफलाथम्‌ । प्राक्चै- | निवरि ही इसका फरु हे । इस 


अवक विज्ञानसे प्रवं भे इस प्रकार 
तस्माद्विज्ञाना रिष्याभ्य- क 
1 अम्नहोत्रादि कम करंगा, मे इसका 


ग्नहोत्रादीनि कर्माण्यदमत्राधि- | अधिकारी ह तथा इन कर्मोका 
छतः, एषां च कमणां फल- | फर भँ इस रोक शौर परलोके 
मिहा्त्र च॒ भश्ये रेषु भोगुगा ओर € करनेपर 

र ध नि | मे इतङ्ृत्य हो जाञंगाः इस प्रकार 
वा कमसु कृतकतन्यः स्याभि- म कटु भोर भोक्तखका भधिकारी 


त्येवं कवत्वभोक्दत्वयोरधिद्- । ह-पेसा जो उते जासामें विजान 


- 


ृष्टान्ते्दतुभिश्च तत्ितुरस्य ह 


विज्ञातवान्‌ । दविवंचनमध्याय- 


५५०७ 


छान्दोग्योपनिषत्‌ 


[ भष्याय ६ 


> क 3.3 


तो ऽस्मीत्यात्मनि यद्विज्ञानम- 
भूतस्य, यत्सज्ञगतो मूरमेक- 


मेवाद्वितीयं 
` वाक्येन प्रतिबुद्धस्य निवर्तते, 


विरोधात्‌ । न दयकस्मिन्नदितीय 
आत्मन्ययमहमस्मीति विज्ञाते 


ममेदमन्यदनेन 


भेदविज्ञानयुपपद्यते । तस्मा- 
त्सत्स॒त्याद्वितीयात्मविन्ञाने बि- 
कारानृतजीवात्मविज्ञानं निवत 
इति युक्तम्‌ । 

नयु तखमसीस्यत्र त्वशब्दवा- 
खद्बुद्ध रारोप्यमा- च्येऽये सद्बुद्धि 
गलरङ्खनम्‌ रादिरयते यथा- 
दित्यमनआदिषु ब्रह्मादि- 
बुद्धिः । यथा च लोकै प्रतिमा- 


दिषु विष्ण्वादिवुद्धिस्तदन्न त॒ 
सदेव स्वमिति । यदि ` सदेव 


विजानीयाचचेन तस्म त्वमसी- 
सयुपदिश्यते | 


तखमसीत्यनेन 


कतव्यमिदं 
कृत्वास्य फल भोक्ष्य इति बा 





था, वह-- जो एकमात्र जदि 

सत्‌ जगत्का मृ है वही तृ है 
इस वाक्यद्ररा जग उटनेप््‌ न 
हो जाता है, वथो [पूवं परिधा 
ज्ञाने ] इसका विरोध दै । काण, 


। एकमत्र अद्वितीय आसाके विषयं 


“यह यँ हरसा ज्ञान हो जनेष्‌ 





८ न ¡भ्य 
मुञ्चे अपना यह अन्य कतव्य इ | 


| साधने करना चाहिये, इमे कले. 


पर मँ इसक्रा फर भोगूंगा ॥ इस 
प्रकारकी मेदबुद्धि होनी सम्भ 
नहीं है । अतः सद्रूप सव 
ओर अद्वितीय आस्माका कत 
होनेपर विकराररूप मिथ्या जीबाल- 
जुद्धकी निवृत्ति हौ जाती है-य 
कथन ठीक दहो है। 

पूवं ° -ङ्गितु निन प्रकार भद 
ओर मन आदिमे ब्रह्मादिक 
तथा रोकमें प्रतिमा आदिम विषु 
ुद्धिका आरोप किया जाता है उप 
प्रकार (तस्मसि' इस वक्यके &॥ 
वम्‌ शब्दके वाच्यम 


सदूबुद्धिका आरोप ही किया जात 
| हे । वस्तुतः खमर्थ सत्‌ ही नही द। 
धेतकेतुः स्यात्कथमात्मानं न! 


यदि उवेतकेतु सत्‌ ही हेता 
जपनेको क्यों न लानता, नित हि 
उसे "तू वह हैः इस प्रकार उपदे 
किया गया | 








खण्ड २६ | शशाङक रबाष्या्थे ७०९ 


28८8: ¬< >< 9 >< 9 9 > ~ ~ आ 9-9-99 9 9८ > ~ ~ 9 


न; आदित्यादिवाक्यवैल- 


क्षण्यात्‌ । आदि. 
तत्परिहारः स 
हमेत्यादा- 
वितिश्चब्दन्यवधानान साक्षा 
्रह्मत्वं गम्यते । रूषादिमन्ला- 
चादित्यादीनामाकाश मनसोधे- 
तिशचब्दव्यवधानादेवाब्रह्मत्वम्‌ । 
इद तु सत॒ एवेह प्रवेशं दरं 
यित्वा तच्वमसीति निरङ्कुशं 


सदार्मभावयुपदिश्चति । 
ननु पराक्रमादिगुणः सिदय- 


ऽपि त्वमितिवत्तख्रमसीति 


स्यात्‌ । 
न; मृदादिवत्सदेकमेवादि- 


तीयं सत्यमित्युपदेशात्‌ । न 
चोपचारविज्चानात्तस्य तावदेव 


चिरमिति सत्सम्पत्तिरुपदिश्येत। 


सिद्धान्ती-पेसी बात नौ है, 
क्योकि “भादित्यो ब्र्ष्युपासीतः 
इत्यादि वाक्योँसे इस वाक्यम 
विलक्षणता है । “भादित्यो गक्षेलु- 
पसीतः आदि वाक्यो “इति, श्षब्द- 
का व्यवधान रहनेके कारण उनका 
सक्षात्‌ ब्रह्मसव ज्ञात नहीं होता । 
इसके सिवा आदित्यादि रूपवान्‌ 
होने कारण तथा आक्कार ओर 
मनके इति, शब्दसे व्यवधान होनेके 
कारण वे ब्रह्म नहीं हो सकते । 
कितु इस परसङ्गमे तो [ आरुणि ] 
सत्का ही इस ८ तेनो उवन्नमय- 
संघात ) मे प्रवेश दिखखकर "तु 
वह॒ दैः इस प्रकार निकुर 
सदातमभावका उपदेश करता है । 

पूवं ° - जिस पकार पर्‌क्रमादि 
गुणवाला त सिह दै" पेसा कटा 
जाता ह उसी प्रकार (तू वह है" 
यह्‌ वाक्य भीतो हो सकता है ९ 

सिद्धान्ती- नही, क्योकि 
'ृत्तिकादिके समान एकमात्र 
अद्वितीय सत्‌ ही सत्य है" रेखा 
उपदेश किया गया है । जपचारिक 
विज्ञानके द्वारा उसे तमीतक 
विरू्ब दैः इख भकार सवकौ 
प्रातिका उपदेश्च नं किया जा 


७०६ छान्दोष्योवनिवद्‌ [ म्वाय १ 
न 
ृषात्वादु पचारविज्ञानस्य त्वमि- | सकता था, वयो त ह्रै 

त्‌ यम है इयादि विषवन 
द्रो यम इतिवत्‌ । समान जओपचारिक विनं तो 


नापि स्तुतिरनुषास्यत्वाच्छये- 
उपदेशस्य स्तत्यथ- तकैतोः । नापि 
त्वनिरासः श॒च्छवेतकेतुत्वोप- 
देशेन स्तूयेत । न हि राजा 
दासस्त्वमिति स्तुत्यः स्यात्‌ । 


नापि सतः सर्वात्मन एकदेश- 
विरोधो युक्तस्त्त्वभसीति देशा- 


धिपतेरिव प्रामाष्यक्षस्त्वमिति । 
न चान्या गतिरिह सदात्मत्वो- 


पदेशा्थान्तरभूता सम्भवति । 


नलु सद्स्मीति बुद्धिमात्रमिह 
उदिमात्कतं कतेव्यद्या चोद्यते 


व्यतानिरखः न॒त्व्चातं॒सद- 

सीति शाप्यत इति चेत्‌ | । 
नन्वस्नपेऽ्पभवं 

भववीत्याधनुपपञम्‌ । 


भतं 


मिथ्या ही हज करता है । 
सके सिवा यह स्तुति भी नह 
हो सकती, क्योकि शेतकेतु उष्य 
नही हे । न इवेतकेतुरूपसे उपेश 
देकर सक्को दही स्तुति कीना 


सकती है, क्योकि तू दष है | 


फसा कृषहक्र रनाकौ स्तुति नही 


की जाती | इक सिवा देशाधिपति | 
की तु मामाध्यक्ष दा कहने | 
समान सर्वासमक सत्क तू वह है 


ठेसा कहकर [ शवेतकेतुरूप | ए 
देशम निरुद्ध करना भी उचित 
नही है । इनसे भतित्कत षत 


आसमलोपदेशचसे भरथ्तरमत कोई | 
घौर गति टस वाक्यर्मे | 


ही नही है। 


पूवं ०-यदि प्सा मानि कि ये 


भं सत्‌ ह एसी बुद्धिका दी क 
ख्पसे उपदेश्च किया गया है 
सत्‌ है रेसा कहकर अतातफा 
्ञान नहीं कराया गया--तो ! ८ 
सिद्धान्ती इत पको /' 
मैप भौ “अश्रुत श्रुत हो जता 
इत्यादि कथन तो भनुरपपनन ९ 





खनब्ड १६ ] 
ए ॐ ॐ 4 


न; सदस्मीतिबुद्धिविधेः 
स्तुत्यर्थत्वात्‌ । 

न; आचार्यवान्पुरुषो वेद 
तस्य तावदेव चिरमि्युपदेन्ात्‌ । 
यदि हि सदस्मीति बुद्धिमात्रं 
करतंव्यतया विधीयते न तु तव 
शब्दवाच्यस्य सद्रषत्वमेव तदा 
नाचायंवान्बेदेति ज्ञानोषायो- 
पदेशो वाच्यः स्यात्‌ । यथामि- 
होत्र जुहुयादित्येवमादिष्व्थ- 
्ा्मेवाचार्यवच्वमिति तद्वत्‌ । 


तस्य तावदेव चिरमिति च केप 
करणं न युक्तं स्याद्‌ । सदात्म- 
तष्वेऽविक्ञातेऽपि सठृद्बुद्धि- 


मात्रकरणे मोक्षप्रसङ्गात्‌ । 

न च त्त्वमसीत्युक्ते नादं 
सदितिप्रमाणवाक्यजनिता बुद्धि- 
छा०उ० २३- 


शाडरमाच्लाथ 





€ 


७०७ 
6 क = = ॐ > = = > = ॐ = त 
पूवं ° -नदी; यह कथन शभ सत्‌ 
ह इस प्रकारकी बुद्धिरूप विधिकी 
सतुतिके स्यि हो घकता है । 
सिद्धान्ती-रेसी बात नहीं है; 
क्योकि यहाँ आचायंवान्‌ पुरुषको 
ज्ञान होता है; उसे तमीतक विरम्ब 
हैः इत्यादि उपदेश किया गया है । 
यदि यहाँ भ सत्‌ ह्र इस प्रकार- 
की बुद्धिमात्रका ही करतग्यरूपसे 
विधान किया गया होता त्वम्‌" 
शब्दवाच्य जीवकी सद्रूपताका 
उपदेश न होता तो “आचार्यवान्‌ 
पुरषको ज्ञान होता है" इस प्रकार 
ज्ञानके उपायका उपदेश न किया 
जाता । जिस ग्रकार “अमिहोत्र करे" 
इत्यादि विधिम आचार्यक 
अर्थतः प्राप्त है, उसी प्रकार्‌ यहाँ 
भी समक्ष ख्य जाता। भौर न 
उसे तभीतकं विर्व दहै" रेष 
कहकर कालक्षेप करना € उचित 
हो सकता दै; क्योकि सदासम- 
तत्तका ज्ञान न होनेपर भी एङ्‌ 
बार सद्ुद्धि करनेसे ही उक 
मोक्षका प्रसंग उपस्थित हो जातवा । 
इसके सिवा जिस प्रकार 
अम्निहोत्रादि-विषिजनित भनिि- 


१७०८ 


निवतयितं शक्या नोत्पन्नेति 
वा शक्यं वक्तुम्‌, सर्पोपनिष- 
०, 
दाक्यानां तत्परतयवोपक्षयात्‌। 
यथाग्नहोत्रादिविधिजनितामि- 
[3 (र 

होत्रादिकतग्यताबुद्धीनामतथा- 
¢ © 
थत्वमनुत्पन्नत्वं वा न राक्यते 
वक्त तदत्‌ । 

यक्तं सदात्मा सन्नात्मानं 


देहादिष्वासबुदि-कथं न्‌ जानीया- 


दिति, नासौ 
दोषः; का्यकर्‌- 
णसङ्कातव्यतिरिक्तोऽहं जीवः 
क्ता भोक्तेत्यपि स्वभावतः 
प्राणिनां विज्ञानादरनाक्किु 
तस्य सदात्मविज्ञानम्‌ । कथ- 
` मेवं सदात्मविज्ञानम्‌ ए 
कथमेवं व्यतिरिक्तविज्ञा- 
नेऽति तेषां करैत्वादि. 
विच्चानं सम्भवति ! दृश्यते 


त्वान्न सदात्म- 


विज्ञानम्‌ 


छा्दोग्धोपनिष्‌ 


ऋ 8 96 < 9 4 9 > 9-88-2 >< 8 8 ऋ 


[ मध्याय ६ 
345 < त 


होत्रादिकत्त्यता बुद्धिका भथा 
( अग्निहोत्रपरक न होना ) भथवा 
नुरयन्नत्व ८ उतपन्न ही न दोना ) 
नही ऊहा जा सकता, उर प्रकार 
तु वह दैः इस प्रकार कहे जनि 
“मे सत्‌ दह रेसी भरमाणवाक्यजनित 
वुद्धि निदत्त नहीं की जा सकती 
ओर नयी काजा सकतादै 
कि वह उपपत्च दी नदी इ, 
क्योकि सम्पूणं उपनिप्रर्थोका 
पर्यवसान इसी अर्थम हुमा दै | 
ओर एे्षा जो कष्टा कि (सवष 
होनेपर भी वह अपनेको [ सद्रूप | 
क्यो न जानता सो यह दोषभी 
नहीं आ पकता; क्योकि स्वभावतः 
तो प्राणिर्योकी रे बुद्धि भी नदी 
देखी जाती कि ओँ देह ओर 
इन्दिर्योके संघातसे भिन्न कर्व 
भोक्ता जीव ह, फिर्‌ उन्दं सदाः 
बुद्धि नहोतो आश्चयं ही क्या 
है £ देसी अवस्थामें छन्दं सदाल- 
बुद्धि होगी भी केसे १ इस परकर 
जबतकं छन्द देदेन्दियादिष 
व्यतिरिक्त बुद्धि न हो तबतक 
कतृ तवादियुद्धिक्षा होना भी कैप 








वड १६] शाङ्करभाष्याथं ७०९ 
~ =< >< >< ¬< >8( >< >< ¬< >9 ~~ ८ ~ ~ -2( ~< ~: -5 ~: ~; ~; ~>: => ~8 


च्‌ । तदन्तस्यापि देदादिष्वा- | सम्भव हो सृता है जोर यदी बात 
देखी भी जाती है । इसी प्रकार उसे 
देहादिमे भालबुद्धि होनेके कारण 
जानम्‌ । तस्माद्विकारारृताधि- | सदालबुद्धि नही होती । अतः यहं 
मे- सिद्ध हुआ कि (तत्वमसि. यह्‌ 

वाक्य विक्ररखूप मिथ्या देहादिमें 
वेदं वाक्यं तसखमसीति सिद्ध- | अथिङ्ृत॒जीवात्मभावकी निदि 
भिति ॥ ३॥ करनेवाला ही है ॥ २॥ 

इतिच्छाष्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये 
षोडश खण्डभाष्यं सम्पणम्‌ ॥९६॥ 


त्मबुद्धित्वान्न स्यात्सदात्मवि- 


कृतजीवात्मविज्ञाननिवत॑क 


=-* © ‡१- 
इति श्रीगोविन्द्भगवत्पूज्यपादरिष्यस्य परमहंसपरित्राका चाय॑स्य 
भीशंकरभगवतः कतौ छान्दोग्योपनिषद्धि- 
वरणे षष्ठोऽध्यायः सम्पूण; ॥ & ॥ 


सततम अध्याय 


~° ए ठो 


थम्‌ कशह 


न= 0 ~ 


नारद्के प्रति प्नत्कुमारका उपदेश 


प्रमाथंत्वोपदेशभ्रधानपरः | भषानतया  परर्थतलम् 
श उपदेश करनेवाखा छठा सध्याय 
वक्यमाणग्रन्या-षृष्ठोऽध्यायः सदा- | सत्‌ (रह्म) ओर आताका एकत. 
सभभ्रवोजनम्‌ त्मेकतवनिर्णयपर- | निणंय करनेके कारण ही उपयोगी 
र्‌ र है । उमे सतसे निम्नतर विकार 
तयवोपयुक्तः, न स रूपः तच्वोका नर्द नहीं कि 
र्षणानि तच्वानि निदिष्टानी- | गया । भतः उन ॒नामादि तश 
श ; उनके द्वार 

त्यतस्तानि नामादीनि 0 ६ 
नि वीनि क्रमेण भी शालाचन्द्र दशंनके समान भूमा- 
दिश्य तद्दरारेणापि भूमाख्यं | संज्ञक निरतिशय तत्वका निर्देश 
निरतिशयं तवं निदेश्यामीति | करी -इस अभिभायते शरुत तौ 

सातं प्रपाठक आरम्भ कर 
शाखाचन्द्रदशं 

"रद नवदितीमं सततम | है | भथवा सतूसे निम्नतर तोका 
भपाठकमारभते । अनिदिष्टेषु हि | निर्देश न होनेपर भौर केवल 
सतो््वाक्तेषु सन्मात्र च नि- | सन्मात्का ही निरूपण कवा नान 
दिेन्यदप्यनिज्ञातं स्या ~ | किौको देसी मार्धा हो सकी 
त्‌ स्यादित्या- हैक अभी कुछ ओर भी अविज्ञात 
क कस्यनितसवातसा मा भूदि दै, वद नाश्य न_हो--श 


आशयसे शति उनका निर्देश करना 
ति वा तानि निदिदिक्षति। चाहती है । ८ 








शष्ड १] 


शाङरंभाष्याथं 


७११ 


0 ॐ 4 ॐ ॐ ॐ @ क ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ > ॐ ॐ ॐ > > क = 9 
अथवा सोपानारोहणवरस्यूला- | भथवा सौद्वियपर चद्रनेके समान 


दारभ्य शकं ब्रष्मतरं च बुद्धि- 
विषयं ज्ञापयित्वा तदतिरिक्ते 
स्वाराज्ये ऽभिषेक्ष्यामीति नामा- 
दीनि निर्दिदिक्षति । 

अथवा नामाद्युत्तरोत्तरविि- 
ष्टानि तत्वान्यतितरां च तेषा 
स्कृष्टतमं भूमार्यं तत्वमिति 
तत्सतुत्यथं नामादीनां क्रमेणो 
न्यासः । 


आख्यायिका तु प्रवि्या- 
सतुत्यथां । कथम्‌ १ नारदो 
आएल्यायिका- देवर्षिः कृतकतग्य- 
सवंविद्योऽपि स- 
क्प 


भ्रयोजनम्‌ 
जनात्मन्ञत्वाच्छुशोचैव 
` वक्तव्यमन्योऽल्पविजन्तुऱत- 
पुण्यातिकयोऽङ्ृवाथं इति । 
अथवा नान्यदात्मज्ञानान्नि- 
रतिशयश्रेयःसाधनमस्तीत्येतसर- 


दरश॑नाथं सनमारनारदाख्या- 


स्थूरसे भारम्भ करके बुद्धिके सुक्ष्म 
द्मौर सूष्ष्मतर विषयका न 
कराकर भधिकारीको उससे अति- 
रिक्त स्वाराज्मपर अभिषिक्त कगी- 
इस अभिपरायसे वह नामादिका निर्दे 
करना चाहती है । 

थवा नामादि उत्तरोत्तर विशिष्ट 
तत्त है; उन सबकी अपेक्षा 
मूमासंजञक तत्तव॒ अत्यन्त उक्ृष्ट 
है--इख प्रकार उसकी स्तुतिके 
स्यि नामादिका क्रमः उष्टेख 
किया गया है । 


यहाँ जो आख्यायिका है वह तो 
परा विदयाकी स्तुतिके स्यि है। 
किष प्रकार ? नो जपने सारे 
कर्तव्य पूणं कर चुके थे ओर स्वै 
विद्याप्षम्पन्न ये उन देवषिं नारदको 
भी अनामज्ञ॒होनेके कारण शोक 
हुआ ही, फिर जिसने अत्यन्त 
पुण्यसम्पादन नदी किया ओर जो 
अङ्कता्थं है रेसे किसी अन्य अल्पज्ञ 
जीवकी तो बातदहीक्या दहे? 

अथवा भ्मज्ञानसे बढ़कर ओर 
कोई कल्याणा साधन नहीं है-- ¦ 
यह्‌ * प्रदर्शित करनेके ल्यि 
सनत्कुमार - नारद - भख्यायिकाका 


७१९ छन्दोण्योपनिषवू [ जध्याव ७ 


~ ~ = = 
यिकारभ्यते, येन ॒दवेदिज्ञान- ¡ आरम्भ किया जाता है, जिघरसे 
साधनशक्तिसम्पननस्यापि नार- र ४. ग 
स्क रक्तिसे सम्पन्न होनेपर 
दस्य देवषैः श्वेयो न भूव छ ९ 
4. नारद्का कल्याण नहँ इभा, इससे 
येनोत्तमामिजनमिदयाडृत्साधन- | वे रतम कुरः, विचा, आचार धौर 
रक्तिसम्पत्तिनिमित्ताभिमानं हि- | नाना प्रकारके साने सामरथ. 
त्रा प्राृतपुरूषवत्सनल्मार- | स्प सम्पत्तिसे होनेवाटे अमिमान- 


~ को त्यागकर श्रेयःसाधनष्ी प्राक 
युपससाद भ्रेयःसाधनप्राघ्तये- 
८ क ~ | ल्यि एक साधारण पुरक समान 
ऽतः प्रख्यापितं भवति निर 


£ सनलछुमारजीके समीप गये । इससे 
वि्रयभ्राहषिसताधनखमात्मवि- श्रयःप्राधिमे आसविधाक्ा निरतिश्चय 


चाया इति । साधनख सूचित होता है | 

ॐ अधीहि भगव इति होपससाद सनलछमार 
नारदस्तरहोवाच यद्वेत्थ तेन नोपसीदं ततस्त ऊर्व 
वक्ष्यामीति सं होवाच ॥ १ ॥ 

“ हे भगवन्‌ | सुसञे उपदेश कीजियेः रसा कहते हुए नारदनी 
सनदभर नीके पास गये । उनसे सनुमारजीने कडा तुम बो कु 


जानते हो उसे बतराते हुए भेरे पास उपदेश लेनेके ल्य आथो; त 
म तमहं उससे आगे बतला? ठव नारदने कहा-॥ १ ॥ 


अधीदधीप्व भगवो मगवमि- हे भगवन्‌ | शृ ह 
तिह किलो ? रद 
ति ह किलोपससाद्‌ । कराये एसा कहते इए न 

द। अधीहि ब्रह्मनिष्ठ योगीश्वर सनक्कुमारके ति 
भगव इति मन्व; । सनलडुमारं | उपसन् इए शरथात्‌ [ शिष्यरूपते ] 
योगीश्वरं बहिष्ठं नारद्‌ उपस्‌- | उनके समीप गये । अधीहि मगव्‌! 


। यह उपसपतिका मन्त्र दै । 
नवाच्‌ । वं न्यायत उपसनने । प्रति नियमानुार उपसनन हुए अनं 








` शण्ड १) शाद्ुरमाव्या्थ ७१३ 
क 4 9 ॐ > क ॐ क ॐ > = = ॐ = = > ॐ क ॐ 4 
होवाच यदात्मविषये किश्चिदरेत्थ | नारदनीसे सनतकुमारजीने कदा- 
सतुम आसमाके विषयमे जो कुछ 
तेन तत्प्रख्यापनेन मा्ुपसीदे- | जानते हो उसे बतलते हुए अर्थात्‌ 
ठेस प्रकट करते हुए मेरे पांस 
दमहं जान इति, ततोऽहं मवतो | उपदेश ठेनेके स्यि भाथो; मँ यह 
जानता है तव॒ ठम्हं द्दारे 
वि्ञानात्ते तुभ्यभूभ्वं वक्ष्यामि, इ जञानसे भगे उपदेश कर्गा । 
सनत्कुमारजीके रेस कहनेपर 
त्युक्तवति स होवाच नारदः | १। नारदी बोटे ॥ १ ॥ 
ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुवद श्सामवेदमाथर्वणं 
चतुथमितिहदासयुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्यश्राि 
दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां बह्मवि्यां 
भूतवि्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रवियाससर्पदेवजनविव्यामेत- 
दगवोऽष्येमि ॥ २ ॥ 

“भगवन्‌ | सुञ्ञे ऋगवेद, यजुवद, सामवेद जर चौथा अथववेद 
याद्‌ है, [ इनके सिवा ] इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद, वेदोका वेद 
( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातान, निधिरशाख, तकंशाख, 
नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविया, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविधा, सपेविद्या 
८ गारुड मन्त्र ) जर देवननविदया-द्प्य-संगीत आदि--हे भगवन्‌ | 
यह सब मँ जानता है ॥ २॥ 
ऋग्वेदं मगवोऽष्येमि स्मरामि | हे भगवन्‌ | मे छग्ेदका अध्ययन 

कर चुका है अर्थात्‌ मुस ऋगवेद 
यद्वेस्थेति विज्ञानस्य पष्टत्वात्‌ । | स्मरण है [ यहाँ अध्ययनवाचक 
पदका स्मरण अथं क्यों किया गया 
तथा यजुर्वेदं साम्रवेदमाथवंणं । उत्तर-- | कर्योफि धद्वेसथ' एसा 
कहकर विज्ञानके विषयमे प्ररन 
चतुथं वेदं वेदशब्दस्य प्रकृतत्वा- | करिया गया दै । तथा यजुवद 


७१७ 


छान्दोण्योयनिवदं 


॥ अष्वाष ७ 


ह 3 9 9 4 9 9 9 9 2 क - ॐ 4 


दिविहासपुराणं प्श्वमं वेदं 
वेदानां भारतपश्वभानां वेदं 
न्याकरणमित्यर्थः । भ्याकरणेन 
हि पदादिविभागश ऋछण्वेदा- 
` दयो ज्ञायन्ते; प्न्य श्राद््‌- 
कल्पम्‌; रिं गणितगर्‌; देव- 
शत्यातजञानम्‌; निधि महाकाल 
दिनिधिसाखम्‌; वाकोवाच्वं- 
तकशाखम्‌; एकायनं नीति- 
शाखम्‌; देवविद्यां निरुक्तम्‌; 
ब्रह्मण छग्यजुःसामाख्यस्य 
विद्यां बरह्मविदां शिक्षादल्प- 
च्छन्द्शितयः; भूतविद्यां भूत- 
तन्त्रम्‌; कत्रविद्यां धलुर्ेदम्‌; 
नक्षत्रविद्या उयोतिषम्‌; सप॑देव- 
जनविद्यां सप॑विधां गारुं 
देवजनविद्यां गन्धयुक्तिनृत्य- 
गीतवाद्यशिल्पादिविज्ञानानि । 
एतस्सवं हे मागबोऽ्ष्येमि ॥२॥ 


~+ 
1 


=> 
सामधेद्‌ जीर चौथा आथर्वण देद 
जानता दह, शद्‌" शब्द्‌ प्रसत; 
पात होनेके कारण इतिहाद्मपुराण- 
रूप पंचव वेद, महामारतसहित 
पाचों वे्दोका वेद्‌ अर्थात्‌ व्याक- 
रण--क्योकि व्याकरणके द्वार 
ही पदादिके विभागपूवक शचुमे- 
दादिका ज्ञान होता है, प्ि- 
श्राद्धकस्प, राक्ि-गणित, दैव-- 
उत्पातज्ञान, निधि-महाकालदि- 
निधिराल्, वाकोवाक्य- तकंशान्, 
एकायन-नीतिश्ाख, देवविा- 
निरुक्त, त्रस्मवि्या- तर॒भर्थत्‌ 
क्यजुःसामसंक्षक वेर्दो्ठी विधा 
यानी रिक्षा, कल्प, छन्द भौर 
चिति, मूतवि्या-मूतशाख, क्षत 
विद्या- धनुर्वेद, नक्षत्रवि्या-- 
ज्योतिष, सर्पदेवजनविद्या अर्थ्‌ 
सप॑विधा-- गारुड ओर देवनन- 
विद्या--गन्धयुक्ति तथा नृत्य, गात्‌, 
वाय जोर रिल्पादिविज्ञान-ये सब 
हे भगवन्‌ | म जानता ह ॥२॥ 


सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविचछतः 


शेव मे भगवदूटशोभ्यस्तरति 


शोकमारमविदिति सोऽदं 








कण्ट १ ] 


लाद्रमास्वाशं 


७१५ 


9 9 9 1 9 9 9 5 5 > 5 5 5. > क 4 
भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य पारं तारयति 
तश्होवाच यद्रे किथैतदष्यगीष्ठा नामेवेतत्‌ ॥ ३ ॥ 
हे भगवन्‌ | वह मँ केवङ मन्त्वे्ता ही ह, आत्वेत्ता नहीं है । 
ने जाप-जैसोपि घना दै कि आातमवेत्ता शोकको पार कर लेता दै, जर 
हे भगवन्‌ ! मेँ शोफ करता हँ; पेसे सु्लको हे भगवन्‌ | शोकसे पार 
छर दीजिये । तव सनत्कुमारने उनसे कहा--तुम यह जो कुछ जानते 


हो वह नामी दैः ॥ ३॥ 

सोऽहं मगव एतस्सवं जान- 
नपि मन््विदेवास्मि शब्दार्थ- 
मात्रविज्ञानवानेवास्मीत्यथंः । 
सर्वो हि शब्दोऽभिधानमात्र- 
मभिधानं च सवं भन््रेष्वन्त- 
वति । मन्त्रविदेवास्मि मन्र- 
वित्कमंविदित्यथः । भन्त्रषु 
कर्माणि" इति हि वक्ष्यति; 
नात्मानं वेध । 

नन्वात्मापिं मन्त्रैः प्रकारयत 
एवेति कथं मन्तरविच्चेन्नात- 
वित्‌ । 

, न; अभिधानाभिघेयमेदस्य 


विकारत्वात्‌ । न च विकार आ- 


हे मगवन्‌ | वह मँ यह सब 
जानते इए भी केवर मन्त्रवेत्ता ही 
ह अर्थात्‌ केवर शब्दाथंमात्र जानने- 
वाख ह कर्याकिं सारे शब्द्‌ 
छमिषानमान्न है गोर सम्पूणं 
अभिधान मन्त्रके अन्तगंत है । भँ 
मन्त्रवित्‌ ही है, मन्त्रवित्‌ अर्थात्‌ 
कमेवित्‌, क्योकि मन्त्रम कमं 
[ एकरूप होते हैँ ] रेखा आगे 
(खं ४मं० शमे) करेगे । 
भ भात्माको नहीं जानता । 
शङ्खा-कितु आत्मा भीतो 
मन्त्रदरारा प्रकराित होता ही है; 
फिर नारदजी मन्त्रवित्‌ होनेपर भी 
आत्मवता क्यो नदीं है ? 


समाधान-फेसी बाव नदीं दै, 
क्योकि नाम-नामीरूप जो मेद है, 
वहतो विकार दै भौर विकारः 


७१६ 


छाम्डौग्योपनिखल्‌ 


[ खनष्याच ७ 


>^ ¬ ~ ८ 1 2 9 >> + 45 
समेष्यते । नन्वासाप्यालमशब्दे- | मासा माना नहीं नाता । यदि 


नाभिधीयते; न, “यतो वाचो 


कहो कि अत्मा भीतो आतमा 
रब्दसे कहा ही नाता है तो रेषा 


टपु | ८८-- 
निवर्तन्ते, ( तै उ० २ | | कहना ठीक नही, कयो “हति 


४।१ ) | “यत्र नान्यस्परयति" 


( जछ० उ० ७।२४। १) 
इत्यादिश्रुतेः । 

कथं तर्यारमेवाधस्तास्स आस्मे- 
त्यादिश्बब्दा आमानं प्रतया- 


ययन्ति । 
नेष दोषः; देहवति प्रत्यगा- 


अनात्मवावात्‌ त्मनि मेदविषये 


सदात्म्त्यय प्रयुज्यमानः शब्दो 
देहादीनामात्मत्वे प्रत्याख्याय- 


माने पत्परिशिष्टं सदवाच्यमपि 


वाणी कौट आती है" “नहँ को$ 
ओर नहीं देखता” इत्यादि श्रुतिस 
[ उसका रशब्दवच्यन होनादही 
सिद्ध होता है ] । 

शङ्ा-तो फिर “आसा दी 
नीचे है" “वह्‌ भतम दै" इत्यादि 
राव्द किस प्रकार आस्माकी प्रतीति 
करति है 

समाधान-यह कोद दोष नहीं 
है । भेदके विषयभूत देहधारी 
परत्यगासामे प्रयोग क्या हज 
[ 'भास्ा--यह ] शब्द, देहादि- 
का आत्मत निरस्त हो जनिषर 
जो सन्मात्र अवरिष्ट रहता दै 
उसे- बयपि वह [ मुष्यदृततसे 
किसी शब्दका ] वाच्य नहीं है तो 
भी-[ लक्षणात्ने ] उसकी प्रतीति 


भत्याययति । यथा सराजिकायां | करा देत दै, जि मकार रनक 


दृश्यमानायां सेनायां छत्रष्वज- 
पताकादिव्यबहितेऽदृरयमानेऽपि 


राजन्येष राजा दृरयत इति भवति 
शब्द्रयोगस्तत्र कोऽसौ राजेति 








सदित दिखायी देती इई सेनाम 
छत्र, ध्वजा लोर पताका आदी 


| जोट राजाके दिखायी न देनेषर 


भी थे राजा दिखायी देते दै पषा 
भवोग होता दै, फिर रेया भरदन हीने. 
पर कि इनमें राजा कोन दहै ¢ राजा 











खब्ड १] शाङ्करभाष्यं ७१७ 
> ल ~ ~ ८ ल - 


शजविशेषनिरूपणायां दुश्यमाने- | कदलनेवाले विशेष व्यक्तिका 
निषूपण करनेपर अन्य दर्यमान 


तखरत्याख्यातेऽन्यस्मिन्नदृश्यमा- |पुरपोका परवयाख्यान करके उनसे 

„ | भिन्न रानाके साक्षात्‌ दिखायी न 

नेऽपि राजनि राजग्रतीतिभवे- देनेपर्‌ भी रानाकी प्रतोति हो 

जाती है उसी प्रकार [ भनातमाकषा 

तदत्‌ । वाध करके आत्माकौी प्रतीति 
तस्मात्सोऽहं मन्ववित्करमवि- | दोती हे ]। 


च अतः [ नारदनौ कहते दै-- ] 
देवास्मि कमंकायं च सव विकार वह म मन्तवे अर्थात्‌ कर्मवेता 


इति बिकारज्त एवास्मि नात्म- | ही ह कमका कांही सारा 
बि्ातगरृतिसरूपक इत्यर्थः । | विर है; अतः मै विकसक ही 


--आत्मनज्ञ अर्थात्‌ आ्माहूप 
अत॒ एवोक्तम्‌ (“आचार्- | £ ` मालक जव जला 
प्रकृति ८ कारण ) के स्वषूपकरो 


वान्पुरुषो वेद” (खछा०° उ० & | | 1 | 
१४ । २) इति । “यतो वाचो | है करि “आचार्यवान्‌ पुरूष 
निवर्तन्ते (तै उ० २।४। | [ आत्मको ] जानता दै” ओर 
| यही गात (जहासि वाणी डोर 
१) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च | | आती है" इत्यादि श्रुतिर्योसे भी 


भ्रतमागमज्ञानमस्त्येव दहि | भरमाणित दती हे। 
1 क्योकि भने आप-जनैतोसे घना 


यस्मान्मे मम भगवद्दृशेभ्यो ह चपा शालय लन हैक 
युष्मत्सदृशेसयस्तरत्यतिक्रामति | “आसवेत्ता शोक -- मानसिक ताप 


कोक मनस्तापमह्तार्थबुद्धिता- । अर्थात्‌ अ्ृताथताबुद्धिको तर जाता 
| है-पार कर लेता हे" लर दहे 
भगवन्‌ | मे अनातमज्ञ होनेके कारण 
विर्वा मगवः शोचाभ्यद्ता्थ- ¦ सोक करता द अर्थात्‌ अहृताः 





मात्मविदित्यतः सोऽहमनास्म- 


७१८ 


छान्दोग्योपनिष्‌ 


[ ण्याय ७ 


>~ 9 6 3 ~ 8 ~ ~~ > > >8 ~~ ~ ऋऋ > 


बुद्धय संतप्य सव॑दातं मामां 
ज्ोकसागरस्य पारमन्तं भगवां- 


स्तारयत्वातमत्तानोडुपेन कृतार्थ 
बद्धिमापादयत्रभयं गमयलि- 
त्यथः । 
७ = 
तमेवुक्तवन्तं होवाच यै 
किशवेतदध्यगीष्टा जधीतवानसि, 
© 
अध्ययनेन तदथज्ञानुपरु्यते, 
क्ञानवानसीत्येतन्नामेवैतत्‌ । 
“वाचारम्भणं विकारो नाम- 
धेयम्‌! (छा० उ० ६।१।४) 
इति श्रुतेः ॥ २ ॥ 


द्धिसे सवेदा संत रहता ह| 
उसे सुक्षको दे मगवन्‌ | आसनान्‌ 
रूपी नौकाके द्वारा शोकागरके 
पार--परे पर्हैवा दो- मुर 
इताथतुद्धि प्रा शरा दो भरत्‌ 
अभयको प्राप्त करा दो | 

स प्रकार कहते हुए उन 
( नारदनी ) से सनछुमारजीने 
कदा--तुमने यह जो कु 
अध्ययन किय है- अध्ययने 
उदके भका ज्ञान भी उपलक्षित 
होता है--[ जतः तार्यं यह है 
कि] तुम जो कुछ जानते हो वह 
सव नामही है; क्योकि “विकार 


वाणोपर भवरम्बित केवर नाम- 


मात्र हे" एसी श्रुति है ॥ ३॥ 


नाम वा ऋग्वेदो यजुद्‌ः सामवेद आथवंण- 
श्तु इतिहासपुराणः पथमो वेदानां वेदः पित्रियो 
रारिदेवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या बह्मविदया 


क . 
भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या 
नामेवेतन्नामोपास्स्वेति ॥ ¢ ॥ 


ऋग्वेद नाम है तथा 
पाँचवाँ वेद इतिहास- 
गणित, उतपातन्ञान, 


यजुवद, सामवेद, चौथा भाथरवण वेह, 

पराण, वे्दोक्षा वेद॒ ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, 
४ वेदविषा 

निधिान, तकशाखच, नीरिशाल, निरुक्त, वेदविघा) 





खब्ड १ ] शाङ्स्भाष्याथे ७१९ 
>< ¬: 8 9 अ ~ 8-8-47 9 9-9-8८ ८-9८-9 


मूतविद्या, धनुवद, ज्योतिष, गारुढ, संगीतादिकला ओर शिस्पविधा-- 
ये सब भीनाम ही दै तुम नामकी उपासना करो ॥ ४॥ 


नाम वा छण्वेदो यजुर्वेद | ण्वेद नाम ही दै, तथा 


इत्यादि नामैतत्‌ । नामोपास्सर | यज्व इयादि ये सव भी नाम 
ही है । खतः निस प्रकार विष्णु 


बरहयेति व्रहमबुद्धया । यथा | वुद्धिसे प्रतिमाकी उपासना करते 
श है उसी प्रकार तुम नामकी धह 
प्रतिमां विष्णुबुद्धयोपास्ते | ब्रह दै" रखी ्हबुद्धिसे उपा्तना 


तदत्‌ ॥ ४ ॥ करो ॥ ४॥ 


नगद - 


स यो नाम ब्रह्मेद्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं 
तक्रस्य कामचारो भवति यो नाम ब्रह्मद्युपा- 
स्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो वाव 
भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्बवीखिति ॥ ५ ॥ 


वह जो कि नामको “यह रहन है' एेसी उपासना करता है उसकी 
जहोंतक नामकी गति होती है वरहतक यथेच्छ गति हो नाती है, जो 
कि नामी यह्‌ ब्रहम है रेसी उपा्ना करता दहै । [ नारद-- ] 
“भगवन्‌ | क्या नामसे भी अधिक कुछ है ¢ [ सनत्कुमार-- ] नाम्ने 
मी भमिक दै ।› [ नारद-- ] 'तो भगवन्‌ | य॒सने बहौ बतङवे' ॥५॥ 


वह जो कि "नाम ऋ दहै" एेसी 
उपासना फरता है उसे जो फर 


यत्फलं मवति तच्छृणु, -या- । मिरुता दै वह सुनो जहतक 


स यस्तु नाम ब्रह्मेत्युपास्त तस्य 





७२० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ मण्याय ५ 


ऋ ड 2 -ए- 6 > 5666 
वन्नाम्नो गतं नाम्नो गोचरं तत्र | नामकी गति अर्थात्‌ नामका विषय 


होता दै वर्होतक उत नाम 
विषयमे इसका कामचार- च्छा. 
चरणहो जाता दै, जैसा $ि 
राजाके अपने विषय ( अधिकृत 
स्वविषयं मवति । यो नाम ब्रह्म । देश ) मे, जो नाम ब्रह ह पौ 
व उपासना करता है - यह उपसंहार 

त्युपास्त इत्युपसंहारः । किमस्ति द । [नारद्‌--] “भगवन्‌ | का 
नामसे बदठ़कर भी कुछ है ! अर्थात्‌ 
जो ब्रहमद्टिके योग्य हो पेषी कोर 
अहादृ्टयहमन्यदिस्यमिप्रायः । | ओर व्स्तु भी है-एसा इसका 
द | अभिप्राय है ¢ सनक्कुमारने कदा- 
सनत्छुमार आह नाम्नो बाव | 'नामसे बद़रकर भीदहै दी । इस 
भूयोऽस्स्येवे्युक्त आह यद्यस्ति | भकार कटे जानेपर नारदने कश- 


ह यदि है तो भगवन्‌ | सुञ्च बही 
तन्म भगवान्त्रवीत्विति ॥ ५ ।। | बते ॥ ५ ॥ 


तस्मिन्नामविषयेऽस्य यथाकाम- 


चारः कामचरणं राज्ञ॒ इव 


भगवो नाम्नो भूयोऽधिकतरं यद्‌- 


[णी 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सत्तमाध्याये 


भथमस्ण्डमःष्यं सम्पणेम्‌ ॥ १ ॥ 


(> 3 








(3 _ शकर ५८ 
ित्फयः खण्ड 


नामकी अपेक्षा वाककरी महता 
वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋ्ेदं विज्ञापयति 
यजुर्वेद <सामवेद्‌माथवणं चतु्ैमितिहासपुराणं पश्च 
वेदानां वेदं पिन्रयश्राश्ि देवं निधि वाकोवाक्यमेकायनं 
देवविद्या ्रह्मवियां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रवियारस- 
पदेवजनवि्यां दिवं च एथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च 
तेजश्च देवाईश्च मनुष्याश्च परश वारसि च तृण- 
वनस्पतीञशछापद्‌न्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्म चाधर्मं 
च सत्यं चानृतं च साघु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं 
च यद्व वाडूनाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो भ्यज्ञापयिष्यन्न 
सत्यं नाच्रतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञी नाह दयनज्ञो 
वागेवेतत्सव विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ 
वाक्‌ ही नामसे बढ़कर है; वाक्‌ ही चछग्ेदको विज्ञापित करती 
दे तथा यजुवद, सामवेद, चतुर्थं आथव॑ण वेद, पञ्चम वेद्‌ इतिहास 
पुराण, वेदों के वेद्‌ व््रकरण, श्रद्धकरद्प, गणित, उत्पाता, निधिज्ञान, 
तकंशास्ल, नीति, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविधा, नुवद, ज्योतिष्‌, गार्ड, 
संगीतशास, चुरोक, प्रथिवी, वायु, आकाश, जर, तेज, देव, मनुष्य, 
पञ्यु, पक्षी, तृण-वनस्पति, श्वापद ( हिल् जन्तु) कीट-पतंग, 
पिपीरिकापर्यन्त प्राणी, धरम ओर अधर्म सद्य ओर असल, साघु ओर 
असाधु, मनोज्ञ ओर अमनोज्ञ जो कुछ भी है [ उसे वाक्‌ ही विज्ञापित 
करती है ]। यदि वाणीनहोतीतो न घमा जर न अधम्काही 
ज्ञान होता; तथा न स्त्य, न॒ असत्य, न साधु, न भसताघ, न मनोद्ग 





७२२ 


छान्दोग्योवनिषल्‌ 


[ अष्याय ७ 


9 6 > कः 88 > 380 8 -3-ध----- = 
र न अमनोज्ञका ही ज्ञन हो सकता । वाणी ही इन सबका ज्ञान 
कराती है; अतः तुम वाक्करौ उपासना करो ॥ १ ॥ 


वाग्वाव । वागितीन्द्रियं निहा 
मूलादिष्वष्टसु स्थानेषु स्थितं 
वर्णानामभिव्यञ्चकम्‌ । वर्णाश्च 
नामेति नाम्नो वाग्भूयसीसयु- 
च्यते । कायाद्धि कारणं दृष्टं 


रोके यथा पुत्रासिपिता तदत्‌ । 
कथं च वाड्नाम्नो भूयसी ! 


इत्याह-- वाग्वा छणवेदं विज्ञाप- 
यत्ययमूृग्वेद्‌ इति । तथा यजुर्वे- 
दमित्यादि समानम्‌ । हृदयज्ञं 
हृदयप्रियम्‌ । तद्विपरीतमहृदय- 
स्म्‌ । यद्यदि बाद्नाभविष्यद््‌- 
मौदि न व्यक्तापयिष्यदरागभावे- 


ऽ्ययनाभाबोऽष्ययनाभावि तदर्थ 
_भवणामावस्तच्छवणामावे । 


ॐ आदि त= य्ह वक्षःस्थ 


वाग्बावः-- वाक्‌ यह जिहामूर 
आदि भाट स्थानें स्थिते वर्णो 
को अभिव्यक्त करनेवाली इन्दि 
है। वर्ण॑दह्वी नाम है, इसीसे यह 
कहा जाता है कि नामसे वाक्‌ 
उल्ृष्ट दहे । जिस प्रकार पुत्रे 
पिता उक्ृष्ट होता है उसी प्रकर 
रोके काय॑से ही कारणकी उर- 
टता देखी जाती है । 

नामको अपेक्षा वाक्‌ क्यों उक्ष 
है सो बताते वाक्‌ दी 
ऋ गवेद्‌को “यह च्छभवेद है इस प्रकार 
विज्ञापित करती है । इसी प्रकार 


¦ यनुद इत्यादिको भी-ये सब 


पूर्ववत्‌ समश्चने चाहिये । तथा 
हृदयक्ञ--हृदयको प्रिय ओर उससे 
विपरीत अहृदगक्ञको भी [ वाक्‌ ही 
विज्ञापित करती दहै ]। यदि वक्‌ 
नहोती तो धर्मादि विज्ञापित त 
होते । वाक्के अमावर्म अध्ययनका 
अभाव हो जाता, भध्ययनके 
अभावे उसके अर्थश्रवणकरा 
अभाव होता जौर उसके भवणके 
अमवमे धर्मादिक्का विद्वान न्‌ 


ठक, कण्ठ दन्त जर 
तादु-- दन सात स्यानका ग्रहण ह मूषा, दन्त, गोष्ट, नासिका 


ही 


खण्ड 2 ] शाह्रमाच्याथे ७२३ 
>< ८ 39८ 9८ 8८9८ 999८ 9८ ¬ >~ 8८ 9८ 8८ 9८ ¬ 8८ 9८ 6८.9८ 28८ ऋ ~ 


न॒ व्यज्ञापयिष्यन्न विज्ञा- | होता अर्थात्‌ धर्मादि विज्ञात न 
तममविष्यदित्यर्थः । तस्माद्रागे- होते । घतः १ | 
९ वाक ही इन सबको विश्चापितक 

वैतच्छन्दोच्चारणेन ५ 
वैतच्छब्दोच्चारणेन सव विज्ञाप 1 ब 
यत्यतो भूयसी बाड्नाम्नस्तस्मा| अतः तुम वाणीको धह ब्रहम है, 


दाचं ब्रह्मत्युपास्स्व ॥ १ ॥ | इस प्रकार उपासना करो ॥ १ ॥ 


~; ० {-- 


सं यो वाचं ब्रहमस्यु पास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य 
यथाकामचारो भवति थो वाचं ब्रमस्युपास्तेऽस्ति 
भगवो वाचो भूय इति वाचो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे 
भगवान्त्रवीविति ॥ २॥ 


वह नो वाणीकी प्य ब्रह्म है" इस प्रकार उपासना करता दै 
उसकी जहोंतक वाणीकी गति हे वर्तकं स्वेच्छागति हो जाती है, जो 
कि वाणीकी यह ब्रह द" इस प्रकार उपासना करता हे । [ नारद- ] 
भगवन्‌ | क्या वाणीसे भी बढ़कर कुछ है ® [सनक्कुमार -] 'वाणीसे 
भी बढ़कर है ही! [ नारद्‌-- ] भगवन्‌ | वह मुञ्चे बताइये ॥२॥ 


समानमन्यत्‌ ॥ २ ॥ । शेष ्य्रख्या पूववत्‌ है ॥ २ ॥ 


-श््कन्व--- 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि सषमाभ्राये 
दवितीयक्षण्डभाष्यं सम्पुणेम्‌ ॥ ॥ 


कुत्णीयः रुह 


--: ० :- 


वाक्‌ अवेक्षा मनकी श्रेष्ठता 
मनो वाव वाचो भूयो यथा वे दवे वामलके 
वा कोठे दवो वाक्षौ सुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम्‌ च 
मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेः 
स्यथाधीते कर्माणि ढुर्वयित्यथ ङसते पुजार परश 
च्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेस्ययेच्छतेमनेो 


ह्यासमा मनो हि रोको मनो हि बह्म मन उपास्स्वेति ॥१॥ | 


मन ही वाणीसे उ्कृष्ट है । जिन्त प्रकार दो ओंवे, दो वेर अथव 
दो बेढे युद्ीमे आनजाते है उही प्रकार वाक्‌ जौर नामकषा मनर 
अन्तभवि हो नता हे । यह पुरुष निस समथ मनते विचार करता दै 
कि मन्न्नका पाठ कष" तभी पाठ करता ह, जिस समय सोचता दै 
काम करं' तभी काम कता हे, नव विचारता दै शत्र जर पदर 
इच्छा करू" तभी उनकी इच्छा करता है ओर जव देसा संकल्प कता 
है कि “इस लोक घौर परडोककी कामना क" तभी उनकी कामन 
क्ता है । मन दी जासमा है, मन ही कोक है ओर मनी बह्म 
एम मनक्षी उपासना करो ॥ १ ॥ 
मनो मनस्यनविशिषटमन्तः- | मन मननशक्तिवििष्ट न 
करणं वाचो भूयः । तद्धि मन- | कष्ण वाणीसे उक्ष दै 8 
स्यनव्यापायद्राचं वक्तव्ये परर्‌- | मनगव्यापारयक्त मन दी वा 1 


2 । 
वत्तव्य विषयं परसि करता दै 
यति। तेन वाङ्मनस्यन्तर्मवति । 


~ न्त ( 
यच ॒वास्मनन्तभवति तत्तस्य | नो निके अन्तर्गत होता £ 


अतः वाक्‌ मनके अन्तगेत दै, ओह , 


खण्ड ३] शाङ्र्भाष्यार्थे ७२५ ` 
> > > 33८ ¬< >< > ऋ ~अ ~< ~ >: 4 ~: ~ ~ ~ ~: ८ ~; ~: ८ आः ~अ ~ 


व्यापकत्वात्ततो भूयो भवति । 
यथा बै कोके दे वामरुके 
फले दे वा कोरे वद्रफले ढौ 
वाक्षौ निभीतङ्फरे ुष्टिरनु- 
भवति युष्टिस्ते एर व्याप्नोति 
रौ हि ते अन्तर्भवतः। एवं 
वाचं च नाम चामरूकादिव- 
न्मनोऽलुभवति । । 

स यदा पुरुषो यस्मिन्काले 


मनसान्तःकरणेन मनस्यति 
मनस्यनं विवक्षाबुद्धिः कथम्‌ १ 
मन्त्रानधीयीयोच्वारयेयमिः्येवं वि 
वक्षां कृत्वाथाधीते तथा कर्माणि 
इवींयेति चिकीषपाबुद्विं ॐ 
त्वाय कुरूते पुत्रां परेच्छे- 
येति प्रापीच्छां इत्वा तस्रा- 
स्त्युपायादुष्ठानेनाथेच्छते पुत्रा- 
दीन्प्रामोतीत्यथंः । तथेमं च 
लोकमय चोपायेनेच्छेयंति 


उसकी अपेक्षा वह न्यापक होनेके 
कारण, बहा होता है। रोक 
जिस प्रकार दो भँवर; दो कोले- 
बेर अथवा दो भक्षो - बहेडधेके फलो - 
को मुटी अनुभव करती है-उन 
फलौको सुट्‌ूटी व्याप्त कर ठेती है 
अर्थात्‌ वे मुटठीके अन्तगंत हो जति 
है, उसी प्रकार उन ओंवटे भादिके 
समान वाणी ओर नाम--इन 
दोनोंको मन नुमव करता है । 

` वह्‌ (यह) पुरुष जब--जिस समय 
मन-अन्त्‌ःकरणसे मन्यन ८ कुछ 
कनेक इच्छा ) करता है, मनस्यन- 
का जथं है विवक्षा-बुद्धि (कुछ कहनेकी 
इच्छा मा विचार) किञ्च प्रकार ? 
यह बताते है-भे मरनत्रोका पाट- 
उच्चारण कर; ईस प्रकार बोरने- 
की इच्छा करके वह पाठ करता है; 
“म कमं करू” एसी चिकीर्षनुद्धि 
करके कम करता है; तथा ^ पत्र 
ओर पश्चुभोंकी इच्छा करू” इस प्रकार 
उनक प्रा्तिकी इच्छा करके उनकी 
पराप्तिके उपायका अनुष्ठान कर्‌ उनकी 
इच्छा करता है अर्थात्‌ उन पुत्रा- 
दिको प्राप्त कर ठता है। इषो 
प्रकार भ इस रो$ ओर पररोक- 
को उपायद्रारा [ प्राक्त करना] 








७१६ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ भष्याय 
>94 > ड 8 >< < ~ -8 9 -9- >9 8-89-3. 25 8: 8-98-84 > 
तत्रप्तयुपायालुषठानेनायेच्छते | वाह" रेसे संकरपूरवक उन्न 
म्रा्तिके उपायद्वारा न्ह चाहता 
प्राप्नोति । अर्थात्‌ पराप्त कर लेता ह | 


मनो द्यात्मात्मनः क्त्वं 
भोक्ठृत्वं च सति मनसि 
नान्यथेति मनो द्यात्मेत्युच्यते । 
मनो हि लोकः सत्येव हि 
मनसि लोको भवति तस््ाप्त्यु- 
पायानुष्टानं चेति मनो हि 
लोको यस्मात्तस्मान्मनो दहि 


लह्य । यत॒ एवं तस्मान्मन 
उपास्स्वेति ॥ १ ॥ 


मन दही भात्मा है; क्योफि मनक 
रहनेपर दौ आत्माका क्ल. 
भोक्तृत्व सिद्ध होता है, अन्यधा 
नही; इसीसे भमन दही मासादै' 
फसा कहा जाता ै । मन ष्टी रेक 
है; क्योकि मनक रहनेपर ही लोक 
जीर उसकी परापिके उपायङ्रा भनु- 
ठान होता है । इस प्रकार क्योकि 
मन दही डोक है, इसलियि मन दी 
जहम है । क्योकि एेा है ईसि 
मनकी उपासना करो ॥१॥ 


स यो मनो ब्रह्मस्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्रास्य 
यथाकामचारो भवति यो मनो बरहमस्युपास्तेऽस्ति 
भगवो मनसो मूय इति मनसो वाव भूयोऽस्तीति तनम 
भगवान्‌ तरवीखिति ॥ २ ॥ 


वह जो किं मनकी यह ब्रह है" इ प्रकार उपाघना कता ट 
उसको जहांतक मनकी गति है वहोतकं स्वेच्छागति हो जाती है, 
मनकी “वंह ब्रह दै' देसी उपासना. करता दै । [ नारद-- ] "भगव, 
क्या मनसे भी बदृकर्‌ कोई है ? [सनत्कुमार] "मनसे बदक 
ही ॥ [ नारद-- ] “भगवन्‌ । मेरे प्रति उसौकना वर्णन करं! ॥ २॥ 

सयो मन इत्यादि स- | द यो मनः इत्यादि म 
मानम्‌ ॥ २॥ भथ पूववत्‌ दै ॥ २ ॥ 


हि --*- 
६।तच्छान्दोग्योपनिषदि सततमाष्याये 
दतायस्षण्डमाप्यं सम्पूणेम्‌ ॥ ३ ॥ 


७ 
चक्ुथे सवश 
मनते संकल्यकी श्रेष्ठता 
संकल्पो वाव मनसो भूयान्यदा वे संकटपयतेऽथ 
मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि 
मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥ 


संकल्प ही मनसे बढ़कर ह । निस समय पुरूष संकरप करता हे 

तभी बह मन्यन ८ बोरनेकी इच्छा ) करता है ओर फिर वाणी 
परित करता  । वह उसे नामके प्रति प्रवृत्त करता दै; नाममे सब मन्त्र 
एकरूप हो जाते है जीर मन्त्रम कर्मोका अन्धर्माव हो जाता दै ॥१॥ 
संकल्पो वाव मनसो भूयान्‌ । | संक ही मनते वद़कर दे । 
संकन्पोऽपि मनस्यनवदन्तःकर- गन 
अन्तःकरणङी वृत्ति ही है, यानी 

णडृत्तिः,कतंग्याकतंन्यविषयवि- | कत्य ओर अक्कतंभ्य॒विषयोका 
९ „ | विभागपूर्वक समथ॑न दी संकद्प है । 

भागेन समथनम्‌ । विभागेन हि इष प्रकार विषयद्ना विभागपूक 
समर्थिते विषये जिकीर्माुदिमं- | समथन होनेपर॒ही चिकीषबद्ध 
कि यानी मन्यन होता है । सो किष 
नस्यन भवात । कथम्‌ १ यदा प्रकार जितत समय पुरूष 
संकल्प करता ह अर्यात्‌ "यह्‌ 
करना चाये इस्त प्रकार कतं 
विभजत हदं कतुं युक्तमिति । | व्यादि विपर्योका विभाग करता हे 
र „_ | तमी वह सोचताहै मे मर्न्का 

अथ मनस्यति मन्त्रानधीयीये- | पाठ क यादि । इसके तं 


वे संकल्पयते कतंग्यादिविषयान्‌ 


त्यादि। अथानन्तरं बाचमीरयति | वह मन्तरादिका उचरण करनेमं 








७२९८ 


छान्डोगरोपनिषदू 


[ जष्याय ७ 


न 8 > १ क 


मन्त्राद्यचारणे । तां च वाचय 
नाम्नि नामोचारणनिभित्त 
विवक्षां हइृवेरयति नाभ्नि 
नामसामान्ये मन्त्राः शब्द- 
विशेषाः सन्त एक मवन्त्यन्तर्थ- 
वन्तीर्य्थः । सामान्ये हि 
विश्षेपोऽन्तभंवति । 

मन्त्रेषु कर्माण्येकं भवन्ति, 
 मन््प्रकाशितानि कर्माणि 
करियन्ते नामन्त्रकमस्ति करम । 
यद्वि मन्तप्रकाशनेन छन्ध- 
सत्ताकं सत्कमं ब्राहमणेनेदं 
कतेन्यमस्मं फलायेति विधी 
यते। याप्युत्पत्ति््राह्णेषु कर्मणां 
दृश्यतं सापि मन्त्रेषु खन्धस- 
त्ाकानामेव कमणां स्पष्टीक 
रणम्‌ । न हि मन्त्राप्रकाशितं 
कमे किञिद्राकषणे उत्पन्न 
दृयते । त्रयोविहितं के 


वाणीको प्रेरित करता है । बौर ख 

णीको नाम अर्थात्‌ नामोषारण- 
निमित्त विवक्षा करके नामे प्रू 
करता है तथा नामरूप सामात् 


मन्त्र, जो शब्दविरोष ही है 
एक होते है अर्थात्‌ उ्तके अन्त- 
सूत होते है; क्योकि समान्य 
विशोषका अन्तर्भाव होता है । 
मन्त्रम कमं एकप हो जते है। 
मन्त्रौँसे प्रकाशित कमं हीश्ियि 
जाते दै, मन्त्रहीन कोई भी कं 
नहीं है । [ यदि कहो कि करमो 
विधान तो बरह्मणभागमे भीहै 
फिर देघा कते माना जा घता है 
कि कर्म मन्त्रपकराशित ही है त) एसा 
कहना ठीक नही, क्योकि ] निष 
कर्मो मन्तरकि प्रकाशित कैत 
सत्ता पराप्त हुई दै नहि 
उसीका से जघुक फलके हि 
करना चाहिये इख भकार विषा 
किया है । इसके सिवा बरह्ि 
जो कर्मोकी उत्पत्ति देखी जाती 
वह भी मन्त्रम सत्ता प्र 
कर्माका ही स्ष्ट्टरण है; मनो 
प्रकाशित कोड भी कर्मं बर्ह 
भागम उद्यन इअ। नदी दश 





कंव्ड ४ 1 शाङ्करभाप्याथं ७२९ 
>>> <-> ऋ ¬ ऋ 
प्रसिद्धं रोके । त्रयीशचन्दश्च | जाता । लोकम बह बात प्रसिद्धही 
है कि कमं त्रपीविहित है, मौर 
त्रयी ब्द ऋक्‌-पजुः-स्रामका दी 
कर्माणि इषयो यान्यपष््यन"' | नाम दै । “'विद्वानोनि जिन कर्मोश्नो 
मर्म देखा” रेषा भाथवणो 
(घ ४: १९.।१ ९ 2 इति पनिषदुमे कहा ओ है । भतः यहं 
चाथवंणे । तस्माुक्तं मन्त्रेषु | कहना कि मन्त्रम सव कम एकरप 
कर्माण्येदं भवन्तीति | १।॥ ।होनति रहै, ठीकहीषै॥ १॥ 
~~; ‰ :न= 


तानि ह वा एतानि संकश्पेकायनानि संकरपात्म- 
कानि संकष्पे प्रतिष्ठितानि समव्छपतां दावाएथिवी 
समकस्पेतां वायुश्चाकाशं च समकस्पन्तापश्च तेजश्च 
तेषारसंबलुप्त्ये वषरसंकस्ते वर्षस्य स्वलुष्स्या 
अन्न <संकर्पतेऽन्नस्य संकर्ष प्राणाः संकस्पन्ते 
प्राणानाश्संक्लप्त्ये मन्त्राः संकस्पन्ते डन्त्ाणा 
संक्टप्त्ये कर्माणि संकल्पन्ते कम्॑णाशसंक्टप््ये खोक 
संकल्पते लोकस्य संक्लप्त्ये सवरसंकस्पते स एष 
संकर्पः संकस्पमुपास्स्वेति ॥ २ ॥ 
वे ये ( मन भादि ) एकान्न संकट्पशूप लग्ने, संकृरपमय 
भौर संकल्पम दी प्रतिष्ठित है । धुरोकं ओर पृथिवीन माने संकट्प क्षिया 
हे । वायु जोर जाकाशाने संकल्प फिया है; नर ओर तेजने संकल्प क्रिया 
है । उनके संकल्पके र्थि वृष्टि समथ होती ह [ अर्थात्‌ उन धुरोकादिके 
संकरपसे वृष्ट हयेती हे ] वृष्टिके संकस्पके स्यि अर समथ होता है, अन्नके 
संकल्पके लिय प्राण समर्थं होते है, पराणौके संकल्यके लिये मन्व समरं 


चछश्यजुःलामसमाख्या । “मन्त्रेषु 














७९ छाल्लेष्यौवनिक् नर 

स 81० > 93 -8९ 
देते दै, मनक संकदपनेः लिये कमं समरथ होते दै, कमो संसत 
ल्थि लोक्‌ ( फ ) समं होता है जर॒लोकेकि संकलपके रथि स 
व होते दै । बह ( देसा ) यह संप है; तुम संकल्प उपदा 
करो ॥ २॥ 


वानिह बा एतानि मन-| बैयेमन भादि स्लोकय 
आदीनि संकल्पेकायनानि | दै--संकस्प ही दै एक अयन- 
संकल्प एकोऽयनं गमनं प्रयो | गमन अत पस्यस्थान नित 
येषां तानि संकल्पैकायनानि । | पस संक्यकायन है । वे उपप 


कपासकानयुततो संकल्प समय संकस्पमय टै तथा स्थितके 
सरग पत्मकान्युत्पत्ता संकल्प | समय संकतपमे भित है । दुरो$ 


प्रतिष्ठितानि स्थितो समक्लपतां ओर पृथिवीने मानो संकत्पक्रिा दै 
संकल्पं कृतवत्याबिव हि चौश्च | क्योकि ये यावापुथिवी- धो भैर 
पृथिवी च द्यावाए्थिवो ्यावा- | पृथिवी निर्व दिखायी देते है । 
पृथिव्यो निशवले रक्ष्येते । तथा | तथा वाय ओर भाकश इन दोनो 
समङन्पेतां वायुराकाशं चैता- | भी मानो संकसप मा दै । ह 
वपि संकल्पं ृतवन्ताविब । | भकार जर जर तेजने भी संक 


किया है, कर्योकिये भी अपने 
तथा समङकृल्पन्तापश्च तेज स्वरूपे निश्वठ दिखायी देते दै। 


स्वेन सूपेण निश्वरानि रक्षयन्ते | उन रोक ओर पथिवी भाक्कर 


यतः । 
| संक्छत्ति यानी संकल्पके सिये वषा 


१ दयावाप्रथिव्यादीनां स- | संकन्यित होती अर्थात्‌ समर्थं हेती 
चल त्य सकल्पनिमितत वपे संक- ¦ हे । तथा वरप्ठी संक्षि 
ल्पत समुथीभवति। तथा वस्य | संकल्पे; (ये भन्न समर्थं हेः 

© १९ € ६ श ४ 
0, सकृन्पनामित्तमने / है, वयोकि वृष्टे ही अन हष 
कपत । इष्टं भवत्यस्य | है । जननकी संकतिके म भ 
सक्छृप्त्य प्राणाः संकल्पन्ते | | समर्थं होते दै, कोक भाण अततम 








कण्ठ ७ ] छाद्र्माण्या्थं ७३१ 
>> > 9 9 ¬ अः 8 19 अ ~ 8 + 9 ~ध 


अन्नमयां हि व्राणा अन्नोपष्ट- | है जर्‌ अन्नके ही आश्रय रटनेवटे | 

स्भकाः । “अनर दाम (ब०उ० ह श्रुति कहती दहै “[ प्राण | 
११ 

२।२। १) इति हि धतिः । +, त 1. १ 

तेषां सक्लष्त्यं मन्त्राः | मन्त्र समर्थं दयते है, क्योकि 

संकल्पन्ते । प्राणवान्‌ हि मस्त्रा- | प्राणवान्‌ ( वलवान्‌ ) हौ मन्तरको 

नधीते नाबलः ।. मन्त्राणां हि | ड़ सकता है, बर्हन नहीं । 


तै = ~. | मर्न्त्रोके संकल्पके स्यि अमनिहोत्र 
संद्लप्त्ये कर्माण्यधिहोत्रादीनि । 8 £ 

(भ श त | आदि कर्मं समर्थं होति है, क्योकि 
पकतयन्तसचु्टयनानानं मन्व" | मनतोदरारा प्रकाशित करम अनुष्ान 

प्रकाशितानि समथींमवन्ति | कयि जानेषर फलभरदानमे समर्थं 

फराय । ततो लोकः एं | होते है । उनसे रोक अर्थात्‌ फर 

9. (9 © 

संकल्पते क्म॑कर्व॑समवायितया | संगत होत हे, भर्थत्‌ कमं जर 

थीमवतीलरथ लर | कर्ताके समव्रायीरूपसे समथं होता 

पे \ 1 ५ ~ 


संक्लृप्त्ये सव॑ जगत्संकल्पते | टये सम्पूणं जगत्‌ अपने स्वरूपकी 


स्वरूपावैकल्याय । एतद्धीदं सव | अविकस्तामे समथं होता ह । 
0. 
इस प्रकार फरूपयन्त जो घरारा 


जगध्त्फलावसानं तत्सवं संक | जगत्‌ ३ वह तव-का-सव संकन्प- 
न्पमूलम्‌। अतो विशिष्टः स एव | पूरक दी दै । अतः वह संकल्प हो 
संकल्पः । अतः संकन्पुपा- | विशिष्ट दै, इसर्यि तुम ॒संल्प- 
की उपासना करौ । एसा कहकर 
स्स्पेतयुक्त्वा फरमाह तदुपास- | सनलुमारनी उसके उपासकके स्मि 

` कस्य ॥ २ ॥ फरु वतरते दै --॥ २ ॥ 














-?&-- 











७६२ छान्डोष्योवनिवल्‌ [ नण्वाष 


> >~ 3८ ~< >< ~ < 9 9-2-5८ > >< -2८ ¬< ~क = 


स यः संकल्पं ब्रह्मसयुपास्ते क्टृत्ान्‌ बै स 
खोकान्धुवान््रुवः प्रतिष्ठितान्‌ परतिष्ठितोऽग्यथमानान 
उ्यथमानोऽभिप्तिभ्यति। यावस्सं कल्पस्य गतं तत्रास्य 
यथाकामचारो भवति यः संकःपं ब्रह्मेतयुपास्तेऽस्ति 
भगवः संकस्पाद्धय इति संकल्पाद्वाव भूयोऽस्तीति 
तन्मे भगवान्‌ व्रवीखिति ॥ ३ ॥ 

वह ज कि संकस्पश्टौ "यह त्रम है" इस प्रकार उपाघ्तना करता 

हे [ विघाताक्े ] रचे हुए भरुवरोकोको स्वयं रुव होकर, प्रतिष्ठित 
लोकौको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पनेवाछे रोनोको स्वयं 
न्यथा न पाता हुआ सव प्रकार प्राप्त करता है । जर्होतकि संकरपकी 
गति हे वहत उसकी स्वेच्छागति हो जाती दै, नो क्रि संकरी 
“यह ब्रह्म है" इस प्रकार उपास्तना करता है । [ नारद-- ] भगवन्‌ | 
क्या संकरथये भी वद्कर्‌ कुक है [' [ सनक्ुमार -- ] 'संकर्पसे वृक 
मी है ही । [ नारद-- ] भगवान्‌ धु उका उपदेश करं ॥ ३॥ 
स यः संकल्पं ब्रह्मेति बह्म-| वह नो किं संकट्पकौ नह 

2 | अर्थात्‌ ऋ्षुद्धिसे 
उद्भासते कलप्तन्‌ वै भावरा- | उतना करत ह बलद 
स्थम लोकाः फलमिति कलान्‌ | वित्वा "इसे ये रोक यानी 
फर प्राप्त होः दस रभ 
समर्थित- संकल्पित भ्रुव अर्थत. 
्युबान्‌ नित्यानत्यन्ताधृवापे- | निय रोको, नो अन्य अ 
 _ | लोकौकी उपेक्षा भ्रुव द, स्वयं 

भता दुत स्वषम्‌ । कोकिनो | होकर, वयोकि रोकवान्‌ भोक्त 
हयभुवसे रोके धरवकलि््थेति | अधुव होनेप लोकमि धुव 
४ र कपना करना व्यं दै, अतः ६4 
वः सन्‌ प्रतिष्ठितानुपकरण- होकर; प्रतिष्ठित अर्थात्‌ सामग्री 


समधितान्‌ संफन्पितान्े विद्वा- 





खण्ड ४1] शाङह्करथाप्ला्थं ७३३ 
ए ® क क 4 >< ¬ >: > >< < 9 ¬ ¬ <> -- ¬< ~ >< 8 9८ 9 < 


सस्वनानित्यथः । पञुपुत्रादिभिः ] बम्प [रोकोको); कयि वह पु 

क त्रादिसे प्रतिष्ठित होता है-ेसा 
शंनात्स्वयं च प्रति- 

परतितिष्ठति द्शनास्तयं च प्ति देखा गया है, स्वयं भी प्रतिष्ठित- 


षिव आत्मीयोपकररणसम्पन्नो- | भपनी सामम्रसे सम्पन होर 

तथा अन्यथमान- श्रु भादिके 
ऽव्यथमानानमित्रादित्रासरहिता- | मयसे रहित रोको स्वयं भी 
अन्यथमान-- व्यथित न होता हुआ 
अभिसिध्यति-- सव प्रकारसे प्राप 


मिप्राघ्नोहीत्यर्थः । यावत्संक- | करता है-देसा इसका तातपय 
है । जहोतिक संकृट्पकी गति दै 


ल्पस्य गतं = अर्थात्‌ संकल्पना विषय है वहोँतक 

इसकी स्वेच्छागति हो नाती है; 
यथाकामचारो भवति आत्मनः | होक उसके संकसक्नो गति 
होती है वहीतक, न कि सवके 
संकरपकी गतितक, वयो [ एेसा 
स्येति । उच्तरफलविरोधात्‌ । | न माननेसे ] आगे बतलये हुए 
फरोसे विरोध जवेगा । थः संकल्पं 
ब्रहयदयुपास्तेः इत्यादि मन्ञ्षा भर्थ 
वत्‌ ॥ ३ ॥ पूववत्‌ दै ॥ २ ॥ 


नव्यथमानश्च स्वयमभिसिष्यत्य- 


संकन्पस्य न तु सर्वेषां संकल्प- 


यः संकल्पं त्रकषत्युपास्व इत्यादि 





इतिच्छशन्दोम्योपनिषदिः सक्षमाभ्याये 
चतु खण्डभाष्यं सम्पूणंम्‌ ॥ ४॥ 


--:९&-- 





पञ्चम्‌ र्द 


संकल्पकौ अपेक्षा चित्तकी प्रधानता 
चित्तं वाव संकल्पाद्‌भूयो यदा वे चेतयतेऽथ 
संकस्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीर- 
यति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि॥१॥ 


चित्त ही संकस्पसे उच्ृष्ट हे । जिस समय पुरुष चेतनावान्‌ होता 

हे तभी वह सङ्कल्प करता है, फिर मनन करता दे, तलश्चात्‌ वाणीको 

रित करता दै, उसे नाममे प्रवृत्त करता है । नाममे मन्त्र एकप होते 
है ओर मन््रोमिं कमं ॥ १ ॥ 

चित्तं वाव संकल्पादुभूयः, | चित्त ही सङ्कल्पते उष ै। 


तक. चित्त यानी वचेतयितृव- प्र 
चित्तं चेतयितसवं प्राप्कालानु- | कारके अनुरूप बोधयुक्त दोन 


भूत ओ विषरयोकि 
पयोध गतविषय- | था मृत ओर भविष्यत्‌ विष 
$ 144 प्रयोजनका निरूपण करनेमे समध 


प्रयोजननिरपणसामर्थ्यं च तत्‌ | होना--यह स्फी भष ध 
। बकर है । यह कैसे १ | 
संकल्पाद्पि भूयः । कथम्‌ १ | बतलते है] निस समय पृ 

न वस्तुको "यह इस भक. 
यदा वै ्ाप्तं वस्त्विदमेवंप्राप्त- ५ व हुई दै" इस 
मिति चेतयते चेतित करता दै, तमी वई 

॥ 

वापोदाय बाथ संकल्पयतेऽथ | सङ्कल्प करता ह । रिर्‌ मन 
करता दै--ह्यादि रे१ ५ 
पूर्ववत्‌ है ॥ १ ॥ 


यि 


मनस्यतीस्यादि पूैवत्‌ ॥ १॥ 








खच्ड ५ ] शाङरभाष्याथे ७३५ 
>< 9 86 ८ 98 >< >< ऋ > 8८ > > >< 8 >~ ४ > -&- >ऋ ¬> >> ~ 


तानि ह वा एतानि चित्तेकायनानि चित्तात्मानि 
चित्ते घतिष्ठितानि तस्माययपि बहू विदचित्तो भवति 
नायमस्तीव्येवेनमाहूरयदयं वेद्‌ यद्वा अयं विद्वाजनत्थम- 
चित्तः स्यादित्यथ यदत्पविचित्तवान्भवति तस्मा 
एवोत शुशरषन्ते चित्तदयवेषामेकायनं चित्तमारमा 
चित्तं प्रतिष्ठा चित्तमुपास्सवेति ॥ २ ॥ 


वेये [ संकस्पादि ] एकमात्र चित्तरूप ख्यस्थानग्रले, चित्तमय 
तथा चित्तम ही प्रतिष्ठित है । इसीसे ययपि कोई मनुष्य बहुज्ञ भी हो तो 
भी यदि वह भवित्त होता है तो रोग कहने र्गते है किं "यह तो कुक 
भी नहीं है, यदि यह कुछ जानता अथवा विद्वान्‌ होता तो रेस्ा अचित्त 
न होता ॥ ओर यदि कोई अल्पक होनेपर भी चितवान्‌ हो तो उसीसे 
वे सब श्रवण करना चाहते है । अतः चित्त ही इनका एकमात्र आश्रय 
है, चित्त दी आमा है ओर चित्त ही प्रतिष्ठा दै, ठम चित्ती उपासना 
करो ॥ २॥ 


तानि संकल्पादीनि कर्मफ-| संकल्पते लेकर कर्मफलपर्यनत वे 

= (~ सव॒ एकमात्र चित्तङूप ख्यस्थान- 
लान्तानि चिरकायनानि विषा बि वि वि 
त्मानि चित्तोतपत्तीनि चित्ते | होनेवाठे ओर वित्से प्रतिष्ठित 


प्रतिष्ठितानि धित्तस्थितानीत्यपि | अर्थात्‌ चित्तमे ह स्थित रहनेवाले 


4 . | दै-इस प्रकार पूववत्‌ ही समज्ञना 


त्म्यम्‌ । यस्माचित्तं संकन्पादि- | महिमा इस प्रकार ॒ै; रमो 
लं ६ तहे चित्त संकल्पादिका मू है इषम 


श्राख्रादिषरि्ानवान्सनवित्तो । शाख्ादिका परिज्ञन रखनेवाब् च 








७दद 


छाब्दोन्योवभिषद्‌ 


> 9 ८ < ८ 8 3-८-9८ >, #> 4 


[ मण्या ५ 
ऋ >> 


भवति प्ाक्ठादिचेतयितृखसाम- | होकर भी अचित्त चरथत प्र 


थ्यंबिरदितो भवति तं निपुणा 
लौकिका नायमस्ति वि्यमानो- 


ऽप्यसत्सम एवेत्येनमाहुः । 
यच्चायं किञिच्छाश्चादि वेद 
्रुतवांस्तदप्यस्य वरथेवेति कथ- 
यन्ति। कस्मात्‌ १ यद्ययं 
विद्वान्‌ स्यादित्थमेवमचित्तो न 
स्यात्तस्मादस्य भरुतमप्यश्रुतमेवे- 
त्याहुरित्यथः । अथाल्पविदपि 
यदि चित्तवान्भवति तस्मा 
एतस्े तदकतरथग्रणायेबोतापि 
सुभरषन्ते श्रोतुमिच्छन्ति । तस्माच 
चित्तं देवेष संकल्पादीनामेका- 
यनमित्यादि पूंवत्‌ | २ ॥ 


विषयादिके यथार्थं स्वह जान. 
की सामथ्यंसे रहित हो तो निष 
लीक्षिक पुरुष उसके विषय र 
छ नहीं दै-- विमान होते हए 
भी असदरप हीदैः एसा कहने 
लगते है | 


वे यह भी कहते दै कि षते | 


जो कुछ शाक्ञादि जाने अथवा पु 
हें वे भी इसके लयि व्यथं ही है। 
क्यों व्यर्थं हैं १ यदि यह द्रन्‌ 
होता तो रसा अचित्त ( मू) 
होता; अतः तालयं यह है कि 
इसका श्रवण किया हुआ भी श्त 


ही दः रसा वे कहते द । शै | 


यदि अहपवित होनेपर भी वह 
वित्तवान्‌ होता है तो उससे उसकी 
कटी हरै बातको ग्रहण कनके 
स्थि ही वे ुननेकी इच्छा कते 
है । अतः चित्त दी इन सलार 
का एकायन है इत्यादि व 
समञ्ना चाहिये ॥ २ ॥ 





स यदिच ्रह्मतयुपासते चिन्तान्वे स रोकान्‌ भुवा 
न्धुवः भतिष्ठितान्धतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिषि 
श्यति । यावचित्तस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भ 








खण्ड ५ ] शाङ्करमाष्याथ ७३७ 
अ >2 ¬< ¬ >< ¬< 9: ¬ ¬< कः >: ~: < ¬ 9 -9- 8 ~ -- ~ -8- > 8- 


यश्चित्तं बहमेदयुपास्तेऽस्ति भगवरिचत्ताद्भूय इति 
चित्ताद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्त्रवीखिति ॥३॥ 


वह जो कि चित्तकी यह वक्ष है" इस प्रकार उपासना करता है 
[ जपने ल्मि ] उपचित हुए ॒भरुवोकोको स्वयं ध्रुव होकर, प्रतिष्ठित 
लोकरौको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पनिवलि लोके स्वयं 
व्यथा न पाता हुभा सव प्रकार प्रप्त कता है । जहाँ तक चित्ती गति 
ह वरहातक उसकी स्वेच्छागति हो जाती दै, नो करि चित्क यह्‌ ब्रहम 
दै" एेसी उपासना करता दै । [ नारद-- ] भगवन्‌ | क्या विततसे 
बद्र भी कुक हे ? [ सनलुमार-- ] “चित्तसे वद्कर भी है ही । 
[ नारद-- ] भगवान्‌ मुञ्च उसीका उपदेश करः ॥ २ ॥ 


चित्तानुपचितान्धुद्धि मद्गुणंः । चित्त अर्थात्‌ बुद्धियुक्त गुणेसि 


चि उपचित ध्रुवलोकौको वह चितो 
स चित्तोपासको ध्रुवानिर्त्या 
ग्तका दुवानत्वा | क भुव होकर--श्यादि स्थं 


चोक्ताथम्‌ | ३ ॥ | पटे के एके मान है ॥ २॥ 


--~0<ॐ>--- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सक्तमाध्याये 
पञ्चमसरण्डभाष्यं सम्पूर्णम्‌ ॥ ५॥ 


नर 5 





कछ र्ट 





चित्तकी अपेक्षा ष्यानका महत्व 


ध्यानं वाव चित्तादृभूयो ध्यायतीव परथिवी भ्यायती- । 
वान्तरिकषं ध्यायतीव व्यर्ष्याथन्तीवापो ध्यायन्तीव पवत | 
ध्यायन्तीव देवमनुष्यास्तस्माय इह मनुष्याणां महतां 
प्राप्नुवन्ति ध्यानापादाश्शा इवेव ते भवन्त्यथ येऽराः 
कलहिनः पिशुना उपवादिनस्तेऽथ ये ध्रभवो भ्याना- 
पादाशा इवेव ते भवन्ति ध्यानसुपास्स्वेति ॥ १॥ 





ध्यान ही चिततसे बहकर है । परथिवी मानो ध्यान एरी है 
अन्तरिक्ष मानो ध्यान करता दै, धुरोक भानो ध्यान करता है, नर 
मानो ध्यान करते है, पवत मानो ध्यान करते है तथा देवता भौर मवृ 
मी मानो ध्यान छरते है । भतः जो रोग याँ मनुष्योमिं मह १6 
करते है वे मानो ध्यानके कमक दी थ पते ई; ङि नो दहे 
है वे कदप्रिय, चुगक्लोर ओर दूसरोकि सुपर ही उनकी निदा 
केवले होते है । तथा जो सामथ्यंवान्‌ ह बे भी ध्यानके लमका ह 
खश प्राक करनेवाले है । अतः तुम ध्यानक्नो उपासना करो ॥ १॥ 


ध्यानं वाव वित्ताद्धयः | | ध्यानं ही चितसे गदर ट। 
ष्यानं नाम ॒शाखोक्तदेवताद्या- | देवता आदि राश्ोक्त सकब) 


जातीये विजातीय वृत्ति्योसे 
मिन्नजातीयेरनन्त। एक ही वृत्िके प्रवाहका 


सितः शरस्ययसन्तानः, एकाग्रतेति | ध्यान है, जिसे "एकमत ५ 


--श----- 





== । 0 


# 1 
ष्ड ६] श्याहुरभाष्याख ७३९ 
क > क = ॐ = 4 अ ॐ ॐ = ॐ = ॐ = = ॐ = = = क. 4 


यमाहुः । दृश्यते च ध्यानस्य | भी कहते हँ । फठ्से भी घ्यानका 
माहाल्य देखा ही जाता है । श्चन 
मादारम्य फएर्तः, कथम्‌ १ यथा | प्रकार ?- जि प्रकार ध्यान 
करता हुआ योगी ध्याना एड 
प्राप होनेपर निश्वर हो जाता दै 
इसी प्रकार प्रथिवी ध्यान करतौ 
हई-षी निरचङ दिवडयी देती दै, 
तथा घन्तरिक्च भ्यान करता-भ्र 
जान पडता है इत्यादि । रोष 
स्थं इसी प्रकार समञ्चना चादिये। 
देव भौर मनुष्य देवमनुष्य कटे गये 
ई अथवा देवतुल्य मनुष्य ही देब- 
मनुष्य ड । तार्यं यह है कि 
शमादि गुणोंसे सम्पन्न एरुष देव- 
मावका कभों व्याग नहीं करते । 
क्योकि इस प्रकार ध्यान विशिष्ट 
है, इसल्ि मनुष्यमिं भी जो रोग 
इस ङोकमे घन, विधा अथवा 
गु्णोके शरण महत्ता - महत्व 
पराप्त करते रै भर्थात्‌ महत्वके 
देतुमूत षनादि प्रप्त छते रहैवे 
ध्यानापादां्के घमान है । ध्यानके 
आपादनका नाम दै “्यानापाद' 
अर्थात्‌ ध्यानके फठ्की प्रापि उसके 
प्क भंशा--भवयव यानी कलास ¦ 
यक्त होते है; तात्ययं यह है किवे ` 
मानो ष्यानफङके भांशिक मसे 













योगी ध्यायनिशवलो भवति | 
फएरुलामे। एवं ष्यायतीव निरा 
दुद्यते पृथिवी ध्यायतीवान्तरि्ष 
भिस्यादि समानमन्यत्‌ । देवा 
मनुष्या देवमनुष्या मनुष्या 
एव वा देवसमा देवमनुष्याः 


शमादिगुनसम्पन्ना मनुष्या देव- 
स्वरूपं न जहतीत्य्थः। 

यस्मादेवं विशिष्टं ष्यानं 
इह शोके मनुष्याणामेव धनै- 
विद्या गुणवां महत्तां महतं 
प्राप्नुवन्ति धनादिमदच्हेतुं 
लमन्त हत्यर्थः । ष्यानापादांशा 
इब धष्यानस्यापादनमापादो 
व्यानफललाम इत्येतत्‌, तस्यांशो 


ऽवयवः कला काचिद्धथानषफल- 


लाभकलावन्त इवैवेत्यथः; ते 
शा उ०° ₹२४- ५ 











७० छान्दोग्योपनिषद्‌ [ खष्याय ७ 


८ द 999 9-8-88 8 + ऋ 
भवन्ति । निश्वखा इव रक्ष्यन्ते | सम्पन्न होते हे । तथा वे नश्वर 
से दिखलयी देते शुद्र पुरषो 

न लुद्रा इव । के समान न्दी देखे नाते । 
अथये पुनरन्यः ल्राः| जरनो अल्पश अर्थ्‌ 
किञ्चिदपि धनादिमहःवैकदेश- | घनादि महससके एक अंशको भी 
मग्रा्नास्ते पूर्वोक्तपिषराताः | प्रा नदीं ई वे उपुकत मनुष्येति 
करदिनः कलहशीलाः पिशुनाः | विपरीत कटदी कृष्ट कवार 


परदोपोद्धासको उपवादिनः पर- | पिन -दृरोकि दोपि भकट 
५" _ . । करनेवाछे ओर उपवादी- जिनका 
दोषं सामीप्ययुक्तमेव वदितुं | रोक दोनो उनके समीप ही 


शीरं येषां त॒ उपवादिनश | कहनेका स्वमाबव होता दै-- 
अवन्ति | एसे होते ह | 


अथ ये महं प्राप्ना धनादि- | ओर ओ रोग धनादिके कार 
महवको प्राप्त हुए है त्थानो 

निमित्तं तेऽन्यान्‌ प्रति प्रमवन्तीति। दूसरेके परति प्रमु होते दैः प्रु भरात्‌ 
विदयाचार्यं॑या रजेदवरादि होते ई 
वे मानो ध्यानफस्का अश्च प्रा 
ध्यानापादां शा इवेप्यावुक्तार्थम्‌ | करनेवाे है सा ध्विन 
# का] अर्थं पहले काला चुका 

अतो दुर्यते ध्यानस्य महं | है । सतः फलसे भी ध्यानक्ा 
फरतोऽनो भूयसि ना महच्च प्रतीत होता दै । इसल्ि 
| दतस्तदुपा- यह्‌ चित्तसे बढ़कर दै; अतः तुम 

इसीकौ उपासना करो-एसा 
सस्वेस्याधुक्ताथम्‌ ॥ १ ॥ | पूर्वत अर्थं समङ्ना चाटिये ॥ १ ॥ 


प्रभवो विधाचा्यैराजेश्वरादयो 





ण्ड ६ ] शा {हरभाष्य (थं ७४१ 
अ 9-9-69 ऋ 9 ¬: 8 >> अअ ऋऋ 


सं यो भ्यानं ब्रह्मेलयुपास्ते यावद्धयानस्य गतं 
तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो ध्यानं बह्मयुपास्ते- 
ऽस्ति भगवो ध्यानाद्भूय इति ध्यानाद्वाव भूयोऽस्तीति 
तन्मे भगवान््रवीविति ॥ २॥ 


वह जो कि ध्यानकरी धह ब्रह्न है' दसो उपास्नना करता है, जरो 
तक ध्यानकी गति है वतक उसकी स्वेच्छगति हो जाती है, जो किं 
ध्यानकी “यह्‌ ब्रहम है" एसी उपना करता है । [नारद-] “भगवन्‌ | 
क्या ध्यानसे भी उङ्ृष्ट कुछ है ¢ [सनक्कुमार-] ्यानसे भी उद्ृष्ट 
है दी ।' [नारद -) भगवान्‌ सुस्ञे उसका उपदेश करं! ॥ २ ॥ 


५ ॥ 
=+ ° 9 --~ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये 
षष्टखण्डमाष्यं सम्पृणम्‌ ॥ ६॥ 








+ 


ख दस 


ध्यानसे विज्ञानकर महत्ता 

विज्ञानं वाव प्यानाद्भूयो विज्ञानेन वा कऋण्वेदं 
विजानाति यज्ेद ्साभवेदमाथवंणं चतुथमितिहास- 
पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पिन्यश्राशि देवं निधिं 
वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां बह्मविव्यां भूतवियां 
क्षत्रवियां नक्षत्रविव्यासर्षदेवजनविव्यां दिवं च परथिवी 
च वायुं चाकादं चापश्च तेजर्च देवा<दच मनुष्या 
इच पशुश्च वयारसि च त्रणवनस्पतीज्छापदान्या- 
कीटपतङ्गपिपीलिकं धर्म चाधर्मं च सत्यं चानृतं च 
साघु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं चान्नं च रसं 
चेमं च रोकममुं च विज्ञानेनैव विजानाति विज्ञान 
सुपास्स्वेति ॥ १ ॥ 


विज्ञान दी ध्यानसे श्रेष्ठ है । विज्ञानसे ही पुरष छछग्वेद्‌ समश्चता ् 
तथा विज्ञानसे €ी वह यजुर्वेद, सामवेद, चौथे आथर्वण वेद, वेदाम पचे 
बद्‌ इतिहास-पुराण, व्याकरण, श्राद्धकरप, गणित, उत्पातज्ञान, निषिज्ञाना 
तकशा, नीति, देवविया (निरुक्त), ब्रह्मविधा, मूतविद्या, धल्व, ज्योति, 
गारुढ ओर शिन्पविया, चु रोक, एरयिवी, वायु, जाकर, जठ, तेज, 
देव, मनुष्य, पर, पक्षी, तृण, वनस्पति, श्वापद, क्ोट-पतंग, पिपीलिका- 
पन्त सम्पूण जीव, घम्‌, अधर्म, सद्य, असत्य, साधु, असाघु, मनोर, 


अमनो, जन्न, रस तथा इहरोक जौर॒परलोकको जानता है । ठम 
विज्ञानको उपासना करो ।॥ १ ॥ 





स्च्ड ७ ] 


शाङ्करभाष्वाथं 


७४३ 


क ॐ 9 कक > क = क = र ॐ = = ॐ ॐ ॐ = = 4 


विज्ञानं वाव ध्यानाद्भुयः। 
विज्ञानं ल्ाख्नाथविषयं जानं तस्य 


ऽयानक्ारगलाद्बानादूभूय- 


विज्ञान ही ध्यानसे श्रष्ुहै। 
विज्ञान शखराथविंषयक अनक्ो 
कहते है; ध्यानका कारण होनेके 
कारण ध्यानकौ अपश्च उघ्रकी 
्रेष्ठता है । उसकी भेष्ठता कि 


सखम्‌ । कथं च तस्य भूयर्समि पकार दै १ यह वतरते ईै-- 


त्याह । विज्ञानेन बा छण्वेदं 


विज्ञानसे ही पुरुष ऋग्वेदो गह 
ग्वेद 2" इख प्रकार प्रमणरूपसे 


विजानास्ययमूग्वेद इति प्रमाण- | नानता ष, नितक्षा र्थक्ञान 
¢ 
तया यस्याथेजानं & प्यानका कारण है | तथा यजनुरवद 


तथा यजुेदमित्पादि समानम्‌ 
किव पश्वादींध धर्माधमों सरास्र- 
सिद्धौ साध्वसाधुनी लोकतः 


इत्यादि रोष अर्थं भी इसी प्रकार 
समञ्षना चाहिये । यष्टी नही, पञ्च 
आदिको, याखषिद्ध ष्म ओर अधर्म- 
को, रोकदृष्टिसे भथवा स्मृति्योदार 


स्मातं वादष्टविषयं च सव | निर्णीत ञ्चम जोर अश्चुमशनो एवं . 


विज्ञानेनैव विजानावीत्य्थः | 
तस्माचयुक्तं ध्यानाद्ि्ञानस्य 
भूयस्त्वम्‌ । अतो विततान 
पार्स्वेवि ॥ १ ॥ 


सम्पूणं अ्ृष्ट॒विषयको मी वह 
विज्ञानसे दी जानता दै- णसा 
इसका तात्पयं है । अतः ध्यानसे 
विज्ञानी श्रेष्ठता ठीक ही है। 
इसल्यि तुम ॒विज्ञानकी उपासना 


क्रो ॥ १॥ 


| 
~: ® :-~ 


स यो विज्ञानं बह्मेदयुपास्ते विज्ञानवतोवे स 


रोकाञज्ञानवतोऽभिसिष्यति यावद्विज्ञानस्य 


गतं 


तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो विज्ञानं ब्रह्म त्युपास्ते- 


ऽस्ति भगवो विज्ञानाद्भूय 


इति विज्ञानाद्वाव भूयोऽ- 


स्तीति तन्मे भगवान्त्रवीतिति ॥ २॥ 











७४७ 


छन्दोग्दोपनिषद्‌ 


[ अष्याय ७ 


>< 9 > 9 ~ 9 9८ 2 >< > > > 8८ 2८ >< 2८ 28८ ॐ अ 3 4 
वह जो विज्ञानकी "यह नहा है' देसी उपासना कता है उत 
विज्ञानवान्‌ एवं ज्ञानवान्‌ कोकोकी प्रति होती दै । जरहोतकं विज्ञानी 
गति है वतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है जो कि विज्ञानी 
“यह न्ह है एेसी उपासना करता हे । [ नारद-- ] भगवन्‌ | क्या 


विज्ञानसे भी श्रेष्ठ कुछ हे १" 


[ सनकुमार-] 'विज्ञानसे श्रेष्ठ भी है 


ही ।' ( नारद-- ) भगवान्‌ भुञ्चे वही बतखवे' ॥ २ ॥ 


शृणुपासनफलं विज्ञानवतो 


वितानं येषु छोकेषु तान्विज्ञान- 


वतो लोकाञ्ज्ञानवतशाभिसिष्य- 


` त्यभिग्राप्नोति । विज्ञानं शाख्रा- 


थेविषयं ज्ञानमन्यशरिषयं नैपुण्य 
तदद्धिथ्ोन्लोकान्‌ प्राभोती- 


हस उपासनाका 
करो-- विज्ञानवान्‌ अर्थात्‌ जिन 
रेके विज्ञान है उन्हं तथा 
ज्ञानवान्‌ रोकोको अभिघिद्ध-- 
प्रष्ठ कर॒ लेता दहै । विज्ञान 
राख्राथविषथक तथा अन्य विषय- 
सम्बन्धी निपुणताका नाम दै, 
उनसे सम्पन्न पुर्पसे युक्त लोको 
प्ाप्कर लेता है- एसा इसका 
ताखय है । यावद्विज्ञानस्य गतम्‌ 


फर श्रवण 


¢ 
स्यथः । यावद्विज्ञानस्येत्यादि | इत्यादि शेष॒ वाक्यका भरं पूर्ववत्‌ 


पूववत्‌ ॥ २ ॥ 


+ 
क 


9 


दै॥२॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये 


सप्तमस्ण्डभाष्यं सस्पूणेम्‌ ॥ ७ ॥ 


[२ पे 





ष्क्‌ श्रदड् 
विज्ञाने वट्की श्रता 
बरं वाव विज्ञानाद्युयोऽपि ह शतं विज्ञानवतामेको 
बखवानाकस्पयते । स यदा वरी भवत्यथोव्थाता 
भवल्युत्ति्टन्‌ परिचरिता भवति परिचरन्तुपसन्ता 
भवत्युपसीदन्‌ द्रष्टा मवति श्रोता भवति मन्ता भवति 
बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति । बलेन वे 
प्रथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं वलेन दयोव॑ेन पवता 
बेन देवमनुष्या वरेन पदवश्च वथा<सि च तृण- 
वनस्पतयः श्वापद्‌ान्याकीटपतद्कपिपीलिकं बलेन 
रोकसर्ति्ठति बलमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ 
बरु ही विज्ञानकी अपेक्षा उच्ष्ट है । सो विज्ञानवानेकि भी एक 
बरूवान्‌ हिला देता दै । निस समय यह परप वलवान्‌ होता है तभी 
उठनेवास भी होता दै, उठकर [ अर्थात्‌ उटठनेवारा होनेपर ] ही 
परिचर्या करनेवारा होता टै तथा परिचर्या करनेवाला होनेपर ही 
उपसदन [ समीप गमन ] करनेवाा होता दै; ओर उपसदन करनेपर 
ही दशन करनेवाला होता है, श्रवण करनेवास होता है, मनन करने- 
वाख होता है, बोधवान्‌ होता दै, कर्ता दोता है एवं विज्ञाता होता दै । 
बरसे ह प्रथिवी स्थित है; बरसे दी अन्तर्कि, बरसे दी दुरोक, बरसे 
ही पर्व॑त, बलसे दी देवता ओर मनुष्य, बरसे ही पञ्च, पक्षी, तण, वन- 
स्पति, श्वापद जीर कीट-पतंग एवं पिपीलिकापयन्त समस्त प्राणी स्थित 
है तथा बरसे ही कोक स्थित दै । तुम वर्की उपाक्नना करो ॥ १ ॥ 














७४६ 


बरं वाव विततानाद्भूयः । 
बरमित्यन्नोषयोगजनितं मनसो 
विदेय प्रतिमानसामभ्य॑म्‌ । 
अनशनात्‌ गादीनि न वैमा 
प्रतिभान्ति गोः (हार इण 
६।७।२ ) इति भुतेः । खरीरे- 
ऽपि तदेबोत्थानादि सामभ्य 
यस्मादिज्ञानवतां बअरतमप्येकः 
प्राणी बलवानाकम्पयते यथा 
दृस्ती मत्तो मनुष्याणां तं 
सषुदितमपि । 


यस्मादेवमन्नाद्युपयोगनिमितत 
यर्‌ तस्मात्स पुरुशे यदा बली 
रेन तद्वानभवत्यथोत्थातोस्था- 
नस्य कर्तोतिषठं् गुरूणामाचा- 
यस्य च परिचरिता परिचरणस्य 
शुश्रुषायाः कतां भवति परिचर- 
न्लुपसत्ता तेषां समीपगोऽन्तरङ्गः 


प्रियो भवतीत्यर्थः । 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


ह 3. 4 > ~ ट 


[ सष्वाय ७ 


वरु ही विद्ानसे उङ्ृष्ट है । 
अन्नके उपयोगसे प्राप्त हुई मनकी 
विज्ञेय पदार्थे प्रतिभानक्टो शक्ति्ष 


| नाम 'बङणै; व्याडि अनशन फरनेके 


कारण “भगवन्‌ | सकते छगादिक्षा 
प्रतिमान नहीं होता, रेस [ छठे 
अध्याये शवेतकेतुका बक्यखूप ] 
श्रतिष्टै। शरीरम भ वहं बह 
ही उठने आदिक सामथ्यं दै, 
क्योकि चौ विज्ञानवानोँको भी एक 
ही बख्वान्‌ प्राणी इस प्रकार कम- 
यमान कर देता दहै जेते एकत्रित 
इए सौ मनुर्प्योको एक मत्त हाथी । 


व्योकि अन्नादिके उपयोगके 
कारण होनेवास बर देस द 
इसल्यि यह पुरुष॒ निस समय 
चरो अर्थात्‌ वलते वश्युक्त होता 
हे तो वह उत्थाता र्थात्‌ उत्थान 
करनेवाला होता है । उल्बान 
कटनेवास होकर वह गुरुजन भौर 
आचार्या परिचारक - परिचर्यां 
यानी शुरु करनेवाला होता है ¦ 
परिचर्या करनेपर उपति कनेः 
वाख-उनके समीप ॒पर्हुचनेवाल~ 
उनका अन्तरङ्ग अर्थात्‌ श्रिय 


| होता - हे । 





खण्ड ८ ] शाङकरयाष्याथं ७४७ 
>^ 33-88-99 9-9-99 ----8--- 9-9-88 


उप्सीदंध सामीप्यं गच्छन्ने- | उपसन्नहोने अर्थात्‌ समीप जाने- 
पर वह्‌ एकाग्रभावसे भाचायं थवा 
किसी अन्य उपदेश करनेवाले गुरुका 
दष्टुभेरोदरश भवति । ततस्तद्‌- दशेन करनेवाला होता है । रि 


| वष्ट उनके कथनको श्रवण करने- 
स्य रोता भवति । तत इदमे- | बाडा होता  । तसात्‌ शनक 


0 
कछाश्रतयाचायंस्यान्यस्य चोप- 


भिरुक्तमेवशरुपपच्त दृत्युपपत्तितो | यह कथन ईस शकार उप्ष्न ट 
| एस प्रकार युक्तिपू्वंक मनन करने- 


मन्ता भवति मन्वानश्च बोद्धा | वारा होता षै । तथा मनन 
करनेपर यह बात एसी दी हैः 
इस प्रकार उसे जाननेवाखा होता 
नित्य तदुक्ताथंस्य कर्तालु- | दै । फिर इस प्रकार निश्चय कर 

„+ वह॒ उनकी कदी हुई बातका 
्ाता भवति विक्ञाताुषठान- | कर्ता- अनुष्ठान रनेवासा होता 
दै, ठथा विज्ञता यानी अनुष्ठानके 
फलका अनुभव करनेवाख दोता 


मवत्येवमेवेदमिति । तत एवं | 


फलस्यानुभविवा भववीत्यथंः । 


किंञ्च बलस्य माहात्म्यं बलेन | है- रेसा इसका तातपयं ह £ इसके 
श पटिः & गि महिमा इस प्रकार 
बै पृथिवी विषठवीत्यादयु- | सिवा वर्कः 

शव षत्युः ||ह लये वजि त्वि? = 
ज्वर्थम्‌ ॥ १ ॥ इत्यादि शेष भर्थं सर दै ॥१॥ 


~--* @ :-- 


स यो बलं ब्रहमत्युपास्ते यावद्वलस्य गतं तत्रास्य 
यथाकामचारो भवति यो बरं ब्ह्मतयुपास्तेऽस्ति 
भगवो बराद्धय इति बलद्राव भूयोऽस्तीति तन्म 
भगवान्‌ जवीविति ॥ २ ॥ 











७४८ छाग्दोग्योपनिषत्‌ [ मष्याय ५ 


> -- > ० < = 
वह जो फ़ बरी यह बरहम है पेसी उपासना करता दै, उपद् 
जहोतक बर्की गति हे, स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि बरकी धह 
रह्म हे" इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद-- ] (भगवन्‌ | कमा 
बरसे भी उक्कृष्ट कुछ है ¢ [सनत्कुमार] बरसे उकृष्ट भी है ही 

[ नारद-- ] भगवान्‌ मेरे प्रति उसीका वणन करे" ॥ २ ॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाष्याये- 
ऽष्टमखण्डभाष्यं सम्पृणम्‌ ॥ ८ ॥ 


(>< <-> 





नकम चण्ड 





बटकी अपेक्षा अन्नकी प्रषानता 


अन्नं वाब बलाद्धयस्तस्माययपि द रारात्रीनाश्नी- 
यायय ह जीवेदथवादरष्टाध्रोतामन्ताबोद्धाकर्ताविज्ञाता 
भवत्यथान्नस्याये द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता 
भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमु- 
पार्स्वेति ॥ १ ॥ 


अन्न ही बरसे उच्छृष्ट है । इसीसे यदि दश दिन भोजन न करे 
शौर जीवित भी रह जाय तो भी वह अद्र्टा, अश्रोता, अमन्ता, भगोद्धा 
सक्तां ओर अविज्ञाता हो टी नाता है । किर अन्नकी प्राति होनेपर ही 
वह द्रष्टा होता दै, श्रोता होता दै, मनन करनेवाला होता है, बोद्धा 
होता षै, कर्ता होता दै ओर विज्ञाता होता दै । ठम अन्ञक्रौ उपासना 
करो ॥ १॥ 
अनं वाब बलाद्धूयः; बलेः | अन्न दौ वरते उक्ष ह, 
क्योकि यह बल्करा कारण दै। 
तुस्वात्‌। कथमन्नस्य बलेतुत्वम्‌!| अनन ॒बलका कारण क्रिस प्रकार 
ट £ यह बताते है--क्योकिं अन्न 
बलका कारण दहै इसख्यि यदि 
तस्माद्यद्यपि कशिदशरातरीर्ना- | कोई पुरुष दश ॒राततक्‌ भोजन न 


४ क्रे तो वह भन्नके उपयोगसे 
भ्रीयात्सोऽन्ोपयोगनिमित्तस्य होनेवाछे वल्के क्षीण हो जानेके 


बलस्य हन्या भ्रियते न वचेन्मरि- | कारण मर जाता है; बर यदिन 


इत्युच्यते-यस्माद्बलकारणमननं 














७५० 


छा्दोन्योषनिषल्‌ 


[ बष्याय ७ 


> 9-99-8 0 9 8 | 9922 > 9 ट 9 ~~ ॐ 4 


यते यद्य ह जीवेत्‌ दृदयन्ते हि 
मासमप्यनशनन्तो जीवन्तोऽथवा 
स जीवन्नप्यद्रष्टा मवति गुरोरपि 
तत एवाश्रोतेत्यादि पूव॑विपरीतं 
सवं मवति । 

अथ यदा दहटू्यहान्यनशितो 


¢ ~ ¢ 

दश्नादिक्रियास्वसमथः सन्नन- 
स्यायी । आगमनमायोऽन्नस्य 
्रप्िरित्यथंः सा यस्य विधते 
सोऽन्नस्याय । 'धायइत्येतदर्ण- 
व्यत्ययेन । अथान्नस्याया 
इत्यपि पाठ एवमेवा्थः । 
द्र्ेत्यादिकार्यभरवणात्‌ । 


दुर्यते ्न्नोपयोगे दषेनादि- 


सामथ्यं न तदप्राप्तावतोऽन्न- 
मुपास्स्वेति ॥ १ ॥ 


मरे जीवित रह जाय, व्यो 
महीनेभर न सखनेवाछे भी नौविति 
रहते देखे नाते दै, वो [णर 
अवस्था ] जीवित रहनेषर कए 
गुस्का भी दशन न करनेबास हो 
जाता है तथा उनसे धवण करनेवाग 
भी नही रहता--इत्यादि ध्व 
नात पदटेसे विपरीत हो जाती दै । 
फिर जब बहुत दिन भोजन न्‌ 
करनेपर दर्थनादि क्रियाभि 
अघ्मर्थं रहनेपर भन्नका भायी-- 
सागमनक्ा नाम॒ (भायः अर्थ्‌ 
“भी पातिः है, वह जिते तौ द 
उसे “भनका भायौ' कहते है। 
्रुतिमे जो "मायै पा पाठ है ह 
(आयौ, का वर्णन्यत्यय करके है तथा 
'न्नस्याया रेषा पाठ भी षी 
अर्थे समञ्लना चाये, कमि 
श्रुति द्र्टा्रोवा भादि काम 
प्रतिपादन करती है । अन्तक 
उपयोग करनेपर ही दर्नाकिकी 
शक्ति देलौ जाती दै--उसग 
भप्रातति होनेपर॒नहां । अतः ध 
अन्नकी उपाञ्नना करो ॥ १॥ 


"= @ °= 





खण्ड ९] शाङ्करभाष्ये ७८१ 


3 9 9 अ 9 2 2 ॐ ® ® 9 ॐ 9 9 9 ॐ क न आ > 9 3 


स योऽन्नं बरह्मप्युषास्तेऽन्नवतो वे स लो कान्पान- 
वतोऽभिसिष्यति यावदन्नस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो 
भवति योऽन्नं ब्ह्मल्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नाद्य 
इत्यन्नाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान््वीखिति॥२॥ 


वह नो कि थन्नकी यह ब्रहम टै रेस उपासना रता दै उते 
अन्नवान्‌ शौर पानवान्‌ रोकड प्रपत होती दै । जशंतकं अन्नक़रौ गति 
हे वहयतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती दै, जो कि अन्तकौ "यह ब्रहम 
ह पेमौ उपासना करता दै । [नारद-] भगवन्‌ | क्या धन्नसे बदर 
भी कु ह! [सनकुमार-] “जन्नसे बहकर भी हे हौ ॥ (नारद ] 
"भगवान्‌ मुस्े उसीका उपदेश करं" ॥ २ ॥ 


फलं चान्नवतः प्रभूताननान्व | ( उसे परत हीनेवारा ) १७ 


ख लोकान्पानवतः प्रभूतोदका- | अन्नवान्‌--अषिक अन्नवलि 
जोर पानवान्‌-- बहुत जलवे 


न्न नित्पसम्बन्धाल्लो- 
+| पानो बन्धाल्लो लको, कवि जन्त भौर जला 
कानमिसिभ्यति । समानम- | निल सम्बन्ष दै, परा होवा दै । 
न्यत्‌ ॥ २॥ शेष पूर्वत्‌ दै ॥ २ ॥ 


--‡ 0 $~ 
इतिरुढान्दोग्योपनिषदि सप्तमाभ्याये 


नवमखण्डमाण्यं सम्पृणेम्‌ ॥ ९॥ 


-य्यन- 











दुक्षः छण 





अन्नकरौ अपेक्षा जलका महत 


आपो वावान्नादमूयस्यस्तस्माद्यदा सुवन 
भवति व्याघोयन्ते प्राणा अच्च कनोयो भविष्यतीत्यथ 
यदा सुदृष्टिभवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहू 
भविष्यतीप्याप एवेमा मूर्ता येयं परथिवी यदन्तरिक्ष 
यदवयोयरपवैता यदेवमनुष्या यस्पद्चवश्च वयारसि च 
तरणवनस्पतयः शापद्‌ान्याकीट पतद्धपिषीलिकमाप 
एवेमा मूता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥ 


जल ही अन्नकी अपेक्षा उछरृष्ट है । इसीसे जव घुवृष्ि ती हेती 
तो प्राण [ इस्यि ] दुसी हो जाति है कर जन थोडा होगा । गौर जब 
सदष्टि होती दै तो यह॒सोच़र कि खूघ अन्न होगा प्राण परहन्न हे 
जाते है । यह जो प्रथिवी ह मूर्तिमान्‌ जल ही हे तथा जो अन्तरिक्ष) 
जो चुरोक, जो परवत, जो देव.मनुप्य, लो पयु ओर पक्षी तथा नो तृण, 
वनस्पति, सवद ओर्‌ कीट.पतंग-पिपीटिकापर्थन् प्राणी है वे भी मू्ि 
मान्‌ जक ही द । अतः तुम जली उपासना करो ॥ १ ॥ 


आपो वावान्ाद्धयस्योऽन्नका- | अनका कारण होनेसे जल दी 
पणत्वात्‌ । यस्मादेवं तस्माद्यदा | अनक उपेक्षा उक्ष दै । ह 
< ^ सा नित 
यसििन्काले सदिः सस्यदिता | चसा, दै, इीस्थि न्धि 


ह सुृष्टि--अन्नके छ्य दिताव् 
शोभना वृष्टिन भवति ददा इन्द्र दृष्टि नही होती उस घर्म 





£ < ध न ---~-- 


कच्छ १० | 


हछाङ्करभाष्बाथे 


७५३ 


~ >~ >9 3 > > > 8८ 8८ 9 ¬>. 9 >. ह: ~: 9-9-99 9 9 ~ 9 9 


व्याधीयन्ते प्राणा दुःखिनो 
मवन्ति। छिनिमित्तम्‌ ! इत्याद- 
अनमस्मिन्‌ संवत्सरे नः कनी- 
योऽल्पतरं भिष्यतीति । जः 
अथ पुनयदा सुदष्टिभवति 
तदानन्दिनिः सुखिनो दृशः 
प्राणाः प्राणिनो मवन्त्यन्नं बहु 
परभूतं मविष्यतीति । अप्सम्भव- 
तवानमू्तस्यान्नस्याप एवेमा 
मूर्ता भूतंभेदाकारपरिणता इति 
मूर्ता येयं परथिवी यदन्तरिक्ष 
मित्यादि, -आप एवेमा मूर्ता 
अतोऽप उपास्स्वेति ॥ १ ॥ 


पाण व्यथित- दुःखो होते है। 
किषचिये दुःखी होते ई ! यह श्रुति 
वतङातो है- इस वषं हमारे स्यि 
थोड़ा अन्न होगा-इकष्यि । 
शौर फिर जि समय सुवृष्ट 
होती है उस समथ प्राण अर्थात्‌ 
प्राण खी--इषित होते दै किं 
[ इस्त बार ] बहुत-स यानी खुब 
अन्न होगी । क्योकि मूते अन्न जक्से 
उन्न हुआ दै इसि यह मूतं 
अर्थात्‌ मूर्तिमान्‌ मेदके आकारे 
प्रिणठ हो जने कारण जो मूरति 
मती है वह यहं एथिवी ओर घन्त- 
रिक्ष इत्यादि मूर्तिमान्‌ जर दी दै। 
अतः तुम जरो उपासना करो ॥१॥ 





स योऽपो ब्र्यव्यपास्त आभोति स्वान्कामाई 





स्तृसिमान्‌ भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो 
भवति योऽपो ब्रह्मेव्यपास्तेऽस्ति भगवोऽद्धद्यो भूख इत्य- 
द्यो वाव भूयोऽस्तोति तन्मे भगवान्‌ बवीचिति॥२॥ 


वह जो कि जलक्री “यह बरदा है" रेसी उपासना करता दै, सम्पूण 
कामना्क्नो पराप्त कर ` ठता है ओर तपिमान्‌ होता दै । जहोतक 
जकुक्षी गति ह वर्हऽक उसकी स्ेच्छागति हो बाती दै, जो कि जलकी 





(> > क 


७५७ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अभ्याय ७ 


> ~ > ¬ > > ¬ > ~ > ~ 2 ¬ ~ ८ 8 ८ ~ ~ ~ 2 
यह रहम दैः पे्ो उपासना करता है । [ नारद] 'भगवन्‌ | कया 
जरसे भी शर कुछ हे ? [ सनल्ुमार--] (न्ते श्ष्ठ भी है ही 
[ नारद --] "भगवान्‌ मुस्े उसीका उपदेश करं, ॥ २ ॥ 


फलं स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त 
आम्रोति सर्वान्कामान्कराभ्या- 

< ^~ [+ ¢ 
न्मूतिमतो पिषयानित्यथंः । 
अप्संभवत्वा्च  दपेरम्बुपा- 
सनात्निमां च भवति । समान- 
मन्यत्‌ ॥ २ ॥ 


[ इस उपासनाकरा ] फर वह 
जो किं जल त्रह्म है' देप उपा्ना 
करता हे सम्पूणं कामनाओंको- 
काम्य वस्तु ओंको अर्थात्‌ मूर्तिमान्‌ 
विषयोंको प्र्तकर केता है। तथा 
तृप्ति भी जलननित होनेके कारण 
जरी उपाक्षना कृरनेसे वह तृक्िमान्‌ 
होता दै । रोष सव पूर्ववत्‌ दै ॥२॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि खपमाण्याये 
द्शमसण्डमाष्यं सस्पूर्ण॑म्‌ ॥ १०॥ 


88 <© 
दद 








जटकी अपेक्षा तेजकी प्रषानता 
तेजो वावाद्धयो भूयस्तद्वा एतद्रायुमागद्याकाश- 
मभितपति तदाहूरनिञ्ञोचति नितपति वर्षिष्यति वा 
इति तेज एव तपपूरव दशयित्वाथापः खजते तदेतदुर््वा- 
भिश्च तिरश्चीभिश्च विचुद्धिराहादाश्चरन्ति तस्मा- 
दाहूर्बियोतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव ` 
तदपूर्वं द रीयितवाथापः जते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥ 
तेज ही जल्की पक्षा उक्कृटतर दै । वह यई तेज जित समय 
वायुको निश्चल कर्‌ आकाशको सब ओरसे तप्त करता है उस सम्‌ 
रोग कहते ह "गमींहोरदी है, बातापदहै, वर्षा होगी ॥ इस 
प्रकार तेज ही षदे जपनेक्नो उदुमूत हुभा दिखलकर्‌ फिर जस्र 
उत्पचि करता हे । वह यह तेज ही वर्षन, हेत दै । जब ऊध्कैगामी ओर 
तिर्यभगामी विचयुत्‌के सदित गढ़गह्टके शव्द कैर जाति है, तव उससे 
भमावित होकर लेग कते दै (बिनरी चमकती दै, बादल ग॑ता द, 
वरषा होगी / इस प्रकार तेव ही षरे भपेङरो दरि कर फिर 
जलको उतपन्न करता दै । अतः तेजकरी उपासना करो ॥ १ ॥ 
तेजो वावाद्धयो भूयः, तेचही जलङ़ी अपेक्षा उलछ्रष्टतर्‌ 
तेजसोऽप्कारणत्वात्‌ । कथ- | है क्योकि तेज जच्छ कारण हे । 
मप्कारणत्वम्‌ ? इत्याद--- | वह जका कारण किस धकार हे ? 


यस्मादन्योनिस्तेजस्तस्मा- यद वतलाति दै-कयोक्रि तेन ' 
तद्रा एतत्तेजो वायुमा- | जर्का कारण दै इसटिये वह यह 








\७4दै 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय ७ 


> 2 9 > 6 > 3-3-28 ~ 


ग्यावष्टभ्य स्वात्मना निशली- 
कत्य वायुमाकाशमभितपत्या- 
काशमभिव्याप्तवत्तपति यदा 
तदाहुलोँकषिका निशो चति सन्त- 
पति सामान्येन जगन्नितपति 
देहानतो वर्षिष्यति वा इति । 
प्रसिद्धं हि लोके कारणमभ्युद्यतं 
दृष्टवतः कायं भविष्यतीति 
विज्ञानम्‌ । तेज एव 
तसमूवंमात्मानद्धतं दर्शयिखा- 
थानन्तरमपः छजतेऽतोऽप्सषटु- 
स्वाद्भयोऽद्धयस्तेजः । 
किश्चान्यत्तदेतत्तेज एव 
स्तनयित्नुरूपेण वपदेतुभवति । 
कथम्‌ ! उर््वाभिधोर््वगा- 
मिर्विुद्धिस्तिरथीमिश्च तिर्थ- 
ग्गताभिश्च सहा दादाः स्तन- 


यनशब्दाधरन्ति । तस्मा- 
तद्रौनादाहुलोकिका विच्ो- 


तते स्तनयति वर्षिष्यति वा 


तेज जिस समय वायुको भागृहीत- 
आश्रित कर अर्थात्‌ अपने 
वाथुको निश्चरु कर आकाशो 
अभितप्त करता है-भाकाशषो 
सव॒ ओरसे व्याप्त करके संप 
करता है उस समय किक पुष 
कृते दै--"जगत्‌ ामान्यश्पते 
संतप्त हो रहा है, देहम भयन्‌ 
ताप है; अतः वर्षा होगी । कारण- 
को अभ्युदित हुभा देखनेवारको 
एसी बुद्धि होना कि कायं हग 
लोकम प्रसिद्ध ही हे । [इस प्रकर 
तेन ही पदञे अपनेको उद्धूत इभा 
दिखलाकर फिर उसके पश्चात्‌ जर 
उतपन्न कर देता है । इष कए 
जलका सटा होनेके कारण जलौ 
अक्षा तेन उक्कृष्टतर दहै । 

इसके सिवा [ दरे षं 
भी ] तेज ही विनठीके रप 
वर्करा तु होता दै। कि 
परकार--उर्ध्वा--ऊरष्वगामिनी भोर 
तिरी. - तिर्यगगामिनी विजटिथेकि 
सहित “आदाद्--गद़्गड 
के शब्द पैक जति है; 
पसा देखकर कोकिक पु 


है --“विजरी चमकती दै, १ 
गंता है, वर्षा, होगी' ६ 


| 


खण्ड १९ ] श्याङ्करमाष्यावं ७५७ 
$ 4 -4 ॐ थ क. 4 4 ॐ ॐ ॐ ॐ = = ॐ ॐ = = ॐ ॐ क 


इस्याययुक्ताथंम्‌ । अतस्तेन | वाकयका जथ उपरकहा नाका है । 
उपास्स्वेति ॥ १ ॥ अतः तुम तेजकी उपासना करो ॥१॥ 
स यस्तेजो ब्रहमसयुपास्ते तेजस्वी वे स तेजस्वतो 
लोकान्भास्वतोऽपहततमस्कानभिसिष्यति यावत्तेजसो 
गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति । यस्तेजो ब्रह्म 
सयुपास्तेऽस्ति भगवस्तेजसो भूय इति तेजसो वाव 
भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्त्रवीखिति ॥ २॥ 


वह जो कि तेनकरी "यह ब्रहम है' पेपी उपना कता है वह 
तन्वी हयोकर तेनःसम्पन्न, भरकाशमान ओर तमोदीन लोकरोको प्राप 
करता है । जहोँतक तेज़ी गति दै वर्तकं उसकी स्वच्छागति ही 
जाती द, जो किं तेलक चह ब्रहम है सी उपासना करता है। 
[नारद्‌--] भगवन्‌ | क्या तेजसे भी बढ़कर कुछ है ¢ [सनल्मार-] 
तेजसे बद्र मी दै ही ॥ [नारद] “भगवन्‌ सञ्च उीका उपदेश 
करं” ॥ २ ॥ 
तस्य॒ तेजस उपाप्तनफ | उप्त तेजक्तो उपा्नाका फक-- 
त ~ वृ निश्चय तेजस्वी हो जाता है 
तेजस्वी वै भवति । तेजस्वत एव = 
च लोकान्मासतः प्रकाशवतो- | उन भास्वान्‌ मकाशवान्‌ ओर 
४ अपहततमस्छ -- बाद्च-- [ रात्रि 
ऽपहततमस्कान्वाद्याघ्यास्मिका- | आदि ] ओर अध्यासिक-जज्ञा- 
नादि रेसे अन्धकारे रहित ोर्कोको' 
प्रा कर केता है। शेष सवका 


ध्यति । ऋछज्वथमन्यत्‌ ॥। २ ॥ | अथं सरल है ॥ २ ॥ 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि स्तमाध्याये 
पकादशखण्डमाप्यं सम्पूणंम्‌ ॥ १९ ॥ 


ज्ञानाययपनीततमस्कानभिसि- 











ददक्‌ सर 


तेजस्ते आकाद्की प्रधानता 


आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वे सूर्याचन 
मसाबुभो विययुननक्षत्राण्यभ्निराकारोनाहयत्याकषेन 
शृणोत्याकाशेन परतिश्रणोत्याकाशो रमत आकारो न 


रमत आकारो जायत आकाशमभिजायत आकारा 
सुपास्स्ेति ॥ १ ॥ 


आकारा ही तेजसे बढ़कर है । आकाशम दी पूर्य, चन्र ये देनो 
तथा विधुत्‌, नक्षत्र जर म्नि स्थित है । अकारे द्वारा ही एक 
दूषरेको पुकारते है, आकाशसे ही घुनते है, आकाशसे ही प्रति्वण 
करते टै, आकाशम ही रमण करते है, आकाशे ही रमण नही कते, 
जाङ्ाशमे ही [ सव पदार्थं ] उदत्न होते है ओर भाक्षाशकी भोर दी 
[सब जीव एवं अङ्करादि] बढ़ते है । तुम आक्ाशकी उपाघना करो ॥ १॥ 


आकाशो षाव तेजसो | आकार दी तेजते बकर टै, 

>ि जका 

भूयान्‌ । वायुस्तस्य तेजसः || ककि माकाश व, त. 

कारणत्व दयोम्नो वायुमा- | जरण दै वायुमा" पः 

गृद्येरि कर वायुका तेजके साथ वणन § 

ति तेजसा सदोक्तो वायु- जा चुका है, इसलिये यदह ते 

जशः } कारणं हि लोके | करिया गया। रोक भ 
कायाद्भयो दृष्टम्‌ । यथा कारण ही उद्कृष्ट देखा 


दि्बो जिक्ष प्रकार कि धटादवि्टी अपे 
वलाष्म्यो सृत्तथाकाशनो वायु- । मृिकि । इसी पकार आकाश वध. 





खण्ड १२ ] 


सितस्य तेजसः कारणमिति 
ततो भूयान्‌ । कथम्‌ ! 
आकाशे वै दर्याचनद्रमसावुमो 
तेजोरूपौ विचुन्कषत्राण्यत्निश् 
तेजोरूपाण्याकाशेऽन्तः । 
यच्च॒ यस्यान्तवतिं तदल्पं 
भूय इतरत्‌ । 

किश्वाकाञ्चेनाह्यति चान्य- 


मन्य आहूतशवेतर आकाशेन 
शृणोव्यन्योक्तं च शब्दमन्पः 
प्रतिशृणोर्याकाशे रमते कीड- 
स्यन्योन्यं स्स्तस्था न रमते 
चाकाशे वध्वादिवियोग 
आकाशे जायते न मूतं नाव- 
्टव्धे । तथाकाशमभिलक्ष्याङ्क- 
रादि जायते न प्रतिलोमम्‌ । 


अत अकारपरुपास्स्व ॥ १॥ 


शाङ्करभाष्यं ७५९ 


सित तेजा कारण है, इसय्यि 
उसे बहा दै । किस प्रकार बहा 
है-आकाशम ही तेन.स्वह्प सुं 
ओर चन्दरमा-ये दोनों दै तथा 
आाङ्गाशके भीतर दी तेजोमय विचुत्‌, 
नक्षत्र जोर अमि है । जो जिघ्तके 
भीतर होता दै वह छोय होता दै 
जर्‌ दूरा उपसे बडा होत है । 

इसके षिवा आङ्काश्चसे दौ एक 
व्यक्ति दूसरेको पुकारता है; किपीके 
द्वारा पुकारे जनेपर कासे 
ही दूरा पुरुष श्रवण करता दै 
तथा दृपरेके कहे हुए शब्दको 
जआकाश्चके द्वारा दी अन्य पुरूष 
श्रवण करता दै । स्र रोग आकाशम 
ही एक दृक्षरेके साथ रमण-- 
क्रीडा करते है ओर खी #आदिका 
वियोग हो जनेपर आक्घाशमे ही 
(खेदका अनुभव करते हुएरमण नही 
क्रते । आङ्काशमे ही जीव उदत्न 
होता दै, मूतं पदारथमे या मवरुदर 
स्थानम नदी तथा अक्राशको रक्ष्य 
करके दी भह्करादरि उलन्नहोते दै, 
विपरीत दशाम नही । इसच्यि तुम 
आकाश उपासना करो ॥ १॥ 


@ ली जिः शब्दस यहां सम्पूणं मोग बड उपलश्नित हे । तायं 
य हैकि भोग्य पदा्॑के प्रात हयोनेपर जो आनन्द्‌ होता है उसका मोग 
आकाशम द्यी होतः ्ै ओर उसका वियोगं होनेषर जो चेद्‌ हता है उसकी 


अतुमूति भी आकामे दी होती हं । 








७६० छान्डोण्योषनिषक 


>9 < 8 @८ 72 ध < < 5८ ७८ < छ < < 86 > 8 ८ कट ऋत ४ 


1 १ ॥ 
स य आकाशं बहमसयुपास्त आकाशवतो वैश 


रोकान्धरकाशवतोऽसम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिष्यति 
यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति थ 
9 कोऽ 
आकारां बरह्म सयुपारतेऽरस्ति भगव आकाशादृमूष 
इत्याकाशाद्राव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्त्री. 
विति ॥ २॥ 
वह जो कि भाकरी यह ब्रह्म हे, एेसी उपासना कसा है 

वह भाकारावान्‌, प्रकाशवान्‌, पीडारहित ओर विस्तारवले ठेेनो 
प्रात करता है । जरहातक आकाश गति ३ वरहो उसकी सेच्छगति 
हो जाती है, जो कि आकाश्चकी यह ब्रह्म है एसी उपासना कता 
दै । [नारद-] भगवन्‌ | क्यं जच्रशसे वद़कर भी कुछ है १ 
[ षनकुमार--|आकाडशसे बढ़कर भी है ही । [ नारद्‌-] “मगवान्‌ 
सु्षे उसीका उपदेश्च फरेः ॥ २ ॥ 

एलं शृण्वाकाशवतो वै बि- | [ इसका ] फल घुनो- 
विद्वान्‌ आश्नाशवान्‌ यानी विलास 
युक्त ठोकोँको तथा ्रकाश्चव्‌-- 
प्रराश्चवतः प्रकाश्चकाश्चयो्नित्य- | क्योकि प्रकाश ओर आकाशा 
नित्य॒ सम्बन्ध है अतः प्रकशयुक्त 
लोको, .अपरम्बाषः-सम्बाधनका 
सम्बाधान्‌ सम्बाधनं सम्बाधः | नाम सम्बाध ओर सम्बाध प्र 


उसे रहित 
सम्बाधोऽन्योऽन्यपीडा तद्रहिता (१ ह 
नसम्ब्ाधानुरुगायवतो विस्तीर्ण | साप 


+ त्‌ 

१परचारोत्नो विक्ती्णं गतिवाछे अर्थात्‌ वि 

सतीन्वतीणभचारं्ोपानमि- भचार रोको भरा होत द। 
सिभ्यति। यावदाकाशस्वे- 


९ "यावदाकाश्चस्यः आदि वाकयर्का 1 
० पटले कटे हुएके समान दै ॥*। 


स्तारयुक्तान्‌ स॒विद्रोललोकान्‌ 


सम्बन्धात््रकाश्वतश्च लोकान्‌ 


--------- | 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि ससमाध्याये दाद्सण्डभाष्यं सम्पूणम्‌ ॥ १९ 
[सि 1 न 





चयो खरल 





आकाश्चकरी अपेक्षा स्मरणका महत्व 
स्मरो वावाकाशादभयस्तस्माद्ययपि बहव 
आसीरन्न स्मरन्तो नेव ते कथन श्रुणुयुनं मन्वीरन्न 
विजानीरन्यद्‌ वाव ते स्मरेयुरथ श्रृणुयुरथ मन्वीरन्नथ 
विजानीरन्स्मरेण वे पुत्रान्विजानाति स्मरेण परुन्स्मर- 
सुषारस्स्वेति ॥ ९ ॥ 
स्मर ८ स्मरण ) द आकाश्चसे वद्र दै । इषीसे यपि बहुत से 
लोग [ एक स्थानपर ] बैठे हो तोभी स्मरण न कटनेपर वे न कुछ 
घुन सकते है, न मनन कर सकते है भोर न नान ही सकते है । 
निस समय वे सरण करते है उसी सम घुन सकते दै, उसी समय 
मनन कर सकते है ओर उसी समय जान सकते दै । स्मरण करनेसे ही 
पुर पुत्रको पहचानता दै अर स्मरणसे दी पञ्चर्ाको । ठुम स्मरक़ी 
उपासना करो ॥ १ ॥ 
स्मरो वावाकाशाद्धयः। स्मरणं | स्मर ही आकारसे बढ़कर हे । 
6 स्मरणक्ा नाम मरः है, यह भन्तः- 
स्मरोऽन्तःकरणधमेः । स आका- | करणका धर्मं है । वह आक्ाशकी 


न्य. | अपेक्षा भयान्‌! ( बढ़कर ) ह 
गसवानिपि ठेस लिष्गपरिवतंन करके# समञ्चना 


स्यथेन । स्मतुः स्मरणे हि सत्या- | चाहिये । स्मरण करनेवटिकी स्मरति 
काशादि सवेमथंवत्‌, स्मरणवतो | होनेषर दी आकाशादि सव साक 


® मूल श्रुति मँ “भूयः यदह ॒नपुंसकटिद्ख है॥ 4 स्मर" शब्द्‌ पुल्किद्घ है, 
अतः उका विशेषण होनेके कारण “भूयः' के स्थानम "भूयान्‌ पेसा पुक्लिङ्घ 


पाठ कर लेना चाये । 











७दैर 
भोग्यत्वात्‌ । असति तु स्मरणे 
सदप्यस्देष, सवकार्याभावात्‌ । 
नापि सच्चं स्मृत्य भावे शक्यमा- 
काशादीनामवगन्तुमित्यतःस्मर- 


णस्याकाादुभुयस्त्म्‌ | 
दृश्यते हि छोके स्मरणस्य 


भूयस्त्वं यस्मात्‌, तस्माश्रयपि सघरु- 


दिवा बहव एकरिमन्नासीरन्वुप- 


विशेयुः, ते तत्रासीना अन्यो- 
न्यमासितमपि न स्मरन्तशरेतस्युः, 
नैव ते कथचन शब्दं शृणुयुः, तथा 
न मन्वीरन्‌, मन्तव्यं चेत्स्मरे- 
युस्तदा मन्वीरन्‌, स्मृत्य भावान्न 
मन्वीरन्‌; तथा न विजानीरन्‌ । 
यदा बाब ते स्मरेयुरमन्तव्य 
विज्ञातव्यं श्रोतव्यं च, अथ 
शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजा- 
नीरन्‌ । तथा स्मरेण वै- मम 
पत्रा णते इति पुत्रान्वि- 
जानाति, स्मरेण पशून्‌ । अतो 


छाब्दोग्योपनिषद्‌ 


96 -9- > 25 >< 26 86 26८ 8 28: < >& >< 5 2७८ >8< ~ ऋ 8 


[ बष्याय ७ 
क्यो [२२ 
होते है, क्योकि े स्मतिमानूक ह 
मोग्य दै ¦ स्सृतिकेन होनेप्‌ तो 
विद्यमान वस्तु भी जवरिधमान ह 
हे, क्योकि उसकी सत्ताके क 
अभाव है । स्पृतिक्रा अभाव होनेष्‌ 
आकाशादिकी सत्तार ज्ञान भी नह 
हो स्कृता । ईइसीसे प्मरणकी 
आकारसे उक्छृष्टता है । 
वर्योक्ठि रोक स्मृति़ौ उकृष्टता 
देखी जाती दै, इसस्यि वि 
बहुत-से रोगे एक स्थानपर वेठेहं 
वे एक-दूसरेसे भाषण कते हए 
भी, यदि स्पृतियुक्त नहीं हते तो 
कोई शब्द श्रवण नीं कर सते। 
इसी प्रकार मनन भी नीक्‌ 
सकते | यदि वै मन्तव्य विषयक 
स्मरण करते तो मनन कर्‌ सकते 
ये, अतः स्मृतिका अमाव होन 
कारण मनन भी नहीं कर 8 
ओर न जान ही सकते है । 
समय वे मन्तव्य, विज्ञात्य अथ 
श्रोतव्य विषयकां स्मरण क 
तभी उसे घुन सकते, मनन 
सकते जर नान सकते टै । # 
भकार स्मरण कएतेसे ही ध ¢ 
पुत्र है, इस प्रकार पूत्रोको 
है जोर स्मरणे ही प्रमे 


€ण्ड१९] शाङरभाष्याथं ७६३ 
>€ >€ € < ॐ >€ < @€ < धट -‰ 6८ 8८ -&८ -8: -@< < ८ 8: ऋ + 8 8: 8 ऋः 


भुयस्त्वात्स्मरपुपास्स्वेति ।।१॥ | मतः उ्छृष्ट॒होनेके कारण तुम 
स्मरणक्रौ उपाषना करो ॥ १ ॥ 

स यः स्मरं बह्म त्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य 

यथाकामचारो भवति यः स्मरं व्रह्मदयुपास्तेऽस्ति 

भगवः स्मराद्धुय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे 


भगवान्बवीषिति ॥ २ ॥ 

वह जो कि स्मरङी "यह ब्रह्म दै ₹स प्रकार उपस॒ना करता है, 
उसकी जरहातक स्मरकी गति है व्हातक स्वेच्छागति हो जाती है, जो 
कि स्मरङी "यह्‌ ब्रह है" इस प्रकार उपासना कत्ता हे । [ नरद] 
भगवन्‌ | क्या स्मरसे भी श्रेष्ठ कुछ है !' [ सनल्छुमर-] स्मरसे भी 
रेष्ठ है ही ।' [ नारद-] भगवान्‌ मेरे प्रति उसका वर्णन करे ॥२॥ 
उक्तार्थमन्यत्‌ ॥२॥ रोष सयदा अथं पूर्ोक्तके समान 

हे॥२॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये 
अयोद्रा ्ण्डभाष्यं स्स्पणम्‌ ॥१२॥ 

















चतुद खण्ड 


स्मरणसे आश्चाकी महता | 


आशा वाव स्मराद्‌भुयस्याशेद्धो वे स्मरो मन्त्रानधीते 


कर्माणि रुते पुत्राश्च पडुडश्चेच्छत इमं इ | 
रोकमसुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥ 
आशा ही स्मरणकौ शपेक्षा उक्छृष्ट है । धाशासे दीप्त इभा ए 


ही मर्न््रोका पाठ करता है, कमं करता दै, पुत्र लोर पुर्भोकी इच्छ 
करता है तथा इस रोक घोर परलोककी कामना करता है । तुम भशर 


उपासना करो ॥ १ ॥ 


अगा वाव स्मराद्भूयसी । 


आजप्राप्तवस्त्वाकाङ्क्षा, आशा 


द्णा काम इति यामाहुः पयायः; 


सा च स्मराद्भूयसी । 
कथम्‌ ? आच्या हन्तःकरण- 


स्थया स्मरति स्मर्तव्यम्‌ । आशा- 


विषयरूपं स्मरन्नसो स्मरो मव- 


त्यत अशञेदर, आशयामिवर्धितः 


स्मरभूतः स्मरन्तृगादीन्मन््ान- 


आशा ही स्मरणसे बहकर दै। 
आञ्ा--अपाप्त वस्तुकी इच्छ 
नाम आशा ष; निका तृष्ण जै 
काम इन पर्याय शब्दस भी निष्ण 
किया जाता है । वह स्मएकी श | 
बद्कर हे । | 

सो किश्च प्रकार भत | 
करणम स्थित इई जाशसे ही श" 
स्मरणीय विषयका स्मरण क्ता टै। 
आशाके विषयके रूपका छ 
करनेसे यह स्मृतिको पर ध 
ह । अतः आयासे दीन 
वृद्धो प्राप्त हुभा स्मृति 
स्मरण करता हआ ऋगादि ५ 





हण्ड १७] ` शाहण्ाष्वारथं ७६५ 


-6- ~ 6 >< >< 2: > 9 -3- ~८ -‹ ¬: 8 क ~ ~ 9 ऋः 8 ऋ 29 -ः 


धीतेऽधीत्य च तदथं ब्राह्मणेभ्यो 
विधींश्च श्रुत्वा कर्माणि ङरूते 
तत्फरारयेव पुत्रांश्च पध 


क्म॑फलभूतानिच्छतेऽभिवाण्छ- 


त्याशयेव तत्साधनान्ययुतिष्ठति। 


इमं च लोकमाशेद्ध एव -रमरं 
लोकसंग्रह तमिरिच्छते। अमुं च 
लोकमशेद्धः स्मर॑स्तत्साधनावु- 
हएानेनेच्छतेऽत आशारश्नावबद्ध 
स्मराकाशादि नामपरयन्तं जग- 
सक्रीभूतं प्रतिप्राणि । अत 
आचायाः स्मरादपि भूयस्त्व- 
मित्यत आश्ायुपास्स्व ॥ १ ॥ 


जध्ययन करता है तथा उनका 
अध्ययन कर ओर ब्राक्षणोके मुखसे 
उनका अथं एवं विधि श्रवण कर 
उनके फलकी मासे ष्टी कर्म करता 
है तथा कर्मके फलमूत पुत्र भौर 
पञ्युओंकी हच्छा-क्ामना करता है 
एवं आञ्चासे दी उनके साघर्नोका 
अनुष्ठान करता है । मशासे समिद्ध 
हभ ही वह रोकसंग्रशरूप देतुओंसे 
इस लोकका स्मरण करता हुआ 
इसको इच्छा करता दै तथा आशासे 
समिद्ध हणा ही वह पररोककी, 
उसके साधनोंका अनुष्ठान करते हुए 
इच्छा करता है । इस प्रकार 
आश्ञारूप रस्सीसे बंधा हुभा यह स्मर 
एवं आकाशसे लेकर नामपरयन्त जगत्‌ 
र्यक प्राणीमें चक्रकी माँतिधूमरहा 
है। इस्यि भाश स्मरकी अपेक्षा भी 
उच्कृष्ट है; अतः तुम आशी 
उपासना करो ॥ १ ॥ 


~~न क~~ - 


स य आशां ब्रह्मदयुपास्त आशयास्य सवे कामाः 
सखध्यन्त्यमोधा हास्याशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं 
तत्रास्य यथाकामचारो भवति य॒ आशां बह्मत्यु- 
पास्तेऽस्ति भगव आशाया भूथ इत्याशाया वाव 
भूयोऽस्तीति तन्मे भगवन््रवीचिति ॥ २ ॥ 








७६६ छान्होन्योपनिचल्‌ [ मष्पाप 


>>> < ८ ¬< ऋ ¬ >~ ¬< 9 ८ -८ ~ => | 
वद जो कि आशाकी "यह बरह्म हैः इस प्रकार उपासना कल १ 

उसकी सव कामनाएं आशासे समृद्ध होती है । उसकी प्रानाए"सक । 

होती है । जरहोतक आशाकी गति हे वहोँतक उसकी खेच्छगि है । 

जाती है, जो फिं आशाकी "यह्‌ ब्रहम है" इस प्रकार उपासना त॒ । 

है । [ नारद--] भगवन्‌ | क्या आश्चासे बद्कर भी कुह है! 

[सनकुमार-] (आशासे बद्कर भी हे ही | [नारद-]] भगवान्‌ 

मुञ्चे वह बतङवे" ॥ २ ॥ | 


यस्त्वां बहयत्युपास्ते शृणु | नो पुरूष आशाक्षी थह त 
हेः इस प्रकार उपासना कत्त ६ । 
उसका फर श्रवण करो । सव॑ 
सितयास्योपासकस्य से कामाः| उपासना की हर भशसे उ । 
उपास्ककी सव॒ कामनाए स | 
सख्ष्यन्ति समूद गच्छन्ति । | अर्थात्‌ उन्नतिको प्रा हो नी ६. 
जर उसकी सव आङ्ा-प्रथ 
सफर होती है । तालं ह ६ 
किलो ङु उसका परर्थित है॥ 
हे वह-अवक्य सिद्ध शेत दै। | 
तद्वरयं भवतीत्यर्थः । यावदा- | “यावदाशाया गतम्‌ यादि बर 
शाया गतमित्यादि पूर्वत्‌ ॥२। | अथं पूर्ववत्‌ दै ॥ २ ॥ | 


तस्य फलम्‌ । आशया सदोपा- 


अमोधा दास्यारिषः प्रार्थनाः 


सवां मवन्ति यत्प्राथितं सव॑ 


= = ~ | 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये 


चतुदशखण्डभाष्यं सस्पुणोम्‌ ॥ १४॥ 


6.-><<रे ॐ > 





पञ्चदक् सणड 


आश्रासे प्राणका श्राधान्य 


नामोपक्रममाशान्तं कायं- 
कारणत्वेन निमित्तनैमित्तिकत्व 
चोत्तरोत्तरभूयस्तयावस्थितं स्मृ- 
तिनिमित्तसद्धावमाशारशना- 
पाेविपारितं सवं सव॑तो विस- 
मिव तन्तुभि्यस्मिन्प्राणे समपि 
तम्‌, येन च सवतो व्यापिनान्त- 
बहिगंतेन सत्रे मणिगणा इव 
घरूत्रेण ग्रथितं विधृतं च स। 
एषः- 


नामसे ठेकर आशापर्यनत जो 


न कार्यकारण एवं निमित्तनैमित्तिक 


रूपसे उत्तरोत्तर बदकर स्थित हे 
तथा जिसका सद्धाव स्मृतिके निमित्त- 
खूपसे सिद्ध होता है उस आश्ञाषूप 
जालसे तन्तुसे कमल्नास्के समान 
सव ओरसे जकड़ा हुभा थह समप 
जगत्‌ जिस प्राणमं समर्पित है तथा 
बाहर-भीतर व्याप्त हुए निस सर्वगत 
सूत्र राण) के द्वारा सूते मणिर 
[ मनकोँ ] के समान यह सव गथा 
हुआ जर विधृत है । वह यह-- 


प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभो 


समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्वश्समपितम्‌। प्राणःप्राणेन 
याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह 
पिता प्राणो माता पाणो भरता प्राणः स्वसा प्राण 
आचार्यः श्राणो बाह्मणः ॥ १ ॥ 

भाण ही भाशासे बद्कर है । जिस भकार रथचक्रकी नाभिमे 
अरे समपिति रहते है उसी प्रकार इस प्राणम सारा जगत्‌ समपिति 
है | प्राण भाण ( भपनी शक्ति ) कै द्वारा गमन रता है; भाण प्राणो 
देताहै भर प्राणके स्मि हीदेतादहै। प्राण ही प्ति ह; भ्रण 





७६८ छान्दोग्योषनिषद्‌ [न 
6-93-9 > 3-4८-8 > 9-8८-9 8 (न ७ 
१३ 


माता है, प्राण माई है) प्राण बहिन दै, प्राण भाचा्यं ष जेरा 
ही ब्राह्मण है॥ १॥ 


पराणो बा आशाया भूयान्‌ | प्राण दौ भागासे बक है। । 


स्म्‌ इः इसको उल्कष्टता किस प्रकार १। 
हथपस्य भूयस्तम्‌ ¶इत्याह दश- 
६ फेसी जिज्ञसा हिनेष 


स (५.2 र्‌ः 
न्तेन सम्थयस्तदधयस्त्वमू-यथा। दटन्तद्वरा॒ उषदी. उद्तम 
वै रोके रथचक्रस्यारा रथनाभौ | समथन करते हुए [ सनकछुमारजी- 


ततिः ति क्ते है-- लोकम जिस प्रक 
समपिताः सभ्प्रोताः सस्प्रवेरिता लके पश न 


इत्येतत्‌; एवमस्मि लविद्ङ्खात- | समे्पित-सम्पोत अर्थ्‌ सम 


रूपे प्राणे प्रत्तार्मनि देदिकै ुख्ये- परकारसे प्रवेशित रहते दै उ 
घातखूप' इस प्रण 
यस्मि परा देवता नामरूप | कर शिक्ग संवातस्प ई 


भ | यानी प्रज्ञासा्मे ° अर्थात्‌ देहिक शल 
व्याकरणायादर्शादौ प्रतिबिम्ब- । प्राणम, जिसमे कि परदेष 


बजीवेनात्मनारुप्रिषटा । यश्च | नामरूपकी गमिबयकति क (4 


| द्षणादिमं परतिनिम्बके समान गी 
महाराजस्येव सर्वाधिकारीश्वरस्य || रपत भवेश किया ह, नोगदा 


` ^(कस्मिन्न्वहयुत्करान्त उच्रान्तो | सर्वाधिकार के समान 


धरी 
भविष्यामि करिमन्बा प्रतिष्ठिते | सर्वाधिकारी है, जा म 
> उक्रमण करनेषर भे छ 
्रतिष्ठास्यामीति स प्राणमसृजत करा तथा कके स्थिः 


` ° उ० ६। ३] इति श्रुतेः || स्थित होगा यसा ॥ 
यस्तु च्छायेवानुगत दैशरम्‌, इ १ । व 
तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरपितो । छायाके समान ईैधरका ^ 
9--व्यष्टििगदेहोंका समुदायरूप उऽमष्टिसूज्ात्मा। 


र-उपापि प्राण ओर उपाधिम विषा 
च्‌ नकर यई 
दिया गया दै । न्‌ आत्माको पकता मा 








& 
खण्ड १५ |] छाहर्माष्वाथ ७६९. | 
~ 9 > 9 3-3-99 9 9-8८-8 ~ 8-3-9८ ~> 9 -9- ~> 


नाभावरा अपिता | हे, जैसा कि कौषीतकी ब्राह्मणो- | 
पनिषदूकी श्रुति है किं “जिस भरकर | 
रथके रमे नेमि अर्पित है ओर | 
रथकी नाभिमे अरे भर्पिति रै इसी | 
प्रकार यद भूतमात्रा परञ्ामात्राम | 
अर्पित है ओर प्रज्ञामात्रा प्राणे | 
२।८ ) इति कोपीतकरिनाम्‌ । | अपति है । वह बहप्राण ही । 
्रजञासा है ।'' इसीसे इस प्राणम 1 
ही उपर्युक्त सव समर्पित दै । 
अतः वह यह अपरतन्त्र प्राण । 
प्राणसे अर्थात्‌ अपनी शक्तिसे. ही 
गमन करता है । तासयं यह दै 
किं गमनादि क्रियार्जोमें जो इसका 
सामथ्यं है वह किसी जन्यके कारण 
नदीं है । सम्पूणं करिया, कारक 
घौर फरखूप मेदसमुदाय प्राण ही 
है, प्राणसे बाहर इनमे फो नहीं 
है- पसा इस प्रकरणका तालयं 
| प्राण प्राण ( शक्ति ) प्रदान 
करता दै; वह जो कु देता है 
भूतमेव । यस्मे ददाति तदपि | उषका स्वातमभूत ही है, निसे वेता 
है व्ह दानभौ प्राणके ख्यिही 
होती है । भतः पितर भादि 
नामबाला भी प्राण ही ह॥ १॥ 












भूतमात्राः प्रततामात्रास्वरपिताः 
प्रतामात्राः प्राणेऽपिताः स एष 


प्राण एव प्रज्ञात्मा!” ( को ०उ० 


अत एवमस्मिन्प्राणे सव॑ यथोक्त 
समर्पितम्‌ । 
अतः स॒ एष प्राणोऽपरतन्त्रः 





प्राणेन स्वशक्स्येब याति नान्यद्तं 


गमनादिक्रियास्वस्य सामथ्यं 


य = 


मत्यः । सवं क्रियाकारकफल- 
भेदजातं प्राण एव न प्राणाद्बदि- 
भूतमस्तीति प्रकरणार्थः । प्राणः 
प्राणं ददाति । यददाति तस्स्वात्म 


प्राणायेव । अतः पित्रा्याख्योऽपि 
प्राण एव ॥ १ ॥ 





- ७७० छान्दोभ्यो पनिषद्‌ [ 6 | 
ककय | 
सथं पित्रादिशब्दानां प्रसि- | पितर लादि शब्दकि प्रदर | 

~ ~ ~ | अर्थक ्ाग करके उन प्र 
द्ाथोत्सि्गेण प्राणविष्यत्वमिति विषयक होना ते समर, 


~ ~, | पसा प्रन होनेप्‌ कहा बत १. 
उच्यते । सति प्राणे पिवादिषु | को भाण नेष 0 


पिरादि तदृनछरा्तं आदिके लिये पितृ" आदि रान 
दिशब्दप्रयोगात्तदुक्रान्तौ 

(^^ ॥ पयोग क्रिया जतादै, उषे | 

च प्रयोगाभावात्‌ । कथं | उक्रमण कलनेपर इष प्ण | 


| 


प्रयोग भी नहीं होता। श्रि 

तत्‌ १ इत्याद- प्रकारं हे १ यह बतलते ३-- 
स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा खसा 
। ंँ किञिद्‌भृशमिव प्रत्याह | 

वाचाय वा ब्रह्मणं वा किञचिद्भश ह 
धिक्तवास्त्वत्येवेनमाहुः पितृहा वे खमसि मातृहा | 
भ | 

त्वमसि भ्रातृहा वे त्वमति स्वखहा वे त्मस्याचारयह 
वे तमसि बाह्मणहा ते तमसीति ॥ २ ॥ | ४ 
यदि कोड पुरुष अपने पिता, माता, आता, भगिनी, आचाय ६ 
नाहमणके र्थि कोई अनुचित बात कहता है तो [ उसके क 4 

उससे कहते ठँ तचे पिक्कार दै, तू निश्चय ही पिताका हनन ने 


ह, त्‌ तो माताका वष करनेवाला ह, त॒तो भको मारनेवासा दै, १ 


बदिनकी हत्या करनेवाला दै, तू तो आचार्या घात करनेवास ६।९ 
निश्वव हौ ब्रहमाती दै, ॥ २॥ 


स यः करिसिपवरादीनामन्य- | नो को कि पि भर्ति 


॥ मिष 
क किसीके भति यदि कोर शष 
क यदि तं भरमि तदन- उनके ` भलयुप श्र लं 
सुरू पमिव किञ्चनं तवङ्कारा- | (भरेत णादि) से युक्त कवा 








खण्ड १५ ] शाङ्रथाच्या्थे ७७१ 


दियुक्तं प्रत्याह तदेनं पाइवेस्था | दै तो उसके सभीपवतीं विचारश्ौङ 


आह्विवकिनो भिकत्वास्तु | लेग उपसे भिस्त 
॥ धिक्कार टै-पेखा कहते है । (तु 
धिगस्तु तवामित्येवम्‌ । पिता | निश्चय ही िदा--पिताका हनन 


वै त्वं पितुर॑न्तेत्यादि ॥ २ ॥ | करनेवाका है' इत्यादि ॥ २ ॥ 


अथ ययप्येनानुस्कान्तप्राणन्छरलेन समासं व्यति: 
षंदहेन्नेवेनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न 
भ्रातृहासीति न स्वखहासीति नाचायंहासीति न 
ब्राह्मणहासीति ॥ ३ ॥ . 
कितु जिनके प्राण उक्तमण कर गये दै उन पिता आदिको यदि 
वह शूलसे एकत्रित बोर छि्न-भिन्न करके नशा दे तो मी उषसे तू 
पितृहा है' (तु मातृहा दैः तु भ्रातृहा दै" तू बहिनक हवया करनेवाला 
हैः "तू जावचार्यकरा घात करनेवाला है" अथवा "तू ्रहधाती दै देषा कुछ 
नही कहते ॥ २ ॥ 
अथेनानेबो्ान्तप्राणांस्स्य- 


क्तदेहानथ यद्यपि शूलेन समासं 







फितु प्राण निकर ननेपर-- 


8 यदि वह शूल्से समासत एकत्रित 
समस्य॒ व्यतिषन्ददहेद्यत्यस्य | कटके व्यतिषन्द्दन करे अर्थात्‌ 
सन्दहेदेवमप्यतिकररं छिन्-मन्न करके जक; उनके 
न , | देसे सम्बद्ध समास-व्थासादि 

व्यासादिप्रकारेण दहनलक्षणं | क्रमसे दहन करनारूप पसा अव्यन्त 
वदेदसम्बद्मेव इर्वाणंनैवैनं्ूयुः| क कम, करप भी उससे त्‌ 
नि पितृहा है' इत्यादि नहौ कहते । 
कहत्याद्‌ । तस्मादन्वय अतः भन्वय.व्यतिरेकसे यह ज्ञात 

काभ्यामवगम्यत एतत्पित्रा्या-! होता दै कि यहं पिता भादि नाम- 


ख्योऽपि प्राण एवेति ॥ ३॥ । वा भी प्राण ही है ॥ ३ ॥ 


त ~: ‰ :- 
छा ॐ १4 


. | देहका साग कर देनेषर इन्दो . 





। | 
॥। 
1 
| 


७७९ छान्दोग्योयनिषद्‌ [ अष्याय ७ 


96 >< >< >< > >< 85 9 96 >< >< ¬< >< >< > 3-62-८ >< ट ~> 3 2 


तस्मात्‌- । भतः-- 

प्राणो द्येवेतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं 
पदयन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्‌. 
बुयुरतिवायसीत्यतिवायस्मीति नृयान्नापहुवीत ॥४॥ 


प्राण दही ये सव [ पिता आदि] है । वह नो इस प्रकार देखने. 


वारा, इत प्रकार चिन्तन ॒रनेवाल, भर इस प्रकार जाननेवासा 
अतिवादी होता है । उससे यदि कोई कहे कर, तू भतिवादी है" तो उत 
यही कहना चाये कि ह, अतिवादी ह, उसे छिपाना नहीं चाये ॥४॥ 
प्राणो दवैतानि पित्रादीनि| प्राण ही ये स्व चर भौर भचर 


सर्गाणि मवति चलानि स्थिराणि | पिता भादि दै । वहं यह पराणनेषा 
इस प्रकार उपयु क्त रीतिसे देखता 


च। स वा एष प्राणविदेवं यथोक्त हुभा अर्थात्‌ फरुतः भतुभव फरता 


प्रकारेण परयन्फरतोऽनुभवनेवं हआ, इसत प्रकार मनन फरता 
इम सर्थात्‌ युक्ति्ो्रारा चिन्तन 


मन्वान उपपत्तिभिधिन्तयमेवं | करत हुमा ओ इस प्रकार जानता 


विजानन्तुपपत्तिमिः संयोञ्यैव- | हभा यानी उपपत्ते संयुक्त 


2 _ ९ ९ करके यह पेसा ही दै इस परकर 
मेवेति निशवयं इुव॑न्नित्यथेः । निश्चय करता हला, कोक मनन 


सननविज्ञानाभ्यां हि सम्भूतः | ओर विज्ञानके दवारा निप्प्न ई 
शाका अथं निधित देखा नत 
शाख 

अत एवं परयनतिवादी मवति | वष्ट अतिवादी होता दै; तातययं यह 
कि उसका नामसे ठेकर भाथा 

नामा्याशान्तम ह ६ 
० बदन गीलो| पनत सम्पूण तच्छोका भतिक्रमणं 
= । करके वोलनेका स्वभाव होता दै। 
द 

 ब्बनी स्वस्त्त उ खाक्ात्कार करता इभा । 





खण्ड १५] च्ाङ्करमाभ्याथ ७७४ 
~8 > > >< 8८ 29: 8८-8८-99 86 8. < ~क: ह 8: 9 ऋ >< 8: 8 -9 ~ 


तं चेदुन्रयुस्तं ययेवमतिवादिनं उपे यदि कर अर्थात्‌ इस प्रकार 
८. नता अतिव्दन करनेवाले यानी जो पूसा 
सवदा सवः रब्दनामाच्ाशान्त- | देखता है कि सब रोग सवदा सम्पूणं 
शब्दोदरारा नामसे लेकर भाशापयन्त 
तरवो अतिक्रमण करके स्थित हुए 
प्राणका ही वर्णेन करते है उत्त भति- 
वदनशीर अतिवादीसे, जो मे ब्र्मासे 
लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूणं जगत्‌का 
प्राण यानी घास ह एसा कहने- 
प्राण आसाहमिति ब्रुवाणं यदि | वाख द, यदि कर क्रि तू अतिवादौ 
_ | हतो उसे यही कदना चाहिये 
नुयुरतिवाद्यसीति । बाढमतिवा- | @ हो म अतिवादौ ह उसे छिपाना 
नहीं चाहिये। जो सरवेड्वर प्राणको 
"यह मेँ ह इस परक्रार आत्ममावसे 
कस्माद्यसावपह वीत यसप्राणं | हो गया दै बड श्त प्रकार 
| उस (अतिवादितव) को छिपावेगा ? 


सर्वेशवरमयमहमस्मीत्यात्मतवेनो- | [ अर्थात्‌ उसके ल्य जपने 
अतिवादितको छिपनेका कोद 


पगतः ॥ 9 ॥ प्रयोजन नहीं है ] ॥ ४॥ 


५ 
-; ० :- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये 


पञ्चददाखण्डमाष्यं खम्पणम्‌ ॥ १५॥ 


प्रतीर्य वतमानं प्राणमेव वदन्त्येवं 
परयन्तमतिषधनशीरमतिषादिनं ¦ 


ब्रह्मादिस्तम्बपयंन्तस्य हि जगतः 


दस्मीति वरुयानापह. बीत । 





=-= 








ख ककण 
{इक्र ल्ह 
~: % : -- 
सत्य ह्ली जानने योग्य है 


स॒ एष नारदः सर्वातिश्चयं 


प्राणं स्वमात्मानं सर्वात्मानं भुत्वा 
नातः परमस्तीत्युपरराम । न 
पू्ववक्किमस्ति भगवः प्राणाद्भूय 
इति पप्रच्छयतः। तमेवं विकारा- 
नृतब्रह्मविज्ञानेन परितुष्टमकृताथं 
परमा्थसस्यातिवादिनमात्मानं 
मन्यमानं योग्यं शिष्यं मभिथ्या- 
ग्रदविशेषाद्विप्रच्यावयन्ाह भगवा- 
न्सनस्ुमारः । एष तु वा अतिव- 
दति यमहं वश्ष्यामि न प्राणवि- 
दतिवादी परमा्थतः। नामादपेकष 
त॒तस्यातिवादितम्‌। यस्तु 
भूमाख्यं सर्वातिक्रान्तं॒तच्तं 


परमार्थसत्यं बेद्‌ सोऽतिवादीत्यत 
आद- 


वे नारदी सबसे उ्ृष्ट भपने 
आमा प्राणको ही सर्वासां पुनङर 
यद्‌ समञ्चकर फि इससे परे ओर 
कुछ नहीं है, शन्त हो गये, करयोकि 
पूर्ववत्‌ उन्होने फेसा प्रन नही 
किया किं भगवन्‌ | प्राणसे बकर 
क्याहे इसन प्रकार विकार 
मिथ्या ब्रह्मके ज्ञानसे संवष्ट हुए, 
अङ्कतार्थं तथा अपनेको प्रमाथं 
सत्यातिवादी माननेवाे उस योग 
रिष्यको उक्त मिथ्याम्रहविरेषसे 
च्युत रते हुए, मगवान्‌ सनलुमारने 
कहा- रै जिघ्का भागे वणन 
कलशा वही भतिदन करता दै, 
परमार्थतः प्राणवेत्ता अतिवादी नदी 
है । उसका अतिवादिव तो नामादि- 
की जपक्षासे ही दै । कितु अतिबाद 
तो बही दै जो भूमासंक पर्वातीठ 
पटमा्थसत्य तत्को जानता है ॥ 


। इसी आशयसे वे कहते दै-- 


एष त॒ वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं 
भगवः सत्येनातिवदानीति सत्यं सेव विजिज्ञासितव्यः 


| मिति सस्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥ ३ ॥ 











£ 
सण्ड १६ | श्ाङ्रभाष्याथं ७७५ | 
~ >€ >< ॐ 9४८ 9 -& ८ 9 9 ~~ 9 ~ ~ ~ ऋ ८ ऋ 7 ~ 8 ऋ ० 


[ सनक्कमार-- ] जो सत्य ८ परमां सत्य भात्माके विज्ञान ) 
के कारण अतिवदन करता है वदी निश्चय अतिवदन करता है । 
[ नारद-] भगवन्‌ | य तो परमां सव्य विज्ञानके कारण ही अति- | 
वदन करता ह । [ सनल्छुमार-- ] सव्यकी दही तो विशेषरूपे 
जिज्ञासा करनी चाहिये ! [ नारद-] भगवन्‌ | मँ विरोषषटपसे सरको 
जिज्ञासा करता ह १॥ । | 

एष तु वा अतिवदति यः| [ सनकुमा-- ] रितु अति- 
वदन तो वही करता है नो परमाथ 
र सविजञानके कारण .अतिविदन , | 
यातिवदति सोऽहं खां प्रपन्नो | करता ह । [ न - | भगवन्‌ | | 
भगवन्सत्येनातिवदानि । तथा | आप्रा शरणागत हृभा मँ तो 
सत्यके ही कारण अतिवदन करता 
ह । ताप्यं यह है # भगवान्‌ मुञ्चे 


सस्येन परमाथंसर्य विज्ञानवत्त- 





मां नियुनक्तु भभवाद्‌ यथाहं 


सत्येनातिवदानीत्यमिप्रायः । 
यच्ेवं सत्येनातिवदितुमिच्छसि 
सत्यमेव त॒ ताबद्विजि्ञासितन्य- 
मित्युक्त आह नारदः । तथास्तु 
तदहि सत्यं भगवो विजिज्ञासे 


इस प्रकार उपदेश करं नि्षसे कर 
भे स्य ॒ज्ञानके कारण अतिवदन 
क्ट । यदि इस प्रकार तुम सत्यक 
ह्रारा अतिवदन करना चाहते हो 
तो सद्यकी दही जिज्ञासा करनी 
चाियेः-ेसा कहे जानेपर मारदजी 
बोले-टीक दै, अच्छा तो 
भगवन्‌ | मेँ सलयकी विजिज्ञसा-- 


विरोषेण ज्ञातमिच्छेयं तत्तोऽ्- | आपके दवारा विेषल्पते सक्त 


मिति ॥ १॥ 


जाननेकौ इच्छा करता ईह ॥१॥ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि , सप्तमाध्याये 
घोडशसरण्डभाष्यं सम्पुणम्‌ ॥ १६ ॥ 











सुषदः चर 
ग 
विज्ञान ही जानने योग्य है 
यदा वे विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन्तलयं 
वदति विजानन्नेव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञा 
सितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ 


जिस समय पुरुष सत्यको विकेषरूपसे जानता हे तभी वह स 
बोरुता है, बिना जाने सत्य नहीं बोरुता; अपितु विरोषषूपसे जानने- 
वाखा ही ` सत्यका फथन करता है । अतः विज्ञानकी ही विशेषषूपसे 
जिज्ञासा करनी चाहिये । [ नारद-] "भगवन्‌ | तँ विज्ञानो विरेष- 
रूपसे जानना चाहता ह ॥ १ ॥ 

यदा बै सत्यं परमाथतो | जिस समय पष सको 
विजानाति । शदं परमाथत | परमार्थतः जानता दे, अर्थात्‌ ह 
परमार्थतः सत्य दै" एेता जानता दै 
उस्न समय वह वाणीपर्‌ अवक्त 
वाचारम्भणं हित्वा सवेविकारा- | मिथ्या विकरारनातकरो त्यागकर समू 
वस्थं सदेवैकं सत्यमिति तदेवाथ | विकारे स्थित एक सत्‌ दी सघ 
वदति यद्वदति । है- रेषा समक्चकर फिर जो $8 
बोकता है उसको गोरुता दै । 
नु विकारोऽपि सत्यमेव । | शङ्खारि विशन मी 9 
“नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राण- | सत्य ही दै, क्योकि “नाम जर ह 
इछन्नः"' (बू०३० १।६। ३ ) । | षल्य है, उनसे यह भाण आच्छि 
“श्राणा चै सत्य तेषामेव सस्यम्‌” हे, “वागादि प्राण ही सय > 
(बरृ° उ० २। १।२ ) यह [ मुख्य प्राण ] उनका 
° ) | सत्य दै”, इस अन्य शु 
हत लनम्‌ । [ यही सिद्ध होता दै ] । 


सत्यमिति । ततोऽनृतं विकारजात 








तण्ड १७] 
सत्यम्‌ , उक्त सत्यत्वं श्रुत्य- 
विकारस्य परमाथ न्तरे विकारस्य 
सत्यतलनिरसः न॒तु परमाथपि- 
युक्तम्‌ । किं तरिं १ इन्द्रिय- 
विषयाधिषयत्वापिक्षं स्च त्यच्चेति 
सत्यभिल्युक्तम्‌ । तदद्रारेण च 
परमाथ॑सत्यस्योपलब्धिर्विवक्षि- 
तेति ! प्राणा वै सत्यं तेषामेष 


सत्यमिति चोक्तम्‌ । 

इहापि तदिष्टमेव, इद त 
प्राणविषयात्परमाथसस्यविक्ञा- 
नामिमानादयुत्थाप्य नारदं 
यत्सदेव सत्यं परमार्थतो 
भूमाख्यं तद्विज्ञापयिष्यामी- 
स्येष विशेषतो विवक्षितोऽ्ः । 
नाविजानन्सत्यं वदति । यस्त्व- 
विजानन्वदति 


रब्देनारन्यादीन्परमाथेषद्रुषानम - 


शाह्ुरथाष्याथं ७७७ 
व 29 > 595 > 9 3 > ॐ = = > + = 9 


समाधान-टीक है, श्रुयन्ते 
विकारका सत्यत्व अवश्य बतलाया 
गया दहै, परंतु वह प्रमा्थेकी 
सपेक्षासे नहीं बताया गया । तो 
फिरि क्या बात है १- इन्दरयोके 
विषय होने ओर न होनेकी अपेक्षासे 
सत्‌ ओर स्यत्‌ है, इस प्रकार बरं 
सुव्यकरा उर्छेख किया गया है । 
तथा उसके द्वारा वहाँ परमार्थं सत्य- 
की उपलब्धि दही विवक्षित दै । 
इसीसे वहाँ यह कहा गया है कि 
५ वागादि ] प्राण ही सव्य है, यह 
[सुख्य प्राण] उनका भी सत्य है ॥ 
यँ भी वह इष्ट दी है । परंतु 
यहाँ विशेषद्पसे सनछछुमारजीको 
यही अर्थं बतलाना भमीष्ट हैक 
नारदजीको प्राणविषयक परमां 
सत्य विज्ञानके अभिमानसे निष 
कर जो मूमासंजञक सत्‌ ही प्रमाथं 
सत्य है,उसे विरोषषूपसे समञ्ञाऊगा । 
उसे विद्ोषरूपसे जाने बिना को 
सत्य न्दी बोरता । नो कोई उसे 


सोऽग््यादि- | बिना जने बोरा है वह “अग्निभदि 


शब्दस अग्नि आदिको ही परमार्थं 
सद्रप समन्चकर बोरुता है। तु 


न्यमानो वदति । न तु ते रूप- | परमार्थतः वे रूपत्रय ८ रक्त, शङ 
जरयव्यतिरेकेण परमार्थतः सन्ति | बौर हष्णरूप ) से अतिरिक्त हँ 
तथा तान्यपि खपाणि सदपक्षया | नही । तथा वे खूप भी सत्क अपेक्षा 











७७८ छ्लोम्ोपनिषद्‌ [ मध्वाब ऽ 
नि 9 क कक 4 थ 9 5 68698 9 -ह 
नैव ॒सन्तीत्यतो नाविजान- | तो है ही नही । णतः परम्् 
विना जने को सत्य नही बोर 
सकता । सत्यका विशेष ज्ञान होने. 
स्यं बदति । पर ही पुरुष सत्य बोर सकता है । 
न च तत्सत्यविन्ञानमविजि-| किन्तु वषट॒सत्यविज्ञान बिना 


वितं जिज्ञासा क्यि- बिना उक़््ी 
जञासितमप्राधितं ज्ञायत इत्याह- | प्रार्थना चक्रिय नही नाना नता, 


इसीसे कहते टै कि 'िज्ञानकी# 
ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करी 
भिति । यद्येवं विज्ञानं मगवो | चाहिये ।॥ [ नारद-- ] दि 
देसी बात दै, तो भगवन्‌ | मँ 
विजिक्ञास इति । एवं सत्या- | विज्ञानको विशेषरूपे जाननेकी 
इच्छा करता ह । इसी प्रकार प्यते 
दीनां चोक्तरो्तराणां करोत्य- लेकर [ जागे बाईसवं खण्डके | 
न्तानां प्वपरवेुतं व्याख्े- | तोरि पनत, उतो पव 
पूर्वपूवं॑पदा्थं कारण दै-- 
यम्‌ ॥ १॥ व्याख्या करनौ चाहिये ॥ १॥ 


न्ष्यं बदति । विजानन्नेव 


विज्ञानंत्वेव विजिज्ञासितव्य 


न्क दि 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सखत्तमाल्याये 


सप्तद्दाखण्डमाष्यं सस्पर्णंम्‌ ॥ १७ ॥ 
9०9 


® “विज्ञान शे 


द अष्टम लण्डके प्रथम मन्त्रमे ] है | परन्तु वर्श उस 
का तास्पयं केवल न्तम भी आया दै । परन्व॒ 


याखलान है ओर यहाँ विशेष जान अर्थात्‌ वास्तविक शान ६। 





दण्द 


मति ही जानने योग्य है 


यद्‌ वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति 
मलैव विजानाति मतिस्तव विजिज्ञासितव्येति। मति 
भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ 


[ घनलछुमार-- ] “जिख॒ समय मनुष्य मनन करता है तभी वह 
किरोषरूपसे जानता है; बिना मनन क्य कोद नदी जानता, णप्तु 
मनन करनेपर्‌ ही जानता है । अतः मतिकरी दी विरोषरूपसे जिजञाघा 
करनी चादिये ॥ [ नारद-- ] भगवन्‌ | मँ मतिके विज्ञानकौ इच्छा 


करता है" ॥ १ ॥ 


. यदा बै भुत इति । सति- | जिस समय मन करता है 
ननं वरो मन्तन्यविषय | इत्यादि । “मकि भर्यात्‌ मनन-- 
आदरः ॥१॥ तक्--मन्तन्य विषयके प्रति भाद्र। 


~न 942 9 


इतिच्छान्दोभ्योपनिषदि सप्तमाभ्धायेऽषटद्‌ शच- 
कण्डभाध्यं सम्पूणेम्‌ ॥ १८॥ 

















एकान्त णह 


न --5 8 १~-~ 
अद्धा ही जानने योग्य है 
यदा वे श्रदधात्यथ मनुते नाश्रदधन्मनुते रद 
देव मनुते श्रद्धा सखेव विजिन्ञासितव्येति । भरदा 
भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ 
[ सनक्कृमार-- ] “निस समय मनुष्य श्रद्धा रता दै पमौ वह 
मनन करता है; बिना द्धा कयि कोई मनन नहीं करता । णपितु श्द 
करनेवाला ही मनन करता है । अतः श्रद्धाको दी विललेषरूपसे जिज्ञप्ा 


करनी चाहिये | [ नारद्‌-- ] भगवन्‌ | मँ श्रद्धे विज्ञानी इच्छ 
करता है ॥१॥ 


आस्तिक्यबुद्धिः द्धा ॥१॥ | आस्तिक्य वुद्धिका नाम ्रद् 
हे॥ १॥ 


9 9, 
णि वि. यै 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि खततमाण्याये पकोन- 
विंशक्ण्डमाष्यं सम्पणेम्‌ ॥ १९ ॥ 


3 











विक्त खणड 


निष्ठा ही जानने योग्य है 


यदा तै निस्तिष्ठत्यथ श्रदृधाति नानिस्ति्ज्ुद- 
धाति निस्तिष्ठन्नेव श्चदधाति निष्ठा स्वेव विजिज्ञा 
सितब्येति ! निष्ठा भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ 


[ सन्कुमार-- ] निष समय पुरपक निष्ठा होती है तभी 
वह शरद्धा करता षै; विना निष्ठके कोई श्रद्धा नही कता) भपितु 
निष्ठा करनेवाखा ही श्रद्धा छता दै । मतः निषठाको दी विशेषरूपे 
जाननेकी इच्छा करनी चाये ॥ [ नारद-- ] “भगवन्‌ । मे नको 
बिरोषरूपसे जानना चाहता है! ॥ १ ॥ 

निष्ठा गुरुशुभरषादिस्तत्परसव निष्ठा गुरुश्श्रूषा आदिक कहते 
ह । उसमे बरहमविज्ञानके ल्यि तत्पर 
ज्यवित्तानाय ॥ १ ॥ रहमा ॥ १ ॥ 


"~" ©@© [ग 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये 
विंदाखण्डमाष्यं सम्पुणोम्‌ ॥ २० ॥ 








1. 





ति 


एककल 


क © क 


कति ही जानने योग्य है 


यदा वे करोस्यथ निस्तिष्ठति नाङ्कत्वा निस्तिष्ठति 
छरस्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । 
छृति भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ 


[ सनल्कुमार-- ] “जित समय मनुष्य करता है उस समय 
बह निष्ठा भी करने रगता है; बिना कयि किसी निष्ठा नदीं होती, 
पुरुष करनेपर ही निष्ठावान्‌ होता दै ¦ अतः छति़ी दी विरोषद्पते 


जिज्ञासा करनी चाहिये ® [ नारद-- ] (भगवन्‌ | भँ कतिक विरोक 
रूपे निज्ञासा कता है ॥ १ ॥ 


यदा वै करोति। कृतिरिन्दरि- | निस समय मवुष्य करता है। 
यसंयमधित्तेकाग्रताकरणं च । | 'हृति' इन्दियसंयम ५ ॥ त 

= व | उ 
सत्यां हि तस्यां निष्ठादीनि | एकायता करनेको फ 


५ दोन दी अपु [व क 

यथोक्तानि भवन्ति विज्ानाव- नष्ठासे लेकर विज्ञान बह 

सानानि॥ १॥ साधन होते है ॥ १॥ - 
--{--*------ 


इतिच्छन्दोग्योपनिषदि सप्तमाष्याये 
परू वंसजण्डमाप्य सस्प्णैम्‌ ॥ २१ ॥ 


> 3 | 





हाकि 





सुख ही जानने योग्य है 


यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं र्ग्ध्वा 
करोति सुखमेव रुच्ध्वा करोति सुखं स्वैव विजिज्ञासि- 
तव्यमिति । सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ 


[सनलुमार-] “जब मनुष्यको घुख प्राप्त होता दै तमी वह कता ह; 
विना घुल मिले को$ नहीं करता, अप्तु घुल पाकर ( पनिकी जशा 
रखकर) ह करता है; अतः घुल्की ही विशेषरूपसे निज्ञासा करनी चादिये।' 
[नारद] “भगवन्‌ ! मँ लकी विेषषटपसे जिज्ञासा करता द ॥१॥ 

सापि कृतिर्यदा सुखं रमते | वह ङृति भी, निसं समय घुल 
मिरुता है अर्थात्‌ जिस समय पसा 

मानता है कि ज्ञे आगे बतलाया 
8 जानेवाखा निरतिशय घु प्राप 
रन्धव्यं मयेति मन्यते तदाः| करना चादिये, तभी होती दै । जिस 

८ रक्ार लोकिकं ति इष्टफल्जनित 
भवतीत्यथः । यथा दृष्टफल- धके लि होती है सी भग्र 
घ प्रसंगे भी बिना घुख मिरे 
को$ नदीं करता । थधपि वह फक 
लग्ष्वा फरोवि । मविष्यदपि मविष्यत्काठ्कि होता हैवो मी 

| “छन्ध्वा ( पाकर ) रेसा [ पूर 


फलं लस्ष्वेसयुच्यते तददिदय | कारिक क्रियाष्पसे ] कदय जता 
हे, क्योकि उसीके उद्देश्यसे 
्दृचयुपपततः । दूषि होनी सम्भव है । 


सुखं निरतिशयं वक्ष्यमाणं 





सुखाृतिस्तथेदापि नासुखं 














७८४ छाम्डोग्योपनिषत्‌ [ मध्याय ७ 
0 9 -8 
धथेदानीं ृत्यादिषृत्तरोत्तरेषु | भव यह पराह होता क 
तिसे लेकर उत्तरो सापेक्ष 
होनेपर सत्य स्वयं ही नुमेव 
इति न तद्िज्ञानाय पएथग्यत्नः | दौ नायगा, षके विश्न सि 
पथक्‌ प्रयत नहँ करना चाहिये- 
¢ ~ ड ^ 
फायं इति प्राष्ठं तत इद्‌ | इसीसे यह कहा गया कि 
। “पुखकी ही विङेषूपसे निकषा 
च्यते सुखं स्यैव ॒विनिन्ञा- | करनी चाहिये, . इत्यादि । मि 
“भगवन्‌ | भ ुखकी विरोषपते 
जिज्ञासा करता है इत प्रकार 
भगवो विजिन्तास इत्यभिघुखौ- | [ खलविज्ञनके भरति ] ग्ध 
हुए नारदजीसे सनकुमाएी 

भूताया ॥ १ ॥ कते है ॥ १॥ ॑ 


सत्सु सस्यं स्वयमेव प्रतिभासत 


सितन्यमित्पादि । सुखं 





इतिच्छान्दोम्योपनिषदि सम्तम्राभ्याये 
छाविंदाखण्डमाष्यं सस्पूर्णम्‌ ॥ २२ ॥ 











चयदि शरड 


-~--१ 9 ‡= 


भूमा ही जानते योग्य है 
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमेव 
सुखं भूमा तेव विजिज्ञासितव्य इति । भूमानं 


भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ 
[ सनसुमार-- ] ननिश्वव जो ममा है वही घुख है, अस्प 


घुल नदी है । ख भूमा ही | मूमाकी दौ विरोषरूपसे जिज्ञासा 
करनी चारय ॥ [नारद --] भगवन्‌ | चै मूमाकी विशेषरूपसे जिज्ञसा 


करतार्ह्॥ १॥ 
यो वै भूमा महन्निरतिशयं निश्चय जो मूमा दै-- महान्‌, 
8 निरतिशय जीर बहु--ये ईइसके 
बह्धिति पर्थायास्तत्सुखम्‌ । | पर्याय ई वही ख है । उससे 
ततोऽबाकसाविशचयत्वादल्पम्‌ । | नीच ५ सातिशिय ( 1 
स्मिन्न म धिक ) दोनेके कारण अल्प € । 
अतस्तस्मिन्नन्पे सुखं नास्ति । | जतः उस जल्पं घुख नहो दै; 
अल्पस्याधिकदष्णादेतुखात्‌ । | वर्योकि अल्प ॒तो अधिक्‌ वृष्णा- 
ष्णा च दुःखबीजम्‌ । न हि | # दतु दै गौर तृष्णा दुःलकष 
,ल्रीजं ससं दष्टं ज्वरादि बीज है ( तथा लोकम दुःखके 
दुःखगरीजं सुखं दुष्टं ज्वरा | बीनमूत॒ उवरादि घुखदूप नशं 
लोके । तस्मायुक्तं नान्पे खुख- | देखे ¦ । अतः (न 
| | | 
मस्तीति । अतो भूमेव सुखम्‌ । नही द ग 
भूम सुखम्‌ । | इसल्यि मूमा ही सुखरूप हैः 
वृ्णादिदुःखवीजत्वासम्भवा- | कोक मूमामे दुःखके . बीनम्‌त 
द्धम्नः ॥ १ ॥ तृष्णादिका होना जघमभव है ॥१॥ 
अ. नज 
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये 
शरयोविंश्वण्डमाष्यं सम्पूणेम्‌ ॥२३॥ 
=~.@० {~~ 























क 
ऋतु{कक्र खख्ड 
भूमाके स्वरूयका प्रतिपादन 
्िर्षणोऽसौ भूमेत्याद-- | _ यह भूमा,भिन सेबर ह , 

सो बताते ई-- 
यत्र नान्यस्परयति नान्यच्छुणोति नान्यद्िजा- 
नाति स भूमाथ यत्रान्यस्पदयस्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजा 
नाति तदस्पं यो वे भूमा तदख्तमथ यद्स्पं तन 
त्य॑म्‌। स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति । स्वे महिम्नि 
यदि वा न महिस्नीति॥ १॥ 

[ सनल्ुमार-] “जह्य कुछ जीर नहीं देखता, कुछ भौर नहं 
सुनता तथा कुछ ओर नदीं जानता वह भमा हे । $ नह ई 
ओर देलता है, कुछ ओर घनता है एवं कृछ भौर जानता £ ष 
खल्प हे । जो भमा है वही भृत है ओर जो भल्प हे बह मलय ६ । 
[ नारद] (भगवन्‌ | वह (भूमा) किसे प्रतिति ६८ 
` [ सनकछूमार-] (अपनी मदिमामे, जवा जपन महिमा मी रही 
डे ॥ १॥ 
यत्र यस्मिन्भूम्नि त्वे नान्य- | जहँ--जिघ ममातप ददर 


दद्र ्टव्यमन्येन्‌ करणेन < मिन कोई अन्य द्रण किसी 
ह दव्य दिषयद्ो यन्य इनि 
विमक्तो दृश्यारपदयति तथा | द्वारा नही देखता घौर न ९ 


नान्यच्छृणोति । नामरूपयोरेवाः| उनव॒ हौ दै । 


भवादिषयभेदस वि नाम जोर सूपे ह ध 
न्तु ४५.५१ त॒दु जाता है; अत्‌ खनका 


खाच्ड २४] शाङ्करभाष्यं ७८७ 
4 (9८98 2 9 - क ॐ - ॐ ॐ ॐ ॐ > 4) => ॐ = @ = ॐ = 4 


योरेवेह दचनश्रवणयोगरदणसू, करनेवारी दर्शन भौर श्रवण हन 
ज दो इन्दर्योका ही यां धन्व 

अन्येषां चौपलक्षणाथत्येन । मननं इन्दि्योके उपलक्षणा ग्रहण किमा 
गया है। रितु मननक्ा मर्ह 

तत्रोक्तं द्रष्टव्यं नान्यन्मुत | "नान्यन्मनुतेः रसा कहकर भल्ग 
उर्रेख क्रिया गया है- प्सा 

इति, प्रायशो मननपूवंकत्वादि- | लाना च ककि ५: 
| प्रायः मननपूर्वक हभा करता है; 

जतानस्य । तथा नान्यद्िजानातिः तथा नहं कुक ओर जानता मी 
नहौ -जो पसे क्कष्णोवाडा है 
वह मूमा हे । | 
किमत्र अ्सिद्धान्यदश्ैनामावो | गुरुहा [ षह विचरना दे 
कि] 'नान्यल्यति' इत्यादि 

भूर्न्युच्यते नान्यत्पश्यतीत्या- वाकयसे मुमि लोकभविद्ध श 
दश्लनक्रा अभाव बतह्या गयादह 

दिना १ अथान्यन्न पर्यत्यात्मानं | मथवा भन्यको नही देखत, 
इषस्यि भपनेको ही देखता दै- ` 


एवंरक्षणो यः भूमा । 


` पर्यतीत्येतत्‌ १ ` | यह बतलाया गया दै ! 
शिष्य-- इससे क्या [ हानि- 
किं चातः १ काभ ] हे! 


यद्यन्यदक्शना्मावमात्रमि- | गुरु--यदि इष _ वार्यदारा 
अन्य पदाथके दशेनादिकरा अभाव 


त्युच्यते वदा दरैतसंब्यवहारवि- | ही बतलाया गया हो तव तो यह 

बात कटी क्ञाती है कि भूमा 
रक्षणो भूमेतयुक्तं भवति । अथा- | द्वैत्यवहारसे विलक्षण है शौर 
ह , | यदि अन्यदश्चनविशोषका प्रतिषेष 
न्यदशनविशेषग्रतिपेधेनात्मानं | करके यह कहा गया हो ड 


पदयवीत्युच्यते तदैकस्मिनेव | बह अपनेको देखत दे तो एकं 








७८८ छान्दोग्योपनिषद्‌ 
> > ८ 8 -६ >> 


[ भ्याय७ 


क्रियाकारकफलमेदोऽभ्युपगतो | दी किया, कारक जौ परु 


मवेत्‌ । _ 
यद्येवं को दोषः स्यात्‌ ? 


नन्वयमेव दोषः संसारानि- | 
वत्तिः । क्रियाकारकषरमेदो 
हि संसार इति । आ्मेकत्व एव 
क्रियाकारकफरुभेदः संसारवि- 
रक्षण इति चेत्‌ १ न; आत्मनो 
निर्विशेषेकत्वाभ्युपगमे दशंना- 
= 


दिक्रियाकारकषर्मेदाभ्युपगमस्य 
शब्दुसात्रस्वात्‌ । 
अन्यद्शना्मावो कतिपक्ेऽपि 
यत्रेत्यन्यन्न पयतीति च विशे 
पणे अनर्थक स्यातामिति चेत्‌! 
दश्यते हि लोकै यत्र शून्ये 
गृन्यन्न पञ्यतीदयक्तेस्तम्मा- 
दीनारमानं च न पयतीति 


न गम्यते। एवमिहापीति चेत्‌ ? 


मेद मानना हो जाता है । 
शिष्य--यदि रेषा ही हे 


¦ उस्म दोष क्या होगा ! 


गुरु --उसके संसारकी विरि 
न हदोना-वस यही दोष द 
करथोकि क्रिया, कारक नौर एल 
मेद हौ संसार षै । यदि को 
आत्माका एकत्व ॒होनेपर भी उप 
जो क्रिया, कारक शीर फरह्प मेद 
है वह संसारसे विलक्षण दै ते 
एसा कदना टीक्‌ न्दी, व्यो 
आस्माका निर्विशेष एकत स्वक्ष 
करनेपर जो उसमे दशनाद कि! 
कारक ओर फरुरूप भेद स्वीक 
करना है वह तो शब्दमत्र दै। 

रिष्य-द्धितु अन्य दशादि 
का अभाव प्रतिपादन करनेके पण 
भी “त्रः जोर अन्यन्न पयति 
दो विहेषण निरर्थक हेगि । शकर 
यह्‌ देखा ही नाता ह कि न्धं 
घरमे “किसी ओरको नदी ; 
एसा कह। जाता दै वी य # 
समज्ञा जाता कि उस रके 
ओर अपनो भी नदी द| 
यदिपे्ा दही य्होँभीहेते 





ण्ड २४ | 


न+ तखमसीत्येकसोपदेगा- 
दधिकरणाधिकतव्यमेदानुष- 
पत्तेः । तथा सदेकमेवाद्वितीयं 
सत्यमिति षष्टे निधौरिततात्‌। 
“अदृदयेऽनासम्ये" ( त° उ° 
२।७।१ ) “नन संदृशे तिष्ठति 
रूपमस्य! ( क० उ: ३।९) 
“धविन्तातारमरे केने बिजानी- 
यात्‌" (ब्रु उ० २।४। १४) 
इत्यादिभ्रतिम्यः स्वात्मनि 
दश्चेनाद्यनुपपत्तिः 

यत्रेति षिशेषणमनथंयः प्राप्त 
भिविचेत्‌ ! 

न, अविद्याकृतमेदापेक्षत्वात्‌। 
यथा सत्येकत्वादितीयत्वबुद्धि 
्रकृतामपे्ष्य सदेकमेवाद्ितीय- 
मिति संख्या्नदंमप्युच्यते, 
एवं भूम्नयेकस्मिन्नेव यत्रेति 
विशेषणम्‌ । अविद्यावस्थाया- 
मन्यद्ेनालुवादेन च भूम्न- 
स्तदभावत्वलक्षणस्य विवक्षि- 
तत्वान्नान्यत्परयतीति विश्ेष- 
णम्‌ । तस्मात्संसारग्यवहारो 
भूम्नि नास्तीति सदायाथः । 


क्ाङ्करभाष्यार्थ ७८९ 
$ 4 >४-<-----&: -ल ~ 8-5-99 8 2 ~ 9 3 ४ < ऋ 79 +< 


गु-एसा नदी हो सकता, 
क्योकि प्तू वह हैः इस प्रकार 
एकखका उपदेश हौनेके कारण 
आधार-आधेषरखूप भेदका होना 
सम्भव नहीं है । इसी प्रकार ष्टे 
अध्यायमें भी यह निश्चयक्िय जा 
चुक्रा दै कि एकमात्र अद्वितीय सत्‌ 
ही स्य दै" तथा “देनेर्मे न जने 
वे शरीररहित “आत्म” 
“इसका खूप दष्टिमं नहीं आता" 
“अरे | विज्ञाताको किक्षके द्वारा 
जाने" इत्यादि श्रतियोसे भी स्वात्मामे 
दशंनादिका होना सम्भव नहीं हे । 
शिष्य--किंतु इस प्रकार "यत्र 
यह्‌ विदोषण व्यथं सिद्ध होता हे १ 
गुर--नही, क्योकि यह 
अविदाकृत मेदकी अपेक्षासे है । 
जिस प्रकार प्रासङ्गिकं सत्थ एकत्व 
ओर अद्वितीयतबुद्धिकी अपेक्षासे- 
संख्या आदिके योग्य न होनेपर 
मी-- सत्‌ एक ओर अद्वितीय है" 
एसा कश जाता है उसी प्रकार 
एक ही मूमामे “यत्र यई विशेषण 
है । तथा अविदयावस्थामे अन्य 
दर्शनका अनुवाद होनेके कारण 
भूमाको उसके अभावत्वूप लक्षण- 
वाखा बतलाना इष्ट॒ होनेसे 
(नन्यत्परयति' एेसा विहोषण दिया 
गया है । अतः सार यह दहे ङक 
मूमामे संसारज्यवहार नहीं है । 














७९० छान्दोग्योपनिषद्‌ ८; 


अथ यत्राविद्याविषयेऽन्यो- 


ऽन्येनास्यत्पश्यतीति तदल्प- 


अध्याय 
| न 
| रतु जहां भिधा गों 


| अन्य जन्यको अन्यके द्वारा देह 
है बह ल्प दै, तास बह दकि 


मविद्याकाल मावीत्यथंः। यथा | वह केवर अव्िदिके सपय ह 


स्वमदुश्यं वस्तु प्राक्‌ प्रबोधात्त- 

त्कारूमावीति तद्वत्‌ । तत एव 
श ^~ 

तन्मत्य विनाशि स्वमरवस्तुवदेव 

तदिपरीतो भूमा यस्तदगृतम्‌ । 

तच्छब्दोऽसृतत्वपरः । ` 

स तक्चवलक्षणो भूमा हे भगवन्‌ 


कस्मिन्‌ प्रतिष्टित इत्युक्तवन्तं 
नारद्‌ प्रत्याह सनत्ङुमारः---स्वे 
महिम्नीति; स्व आत्मीये महिम्नि 


माहास्म्ये विभूतौ प्रतिष्ठितो भूमा। 


यदि प्रतिषठाभिच्छसि क्वचिद्यदि 


बा प्रमाथभेव पृच्छसि न मदि- 


रहनेवारा है । जि प्रकार छप 
दिखरायी देनेवारी वतु नाने 
पूं स्वपरकार्म ही रहनेवारी हेती 
है उसी प्रकार [उसे नाना 
चाहिये । इससे वह स्वपे 
पदार्थंके समान ही म्य--विनाशी 
है। उसके विपरीत जो भूमा दै 
वह॒ अमृत । त्‌ शद 
जमृतत्वपरक है [ इषीसे नप 
लिङ्गका प्रथोग किया गया | 
तो, हे भगवन्‌ | वह ५ 
रक्षणवाला भूमा किम प्रि 
हे इस प्रकार ते & 
नारदजीसे सनत्कुमारनीने %९~- 
“अपनी महिमामे । तो वह 
शस्वे- अपनी महिम्नि म्हि 
अर्थात्‌ विभूति परति ै। 
जरः यदि करी उसकी ॥ 
जानना चाहते हो--अथवा 
परमार्थतः ही . पृषते | 
हमारा यह कथन दै कि 


स्यपि परतषठित इति जूः । | अपनो महिमम मी परि 


खंज्ड २४। शाङ्र्ाष्याथं ७९१ 
0.4 क क 2 9 9 9 क 9 9 ॐ 2 2 ॐ = = 2 = > 9 > 4 
धप्रतिष्ठितोऽनाभितो भूमा क्वचि-| दै । तालयं यह है कि भूमा 

4 अप्रतिष्ठित दै अर्थात्‌ कहीं भी 
त्यभंः | १ ॥ आधित नही है" ॥ १ ॥ 


यदि स्वमहिम्नि प्रतिष्ठितो | दि मूमा अपनी महिमम 
प्रतिष्ठित है तो उसे अप्रतिष्ठित क्यों 

भूमा श्थं तरदप्रतिष्ठ उच्यते,गृणु | कहा नाता दै ? घनो- 
गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिष्िरण्यं दास- 
भार्यं ेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं जवीमि वीसीति 


होवाचान्यो ह्न्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥ 

“इस रेके भो, अङव॒ आदिको महिमा कहते दै तथा हाथी, 
सुवण, दास, मर्या, तर जोर घर इनका नाम भी महिमा दै । किन्त 
मेरा रेसा कथन नहीं है, क्योकि घन्य पदाथ भन्ये प्रतिष्ठित होता ह । 
म तो वह कहता हरा सनत्मारजीने कषा ॥ २ ॥ 

गोअश्वादीह मष्िमेत्याचक्षते| इस रोकमं गो-भखवादिको 
महिमा कहते है । गो घौर भरवको 
(गोमश्च कहते रै । इन दोनां 
शाव्दोका इन्द्र समासमं एकवद्भाव 
हआ है । सर्वत्र गौ ओर अव 
प्रसिद्धम्‌ । तदाभितस्ततरतिषठ- | भादि ही मरहम दै इस भकार 
_ . | प्रसिद्ध हं । निस प्रकार चत्र 

मरै मवति यथा नाहमेवं | [ नामका कोई पुरुष ] उनके 
र 
द्ध व्ल यह परष्न होता है किं गावश्च अश्वाश्च' एेसा विग्रह करके पुक्‌ 

एवं बहुवचनान्त शब्दोका द॒न्दसमाष दज दै, एेखी दशामें गोअश्वम्‌' यह एक- 


वचनान्त नपुंडकटिङ्घ प्रयोग केसे हुआ { इसीका उत्तर देते हए कहते हं कि 
एकवद्धाव हआ है । इन्द्र प्राणितूरयसेनाङ्घानाम्‌ः इस पाणिनिसुजरसे यषां 


एकवदूमाव्‌ किया गया है, इससे एकवचनान्त हो गया दै तथा जक एकवद्भाव 
होता है वहा “सख नपुंसकम्‌” इस सूजके अनुसार नपुखकता भी दो जाती है।. 


गवभाश्चाथ मोअश्वं दन्दरेकब- 





द्धाबः। सवत्र गवाश्वादि महिमेति 





७९३ ` छन्दोग्योपनिषद्‌ 


>9 5 38099 308 258 4-6-89 इ ॥ ५ ४ 
स्वतोऽन्यं महिमानमाशत | धित वोर उनमे भति हे 


है उसी प्रकार चैत्रके समान ह 
भूमा चैत्रवदिति तवीम्यत्र भूमा भी अपनेसे भिन्न महिमो 


त वसि आश्रित दै--देसा गँ नहीं कव | 
हेतुस्वेनान्यो हयन्यस्मिन्प्रति गहं शयोक अन्य पष अनी 


छित इति व्यवहितेन सम्बन्धः । | भतिठित होत दैः इस व्यषु 
वाक्यसे इसका दैतुषपसे सम्ब 
किं त्वेवं ब्रवीमीति होवाच स | दै। रित भतो यह कहता 


| एसा ककर सनकुमारजीने 
एवेत्यादि ॥ २ ॥ एव अधस्तात्‌! इत्यादि कहा ॥ २॥ 


---; © = 


इतिष्छान्दोभ्योपनिषदि सप्तमाध्याये 
खठर्विंशलण्डभाष्यं सस्पणम्‌ ॥ २७ ॥ 


-#>9 ॐ 


ङक 
कञ्काङक्त खड 
सर्वत्र भूमाही है 
कस्मास्पुनःकचिन्न प्रतिष्ठितः १ | तो फिर दसा कयो कहा जाता 
है वह कहीं प्रतिष्ठित नहीं है £ 
इव्युच्यते--यस्मात्‌-- सो वतरते ठै; क्योकि-- 


स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स 
दक्षिणतः स उत्तरतः स ष्वेद्‌ <स्वमित्यथातोऽहङ्ारा- 
देशा एवाहमेवाधस्तादहसुपरिषटादहं पश्चादहं पुरस्ता- 
दहं दश्षिणतोऽहसु ्रतोऽहमेवेद श्सवमिति ॥ १ ॥ 


वही नीचे दै, वही उपर दै, वही पीठे है, वही आगे है, वही 
दायी मोर है, वही बायी ओर है ओर वदी यह सव है । अव उम 
अहकारादेश किया जाता हैम दी नीचे भेदी उप नेही 
पणेः मदी जगे ही दायी जोर मही बायीं भोर है भोर 
मेदी यह सबर्ह॥ १॥ 


स॒ एव भूमाधस्तान्न ठद्‌- | वोह बड मूमा हौ नीचे है 


व्िरक्ेणा्यदियते यस्मि ऽवसे मिनन भोर नोर यी इ 
प भोपरिादितयादि नहीं है जिक्षपर वह प्रतिष्ठित दो। 
तः स्यात्‌ तथापारशाद्त्या्‌ | इसी परक्रार “उपरिष्टात्‌, इत्यादिका 
समानम्‌ । सति भूम्नोऽन्यस्मि- | अथं भी समञ्ञना चाहिये । मूमासे 
स्भूमा दि प्रतिष्ठितः स्यान्न तु | भित्र भ ८4 9 भूमा 
तदस्ति । सएव तु स्वम्‌ । व विष्ठित हो; शि पवा 
निः नहीं । सब कुछ व्ही है । जतः 

अतस्तस्मादसो न कवित | इसीसे वड कीं अन्यत्र प्रतिष्ठित 


विष्ठितः । | नहीं है । 











७६४ छान्डोष्योखनि | अभ्या 


यत्र नान्यत्पदयतीत्यधिकर- | "नहो ह भौर च 
इस वाक्यसे भाषार-भवेय्न॒ । 
निदेश होनेसे तथा "वह नीचे 1 
धस्तादिषि च प्रोक्षनिर्दशादू- | इत्यादि वाक्यसे परोक्ष न्द ` 
होनेसे किसीको पेपी शा न 
। जाय कि भूमा द्रष्टा जीवते भिन 
त्याशङ्का कस्यचिन्मा भूदित्यथा- | दै इसलिये भव- इतके पथ्‌ 
अहकारादेश्च किया जता है । 
तोऽनन्तरमदङ्कारादेशोऽङ्कारे- | णहं काररूपसे आदेश ( उपदेश ) 

, । | क्षिया जाता है इसल्मि इषे 
गादि्यत अ । भहंकारादेश्च कहा दहै । दधते 
दरषटरनन्यत्वदश्नाथं भूमेव | अमिन्नल दिखलनेके सिये ष 

ही भै ही नीचे हैं इय 
निर्दिरयतेऽहङ्कारेणा हमेवाध- वाक्थद्वारा अहंकाररूपसे नदश 
स्तादित्यादिना ॥१॥ किया जाता है ॥ १॥ 





(स ५ 
 नाधिकतंभ्यतानिदंशात्स शए्वा- 


्रषडुजीबादन्यां भूमा स्यादि- 


अहङ्कारेण देहादिसद्यतो- ! अविवेकी रोग अटंकारते देहि 
ऽप्यादिश्यतेऽविवेकिभिरित्यतस्त- संघातका भी मदश्च करते ई; त 
` दाशङ्का मा भूदिति-- | एसी आशङ्का न हो इसस्ि-- 


अथात आसमादेदा एव आस्मैवाधस्तादा्मोपरिषटः 
दास्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तत, 
आस्मेवेद<सर्वमिति। स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान ए 
विजानन्नारमरतिरासमक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः € 
स्वराड्भवति तस्य सर्वेषु रोकेषु कामचारो भवति अथ 


क & 
क्ख्ड 2५ ] शा्त्माव्याय ७९५ 
अ ~ >~ > 8 ---- -8 ॐ 2 ॐ 9 > ~ ॐ ॐ 4 


येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति | 
तेषा९ सर्वेषु रोकेवष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥ 


अव जात्ूपसे दी मूमाका आदेश्च फिया जाता है । मात्मा ही 
नीचे ह, भात्मा दी उपर दै, णाता ही पीठे दै, जामा ही भागे है, 
णात्मा हयी दायीं ओर ह, आत्मा ही बाया जोर है भर भातमा हौ यह 
सब रै । वह यह इस प्रकार देखनेवारा, इष प्रकार मनन करनेवाला 
तथा विनलेषरूपसे इस प्रकार जानेवाला आतमरति, आत्मक्रीड, भात्म्‌- 
मि्ुन नौर आत्मानन्द होता है; वह स्वराट्‌ है; सम्पूणं लोकम उघरकी 
वयेच्छ गति होती है । रितु जो इससे विपरीत जानते है वे अन्यराट्‌ || 
( निना राना सपनेसे भिन्न कोर जौर दै, देसे ) भर क्षग्यडोक | | 
( शशीर रोकोको प्रा होनेवाठे ) होते दै । उनकी सम्पूणं कोको 
स्वेच्छागति नहीं होती ॥ २ ॥ 








अथानन्तरमात्मादेश्च आत्म- 


नैव केवरेन सत्ससूपेण बुदधे- 
नादिक्यते । आत्मेव सब॑तः 
सर्वमित्येवभेकमजं संतो व्यो- 
मवतपूनेमन्यशून्यं प्रयन्स वा 
एष विद्वान्मननविज्ञानाभ्यामा- 
त्मरतिरार्मन्येब रती रमणं यस्य 
सोऽयमात्मरविः। वथात्मक्रीडः। 
देदमात्रसाधना रतिर्बाध्यसाधना 


क्रीडा । छोके स्रीभिः सलिभिश् 


अब भागे भात्मादेश है र्थात्‌ 
केवल खत्सरूप शुद्ध भात्माके द्वारा 
ही भादेश किया जाता ै। इष 
घोर सब कुछ भाला दी है। 
इस प्रकार आकाशके समान सवत्र 
पूणं एक अन्‌ भोर अनन्य 
आत्माष्ठो देखनेवार बह यह 
विद्वान्‌ मनन ओर विज्ञानके कारण 
आतमरति-आत्मामे ही जिसकी रति 
अर्थात्‌ रमण है ेसा आरति ओर 
आत्मक्रीड होता है । रतिक्ा साषन 
केवल देह दै. ओर क्रीडा बाद् 
साधनवारी होती रै, क्योकि लोके 
“न्यो ओर मित्रके साथ क्रीदा 





७ शदे 


छान्दोण्यौपनिषष्‌ 


[ अध्याय्‌ $ 
>< >> -- > > ¬ ~ ८ -उ--8- > >< >€ ~ध ॐ 5 4 


/ 


क्रीडतीति दशनात्‌ । न तथा 
विदुष । किं तद्यार्मविज्ञाननि- | 
मित्तमेषोभयं भवतीत्यर्थः । 

मिथुनं दन्द्रजनितं सुखं 
तदपि दन्दनिरपक्षं यस्य विदुषः 
तथात्मानन्द्‌ः शब्दादिनिमित्त 
आनन्दोऽविदुषां न॒ तथास्य 
विदुषः किं तर््यात्मनिभित्तमेव सर्व 
सर्वदा सर्वप्रकारेण च । देह- 
जीवितमोगादिनिभित्तबाद्यवस्तु- 
निरपेक्ष इत्यथः । 

स॒ एवेलक्षणो बिदाज्ञीवनेव 
स्वाराज्येऽभिषिक्तः पतितेऽपि 
देहे स्वराडेव भवति । यत एवं 


भवति तत एव॒ तस्य सर्वेषु 
लोकेषु कामचारो मवति । 


. भराणादिषु पू्वभूमिषु तत्रास्येति 


करता है" एेसा प्रयोग देवा 


ह कितु वदवनूककी क्रीदा ष 
नही होती । तो कैसी हेती है। 
उघकौ तो ये [ रति चौर करी | 
दोनों ही आसविज्ञानकरे ही कृ 
होती हे । 

मिथुन यह दोसे होनेवाल घब 
है, वह भी नि विद्ानूका द 
अपेक्षासे रहित है [ उसे आल. 
मिथुन कहते हैं }; तथा जामानन्द- 


अविद्रानोका आनन्द शब्दादि विष्य- 


जनित होप्ता है, विद्वानक्ा आन 
वैसा नही होता । तो केषा हेत 
है १ वह सारा-का-सारा पददा 
सव प्रकार आत्माके ही कारण शेत 
है । तात्पर्यं यह हैक्रि वह दह 
जीवन ओर भोगादिकी निमि 
बाह्य व्तुओंकी अक्षते शह 
होता हे । 

इस प्रकारके रक्षणोवालं ॥ 
विद्वान्‌ जीवित रहता इभा € 
स्वाराज्यपर अभिषिक्त हो जर्ण 
तथा देहपात होनेषर भी वर 
होता है । क्योकि ठता दै £ 
उसकी सम्पूर्णं रोम थै 0 
होती दै । प्राणादि पूं भृम्कि 
इस उपापक्रङ्गी उनते पिच्छ 


ऋ 
ण 


शण्ड ५ ] 


काङ्रभाष्या्थे 


७९७ 


8८ 9८ ८ ~ 8 8 ह प 8 कः ॐ 9८ ~ 9 9 -9 = 
तावन्मात्र परिच्छि्कामचारत्व- | स्वैच्छागति बतसयी गयी थी । 


ुक्तमन्यराजत्वं चाप्राप्तं 


सातिक्षयत्वाचथाप्राप्वस्वाराज्य- 


कामचारत्वालुवांदेन < 


रिदच्यते च स्वराडित्यादिना । 

अथ पुनर्येऽन्यथात उक्तद्‌- 
दीनादन्यथा वैपरीत्येन यथोक्त- 
मेव वा सम्यङ्‌ न विदुस्तेऽन्य 
राजानो भवन्ति । अन्यः परो 
राजा स्वामी येषां तेऽन्यंराजा- 
नस्ते किश्च क्षय्यलोकाः क्षययो 
लोको येषां ते क्षय्यलोका; । 
भेददशेनस्याल्पविषयत्वाद्‌ं । 
अल्पं च तन्मत्य॑भित्यवोचाम । 
तस्माचेदेतदरिनस्ते क्षथ्यरोकाः 


स्वदशनायुरूपेणेव (4 
स्वदशेनानुरूपेणेव भवन्त्यत 
एव तेषां सर्वेषु रोकेष्वकाम- 
चारो भवति ॥ २॥ 


अत; सातिशय होनेके कारण बरहा 
उसा अन्यराजतव स्वतः सिद्ध है। 
अब यथाप्राप्त स्वाराज्य भौर काम- 
चारा णनुवाद्‌ करते हए यह 
(त स्वराड्‌ भवति इत्यादि वाक्यसे 
उक्षकौ निषृिश्ना निरूपण किया 
जाता टै । 

रितु जो इसे अन्यथा-- 
उपर्युक्त दष्टिसे घन्य प्रकार शर्थात्‌ 
इसके विपरीत जानते है भथवा 
इसीको सम्यक्‌ प्रकारे नहीं जानते 
वे जन्यराट्‌ होते ई । भन्य भर्यात्‌ 
प्र दै राना- स्वामी निनक्ना उन्हं 
“अन्यराट्‌ कहते दँ । ई्के सिवा 
वे क्षय्यरोक-जिनका रोक क्ष्य 
ह रेते वे ्ष्यरो$ होते है, क्योकि 
मेदरद्टि अस्पविषरथ़ है । ओर नौ 
अरप है वह म्यं दै-पेषा हम 
पठे कह चुके दै । अतः जो 
्रेतदर्था दै वे अपनी दिके 
अनुरूप ही कषय्धलोक होते है । अतः 
उनकी सम्पूणं ोकोमे स्वेच्छागति 
नहीं होती ॥ २ ॥ 


---=-------- 


इतिच्छान्दोम्योपनिषदि सप्तमाध्याये 
पञ्चविंशलण्डमाष्यं सम्पणंम्‌ ॥ २५ ॥ 
तन + ~य 











क डूर्विं्तः छरड 
इत प्रकार जाननेवाठेके छि फलका उपदेश्च 

तस्य ह वा एतस्येवं पद्यत एवं मन्वानस्य 
विजानत आत्मतः भ्राण आत्मत आशात्मतः सर 
आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आसत 
आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमासते 
विज्ञानमात्मतो ध्यानमाद्मतश्चित्तमातमतः संकख 
आत्मतो मन आत्मतो वागाह्मतो नामात्मतो मन्त्र 
आत्मतः कर्माण्यात्मत षवेदश्सर्वमिति ॥ १ ॥ 


उस इस भकार देखनेवटे, इस भकार मनन करनेवारे भीर छ 
प्रकार जाननेवले इस विद्वानूके रयि समासे प्राण, आतमासे भ 
भात्मासे सृति, सात्मासे आकाश, भाप्मासे तेन, भालसि च 
भातमासे आविर्भाव ओर तिरोभाव, णात्मासे अन्न, आलासे बढ, मामपि 
दिज्ञान, आसासे ध्यान, जासासे वित्त, भात्मासे संकट, मासते १ 
जालमासे वाक्‌, आत्मासे नाम, आलासे मन्त्र, आ्मासे कमं भौर भ 
हौ पह सव दो जता ६॥ १॥ 


तस्य हवा एतस्येत्यादि “तस्य ह वा एतघ्य' इवारि 
यह तातप्ं है कि स्वाराज्य 
हुए इस प्रकृत ध ५ 
¢ \ 
इयथः । प्रक्सदात्मविजञाना- | आलस्वरूपसे चानं 
माणसे सकर नामपरयन्त पद्य 
तस्वातमनोऽन्यस्मात्सवः पराणाद | उतत लर भर्य 


स्वाराज्यं प्राप्तस्य प्रकृतस्य विदुष 


खण्ड २६] ज्ञाहराष्याश्च . . ७९९ 
~~ 99-49-99 8-2-28 


नौमान्तस्योत्पत्तिप्रयावभूताम्‌।| सतसे होते थे । किन्तु भब सतका 
सदात्मविज्ञाने तु सतीदानीं | भासत शात होनेपर॒वै अपने 
खात्मत टव संवृत्तौ तथा | भासासे टौ हो गये । इसौ प्रकार 
सर्वोऽष्वन्यां व्यवहार आत्मत | विद्रानक्ा जोर भी सब व्यवहार 
एव विदुषः ॥ १ ॥ आलसे ही होने रगता हे ॥१॥ 
किश्च-- । तथा-- 

तदेष श्छोको न पश्यो मस्युं पटयति न रोगं 
नोत दुःखताश्सरव॑९ ह परयः पयति सर्वमाभोति 
सवश इति । स एकधा भवति त्रिधा भवति पथचधा 


स्तथा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्तः शतं च द॒श 
चैकश्च सदखाणि च विश्ातिराहारणशुद्धौ सत्वशुद्धिः 


¢ 


सतशद्धौ धरुवा स्मृतिः स्प्रतिलम्भे सवयन्धीना । 


विषमोक्षस्तस्मै श्दितिकषायाय तमसस्पारं दशयति 
भगवान्सनत्कुमारस्तश्स्कन्द इत्याचक्षते तरस्कन्द्‌ 
इत्या चक्षते ॥ २ ॥ 

इस विषयमे यह मन्व दहै विद्ठान्‌ न तो शुको देखता है, न 
रोगक्ठो जीर न डुःखघ्वको दी । वह विद्वान्‌ सको [ आलप ही] 
देलता ट; भतः सवो प्राप्त हो जाता ट| वह एक होवा दै; श्ट 
वही तीन, पाँच, सात ओर नौ रूप हो जता | फिर वौ ग्वरह 
कहा गया है तथा वकष सो, दश, एक सद नोर बोस भी होता ह । 
गाहारशचद्धि ८ विषवोपरण्धिरूप दिज्ञानक द्धि ) होनेपर॒भन्वः- 
करणकी शुद्धि होती दै, अन्तःकरणकी शद्ध दोनेपर निश्च स्यति 
होती है तथा स्ृतिकरो प्रा्षि होनेपर सम्पण अरन्धरयोकौ निवृत्ति हो 
जाती ह । [ इस प्रकार ] जिनको वासना क्षीण दी गयी थीं उन 
( नारदनी ) को भगवान्‌ सनत्कुमारने अज्ञानान्धकारका पार दिञ्लराया । 








- 


८०० छान्दोग्योपनिषद्‌ सभ्याय ७ 
~~~ ८ ८ ८ < >< ८-8८-9८ ८ > ऋऋ ट 


उन ८ सनक्कुमारली ) को छन्द एेषा कहते दहै, कन्द रे कहते 
है॥ २॥ 


तदेतस्मिन्रथं एष रोको | इस विषयमे यह रोक मन्न 

मन््रोऽपि भवति--न पद्यः | मी दै । प३य नही देलता । पय 
४५ 

पयतीति । पदयो यथोक्तदश् अर्थात्‌ उपयुक्त प्रकारसे देलनेवाल 


९ _. ~ . | विद्वान्‌ मूष्यु-मरण, ज्वरादि रोग 
विद्वानित्यथः, लयं मरणं रोगं ओर दुःखत यानी दुःखभाक्को 


ज्वरादि दुःखतां दु ःखभावं | नहो देलता । वह॒ पय विवान्‌ 
चापि न परयति। सवं ह सर्व- | सभीको देखता है अर्थात्‌ सबको 
मेव स पश्यः प्रयत्यात्मानमेव | भासूप हौ देखता दै । इ 
स्वम्‌। ततः सर्वमारोति | सक्को सव॒ भकार भ्र 


सर्वशः सर्प्रकारैरिति १६५ 
शः सवेप्रकाररेति । तथा वह विद्वान्‌ खष्टिमेदके पूवं 


किश्च स विद्वान्म्राक्युष्प्रमे- | एकल्प होता हु ही ष्िकालमं 
दादेकपैव च संक्िधादिभेदैरन- | तिषा णादि भनन्तमेद प्कर्योबाल 


= ~ | हो जाता दै। भौर फिर सशर 
न्तमेद प्रकारो भवति ख्टिकारे ।| € 
६ काठमे भपने मूर पारमार्थिक 


पुनः संहारकाटे मूरमेव स्वं | एकधाभावको ही प्रा हो जाता दै, 
पारमा्थिकमेकधामावं प्रतिपद्यते व्योकि वह स्वतन्त्र ही 


द्रारा एवि 
स्वतन्त्र एवेति विद्याफलेन प्ररो- | भमर विदाके फल्ारा 
व । छ उतन्न करते हुए सनत्कुमार 


उसकी स्तुति करते द । 

अथेदानीं यथोक्ताया विद्यायाः इसके ` पर्चात्‌ अब धुल 
भासक हेतुमत दर्पणकी विद्व 

सम्यगवमासकारण युखावमास- | करनेके समान उपयुक्त 


। सम्यक्‌ परकारसे प्रतिफलित होनेके 
कारणस्तेवादसव बिधदविारणं देतुमृत स्ाषनक्ञा॒ उपदेश रा 


शाङ्करमाण्याथे ८०१ 


शण्ड २६ 1 
~~~ ~ 9-9८-3 4-8-39 9-9-99 


साधनयुपदिदयते । आहार | 
दधौ । आहियत इत्याहारः 
दन्दादिषिषयविज्ञानं भोक्त 
भोगायाहियते ठस्य 'विषयोप- 


 हन्धिलक्षणस्य विज्ञानस्य 

` बुद्धियहमरशुद्धी रागदेषमो्- 
दोषैरसंसष्टं  विषयवि्तान- 
मित्यर्थः । 


तस्यामाहारशुदधौ सत्यां तद्र- 
तोऽन्तःकरणस्य सस्य शुद्धिर्न 
मैल्यं मवति, सखछशुद्धौ च सत्यां 
यथावगते भूमाटमनि ध्रवावि- 
च्छिन्ना स्मृतिरविस्मरणं भवति । 
तस्यां च छव्धायां स्मृतिलम्भे 
सति सरदेपामविदयाछरृतानथंपाश- 
रूपाणामनेकजन्मान्तराचुभवभा- 
वनाकरिनीक्रतानां | 
ग्रन्थीनां विप्रमोक्षो विशेषेण 
प्रमोक्षणं विनाशो भवतीति। 
यत एतदुत्तरोत्तरं यथोक्तमाहार- 
शद्धिमूर तस्मारसा कारयत्यर्थः। 


जाता है- “जहारञ्यद्ौः इत्यादि । 
जिनका आहरण किया जाय उन्हं 
“आहारः कहते है; भोक्ताके भोगके 
स्यि शब्दादि विषयविन्ञानका 
आहरण किया नाता है; उस 
विषयोपलन्धिषूप विज्ञानकी शुद्ध 
ही "आदारश्चद्धिः है, अर्थात्‌ राग- 
द्वेष, मोह आदि दोषोसे असंखष्ट 
विषयविज्ञान । 


उस्र आहारश्ुद्धिके होनेपर उससे 
युक्त अन्तःकरण यानी सस्वकी 
श्ुद्धि-निम॑खता होती है; ओर 
अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर उपययक्त 
प्रकारसे जने गये भूमासमे धरुव- 
अविच्छिन्न स्मरति यानी अवि्मरण 
हो जाता दै तथा उसकी प्राधि 
होनेपर-स्मृति रुन्ध होनेपर अनेक 
जन्मेमिं अनुभव की हरे भाव-- 
नाओंसे कठिन की इई अविदयाङ्कत 
अनर्थपाशूप हृदयस्थित अन्थियोँ- 
का विपरमोक्ष-विशेषषपसे भमो- 
क्षण- विनाश हो जाता है । इस 
प्रकार वकर्योकि यह उपर कहा हज 
सव कुछ उत्तरोत्तर भादारद्ुद्धि- 
मूलक है; इसर्यि वह अवदय करनी 
चादिये--रेसा इसका तालं है । 


८० छाम्दोख्योषलिषषु [ सष्याष ७ 


सवं शास्ाथमरोषत उक्त्वा- | लाके सम्पू अभमिपायद्ो 
खथायिकामुपसंहरति श्रुतिः-तस्मे| सम्यक्‌ _ पकरारसे कहकर श्रत 
मरदिवकषायाय वाक्षादिखि | आस्यायिक्न उपसंहार कती 


स है-- उप्त मदितकषायको वृक्षादि 
कषायो रागदपादिदोपः स्वस्य | से सम्बन्ध रखनेवाले कपये 


रज्ञनास्पतवातस॒जञानैराग्या- | समान रागादि दोष णन्ड करके 
भ्यासस्प्क्षारेण क्षारितो | र् १ कारण कषाय है । 
। विं नारि न, वैराग्य छभ्या 

रदित विनाशितो यस्य नारद्‌. | शान, वैरा ओर्‌ जभ्य 


4 ६” क्षारसे जिन नारदनीके उस कषायका 
स्य तस्म योग्याय मृदितकषायाय | क्षारन-मदून अर्थात्‌ विनाश क 


तमसोऽविद्यालक्षणात्पारं परमारथ-] दिया गया द उन मृदितकषाय योग्य 
= ५ ए 

तच्वं दशयति दर्धितवानित्यर्थः। शिष्य नारदजीको भविधाखूप तमसे 
“लतति पार परमाथंतत्वको दिखलया । वह 

कोऽसो १ भगवान्‌-- “उत्पत्ति 


_ ` | दिखानेवाख कौन था १ भगवान्‌-- 
्रखयं चैव भूतानामागतिं गतिम्‌|| “नो मूतोकी उत्प, पर्य, आय- 
वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो | ग्यय तथा वि्या-अविद्याक्रो जानता 

मगवानिति' ( विषणुषु ६। | दै छते “भगवान कहना चादि 
। ९। ७८) एवंध्ा सनत्‌. | पर पर्मोवाले सनकुमारजौ । उन, 
¦ । तमेव सनछमारं ददं | सत्मारदेवको दी, विद्वान्‌ लोग 

, इमारः । तमेव सनल्छमारं देवं कन्द" ठेसा कते ह । ।तं छन्द 
, स्कन्द्‌ इत्याचक्षते कथयन्ति | इत्याचक्षते, इसकी द्विरुक्ति अध्याय- 
तदिद्‌; ।, द्विव चनमध्यायपरि- | की समाति सूचित कल्नेके दि 
समाप्त्यथमर्‌ ।॥ २ ॥ हे॥२॥ | 


इि्छान्दो्वोपनिषदि सप्तमाध्याये 
षडवराखण्डभाष्यं समभ्पुणम्‌ ।! ५६॥ 


विमि 
इति श्रीगोविन्दभगवलूज्यपादरिष्यस्य॒परमहखपरिवराजका चाय॑घव 


श्रीशद्करमगवेतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्धिवरणे 
सप्तमोऽध्यायः समाप्तः | ७ ॥ । 


"== 0 २ 








॥ 





अष्टम अत्यय 


क (> *--~ 


क्रथक खण्ड 





दह्र-पण्डरीकषम बह्कौ उपासना 


यद्यपि दिग्देशकालादिभेद- 
अषटमप्रपाठका- शुन्यं बह्म सत्‌, 
रम्मप्रयोजनम एकमेवाद्वितीय- 


मात्मेवेदं सवेमिति षषठसप्तमयो- 
रधिगतं तथापीह. मन्दबुद्धीनां 
दिग्देशादिभेदवद्रस्तवित्येवं 
भाविता बुद्धिनं शक्यते सदसा 
परमार्थविषया कतमित्यन- 
धिगम्य च नह्य न पुरुषाथं- 
सिद्धिरिति तदधिगमाय हृदय- 
पुण्डरीकदेश उपदेष्टव्यः । 
यद्यपि सस्सम्यक्प्रत्ययेक- 
विषयं निथुणं चात्मतष्छं तथापि 
मन्दबुद्धीनां गुणव्वस्येष्टत्वा- 


छा०उ० २६-- 


यपि छे ओौर सातवें अध्यायमें 
दिशा, देश ओर फालादि भेदसे 
रहित ब्रह्म 'सत्‌ एकमात्र छद्वितोय 
है" “आतमा दी यह सव है- रेशा 
जाना गया दै, तथापि हां दिशा 
जर देश आदि मेदयुक्त वस्तु है 
ही -इस प्रकरी भावनासे युक्त 
मन्दुद्धि पूर्षोी बुद्धि सदसा 
परमार्थसम्बन्धिनी नही की जा 
सकती ओर बरह्मको जने बिना 
ुसपार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती, 
अतः उसका - अनुभव होनेके लियि 
हूदयकमररूप देशका उपदेश करना 
आवद्यक हे । 

यद्यपि आत्मतत्व सत्‌ , एकमात्र 
सम्यक्‌ ज्ञानका विषय जीर निगुण 
हतो भी मन्दुद्धि पुर्षोको 
उसकी सगुणता हौ इष्ट दै, इसञ्यि 
उसके सत्यसंकल्पादि गुणोंसे युक्त 


८० 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय्‌ ८ 


> = 4 > > = 9 कक 9 2 ॐ: 9 6 2 > तरैः इ 


त्सत्यकामादिगुणवन्तं च वक्त- 
व्यम्‌ । तथा यथपि बरह्मविदां 
रू्यादिविषयेभ्यः स्वयमेवोप्रमो 
भवति तथाप्यनेकजन्मविषय- 
सेवाभ्यासजनिता विषयविषया 
तृष्णा न सहसा निवतंयितुं 
शक्यत इति बह्मचर्यादिसाधन- 
विशेषो विधातव्यः । तथा यद्य 
प्यात्मेक्वविदां गन्त॒गमनग- 
न्तव्याभावादविद्यादिश्ेपस्थिति- 
निमिततक्षये यगन इव विचुददधत 
` इव वायुदेन्धनइवामिः स्ातम- 
न्येव निवृत्तिस्तथापि गन्तग- 
मनादिवासितवुद्धीनां हृद यदेश- 


युणविरि्ठरदोपासक्षानां मूर्- 
न्यया नाव्या गतिरवक्तव्येत्य- 
टमः प्रपाठक आरभ्यते | 

त दिषदेशगुणगतिफलमदशून्य 
दि परमाथसदद्वयं ब्रह्म मन्द 


होनेका प्रतिपादन करना भाव्यक़ 
है । इसी प्रकार यथपि ब्रहलोपासक्षो- 
फोख्ली सादि दिष्यते स्वयं षौ 
उपरति होती षै तो भी अनेक्ष 
लरन्मोके विषयसेवनके अभ्यासे 
उत्पन्नं हद विषयसम्बन्धिनी तृष्णा 
सष्टसा निवृत्त नहीं कौ जा सक्ती, 
इसल्थि बरह्चर्यादि साधनविङेषका 
विधान रना भी आवदयक 
है, इसी तरह यथपि आतमक्षा 
एकत्व जाननेवासंकी दृष्टि गमन 
करनेवाले, गमनक्रिया ओर गन्तव्य 
देशका अभाव्र हो जानेके कारण 
शरीरकी स्थितिकी निमित्तमृत 
अविधा आदिक क्षय दहो जानेषर 
उनकी व्िदयुत्‌, वदे हए वायु घौर 
जिसका ईधन जल गया है उप 
अग्निके आश्म रीन हो जानेके 
समान अपने आत्मामं दही निवृत्ति 
हो जातीहैतो भी जिनकी बुद्धि 
गन्ता ओर गमनादिकी वाप्षनासे 
युक्तं हे यपने हृदयदेशस्थित गुण- 
विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करनेवाले 
उन पुररषोकी शिरोगत नाडीसे होने- 
वारी गतिका प्रतिपादन करना 
यावदयक दहे, इसीष्यि अष्टम 
पपाटकका आरम्भ किया नाता है । 

व्ा, देश, गुण, गति ओर 


-परुमेदसे शल्य जो परमार्थं सत्‌ 


ख॑ण्ड१ || छाङरभाष्याथ ८०५ 
>> >8< > >< >< < ‰ 55 £< < ऋ ह 0८ < < < &< ८ >< ऋ -8< 8८ 


बुद्रीनामसदिव प्रतिभाति । | अद्वितीय बह्म है, वह मन्दुद्धि 
6 च पुर्षोको असत्‌के समान प्रतीत 
सन्मागंस्थास्ताबद्भवन्त; ततः | होता है, ये सन्मार्गमे स्थित हो, 
तव धीरे-धीरे म इन्दं परमार्थ 
सत्कतो मी प्रहण करा दूगी--पेसा 
मीति मन्यते श्रुतिः । रति मानती दै । 
हरिः ॐ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं 
बेदम दहरोऽस्मिन्नन्तराकारास्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं 


तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १॥ 
अव ईस ब्रहमपुरके भीतर जो यह सुक्ष्म कमलाकार स्थान है इसमे 
जो सूक्ष्म आका है उसके भीतर जो वस्तु दै उघकू अन्वेषण करना 

चाहिये जओर उसीकी जिज्ञासता करनी चये ॥ १ ॥ 

अथानन्तरं यदिदं वक्ष्यमाणं | अथ-इसके पश्चात्‌ [ यह कहा 
कि. जातादहै कि] यह जो आगे 
ददरमन्पं पुण्डरीकं पुण्डरीक- | कष्टा जानेवाला दहर अर्थान्‌ छोट- 
¦ _ |सा कमर सदश गृह है-दरार- 
सदृशं वेदमेव वेदम द्वारपाखादि- | पालादिसे युक्त श जो 
6 गृहके समान गृह रै वह इस 
मश्वात्‌; अस्मिन््रमपरे ब्रह्मणः ८. यानी परमात्मक 
६ त जञेसा जका अनेको 
परस्य पुरं राज्ञोऽनेकग्रकृतिम्यथा ५ ८ ५4 १ ५ 
ं नि द्धि | प्रकार यह ( शरीर ) भी [आत्मा- 
पुरं तथेदमनेकेन्द्रियमनोबुद्धि वी 
करनेवारौ अनेको इन्दिर्यो तथा मन 
ओर बुद्धिसे युत पुर दे, अतः यद 
बहापुरम्‌ । पुरे च वेदम राज्ञो । ब्द दै । निस भकार पुरम 
राजाका भवन होता है उसी प्रकारं 


यथा तथा तस्मिन्‌ ब्रह्मपुरे शरीरे | उस बरहमपुरखूप शरीरम एक सुक्ष्म 
। गृह अर्थात्‌ बह्मकी उपरन्धिका 


दहरं वेदम बह्मण उपलन्ध्यधि- । अ्ष्ठान दे, नि परकर क्गि शक 


नैः परमाथंसदपि प्रादयिष्या- 


भिः स्वाम्यथंकारिमियुंक्तमिति | 


८०६ 


छाम्दोग्योवनिषष्‌ 


बष्याय ८ 


ह्ठानमिस्यथंः, यथा विष्णोः 
शालग्रामः ¦ 
अस्मिन्‌ हि स्वविकारुङ्ख 


देहे नामरूपव्याकरणाय प्रविष्टं 
सदाख्यं ब्रह्म जीवेनात्मनेत्यु- 
क्तम्‌ । तस्मादस्मिन्हृदयपुण्ड- 
रके वेदमन्युपसंहतकरणेर्वाह्यनि- 
पयविरक्तंशेषतो ब्रह्म चयंसत्य- 
साधनाम्यां युक्तव॑ध्यमाणगुण- 
वद्धयायमानेत्लञोपलम्यत इति 
प्रकेरणा्थः । 
दहरोऽल्पतरोऽस्मन्दहरे 
वेदमनि वेरमनोऽल्पत्वात्तदन्तः 
वेतिनोऽन्पतरलं वेश्मनोऽन्तरा- 
काश आकशाख्यं ब्रह्म | 
आकाशो वै नामेति हि वक्ष्यति । 


आकाश इवाशरीरत्वातखकष्मत्व- 


सर्वगतत्वसामान्याच । तसिमनना- 


आमशिखा विष्णुक्री उपरुन्धिकी अधि. 
्टान होती है-रेसा इका तास्थ है । 

इष अपने विकारमूत काय॑-- 
देद्मे सत्संज्ञक व्रह्म नामहप्ी 
अभिव्यक्ति करनेके स्यि जीवास- 
भावसे अनुप्रव्िष्ट दहै-यह कहा 
जा चुका है । इसीसे जिन्होनि इस 
हृदथकमलहप भवने अपने ₹न्िय- 
वर्गा उपसंहार कर द्विया है उन 
बाह्य विषर्योसे विरक्त, विरोषतः 
ब्रह्मचर्यं एवं सवयषटप साधनोसे 
सम्पन्न तथा अगे बतल्लये जनेवाटे 
गुणोसे युक्त ॒पुरषोद्रारा चिन्तन 
किये जनेपर ब्रक्चकरी उपलब्धि 
होती दै--एेसा इस प्रकरणका 
ताद्य हे । 

इस पृक्ष गृहमे दहर- 
अत्यन्त सुक्ष्म अन्तराकाश्च यानी 
आकाशसं्ञकं ब्रह्न दै । गृह सूक्ष 
होनेके कारण उसके अन्तर्वतीं 
आकाशका सूक्ष्मतरत्व सिद्ध होता 
है। “आकाश्च ही नाम-रूपका 
निर्वाह करनेवाला दै" एसा श्रुति 
करेगी भी । आकाशके समान 
अशरीर होनेके कारण तथा सूक्ष्मव 
ओर सर्वगतत्वे उससे समानता 
होनेके कारण [ उसे आका कदा 


छण्ड १] शाद्भर्माष्वायं ९०७ 
ऊ ॐ ॐ ॐ. क 4 ए ८ > < ऋ ८ ८ ८ 9८ ^ ~ ८ 9८96 


दाशार्ये यदन्तर्मभ्ये तदन्बेष्ट- | गय। है ]। उष॒ आकाशसंकक़ 
तच्वके भीतर जो वघ्तु है, उघका 
व्यम्‌ । तद्वाव तदेव च विशेषेण | जन्ैषण करना चाहिये, तथा उधी- 
कौ वि्ेषरूपसे जिज्ञासा करनी 
चाहिये, र्थत्‌ गुरुके आश्रय तथा 
श्रवणादि उपा्याँसे अन्वेषण करके 
उसका साक्षात्कार करना चादिये- 
मित्यथंः ॥ १ ॥ देखा इसक्षा तात्य ह ॥ १ ॥ 


9 @ °= 
क 9 @ % 


तं चेद्यु्यदिदमस्मन््हमपुरे दहरं पुण्डरीकं वेदम 
दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं 


यद्वाव विजिनज्ञासितग्यमिति स ब्र.यात्‌ ॥ २ ॥ 
उस ( गु ) से यदि { शिष्यगण ] क कि इस ब्रकषपुरमे जो 
सूम कमलाक्ार गृह है उमे जो अन्तराकाश है उसके मीतर क्या 
वस्तु है जिसका अन्वेषण करना चाये अथवा जिसकी निज्ञासा करनी 
चाहिये १- तो [ इस प्रकार पूछनेवाले विष्यो भति ] वह भाचायं 

यो कहे ॥ २॥ । 

तं चेदेवसुक्तवन्तमाचायं यदि ] इस प्रकार कढनेवारे उ 
व आचा्यसे यदि शिष्यगण कं 
नूयुरन्तेवासिन्ोदयेयुः; कथम्‌ | अर्थात्‌ शङ्का करे, किस प्रकार 
दिदमस्मिन सरल शङ्का करं --इस परिच्छिन्न क्ष 
यदिदमस्मिन््रहमपुरे परिच्छिसे सम जो मह अनवत कमर्न 
उनतरदहरं पुण्डरीकं वेदम ततो- | च्म गद दे उपकै भीतर तो उपसे 
त भी सूक्ष्मतर आकाश है । प्रथम तो 
व एवाकारः । | उख कमलाकार गृहमे ही का वस्व 


पुण्डरीक एव वेरमनि तावक्कि । र सकती दै £ फिर उससे भी 


जिहासितव्यं गुर्वाश्रयथवणाच्‌- 


(०1 
पार्यन्बिष्य च साक्षार्करणीय- 


८०८ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय ८ 


= 38 8 3 ट 


स्यात्‌ । #िं ततोऽल्पतरे खे | 
यद्धवेदित्याहुः । ददरोऽस्मिन्न- 
न्तराकाश्चः फं तदत्र बिद्यते न 
किंश्चन विद्यत इत्यभिप्रायः । 
यदि नाम बदरमात्रं किमपि 
विद्यते कं तस्यान्वेषणेन विजि- 
ज्ञासनेन वा फरं विजिज्तासितुः 
स्यात्‌ ! अतो यत्ततरान्वेष्व्यं 


विजिज्ञासितव्यं वा न तेन 
प्रथोजनभित्युक्तवतः स आचार्यो 


भूपादिति भरुतेवचनम्‌ | २ ॥ | 


अल्पतर आकाशम जो हो एसी क्या 
वस्तु हो सक्ती दहै १-दस प्रकार 
यदि वे पूं । अभिप्राय यह ह 
इस ॒हदयपुण्डरीकके भीतर नो 
माक्राश दै वह सुक्ष्म दै, उस 
क्या वस्तु हो सक्ती है £ अर्थात्‌ 
कुछ भी नहीं हो सकती । 

यदि वेरके समान कोई व््तु ही 
भी तो उस्षकी खोज अथवा जिज्ञासा 
करनेसे जिज्ञाघुको फक भी क्या 
होगा १ अतः वर्ह जो खोन करने 
योग्य अथवा जिज्ञासा करने योग 
वस्तु ह उप्तसे हमे कोई प्रयोजन 
नदीं है तो इस प्रक्र कहनेवारे 
सिष्थोसे आचायंको इक्त प्रकार 
कहना चाहिये--यह शरुतिका वाक्य 
हे॥२॥ 


कि क 


शृणुत, तत्र यदुनृथ पुण्डरी- 
कान्तः सस्यान्पत्वात्तरस्थमण्प- 
तरं स्यादिति, तदसत्‌ । न हि 
खं पुण्डरीकयेदमगतं पुण्डरीका- 
दन्पतरं मत्वावोचं द्हरोऽस्मि- 


चन्तराकाश इति । किन्तषिं १ | 


. पण्डरीकमल्पं तद्नुविधायि 


सुनो, इस विषयमे तुम नो 
कहते हो करि हदयपुण्डरीकन्तग॑त 
आकाश सूक्ष्म होनेके कारण उसका 
अन्वेतं रह्म जर मी सूक्ष्म होगा, 
बह ठीक नहीं । मेने हृद्यपुण्डरी- 
कान्तगंत आकाशो हदयकमलते 
सृक्ष्मतर्‌ मानकर यह नीं करदा 
ङि इसका अन्तर्वतीं आकाश सम 
ह। तो क्या बात है {--ह्दय- 


ॐ. © 
कमर सूक्ष्म हं उसका अनुवतन 


खण्ड १] शाङ्रमाष्याथं ८०९ 
~> < ऋ 8-८-09 ~ ल 8 र 


तर्स्थमन्तःकरणं पुण्डरीकाकाश-| करनेवाला उसका अन्तवती अन्तः- 
करण उस ॒पुण्डरीकाकाश्चसे परि- 
च्छिन्न है । जिन्होनि अपनी इन्दि 
करणानां योगिनां सखच्छ इवो- | योका उपसंहार कर ख्या है उन 
योगिरयोको उस विशुद्ध अन्तःकरणे 
जलम प्रतिविम्बके समान तथा 
शुद्धे स्वच्छं विज्ञानञ्योतिः- | स्वच्छ दरपणमे रूपके समान विद्ध 
विज्ञानज्योतिःस्वरूपसे प्रतीत होने- 
स्वरूपावभासं तावन्मात्रं ब्रह्मो- | वाला त्रह्म उसके बराबर उपलब्ध 
होता है । इसीसे अन्तःकरणर्प 
उपाधिके कारण हमने यह कहा 
काश इत्यवोचामान्तःकरणोपा- | या कि इसका अन्तवती आका 
| अन्तःकरणखूप उपाधिके कारणं 

सक्षम हे; स्वयं तो- 


परिच्छिन्नं तस्मिन्विुदधे संहृत- 


दङ्के प्रतिबिम्बरूपमादशं इव च 


परुभ्यत इति ददरोऽस्मिन्नन्तरा- 


धिनिमित्तमू; स्वतस्त॒-- 


यावान्वा अयभाकारास्तावानेषोऽन्तहयदय आका 
उमे अस्मिन्यावाप्रथिवी अन्तरेव समाहिते उभाव्निश्च 
वायुश्च सूर्याचन्द्रमसाबुभौ विद्यु्नक्षत्राणि यचास्येहा- 
स्ति यच्च नास्ति सर्वं॑तदस्मिन्समाहितमिति॥ ३ ॥ 


नितना यह [ भौतिक ] आक्षा दै उतना दी हदयान्तगंत 
आकाश है । यलोक ओर प्रथिवी- ये दोनों रोक सम्यक्‌ प्र्ारसे इषके 
भीतर ही स्थित है । इष प्रकार अग्नि ओर वायु-ये दोना, सूय जीर 
द्रमा- ये दोनों तथा विद्युत्‌ जीर नक्षत्र एवं इस आसमाका जो कुक 
इस रोकमे हे ओर जो नहीं हे वह सब सम्यक्‌ पभरश्नरसे इसीमे स्थन 
है॥३॥ 


९ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ लध्याय ८ 


> >€ ¬ ८ > ८ < < 9: >< 9 < >< ८ < < >< < ८ ८9 ॐ 4 

यावान्वै प्रसिद्धः । परिमाण जितना य॒ भौतिकं 
ऽयमाफाश्नो भोतिकस्तावानेषो- | भाकाश्च प्रसिद्ध है उतना ही 
ऽन्तहंदय आकाशो यरिमिन्न्बष्टव्यं| यह॒ हृदयान्तगत आक्षा 
विजिज्ञासितव्यं चावोचाम । | निके विषयमे किं हमने अन्ेषण 
नाप्याकाक्षतुल्यपरिपराणतमभि- | करना चादिये तथा निशसा करनी 
रस्य तावानिर्युच्यते। किं तर्हि {| चाहिये" र्ता कहा शा ! [ यहो 
ब्रह्मणोऽनुरूपस्य दुषटान्तान्तर- | नदी ] 'ब्ह्मको भाकाशके समान 
स्यामावात्‌ । कथं पुन्नाका- | परिमाणवाला मानकर भी रेषा नही 
दसममेव ब्रहमत्यवगम्यते । | कष्टा जाता। तो फिर क्या बात 
“येनावृतं खं च दिवं महीं | है १--त्रहमके अनुरूप फोर अन्य 
च, ( महानारा० उ० १।३ ) | द्टान्त न दोनेके कारण रसा 


कहा जाता पर्ष] 
, “(तस्माद्रा एतस्मादात्मन आकाशः नीं क १ द ही ८ है- 
सम्भूतः ।” (ते०उ० २।१।१) 


यह कैसे जाना नाता है ! [उक्ष्‌] 
“एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्या | निने आकाश, दुरोक भौर 
काशः ।'” (ब्रु०उ० ३।८।११) 











ृथ्वीको आदृत श्गिय। हज दै" 
“उस इस आस्मासे आक्राश्च उन्न 
हआ" “हे गार्गि | इस अक्षरमे ही 
जका स्थित है” इप्यादि श्रतियसे 
यह बात सिद्ध होती दै । 

यही नहो, इस बुद्धयुपधि- 
विशिष्ट ॒त्रहमाकाशके भीतर ही 
युकोक ओर प्रथिवी समादित-- 
सम्यक्‌ परकारसे स्थित है; निह 
पकारकी नाभिमे अरे--पेषा 
पह ह ही लुक दै । इसी प्रक्ष 
अभि ओर वायु -ये दोनों भी 


इत्यादिश्रुविभ्यः । 
किश्वोमे अस्मिन्द्यावापरथिवी 


बरह्माकशे बुद्ष्युपाधिविशिषट 
अन्तरेव समाहिते सम्यगादिते 


स्थिते। यथा वा अरा नाभावि 


हि । तथोमावभिश्च वायुश्वेत्यादि 


शण्ड १1 क्षाह्ल्षाण्याथं ८११ 
+ 9 क 5 >. ॐ 9 ५८ 9 अ 2 - --- 


समानम्‌ ! यचचास्यात्मन आत्म ध्थित दै--इूयादि शेष वाक्यका 

तात्पर्यं भी इसीके समान दहै । इष 
यत्वेन देदवतो ऽस्ति विद्यत इहं | देहवान्‌ आतमाका ५. नो 

कुछ पदाथं इस ढक है ओर जो 
लोके, तथा यच्चात्मीयत्वेन न कठ "लीयसे [ इस समम ] 
नही दै, नष्ट हो गया है भथा 
भविष्ये नही होगा-रेसा कहा 
जाता है [ वह सव सम्यक्‌ परकारसे 
इसीमे स्थित है ]। यहां भव्यन्त 
अत्‌ वस्तुसे अभिप्राय नही है, 
वरयोकि उसको तो हृदयाकाशे 
स्थिति होनी ही सम्भव नहीं है ॥२॥ 


विद्यते; नष्टं मविष्यच्च नास्तोत्यु- 
च्यते । न त्वत्यन्तमेवासत्‌, 
तस्य हयाकाे समाधानानुपपततः 


॥ ३॥ 


--: ® :-- 

तं चेदृनरूयुरस्मि<शदिदं ब्रह्मपुरे सवश्समाहित 

सर्वाणि च भूतानि स्वे च कामा यदेतज्नरा वामरोति 
धर्वश्सते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४॥ 


उ आचार्यसे यदि शिष्यगण करद किं यदि इख बह्मपुरम यह सब 
समाहित है तथा सम्पूणं भूत भौर समस्त कामनाएं भी सम्यक्‌ प्रकारसे 
स्थित है तो जिख रमय यह वृद्धावस्थाको प्रा शेता अथवा नष्ट शो 
जाता है उस समय क्या शेष रह नाता है १॥ ४ ॥ 

तं देवशर कवन्तं ब्रूयुः ह किंतु यदि इस प्रकार कहनेवठे 

उस भाचार्ंसे सिष्यगण करदं 
न्तेवासिनोऽस्मिेद्थोक्ते चे्यदि। कि यदि इस बहमपुरमे अर्थात्‌ ब्रक- 
घुरोपरक्षित अन्तराकाशमे यह सब 

जहमपुरे बक्षपुरोपरक्षितान्तराकाश। सम्यक्‌ प्रकारसे स्थित है तथा 


८१२ 


छाम्दोम्योपनिषत्‌ 


{ सष्वाय ८ 


>< 9८6 ~ > 8 ~ > ऋ >~ ~ 8 -6- > ~ न> 38 


इत्यर्थः । इदं सव॑ समाहितं 
सर्वाणि च भूतानि सव च 
कामाः । 

कथमाचार्येणानुक्ताः कामा 
अन्तेवािभिरुच्यन्ते ? 

नेष दोपः; यच्चास्येहास्ति 
यच्च नास्तीरयक्ता एव द्याचार्येण 
कामाः । अपि च सर्वशब्देन 
चोक्ता एव॒ कामाः। यदा 
यसिमन्कार एतच्छरीरं तरह्मपुरा- 
ख्यं जरावरीपकलितादिलक्षणा 
वयोदानिर्वापोति श्रादिना वा 
इक्णं प्रध्वंसते विस॑सते विनरयति 
फं ततोऽन्यदतिशिष्यते । 


षटाभितकषीस्द्धिस्नेहादिवड्‌- 
घटनाशे देहनाचचेऽपि देदाधय- 


स॒त्तरोत्तरं पूर्॑ूवनालानरयती- 


सम्पूरणं भूत ओर समस्त कामना 
भीस्थित है [तो जिस समय यह्‌ 
वृद्ध होता या नष्ट हो जाता है उष 
समय क्या क्या रहता है १ | 

शङ्धा-आचार्यने जिनका निषध 
पण नहीं करिया उन कामनाओं्षो 
रिष्यगण क्यो [ ब्रहपरमे स्थित | | 
वतरते है ? 

समाधान-यह दोष नहीं है; 
“इस ठोकमे नो कुछ इसका है ओर 
जो कुछ नहीं हैः इस प्रकार 


आचारथने कामना भोंकि विषये कदा 


ही हे । इसके सिवा सर्वः शब्दस 
भी कामनार्ओंका कथन होदही 
जाता है । ज्र जिस समय इस 
्रह्मपुरसंज्ञकं शरीरको सुरथा पड 
जने ओर कैशोके पक जाने आदि 
रूपे बरद्धावस्था जपनाती है अथवा 
उप॒क्री आयुका क्षय प्रात होता है 
अथवा वह रास्रादिसे काटा नाकर 
स्पस- विल्सन यानी नारके प्रप्त 
हो जाता है तो उसे भित्र भौर 
क्या रोष रहता है 

अभिप्राय यह दहै कि षट्का 
नाश होनेपर घटस्थित दुग्ध, दही 
ओर शतादिके नाशे समान देहका 
नाश होनेपर भी देहके आश्रित 


खख्ड १ ] च्ाङ्रभाष्याथ ८१३ 
अ ~ = 8-4-88 98 9 ~ 9-9-38 > 


स्यमिप्रायः । चवं प्राप्ते नाने हिं | उत्तरोत्तर कायं पूर्वपूर्वं कारणक 


ह (ङ नाक्च होनिके कारण नष्ट हो जाते 
इर - 
तवौऽन्यघ्थोक्तादति दिष्यते | इव प्रकार ना रोनेषर 


तिष्ठते न किश्वनावतिष्ठत उपर्युक्त नासे भिन्न लार कया रह 
जाता है! धर्थात्‌ कु भी नं 


इत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ रहता-पे्ा इसका तार्यं ट ॥४॥ 


(री 


एवसन्तेवासिभिभोदितः-- रिष्योद्रारा इस प्रश्नार भ्ररन 
फ्ि जनेपर- 


ल ब्रुयान्नास्य जरयेतन्नीर्यति न वधेनास्य हन्यत 


एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्कामाः समाहिता एष आला- 
पहतपाप्मा विजरो विषर्युर्विंशोको विजिघत्सोऽपिपाक्ः 
सत्यकामः सत्यसंकटपो यथा दयवेह प्रजा अन्वाविः 
शन्ति यथानुश्ञासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं 
जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥ 


उसे कहना चादिए इस ( देह ) की जरावस्थासे यह 
८ आकाञ्चाल्य ब्रह ) जीणं नहीं होता । इसके वधसे उसका नाश 
नहीं होता । यह ॒त्रहमुर सय है; इसमे | सम्पूणं ] कामना सम्यक्‌ 
प्रकारसे स्थित दै; यह आत्मा दै, घर्माषर्मसे शल्य दहे तथा जराहीन, 
मृलयुदीन, शोकरहित, भोजनेच्छारित, पिषसाञयूत्य, सलयक्राम ओर 
स्यसंङृस्प है; जितत प्रकार इस रोके भना रानाकी भाज्ञाका अनुवतेन 
करती दै तो वह निस-निष सन्निहित वस्तुको कामना करती दै तथा 
जिस-निष्त देश॒या भूभागो इच्छं करती है उसी-उसीके आधित , 


जीवन धारण करती है" ॥ ५ ॥ 


८१७ छाम्बोष्योपनिषषू [ बष्वाव ८ 
9259 ~ ~~ ~ 9८ 2८ ~ ¬< ८ 9 ¬ >^ 9 2८ 96 88 8 > 8 
ख आचाय ब्रुयात्तन्मतिमप- | _ उस आाचायंको उनकी [ शूल्ब- 

विषयिणी ] बुद्धिकी निवृत्ति करते 
हुए इख प्रकार कहना चहिये । 
किस प्रकार कहना चाहिये !- 
जरयेतचयथोक्तमन्तराकाशाख्यं | इस, देही जरावस्था्े यह 
उपयुक्त भन्तराकाशसंक ब्र्ष, 

ब्रह्म यस्मिन्‌ सवं समाहितं न | जिम करि प्व कुछ स्थित है 
व जीणे नही होता, अर्थात्‌ देहे 

ति देहवन्न विक्रियत | समान उत्का विक्रार नही होता, 
र | गीर न॒ इसके वध अर्थात्‌ 
त्यथंः। न चास्थ वधेन शब्ा- | श॒खादिके प्रहारे यह नष ही 


ह होता है, जैसे छि [ शञ्ञादिके 
घातेनैतद्धन्यते यथाकाम; ¦ £ 2 
दि ४ £ । जाधातसे ] जाकाशाका नाश नहौ 
किमु ततोऽपि घवकष्मतरमशब्दम- । होता; रिरि उससे भी सूक्ष्म 
९ „~ 35 | अशब्द एवं अस्पशं ब्रह्मक देह 
स्पशच॒ब्ह्म देदेन्द्ियादिदोषेन- | एवं इन्दियादिङे दोषसे स्प नही 
९, । होता-इस विषयं तो कहना ही 
सर्य इत्यथः | __ . | क्या हे १ यह इसका तात्पयं दे । 
रयत इत्येतस्मि्वसरे वक्तव्यं ¦ ब्रहम स्पशं क्यो नीं होना ! 
प्राप तस्परकृतव्यासङ्खो मा! इस बाता उस्लेल करना इष 
दिति नोच्यते । हनरविरो$ अवसरपर आवश्यक दै; परु 
भूदाति नाच्यते । इनदरविरोच- || शरसङ्गका विच्छेद न हो, इलि 
नाख्यायिकायाड्ुपरिषटादक्ष्यामो | यों नहीं कहा नाता । अगे इन्द 
युक्तितः । | विरोचनकी नाख्यायिकरमे इसन 
यक्तिपूवंक वर्णन करगे । 
६ एतत्सत्यमुवितथं ब्रह्मपुरं | यद ब्रह्मपुर सत्य अवितथ है । 
शह वरत जरहव पुरं ब्रह्मपुरं | ब्रह्म दी पुर [अर्थात्‌ तरहमहप पुरका 
घप्म शरीराख्यं तु बह्म- । नाम ] बरहमपुर ह । कितु यह 





नयन्‌ । कथम्‌ १ अस्य देहस्य 


काण्ड २] 


दछाङ्करमाष्याथे 


८१५ 


` ~ 9-9-35 ~ 


पुरं ्ह्ञोपलक्षणाथंतात्‌ । तच- 
नृतमेव, “वाचारम्भणं विकारो 
नामधेयम्‌" ( ज० उ०° & । 
१। ४) इति भरुतेः 
कारे ऽन॒तेऽपि देहसुङ्ग ब्रह्मोपल- 
भ्यत इति ब्रह्मपुरमित्युक्त व्याव- 
हारिकम्‌ । सत्यं तु ब्रहमपुरमेत- 
देव ब्रहम; सर्व॑व्यवहारास्पद्‌- 


तद्वि 


ताव्‌ । = 
क्षिते ब्रह्मपुरे सवं कामा येः 
वहिरभवद्धिः प्रायं नते तेऽस्मिन्ने 


` स्वात्मनि समाहिताः । अतस्व- 


सप्राप्त्युपायमेवायुतिष्ठत बाद्य- 


विषयत्ष्णां त्यजतेत्यमिप्रायः। 

एष आत्मा मवतां स्वरूपम्‌ । 
भात्मनो शृणुत॒ तस्य रक्ष- 
क्षणम्‌ णम्‌ । अपहतपाप्मा, 
अपहतः पाप्मा धर्माधर्म 
ख्यो यस्य सोऽयमपहतपाप्मा। 
तथा विजरो विगतजरो विगू- 


स्यु । 





ररीरसंक ब्रह्मपुर रक्षके अप्क्षण- . 
के ल्यि होनेके कारण [ ब्हमपुर ` 
कहा जाता ] है । भौर वहतो 
मिथ्यादही है, क्योकि “वाणीके 
आश्रित विकार नाममात्र दहे" एसी 
रति दै । ब्रह्मका विर भोर 
मिथ्या ोनेपर भी इस देहरूप 
अङ्कर-- कायम ब्रह्मकी उपरुन्षि 
होती दै, इसर्यि इसे व्यावहारिक 
ब्रह्मपुर कहा गया दहै । वास्तविक 
्हमपुर तो यह ब्रह्म ही दै, व्यक < 
यह घम्रण व्यवहारका आश्रय है । 
अतः इस ॒ृदयपुण्डरीकोपरक्षित 
ब्ह्मुरमे सम्ूणं कामनापं जिदं 
कि आप. बाहर पाना चाहते है । 
वे सब-की-सब इस॒ अपने सामे 
ही स्थित है । इसरिये भापको उसकी 
परा्तिके उपायका दी अनुष्ठान करना 
चाहिये जीर बाच विपर्योकी तृष्णा- 
का परित्याग कर देना चाहिये-- 
रेखा इसका तालयं है । ” 
यह्‌ आत्मा आपका स्वरूप है । 
आप उसका लक्षण घुनिये । जप- 
इतपाप्मा-जिसङा धर्माधमंसंजञक पाप 
अपहत- नष्ट हो ग्या दै वह 
यहु त्रम अपहतपाप्मा है । इसी 
प्रकार विजर- जिसकी जरावस्या ,. 
बीत गयी है ओर स्लयुदीन द । 


क, 


< 


छान्दोग्योयनिषव्‌ 


[ छश्याय ८ 


> ~ ~ 9: 9 9 ~ ¬ ~ ~ ~ 9 8 ~ 9 ~ ~> 8 ~ह~ 


तदुक्तं पूवमेव न वधेनास्य 
इन्यत इति फिमथं पुनरुच्यते ? 
यद्यपि देहसम्बन्धिभ्यां .जरा- 
मृत्युभ्यां न सम्बध्यते । अन्य- 
थापि सम्बन्धस्ताभ्यां स्यादि- 


स्याशङ्कानिवृष्यथम्‌ । 

विशोको विगतश्चोकः। 
ओको नामेष्टादिवियोगनिमित्तो 
मानसः सन्तापः । बिजिघत्सो 
विगतारनेभ्छः । अपिपासो- 
ऽपानेच्छः । 

नन्वपदतपाप्मत्वेन जरादयः 
शोकान्ताः प्रतिषिद्धा एव 
बन्ति । कारणप्रतिषेधात्‌ ! 
धर्माधमेकाया हि त इति । 
जरादिपरतिपेषेन वा धर्माधर्मयो, 
का्यामावे विद्यमानयोरप्यसत्स- 
मत्वमिति पृथक्प्रतिपेषोऽनर्थकः 


स्यात्‌ । 


शङ्गा- दस (शरीर) के नाशसे 
उसका नाय नीं होता--यह 
चात तो पटे ही कदी जा चुकी दै, 
फिर इसे पुनः क्यो कहा जाता है ! 

समाधान--ययपि देह-सम्बन्धी 
जरा-मृलयुसे उसका बम्बन्ध नहीं 
होतातो भी अन्य प्रकारे तो 
उनके साथ उसका सम्बन्ध हो ही 
सकता दहै--इस आराङ्काकी 
निवृत्तिके स्यि रेषा किया गया है | 

वह--विोक--शोकरहित-- 
इष्टादिकरा वियोग होनेके कारण 
नो मानसिक्र संताप होता है उसे 
शोक कहते रहै, विनिवस्त-- 
भोजनेच्छासे रहित जर अपिपास- 
पीनेक्ठी इच्छासे रदित है । 

रङ्ञा--रिंतु अपहतपाप्म्वके 
द्वारा तो जरासे लेकर शोकपरयन्त 
सभी विरोषण प्रतिषिद्ध हो नति दै, 
क्योकि उनके कारणका प्रतिषेध हो 
नाता दै, कारण वे सव धर्माघमके 
ही कायं है; अथवा जरादिके 
प्रतिषिसे धर्मार्मक्षा कोई कायं न 
रहनेके कारण, विद्यमान रहते इए 
भो, उनका असत्समत सिद्ध होता 

। इसस्यि इन दोरनोका प्रथक्‌ 
प्रतिषेष निरर्थक दी दै । 


हाज्ड १] 


कशाङगभाष्या्थं 


८१७ 


4 3 र > क क = ॐ 3 = 9 2 3 


सत्यमेवं तथापि धमंकार्या 
जरादि-प्रतिषेध- नन्द्व्यतिरेकेण 
खा्य॑क्यम्‌ स्वाभाविकानन्दो 
यथेश्वरे “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" 
(बु० उ० ३।९ । २८) इति 
तैः । तथाधमंकायजरादिव्य- 
तिरेकैणापि जरादिदुःखस्वरूपं 
स्वाभाविकं स्यादित्याशङ्कयते । 
अतो युक्तस्तनिव्ृत्ये जरादीनां 
धमाधर्माभ्यां पृरथक्प्रतिषेधः । 
जरादिग्रदणं सवंदुःखोपलक्षणा- 
थेम्‌ । पापनिमित्तानां त 
हुःखानामानन्त्थासत्येकं च 
तत्परतिपेधस्याशक्यत्वाःपरवदुःख- 


प्रतिषेधाथं युक्तमेवापहतपाप्मत्व. 


वचनम्‌ । 

सत्या अवितथाः कामा यस्य 
सोऽयं सत्यकामः । वितथा हि 
संसारिणां कामाः । ईइवरस्य 
तद्विपरीताः । तथा कामहेतवः 
संकल्पा अपि सत्या यस्य स 
सत्यसंकन्पः । संकल्पाः कामाथ 
शूद्धसत्वोपाधिनिमित्ता ईदवरस्य 


समाधान-टीक है, पसा ही 
होता दै; रितु जिस प्रकार हैम 
धर्मके कार्यभूत भानन्दसे भिन्न 
“रह्म विज्ञानस्वूप भौर भानन्द्‌- 
मय दै'" इस श्रुतिके अनुसार स्वाभा- 
विक सानन्द दै इस प्रकार अधर्मके 
कार्यहूप जरादिते भिन्न स्वाभाविक 
जरादि दुःखक्ा होना भी सम्भव 
है-ेसी मशका हो सकती है । 
इसलिये उसकी निवृिके लिपि 
धर्माधर्मसे जरादिका प्रथक्‌ प्रतिषेष 
करना उचित ही है । जरादिका 
ग्रहण सम्पूणं दुःखोके उपलक्षणके 
र्थि दै । पापनिमित्तक दुःखोकी 
अनन्तता होनेके कारण शौर उनरमेसे 
्रत्येकका प्रतिषेष करना भसम्भब्‌ 
होनेसे सम्पूणं दुःखोका प्रतिषेष 
करनेके छ्य उसके भपहतपाप्मतका 
प्रतिपादन करना उचित ही ै। 

जिघकी कामनाएं सत्य-- 
अमिथ्या है ऽसे सत्यफाम कहते 
है| असत्य ठो संसा्ियिंकी हौ 
कामनाएं हुआ रती है, दैश्वरकी 
कामना तो उससे विपरीत होती 
है। इसी प्रफार निके कामके 


हेतुमत संकल्प भी घत है वह 
ईश्वर ॒सत्यसंकरप है । दैदवरके 


८१८ 


छान्दोम्योषनिषद्‌ 


[ अश्वाय ८ 


ग~ 84 ~ > ~~ 9 ऋ 8 ट ट १.4 


वित्रगुवत्‌। न स्वतो नेति 
नेवीत्युक्ततवात्‌ । यथोक्तलक्षण 
एवात्मा विज्ञेयो गुरुभ्यः शान्ञ- 
तश्रारमसंबेद्यतया च स्वाराज्य- 


कामः 
न ॒वेद्वि्ञायते को दोषः 
आस्मतत्वा- स्यादिति, शृणु- 
डने दोषः तात्र दोषरं॑दृष्टाः 
न्तेन । यथा द्येवेह रोके प्रजा 
अन्वाबिशन्त्युवतंन्ते यथानु- 
जासनं यथेह प्रजा अन्यं स्वामिनं 
मन्यमानाः स्वस्य स्वामिनो यथा 
यथानुशासनं तथा तथान्वावि- 
शन्ति। किम्‌? यं यमन्तं 
प्रत्यन्तं जनपदं सेत्रभागं 
चामिकामा अथिन्यो भवन्त्या- 
त्मबुद्धधनुरूपं तं वमेव च 


संकट ओर कामना चित्रकै 
समानश उसकी श्ुद्धसत्चह्ूप 
उपाधिके कारण हैँ, स्वतः नही 
क्योकि नेति. नेतिः एसा कहकर 


उनका प्रतिषेष किया गया है | 


स्वाराज्यक्ठौ इच्छाव पुरूषो 


गुरु ओर शाश्चद्रारा उपर्युक्त 
रक्ष्णोवले भसमाको ही स्वसंवेध- 
खूपसे जानना चाहिये । 

यदि कहो छि उसे न जानें 
तोभीक्या दोषदहैतो इषम लो 
दोष है वह दृष्टान्तपूर्वकं घनो । 
इस रोके जिच प्रकार प्रजा 
[ राजाके ] नुश्च[सनके भनुसार 
रहती है-इस रोके निस प्रकार 
अपनेसे भिन्न कोई अन्य स्वामी 
माननेवाली प्रजा लैसी अपने 
स्वामीक्ो आज्ञा होती है उसी 
प्रकार भनुवतंन छरती है; किसका 
अनुवतन करती है - वह अपनी 
बुद्धिके भनुषार जिस-जिस प्रत्यन्त 
( वस्तुको संनिषि ), देश्च थवा 
कषेतरभागकी कामना करती है उ्ी- 
उसी प्रतयन्तादिक्षौ उपजीविनी होती 
है। यह दृष्ट्व पुण्यफडोपमोनमें 
भस्वात्यदोषके प्रति ट ॥ ५॥ 


9 सकते 


्रत्यन्तादिष्ुपजीवन्तीति । एष 
दृषटान्तोऽस्वावन्त्यदोषं प्रति 
पुण्यफरोपमोगे ॥ ५ ॥ 

` नविलप्रकारभिष्डे नन ------------ जिस प्रार्‌ जिखके व्‌ 


है, उसी प्रकार । 


शं चिन-वणनाढी गौ है दको जिग कत 


दण्ड १] हाद्करमाच्याथ ८१९ 
१.5. 4 ४ 4 ॐ = ॐ ॐ 4 क क = क ॐ क. क. ॐ क. 5 # = र ॐ 4 
पुण्यकम फलका अनित्यत्व 


अथान्यो दृष्टान्तस्तरकषयं | अब उप्त ( कमफल ) के क्षमके 
लिये (तद्चथेलयाषः श्रतिसे दद्रा 
प्रति तघ्थेहै्यादिः | दृष्टान्त दिया नाता दै- 
तद्यथेह कर्मजितो रोकः क्षीयत एवमेवामुत्र 
पुण्यजितो खोकः क्षीयते त्य इ्ातमानमननुवि्य ्रज- 
न्येताश्श्च सत्यान्कामारस्तेषा९ सर्वेषु रोकेष्वकाम- 
चारो भवत्यथ य इदात्मानमनुवि्य बजन्त्येतारध सत्यान्‌ 


कामाश्स्तेषाश्सरवेषु खोकेषु कामचारो भवति ॥ ६ ॥ 
जिस प्रकार यहो करमते पराप्त किया हमा रोक क्षेण हो नाता दै 
उक्ष परार परलोके पुण्योपार्जित रोक क्षीण हो नाता है । जो रोग 
इस रोके भातमाको भौर इन स्य कामनाओं बिना जाने हौ पररो- 
गामो होते दै उनकी समपूणं लोकमि यथेच्छति नी होती भौर नो इव 
रोकम भात्माको तथा सल ॒कामनाओंको जानकर [ परलोके ] जते है 
उनकी समस्त लोकमि यथेच्छगति होती है ॥ ६ ॥ 
तत्तत्र यथेह रोके तासामेव | सो निस प्रकार इस रोके भपने 
स्वाम्यदुशासनायुवतिनीनां प्रजा 1 ५. ए 
नां सेवादिजितो लोकः पराधी- | कर्मत भ्र सा हुमा यह रोक 
जिका उपमोग पराधीन है, क्षीण 
नोपमोगः क्षीयतेऽन्तवान्भवति || अन्तवान्‌ हो जाता है--मन धूति 


बयेदानीं दारशन्तिकयपसंदरति | दान्तका उपसंहर कती ह 
दानीं दार्टान्तिकमुपसं्रति व न 


एवमेवधुतरारदोतरादिपण्यनितो ुण्यकर्मसे प्राप्त किया हुभा शोक 
रोकः प्राधीनोपभोगः क्षीयत | भी, निका उपमोग पराधीन है, ` 
एवेति । उक्तो दोष | क्षीण दीहो नता हे । उक्त दोष 


८२० छान्दोच्योपनिषद्‌ [ लष्याव ८ 


96 < 9 ~ < 9 2 9 =< 8 ~ 9 ~< 8८ >2 2८9८-9 >8८ 8८ ~ = ० 


एषामिति विषयं दर्शयति तच 


इत्यादिना । 

तत्त्रहास्मिन्नोके ज्ञानक्म- 
णोरयिषृता योग्याः सन्त 
आत्मानं यथोक्तलक्षणं शाघ्ना- 
, चारयोपदिष्टमनयुविद्य यथोपदेश- 
मनु स्वसवेद्यतामषृत्वा ब्रजन्ति 
दहादस्मासरयन्ति। य एतांश्च 


= 


अ स्वात्मस्थान्‌ कामानननुविद्य 
व्रजन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वका- 
मचारोऽस्वतन्तरता भवति । यथा 
राजायुशासनादुवतिंनीनां प्रजा- 
नामिय्थः । 

अथ येऽन्य इह लोकं 
आत्मानं शाघ्राचारयोपदेशमनु- 
विद्य स्वात्मसवेद्यतामापाच 
व्रजन्ति यथोक्तां सत्यान्कामा- 
स्तेषां सषु छोकेषु कामचारो 


मवति रास इव सार्वभोमस्येह | 


लोके ॥ ६ ॥ 


इन ( भनास्मवे्ताभो) को हप्र 

ता दै इस प्रकार श्रुति (तपे 
इत्यादि वाक्यसे दोषका विषय 
दिखती है । 

सो हस रोम शान भौर 
कर्मके सधिकारी शर्थात्‌ योग्यता- 
सम्पञ्च होकर जो छोग शाञ्च 
जीर जावचार्दरारा उपदेश क्षिय इए 
उपयुक्त रक्षणवाले आत्माको उनके 
उपदेशके अनुसार बिना ननि-- 
प्वात्मसंबे्यताको बिना प्राप्त क्षिय 
हस दहसे चले नाते है भौर जो 
इन उप्यक्त सत्य--सत्यसंकल्पकषी 
कार्यभ्‌त लपने अन्तःकरणमें स्थित 
सत्य कोमनाओंको बिना जाने चे 
जाते दै उनकी सम्पूणं रोक 
अक्रामगति- अस्वतन्त्रता होपी है। 
जिस प्रकार कि राजाकी अना 
अनुवर्तन करनेवाली प्रनार्थोै 
परतन्त्रता रहती हे । 

घौर जो सरे लोग इष लोक 
शाक्ञ ओर भाचार्यके उपदशषके 
अनुसार भास्माक्ो जनकर-- 
स्वातसंबषेद्यताको प्राप करके 
उपयु क्त सत्य कामनाओंको जानक 
परलोकमें जाते है उनकी इस लोक; 
म सार्व॑भोम राजाके क्षमान सम्पूणं 


। रोकेमिं ययेच्छगति होती दै ॥६॥ 


= ~ 
इतिररान्दोग्यो पनिषद्य्मारय गय 
अथमखण्डमाप्यं सम्पणेम्‌ ॥ १ ॥ 


| 


(= (= दीय 
{4 सकरद 
दहर-ब्ह्मकी उपासनाक्रा फट 


कथं सर्वेषु रोकेषु कामाचारो | उसरी सम्पूणं लोकमि क्कि 
तत . __. | प्रकार यथेच्छगति हो जाती है, यह 
मबतीसयुभ्यते । य॒ आत्मानं | वतरते है- जिसने अगि बतरये 


यथोक्तलक्षणं हदि साक्षाछृत- | जनेवले वऋकषचर्यादि . साधनेति 
६ सम्पन्न हो अपने हयम [ अर्थात्‌ 
बान्वक्ष्यमाणव्रहचयादिसाधन- | ध्यानके द्वारा ] उपर्युक्त सक्षणो 


वले आत्माक्रा साक्षाक्तार श्रिया द 
तथा उसमे रहनेवाठे सल कार्मोको 
कामान- । प्रप्त क है 
स यदि पितृखोककामो भवति संकरपदेषास्य 
पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन सम्पन्नो भही- 
यते ॥ ९ ॥ | 
वह यदि पितृरोककी कामनाबाखा होता हे तो उपतके संकल्पते 
ही पितृगण वँ उपस्थित होते है [ अर्थ्‌ उसके भसस्बन्धौ हो 
जाते दै, ] उस पितृरोकसे सम्पन्न होकर वह महिमानित होता दे ॥१॥ 
स स्यक्तदेहो यदि पिवरोक- | बह यदि देह छोडनेपर ॒पितू- 
लोककी कामनावाख होता हे-- 
पितर उत्प्तिकर्ताथोँफो कते है, 
सुखहैतसेन भोग्यत्वाघ्नोका | सुलके हितुरूपसे भोग्य होनेके 
उच्यन्ते तेषु कामो यस्य तैः | कारण वे दी रोक कहे नाते दै, 


उनके प्रति जिसकी कामना होती 
पित्भिः सम्बन्पेच्छा यस्य ल 


मवति तस्य संकन्पमात्रादेष | सम्बन्ध करनेकी जिनको इच्छा 


सम्पन्नः संस्तत्स्थां्र सत्यान्‌ | 


॥ 
| 


कामः पितरो जनयपितारस्त एव 


८२२ . छान्दोग्योपनिषद्‌ [ बष्याय ८ 
थ 8080888 


पितरः स॒तिषठन्त्यात्मसम्बन्धि- | होती है उसके संकल्पमात्रत ही 
पितृगण समुत्थित हो जति है 
तामापच्न्ते । विशुद्धसत्चतया | रथात्‌ आम-सम्बन्धिलको प्रा 


। हो जाते है । दरवित् होनेसे ईशरके 
सत्यसंकल्पलादीश्वरस्येव तेन | समान स्यसषकल्प होनेके कारण 


| -वह उस पितृरोकके भोगसे स्पनन 
पिरलोकेन भोगेन सम्पन्नः सम्प.| हो -सम्पति इष्टपराप्तिका नाम. है- 
ततिरिपरा्िस्तया समृद्धो मही- | उससे समृद्ध हो वह महनीय पूनित ऽ 


होता अथवा बृद्धकतो पराप होता दै , 
यते पूज्यते वधते वा महिमान- यानी महिमा अनुमव कला 
मञुमवति ॥ १॥ `. ।है॥१॥ 


~: ०:- 


अथ यदि मातृलोककामो भवति संकल्पादेवाख 
मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन सम्पन्नो मही- ५ 
यते ॥ २ ॥ | 

जर यदि वह मातृरोककी कमनावाा होता दहै तो उसके 
संहस्पसे दी माता वहाँ उपस्थित हो जाती है । उष मातृरोक 
सम्पत्न हो वह महिमाको प्रा होता है ॥ २ ॥ ` 

अथ यदि च्रातुरोककामो भवति संकर्पादेवा- 
स्य॒ भ्रातरः समुक्षन्ति तेन भ्रातुलोकेन सम्पन्न 
महीयते ॥ ३ ॥ ¦ 

जोर यदि वह॒ भ्ातृरोककरी करामनावाख होता है तो उक 


संकलपसे दी आातृगण वं उपस्थित हो " जति द । उस भ्रातृ 
सम्पन्न हो वह महिमाको पराप्त होता है ॥ ३ ॥ 


अथ यदि स्वखरोककामो भवति संकटपादेवा- 


स्य स्वलारः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्वसखलाकेन सम्पन्नो 
महीयते ॥ ४ ॥ 


इष्ड २ | शाङ्करभाष्याथं < 
-9-4- ऊक ॐ ॐ ॐ ॐ = ॐ क @ @ ॐ = ॐ = = ॐ = 


जोर यदि वह भगिनीरोककी कामनावाा होता है तो उसके 
संकल्पते ही बहन वदँ उपस्थित हो नाती है । उर भगिनीकोकते स्तन 
हो वह महिमाको प्राप्त होता दहै ॥ ४॥ 


अथ यदि सखिरोककामो भवति संकल्पादेवास्य 
सखायः समुत्तिष्ठन्ति तेन सखिरोकेन सम्पन्नोमहीयते।५। 
जौर दि वह सखाभकि रोककी कामनावाला होता है तो उसके 
संकल्पते ही सखालोग वहो उपस्थित हो जते है । उस सखाभोके 
लोकते सम्प्र हो वह महिमाको प्राप्त हेता है ॥ ५ ॥ 
अथ यदि गन्धमास्यरोककामो भवति संकल्पा- 
देवास्य गन्धमास्ये समुतिष्ठतस्तेन गन्धमाल्यरोकेन 
सम्पन्नो महीयते ॥ ६ ॥. 


ओर यदि वद गन्धमाल्यलोककी कामनावाखा होता है तो उघ्ठके 
संकसपसे ही गन्धमाल्यादि व उपस्थित हो नते द । उप गन्धमाल्य- 
रोकसे शष्प्न हो वह मदिमाको प्रा होता द ॥ & ॥ 
अथ यदयन्नपानलोककामो भवति संकस्पादेवास्यान्न- 
पाने ससुक्तिष्ठतस्तेनान्नपानरोकेन सम्पन्नो महीयते ।७। 
ओर यदि वह अन्नपानसप्बन्धी लोकको कामनावा होता है तो 


उसके संकल्पते ही अन्नपान उसके पास उपस्थित दो जाति दै। उस 
अन्नपान-रोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता हे॥ ७॥ 


अथ यदि गीतवादि्नखोककामौ भवति संकर्पा- 
देवास्य गीतवादित्रे समुत्तिष्ठतस्तेन गीतवादित्रलोकेन 
सम्पन्नो महीयते ॥ < ॥ 


८२४ छाण्डोग्योवनिषदू [ बष्याय ९ 
988 9 85 286 86 9 6 तः ट 


ओर यदि वह गीतवाचस्बन्धी रोककी कामनाबाल होता हषे 
शके संकृटपसे ही गीत-वाय व्हा प्राप्त हो जाते है । उप मीतवाघ- 
लोकसे सम्पन्न हो वह महिमा परप्च होता है ॥ ८ ॥ 


अथ यदि च्ञीरोककामो भवति संकल्पादेवास्य 
जियः समुत्तिष्ठन्ति तेन च्लीरोकेन सम्पन्नो महीयते॥९॥ 


छीर यदि वह ख्ीरोफकी कामनावाख होता है तो उके संकल्य- 
मात्रसे ही र्या उसके पास उपस्थित हो जातो है | उ श्चीरो्षत 
घम्प्न हो वह महिमान्वित होता है ॥ ९ ॥ 


समानमन्यत्‌ । मातरो जनयि- रोष सव इसीके समान दै। 
त्योऽतीताः सुखहेतभूताः साम- | मातुगण अर्थात्‌ अतीत जन्म देन 
ए के अनुष 
यात्‌ । न ;खदेतुभूता वाढी माताए जो योग्यता 
ति । न हि दःखेतभूतस | पुलकी हेतुभूता है, क्योकि दुःखकी 
ग्रामष्करादिजन्मनिगित्ताु | न 


विशुद्ध सर _ _। हेवमूत प्रामपुक्रादि जन्मो 
(रः याभिन कारणस्वूपा माताओकि प्रति विदुर 
इच्छा तत्सम्बन्धो वा युक्तः 


चित्त योगीकी इच्छा अथवा उनरे 
॥ २-९ ॥ सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है ॥२-९॥ 





ष हि | 


यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य 
संकर्पादेव समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नो महीयते ॥१०॥ 
वह्‌ जिस-जिस मदेशकी कामना करनेवाला होता है ओर निघ 


जिस भोगकी इच्छा करता दै वह सव उसके संकल्पसे ही उसको ध 
हो नाता है । उससे सम्पन्न होकर वह महिमाको भाप होता दै ॥१०॥ 


खण्ड २] चाङरभाव्यार्थं ८२५ 
+ ॐ 3 ४.4 ग = + क 5 ॐ क + ॐ = = ॐ. ॐ ॐ @ > ॐ 3 


यं यमन्तं प्रदेश्षमभिकामो | वह जिस-जिस अन्त यानी 

| ६ प्रदेशकी कामना करनेवाला होता 
वति । यं च कामं कामयते ३ वीर जन 
यथोक्तव्यतिरेकेणापि सोऽस्या- | भोगी इच्छा करता दै वह इसका 
पानेके छ्य मभिमत प्रदेश ओर भोग 
इसे संकटपमात्रसे प्राप्त हो जाता है। 
ल्पादैव स्ट्तष्ठत्यस्य । तेने- | उससे भरथात्‌ इच्छाके भविधात जौर 


स्छादिषावतयाभिपरेतार्थभ्प्त्या | भमिमत पदा्थको महिते स्प शे 
सम्पन्नो मदीयत हत्य वह्‌ महिमाको प्रष्ठ होता है--श्स 
च सम्पन्नो मदीयत हतयुकता- | भकार यह जथ पे कटा ही ना 


थेम्‌ ।। १० ॥ च्ञ है ॥ १०॥ 


न्तः प्राप्तुमिष्टः कामश्च संक- 


~: ०:- 


इतिच्छान्डोग्योपनिषदय्ठमाध्याये वितीयस्षण्ड 
भाष्यं सम्पूणम्‌ ॥ २॥ 





कुतीख तद 
भसत्यसे जाव त सत्यक उपासना जर नामाक्षरेपा्तना 

यथोक्तातमध्यानसाधनानु- उपयुक्त ात्मध्यानरूप साषनके 
वानं प्रति सांथकानाघ्रुसाह- भनुष्ठानके प्रति साधकं. उतसाह 
जननार्थमनुक्रीशन्त्याह- ऋष्ट- | पेदा रेके ल्थि दया कनेवाी 
1 त ्रुति कहती है-यह्‌ बहू ही कषटक्ी 
मिदं खलु वतते यत्स्वासस्थाः बात ह दि जपने भाम ही स्थित 
स्क्यप्राप्या अपि-- आर प्राप्त होने योग्य भी-- 


त इम सप्याः कामा अनृतापिधानास्तेषा सत्या 
नासतामनृतमपिधानं यो यो ह्यस्येतः परेति न तमिह 
दशनाय रभते ॥ १ ॥ 


वे ये सत्यकाम अनृताच्छादनयुक्त है । सत्य होनेपर भी भनृत 
(मिथ्या) उनक्रा अपिधान (आच्छादन करनेवासा) है, क्योकि इस प्राणीक। 
जो-नो [ सम्बन्धी ] यंस मरकर जाता है वह-वह उसे फिर देखनेके 
ल्मि नहीं मिक्ता ॥ १ ॥ 


त इभे सत्याः कामा अनृता- | वे ये सकाम अनूतापिभान 
८ मिथ्यारूप आच्छादनवलि ) द । 
अपने ही आश्रित रहनेवाढी उन 
याणामेव सतामरतं बाह्यविषयेषु | आतमस्थित कामना्ोंका अग 


क दष ष्ण | अषिन है जी, न्त भा 
सपजभाजनाच्छना पि द््णा | जोर यज्ञादि वाद विषयों नो तष 


पिधानास्तेषामात्मस्थानां स्वाश्र- 


तन्निमित्तं च स्वेच्छाप्रचारत्वं | 2 उके कारण होनेवाल स्वैच्छाचाई 
| मिथ्याज्ञानजनित दहोनेके कण 
मिध्याज्ञाननिभित्त्वादनृतमिरयु नुतः कहा जाता है; 


खण्ड ३ ] 


शाषङ्श्भाष्या्थं 


८२७ 


2 9 9 9 9 क 2 ॐ = = > > 5 2 5 ॐ 4 


श्यते । तनिभित्तं सस्यानां 


कामानामपराधिरित्यपिधानमि- 
वापिधानमर्‌ | 
थमनृतापिधाननिमिततं तेषा- 
मामः ? इत्युच्यते; यो यो 
हि यस्मादस्य जन्तोः पुत्रो 
भ्रातः वेष्ट इतोऽस्मान्नोकास्रेति 
प्रिवते विष्टं पत्रं भ्रातरं वा 
स्वहदयाकाश्े वि्यमानमपीह 
पुनरदशेनयेच्छ्पि न लमते 
॥ १ ॥ 


कारण स्त्यकामनार्ओंकी प्राप्ति 
नदीं होती इसलिये वह भपिधानके 
समान अपिधान है [ वास्तविक 
अपिधान नहीं है ]। 

मिथ्या अप्धानके कारण उनकी 
प्राप्ति किस प्रकार नदीं होती, सो 
बतलाया जाता है; क्योकि इस 
जीवक जो-जो पुत्र, भारे अथवा 
इष्ट इस छोकसे मरकर जाता है, 
अपने हृदयाकाशे विमान रहनेषर 
भी उस इष्ट, पुत्र अथवा मारको 
वह इच्छा करनेपर भी इख लोकम 
फिर देखनेको नहीं पता ॥ १ ॥ 


4 ५, 
णौ वि १ य 


अथ ये चास्येह जीवा ये च परेता यचान्यदिच्छन्न 
रभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्येते सत्याः कामा 
अच्रतापिधानास्तयथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षे्रज्ञा 
उपयुपरि सरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा 
अहरहर्गच्छन्त्य पतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि 


प्रत्यूढाः ५ २॥ 


तथा उस्र लोकमम भपने जिन जीवित अथवा जिन मतक [पुत्रादि] 
को ओर जिन अन्य पदार्थोको यई इच्छा करते हुए भी प्राप्त नहीं करता 
.उन सबको यह हस ८ हदयाक्ाशचस्थित ब्रह्म ) मेँ जाकर प्राप्त कर केता 
है; क्योकि यरं हसके ये सत्यकाम अनुतसे ठके इए रहते दै । इस 
विषयमे यद दष्टन्त है--जिस भकार पृथिवीम गढ एखुवणंके खजानेकमो. 


८२८ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ शष्याय ८ 


ऋऋ ऋ < ८ < < ८ 08 >~ ८-8८- 
उस स्थानसे अनभिज्ञ पुष उपर-ऊपर विचरते हुए भी नहीं जानते इती 
भकार यह सारी प्रजा निदयप्रति त्रहरोकको जाती हुई उपे नही पाती, 
क्योकि यह भनृतके द्वारा हर ली गयी है ॥ २ ॥ 


अथ पुनय चास्य विदुषो | तथा इस विद्वान्‌ प्रणीक़ो जो 
जन्तोजीवा जीवन्तीह पुत्रा | जीव--इस लोकम जीवित पुत्र य 
भ्रा्रादयो वाये चप्रेता मृता | आता भादि, थवा जो प्रत-मर 
दाः सम्बन्धिनो यच्ान्यदिष् | हए इष्टसम्बन्धी तथा इपर टो 
रोके षस्रान्नपानादि रत्नादि वा | जो वज्ञ एवं अक्न-पानादि चैर 
वसिच्छन्न रभते तत्सवमत्र | रलादि पदार्थं इच्छा करनेपर भी 
हृदयाक्राशास्थे ब्रह्मणि गत्वा | नही मिते उन सवो यह इस 
यथोक्तेन विधिना विन्दते | हदयाकाशखूप वक्षे पचक 
रमते । अत्रा्मन्दार्दाकाशे | उप्ुक्त विधिसे प्राप्त कर केता दै, 
हि यस्मादस्येते यथोक्ताः | क्योकि यद उप्तके हस हदयाकादमे 
सत्याः कामा वतंन्तेदृता- | ये उयप्थुक्त सत्य काम मिथ्यासे 
पिधानाः। आच्छादित हुए वतमान रहते है । 
कथमिव तदन्याग्यमिल्यु- | [अपने आत्ममूत ब्रह्म विमान 
रहनेपर भी कामनाएं यष्ट उपरन्ब 

च्यते। तत्त्र यथा दिरण्यनिधि | नही हेती ] यह असङ्गत बात 
8 कैसे हो सकती है ! यह बतलाया 

हिरण्यमेव पुनग्रहणाय निधाव्‌- | जाता ै। इस विषयमे यह दृष्टन्त 
है- निन प्रकार हिरण्यनिधि-- 
हिरण्य ( घुष ) ही, धरोहर 
रखनेवले पुर्पोदरारा पुनः गहण 
छरनेके स्थि धरोहरखूपतसे नित 


९ क्रिया (रख दिया) नाता दै, 
समक्ता निषिशाचेनिभिकषेतर- | इर्ये निमि ३ । मूमिके नीने 


भिर्निधीयत इति निधिस्तं हिरण्य 


निधि निदितं भूमेरधस्तानिक्षि- 


चण्ड । 


ह्लाहुरभाष्याथं 


८२९ 


06 9८29-5 ~ 8 9 4 9 8 8 ~ ~ 9 ~ = 9 


मरजानन्तस्तै निषेूपयुपरि 
सश्वरन्तोऽपि निधि न विन्देयुः 
्वकयवेदनमपि; एवमेवेमा 
अवि्लावस्यः सर्वा हसाः प्रजा 
यथोक्तं हदयाकाशाख्यं बह्- 
लोक्ठं ब्रहैव लोको ब्रह्मलोक 
स्तमदश्हः प्रत्यहं गच्छन्त्योऽपि 
सुसुप्तकारे न॒ विन्दन्ति न 
लभन्ते एवोऽहं ब्मलोकभाव- 
मापन्नोऽस्खधिति । अनृतेन दि 
यथोक्तेन दि यस्माखत्युढा 
हताः सवरूपाद्वि्यादिदोषेवं- 
दिग्षटृष्टा इत्यथः । अतः कष्ट- 
मिदं वैते जन्तूनां यत्स्वायत- 
मपि ब्रह्म न रस्यत इत्यभि- 
प्रायः ॥ २॥ 


निहित- निक्षिप्त (रखी हर ) 
उञ्च युवण॑निधिको जिम प्रकार 
उस स्थाने अनभिज्ञ-निषि- 
शक्द्रारा निधिक्ेतरको न नानने- 
वलि पुरूष निधिकरे उपर सम्चार 
करते हुए भी, जितश्ना ज्ञान प्रपत 
होना सम्भव मी है उस्र निषिक्ो 
भी नहं जानते उसी प्रकार यह 
सम्पूणं अविघावती प्रजा उपय्त 
हदयाकाश्चसंज्क रोक$शो- तक्ष 
यही रोक है उप प्रक्षोकको युषुपति 
काम प्रतिदिन जानेपर भी यह मँ 
इस समथ बक्मरोक्षभावको प्राप्त हे 
गया हः इत प्रष्ठ नहीं उर्ज्ध 
करती, क्योकि वह उप्यक्त भनृतसे 
परसयुद-हत दै भर्थात्‌ मविदादिः 
दोोद्रारा-भपने स्वरूपसे बाहर 
खींच री गयी है । अतः यह बहे 

कृष्टकी बात दै ढि स्वायत्त होनेषर 

भी जीर्वोको ब्रह्मी प्राप्ति नहीं 

होती-रसा इसका ताप्यं है ।॥२॥ 


~~~ 


स वा एष आमा हृदि तस्येतदेव निरुक्त रहथ- 
भिति तस्माद्धृद्यमहरहरवा एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ॥२॥ 
वह्‌ य आत्मा हृदयम दै दि अयम्‌ ( यह हदे दै ) यदी 


इसका निरुक्त ( व्युखपत्ि ) दैः । इसीसे यद “हदय' दै । ईइ भशर 
जाननेवाला पुर्ष प्रतिदिन स्वरगरोकको नाता दै ॥ ३ ॥ 


८३० 


छन्डोग्योपनिषद्र 


[ भण्वाव ८ 


9 > 2: 85 ¬< 8 "~ ¬~ ¬ 8 क 9 ~ ~ >< 8८ 6८ > ८ ~ ऋ ८ 


स वै यः आत्मापहतपाप्मा 
इति प्रकृतो वैशब्देन तं स्मार- 
यति, एष विवक्षितं आत्मा 
हदि हृदयपुण्डरीक आकराश- 
कब्देनाभिदितः । तस्यैतस्य 
हृदयस्येतदेव निरुक्तं निवेचनं 
नान्यत्‌ । हृ्ययमासा वतेत 
इवि यस्मात्स्मादभदयम्‌ । 
हृदयनामनिवंचनप्रपिद्धापि 
स्वहृदय आत्मेत्यवगन्तन्थमि- 
त्यमिप्रायः । अदर प्रत्यह- 
मषिद्धु्रयमात्मेति जानन्‌ 
स्वर्गं लोकं हादं ब्रहेति प्रति- 
पद्यते । 

नन्वनेवेविदपि सुषुषटकाठे 
रादं ब्रहम प्रतिपद्यत एव सुपु 
काले सता सोम्य तदा सम्पन्न 
इत्युक्तरथात्‌ । 

चाटमेवं तथाप्यस्ति विषः ¦ 


यथा जानन्नजानंश् सो जन्तुः 


वह जो णामा है, 'भातपापहत. 
पापा" इस प्रकार जिसका प्रकरण है 
उघ आत्मगा ही श्रुति “रै शब्दस 
स्मरण कराती है । यह विवक्षित 
आत्मा हदय-पुण्रीकममे भाङ्राज 
छञ्दसे कडा गया है | उस इस हृदय. 
का यही निरुक्त निर्वचन (व्युखसि) 
हे, अन्य नहीं । कर्थ यह सा 
हृदयम विमान दहै इष्य पह 
दय है । इस प्रकार हदय) इष 
नामके निर्वचनकी प्रतिद्धिसे मी 
आतमा अपने हृदयम ह, एमा जानना 
चाहिये-एेसा इका मभिपराय दै। 
अहरहः ~प्रतिद्धिन इस प्रकार जानने- 
काला अर्थात्‌ 'यह मास्म थमे 
है" इस प्रकार जाननेवाला प्म 
स्वर्गरोक -- इदयस्थ ब्रह्मको पर 
होता ३ । 

शङ्का- शिवु इस प्रकार त 
जानेवाला भी घुषुपश्नारपे बरक 
प्राप्त होता ही दै, कोक पुषुप- 
कालम € सोम्य | उस मय यष 
सतसे सम्पन्न हो जाता दै' पे 
कडा गया दै । 

समाधान- ठीक दै, एेखा ही 


है। तो भी कुठ विरोषता दै । 
निस प्रकार विद्वान्‌ जोर भविद्वन्‌ 


खण्डे] हाहरभाष्याथं ८३१ 
| ~9(8 ८8 >< 8 289 9-8८-8 < >< 9 8 < > > 9 9 ऋ << 
। सद्रव्ैव तथापि त्वमसीति | सभी जीव सद्र ही द, तथापि 
| प्रत्ोधितो विदवान्सदेव | त दइ, भर पोप 
च _ ~ ॥ इ विद्रान्‌ . भ्र सत्‌ हीह, भौर 
नान्योऽस्मीति जानन्सदेव | कुछ नही" इत भकार जानता हमा 


मवति । एवमेव विद्रानविद्वंश्च | सत्‌ ही हो जाता हे । इसी प्रकर 
0 । यद्यपि सुषु्तमें विदान्‌ ओर भविद्वान्‌ 
सुषुपरे यद्य म्पद्यते तथा- ¦ _ .. र 

द | दोना ही सत्को प्राप होते है, तो 


प्येवंबिदेव स्वगं रोकमेती- | भी केवर दस प्रश्नर जाननेवाय दी 
= ल | © ¢) ~= 
त्युच्यते । देहपातेऽपि बिद्या- | घ्गेरोकको भाप होता है-एसाकदा 


५ जाता है, क्योकि देहपात हनेपर भी 
फलस्यावश्यं माबितवादित्येष । | 


विश्ेषः ॥ ३ ॥ ¦ यही इसकी बिक्षषता- ई ॥ २ ॥ 
अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरत्समुत्थाय परं 
उथोतिरूपसम्पदयय स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यतत एष 
आर्मेति होवाचेतदम्रतमभयमेतद्‌न्रह्येति तस्य ह वा 
एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥ ४ ॥ 
यह जो सम्परसाद है वष्ट इस खरीरसे उत्थान कर परम ज्योतिको 
। प्राप्त हो पने स्वद्पसे युक्त हो जाता है । यह भासा है, य्ह सृत 
| एवं घभय ह ओर यही ब्रहम दै-रेसा आचायने कडा । उस इस 
जह्मङ़ा “सत्यः यह नाम हे ॥ ४॥ 


खषुपकाछे स्वेनात्मना सता सुपुप्कास्मे अपने भाता 
सतसे सम्पन्न हमा पुष ्षम्यक्‌ 

सम्पमः सन्सम्यक्‌ ्रसीदूपीति | सूपे प्रसन्न होता दै, अतः बह 
जापरत्‌ तथा स्वप्नके निषय भार 


जग्रतवभयोिपयन्ियसंयोग- | इन्दियोके संयोगसे प्राप्त हु 





<३९ 


छान्दोण्योपनिषल्‌ 


[ बध्याब ८ 


> 8-90-8 9८9 0-9-85 3 < 


जातं कालुष्यं जहातीति सम्प्र 
सादश्ब्यो यद्यपि सव॑जन्तूनां 
साधारणस्तथाप्येवंवित्स्वगं 

लोकमेतीति 
सम्प्रसाद्‌ इति संनिदहितवद्यलन- 


विशेषात्‌ । 
सोऽथेदं शरीरं ्ितवास्माच्छ- 


भ्रकृतसादेष्‌ 


रीरात्सयुत्थाय शरीरात्मभावनां 
परित्यञ्येत्यथः। न त्वासनादिव 
सथुत्थायेतीह युक्तम्‌; स्वेन 
रूषेणेति विक्ञेषणात्‌। न हन्यत 
उत्थाय स्वरूपं सम्पत्तव्यभ्‌ । 
स्वरूपमेव टि तन्न भवति प्रति- 
पत्तव्यं चेस्स्यात्‌ । पर परमातम- 


लक्षणं विज्ञप्तिस्वमावं ज्योति- 


फालिमाको व्याग देता है स्ह 
यपि (सम्पद शब्द सम्पण 
जीरके ल्थि साधारण षै, तो भौ 
इस प्रकार जानेवाला स्वर्गलोको 
भरा होता हैः देसा [बिहवसम्बन्ीं 
प्रकरण होनेके कारण^्एष सम्प्ादः 
यह प्रयोग ई विद्रानके ल्मिष्टी 
आया है; क्योकि यहँ संनिहितके 
समान विशेष यतन किया गया है ।# 

इस प्रकारा विवेक नेक 
पश्चात्‌ षह विद्वान्‌ इस शरीरको 
स्यागकृर इस क्षरीरसे उत्थान कर 
अर्थात्‌ देहासबुद्धिको व्यागकर-- 
यट (आसने उटनेके ्षमान 
शरीरसे उठ्करः रेषा भथं करना 
उचित नहौं है, वर्थोकि “स्वेन रूपेण" 
(अपने स्वरूपसे ) एेसा विेषण 
दिया गया है ओर अपने स्वरूपकी 
प्राप्ति किकी अन्य स्थानसे उत्थान 
करके की नक्ठी जाती, क्योकि यदि 
वह प्रा्व्य हो तो स्वरूप दी नदी 
हो सकता--पर अर्थात्‌ परमाल- 
क्षण विज्ञ ्वरूप ज्योतिको प्रप 


ॐ ' पप सम्भ्खाद्‌" में नो “एषः? शब्दका भयोग किया हुआ हे बही बल- 
बिशेष हे । जो वस्तु समीष होती र उसीके लिय 'एषः? ( यह ) का भोग 
किया जाता दे, अतः सम्परसाद' शब्दसे ययपि सामान्यतः समी जीका ग्रहण 
हो सकता है तथापि षः" सूप विशेष यतन होनेके कारण तीसरे मन्त्रे कदे 

: इट प्रकरणात विदान्के ल्य ही प्रयुक्त णा है क्योकि वही खमीप रै । 





निष्पद्यते । प्रागेतस्याः § 


ण्ड द ] शाङ्कर्याष्याथ ८३३ 
9: > >ˆ 9 ~> 39 8. ॐ 8: ~-ढ ज ~ ~ ० ~ ~ ~ ~ ~ अः 


रुपसम्पद्य स्वार्थ्यश्रुपगम्येत्ये- | हो भर्थात्‌ आत्मस्थिति्मे पचर 
तत्‌ । स्वेनात्मीयेन खूपेणाभि- | स्वकीय अर्थात्‌ पने रूपसे सम्पन्न 
हो जाता है । इस स्वरूपप्रापिसे पूवं 
वह॒ अपररूप देहको हौ अविधाके 
कारण आत्मभावसे समञ्ता था । 
उसीक्ौ अपिक्षसे स्वेन रूपेण 
( भपने स्वषूपसे) पसा हा 
गया है । 
अशरीरता ही आत्माका स्वूप 
हे । निक्त अपने परज्योतिःस्वरूपषो 
सम्प्रसाद प्राप्त होता टै वही 
आत्मा है-रेसा आचार्ये का । 
ताप्यं यह है छि श्रृतिने जिसे 
नियुक्त फिया है उस आचार्यको 
शिरयोके प्रति एसा कहना चाहिये । 
तथा यही अमृत-भविनाञ्ची भूमा 
है, क्योकि “जो भूमा है वही ममृत 
है" रेता कहा जा चुका है । इसीसे 
यह जमय दै, कयो मूमासे भिन्न 
दूसरी वस्तुका भभाव है; इसस्ि 
यह ब्रह है । 
उस इस ब्रह्महा बह नाम- 
अभिधान है । वह क्यादहै१- 
सत्य । सत्य ही ० असद्ि- 
> र ठ लक्षण ) बह्म है, क्योकि वह 
मिति । सत्यं वितथं रह्म । सल ह, बह आता ह पेता पले 


तत्य स॒ आत्मेति दुक्त । | ( छ ६। ८ ७मेँ) काना 












त्ेरविद्यया देहमेवापरं रूपमा- 
त्मत्वेनौपगत इति तदपेक्षयेद्‌- 
रुच्यते स्वेन शूपेणेति । 

अशरीरता घात्मनः स्वरूपम्‌ | 
यत्स्वं परं ज्योतिःस्वरूपमापद्यते 
सम्प्रसाद्‌ एष्‌ आत्मेति होवाच | 
स ब्रूयादिति यः शरुत्या नियुक्तो- 
ऽन्तेवासिभ्यः | किञशचैतदमृतम- 
विनाशि भूमा “वो वैभूमा 
तदशख्तम्‌'' (छा° उ० ७।२४। 
१ ) इत्युक्तम्‌ । अत॒ णएवाभयं 
भूम्नो द्वितीयाभावाद्‌त एत- 
दूत्रहयेति । 

तस्य हट वा एतस्य ब्रह्मणो 
नामाभिघानम्‌ | किं तत्‌ ? सत्य- 


८३ छाम्दोम्योनिवह्‌ [ बष्याख ८ 
>ऋ 9८ > 9८ 9८ > 9८ 8८ 8८ ८ < < < > < ८ £< >< >< 8-8-2८ > अ 
अथ क्रिमर्थमिदं नाम पुनरुच्यते !| चुका दै । पितु यह नाम शिब 

स्यि कहा गया है ! [ इसपर कते 
है-- ] उसकी उपासना-विधिक्ी 
तदुषासनविधिस्तुत्यथम्‌ ॥ ४ ।॥ स्तुतिके स्थि ॥ ४ ॥ 


--- 


तानि इ वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सतीयमिति 
तदयत्सत्तदस्रतमथ यत्ति तन्म्थमथ यदयं तेनोभे यच्छति 
यदनेनोभे यच्छति तस्मायमहरहर्वा एवंविरस्वर्ग 
खोकमेति ॥ ५॥ 


वे ये सकारः, तकार भौर "यम्‌" तीन अक्षर दै । उनम नो 

“सकार, है वह अमृत दै, जो (तकार है वह म्यं है ओर जो म्‌ 

उससे वह ॒दोनोका नियमन फरता दै; क्योकि इससे वह उन दोनोका 

, नियमन करता है इसल्यि “यम्‌, इस प्रकार जानेवाला प्रतिदिन दी ` 
` स्वगलोकको जाता है ॥ ५ ॥ 

तानि हवा एतानि ब्रह्मणो] वेये ब्रहमके तीन नामाक्षर दै 

शसः, ती, जौर यम' अर्थात्‌ सकार, 

नामाक्षराणि त्रीण्येतानि सतीय- | तङ्कार ओर यम्‌ है | तारम नो 

मिति सकारस्तकारो यमिति च ईकार दै वह उच्चारणमात्रके ल्यि 


. | अनुबन्ध दहै, वरयोकरिं पीछे हस्व 
# द्‌ [ इकार ] से ही उसा निरदश 


बन्धुः;दस्वेनेवाक्षरेण पुनः प्रति- | किया गया है । उनमेसे वरह जो 
निर्देशात्‌ । तेषां तन्त्र यत्सर्स- | सत्‌ यानी सकार दै वह १ 
- सद्‌ ब्रह्म है । अमृतका वाचक 
कारस्तदगतं 1 ह 
ध वद्जक अदृतवाच- | कारण अमृतरूप सकारका ही 
` कत्वादगत एव सकारस्तकारान्तो| तकारान्त निर्दे किया गया हे । 


` निदि्टः। जथ यत्ति तका-। तथा बो तिः यानी तकार ट 


खण्ड 2 |] 
रस्तन्सत्यम्‌ । अथ यद्यमक्षर 
तेनाक्षरेगागतभर्यार्य पूर्वे उभे 
अक्षरे यच्छति यमयति नियम- 
यति वशीकरोत्यात्मनेत्यथः । 


यद्यस्मादनेन यमित्येतेनोमे 
यच्छति तस्माधम्‌ । संयते इव 


ह्येतेन यमा लश्येते ब्रह्मनामा- 


स्षरस्यापीदमभृतत्वादिधर्मवचवं 


महाभाग्यं किमुत नामवत इत्यु- 


^ 0 
पास्यत्वाय स्तुथते ब्रह्मनामानवं- 


चनेनैव । नामवतो वेत्ेव वित्‌ । 


अहरहर्वा एवेवित्स्वगं रोकमेती- 
स्ुक्तार्थम्‌ ॥ ५ ॥ 


€ 
शाङ्करमाष्याथं ८३५ 
>& >< >< ८ ७८ >€ ® 9८ > 9 9८ 6-9८-9८ -9 -ढ ध ॐ = = ॐ ॐ 4 


वह मत्य॑है घ्र जो “यम्‌, अक्षर 
है उस जक्षरसे अमृत जोर मत्य॑- 
संज्ञक पहले दोनों भक्षरोका 
प्रयोग॒करनेवाखा उनका नियमन 
करता है अर्थात्‌ उसके नियमन 
स्वमावसे उन्द वशीमृत करता है । 

कथो इस अक्षरके द्वारा इन 
दोनोँको नियमन करता है इसलिमि 
यह म्‌" है । इस थम्‌ भक्षरके 
द्वारा बे पूर्वोक्त दोनों भक्षर संयत-से 
दविखारी देते दै । ब्रह्मके नामके 
अक्षरोका भी यह भ॑गरृतत्वादि 
धर्मवान्‌ होना परम सौभाग्य दै, 
फिर नामीके विषयमे तो कहना ही 
क्या है १ इस प्रकार उसके 
उपाश्यत्वके ल्यि रह्यके नामका 
निर्वचन करके दी उसकी स्तुति कौ 
जाती है। उस नामीको जानने- 
वाला “एवंवित्‌, कहलाता है । वह 
एवंवित्‌ ( इस प्रकार जनाननेवाला ) 
नित्यपरति स्वर्गरोकको जाता है-पेसा 


अर्थं पहले कहा ही जा चुका ह ॥५॥ 


1 
इतिच्छाम्दोभ्योपनिषदयष्टमाध्याये दतीयञ्लण्ड- 
भाष्यं सस्पृणम्‌ ॥ ३ ॥ 


=: *: ~ 


छार उ° २७ 


© र्ध 
चतुथः स्कर 
सेतुरूप आत्माकी उपासना 


अथ य आत्मा स सेतुर्धृतिरेषां खोकानामसम्भे- 
दाय नेतश्सेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न श्र्युनं शोको 
न सुकृतं न दुष्कृत्सवेँ पाप्मानोऽतो निवतंन्तेऽपहत- 
पाप्मा द्येष ब्रह्मरोकः ॥ १ ॥ 


जो आतमा है वह इन रोकेके असम्भेद ( पारस्परिक असंघरष) के 
ख्ि इन्दं विशेषरूपसे धारण कटनेवाख सेतु दै। इस सेतुका 
दिनि-शत भतिक्रिमण नहीं करते । इसे न जरा, न मृध्यु, न शोक ओर 
न धकृत या दुष्त दी प्राप्त शे सकते है । सम्पूणं पाप इससे निवृत 
हो जाते है, क्योकि य ब्रह्मरोक पापशुल्य दै ॥ १ ॥ 


अथ य आत्मेति । उक्तलक्षणो | उपयुक्त लक्षणवाला जो सम्पताद 
। हे उसके स्वरूपकी आगे कहे नाने- 

यः सम्प्रसादस्तस्य स्वरूपं वक्ष्य- वाटे, परे कहे हुए तथा बिना 
मोरतलक्त < कहे इए गुर्णोसे ब्रह्मचय॑रूप 
गग! पतः साधनसे सम्बन्ध करानेके ल्य पुनः 
स्तूयते ब्रहमचर्यसाधनसम्बन्धा- | स्तति की जाती दै । यह जो उपयुक्त 
६ रक्षणोवाल आसा है वह सेतुके 
थम्‌ । य एष यथोक्तलक्षण । समान सेतु है; विध्रति--विशेषतः 


स सेतर सेतः। विधरतिविधरणः || > करनेवाखा हे । कर्ता (नीव) 


व || के अनुरूप विधान करनेवाले इस 
अनेन हि सवं जगदर्णाश्रमादि- | आत्मक 0 ता 


क्रियाकारकफलादिभेदनियमेः | वर्णाश्रमादि क्रिया, कारक ओर 








ण्ड ४ | 
क्रनुरूपं परिदधता बिश्तम्‌ । 


अभियमाणं दीश्वरेणेदं विश्वं 


विनश्येद्यतस्तस्मास्स सेतर्विंधृतिः। 


किमथं स सेतुरित्याह--एषां 
भूरादीनां लोकानां कतकमे- 
फलाश्रयाणामसंमेदायाविदारणा- 
याविनाशायत्येतत्‌ । किंविचिष्ट- 


श्वासौ सेतुरित्याह । नैतं सेतुमा- 
त्मानमहोरात्र सर्वस्य जनिमतः 
परिच्छेदके सती नैतं तरतः । 
यथान्ये संसारिणः कालेनाहो- 
रात्रादिरक्षणेन पर्च्छिया न 
तथायं कार्परिच्छिद्य ईत्यभिः 
प्रायः । ““यस्मादर्वाक्सवत्सरो- 
ऽहोभिः परिवर्तते” (व° उ० ४। 
४ । १६ ) इति श्रुत्यन्तरात्‌ । 
अत एवेनं न जरा तरति न 
्रा्ोति तथा । न सत्युनं शोको 


शोहरमाष्याथे ९३७ 
>~ ८ ¬< ~ 4 (ल (9 7 0- 


फलादि भेदके निय्मोद्रारा धारण 
क्षिया गया है; क्योकि ईैशरद्रारा 
धारण न किये जानेपर्‌ यह विश्च 
नष्ट हो जाता, इसल्यि वह इसे 
धारण करनेवाला सेतु है । 

वह सेतु क्यो है १ इसपर श्रुति 
कहती है कि कर्ता ओर कर्मफलके 
आश्रयभत इन भर्छेक भादि 
ोकौके असम्मेद-अविदारण 
अर्थात्‌ अविनाश ( रक्षा ) के ल्यि 
यह सेतु दै) यह सेतु किस 
विकशेषणवाला दहै १ इसपर श्रुति 
कहती है--ईइस आतमाखूप सेतुको 
दिन ओर रात सम्पूणं उसत्तञचीर 
पदा्थेकि परिच्छेदक होनेपर भी. 
अतिक्रमण नही करते । जितत 
प्रकार अन्य संसारी पदाथं अहो 
रात्रादिषूप कारसे परिच्छे है उस 
प्रकार यह कारपर्च्छिथ नहीं ह- 
एसा इसका भमिप्राय है; नेसा कि 
“निस्त ८ परमात्मा ) से नीचे 
संवत्सर दिनके रपम परिवर्तित 
होता रहता दै” इस अन्य श्रुतिसे 


| सिद्ध होता है । 


इसीसे इसे जरा नहीं तरती; 


अर्थात्‌ प्राप्त नहीं होतो । इसी प्रकार 
न मृलयु, न शोक, न ुङ्गत-दुष्कृत 


८३८ 


छाण्ोण्योपनिद्‌ 


{ बष्ायं ८ 


4 ८-४८-८ 3-9-८८ < ८ > 86 8 8८ ¬< > ह ¬ 


न सुकृतं न दुष्कृतं सुकृतदष्छृते | ओर न पर्माधर्मं हो प्रा होते है । 


धर्माधर्मौ । प्रापित तरणशब्दे- 


यहाँ (तरणः रशब्दसे प्राप्ति भभिप्रत 


[९ 
नाभिप्रेता नातिक्रमणम्‌ । कारणं दे, अत्किमण नही; काकि भाता 
॥ ९ 


द्यासमा । न शक्यं हि कारणाति- 
क्रमणं कतुं कार्येण । अश्ोरात्रादि 
च सवे सतः कायम्‌ । अन्येन 
हन्यस्यं प्रापिरतिक्रमणं बा 
क्रियेत । न तु तेनैव तस्य । न 
हि घटेन मृसप्राप्यतेऽतिक्रम्यते 


घा। 


यद्यपि पूवं य॒ आत्मापदत- 
पप्मेत्यादिना पाप्मादिप्रतिषेध 
उक्त एव तथापीहायं विक्षेपो न 
तरतीति प्राप्रिविषयत्वं प्रतिषि- 
ष्यते । त॒त्राविशेषेण जराद्यमाव- 
मात्रयुक्तम्‌ । अहोरात्रा्या उक्ता 
अनुक्ताश्ान्ये स्वे पाप्मान 


उच्यन्तेऽतोऽस्मादात्मनः सेतोरनि- 


वर्तन्तेऽग्राप्यैवेत्यथंः । अपहत- 


पाप्मा येष बह्मैव लोको ब्रह्मलोक 


` उक्तः ॥ १ ॥ 


कारण है जर कार्यके द्वारा कारण- 
का अकिक्रमण नही किया जा 
सकता । दिन ओर्‌ रात्रि भादिये 
सव॒ सत्के हौ कायं ई; भौर 
अन्यके द्वारा अन्यी दौ प्रपि 
अथवा भतिक्रमण क्षिया जाता है, 
अपने द्वारा अपनी ही प्राप्ति या 
अतिक्रमण नहीं क्रिया जता-- 
घटके द्वारा मृत्तिक्षा प्राप्त या भति- 
क्रान्त न्ीकी जा सकती । 

यद्यपि पहले य भात्माप्टतपाप्मा' 
इत्यादि वाक्यसे पाप आदिक 
प्रतिषेध फर दिया गया ह तथापि 
यँ धह विशेषता टै कि न 
तरति, इष वाक्षयसे आसमाके प्राप्ति- 
विषयत्वा प्रतिषेष किया जाता 
है । उसमे सामान्थङ्पसे जरादिका 
अभावमात्र बतलाया गया है । 
पूर्वोक्त दिन घौर रात्रि भादि तथा 
अन्य नुक्त पदाथं सभी पाप कष 
जाते है । भतः वे इस आसाखूप 
सेतुसे इसे प्राप्त क्रिये बिनाही 
निदत्त हो जाते टै, क्योकि यह 
ब्रह्मरोक-- जिसमे ब्रह्म ही रोक 
हे-अपहतपाप्मा कहा गया हे ॥१॥ 


[ति हि 


खण्ड ७ 


शाङ्करभाष्यं 


८३९ 


>>: >< >< < >< >< >< >9< < < > 8 9: 2८ ८ ¬< क 8८ 2८ < < 9८ 86 286 


यस्माच पाण्मकार्यमान्भ्यादि- 


क्योकि पापके छायं अन्धलादि 


शरीरवानको ही होते रै, भद्यरीर- 


दरीरवतः स्यान्न सवश्षरीरस्य- । को नद्ौ- 
तस्माद्रा एत सेतुं तीर्ववान्धः सन्ननन्धो भवति 
विद्धः सन्नविद्धो भवस्युपतापी सन्ननुपतापी भवति 
तस्माद्रा एत सेतुं ती्व्वापि नक्तमहरेवाभिनिष्प्यते 
सङ्द्धिभातो द्येवेष बह्मरोकः ॥ २ ॥ 
इसल्यि इस सेतुको तरकर पुरुष अन्धा होनेपर भी भन्धा नहीं 
होता, विद्ध होनेपर भी अविद्ध होता है, उपतापी होनेपर भी अनुपतापी 


होता है, इसीसे इपर सेतुको तरकर अन्धकारखूप रात्रि भी दिन ही हो 
जाती है, क्योकि यह ब्रह्मरोक सर्वदा प्रकाराघ्वरूप है॥ २ ॥ 


तस्माद्वा एतमात्मानं सेतुं 
तीस्वां ब्राप्यानन्धो भवति 
देदवखे पू्॑मन्धोऽपि सन्‌ । 
तथा विद्धः सन्देहवश्वे स दे 
वियोगे सेतु प्राप्याविद्धो भवति। 
तथोपतापीरोगादयुपतापवान्सन्न- 
सुपतापी भवति । किञ्च यस्माद्‌ 
दोरात्रे न स्तः सेतौ तस्माद्वा एतं 
सेतं॑तीर्त्वा प्राप्य नक्तमपि 
तमोरूपं रात्रिरपि सवंमहरेवा- 


इसीसे सेतुखूप इस आत्मा 
तरफर-प्राप्त होकर देहवान्‌ होनेके 
समय पहले अन्धा होनेषर भी- 
अनन्ध हो नाता हे । इसी प्रकार 
देहवान्‌ होनेके समय विद्ध होनेषर 
भी देका वियोग होनेपर इस सेतु- 
को प्राप्त होकर अविद्ध हो जाता 
है तथा [ देहवान्‌ होनेके दही 
समय ] उपतापी-रोगादि उपताप 
वाला होनेपर भी अनुपतापी हो 
जाता है। इसके सिवा क्योकि 
इस [ आत्मारूप ] सेतुं दिन- 
रातका अभाव है इसस्यि इस 
सेतुको तरकर प्राप्त शकर नक्त- 
तमोषूपा रात्रि भी सम्पूणं दिन ही 


८७० 


छ.न्डोग्दोरिङ्ड 


[ अंष्र(थ८ 


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भिनिष्पद्यते । विञप्त्यात्मल्यो 
तिःस्वरूपमहरिबाहः सदेकर्पं 


विदुषः सम्पद्यत इत्यर्थः । सकृ 


हो जाती हे | तासं यह हैक 
विद्रान्‌ॐ ल्थि वह दिनके समान 
विज्ञानामञ्योतिःस्व्ूप दिन अर्थात्‌ 
सवदा एक खूपदही हो जाता है 
वर्योकिं यह ब्रह्मलोक अपने 


दविभातः सदा विभातः सदेकरूषः| स्वाभाकिकरूपसे सङृद्िमात- सदा 


भासमान अर्थात्‌ सदा एक हूप 


स्वेन स्पेणेष ब्रह्मलोकः ॥ २ ॥ । हे ॥ २ ॥ 





तद्य एवेतं बह्म रोकं ब्रह्मचर्येणालुविन्दन्ति तेषामे 
वष॒ ब्रह्मरोकस्तेषा९ सर्वेषु खोकेषु कामचारो 


भवति ॥ २ ॥ 


वहो पेता होनेके कारण जो इस ब्रहमरोकको ब्र्षचर्यके द्वारा [ शाश्च 
एव जचायके उपदेशके अनुसार] जानते है उन्हीको यह ब्रह्मलोक प्राप 
होता है तथा उनकी समपूरणं लोकम ययेच्छगति हो जाती है ॥ ३ ॥ 


तत्तत्रैव यथोक्तं ब्रह्मरोक्ष > 


येण स्लीविषयतष्णात्यारोेन शारा 


व्ह ेसा होनेके कारण बो 
इस पृवोक्त क्मरोकको बह्यचय-- 
खीविषयक तुष्णाके ` व्यागद्वारा, 


| शाख एवं आचार्यक उपदेशके 


चा्योपदेशमनुषिन्दन्ति स्वातम- 


सवेद्यतामापादयन्ति ये तेषामेव 
¢ 

जह्यचयंसाघनवतां ब्ह्मविदामेष 

ब्रह्मरोकः । नान्येषां स्ीविषय- 


अनन्तर जानते दै भर्थात्‌ स्वात्मसं 
वेधताको प्राप्त कराते है उन 
ब्रह्मचय॑रूप साधनसम्पन्न ब्रह्मो- 
पासकको ही यह्‌ ब्रह्मरोक प्राप 
होता है । अन्य ख्रीविषृयक सम्पक- 
नित तुष्णावारोको बद्लोपासरक 


सम्प्कजातद्म्णानां ब्रहवरिदाम- | होनेपर भी इसकी प्रा नदी 


खण्ड ४] शाङ्करभाष्या्थं ८५१ 


वीत्यथं; । तेषां सवेषु रोकेषु | होती- रेस इसका तापस्यं है । 
कामचारो मवतीलयुक्तर्थम्‌ । | उनकी समू लोकम छेच्गति 


व हयो जाती दै-इस प्रकार इसश्ञा 
तस्मात्परसेतः्साधन ब्रह | अर्थ पल कृहा ना चुका है । अतः 


९ मरः © 
चयं ब्रह्मविदामित्यमिप्रायः | भमिप्राय यह दै किं यह ब्रह्मचर्य 
।॥ ३ ॥ ्रहनोपासकोका परम साधन है ॥२॥ 


°= 0 * 


इतिच्छाम्दोग्योपनिषद्यष्टमाष्याये चतुथं 


खण्डभाष्यं सम्पणंम्‌ ॥ ४॥ 





कुञ्च्‌ प्रः तड 
यन्ञादिमें ब्रह्मचर्यटशि 


य॒ आला सेतुतवादियुणेः | जिस आसाक्गी सेतुलादि गुणि 
स्तुतिं की गयी हे उशी प्रा्तिके 
स्थि ज्ञानसे इतर ज्ञानके सहकारी 
साधनान्तरं ब्रह्मचर्यारूपं बिधा- | साधन ब्रह्मचर्या विधान करना 
आवदयक दै; इसीते शुर कहती 
है; तथा उसकी कर्तञ्यताके हिमे 
त्स्तौति कतंव्यार्थम्‌-- यज्ञादिखूपसे उक्तकी स्तुति करती है- 


अथ यदन्ञं इत्याचक्षते बरह्म चर्थमेव तद्ब्रह्मचर्येण 
ह्यव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते बह्म- 
चथ॑मेव तद््रह्मचर्येण दयेेष्ारमानमघुविन्दते ॥ १ ॥ 
अन, [ रोकम ] जिसे "यज्ञः ८ परमपुर्षा्थका साधन ) कहते 

दे वह ब्रह्मच ही दै, वथोकि जो ज्ञता दै वह ब्रहमचर्् द्वारा ही उघ 
( जह्मलोक ) को प्रा होता है । जर निते ष्ट एेसा कहते है वह 


भौ बरहमचयं दी दे, करोड़ जकषचरयके दवार। पूजन करे ही पुल 
भास्करो प्राप्त होता है ॥ १॥ 


स्तुतस्तस्ाप्रये ज्ञानसदकारि- 


तन्यमित्याह । यन्ञादिमिश्व 


अथ यययज्ञ इत्याचक्षते रोके | अवर, निते "यज्ञः पसा का 
परमुरुषाथं्ाधनं कथयन्ति | जाता दै अर्थात्‌ रोकमे नसि रिष्ट 


९ „ | पुस्पं प्रम एस्वार्थका साधन 
शिशस्तद्र्चय मेव । यज्स्यापि | बतलते है वह ब्रह्मचर्यं ही दै । 


खंन्ड ५] 


व € 
शाङ्रमवाष्याथ 


८४३ 


व ~ -=--<---4 19 ८-99-८ 8 
यत्फलं तद्रह्मचयबोल्लभतेऽतो | यरंका भी जो फर दै उसे 


य्तोऽपि जरक्षचर्यमेवेति प्रतिपत्त- 


ब्रह्मचय॑वान्‌ पुरुष प्राप्त करता दै, 


| इसल्यि वज्ञको भी ब्रह्मचयं ही 


व्यय्‌ | कथं जहा चयं यज्ञ इत्याह । | समञ्चन चाहिये । ब्रह्मचर्यं यज्ञ 


बरह्मचर्येणेव हि यस्माच ज्ञाता 


किस प्रकार ह १ - इसपर श्रुति 
कहती दै- कोक जो ज्ञानवान्‌ 


स तं ब्रह्मलोकं य्तस्यापि पारम्प- | दै वह उप्त ब्रह्रोकृफो, नो कि 


यण शलभूतं विन्दते रभते ततो 
यज्ञोऽपि बहमच्यमेवेति । यो 
जञातेत्यक्षरायुडततेयला 


चर्यमेव । 
अथ यदिष्टमित्याचक्षते बक्ष- 


चर्यमेव तत्‌ । कथम्‌; ्रहमचये- 
णेव साधनेन 
पूजयित्वाथवैषणामात्मविषयां 
कृत्वा तमात्मानमलुविन्दते । 
एषणादिष्टमपि ं 
मेव ॥ १ ॥ 


परम्परासे य्ञका भी फर्षह्प दै, ` 
ब्ह्मचर्से दी प्राप्त करता है; अतः 
यह्‌ भी ब्रह्मचयं ही है । यो ज्ञाताः 


ब्रह्म- | इन अक्षरो री अनुवृत्ति होनेके कारण 


बह्मचर्यक्नो ही यज्ञ कदा गया हे । 


तथा जिते “इष्ट पसा कहा 
जाता है वह भी ब्रह्मचय॑ ही है। 


किस प्रकार १?- परुष उस दैश्रको 


तमीश्वरमिषटा | नर्मच्यषप साषनसे हौ यजन कर- 


पूजकर अथवा आत्मविषयक एषणा 
कर उस आत्मको शक्ल एवं 
आचार्यके उपदरेशानुसार साक्षात्‌ 


नक्मचय- | जानता है । उक्त एषणाके कारण 


इष्ट भी ब्रह्मचर्य ही है ॥ १॥ 


---्क*- 


अथ यत्सल्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्म 
चर्येण र्येव सत आत्मनच्राणं विन्दतेऽथ यन्मोन- 
मित्याचक्षते बह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण छ्य वात्मानमनु- 


विद्य मनुते ॥ २॥ 


८४४ डाग्दोण्योषनिषदहू [ ण्याय ८ 
> >9< >~ < ~< 9 व~ इ ~< ¬ 5 -5८ ¬2-| 9८ 8८ ¬ ८ -8- क 4. 4 ' ॐ 4 


र्था निस 'सलरयण' देता कडा नाता ह वह भी ब्रह्य ही है, 
वर्यो ब्रहमचर्यके द्वारा दी सत्‌-परमातमासे अपना त्राण प्राप्त करता 
दै। इसके पिवा जिसे भौन, सा कदा जाता है वह भी नष ही है, 
क्योकि ब्रह्मचयय॑के द्रारा दी आः्माको जानकर पुरुष मनन करता है ॥२॥ 


अथ यत्सस्रायणमित्या चक्षते | तथा जिसे 'सत्रायणः दसा 
£ 
बहमचयंभेव तत्‌; तथा सतः | कडा नाता दै वह मी ब्रह्मच ही 
॥ वर्योकि पूर्वोक्त (यज्ञ ओर इष्ट 
परस्मादास्मन आस्मनक्चाभं दै (० (व 
४ ९ के समान ब्रह्मचर्थरूप साधनते ही 
रक्षणं बरह्मचयंसाधनेन विन्दते । 


पुरुष सत्‌-- परमाप्मासे अपनी रक्षा 
अत; सल्रायणशचन्दमपि ब्रहम | करता है । अतः सत्राधण नाम- 


वयमेव तत्‌ । अथ यन्मोन- | वाया भी हमची दे । जर जिते 
मित्याचकषते ्रवचरथभेष तत्‌, | भौन" ला हा नाता दै वह 
ब्रहमचर्यणेव साधनेन युक्तः | बरह्मच ही हे, कोक बरह्मच 
सन्नात्मानं शाखाचार्याभ्याम- | सापनते दुक्त हना ही साक शा 


~ , । ओर आचार्ये आत्माको जानकर 
क्त & 
उवच पथा मते ध्यायति । फिर मनन अर्थात्‌ ध्यान करता 


है । अतः भौनः नामवाङा मी 
बक्मचयं ही है ॥ २॥ 


अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते बह्मचर्यमेव ` 
तदेष ह्यात्मा न नदयति यं बह्मचर्येणानुविन्दतेऽथ 
यद्रण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तततद्र ह वै 
ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मरोके ततीयस्यामितोदिवि तेदेरमदीय< 
सरस्तद्‌श्वस्थः सोमसवनस्तद पराजिता बरह्मणः 
ध्रमुविमितः दिरण्मयम्‌ ॥ ३ ॥ 


अतो मौनशन्दमपि ब्रह्मचर्य 
मेव ॥ २ ॥ 





कज्ड ५५] 


# 
शाद्गणवाष्वाथ ८७५ 
~>: 9 6 39८ > >9८ 9८ -४- 8८ >8< 28: 86 8-8-95 9८ 9 >$ 9८9 8 ¬ 9 


तथा निसे भनाशचकायन ८ नष्ट न होना ) क्य नाता है वह भी 
नह्मचर्ं ही दै, वर्यो नते [ साधक ] ब्रहमचयके दवारा प्राप्त होता है 
दह यह आत्मा नष्ट नदी होता । ओर जिसे भरण्यायन पसा कहा जता 
ह वह भी ब्रह्मच ही है; व्ोकिं इप तऋहरोकमे अर' ओर "्व' येदो 
समुद है यक्षे तीपरे धृरोक्े एरंमदीय सरोवर दै, सोमकतवन नाभका 
अशवत्य है, वहाँ ब्रह्मकरी भपराजिद्रा पुरी है ओर भसा विशेषहते 
निर्माण किया हुआ दुवरण॑मय मण्डप है ॥ ३ ॥ 


अथं यदनाश्चकायनमित्याच- 
क्षते बह्मचयंमेव तत्‌। यमात्मानं 
ब्रह्मचर्येणालुविन्दते स एष 
हयास्मा ब्रह्मचय॑साधनवतो न 
नर्यति तस्मादनाशकायनभपि 
ब्रह्मचयंमेव । 

अथ यदरण्यायनमिस्याच- 


षते ब्रह्मचर्यमेव तत्‌ । अरण्य- 


शब्दयोरर्णवयो ्रंहयचर्यवतोऽय- 


नादरण्यायनं बह्मचय॑म्‌। यो ज्ञानाः 


दयज्ञ एषणादिष्टं सतस्राणात्सखा- 


यणं मननान्मोनमनशनादनाश्- 


कायनम्रण्ययोगेमनाद्रण्याय- 


तथा जिसे अनाशकायन' रेषा 

| कहतेदै वह भी बरहमचयं दी है । निस 
आत्माकञो त्रहमचर्॑के ह्वारा प्राप्तकर्ता 
है, त्रहमचरथखप साधनवाले पुरषका 
वह आत्मा नष्ट नहीं होता; भतः 
अनाशचकायन मी ब्रह्मचयं दी है । 


ओर जिसे “अरण्यायत' 
८ वनवास ) देसा कते है बह भी 
बरह्मचर्यं ही है । बक्षचयंवान्‌ पुरुष 
अरः ओर ण्यः नामवले दो 
समुदोके प्रति गमन करता है, 
इसख्यि ब्रहमचयं अरण्यायन है । 
जो ब्रह्मचर्य ज्ञानष्प होनेके कारण 
यज्ञ डे, एपणाकरे कारण इष्ट है, 
सत्‌ (ब्रह्म) से रक्ष करनेके कारण 
सत्रायण हे, मनन करनेके कारण 
मौने, नष्ट न दोनेके कारण अनाश- 
कायनटै ओर अर एवं ण्य इन्‌ 


# 


८४६ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ बभ्याय ८ 
= >: > 5 8८ > 8८ >< -9< >8< 8८ > >< ~ 9८ < < <> < 9 
नमित्यादिभिमंहद्धिः पुरुषारथं- | अर्णवोको गमन करनेके कारण 
साधनैः स्तुतत्ाद्रहमचयं परमं | रण्यायन दइर रकार 
व पुरुषाथके महान्‌ क्ञाधरनोह! स्तुति 
शानस्य सदकार्कारण सधन || करिया जनके कारण बह्मचयं 
मिव्यतो ब्रह्मविदा यलनतो रक्ष- | ्ानका परम सहकारी कारण 
घतः तार्य यह्‌ है कि ब्रहमवत्ताको 

इसकी यतनपूवक रक्षा करनी चाहिये। 

वर्ह उस ब्रह्मलोक तीपरे 

भर्थात्‌ इस छोकसे भारम्भ करनेषर 

भूर्लोक ओर अन्तरिक्ष भपेक्षा 

तीसरे दरोक्रमे प्रसिद्ध॒ अर' भौर 

यःये दो समुद्र अथवा समुद्रके 

समानदो सरोवर दै । तथा वीप 

एेर--इरा अन्नक्रो कहते दै तन्मय 

एर अर्थात्‌ मण्ड उससे भरा हुआ 

(मदीय'!--अपना उपयोग करने- 


वार्छोको मद्‌ उदन्न करनेवाला 
अर्थात्‌ हर्णेलादक सरोवर है । 
वहीं सोमसवन नामबाखा अधत 
वृक्ष है, अथवा सोम अमृतको कहते 
नामतः सोमाऽगृतं तनिसर- | दै उसका निल्लवण करनेवाला 
बोऽमृतखत्र इति वा । तत्रेव | अमृतस्लावी वक्ष है । वशं उस 
च ब्रह्मलोके ब्चर्थसाधन- | बरह्मरोकमे ही बरह्मचर्यरूप साधने 
रहितेभरदचर्यसाधनवदुभ्योऽन्येन | रदित अर्थत ब्रहमचय॑साधनवानोति 


-त्लां लि भिन्न पुर्षोदवारा जो नहीं जीती जा 
जीयत इत्यपराजितां नाम धः | सक्ती देसी ब्रह्मा यानी हिरण्य 
पुरी बरह्मणो दिरण्यगभंस्य । | ग्भकी अपराजिता नामवाङी एरी 


णीयमित्यथः। 

तत्तत्र हि ब्रह्मरोकेऽरथ हवै 
प्रसिद्धो ण्यश्राणवौ सुरो 
सथुद्रोपमे वा सरसी ततीयस्यां 
युवमन्तरिक्षं चापेक्ष्य ठतीया 
द्योस्तस्यां त्तीयस्याभितोऽस्मा- 
ल्लोकादारभ्य गण्यमानायां 
दिवि । तक्त्रैव चैरमिरान्न 
तन्मय ेरो मण्डस्तेन पूणमेरं 
मदीयं तदुपयोगिनां मद- 
करं हर्षोत्पादकं सरः ¦ तत्रेव 
चश्वस्थो वृक्षः सोमसवनो 


लण्ड ५] शाङ्करभास्याथ ८४७ 


ब्रह्मणा च प्रञ्ुणा दिशेषेण मतं | है तथा ब्रह्मरूप प्रसेके दवारा 
निभितं तश्च दिरण्मयं सौवेणं | विशेषरूपसे मित-- निर्मित ८ स्वी 
प्रथु विभितं भण्डपमिति बाक्य- | हुई ) प्रसुविमित घुवणेमय भण्डप ट" 
शेषः ॥ ३ ॥ | एेसा वाक्यशेष समश्चना चाहिये॥२॥ 








तद्य एेतावरं च ण्यं चाणवो ब्रह्मरोके ब्रह्मचर्ये 
णानुविन्दनिति तेषामेवेष द्रह्मलोकस्तेषाशसवेषु रोकंषु 
कामचारो भवति ॥ ४ ॥ 


उस ग्रह्मरोकमे जो लोग ॒ब्रह्मचर्यके द्वारा इन “भरः जीर “यः 

दोनों समुदको प्रात करते है उन्दको इस बरह्रोककी प्राप्ति होती है। 
उनकी सम्पूणं लोकम यथेच्छ गति हो जाती है ॥ ४॥ 

तत्तत्र ब्रह्मलोक एतावर्णवौ । उस ब्रह्मलोकम जो ये अर 


= “यः नामवाठे दो समुद्र कहे 
यावरण्याख्याव॒क्तौ बह्मचर्येण जीर शय 
॥ गये है इन्हे जो ह्म चय॑ूप साधनक 


साधनेनालुविन्दन्ति ये तेषामे- | द्वारः भ्रा करते है उन्ीङञो उप 


वैषयो व्याख्यातो = बरह्ोककी पराति होती है, 8 
र व्याख्या पहटे को जा चुको हे । 
न महलपतावतरणा9 तथा उन त्रह्मचर्यस्ाधनसम्पन्न 


सर्वेषु लोकेषु कामचारो मवति ब्रह्मवे्ार्ओोकी सम्पूणं लोकमि 


नान्येषामन्रह्मचर्यपराणां बाद्य- | येच्छ गति हो जातीदै; बह्मचर्यमे 
तत्पर न रहनेवाठे अन्य बाह्य 


विषयासक्तबुद्धीनां कदाचिद्‌" | विषयासक्तवद्धि परमोकी सवच्छ- 
पीत्य्थः। गति कभी नहीं होती । 

नन्वत्र त्वमिन्द्रस्त्वं यमस्त्वं | रित यहाँ कुछ रोर्गोज्ञा मत 
वरुण इत्यादिभिर्यथा कित्‌ | दै कि निप भकार तुम हन होः 


८४८ छाण्दोग्यो पनिषषु [ ख्याय ८ 


= ०-9-9८ 8 ¬ ¬ ¬ ¬ ¬ ¬ 8 5 ह: 8: > ~ = < 9 > 8 ~ - ~ 
स्तूयते महादं एवमिशादिभिः | तम यम हो, तुम वरुण हो" इत्यादि 

9 _ _ | वाक्थंसे किप. परम पूजनीय 
शदेन रूयादिविषयृष्णानिद्- | पुरुपकी स्तुति की जाती है 
उसी प्रकार ₹ष्टादि श्दोसे केवल 
खी आदि वियश्षम्बन्धिनी तष्णाकी 
निवृत्ति दो स्त॒ति योग्य नहीं है, 
तो फिर क्या है? [इसपर वे कहते 


त्तिमात्र स्तुत्यहं फं तदि ्ञान- 
है-- ] ज्ञान मोक्षा साधन है, 


स्य मोक्षसाधनतवात्तेवे्टादिभिः 


स्तूयत इति केचित्‌ । न | 


अतः इष्टादि श्दोसे उसीकी स्तुति 
की लाती है । परंतु यह मत ठीक 
नहीं है, वयोकिं सी आदि बाह 
विषर्योकी तष्णाद्रारा जिनका चित्त 
हर ल्या गया है उन्हे परस्यगास- 
विषयक विवेकन्ञान होना सम्भव. 
नही है । यह बात “स्वयम्भू 
ब्रह्मने इन्दिर्योको बहि करके 
हिंसित कर दिया है; इसल्यि नीव 
वाह्य विपर्योको देखता है, भन्त- 
रात्माक्ो नहीं देखता'' हइव्यादि 
सेक श्रुति.-स्मरति्योसे सिद्ध होती 
है । अतः ज्ञानके सहकारी फरण 
खी आदि विषयसम्बन्धी तृष्णा़ो 
निब्रृ्तिरूप साधनक्ा विधान करना 
ही चाियि--इसल्यि उसकी स्तुति 
करना भी उचित ही हे । 
शिष्य- रितु ब्रह्मचयंकी 
यज्ञादिरूपसे स्तुति की गवी दै; 
ब्रह्मचयंमिति यज्ञादीनां पुरुषार्थ ८ सरसे यनज्ञादिका एस्षार्थसाधनत् 


रूत्यादिवाह्यविषयतृष्णापहतचि- 
तानां प्रत्यगात्मविवेकविज्ञाना- 
नुपपत्तेः । "पराञ्चि खानि व्यत्‌- 
णलत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराड परयति 
नान्तरात्मन्‌'' ( क० उ० २। 
१। १) इत्यादिभरुतिस्ृति- 
शतेभ्यः । जानसदकारिका- 
रणं खयादिविषयत्ष्णानिव्त्ति- 
साधनं विधातन्यमेवेति युक्तैव 


तत्स्तुतिः । 
नु च यज्ञादिभिः स्तुतं 








खण्ड ५| 


शाङ्करमाष्याथं 


८त९ 


०-4-59 = क = > > क 7 = = > > 3 


साधनत्वं गभ्यते । 

सस्यं गम्यते, न विह 
ब्रह्मलोकं प्रति यज्ञादीनां सा 
नत्वमभिपरेतय यज्ञादिमित्रंहयचयं 
स्तूयते । फं तहिं १ तेषां प्रसिद्धं 
पुरुषाथंसाधनत्वमपेक्ष्य । यथे- 


नद्रादिभी राजान तु यत्रा 
दीनां व्यापारस्तत्रैव राज्ञ इति 


तदत्‌ । 


य हमेऽणवादयो | 
्र्मलोकादि- संकल्पजाश्च पित्रा 
भोगानां स्वरूप- द्यो भोगास्ते 
किं पार्थिवा 


आप्याश्च यथेह लोके दश्यन्ते 
तददर्णवदृक्षपूःस्वणंमण्डपान्याहो 


विचारः 


प्रतीत होता ह। 


गुरु-ठीक. है, रसा प्रतीत 


धू- | द्योता दै । दु य, व्हमलोकके 


परति यज्ञादिका साधनत है- 
से अभिप्रायसे यज्ञादिके द्वारा 
ब्रहमच्य॑को स्तुति नहीं की नाती । 
तो फिर क्या बात है {उनके 
प्रसिद्ध पुरुषाथंसाधन्वकी अपेक्ष 
ही स्तुति कौोनाती दै, जिस 
प्रकार कि इन््रादिषूपसे राजाकी । 
इससे यह अभिप्राय नदीं होता कि 
जह इन्द्रादिकां व्यापार है वीं 
राजका भी दै [ अर्थात्‌ जो काम 
इन्द्रादि देवगण करते है वही राजा 
भी करता है ] । उसी प्रकार य्ह 
समक्षना चाहिये । 


[ भला सोचो तो] ये जो 
ब्रह्मरोकसम्बन्धी समुद्रादि भौर 
संकरपननित पित्ररोकादिके भोग 
है वे- जैसे कि इस रोकमे सश्र, 
वृक्ष, पुरी भौर खुवणेमय मण्डप 
देखे जते दै उन्दीके समान प्थ्वी 
छीर जरके विकार है, अथवा केवल 


स्विन्मानसप्रस्ययमात्राणीति । । मानसिक परतीतिमात्र है ९ 


८८4९ 


छाण्डोम्योयतिषद्‌ 


[ बच्याय ८ 


8 ८ > 8८ ~; > ~ध हः 8 इ 8: 8: ~ 84 608 >8: >8८ > ~. ~ > ~ ~र 


किथतो यदि पार्थिवा 
आप्याध स्थूलाः स्युः ! 
ह्याकाशे समाधानानुपपत्तिः। 
पुराणे च मनोमयानि ब्रहमरोकै 
शरीरादीनीति वाक्यं विदष्येत। 
“अशोकमद्िमम्‌!" ८ ब्° उ० 


९ । १०।९ ) इत्याद्याश्च श्रुतयः। 


ननु सथुद्राः सरितः सरांसि 


वाप्यः कूपा यज्ञा वेदा मन्त्राद्‌- 


यश्च मूतिमन्तोबरह्माणभुपतिषठन्त 
इति मानसत्वे विरुष्येत पुराण- 
स्मृतिः । 

नः मूर्तिमसवे प्रसिद्धरूपाणा- 
मेव तत्र गमनानुपपततेः। तस्मा- 
सप्रसिद्धमूर्तिव्यतिरेकेण सागरा- 
दीनां मूर्य॑न्रं सागरादिभिङ- 


शिष्य-- यदि वे पृथ्वी भौर 
जके विकारभूत स्थूर पदार्थं ही 
हय तो इसमे क्या आपत्ति है ? 
गुरु--उनका हृदयाकशम 
स्थित होना सम्भव नही है तथा 
पुराणम यह कहा गया हैष 
बक्षरोकमे जो शरीरादि रै वे 
मनोमय है- इस ॒वाक्यसे विरोष 
आयेगा तथा “्ञोकरहित है, शीत- 
स्य्रित है” इत्यादि श्ुतियोसे 
भी विरोध होगा | 

शिष्य--रितु उन्दै मानसिक 
माननेपर भी समुद्र, नदिं, 
सरोवर, वापी, कूप, यज्ञ, वेद जर 
मन्त्रादि मूर्तिमान्‌ होकर बक्षके 
समीप उपस्थित रहते है" रेतसे 
अ्थवाली पुराणस्मृतिसे विरोष 
आयेगा । 

गुरु- यह बात नदी &, 
क्योकि मूर्तिमान्‌ होनेएर तो उन 
समुद्रादिके प्रसिद्ध ख्पोंका वं 
गमन होना सम्भर नदी है। 
इसख्यि समुद्रादिके प्रसिद्ध ख्पते 
भिन्न॒ सागरादिद्वारा प्रहण करिया 
इभ कोई अन्य रूप ब्रह्मलोकं 


पाच ब्रह्मलोकगन्द कल्पनीयम्‌ || गमन करनेवाय दै-रेसी करप 


खण्ड ] 


शाङ्करभाष्यं 


८५१ 


-8८ 8 -८ 8८ 9 6८ ~ >: 96 9 8८ -8। ~ -8 ड 95 8: 8८ 9: 8८ -9: 9: 9 क: डः 


तुल्यायां च इछल्पनायां वथा- 
व्रसिद्धा एव मानस्य आकारवत्यः 
पर्याया मूर्तयो युक्ताः कन्प- 
यितुं भानसदेहावुरूप्यसम्बन्धो- 
पपत्तेः दष्टा हि मानस्य एवा- 
कारवत्यः पुरूपाच्या मूत॑यः 


स्वप्ने । 

नयु ता अनृता एव, “त इमे 
सत्याः कामाः" (° उ० ८। 
३। १ ) इति श्रुतिस्तथा सति 
विरुष्येत । 


न;मानसप्रत्ययस्य सस्वोपपततः। 
मानसा हि प्रस्ययाः चखीपुरुषा- 
द्याकाराः स्वप्ने दुर्यन्ते । 


ननु जाग्रहासनास्पाः स्वग्र- 


करनी चाहिये । तथा [ मनुप्यादि- 
के विषयमे भी] वसी ही कल्पना 
होनेके कारण जैी प्रसिद्ध है वेते 
ही आङ्नारवारी मानसिक पुर्प-खी 
आदि मूर्तियोक्की इत्पना करनी 
चाहिये, क्योकि मानदेहके साय 
तदुप दही उनका सम्बन्ध होना 
सम्भव है । स्वद्म पु्प एवं छी 
आदिकी मूर्तिर्या मानसिक आङ्ार- 
वारी ही देखी भी गयी है । 

शिष्य- रितु वे तो मिथ्या 
हीह; पेखा होनेपर “वे ये सत्य 
काम है इस श्रृतिसे विरोष 
अयेगा । 

गुरु- नदी [ इस शरुतिसे शई 
विरोध नही आ सकता ], कथे 
मानसिक अनुभवका सव्य होना 
सम्भव दे; कयो स्वममे मानसिक 
प्रतीत्या ही सखी-परषादि जज्ञर- 
वारी दिखायी देती है । 

लिष्य कतु सवप्नम दिलखयी 
देनेवलि  प्दाथं तो जागतिक 


दृयान तु तत्र यादयः स्न 
` विद्यन्ते । 


अत्यन्पमिदमरुच्यते । जाग्र 
द्विषया अपि मानसप्रस्ययाभि- 


वासनारूप ही है; वहाँ स्वप्नाव्यामे 
वास्तवमे तो खी भादि द दी नहौ। 


गुरु- यह तुम बहुत कम बता 
रदे हो । जापरत्कालके विषय भौ 


<र 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ मध्या ८ 


28८9-9 ~ ~ ~ ¬ ¬ तः ~: ऋः > 9 280 8 ८ 9८ ~ ऋऋ 


निवृत्ता एव॒ सदीक्षाभि- 


 निष्रंतेजोऽबनमयतवाजाग्रदि- 


षयाणाम्‌ । संकन्पमूला 


रोका इति चोक्तम्‌ “सम- 
क्ल्पतां चयावाप्रथिवी'” ( छा° 
उ० ७।४।१) इत्यत्र। 
सर्वशतिषु च प्रत्यगात्मन 
उत्पत्तिः प्रखयश्च तत्रेव स्थितिश्च 
यथा वा अरा नाभौ" (ज 
उ० ७ । १५ । १ ) इत्यादि- 


नोच्यते । तस्मान्मानसानां बा- 


दानां च विषयाणामितरेतरका- 
यकारणत्वमिष्यत एव बीजाङु- 
रवत्‌ । यद्यपि बाह्या एव मानसा 
मानसा एवं च बाध्या नानृतत्वं 
तेषां कदाचिदपि. स्वात्मनि 
भवति । 

नयु स्वप्ने दृष्टाः प्रतिबुद्धस्या- 


सृता मवन्ति विषयाः | 


सत्यभेनम्‌; जाग्रद्बोधायेक्ष 


तु तदचृतत्वं न स्वतः। तथा 





तो सवथा मानसिक प्रतीति ही 


निष्पन्न हुए दै; क्योकि जापर 
काटीन विषय सतके ईक्षणे 
निष्पन्न तेन, प्‌ भौर अन्नमय 
ही है । “समवल्पतं घवा. 
एथिबी" (पथरी ओर्‌ युरोकङ़ी 
कल्पना की) इव्याद्वि स्थानपए्र 
यही कहा गया है कि सम्पू लोक 
संकल्पमूरक रै । तथा सम्पूणं 
्रतिर्योमें “जिस प्रकार नाभि अरे 
समपित है" इत्यादि दष्टन्तसे उन 
सवकी उत्पत्ति प्रव्यगास्माते दी 
वतलायी गयी है तथा उीर्मे उनके 
लय भौर स्थिति भी वतर्ये गे दै। 
अतः वीज ओर अङकुरके सपान 
मानसिक ओर बाद्य विषर्योक्ा एक 
दृपरेके प्रति कार्यं कारणमव मात 
ही जाता है । यद्यपि बाह्म पदाथ 
ही मानसिक है जर मानसि 
पदार्थ ही बाह्य दै तो भी स्वासा 
उनका मिथ्याल कभी नदीं होता । 

शिष्य- रितु स्वभरम देते &ए 
विषय तो जाग्रत्‌ पुूषके 
मिथ्या हो जते है । 


गुरु-यह टीक दै, टि 
उनका मिथ्या जाप्रत्‌-जञात 


अपेक्षासे है, स्वतः नदीं 


खण्ड ५ | 


शाङ्करभाष्यं 


८५३ 


> 28८ >9८ 6८ ¬< 9८ < >< € < 9८ ८ < 8८ 9: 9: 9८ 9८ >: < ऋ < ८ < 


स्वभ्रमोधापेक्षं च जाग्रदुदु्टविष- 
यानृतत्वं न स्वतः । विशेषाकार- 
मात्रं त॒ सर्वेषां भिथ्याप्रत्यय- 
निभित्तमिति वाचारम्भणं विकारो 
नामधेयमनृतं त्रीणि सूपाणीस्येव 


सत्यम्‌ । 


ऽनृतं स्वतः सन्ात्रख्पतया 
सत्यम्‌ । प्राकपदात्मप्रतिबोधात्‌ 
स्वविषयेऽपि सवं सत्यमेव सख 
दृरया इवेति न कथिद्विरोधः। 
तस्मान्मानसा एव ब्राह्मलोकषिका 
अरण्यादयः संकल्पजाश्च पित्रा 
दयः कामाः | 
बाध्चविषयमोगवदशुद्धिरदि- 


तत्वाच्छुद्सखसंकल्पजन्या इति 


निरतिशयसुखाः सत्या्व्वराणां 
मवन्तीत्यथः। सत्सत्यात्म- 
प्रतिभोधेऽपि रज्ज्वामिव कन्पि 
ताः सर्पादयः सदात्मस्वरूपता- 
मेव प्रतिपद्यन्त इति सदात्मना 
सत्या एव वन्ति ॥ ४ ॥ 


दी प्रकर स्वपनज्ञानकी अपेक्षा 
जाग्रकार्पे देखे हुए विषर्थोका 
मिथ्या है, स्वतः नही। सम्पूणं 
पदार्थोक्रा जो विष आक्रारमात्र है 
वही मिथ्यराज्ञानका कारण है, क्योकि 
वाणीपर अवरम्बित विकार नाम- 
मात्र ओर मिथ्या है, ब्त तीन दप 
हीस्त्यह। वेतीन रूप भी 
धाक्गारविक्ेष होनेसे स्वतः तो मिथ्या 
हीदै, कितु सन्मात्रह्प होनेसे 
सव्य॒दै। सदाताका साक्षाकरार 
होनेसे पूवं तो स्वमददय पदा्थोकि 
समान अपने कषेत्रम भी वे सतव सतय 
ही है, इसख्यि किप्ती प्रकारका 
विरोध सम्भव नहीं है । अतः ब्रह्म 
रोकप्म्बन्धी अरण्यादि ओर संकल्प- 
जनित पित्रादि काम मानसिक ही है। 

बाह्य विषयमोर्गोके समान 
अश्ुद्धिरदित होनेके कारण वे 
श्दधान्तःकरणके संकन्पसे होनेवलि 
है; इसल्यि ईश्वरके संकट 
अत्यन्तिक सुखमय ओर सत्य होते 
दै- रसा इसका तार्य है 1 
सत्‌ ही वास्तविक आत्मा है-- 
रेका बोध होनेपर भी वे रज्जु 
कल्पित सर्पादिके समान सदात- 
ूपताको दी प्रप हो जते ै। 
इसर्यि सत्प्वरूपसे वे सत्य ही 


रहते हैँ ॥ ४॥ 


इतिच्छान्दोष्योपनिषष्टमाभ्याये पञ्चमसण्ड भाष्यं सम्पणम्‌ ॥ ५॥ 


(1 
1 


एषठ छश 
--: ® : -- 


हृदयनाडी जीर सूर्यरसिमिख्प मार्य उपा्तना 


यस्तु हृदय पुण्डरीकगतं यथो- , नो पुरूष ब्रह्मचर्यादि साषनेपे 
सुतरिनिध तदन अथच. | समत ओर्‌ बाह्य विष्यं मिथ्या 
तृष्णाते निवृत्त होकर अपने 

दिसाधनसम्पन्नस्त्यक्तबाद्यविष- | हयकमलमे विराजमान उपर्य 
गुणविशिष्ट ब्रह्मकी उपासना केरा 

यातृतदभ्णः सन्नुपास्ते तस्यं | दै उषङ्ग यह मूर्धन्य नाडीक वर 


९ ९ गति बतलानी है; इीलियि इस 
न्यया 1 तठ 
मूषेन्यया नाञ्या गतिवक्तव्येति नाः ब 
नाडीखण्ड आरभ्यते-- जाता है-- 


अथ या षता हृदयस्य नाङ्यस्ताः पिङ्गलस्याणि- 
स्नरित्न्ति शुङ्कस्य नोरुस्य पीतस्य रोहितस्येत्यतौ 


वा आदित्यः पिङ्गर षष शुङ्ग एष नील एष पीत 
एष रोदितः ॥ १ ॥ 


अब्‌, ये जो हृद्यकी नाद्यौ ह वे पिगलव्णं सूम रकौ दै । 
वे शल, नीरु, पीत ओर रोहित रसकषी है; क्योकि यह आदिय रि 


वणं दै, यह शुक्ल है, यह्‌ नीक दै, यइ पीत दै ओर यह सोद 
दे॥१॥ 


अय या एता वक्ष्यमाणा, अब, आगे कहै जनेवाे 


`. | ब्रह्मोपासनाके आश्रयमूत ९ 
हदयस्य शृण्डरीकाकारस्य ब्रह्मो । पण्डीकाकषार इदयदी नो उर 





खण्ड ६] 


छाङ्करमास्याथं 


<५५ 


>< > >< >< >&८ 9८ 22 9 9 >: 8 6८ ड 9८ 2: 8८ 9 8८ 9. 9 < < अ 8 


पासनस्थानस्य सम्ब्रन्धिन्यो 
नाव्यो हृदयमां सपिण्डास्सर्वतो 
विनिःखता आदित्यमण्डलाव 
र्मयस्तादचैताः पिङ्गरस्य वणं- 
विशेषविशिष्टस्याणिम्नः बहम 
रसस्य रसेन पूर्णास्तदाकारा एव 
तिष्ठन्ति वत॑न्त इत्यर्थः । 

तथा शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य 
लोहितस्य च रसस्य पूर्णां इति 
सर्वत्राष्याहारयम्‌ । सोरेण तेजसा 
पित्ताख्येन पाकाभिनिरचेन 
कफेनान्पेन सम्पर्कातिपङ्गलं भवति 
सौरं ठेजः पित्ताख्यम्‌। तदेव च 
बातभूयस्त्वान्नीलं भवति । तदेव 
च कफभूयस्त्वाच्छुक्लम्‌ । कफेन 
समतायां पीतम्‌ । शोणितबाहु- 


न्येन रोदितम्‌ । वैचकादरा 
वणेविरोषा अन्वेष्टव्याः, कथं 
भवन्तीति ? 
भ्रुतिस्त्वाहादित्यसम्बन्धादेव 
तत्तेजसो नादीष्वनुगतस्यैते 


सम्बद्ध नादयां भादिप्यमण्डर्षे 
करर्णोके समान उस हृदयह्प 
मांपपिण्डसे सव ओर निकली हु 
ह, वे पिंगलनामङ़ एक्‌ वर्णविरोष- 
से युक्त अणिमा अर्थात्‌ पृक्ष 
रसको दै; तासं यह दहैकिवे 
उस रससे पूणं होकर तदाकार ही 
रहती है । 

इसी प्रकार वे शुक्र, नीट, पीत 
ओर रोदिति रससे ण है-इस 
प्रार्‌ पूरणं पदक्ञा सर्वत्र अध्याहार 
करना चाहिये । पित्तसंज्क़ सौर 
तेजसे परिपक्व हुए थोड़-से कफपे 
सम्प होनेपर पििनामक सौर 
तेज पिङ्ग वणं हो जाता दै। 
वही बाती मधिङृता होनेपर नीला 
हो जाता दै ओर कफर अधिकता 
होनेपर वही शक्ल हो जाता है । 
कृफसे [ वातकी ] समता होनेषर 
वह पीला हो जाता है ओर रक्तकी 
अधिकता होनेपर रोहित । अथवा 
वयक शाक्ते इन व्ण॑विरोषोंश्-- 
ये किस प्रर होते है, एेसा-- 
अन्वेषण करना चाहिये । 

किंतु श्रुतिकातो यही कथन 
दै कि मादिल्यके सम्बन्धसे ही, 
नाडयो अनुस्यूत हुए उस तेजके 


८५६ छण्होग्योपनिषह्‌ [ मष्वाय 
28 ~< 3-85-8 =< >< ३८ >§< 28< >< -96 ८-8८-८ इट ष्ट &< ऋ < ~8 > 


वणेविशेषा इति । कथम्‌ १ असौ | ये वर्णविरोष हो नाते है| धह 
करस प्रकार ? [ इसपर कहते है] 
यह मादित्य वणतः पिङ्गल दै, यह 
आद्य दयक मीहे तथा यही 
नीर्वणं है, यही पीडा है बौर 
एष्‌ लोहित आदित्य एव ॥ १ ।॥ यही लोदित भी है ॥ १ ॥ 


बा आदित्यः पिङ्गलो वणं एष 


आदित्यःशुक्लोऽप्येष नील एष पीत 


~--* 9 ( [य 


तस्याध्यातमं नाडीभिः कथं | शरीरके भीतर नादियेकरि साथ 
उसका सम्बन्ध किष प्रकार होता 
हे -इस विषयमे श्रुति इटन्त 

सम्बन्ध इत्यत्र दृष्टान्तमाह-- । देती है- 


तद्यथा महापथ आतत उभौ पाभो गच्छतीमं 

चामुं चेवमेषेता आदित्यस्य रमय उभो रोको गच्छ. 

नतीमं चामुं चामुष्मादादित्यास्पतायन्ते ता आसु 

नाडीषु खता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽसुष्मित्ना- 
दिव्ये खाः ॥ २॥ 

इस विषयमे यह दृष्टान्त है कि निस प्रकार कोई विस्तीर्णं महापथ 

इस ( समीपत ) ओर उस ( दूरवतीं ) दोनों गो्को जाता दै उत 

भकार ये सूर्य किरणें इस पूरुषम ओर उस आदिलयमण्डकम दोन 


रोकमिं भविष्ट है । वे निरन्तर इस आदिते ही निकी हैँ जर हन 


नाम व्याप्त हँ तथा जो इन नाठियोसे निकृती है वे इत आदिमे 
व्याप्त हें ॥ २॥ 


तत्तत्र यथा रोके महान्वि- | इत विपये थौ समकचना चाहिय 
स्तीणः पन्था महापथ आततो | कि जिस प्रकार रोकने कोर महा 


खण्ड ६] 


शाङ्करभाष्याथं 


<५७ॐ 


9-८-8८ ~ >< 8 9 8 9-9-9८ 9-8-४८ 8: 9 ऋ 9 + < < अ ऋ ~त 


व्याप्त उभौ ग्रामा गच्छतीमं च 
संनिदितमथं च विप्रकृष्टं द्रम्‌, 
एवं यथा दृष्टान्तो महापथ उमो 
रामौ प्रविष्टः, एवमेवैता आदि- 
त्यस्य रमय उभो छोकावघुं 
चादित्यमण्डलमिमं च पुरुषं 
गच्छन्त्युमयत्र प्रविष्टाः; यथा 


महापथः । 
कथम्‌ १ अदयुष्मादादित्यम- 


ण्डलात्प्रतायन्ते संतता भवन्ति, 
ता अध्यात्ममामु पिङ्गलादिव- 
णसु यथोक्तासु नाडीषु प्ता 
गताः प्रविष्टा इत्यथः । आभ्यो 
नाडीभ्यः प्रतायन्ते प्रदत्ताः 
संतानभूताः सस्यस्तेऽपुष्मिन्‌ 
रहमीनाघुमयलिङ्गतात्त इत्यु 
च्यन्ते ॥ २॥ 


यानी विक्षीणं मागं अर्थात्‌ महापथ 
आतत-- व्याप्त हुआ इस समीपवतीं 
ओर उस दूरस्थ दोनों प्रामोको 
नाता है इसी प्रकार, जैसा कि यह 
दृष्टान्त हे किं महापथ दोनो भमो 
प्रवेश करता है, ये वुर्यको किएणे 
दोनों रेक्रम--उस आदिलय- 
मण्डलम जीर इस पुरुषे जाती दै 
अर्थात्‌ मदापथके समान दोनों 
जगह प्रवेश कयि हुए है । 

किस प्रकार प्रवेश द्वि हुए 
है १ वे इस आदिल्यमण्डलसे 
कैलती है ओर शरीरम उन उपयुक्त 
पिङ्गल(दि वर्णोवारी नादिर्योमिं ्त- 
गत अर्थात्‌ प्रविष्ट होती दँ तथा इन 
नादिमोसे व्याप्त होती सर्थात्‌ प्रवृत्त 
होकर फैकती हई इस भादिलय- 
मण्डलम प्रवेशच करती है । ^रदिमः' 
शब्द [ सीरिङ्ग जौर एलिङ्ग ] दोनों 
लिङ्गोषारा होनेके कारण उनके 
स्यि [ पके ता" सर्वनामक्ा 
प्रयोग होनेपर मी षीढे ] ते सा 
कहा गया हे॥ २॥ 


तदयत्रेतस्यु्ः समस्तः सम्प्रसन्नः खं न विजा- 
नात्यास्चु तदा नाडीषु खतो भवति तं न कश्चन पाप्मा 
स्शति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति ॥ ३ ॥ 


८4८ 


, सौ अवस्थामे जिस समय 


छन्डयोष्यो पनिशहू 


8 9८ >9- 8 गट 6 9 ~~~ > 3 टट 


{ बध्वीव्‌ ८ 
यह सोया इुभा-- भटी परक हीन 


इभा पुरुष सम्यक्‌ भरकारसे प्रसन्न होकर स्वम नहीं देखता उब समय 
यह इन नार्यो चखा जाता है, तव इसे को पाप स्वश नहीं कृता 


जर यह तेजसे व्याप्त हो जाता है 
तत्त्वं सति यत्र यस्मिन्‌ 
कार एतत्स्रपनमयं जीवः पो 
भवति। स्वापस्य द्विप्रकारतवाहि- 
शेषणं समस्त इति; उपसहत- 
सवेकरणदृत्तिरिप्ेतत्‌ । अतो 
बामविपयसम्पकंजनितकालुष्या- 
भावात्सम्यङ्‌ प्रसनः सम्प्रसन्नो 
भवति । अत एव स्वम विष्या- 
काराभासं मानसं स्व्नप्रत्ययं 
न विजानाति नानुमवतीवयर्थः। 
यदेवं सुपो मवस्यासु सौरतेज,- 


पूर्णासु यथोक्तासु नाडीषु तदा 
= 


‡# निद्राकी दो व्रत्तियां हद्‌ 
गाद सुपुतनि । यदं द्दानवृत्तिकी 
€< 
गया है । 


॥ ३ ॥ 


1 


तत्‌--उस अवस्थामें रेस हने- 
प जहां -निप॒ समय यह जीव हष 
स्वम्रावष्या अर्थात्‌ निद्र प्रप 
होकर धो जाता है । निदा दो 
पकररश्टी है हसख्यि यहो मस्त 
देसा वेषण दिया गया है | तासं 
यह है चि निघ्ठ समव वद, निद 
सम्पूणं इन्दरियवृतियोका उपसहार 
दो गयादै, देषा हो बता 
इर्ये बाह्य दिषर्योके सम्पकंसे पराप 
इई मटिनताका अभाव हो जानेके 
कारण यह सम्यक्‌ प्रशनरसे प्रसत्न- 
सम्पन्न होता है; ताप्यं यह है 
ङि इसीध्यि यह स्वप्म--विषथा- 
कारसे भातित होनेवाले मानसिक 
स्वप्नपरययशो नही जानता, भरथत्‌ 
उसका अनुभव नहीं करता । जिप 
समय इस प्रकार सो जाता दै उप 
समय सूर्यके तेजसे पूरणं हदं ल 
पूरवक्तं नादि्ोमें खत अर्थात्‌ परव 
होता दै, तादयर्यं॑यह है ढि बह 


दनन्ति यानी स्वप्न ओर अदशंनदृत्ति-- 
व्यदत्तिके टि समस्तः दसा विशेषण दिगा 


क्ष्ड ६ | द हरमाष्याथं ८५९ 
४-2-9८ 8८ 8८ 9 28८ ड 28 >9८ 282 >@: 8 9: -8< -8८ 8: हे: 8: 8: 8 < 8: ¬< "8 
बुः प्रविश नाडीभिर्रभूता- | ईन द्ारूत नादिर्योसे दयाकाशे 

पच जाता है । सत्सम्पति ( सत्‌- 


भिहबाकाशं गतो मवतीत्यथः। | को प्राप्त हो जाने ) क सिरा जर 


न न्यत्र सत्सम्पत्ेः स्वभादशच 
नमस्तीति सामर्थ्यानाडीप्विति 
सप्तमी ठतीयया पएरिणम्यते । 
तं सता सम्पन्नं न कथन न 
ङक्िदपि धर्माधमंरूपः पाप्मा 
स्पृशतीति स्वसूपावस्थितत्वा्त- 
दातममनः । देदैन्द्रियविशिष्टं हि 
सुखदुःखकाययप्रदनेन पाप्मा 
स्पृशतीति न तु सत्सम्पन्नं सष 
पावस्थं किदपि पाप्मा सषु 
त्वहते; अविषयत्वात्‌ । अन्यो 
दन्यस्य विषयो भवति न खन्यत 
केनचित्ुतथिदपि सत्सम्पन्न- 
स्य । स्वरूपप्रच्यवनं त्वात्मनो 
जाग्रत्वप्नावस्थां प्रति गमनं 
बाह्यविषयगप्रतिबोधोऽविदयाकम्‌- - 


कहीं स्वपनश्ा अदर्शन नही होता-- 
इस घामर्थ्यसे "नाडीषु इस पद्मे 
जो सप्तमी विभक्तिं है उसे 
[ (नाडीभिः, इस प्रकार ] वृतीयाके 
रूपमे बदर री जाती है । 


सतको प्रा्ठ हुए उस प्राणीको 
को$ भी षर्मिर्मखूप पष स्पशं 
नहीं करता, क्योकि उस णवस्थामें 
आतमा अपने स्वरूपम स्थित हो 
जाता दै। बो जीव देह ओर 
इन्दरयोते विचिष्ट दै उसीशनो ुख- 
दुःलरूप भपने कायं प्रदान करके 
पाप स्प्च कर. सकता है । सत्को 
राप हुए स्वरूपावस्थित आत्मको 
स्पर्शा करनेका कोई भी पा१ साहस 
नही कर सकता, क्योंकि वह उसका 
विषय नही है । अन्य ही जन्या 
विषय हुमा करता है ओर सत्को 
रा हुए नीवा किसीसे भी ह्विसी 
भी क्षारणसे अन्यत्व है नहीं । 
आसमाका नाप्रत्‌ या स्वप्नावस्था 
प्राप्त ह्योना तथा बाह्य विषर्याको 
अनुभव करना ही स्वरूपे 
च्युत होना है, व्याक अविधा- 
हप काम ओर कर्मा बीज 


८६० 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अ॑ष्याय ८ 


५ १ ४ ‰< ‰< ‰< ‰< #< < < < >> 2-८96-9८ 9 


¢ 
कमेधीजस्य ब्रहमवि्राहुताशादा- 


हनि मित्तमिस्यबोचाम षष एव 
तदिहापि प्रस्येतव्पम्‌ । 

यदेवं सुप्तः सौरेण तेजसा हि 
नाञ्यन्तगंतेन स्वेतः सम्पन्नो 
व्याप्तो मवति । अतो विशेषेण 
चक्ुरादिनाडीदररेबाद्यविषयभो- 
गायाप्रह्तानि करणान्यस्य 
तदा भवन्ति । तस्मादयं 
करणानां निरोधास्घात्मन्येवा- 
वस्थितःस्प्नं न विजानातीति 
युक्तम्‌ ॥ २॥ 


~+ 
१ 


तत्रैवं सति- 


ब्र्मविचारूपं अभिसे द्ग्ध न होनेकै 
कारण ही रहता है -रेषा हम च्छे 
अध्याये ही कह चुके है, उसीएर 
यहां भी विश्वाप् करना चष्टे । 
जप्त समग्र यह जीव दस्त प्र ` 
सो जाता है उस प्तमय सव भोरसे 
नाके अन्तरगत भौर तेजसे सम्प्- 
प्ाप्ठहो जाता है इसरियि त्र 


| इसकी इन्दि बाह्य विषरयोके भोगके 


स्यि चक्षु जादि नाडियकि द्वार 
विरोषूपसे अप्रसृत अर्थात्‌ निर 
हो जाती है । इससे इन्दर्यो 
निरोध हो जानेके कारण अपने 
स्वहूपमर ही स्थित हुआ यह जीव 
स्वम नहीं देता ॥ २ ॥ 


। रेता होनेपर-- 


अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित 
आसीना आहूजानासि मां जानासि मामिति स यावद्‌ 
स्माच्छरोराद नुत्कान्तो भवति तावजानाति ॥ ४॥ 


अब, नित समय यह जीव शारीरकी दु्॑ख्ताक्ो प्र होता द 


उप्त समथ उसके चारों ओर बै 
तुम सुञ्ञे जानते हो ! 
शरीरसे उक्तमण नहीं कर 


ओर बैड इए [ बनधुजन ] कहते ह-- 
क्या तुम सुञ्चे जानते हो १ वष्ट जनत ईस 
ता तत्रतक उन्हं जनता है ॥ ४ ॥ 


क्लण्ड दै] हाहुल्साष्यायं ८६१ 
(54 9-5-9८ + ~> ~ ८ ८ ~ < 9८ 9 8८ अ < ८ 9 9८ 9: 9: ¬ 


अथ थत्र यस्मिन्‌ काठेऽबल्लि- ! अव, जित समय यह देवदत 


मानमवलमावं देहस्य रोगादि- 
निभित्तं जशदिनिभित्तं वा 
कृरीमाबमेवनयनं नीतः 
प्रापितो देवदत्तो भवति धुमूषु- 
य॑दा भवतीत्यथः, तमभितः 
सवेतो वेष्टयित्वाक्ीना। ज्ञातय 
आहूर्जानासि मां तव पुत्र 
जानासि मां पितरं चेत्यादि । 
स॒ ॒परमूर्याबद्स्माच्छरीरादलु- 
तान्तोऽनिगंतो भवति ताव- 
सपुत्रादीज्ञानाति ॥ ४ ॥ 


| [ नामक पुरुषविशेष ] भवरिमान्‌ 


रोगादिके फरण मथवा जराषठिके 
कारण देषकी दुबस्ता- ङृश्चताको 
प्रा करा दिया जता है भर्थात्‌ 
निप समय यह म्णा्तनन होता दै, 
उप्त समय उपक्र चरो भोर बैठे 
हुए बन्धुजन कके दै--(क्याः तुम 
सञ्च भपने पुत्रको जनते हो ! क्या 
तुम मुज्ञ छपने पिता्ठो पहचानते 
हो ? स्यादि ] वह मुमूपुं जीव 
जवतक ईस शरीरसे अनुक्ान्त 
रहता दै भरथात्‌ बहिगंत नहीं होता 
तवतक उन पुत्रको पहचानता 


है॥ ४॥ 


अथ यत्रेतदस्माच्छरीरादुत्कामत्यथेतेरेव रदिमिभि- 
रूप्वमाकमते सओमिति वा होद्वा मीयते स यावस्कि- 

पयेन्मनस्तावदादिस्यं गच्छत्येतद्रे खट रोकद्वारं 
विदुषां भ्रपद्नं निरोधोऽविदुषाम्‌ ॥ ५॥ 


फिर जिश्च समय यह इस शरीरस उक्तमण करता दै उस प्षमय 
इन किररणोसे ही ऊपरक्षी ओर दता दै । वड ॐ पेता [ ९६ 


- आतमक्षा ध्यान करता हु ] उरधवछोक मथवा मपोलोकको जाता है । 


वह जितनी दरम मन जाता है उतनी ही देरमे अआदियलोकमम पटच 
जाता है । यह [आदिष्य] निश्वय की शेरकदवार है । यह विदवानोकि लि 
नहाोकभाप्िकरा द्वार दै भोर अविदवानोंका निरोधस्यान दै ॥ ५ ॥ 


८६२ 


छान्दोण्योपनिषषु 


{ घ्यांय ८ 


थ = ~>. ~ 8.9८ 


अथ यत्र॒ यदेतक्ियाविद्येष- 
णमित्यस्माच्छरीरादुक्रामति । 
अथ तदैतैरेव यथोक्ताभी रर्मि- 
भिरुष्वंमाक्रमते यथाकर्मजितं 
लोकं प्रत्यविद्वान्‌ । इतरस्तु 
विद्रान्यथोक्तसाधनसम्पन्नः स 
जओमित्योङ्ारेणात्मानं ध्यायन्य- 
थापूवं वा हैव । उद्धोध्व॑ वा 
विद्वां भेदितरस्तियंड्वेत्यभिग्रायः। 
मीयते प्रमीयते गच्छतीत्यर्थः ] 

स विद्रानुक्रमिष्पन्यावसल्क्षि- 

प्येन्मनो यावता कारेन मनसः 
क्षेपः स्यात्तावता कारेनादित्यं 
गच्छति प्रामोति क्षिप्रं गच्छ- 


तीस्यर्थो न तु तावतैव कालेनेति 
विवक्षितम्‌ । 


किमथमादित्यं मच्छतीत्यु- 
च्यते। एतदव खलु प्रसिद्धं बरहम 


लोकस्य द्रारं य आदित्यस्तेन 


फिर निस्त समप्र--तत्‌! यह 
शाब्द क्रियाविरोपण दै- यह इष 
रारीरते उत्करमण करता दै तब वह्‌ 
अज्ञानी अपने कर्मकरे अनुपार 
उपार्जित छोककि प्रति इन उप्त 
किररणाके द्वारा ही उपर चदरता दै । 
तथा दूसरा जो उप्क्त साधरि 
सम्पन्न ज्ञानी ८ निशुणोपाक्तक ) दै 
वह ्मोङारके द्वारा पूववत्‌ आतम 
ध्यान करता इआ- तायै षह 
है ङि यदि वह विदान्‌ होता है 
तो उर्ध्वरोक्रोको ओर भविन्‌ 
होता ह तो अधोरोकेकि 'मीयते' 


अर्थात्‌ जाता है । 


वृड उत्रमण करनेवाला विद्वान्‌ 
जितनी देर मन जाता है अर्थात्‌ 
जितने समयमे मनक्रो कहीं ठे जधा 
जाता है, उतने ह। समयमे मादिव 
रोकं नाता-पहुचता ह । तविप 
यह है ङ्क वह शीघ्र चरता & 
इसमे यह्‌ बताना अभीष्ट ॥ ह 
किं उतने ही समयमे परचता € । 

वह आदियलोकमें क्या नता 
हे १ यह बतलाया बाता है--य€ 


नो आदित्य है वह निश्चय ही 


रह्मरोकका प्रसिद्ध द्वार दै; ऽ 





खण्ड ६] शाङ्करमाप्याथं ८६३ 


> 8८ -&< -9: >: 6८ >< 1 8८ ~ -9 8 8: 2-8-8८ `: 8: -8( 8 9; 9; 9 ~ ~ ~ 


भूतेन बरहठरोकं गच्छति विद्वान्‌ | दवारमूत आदिष्यके द्वारा द्द्वान्‌ 
रह्षलोकको जाता है । अतः इष 
द्रे विद्वान्‌ बरहषलोकको पराप्त होते 
ब्रह्मलोकमनेन द्वारेणेति प्रपद- | दै इसल्यि यह ॒विदरर्नोङघा प्रपदन 
है । निरोधनका नाम निरोष है; इस 
नम्‌ । निरोधनं निरोधोन्समादा- | जादि मवद निरव होता 
दिस्यादविदुवां मवतीति निरोधः। | दै, इषरिये यह निरोष हँ । तातयं 

यह है कि अविद्वान्‌ रोग सौर तेजके 
श रा नुदा | ररा देह हौ नष्ट होकर मूष 
सन्तो मूभन्यया नाब्या नोत म्यनादीसे उक्रमण नही करते, जै 
मन्त एवेरयर्थः । विष्वङ्न्या | क़ (विष्वडडन्या' इत्यादि जगके 
इति छोकाव्‌ ॥ ५ ॥ मन्त्रसे सिद्ध होता है ॥५॥ 


= © ~> 


अतो विदुषां प्रपदनं प्रपद्यते 


तदेष शोकः । शत" वेका च हृदयस्य नाञ्य- 
9 © 
स्तासां मू्धानमभिनिःखतका । तयोष्वमायन्नखततमेति 


विष्वङ्डन्यां उत्कमणे भवन्द्यु्तमणे भवन्ति ॥ ६॥ 
इस विषयमे यह मन्त्र है--ददयशी एक सो एक नायां है| 
उनसे एक मस्तकश्टी जर निश्चल गयी दै । उसके द्वारा उषरकी भोर 
जनेवारा जीव भमरतवको प्राप्त होता है; शेष॒ इषर-उधर जानेवाली 
नाडियाँ केवल उक्रमणङ्ा कारण होती है, उक्तमणका कारण होती दँ 
[ उनसे अमरस्वकी प्राप्ति नही होती ] ॥ & ॥ 
तदेतस्मिन्यथोक्तेऽ्थं एष, उस इस उर्ुक्त अर्थम यह 


व शोक यानी मन्त्र है- मांसके 
शोको मन्तो भवति, शतं चैका पिण्डमूत ह्दयसे सम्बन्ध रखनेवारी 


चैकोचर्तं नाब्यो हदयस्य | सौ जर एक भ्‌ एक उभ लो 
मांसपिण्डभूतस्य सम्बन्धिन्यः | रषान नार्वा ह, [ ्रषानतः' 


दि 


छान्दोष्योपनिषद्‌ 


[ अष्याय ८ 


> 9 9 9 8 89 8 > 8 ¬ ~ > 2८ ~ ह < 8८ .8-- 


प्रधानतो मवन्ति, आनन्त्याहै- 
हनाडीनाम्‌। तासामेका मूर्धान- 
ममिनिःता विनिगंता तयो- 
प्वंमायन्गच्छनमृतत्वमयस्रतमा- 
वमेति विष्व्नानागतयस्ति- 
यंग्विसर्पिण्य उ्वंगाथान्या 
नाव्यो मवन्ति संसारगमन- 
` हारभूता न ॒सश्तलाय किं 
तदयंमण एवोत्कान्त्यर्थमेव 
भवन्तीत्यथंः । दिरभ्यासः- 


 प्रकरणसमाप्त्यथः | ६। 


इसखिय कहा क ]देहकी नादि 
कोद अन्त नहीं है । उनम एक 
मृधकी बोर निक्ष गवयी ै। 
उसके द्वारा उपरी भोर नानेवास 
जीव अमृतल--अषृतमावको प्रप्त 


होता दहै। तथा जन्य नादिं 

विष्वक-- नाना गतिवारी अर्थात्‌ 
इधर-उधर जानेवारी घौर ऊर्ध्व 

गामिनी है। वे संपासराप्तिकी 

दरारमूत दै, अमृतत्की हेतुमत 

नही दहै । तो फिर केषी है !-वे 

उत्करमण अर्थात्‌ प्राणप्रयाणके र्म 

ही होती है-पेसा इसक्ना ताप्यं 

है । “उक्तमणे भवन्ति! इष प , 
द्िरक्ति प्रकरणी समाप्ति सूचित 

करनेके ल्यि है ॥ ६॥ 


---ः (1 ~--- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषयष्ट माध्यायै 
षष्ठकण्डभाष्यं सर्पणम्‌ ॥ ६.॥ 


(3 > 





खक्ष करण्ड 


~: ०9 †-~ 


जात्मतच्चका अनुतंधान करनेके लिये इन्द्र ओर 
विरोचनका प्रजापतिके पास जाना 


अथ य एव सम्बरसादोऽस्मा- | “जथ यह नो सम्मसाद्‌ है, जो 
, _ इस शरीरसे सम्यक्‌, रूपसे उत्यान 
च्छरीरात्सथु्थाय परं ज्योतिरु- | कर परम भ्योतिको प्राच हो$र 


पतम्पद स्वेन सूपेणाभिनिष्पद्यत| अपने स्रूपते ननन होता दै यह 
आसा दै-- पेसा [ आचार्थने ] 


एष आत््ेति होबाचैतदमतमम- | कदा । यदम सत है, यह भभ दै, 
् यहे बह्म दै रेषा [ पले दहर 
यभेतदुव्रहतयुक्तमू्‌ । तत्र कोऽसौ | विके भसङ्गमे ] कडा जा चुका 
„ | है । सो इत प्रसङ्गमे यह सम्धरसाद्‌ 

सम्प्रसादः ? कथं वा तस्याधि- 
दः १ कथं वा तस्याध नन ह नोर उष प्व वे 
गमः १ यथा सोऽस्माच्छरीरात्स- । होती है ? यह जिस भकार इस 
कु शरीरसे उत्थानकर्‌ परम ज्योतिको 
स्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य प्राप्त हो अपने स्वरूपसे निष्पन्न 
6 होता दै ओर निस्‌ रूपसे निष्पन्न 
स्पेणाभिनिष्पद्यते,येन स्वरूपेणा- होता है बह भाला केसे सणवारा 
भिनिष्पद्यते स किंलक्षण आत्मा १ हे १ सम्प्रसादके नो | सविशेष ] 
हप है वे तो देहसम्बन्धी ई, उनसे 


सम्प्रसादस्य च देदसम्बन्धीनि | भिन्न जो उसका. | निर्विहोष ] 
गा रूप दै वह केसा है ये सब 
रूपाणि ततो यद्न्यत्कथं स्वरूप | बति बतसनी है, इसीलियि ५५ 
मिव्येतेऽ = र्थ लारम्म क्रिया जाता &। 
सेतेऽ्था बक्तभ्या इत्यतो यहाँ नो आख्यायिका दै वह तो 


ग्रन्थ आरभ्यते । आख्यायिका । विद्याके रहण ओर दान करनेकी 


८६६ छाष्डोष्योषनिषधु [ कष्वाव ८ 
~ 8 >: =9- 8 9 ¬ -8 9 9 8 > ~ध > 9; 9 >. 85 3; >8 ~ >> 
तु विद्याग्रहणसम्प्रदानदिपिप्रद्‌- | दिधि प्रदरित करने एवं विधादी 
& सतुतिके स्यि है, जिघ्र प्रकार 
नार्था विद्यास्तुत्यथां च । | [ जरी प्रशंसा करनेके स्थि ] 

"यह चरु राजाद्रारा सेवित दै! 
राजसेवितं षानीयभितिवद्‌ । | रे्ा कहा नाता है । 


य आत्मापहतपाप्मा विजरो विभरद्युर्विंशोको 
विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्य्संकस्पः सोऽन्वे- 
छटञ्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वारश्च छोकानाप्नोति 
सर्वाश्च कामान्यस्तमात्मानमलुविव्य विजानातीति ह 
प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥ 


जो आत्मा [ धर्माधर्मादिषूप ] पाप्य, जरारदिठ, मृयुदन, 
विशोक, क्ुधारदित, पिपासारहित, सलयज्ञाम भौर सलयसंकल्प दै उपे 
लोजना चाहिये ओर उसे विरोषरूपते जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। 
जो उस आत्मको शाघ्च नौर गुरुके उप्देशानुसार खोकर जान रेता दै 
बह सम्पूर्णं रोक जर समस्त कामनार्ोक़ो पराप्त कर ठेता है-रता 
प्रजापतिने कहा ॥ १ ॥ 


य आत्मापहतपाप्मा विजरो | जो आतमा पापरहित, जराहीन, 


मूर धारहित) 
विमृतयुिशोको विजिषरसोऽपि- | गन, शोकरहित, षार 
| तृषादीन, सत्यकाम नौर सतयसय 
पास, सत्यकामः सत्यसकर्पः, | है, जिसकी उपासना अर्थ्‌ 
यस्योपासनायोपलब्ध्यथं हृदय- उपर्न्धिके स्यि व ध 
प ध्य 
पुण्डरीकममिदिवम्‌, यस्मिन्कामाः| बयया गवा, है, निक्षमे न 
अदिहित (दके हुए) सथ 
| सम्यङ भ्कारसे स्थित दै, ज 
यदुपासनसदभावि ब्रहमचयं । उपदनकि साथ-घाथ रहनेवलि 


समाहिताः सत्या अनृतापिधाना; 


साधनषट्कम्‌, उपासनफरभूत- | ब्रहमचयूप साधन बताया गया 


है भौर उपासनाके फरमूत मी 


छामप्रतिपत्तये च भूषन्यया | राते ल्थि मूरध्य नाढीसे गति 


नाव्या गतिरभिदहिता । 


बतायी गयी है उसका भन्वेषण 
करना चाहिये- श्न नौर 


ाज्ञाचा्योपदेशे्तातव्यः स | आाचार्यके उपदेशोसे उका ज्ञान 


विक्षेषेण ज्ातुमेष्टव्यो विषि- 


यितन्यः । 


प्राप्त करना चाहिये; वह विजिज्ञा- 
सितव्य-- विरोषरूपते जाननेके 


ज्ञासितव्यः स्वसंवेद्य ताभापाद्‌- | ल्यि इष्ट दै अर्थात्‌ स्वसंवेधताको 


्ा्ठ करानेयोग्य दै । 
उसके अन्वेषण ओर विदोष- 


क तद्यान्वेषणाद्विजि्ञा्ननाच | रूपसे जाननेकी इच्छसे क्या 
स्यात्‌ १ इत्युच्यते- स सर्वाश | होता दै, यह बतरव। नाव है- 
लोकानासनोति सर्वाश कामान्य-| नो उपयुक्त प्रकारसे उस आत्माको 


स्वमात्मानं यथोक्तेन प्रकारेण 


शर ओर आचा्के उपदेशानुसार 
अन्वेषणकर विशोषरूपसे जान . लेता 


शाल्लाचायोपदेशेनान्वष्य विजा है अर्थन्‌ स्वसंवेचरको भात र 
नाति स्वसंवेद्यतामापाद्यति लेता है उसे इन मस्त रोकोके 
तस्ये ततसवलोककामावापिः सर्वा भोगोक्धो प्राप्ति नौर सर्वात्मतारूप 
त्मता एलं भवतीति ह चिल | कल्कौ भर्ति होती हे--पेसा 


प्रजापतिस्वाच । 
अन्वेष्टव्यो विजिज्ञासितव्य 


इति चैष नियमविधिरेव नाव॑- 
विभिः । एवमन्वेष्टव्यो पिजिज्ञा- 


सितव्य इत्यथः । दृ्टाथलादन्बे- 


छाः उ० २८- 


प्रनापतिने कहा ।. 

“अन्वेषण करना चाहिये, विशेष- 
रूपसे जानना चाहिये" यह नियम- 
विषि ही दै, भपूरवं विषि नही है । 
इसका तात्पयं यह है छि उसे इ 
प्रकार अन्वेषण करना चाहिये, 
इस भरक्चार - जानना चाहिये, कोष 


६८ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ अष्वाय ८ 
व 
षणविनित्तासनयोः । दष्टाथत्वं | भन्वेषण ओर विनिह्ासा ये दोनों 
व , | ही दष्टाथं है [ इनका फर प्रलय 
च दशेयिष्यति नादमतर भोग्यं | हिद्॒ै, क माति 


परयामीत्यनेनासक्‌ । पररूपेण | अच्छ नही दै] । इनकी दृता * 
दिते म इसमे भोग्य नहीं देखता, इस 
च देहादिधर्मरवगम्यमानस्या- | [ इन्द्रके ] वाक्ये श्रुति बारंबार 
| दिखलायेगी । देहादि धर्मौ अतीत 
` | रूपसे ज्ञात ॒दोनेवाले आत्मके 
गमनिचृत्तिदुष्टं फठमिति नियमा- | स्वख्पका रान होनेमे विपरीत 
४ ॥ ज्ञानकी निवृत्ति-यह दृष्ट फर है; 
थेतैवास्य विधेयुक्ता न त्वधिहो-। अतः इस विधिका नियमा 
होना दी उचित हे; अमिहोत्रादिके, 
समान इसका अपूरवविधि होना 
सम्भवति ॥ १ ॥ सम्भव नहीं है ॥.१॥ 
. -~-१०० 

तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते दहोचहन्त 
तमासमानमन्िच्छामो यमात्मानमन्विष्य सवौ 
लोकानाभ्चोति सर्वाश्च कामानितीन्द्रो हैव देवाना- 
मभिप्वत्राज विरोचनोऽसुराणां तो हासंविदानावेव 
समित्पाणी प्रजापति सकाशमाजम्मतुः.॥ २ ॥ 

परजापते इस वाक्यको देवता ओर अघुर दोनों दीने परम्परासे 
जान्‌ लिया । वे कहने रुगे- “म उस अप्माको जानना चाहते दै 
जिसे नाननेपर जीव सम्पूणं रोको ओर समस्त भोगोको प्राप्त कर रेता 
है-एेसा निश्चय कर ` दवतागोका राना इन्द्र ओर अघुररोका राजा 


विरोचन-ये दोनों परस्पर शर्या करते हए हारथोमि समिधा" टकर 
 भरजापतिके पास आये ॥ २ ॥ | 


स्मनः स्वरूपाधिगमे विपरीताधि 


त्रादीनामिवापूवविधित्वमिह 


तै्ड ७ ] 


शोारभाष्वाथ ८६९ 


(2 5 4 5 5 9 5 9 9 5 9 9 ॐ = 3 ॐ ॐ 3 9 > = 


वद्धोभय इत्याद्याख्यायिका- 
प्रयोजनशक्तमू । तद्ध फिर प्रजा- 
पते्वचनघ्ुभये देवासुरा देवाध्ा- 
सुराश्च देवामुरा अलु परम्परागतं 
स्वकर्णगो चरापन्नमलुबुबुधिरेऽ्- 
बुद्धवन्वः । 


ते चैततप्रजापतिषचो बुद्ध्वा 
किमदु्वनिःयुच्यते- ते होच॒रु- 
क्तवन्तोऽन्योऽन्यं देवाः स्वपरिष- 
सुराश्च हन्त यद्य ुमति्॑वतां 
ब्रजापतिनोक्तं तमात्मानमन्वि- 
चछामोऽन्वेषणं ङमो यमात्मान- 
मन्विष्य सर्वाश्च लोकानाभोति 
सर्वाश कामानिल्युक्तवनद्रो हैव 
राजैव स्वयं देवानामितरान्दे- 
वांच भोगपरिच्छदं च सवं 
स्थापयित्वा शरीरमात्रेणेव प्रजा- 
पतिंप्रत्यमिप्रवव्राज प्रगतवां स्तथा 
विरोचनोऽसुराणाम्‌ । 


विनयेन गुरबोऽमिगन्तव्या 
इत्येतदर्चयति, त्रेरोक्यराज्याच्च 
गुरुतरा विद्येति । यतो देषासुर- 


शद्धोमये, इत्यादि भाख्यायिका- 
का प्रयोजनं पहले बतला दिया 


गया । परम्परासे आये हए-भपने 
कर्णोके विषय हुए उबर प्रना- 
पतिके वचनको देवता ओर शघुर 
इन दोनँने जान ख्िा । 
प्रजापतिके इष वचनको जान- 
व्र उर्ोने क्या किया-यह 
बतलाया जाता दै--उन देवता 
ओर अघुरोने अपनी-अपनी समामे 
आपसमे कटा, यदि भापरोर्गोकी 
अनुमति हो तो प्रजापतिके बताये 
हुए उस आत्माका भन्वेषण करे,जिस 
आसाक्ा अन्वेषण कर लेनेप्र मनुष्य 
सम्पूणं रोक भौर समस्त भोगोको 
प्राप्त कर ठेता हे । एसा कहकर 
स्वयं देवतार्ओंका राना इन्र ही 
अपनी सम्पूणं मोगसाममरी देवताओं 
को सौपकर शरीरमत्रसे ही प्रजा- 
पतिके पाष गया । इसी प्रकार 
अधुरोका राजा विरोचन भी गया। 


गुरुजनोके भति विनयूर्वंक जाना 
चादिये-- यह बात श्रुति दिखलती 
है; तथा यह मी [ प्रदर्धित करती 
ह] छि विदा तिङोकीके शञ्यमे 


९७० छाग्ौण्यो पनिषद्‌ [ जष्याद र 
अ~ -9 - >9 ~< ~ 8-88-28 > 9 889 > > < 
राजौ महारमोगादौँ सन्तौ तथा | भी बढ़कर ह, कर्थोकि देवराज भर 
अघुररान ये दोनों बहुमूल्य भोगके 
पात्र होनेपर मी इस प्रकार गुरुक 


संबिदानावेवान्योऽन्य संबिदम- | समीप गवे । वे दोनो परसय 
त न्योः असंविदान--संविद्‌ ( सद्भाव ) न 
र्बाणौ विद्याफलं प्रतयन्योन्य- | करते इए अर्थात्‌ विद्ये फलके 


मीया दशंयन्तौ समित्पाणी व्यि एक दूसरेके प्रति ष्य 
प्रदर्चित करते हुए समिाणि-- 


समिद्धारहस्तो प्रजापतिसकाश- हाभोमे समिधानोके भार तिमि 
माजग्मतुरागतवन्तौ ॥ २ ॥ । प्रनापतिके समीप आये | २॥ 


+ क्छ 


गुरुपभ्युपगतवन्तौ । तौ ह कफिला- 


तो ह द्वा्निश्शतं वर्षाणि बह्मचयमूषतुस्तो ह 
भजापतिरवाच किमिच्छन्ताववास्तमिति तो होचतुयं 
आत्मापहतपाप्मा विजये विभरव्युविंशोको विजिघस्सो- 
ऽपिपासः सत्यकामः सव्यसंकर्पः सोऽन्वेष्टव्यः स 
विजिज्ञासितव्यः स सर्वाश छोकानाभोति सर्वास 
कामान्‌ यस्तमारमानमनुविव्य विजानातीति भगवतो 
वचो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ ३ ॥ 


उन्होनि बत्तीष वषैतक ब्रहमचर्यवास किया । तव उनसे परनापतिने 
कदा-तुम यँ किस ₹इच्छासे रहे हो ¢ उन्होने कदा--जो भाला 
पापरहित, जरारहित, मूद्ुदीन, शोकरदित, श्चुषाहीन, तृषादीन, सत्य- 
काम जोर सत्यसंकषस्प है उसश्च अन्वेषण करना चाहिये ओर उसे विशेष 
रूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये । जो उस आतमाका अन्वेषण कर 
उसे विशेषरूपसे जान लेता ६ वह सम्पण लोक ओर समस्त भोगो 
राष्ठ कर लेता है--इस श्रीमान्के वाक्यको शिष्टजन बतकते है । 
उसीको जाननेक) इच्छा करते हए हम यहाँ रहे है" ॥ २ ॥ 


शण्ड ७1 


शाङ्करभाष्यं 


८७१ 


>< 29८ >9८ 9 ~ 9 9 96 9 9 9 ~ 9 9-99-2 ~ 9 + -- 


तौ ह गत्वा दा््रिंशतं वर्षाणि 
शुभषापरौ भूत्वा त्रह्मचयंभू- 
षृतुरुषितवन्तौ । अभिप्रायज्ञः 


वरजापतिस्तात्ुवाच किमिच्छन्तौ 


फ = 


स्तष्ुषितवन्तौ युवामितीत्युक्तो 
तौ दहोचतुः-य आत्मेत्यादि 
भगवतो वचो वेदयन्ते शिष्टा 
अतस्तमात्मानं ज्ञातु मिच्छन्ताव 


वास्तमिति । यद्यपि प्रार्‌ प्रजापतेः 


समीपागमनादन्योन्पमीर््यायु- 
क्तावभूतां तथ।पि विद्य प्राप्ति 
प्रयोजनगौरवात्यक्तरागदेषमोहे 
ष्यादिदोषावेव भूत्वोषतुर्हयचयं 
प्रजापतौ । तेनेदं प्रख्यापितमा- 
त्मविद्यागोरवम्‌ ॥ ३ ॥ 


वहं नाकर उन्होने बत्तीस वर्षतक 
सेवामें तत्यर रहते इए ब्रहमचयं वास 
करिया । तव उनके भभिप्रायको 
जाननेवाले प्रनापतिने उनसे कहा- 
(तुमने किस प्रयोननके अमिप्रायसे 
अर्थात्‌ क्या चाहते हुए यहं 
निवास किया दै ¢ इस प्रकार के 
जानपर वे बोटे-'चिष्टजन श्रीमान्‌- 
काथ भामाः इत्यादि वाक्य 
वतखते है, मतः उस भात्माको 
जाननेके स्यि हमने निवास क्रिया 
है ॥ यथपि प्रजापतिके परस 
आनेसे पूर्वं॒॑वे एक दूसरेके प्रति 
ई्ययुक्त ये, तथापि विद्ापराधषिके 
प्रयोजनके गोरवसे उन्होने प्रना- 
पतिके यरा. रागद्वेष, मोह णवे 
ईष्यदि दोर्षोको ल्यागकर्‌ दही 
्रह्मचर्यवास किया । इससे इस 
आत्मविद्याके गौरवकी सूचना 


मिलती है ॥ ३ ॥ 


~ ° :- 


तो ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो द्यत 


पष आत्मेति होवाचैतदमतमभयमेतदन्रहमत्यथ योऽयं 
भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादे कतम एष इत्येष 
उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४॥ 


८७दे छान्दोग्योपनिषद्‌ [ लष्याष ८ 


> ॐ > 99 3 ~ ~ 9 98८8-2 9 - 
उनसे प्रजापतिने कडा-- ह जो पुरूष नेत्रम दिखायी देता है 
यह आसा दै, यह मृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म है । [ तव उन्होने 
पूछा--] भगवन्‌ | यह जो जरम सव ओर प्रतीत होता है भौर जो 
दपणमे दिखायी देता है उनम मात्मा कौन-सा दै ¢ इप्‌ भनापतिने 
कहा--्ैने जिस नेत्रान्तग॑त ॒पुरूषका वर्णन किया है वही इन सक 
घव घोर प्रतीत होता है" ॥ ४ ॥ 


तावेवं तपस्विनौ शुद्धकन्मषौ | उन्हे इस प्रकार तपस्वी, विशुद्ध 
कर्मष ( जिनके दोष निवृत्त हो 

योग्यावुपर्ष्य प्रजापतिरुवाच | गये ह ) जर योग्य जानकर 
~ | प्रजापतिने कहा-- “जिनकी इन्द्रां 

ह । य एषोऽक्षिणि पुरुषो निद | विषति निच हो गयी है नोर 
तचद्धुभिमदितकषायेरदरयते | जिनके रागद्धेषदि दोरपोका नाश 
ज वोभिम ४ हो गया है उन योगि्ोँको नो 
योगिमिद्रशा । एष आत्मापहतपा-। नेत्रके भीतर 1 दरष्टा पुरूष 
स , | दिखायी देता हे, यह अपहत. 

प्मादिगुणो यमवोचं परां पाप्मादि गु्णोवाखा आत्मा दै,निसके 
यदविज्ञानात्सवंलोककामावाप्तिरेत- विषयमे पहले भने कहा था जर 
$ जिसका ज्ञान होनेपर सम्पूणं रोक 
दष्टत भूमाख्यम्‌ । अत एवाम- | जर कामनाओंकी प्राप्ति हो जाती 


ह । यह मूमासंजञक अधृत दै, 
यमत शव बरह्म इद्धतममिति । | इसल्यि जमय है जीर इसीसे ब्रहम 


अथैतत्रजापतिनोक्तमक्षिणि | यानी दृदधतम दै ॥' 
तव॒ प्रजापतिके कहे इए 
पुरुषो दुश्यत इति वचः श्रत्वा ¦ नेत्रोके भीतर जो पुरुष दिखायो 
व = ` |देता दैः इस वाक्यसे उनहेनि 
छायार्ूप पुरुप जगृहतुः । | छाया्प पुर्षको ब्रहण शिया 


कंच्ड ७ ] 


द्याङूरमाष्याथं 


८०द 


[99 9 9 9 9 ॐ ॐ > > > = = = ॐ ~ = ॐ ॐ < 


गृहीत्वा च दृढीकरणाय प्रजापतिं 
वष्टवन्तौ । अथ्‌ योऽयं हे भग- 
बोऽप्सु परिख्यायते परिसमन्ता- 
ज्तायते यश्वायमादशे आत्मनः 
प्रतिबिम्बाकारः परिख्यायते 


खड्गादौ च कतम एष एषां भव- 


द्विरुक्तः किं वैक एव सर्वेष्विति । | 


एवं पृष्टः प्रजापतिरुवाच- 
एष उ एव यश्वज्घुषि दरश 
मयोक्त इति । एतन्मनसि 
कृत्वैषु सर्वेष्वन्तेषु मध्येषु परि- 
ख्यायत इति दोवाच । 

नञ कथं युक्तं शिष्ययोर्विप- 
रीतग्रहणमनुज्ञातु प्रजापतेविंग- 
तदोषस्याचार्यस्य सतः ? 
सत्यमेवं नानुत्तातम्‌ । 








ओर उसे ग्रहण अपने विचारो 
पुष्ट कनेक स्यि भ्रनापतिसे पूषा, 
हे भगवन्‌ | यद जो पुरुष जरम 
परिख्यात-परि- सव भोर 
'छ्यातः- प्रतीत होता है नोर जो 
यह दर्पणे अपने प्रतिबिम्बखूपसे 
दिखायी देता है तथा नो खड्गादि 
[ स्वच्छ पदार्था ] में दीखता दहै इन 
सव्मे आपका वतराया हु 
आत्मा कौन है ए अथवा इन सने 
एक ही आत्मा है ¢ 

इस प्रकार पठे जनेप्र परना- 
पतिने कदा- भने जो नेत्रान्तग॑त 
द्रष्टा बतलाया है वही आत्मा है 
इस बातको मन्म रखकर ही उसने 
कहा कि "वह इन सभीके भीतर 
दिखायी देता हे ।' 


शङ्ञा-र्कितु निर्दोष आचायं 
होकर भी प्रजापतिका अपने शिष्योके 


विपरीत अहणका अनुमोदन करना 


कैसे उचित हो सकता है? 


समाधान- यह ठीक दहै, 


परंतु -भरजापतिने उसका अनुमोदन 
नहीं किया । 


® इस उक्तिसे प्रजापतिने यह सचित कर दिया दै किं ठम मेरा अभिप्राय 
नदीं समके, मेने दशको आत्मा बतछाथा दै ओर ठम दस्यको आत्मा समश्च 


बैठे हो। 





८ ७.७ 


छान्दोम्योपनिषद्‌ 


[ अध्याव ९ 


= = ॐ > ग = + 9 44 क क 9 7 क क 9 > 9 = > 4 


कथम्‌-- 
आस्मन्यष्यारोपितवषाण्डित्य- 


परचापतिविषय- मदर्वबोदधतवौदी- | 


काक्षेपवारणम्‌ न्द्रविरोचनौ तथेव 
च प्रथितौ रोके । तौ यदि 
प्रजापतिना मूढौ युवां विषरीत- 
ग्राहि गावित्यक्तौ स्यातां ततस्त- 
योधित्ते दुःखं स्यात्तजजनिताच 
चित्तावसादात्पुनः प्रश्रवण- 
ग्रहणावधारणं प्रत्युर्साहवि- 
घातः स्यादतो रक्षणीयो 
शिष्याविति मन्यते प्रजापतिः। 


गृह्णीतां तावत्तदुदशरावदृषटान्ते- 
नापनेष्यामीति च । 


ननु न धुक्तमेष उ एवेत्य- 


चतं वक्तुम्‌ । 
न चारृतयुक्तम्‌ । ` 


कथम्‌ ? 


आत्मनो क्तोऽकषिपुरुषो मनसि 





शङ्ञा- सो किस प्रकार 

सम्राधान-- इन्द ओर विरोचन 
इन दोन जपने पाण्ड्य, महत्व 
ओर ज्ञतुतका अशेप क्रियाथा 
ओर ये रोक प्रतिष्ठित भी थे। 
यदि उनसे प्रनापति यह कहते छि 
(तुम मूढ हो ओर उल्टा सम्नने- 
वलि हो, तो उनके चित्तम दुःख 
हो नाता ओर उससे होनेवारे 
वित्तके पराभवसे एर परभ्र कने, 
सुनने, महण करने ओर समक्नेके 
ट्यि उत्ाहका इस हो जाता । 
अतः प्रजापति यही मानते है 
रि्योङी रक्षा फरनी चाये । 
अभी ये विपरीत रहण करते दै तो 
भले ही करे म नरके शकरोरे आगिके 
दष्टान्तसे उसे निवृत्त कर दगा । 





शङ्खा --ितु “यही बह आतमा 
ह पसा कहकर मिथ्यामाषण 
करना तो उचित नीं है । 


समाधान - प्रजापतिने भिथ्या- 
भाषण तो नहीं क्रिया । 


रङ्ा- सि प्रहार नीं किया! 


समाधान-शिष्यके ग्रहण 


ण्ड ७ | शाङ्करमाभ्यर्थ ८०५ 
> 3८ >< (>< >> 9८ 9: 8 ¬ 9८ 1 9८ ~ > 9 ~ < 
सलिहिततरः शिष्यगृहीताच्छा- | क्वि हुए छवासासे प्रनापतिश्ा 
याला 1 ! स्वयं वतलया हुवा नेतरान्तगत पुरुष 

त्मनः । सवषा चीभ्य- | उनके मनते बहुत समीपवतीं है; 
| कयो “आत्मा सवके भीतर है" 


स्तरः" ; = ॥ 
+ । | ठेसौ श्रुति दे । ची वह भासा 


वोचदेष उ एवेत्यतो नारृत- | दै' इस वाक्ये प्रजापतिने उसीक्ञा 
ॐ ध निर्दृश किया दै, इयि उन्डेनि 
। उन्होने उनके विपरीत प्रहणकी 





तयो्विपरीतग्रहणनित्ररयथ निके समि इ प्रम 
ह्याह ॥ ४ ॥ कहा ॥ ४ ॥ 
------+----- 


इतिच्छान्दोग्थोपनिषयम्टमाभ्वाये सप्तमकण्ड- 
भाष्यं सम्पृणैम्‌ ॥ ७ ॥ 





इष्य खण्ड 
~: ® {-- 
दद्र तथा विरोचनका जलके शो रेमे अपना प्रतिविम्ब देलना 


उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदास्मनो न विजानी- 
स्तन्मे भन्रूतमिति तो होदशरावेऽवेक्षाथक्राते तो ह 
प्रजापतिरुवाच किं प्यथ इति तौ होचुः सर्वमेव 
दमावां भगव आ्मानं पर्याव आ छोभभ्य आं 
नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥ 

“जलपूे शकोरेमे अपनेको देखकर तुम आमाके विषयमे जो न 
जान सक्तो बह मुञ्चे वतसखओ' रेता [ प्रजापतिने कहा ] । उन्हे 
जके शकोरेमे देखा । उनसे प्रनापतिने कहा--तुम क्या देखते हो ¢ 
उन्दने का, भगवन्‌ | हम अपने इस समस्त आत्माक़्ो रोम ओर 
नलपय॑न्त ज्यो-का-वयो देवते ई" ॥ १ ॥ 

उदशराव उद्कपूर्णं शरावा- ] [ प्रनापतिने कदा- ] उदशराव 


75 जीजनत अर्थात्‌ जरसे भरे इए शकोरे 
दावात्मानमवेक्ष्यानन्तं यत्त- रो 
आतमाको देखनेपर जो कुछ तुम त 
थस्तन्मे मम प्ररूतमाचक्षीयाथा- | समञ्च सको वह तम से कना / 

# व इस प्रकार कदे जनेपर उन्देनि 
मिलयुक्तो तो इ तथेवोद्राे- उसी प्रकार जल्के शकोरेभे 
अवक्षाजक्राते अवेक्षणं चक्रतु- | दैकण-अवरोकन क्या म 
स्तथा छतवन्तौ । तौ ह प्रजा [ लष प्रनापतिने कहा थ ] वेसा 


ही क्रिया । तब उनसे प्रजापतिने 
पतिरूवाच किं प्रयथ इति १ | का- तुमने क्या देला १ 


ब्रात्मानं परयन्तौ न विजानी- 


लच्ड ८ ] 

नलु तन्मे भ्रत्रूतमित्युक्ता- 
स्वाषटुदशरावेष्वेक्षणं कृत्वा 
प्रजापतये न निवेदितमिदमावा- 
भ्यां न बिदितमित्यनिवेदिते 


चाज्ञानहेतौ € प्रजापतिर्वाच 
रि पदयथ इति १ तत्र कोऽमि- 
प्राय इति । 


उच्यते मैव तयोरिदमाव- 
योरबिदितामत्याशङ्काभूच्छाया- 
त्मन्यात्मप्रत्ययो निधित एवा- 


सीत्‌ । येन वध््यति-तो इ 
शान्सहदयौ प्रवव्रजतुः" इति। न 
हनिशितेऽमिप्रेताथे प्रशान्तहृद- 
यत्वघ्ुपपद्यते । तेन नोचल- 
रिदमावाम्यामविदितमिति । 
विषरीतग्राहिणौ च शिष्याबु- 


चेक्षणीयाविति स्वयमेव पप्रच्छ 


शाङ्करमाष्याथ ८७ 
न 99998 5 9 99 9 8 9 ध 


शङ्खा- पितु वह सुकसे कमा" 
इस प्रकार कदे हुए उन दोननि तो 
जलपूर्णं शकोरेमे देखकर प्रजापति 
देखा कोई निवेदन नदी ॒किया कि 
यह बात हम नष्टौ समञ्च सके ।' 
इस प्रकार भन्ञानका कारण न 
वतलनेपर भी प्रजापतिने जो कदा 
कि तुमने क्था देखा ¢ सो इसका 
क्या अभिप्राय है 


समाघान-ईसका उत्तर दिया 
जाता दै-उन्दै इसत प्रकारक 
को शङ्का नही हद कि अक 
बात हमको ज्ञात नहीं है । ` 
छायालाम उनी आतप्रतीति 
निश्चित ही थी । इ्षीसे अगे 
चकर शति यह कती है करि वे 
्ान्तचित्तसे चले गये । तथा 
अभीष्ट वस्तुा निश्चय हुए विना 
प्रशान्तवित्तता सम्भव नक्ष है; 
इसीसे उन्होनि यह नहीं कडा 
यह बात हम विदित नहीं दै। 
रितु विपरीत अह्ण करनेवलि 
शिष्योक्षी भी उपेक्षा नहीं करनी 


चाहिये; इससे उन्होने स्वयं ही 


पूछ दिया कि तुम क्या देखते हो; 


किंपर्यथ इति ? विपरीतनिश्चया-। वथा उनके विप्रीत निश्वयका 


€७८ 


[ लच्याय ८ 


>9--9-9 ~ > 9 928 ¬ 80 >8 286 8८ >< 8 > 2928८ 202 धट 8८ ह ट ~ 


पनथाय च वक्ष्यति साध्वलङ्कृ- 


तावित्येवमादि । 

तौ दोचतुः--सर्वभेवेदमावां 
अगव आत्मानं पहयाव आ 
लोभस्य आ नखेभ्यः व्रतिरूष- 
मिति, यथेवावां हे भगवो 
लोमनखादिमन्तौ स्वः, एव- 
मेवेदं रोमनखादिसहितमाबयोः 
प्रतिरूपमुदशरावे परयाब 
इति ॥ १ । 


निराकरण करनेके ल्यि [ पढे ] 
साध्वल्कृतो' इत्यादि वाक्य भी 
कहा । 

उन्होने कहा--^हे मगवन्‌ | 
हम दोनों अपने भातमाको रोम 
ओर नश्वपरथन्त ज्यो-का-यों देखते 
ह । हे भगवन्‌ ¡ हमारे स्वह्पजञस 
लोभ एवं नखादियुक्त रै उसी 
प्रकार हम जक्के शकोरेमे अपने 
प्रतिविम्बको भी रोम ओर 
नखादियुक्त देखते टै" ॥ १ ॥ 


= 
तो हं भ्रजापतिरुवाच साध्वखड्ककतौ सुवसनौ 
परिष्कृतो भूर्वोदरारावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्व 
खङ्ृतो सुवसनौ परिष्कृतो भूत्ोदशरवेऽवेक्षाथ- 
राते तो हं प्रजापतिस्वाच किं पर्यथ इति ॥ २ ॥ 
उन दोनोसे प्रनापतिने कहा- (तुम अच्छी तरह अरङ्कत होकर, 
घुन्द्र॒वस् पहनकर ओर परिष्छरत होकर जलंके शकफोरेम॑देखो ॥ 


तब उन्होने अच्छी तरह भलङ्ृत हो, सुन्दर वल धारणकर घोर परिष्ृत 
होकर जूके शकोरेमे देला । उनसे प्रजापतिने पञछछा, तुम र्या 


देखते हो ¢ ॥ २ ॥ 
तो ह पुनः प्रजापतिरुवाच 
छायात्म नि्यापनयाय साध्व 


उन॒ दोनोसे प्रजापतिने 
छाया्मामे आत्मलके निश्वयकी 
निद््तिकि स्यि फिर कदा-- 


ल्क.तौ यथा स्वगृह सुबसनौ महा-। म दोनों बिस प्रकार भपने षू 


हण्ड ८ | 


शाङ्करमाष्याथं 


९७९ 


8८28८ > >< ८ > ८ > ब 92 ~ ॐ ॐ ॐ ॐ = ॐ 5? = 4 


ईबद्धपरिधानौ परिष्कृतौ छिनन-। रहते हो उसी भांति शच्छी तरह 


अलङृत होकर ुवसनः-महामूल्य 


लोमनद्लौ च भूत्वोदशचरावे वस्त्र धारणकर तथा परिष्कृत यानी 


पुनरीकेथाभिति । 
नादिदेश यदज्ञातं तन्मे प्रन 
तमिति । कथं पुनरनेन साध्व- 


इद चं 


ङ्ारादि कृत्वोदशरावेऽ्वे- 


क्षणेन तयोश्छायातमग्रहोऽप- 


नीतः स्यात्‌ । 
साध्वलङ्कारसुबसनादीनामा- 
गन्तुकामां छयाकरत्वशद्‌- 
शरावे यथा शरीरसम्बद्वाना- 
मेवं शरीरस्यापिच्छायाकरत्वं 
भूं बभूवेति गम्यते । शरीरे 
कदेश्ानां च लोमनखादीनां 
नित्यत्वेनाभितप्रेतानामखण्डि- 
तानां जयाकरत्वं पूव॑मा- 
सीत्‌ । छिन्नेषु च तेषु नेव 
लोमनखादिच्छाया दश्यतेऽतो 


लोम भीर न्न काटकर जल्के 
शक्षोरेमे फिर देखो ॥' यों 
प्रनापतिने पसा भदेश्च नहीं किया 
कि उप्त समय तुम जोन जन 
सको वह मुञ्े बतरना । [ क्योकि 
वे यही चाहते ये कि ] इस प्रकार 
सुन्दर भलकारादि धारण कर्‌ 
जरुके शकोरेमे देखनेसे किसी-न 
किसी तरह उनकी छयासमबुद्ध 
निवृत्त हो जाय । 

जिस प्रकार देहसे सम्बद्ध घुन्द्र 
अलंकार भौर बहुमूल्य वस्त्रादि 
आगन्तुक पदाथ नलके शकोरेमे 
सपनी छाया प्रकट करते दै उसी 
प्रकार पहले शरीर भी छायाकरक 
था- दसा इससे ज्ञात होता है । 
शरीरके एकदेशखूप तथा निर्य 
खूपसे माने गये खण्डित रोम 
जर नखादि भी पहरे छायाजनक 
य्े। कितु अब उन्द काट ल्थि 
जानेपर उन लोम एवं नखादिकी 
छाया दिखायी नही देती । इससे 
लोम ओर नखादिके समान शरीर 


लोमनषादिवच्छरीरस्याप्यागमा- भी आगमापायी ८ उतनज्न नौर 
पायित्वं सिद्धमित्युदशरावादौ | नष्ट देनेवाला › सिद्ध होता है। 


(~, 


छान्दोभ्योयतिकलू 


[ अच्याव ८ 


>§< 96 < 9८ < &< < 3८ < >€ 8८ ऋ -हट षः >< < 8 96 9 9 ट € ॐ 4 
दृश्यमानस्य तन्निमित्तस्य . च | इस भकार जलके शकोरे भादिमे 


देदस्यानात्मतं सिद्धम्‌, उदशष- 
रावादौ छायाकरत्वादेदसश्वद्धा- 


लङ्कारादिवत्‌ । 

न केवलमेतावदेतेन यावक्कि- 
श्विदात्मीयत्वाभिमतं सुखदुःख- 
रागद्ेषमोहादि च कादाचित्क- 
त्वान्नखलोमादिवदनालमेति प्रत्ये 
तव्यम्‌ । एवमशेषमिथ्याग्रहापन- 
यनिमितते साष्वरङ्कारादिदृष्टान्ते 
्रजापतिनोक्त भुता तथा कृत- 
बतोरपिच्छायात्मविपरीतग्रहो 
नापजगाम यस्मात्तस्मारस्व- 
दोषेणेव केन चितपरतिबद्धविवेक- 
विज्ञानाविनद्रविरो चनावभूतामिति 

गम्यते । तो पूववदेव द्‌ निश्चयौ 


दीखनेवाले उनके निमित्तमूत 


। देहका भी भनातमत्व सिद्ध होता दै, 


वर्योकि देहसम्बन्धी भलंकारादिके 
समान उसका भी जरुके श्वकोरे 
आदिम छायाकरत्व है । 


इसीसे केवर इतनी ही बात घिद्ध 
होती हो सो नही, ब्कि घुल, दुःख, 
राग, द्वेष ओर मोहादि जितना कुह 
मी आत्मीयद्पसे माना नाता है 
वह भी नख एवं ोमादिके समान 
कभी-कभी होनेवाख होनेके कारण 
जनात्रा दही है-रेसा जानना 
चाये । इस प्रकार समूण 
मिथ्या प्रहणकी निष्का हेतुभूत 
प्रजापतिका कहा हुमा साधु अ 
कारादिका दृष्टान्त घुनकृर का 
ही करनेपर भी, क्योकि उनका 
छयात्सम्बन्धी विपरीत शान 
निवृत्त नही हु ईइसख्यि यह 
विदित होता किं उन इन्द्र ओर 
विरोचनका विवेकविज्ञान उनके की 
अपने दोषसे ही प्रतिबद्ध हो गया 
था । तव प्रजापतिने पहटेदीके 
समान दृढ़ निश्चयवाले उन दोसे 


पप्रच्छ किं प्रयथ इति ॥ २ ॥ | पू, तुम क्या देखते दो ४॥२॥ 


= -~-श्व्कन्की- 


हण्ड ८ ] हछाहकरभाष्याथ ८८१ 
~< < < < 3 8 8 ~ 9-99-9 


तो होचतुर्यथेवेदमावां भगवः साध्वलङ्कतो सुवसनो 
परिष्कतो स्व एवमेवेमो भगवः साध्वखङ्कतो सवसनो 
परिबकतावित्येष आस्मेति दोवाचैतदश्तमभयमेतदन्र- 


ह्येति तो ह शान्तहदयो प्रवव्रजतुः ॥ २ ॥ 
उन दोनोनि कहा- भगवन्‌ ! नि प्रकार हम दोना उत्तम . 
प्रकारसे अटृकृत, घुन्दर वस धारण क्षिये ओर परिष्ृत हैँ उती प्रकार * ` 
हे भगवन्‌ | ये दोनों भी उत्तम प्रकारसे अर्त, धन्द्र वक्लषारी -मौर 
परिष्कृत ड ॥ तव प्रनापतिने कहा आत्मा दै, यह अमृत जर 
अभय टै भौर यही ब्रह है ।' तव वे दोन शान्तचित्तसे चरे गये ॥३॥ 
तौ तथैव प्रतिपन्नौ यथैवेद- | उन्न उती मकार समशचा । 
“यथेवेदम्‌' अर्थात्‌ पूववत्‌ निघ 


(~ (~ (ध 
[मात पूवेवद्यथा साभष्वलङ्कारा- ; 
४ ड प्रक्र हम साधु-अलंकारादिविशिष्ट 


दिविशिष्टावावां स॒ एवमेवेमौ 
छायात्मानाविति सुतरां विपरीत 


निश्चयौ बभूवतुः । यस्यात्मनो 
रक्षणं य आत्मापहतपाप्मेत्युक्त्वा 


पुनस्तदविरोषमन्विष्यमाणयोयं 

एषोऽक्षिणि पुरूषो दुश्यत इतिं 
साक्षादात्मनि निर्दिष्टे तद्विपरीतः 
ग्रदापनयायोदङ्षरावसाष्वलङ्कार 
ृष्टान्तेऽप्यमिहित आस्सस्वरूपः 


हे उसी प्रकार ये छायासा भी दै । 
सत॒ प्रकारे सवथा विपरीत 
निश्चयवलेहो गये । निन भसङ्गा , 
रक्षण ध आत्मापहतपाप्मा 
इस प्रकार कहकर फिर उपक 


विेषताक्षी निज्ञासावारकि प्रति `` ` 


फ जो नेत्रान्तगंत पुरुष दिखायी 
देता दै, इस प्रकार आत्माका 
सक्षात्‌ निर्देश करनेपर तथा 
उसके विपरीत ज्ञानकी निद्रत्तिके 
स्यि उदशराव ओर साधु-मरुकारादि 
दृष्टान्त देनेपर भी उन दोरक 


आत्म्ठहपज्ञानसे विपरीत अह 


यधाद्विपरीवग्रदो नापगतः । | निद्र नदी इजा; अतः शषा 


८८२ 


` छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय ८ 


> < < ८ ¬< ८-८-8८ = 9 = 6 28 -धट -~-हट ऋ 


अतः स्वदोषेण केनचितपरतिषद्व- | 


विवेकविज्ञानसामर्ध्याषिति 
यथाभिप्रेतमेवारमानं मनसि 
निधयेष आस्मेति होवाचैत- 
दमरतमभयमेतदब्रहमेति प्रजापतिः 
पूववत्‌। न तु तदभिग्रत- 
मात्मानम्‌ । 


य आस्मेत्यायारमलक्षणश्रव- 
णेनाकषिपुर्षश्रस्या चोदशरावा- 
द्यपपरया च संस्कृतो तावत्‌ । 
मद्वचनं सवं पुनः पुनः स्मरनोः 
प्रतिबन्धक्षयाच्च स्वयमेवात्म- 
विषये विवेको भविष्यतीति मन्वा- 
नः पुनर्ज्॑चर्यादेशे च तयोधि- 
तदुःखोतपत्ति परिनिदीर्न्छरता- 
थेषुद्धि तया गच्छन्तावप्युपकष- 
तवान्प्रजापतिः । तौ हेन्द्रविरो- 
चनो शान्तहृदयौ तुशुहदयौ 
कृताथबुद्री इत्यर्थः । न तु शम 
एव श्मर्चेत्तयोर्जातो विपरीत- 
गरदो विगतोऽमविष्यस्रववन- 
त्॒गतवन्तो ॥ ३ ॥ | 


क 


मानकर कि इन दोनोंकी विवे 
विज्ञानक्षामथ्य अपने किरी दोषे 
कारण प्रतिबद्ध हो गयी दै 
परजापतिने उनके मनि हए 
आत्माका नहीं वर्कं अपने मकं 
यथाभिमत आस्क्रा ही निश्चय कर 


पहल्हीकी तरह कहा--शयह 
आसा है, यह अभूत ओर अभय दै 
तथा यही ब्रह्म है। 


“य॒ आत्मापहतपाप्मा इत्यादि 
आत्माक¡ रक्षण ॒सुननेसे, भक्षि- 
पुरुषसम्बन्धिनी श्रुतिसे ओर उद- 
ररावादिकी युक्तिसे तो ये संस्कारयुक्त 
हो ही गये है; अव मेरी सारी 
बातको बारंबार स्मरण करते हुए 
प्रतिबन्धक क्षिय होनेपर इह स्वयं 
ही आसाके सम्बन्धे वतरिक हो 
जायगा- रेसा मानकर ओर पुनः 
नह्मचरयका आदेश देनेपर उन 
लो दुःख होगा उसे बचानेके लिये 
परजापतिने कतार्थबुद्धि होकर जति 
हुए उन दोनोकी उपेक्षा कर दी । 
वे इन्द्र ओर विरोचन शान्तचित्त- 
संुष्टहदय अर्थात्‌ कृतारथवुद्धि 
होकर चले गये । कंतु यह श्वम 
नहीं था, वर्योकि यदि 
वास्तविक शम दही होता तो उनका 
विपरीतम्रहण निदत्त हो जाता ॥३॥ 


खण्ड ८ ] शा्ुरमाष्याथं ८८३ 
ह: 4- 4 = य 8८ >< 8८ ८ 8८ ८ ~ 8८ 9 ८ 9८ 9-८८8-9८ ~: 9: ~ 


(4 © (~ 
एवं तयोगंतयोरिन्द्रविरोच-, इस प्रकार गवे हुए उन 
नयो रक्ोमोगातरयोषयो | गाणा 
को पठे कहे हुए [ आत्मरक्षण | 
विस्मरणं स्वादित्याशङ्कथाप्ररक्षं | का वि्मरण हो जायगा-- एसी 
, | आशङ्कसे प्रक्ष वचनद्वारा 
्तयक्षवचनेन च ॒विन्तदुःखं अप्रक्षख्पसे उनके हार्दिक 


परिजिदीषः- दुःखी निवृति चाहनेवले-- 


तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिशूवाचानुपर्भ्यात्मानमनु 
विद्य बजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वासुरा 
वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहयदय एव विरोचनो- 
ऽसुराञ्जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं श्रोवाचात्मेवेह महय्य 
आमा पर्चिर्यं आरमानमेवेह महयन्नात्मानं परिचर- 
न्नुभो टोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४॥ 


प्रन।पतिने उन्ह [ दूर गया ] देखकर कहा--थे दोनी आस्र 
उपलभ किमे विना उपशा साक्षाकार क्वि विनाना षद टै; 
देवता हों या अघर जो को$ रेस निश्चयवलि होगे उन्दी परामव 
होगा । वह्‌ जो विरोचन था शन्तचित्से अघुरौके प पर्हैवा ओर 
` उनको यह आतमविद्या घुनायी-द लोकम आत्मा ( देह ) दी 
पूजनीय दै ओर आतमा ही सेवनीय ह। आस्माकी ही पूना ओर 
परिचर्या करनेवाला पुरुष इदलोक जर परलोक दोनों टोकोको प्राप्त 
क्रेता हे" ॥ ४॥ 


तौ द्रं गच्छन्तावन्वीक्ष्य य ,  भजापतिने चं . द्र गवा 
५ देखकर, यह मानते हुए कि 


आत्मापदतपाप्मेत्यादिबचनवदे- । ब॒ जसता इत्यादि 


८८७ छाल्टोग्योपनिवव्‌ 


> क ॐ +: ॐ: 4 8८ ¬ ¬> ->- >< 8८ ~ >< >> 
तदष्यनयोः 


तीति मत्वोबाच प्रजापतिः| 
अनुपरभ्य यथोक्तलक्षणमात्ना- 


[ सष्याय ८ 
95998 
वाक्यके समान यह वचनं भी 
उनके कानि प्‌ जायगा; इहा- 
ये इन्द्‌ लोर विरोचन उप 
रक्षणवाठे आत्ाफो बिना नने 
उसे सपने प्रयक्ष क्रिये बिना 
विपरीत निश्चयवाले होकर घा ह 
है । इसरियि विरोषहपसे कया इहा 
जाय, जो भौ देवता या अर 
इस उपनिषदृवाले होगि- इनके 
दवाय जो आसमविद्या अ्रहणषी 
गयी है वही जिन देवताया 
छघुरोी उपनिषद्‌ होगी वे रेस 
उपनिषद्‌- एसे विज्ञान अर्थात्‌ 
एसे निश्वयवश जो भी हेगि। 
उनका क्या होगा ? उनका पराभव 
होगा । तापय यह है व 
्रयोमार्गसे पराभूत--बहिमूत 
अर्थात्‌ विनष्ट हो जार्येगे ॥' 
अपने घरको जानेवाठे देवराज 
ओर अघुररानोमे जो अधुरराल था 
वह॒ विरोचन शान्तचित्से द 


जघुरोके पास प्हुवा । तथा व 
प्चकर उन अघुरोके प्रति जो 











नमनुविच स्वात्मप्रत्यक्ं चाह्न. 
त्वा विपरीतनिशयौ च भूरवनद्र- 
विरोचनावेतौ व्रजतो गच्छेया- 

ताम्‌ । अतो यतरे देवा वासुरा 
वा फं विशेषितेनैतदुषनिषद 
आभ्यां या गृहीतात्मविध्ा सेय- 
युपनिषेषां देवानामसुराणां वा 
त एतदुपनिषद एवंविज्ञाना एत- 
निधया भविष्यन्तीत्यर्थः । ते 
किं परामविष्यन्ति श्रेयोमार्गा- 
त्पराभूता बहिर्भूता विनष्ट 
भषिष्यन्तीत्यर्थः । 


स्वगृहं गच्छतोः सुरासुररा- 
जयो्योऽसुरराजः स॒ह शान्त- 
हृदय एव सन्विरोचनोऽसुराज्ञ- 
गाम । गता चते ; 
शरीरात्मबुद्धरथ इ देदातमबुदधिरप उपनिषद्‌ थी वही 
पनिष्ामताु- उपनिषद्‌ घुना दी । अर्थात्‌ यह 


पनिपदं भ्ोवाचोक्तवान्‌ । दह | क दिया कि भनापतिने देको 
मात्रभेवात्मा पिव्ोक्त इति । । ह भासा बतलाया द । ईसटिये 


तण्ड ८] श्ाङ्रभाष्या्थं ८८५ 
८9 9 -5८ -ः ~ ८9८ ८ ८-9-99 9 9 9८ ड: 9: ८ (८ ८ 9 ऋ 


तस्मादात्मैव देह इद लोके | इस कम देदरूप आत्मा हो 


महस्य पूजनीयस्तथा परिचयः २ भ. तथा परिचयं -- 
= वनीय है ओर इपर लोकम देदरूप 
परिवरणीयस्तथातमानमेधद ५ आमाक्री हौ पूना-सेवा कलनेसे 
दष्टं महयन परिचरंबोमय- इस भौर उस दोनों रोकोको प्रा 
लोकाववाप्नोतीमं चाग्रं च । इद- | कर॒ केता दै । इस रोक जर 
लोकषरलोकयारेव सरवे शोकाः | परोकम ही सम्पूणं रोक भोर 
कामाश्वान्तर्मबन्तीति राज्ञोऽभि- | मोग भन्तथूत हेते दै सा 
प्रायः ।। ४ ॥ राजा वरिरोचनका अभिप्राय है॥४॥ 


~ सूक 


तस्मादप्ययेहाददानमश्रदधानमयजमानमाहृरासुरो 
चतेर्यसुराणाशद्येषोपनिषस्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसने- 
नारङ्क रेणेति सस्छरवन्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो 
मन्यन्ते ॥ ५॥ 
इसीसे इस ोकम जो दान न देनेवाला, शरद्धा न करनेवाय ओरं 
यजन न करनेवाला पुरुष होता है उसे शिष्टजन “भरे | यह तो घुर 
( आघुरीस्वमाववाख ) ही दै' पेसा कहते है । यह उपनिषद्‌ अघुरोकी 
ही है। वे ही मृतक पुरूषके शरीरके | गन्ध-पष्प-भन्नादि ] भिक्षा, वज्ञ 
जर अरंकारसे घुज्ञित करते दै. ओर इसके द्वारा हम परलोक प्राप 
करेगे- रेखा मानते है ॥ ५ ॥ 


तस्मात्तत्सम्प्रदायोऽग्राप्यनुव- | इसीसे उन ( अघर) का 
६ ध सम्पदाय इस समय भी विध्यमान 
तत इतीह रोकेऽददानं दानम- | ह । अतः इस कोक गददान-- 
कर्बाणमविभागश्ीरमश्रदधानं दान न करनेवाले अर्थात्‌ निन 
स्वभाव अपने धनका विभाग 


सत्कार्येषु श्रद्धारदितं यथाश- | करे नही हे, अश्रद्धान-- 


९८६ 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अष्याय ८ 


>< >< 8८ >< 9: >< ¬< 9-9-8८ -४- ह -८ > -&८ >> ७ ‰ 28 ऋ 8 >> 
केत्ययजमानमथजनस्वभाव माहु-| सतक शरद्धा न रनेवरे थर 


रासुरः खल्वयं यत एवंस्वभावो 


बतेति खिद्यमाना आहुः रिष्टाः। 
असुराणां दि यस्मादश्रदधानता- 


दिलक्षणेपोपनिपत्‌ । | 
तयोपनिषदा संस्कृताः सन्तः 


प्रेतस्य शरीरं कुणपं भिक्षया 
गन्धमाल्यान्नादिलक्षणया वस- 
नेन वल्रादिनाच्छादनादिप्रका- 


रेणारङ्कारेण ध्वजपताकादिक- 
रणेनेव्येवं संस्डुवेनत्येतेन कुणप- 
संस्कारेणायुं प्रेत्य प्रतिपत्तव्यं 
लोक जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥५॥ 


अयजमान-- जिक्षका स्वभाव 
यथाशक्ति यनन करनेका नहं है 
उस पुरूपक्रो शिष्टनन व्योकि 
यह एसे स्वभावता है इसिि 
निश्चय यह आषुर ही दै रेसा 
खेद करते हुए कर्ते है, क्योकि 
यह अश्रहूधानता आदि रक्षणोवाटी 
उपनिषद्‌ अघुरौकी ही हे । 

उस उपनिपषदृ्े संस्ारयुक्त 
होकर वे मृतक पुरुषके शरीर अध 
शवो गन्ध, पुष्प एवं अन्नादिषूप 
भिक्षा, वसन--वकादिद्रार 
आच्छादनाद्वि करनेकी विधिसे ओर 
ध्वना-पताकादि लगानाह्प 
अलंकारसे संस्छृत करते हैँ ओर 
फसा मानते दहै कि ईस शवके 
संस्कारसे हम मरकर अपने प्रप 
होनेयोग्य लोककेो पराप्त कर ठेगे ५५ 


९ ५4२ 9 ~ 


इतिच्छान्दोग्योपनिषद्य्टमाध्याये ऽष्टमखण्ड- 
9 ९ ॐ 
भाष्यं सम्पण॑म्‌ ।। ८ ॥ 


~~ ४ प 


नकम खणड 


3 
इन्द्रका पुनः प्रजापतिके पास आना 
अथ हेन्द्रोऽप्राप्येव देवानेतद्धयं दद यथेव 
खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलड्कुते साध्वलङ्करुतो 
भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कुत एवमेवा- 
यमस्मिन्नन्ेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिदकणे परि 
बृकणोऽस्येव शरीरस्य नारामन्वेष नश्यति ॥ १ ॥ 


वितु इन्द्रको देवताओकि पास बिना पहुचे ही यह भय दिलायी 
दिया | जिस प्रकार इस शरीरके अच्छी प्रकार भक्त होनेपर यह 
(छायात्मा) अच्छी तरह अलक्त होता है, घुन्दर व्ञधारी होनेपर 
न्दर वल्लधारी होता दै ओर परिषछृत होनेषर परिष्छृत होता है उसी 
रकार इसके अघे होनेपर अधा हो जाता दै, साम होनेपर क्षाम हो 
जाता ष ओर खण्डित होनेपर खण्डित हो जाता है तथा इस शरीरकं 
नाञ्च होनेपर यह भी नष्ट हो जता है ॥ १॥ 
अथ ह किेन्द्रोऽप्राप्येव , रितु इन्द्रे देवताओंके पास 
ह्‌ बिना परहैचे ही, क्योकि वें 
देवान्‌ देव्याक्रोयादिसम्पदा | अकूरता जादि दैषीपम्पततसे उक्त थे 
ईसलस्यि गुरुवाक्योको बारंबार 
स्मरण करते हए जति-नाते अपने 
स्मरन्नेव . गच्छन्नेतद्रश्यमाणं | क्ये इए जसस्वरूपके म्रहणके 
+ =) कारण यह मय देखा । जल्पात्रके 
भय स्वामग्रह् दद | टष्ान्तसे प्रनापतिने जिसके लिये 


दृष्टवान्‌ । उदशरावदृशन्तेन । [अर्भ देहका अनात्मत्व प्रदर्शित 


युक्ततवाद्गुरोवंचनं पुनः पुनः 





प्रजापतिना यदर्थो 


उक्तस्तदेकदेशो 


प्रत्यभादृषुद्धो,येन ह, 


दोषं दशं । 

कथम्‌ १ यथेव खल्वयमस्मि- 
ज्छरीरे साध्व्टते छायात्मापि 
साध्वलंछृतो भवति सुवसने 
च सुवसनः परिष्छरते परिष्टृतो 
यथानखलोमादिदेहावयवापगमे 
छायात्मापि परिष्कृतो भवति 
नखलोमादिरदितो भवति; एवमे- 
वायं छायात्माप्यस्मिञ्छरीरे 
नखलोमादिमिदेहाषयवत्वस्य 
त्न्यत्वादन्बे चद्धषोपगमेऽन्धो 
मवति स्रामे स्रामः। घाम; 


किलेकनेत्रस्त 
स्यान्धत्वन गत- 


त्वात्‌ । चज्ुर्नासिका वा यस्य सदा 


सवतिस स्रामः। परिद्क्णरिछन्‌- 


न्याय | करनेके ल्थि नो व्यभिचारि] 
न्याय प्रदतं क्या था उदु 
त ¡ उका 


एकदेश न्दी बुद्धिम रि 
निपसे क्षि उन्दं छयक्षो 
आ्मर्पसे ग्रहण करने दोष 
दीखने ल्गा । 

केसा दोष दिखायी दिया १ 
निस प्रकार निश्वय ही इस शरीरके 
अच्छी तरह अरुक्ृत होनेपर यह 
छायात्मा अच्छी तरह अलक्त हो ` 
जाता है, घुन्दर वञ्ञधारी होनेष 
न्दर वक्लषारी होता है भौर 
परिष्कृत होनेपर॒परिष्छित होता दै 
अर्थात्‌ नखलोमादि . शरीरके 
अवयवोंकी निवृत्ति होनेपर छायामा 
भी परिष्कृत - नघलोमादिरदित 
हो जाता द; उक्ती प्ररि यह 
छायात्मा भी--इस शरीरम नघ्- 
लोमादिसे चश्षुजादिकी ेहावयवल 
समानता होनेके कारण [ शरीर |] 
अंधे होनेप अंधाहो जाता 
ललाम होनेपर ज्लाम हो जता है। 
सरमश्न प्रतिद्ध अर्थं एक तरवा 
है, फितु वह अन्धतवसे ही गतार्थ हो 
जाता है इसख्यि जिसके चक्षु था 
नासिका सद्‌ा सवित होते रहते 
उसे छामः समन्नना चाहिये । 
परिवृक्ण-- जि्तके हाथ या वैर 


छण्ड ९ ] श्ाष्रमाष्याय ८८९ 
ध > 8८ ऋ 9८ 2 9८ 9८ 9 ऋ 8८ 9८ -9८ अ ८ ~ ~ ~ ~ 


दस्तदिछन्षपादो वा । सरमे | कट गये हो| शरीरके ज्ञाम या 


परिदक्णे वा देहे छायात्मापि परिवृक्ण होनेपर छया भी वस्ता 
दीहो जता दै; तथा इष देहशा 
तथा भवति । तथास्य देहस्य । नाश॒होनेपर यद भी नष्ट हो 


नशिमन्वेष्‌ नश्यति ॥ १॥ | नाता ६ ॥ १॥ 


~---*4- 


अतः- | अत!-- 

नाहमत्र भोग्यं पद्यामीति स समित्ाणिः पुनरे 
याय तरह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहदयः परात्ा- 
जीः सार्धं॑विरोचनेन किमिच्छन्‌ युनरागम इति स 
होवाच यथेव खस्वयं भगवोऽस्मिञ्छरीरे साष्वलङ्छृते 
साभ्वलङ्छ्ृतो भवति सुत्रसने सुवसनः परिष्कृते 
परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति लामे ललामः 
परिदक्णे परि्रक्णोऽस्येव शरीरस्य नाशमन्वेष 


नदयति नाहमत्र भोग्यं पदयामीति ॥ २ ॥ 

“स [ छयासदर्घन ] मे मे कोई भोग्य नटी देखता ।' इष्य वे 
समित्पाणि होकर फिर प्रनापतिके पस आये | उनसे प्रजापतिने कहा-- 
“इन्द्र | तुम तो विरोचनके साथ शान्तचित्त होर गये थे, अब किष 
इच्छासे पुनः आये हो ; उन्होने कदा-- भगवन्‌ | जिस प्रकार यह 
८ छायात्मा ) इत शरीरके अच्छी तरह अलकृत होनेपर भच्छी तरह 
अलङ्कृत होता दै, सुन्दर व्ञधारी होनेपर सुन्दर वखलधारी होता है ¦ 
जोर परिष्कृत होनेपर परिषछरत हो जाता है उसी प्रकार इसके अधे 
होनेपर अघा, साम होनेपर सषाम ओर खण्डित होनेपर खण्डित भी हो 
जाता है तथा इस शरीरा नाश होनेपर यह नश भी हो जाता है, 
मुषे इसमें कोई एर दिखायी नहीं देता ॥ २ ॥ 





<९&2 


नाहमतास्मिशमयात्मदशे 


देदात्मदशेने बा भोग्यं फलं 


प्रयामीति। एवं दोषं 


स्मदशेनेऽप्यवरय स समित्ाणि- 
रचयं वस्तुं पुनरेयाय तं ह 
प्रजापतिरवाच--मघवन्यच्छा- 
न्तहृदयः व्रा्राजीः प्रगतवानसि 
विरोचनेन साधं किमिच्छन्‌ पु- 
नरागम्‌ इति । विजानन्नपि पुनः 
पप्रच्छेनद्रामिप्रायाभिव्यक्तये । 
यद्वेत्थ तेन मोपसीदेति यद्रत्तथा 
च स्वामिप्रायं प्रकटमकरोदभेव 
खन्बयमित्यादि, एवमेवेति 
चान्वमोदत प्रजापतिः । 

| नु तल्येऽक्षिपुरुषध्रवणे 


| देदच्छायामिन्द्रोऽगरहीदात्मेतिः 
देदमेष तु॒भिरोचनस्तत्किन्नि- 


मित्तम्‌ । 


छान्दोग्योपनिषत्‌ 


> > > 9 6 ~ > >9 > >> ~ -- <~ ~ 


[ ऋष्यांय ८ 

=> 8 -3- 
इस छयासमदर्शन या दैहास- 
दर्शनम भे फो भोग्य फ़ल नह 
देखता । इस प्रकार देहासदर्घनि ` 


या छायत्मदर्हनमे दोष निश्चय 


कर वे समिताणि हो पुनः ब्रह्मचर्य 
वस्त करनेके स्यि जीर अये। 
उनसे प्रजापतिने कदा-- इन्दर | 
तुम तो विरोचनके साथ शन्तचित्त- 
से च्छेगयेये, अव व्या इच्छा 
करते हए तुम पुनः आयेदहो? 
उन्होने अच्छी तरह जानते हुए 
भी इन्दके अभिपायकटी अभिव्यक्तिके 
लिये [इस भकार] पुनः प्रभक्निया । 
[ सप्तमाध्याये सनत्कुमारजीके ] 
तुम जो कुछ जानते हो उसे बत. 
लते हुए मेरे भति उपन्न हेभो' 
पैसा पूनेपर जिस पकार नारदबीने 
अपना अभिप्राय प्रकट क्रिया था उषी 
भर इन्द्रने "यथेव खद्वयम्‌' इत्यादि 
वाक्यसे अपना अभिप्राय प्रकट किया 
ओर प्रनापतिने “एवभेव, पसा 
कर उसका अनुमोदन किया । 


शङ्ञा-कितु अक्षिपुर्षका समान- 
रूपसे श्रवण करनेपर भी इन्दने 
देहकी छायाको भतम्पसे प्रहण 
किया ओर विरोचनने स्वयं देको 
दी- सो एेसा किस कारणसे हमा { 


लञेण्ड ९ ] 


चाङस्माव्याथं 


८९१ 


>< 28 >@< < >@< 8 ८ 6: < ८ 8८-3८-2८ 8८ 9 < < < 9 9 < 8-< 


तत्र॒ मन्यन्ते यथेन्द्रस्यो- 
दश्चरावादिश्रजापतिवचनं स्मरतो 
देवानप्राप्स्येवाचार्योक्तबुदया 
छायातमग्रहणं तत्र॒ दोषदं 
चाभूत्‌ । न तथा विरोचनस्य, 
कं तिं १ देह एवात्मद्शनं नापि 
तत्र दोषदेनं बभूव तद्वदेव । 
षिग्रहणषामथ्यंप्रतिबन्धदो- 
षान्पत्वबहुत्वापेक्षमिन्द्रविरोच- 
नयोदछायःतमदेहयोगरहणम्‌ । 
इन्द्रोऽन्पदोषत्वादुदृरयत इति 
रुत्यथमेव भदधानतया जग्राि- 
तरश्छायानिभित्तं देहं हित्वा 
भुत्यथं लक्षणया जग्रा प्रजाप- 
तिनोक्तोऽयमिति दोषभूय- 
सत्वात्‌ । यथा किल नीलानील- 


समाधान -हस् विषयमे शिष्टजन 
एेषठा मानते दै- जिस प्रकर 
इन्द्रो प्रजापतिक्रा जल्पात्रादि- 
सम्बन्धी वाक्य स्मरण करते-करते 
देवतकरे पर्त पहुचे बिना दही 
आचार्यक्री वतेलायी हुदै दृष्िसे 
छापासाकरा ब्रहण ओर उसमे दोष- 
दर्शन भी हज; तथा विरोचनकेो 
वैसा नदी हुआ, तो क्या हुआ १ 
--उसकी देम ही लदृष्टि हद 
ओर उसमे कोई दोषदर्चन भी नहीं 
हुआ--उसी प्रकार विधाप्रहण- 


दी सामथ्यंक। प्रतिबन्ध करनेवाले 
दोषकी न्यूनाधिकताकी अयेक्षासे 
इन्द्र॒ ओर विरोचनका यात 
जर देहाससम्बन्धी अहण दै । 
इन्द्रने अ्पदोषयुक्त होनेके कारण 
रद्वा करते इए “दस्यते, इख शुति- . 
के भर्थको ही अहण किया ओर - 
दूसरे ८ विरोचन ) ने दोषकी 
अधिकताके क्षरण श्रत्यर्थको छोड़- 
कर रक्षणासे भ्रबापतिने वेहके 
विषयमे ही का है" इस भकार देह- 
को ही अ्रहण किथा। जिष्च प्रकार 
दर्षणमे दीलनेवले नीर भौर 
अतीर्वणं वश्मि जो नीख है बह 


९९२ 


छन्दौग्योपनिषद्‌ 


>< 9. ऋ 3-८-95 <> 


[ सष्याय ८ 
ऋऋऋ ऋ > ॐ 4 


योरादङेदु्यमानयोर्वा्सोय- | बहुूष्य है इस कथने छाया- 


शीरं तन्महा्मितिच्छायानि- 
मित्तं बास एवोच्यते नच्छाया 
तहदिवि विरोचनाभित्रायः । 
हि 
उब्दार्थावधारणं तुन्येऽपि श्रवणे 


स्ववित्तगुणदोषवशादेषव 


ख्यापितं दाम्यत दत्त दयष्व- 
मिति दकारमात्रशरवणाच्छुस्य- 


न्तरे । निमित्तान्यपि तदनुशु- 
णान्येव सहकारीणि भवन्ति ।२। 


का निमित्तभूत वल ही कहा नाता 
है, छाया नही कही जाती उपी प्रकार 
[प्रज।पतिके | इस कथने देह ही 
विवक्षित है- रेता विरोचनश्च 
अभिप्राय था | एक भन्य श्रुति 
(ब्रह ° अ०५ मे) केवर दकारके 
श्रवणसे तुल्य श्रवण होनेषर भी 
अपने चित्तके गुण-दोषके कारण दही 
(दमन रो, दान करो, द्या फरो" 
दसा विभिन्न शब्दार्थ-ज्ञन देषा 
गया हे । अपने-जपने गुणोके 
अनुकार ही युक्तिरूप निमित्त भी 
सदारी हयो नति दै ॥ २॥ 


एवंमेवेष मघवन्निति होवाचेतं सखेव ते भूयोऽनु- 


व्याख्यास्यामि वसापराणि द्वाचिश्दातं वर्षाणीति स 
हापराणि दवात्रिश्शतं वर्षाण्युवास तस्मे होवाच ॥२॥ 


दे इन्द । यह बात देसी ही है दसा प्रनापतिने कहा, द्र 

मति इसकी पुनः व्याख्या कशा | अब तुम बत्तीस वरष याँ ओर 

रदो ' इन्द्रने वहाँ बत्ती व्ष॑ जर निवास किया । तब प्रजापतिन 
उससे का ॥ २ ॥ र 

एवमेवैष मघवन्स॒म्यक्‌ | दे इन्द्र | यह बात देसी ही दै 


प तुमने म छाया भाला 
स्यावगतं नच्छायातमतयुवाच | ९ ठीक समन्ला दै, 


च | नहीं हे- रेता प्रजापतिने कटा, 
प्रजापियं मयोक्त आतमा प्रकृत। भने द्रे प्रति निस्त 


लच्ड ९ 1 शाडरथाच्याथं ८९३ 
ह ॐ 3 ॐ क 9 ‰~9 ~~ ~ ८ 9 ~~ 9 9 < > 9 
एतमरवात्मानं तु॒ते भूयः पूवं | भातमाक्ना वणन क्या दे, हरे 


ॐ व्याख्या क्रिये हुए उस भात्माी 
व्याख्यातमष्यनुव्याख्यास्यामि। ह 1 (ल्ल 


यस्मात्सकृद्व्याख्यातं दोषरहि- | करूंगा । क्योकि गपि दोषरहित 
। पुर्षोको वह एक बर्‌ व्याख्या 
ठानामवधारणदिषयं प्राप्तमपि | करनेपर ही ज्ञनशन विषय हो नाता 


ना्रदीरतः कनचिदोषेण प्रति- है तथापि तुम उसे रहण नही 
1 £ कर्‌ सके । इषल्यि किसी दोषसे 


बदुरहणसामर््वस्तरमवस्तत्षष-। तुह भरद णशक्ति भतिबदध ह । 
उपकी निदृ्तिके लिये तुम अगृे 


णाय वसापराणि दा्रिशतं वषौ- | वत्तीस व४ यहाँ ओर बहमचर्यवास 
करो ॥ एसा फदकर, रसौ प्रकार 
निवाश्च करनेवाले क्षीणदोष इनसे 
दोषाय तस्मै होवाच ॥ २ ॥ । प्रनप्तिने कदा ॥ ३ ॥ 


णीत्युक्त्वा तथोषितवते क्षपित- 


--: ® :-- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषदयष्टमाध्याये नवंम- 
खण्डमाप्यं सम्पुणेम्‌ ॥ ९ ॥ 


€. -><<त <> > 


दवण ण्य 
ङ्न्द्रके प्रति खप्मुरपका उपदेश 


य आत्मापहतपाप्मादलशक्षणो | नो आमा अपहतपाप्मादि ठक्ष- 


णोबारा है जिसकी “ एषोऽक्षिणि 
ऽक्षिणीःं व्या- 
य॒एषोऽक्षणी्यादिना व्या ह्यादि वाक्यद्रारा व्याख्या की गवी 


ख्यात एष सः । कोऽसौ १ | दै वह यह दहै । वह कोन दै! 


य एष स्वप्ने महीयमानश्चरस्येष आत्मेति होवाच. 
तदमरतमभयमेतदबद्येति स ह दान्तहदयः प्रव्ाज 
स हाप्राप्यंव देवानेतद्धयं ददश तद्यद्यपीद्‌श्शारीर 
मन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि शलाममसखरामो नेवं- 
षोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ १ ॥ 


“जो ह स्वप्नं पूनित होता हुमा विचरता है यह आतमा है 
एसा प्रजापतिने कहा यह अमृत हे, जमय दै जर्‌ यही ब्रह्म है ॥ 
पसा नकर वे ( इन्दर ) शान्तहृदयसे चले गये । किंतु देवतारओंकि पस 
बिना परहैचे ही उन्दं यह भय दिखायी दिया थय्पि यह शरीर अधा 
होता है तो भी वह ८ स्वप्नशरीर ) अनन्ध होता है ओर यदि यह 

म होता दै तो भी बह असाम होता दै। इस प्रकार यह इसके 
दोषसे द्षित नहीं होता ॥ १ ॥ 


यः स्वप्ने महीयमानः स्या- | जो स्वप्न महीयमान-- क्षी 


वित्रा 
दिभिः पूज्यमानशवरत्यनेकवि- | आदिसे पूजित होता हा 

क | अर्थात्‌ मनेक प्रकारके भोगोक्ो 
धान स्वमभोगानयुभवतीत्य्थः। । अनुभव करता दै, वही भातमा दै 





खाण्ड १० ] शाडरमाष्याथे ८९५ . 
ट क = ॐ + क > = क क 9 9८ ~ ८ -9- --- -- - -- - 


एष आत्मेति होवाचेत्यादि | देसा प्रनापतिने कदा इत्यादि शेष 
समानम्‌ । स दैबधुक्त हन््रः | मथ पूववत्‌ है । इस प्रकार फटे 
शान्तहृदयः प्रवन्रा् । स || ननपर वैन शान्तहदयते 


= वदि चे गये | कितु उन्होने देवताओं- 
हात्राप्येव देव वदस्मिन्न- हे 
ध्व ववत के पास बिना पर्वे ही इस आसमामे 


¢ 
प्यात्मनि मयं ददश । कथम्‌ १ | भी यह भय देल । क्या देखा १- 


तदिदं शरीरं यद्यप्यन्धं भवति | ययपि यह शरीर अंघा हो तो 
लभरातमा योऽनन्धः स भवति। भी जो स्वप्नशरीर है वह शनन्ध 
होता है ओर यदि यह शरीर साम 


यदि साममिदं शरीरमस्तामथ हो सो भी वह साम नहीं होता । 
स भवति नैवैष स्वभात्मास्य | इस प्रकार यह स्वप्नरारीर इस चरीर- 
देहस्य दोपेण दुष्यति ॥ १ ॥ | के दोपते दूषित नदीं होता' ॥१॥ 


कक 9- - 

न वघेनास्य हन्यते नास्य खाम्येण खामो घ्नन्ति 
त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव 
नाहमच्र भोग्यं पदयामोति ॥ २ ॥ 

“यह्‌ इस देहके वधसे नष्ट भी नदीं होता ओर न इसकी स्रामतासे 
जाम होता है । तु इसे मानो को$ मारत हो, कोई ताडित कता हो, 
यह्‌ मानो अग्रियवे्ता हो जोर रुदन करता होप हो नाता दै; अतः 
इसमे (इष भकारके आसदशंनमे) मँ कोई फर नदीं देखता' ॥ २॥ 

स समिरपाणिः पुनरेयाय तरह प्रजापतिरुवाच 
मघवन्यच्छान्तहद्यः प्रा्ाजीः किमिच्छन्पुनरागम 
इति स॒ होवाच तव्यदपीदं भगवः शरीरमन्धं भव- 
त्यनन्धः स॒ भवति यदि खाममसखरामो नेवेषोऽस्य 


दोषेण दुष्यति ॥ ३ ॥ 


८९६ छान्वोण्योपनिषल्‌ [ गण्याय ८ 


~ ¬ ८ 2 ¬ 9-8८-9८ 8 > [9-9८-8 9 ~ क ॐ 7 3 >. 
न वधेनास्य हन्यते नास्य खाग्येण सामो घ्नन्ति 
खेवेनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवस्यपि रोदितीव 
नाहमत्र भोग्यं पदयामीत्येवमेवेष मघवन्निति होवा- 
चैतं तेव ते भूयोऽनुग्याख्यास्यामि वसापराणि 
दवात्रि्शतं वर्षाणीति स हापराणि द्रािश्शतं वषा. 
ण्युवास तस्मे होवाच ॥ ४ ॥ 

[अतः] वे समित्पाणि होकर फिर [परजापतिके पास] जाये । उनसे 
प्रनापतिने कदा-- न्द्र | त॒म तो शान्तचित्त होकर गये ये भव ढि 
इच्छसे पुनः आये हो * उन्होने कहा-- "भगवन्‌ £ यदपि यह शरीर 
अंघाश्ेता है तो भी वह ( स्वप्नरारीर ) अनन्ध रहता दै, गौर य 
सामहोता है तो भी वह लाम रहता है; इस प्रकार वह इसके 
दोषसे दूषित नही होता ॥३॥ न इसके वधसे उसका वध होता है भौर 
न इसकी स्तामतासे वह साम होता है; श्गितु उसे मानो को$ मारते श, 
कोई ताडित करते हों ओर [ उसके कारण ] भानो वह॒ भप्ियवै्ा 
हो ओर रुदन करता हो-[ देखा अनुभव होनेके कारण ] इसमे 
कोई फरु नहीं देखता । तव प्रनापतिने कटा-- न्द्र | यह्‌ बात 
देसी ही है, मे तुम्हारे इस ( आत्मतत्व ) की पुनः व्याख्या कग, 


तम बतीस वषं ओर ब्रहचर्यवास करो । इन्द्रने वँ बत्तीस वं भौर 
निवास किया; तव उनसे प्रनापतिने कहा- ॥ ४ ॥ 


नाप्यस्य वधेन स हन्यते | नतो छायासाके समान 
देहके नासे उस ८ स्वप्नशरीर 

| टी होता है जोर न इसकी 

` सरामः स्वप्नात्मा मवति । यद्‌- | खामतासे वह स्चाम होता है । इ 

न्यायादावागममात्रेणोपन्यस्त अध्यायके भरम्भ्मे नो कष श्ल 

ए † र ् ५ ^ ममाणसे कहा गया है कि सकी 

नास्य जरयतजीय॑तीत्यादि, | नरावस्थासे वह जी्ण॑नदीं हेत! 


' | 


` तदिह 


खण्ड १९ ] 


दा ङ्रभाण्वा्थं, 


८९७ 


2 9 9 9 0 5 5 > 5 9 5 5 5 3 9 > 1 


न्यस्तम्‌ । 
न तावदयं गयारमवदह- 


दोषयुक्तः, किन्तु ध्नन्ति स्वव 


. नम्‌ । एवशब्द्‌ इवाथ । ्नन्ती- | ६। 


वैनं केचनेतिं द्रष्टव्यम्‌, न तु | 


ल्यायेनोपपादयितुभुप- ¦ इत्यादि, उसीका न्यायतः उपपादन 


करनेके ल्यि यहाँ उल्लेख किया 


| गया है । 


[ इस प्रकार ] यष ॒छायास्राके 
समान देहके दोषो तो युक्त नहीं 
षै; क्तु इसे मानो को मारते 
“ध्नन्ति स्वेव' इत पदम ] 
एव' शब्द (वः भर्म है; भतः 
हसक्षा मानो इसे कोई मारते है" यही 
भाव समक्षना चाहिये, मारते ही 


ध्नन्स्येवेति, उत्तरेषु सर्वेष्विव- | टै पेखा नहीं समश्ना चाहिये 


शब्दद्शनात्‌ । 


-नास्य वधेन हन्यत इति 


। विश्ेषणाद्‌ष्नन्ति स्वेवेति चेत्‌ ! 


नैवम्‌ , प्रजापतिं प्रमाणीडुवतो- 


। . ऽसतवादित्वापादनानुपपत्तेः । 


“एतदग्रतम्‌” इत्येतस्रजापति- 
वचनं कथं मृषा इरयादिनदरस्तं 


प्रमाणीडवंन्‌ । 


कर्योकिं उत्तरवर्तीं सव वाक्यम 
हवः शब्द दी देखा जाता है । 


यदि कहो किं यह्‌ इस ( स्थूर 
शरीर ) फा नाञ्च होनेसे न्ट नदीं 
होता! एेसा विशेषण होनेके कारण 
द्से कोई मारते ही है" यही घर्थ 
समञ्लना चाहिये तो रसा कहना 
ठीक नही, कर्माकि प्रनापतिको 
प्रामाणिक माननेवाल व्यक्तिके शये 
उनपर्‌ मिथ्यावादिखका भारोप करना 
सम्भव नहीं है । भल, प्रनापतिको 
प्रामाणिक माननेवाख इन्द्र उनके 
श्यह॒ अमृत दहै इस वचनो 
मिथ्या कैसे कर सकता है । 


८९८ 


छान्दोम्योयनिषत्‌ 


[ अच्याय ८ 


>9 > ~ ~ 8 ~ ~ ~ > > ~ > > > 9८ 5८ > 2 3 5 ॐ ` 


नदुच्छायापुरुषे प्रजापति- 
 नोक्ते अस्य शरस्य नाशमन्वेष 
नश्यति इति दोपमभ्यदधात्‌, 
तथेहापि स्यात्‌ । 


नेवम्‌ ; कस्मात्‌ १ “य एषो- 
ऽक्षिणि पूरुषो दृश्यते इति 
नच्छायात्म प्रजापतिनोक्त इति 
मन्यते मघवान्‌ । कथम्‌ १ अषप- 
हतपाप्मादिलक्षणे पृष्टे यदि- 
च्छायारमा प्रजापतिनोक्त इति 
मन्यते तदा कथं प्रजापतिं 
प्रमाणीकृत्य पुनः श्रवणाय 
 समित्पाणिगेच्छेत्‌ १ जगाम 
च । तस्मान्च्छायात्मा प्रजा- 
पतिनोक्त इति मन्यते । तथा 


च॒ व्याख्यातम्‌- द्र्टाक्षिगि 
दृश्यत इति । | 
तथा चिच्छादयन्तीव विद्रा 


. बयन्तीव, तथा च पत्रादिमरण- 


शङ्का-्ितु प्रज।पतिके बताये 
हुए छायापुरूषमें तो [इन््रने] शरीर. 
का नाश होनेके पश्चात्‌ यह भी नष्ट 
हो जाता हैः ेसा दोष दिखलया 
था; उसी प्रकर यँ भी हो 
सकता है । 


समाधान-यदह बात नही दै; 
छसे नही है? क्योकि हनो 
नेत्रम पुरूष दिखायी देता ह" इष 
वाक्यसे प्रजापतिने शयात्मका 
निहूपण नही श्रिया- रेषा इन्र 
मानते है । किस प्रकार ?-- यदि 
वे एेसा मानते कि अपहतपाभादि 
लक्षणवाले आत्माके विषयमे पढे 
जानेपर प्रजापतिने छायासा बता 
है तो प्रनापतिक्ो प्रामाणिक मानकर 
भीवेश्रवण करनेके लिय धनः ¦ 
समित्पाणि होकर . उनके पात क्यो 
जाते १ घौर गये थे ही । इतस | 
वे यदी मानते; येकि प्रजापतिं | 
छयात्माका वणन नही क्रिया । तथा 
हमने भी “जो दरष्टा नेत्रम दिलाधी 
देता है" रेसी ही व्यास्या की 8 । 

तथा मानो इसे कोई विच्छदित- 
विद्रावितं ( तादित) करे 
ओर इसी प्रकार पुतरादि-मरणके 


खण्ड १० | शाङरभाष्याथं ८९९ 
> 8 >86 8८ ®: डः इः 9८ 9: -9८ < ह: ~ 5 ८ ~: -5८ 8८ > ८ < ८ 9-2-४9 
निमित्तमप्रियवेत्तेव भवति कारण मानो वह अपि अनुभव 


अपि च स्वयमपि रोदि- | करनेषाा होता है तथा वह स्वयं 





प््च्व््य 


तीव । 
नन्वप्रियं वेत्येव कथं वेत्ते- 


वेति उच्यते ? 
न; अमृतामयत्ववचनायुष- 


पत्तेः। “ध्यायतीव” ८ चर 


उ०४।२३।७) इति च 


श्रुत्यन्तरात्‌ । 
ननु प्रत्यक्षविरोध इति 
चेत्‌ १ 


न; शरीरात्मतवग्रत्यक्षव- 


दइान्तिसम्भवात्‌ । 
तिष्टतु तावदग्रियवेत्तेव न 


वेति; नाहमत्र भोग्यं पर्यामि। 


स्व्राटपततानेऽपीष्ट शलं नोपरम 


इत्यभिप्रायः । 
एवमेवेष 


. दक्रा° उ र ९ ---- 


तवाभिप्रायेणेति 


भी मानो रोता है। 

रङ्क--र्ितु वह तो अप्रिय 
जानता ही है, फिर उसे भानो 
अप्रिथ जाननेवाख हो रेसा क्यों 
कहा नाता दै १ 

समाधान-एेसा कहना ठीक 
नही, क्योकि इससे उक्षका भग्रतत्व 
ओर अभयघपरतिपादन अनुपपन्न 
होगा तथा “मानो ध्यान करता है" 
देसी एक दूसरी श्रुति भी है। 

शङ्का- कितु एसा माननेसे तो 
प्क्ष अनुभवसे विरोध आता है। 

समाघान- नही, क्योकि शरीर 
ही आत्मा है इस प्रक्ष अनुभवके 
समान यह ( अप्रियवेदनादि) भी 
आन्तिजनित हे । 

वह मानो अप्रियवेत्त हो अथवा 
नहो, यह बात अलग रहै, मुञ्चे 
इसमे कोई मोग्य ८ फर ) दिखायी 
नहीं देता । तात्य यह दै कि 
स्वप्नशरीरको आत्मा माननम मी 
सुसे इच्छित फर प्राप्त नदी होता। 


(प्रजापतिने कदा-] साका 
असूत ओर अभय गुणवान्‌ होना 


९.०० 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अच्याय < 


>& -9: >8: >ढ ¬ > ~ ¬> >8 >; 2: > ऋ 95 >. >. 6 ¬< ~ 0 9-88-9 ~ 


वाक्यशेषः । आस्मनोऽगरता- 


भयगुणवष्छस्याभिग्रेततवात्‌ । 
दविरुकमपि न्यायतो भया 


यथावन्नावधारयतिः; तस्मासपूबं- 
वदस्याघ्ापि प्रतिबन्धकारणम- 
स्तीति मन्वानस्तरक्षपणाय 
वसापराणि दात्रिंशतं वर्षाणि 
बरह्मचर्यमित्यादिदेश प्रजापतिः। 
तथोषितवते क्षपितकल्मषायाह 
| २-४७ ॥ 


जभीष्ट है, भतः तुम्हारे भमिपरायके 
अनुसार यह बात पेसी ही है ।# 
यँ “एवमेवेष' इससे धागे 'तवाभि- 
परायेणः यह वाक्यदोष है । 

फ्रि रेस समक्षकर्‌ छि भिरे 
दो वार्‌ युक्तिपूर्वक बतकनेपर भी 
यह रटीक-ठीक नष्टौ समश्षता, 
दइस्षस्यि पहलेकी भोति अवभी 
इसमे प्रतिबन्धका कारण विद्यमान 
है" प्रलापतिने उसकी निष्के 
स्यि इन्द्रको “बत्तीस वषं घौर 
ब्रह्मचर्थवास करो- एसी भाज्ञा 
दी । इस प्रकार ब्रह्मचयंवास करके 
्षीणदोषर हए इन्द्रसे प्रजापतिने 
कहा ॥ २-४ ॥ 


[ग ६ © प णै 


इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यषटमाध्याये वशामल्ण्ड- 
भाष्यं सस्पुणेम्‌ ॥ १० ॥ 


3 1 





$ यरा स्वप्नरारीरो आत्मा माननेमे षरसवुतः फो छाम नश है । 


~ 








एक द्व्छ सर 
--- [1 ~~ 

सुषुप्त पुहषका उपदेश 

ूववदेतं स्वेव त हत्यायु- | पूर्ववत्‌ भ तरे प्रि इसकी [पुनः 
क्त्वा- व्याख्या कङ्गा] एसा कहकर्‌-- 

तयत्रेतत्‌ सुतः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न 
विजानाव्येष आत्मेति होवाचेतदम्रतमभयमेतद ब्रह्मेति 
स ह शान्तहृदयः प्रवत्राज स हाप्राप्येव देषानेतद्धयं 
ददी नाह खस्वयमेवश्सम्प्रतयासमानं जानात्ययमहम- 
स्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति 

नाहमत्र भोग्यं पदयामीति ॥ १ ॥ 

“निस भवस्थामे यह सोया हआ। दरहनदृपिसे रहित भौर सम्यक्‌ 
हूपसे भानन्दित हो स्वप्नका अनुभव नहीं करता वह आत्मा है'-एेसा 
भरनापतिने कहा "यह अमृत दै, यह अमथ है जर यही ब्रह्म है ।' यह 
सुनकर इन्द्र॒ शान्तचित्तसे चरे गये; तु देवताभकि पास प्च बिना 
ही उन यह भय दि्लायी दिया- “उस अवस्थे तो इसे निश्चय ही 
यह्‌ भी ज्ञान नदीं होता कि चह में ह ओर न यह इन अन्य भूरतोको 
ही जानता दै; उस समय तो यह मानो विनायको प्रप्त हो जाता हे। 
इसमे सु इष्टफरु दिखायी नहीं देताः ॥ १ ॥ 

तद्यत्रेतस्सुप्च इत्यादि व्या- | तव्रैत्‌ सुप्तः इत्यादि वाक्यकरी 
व्याख्या पहले हो चुकी है । नो 
रुयातं वाक्यम्‌ । अक्षिणि यो । नेत्रस्य द्रष्टा सवप्नम पूनित होता 


८ 


छान्दोग्धोपनिषद्‌ 


[ अध्याय ८ 


8 9 ¬< 9८ 9८ > ¬: 8 ८ 8८ +< >8~ 3 >^ -6< >< >< 8 3 + 2 < -8 8८ -8- 


द्रष्टा स्वप्ने च मदीयमानश्चरति 
स एष सुप्रः समस्तः सम्प्रसन्नः 
स्वप्नं न विजानात्येष आस्मेति 
होवाचैतदभृतमभयमेतद्रसेति 


स्वामिप्रेतमेव । 
मघवांस्तत्रापि दोषं ददश | 
कथम्‌ १ नाह नैव सुपुपरस्थोऽप्या- 
त्मा खन्वयं सम्प्रति सम्यगि- 
दानीं चात्मानं जानाति नेवं 
जानाति । कथम्‌ १ अयमहम- 
स्मीति नो एवेमानि भूतानि 
चेति, यथा जाग्रति स्वप्ने वा। 
अतो विनाश्चमेव विनाञ्चमिवेति 
ूेवदूदरष्टव्यम्‌ । अपीतोऽपिगतो 
भवति विनष्ट इव भवतीत्य- 
भिप्रायः । 
जञाने हि सति ज्ञातुः सद्धा- 
बोऽवगम्यते नासति ज्ञाने । न 
च सुषुप्तस्य ज्ञानं दृश्यतेऽतो 
विनष्ट इवेत्यभिप्रायः । नतु 


। हुआ विचरता है, व्ह जब सो 
जनेपर दरशनवृ्तिसे रदित चर 
| अच्यन्त आनन्दित होकर स्वप्न नहीं 
देखता तो वहो आसा है यह्‌ अभृत 
ओर्‌ अमय है ओर यही ब दै' 
इस प्रकार प्रजापरतिने अपने 
अभिप्रायके अनुसार ही आसिका 
स्वरूप बतराया । 
किंतु इन्द्रने उस्म भी दोष देवा | 
सो किस प्रकार ?-- "यह सुषुपस्थ 
आत्मा भी इस्त अवस्थामं निश्चय ही 
अपनेको इस प्रकार नहीं जानता ॥' 
किस प्रकार नहीं जानता !-- कि 
भे यहर्हं जौरन यह भन्य 
मृतोको ही जनता दै; जैषाकि 
यह्‌ जाग्रत्‌ ओर स्वप्न अवस्थां 
जानताथा। अतः यह मानो 
विनाशो अपीत-- प्राप्त हो जता 
ह; तात्पयं यह दै कि विनष्ट-सा 
हो जाता दै । यहाँ पू्ैवत्‌ ।विना- 
समेव के स्थानम विनाशमिव। 
ेसा समक्चना चाहिये । 
ज्ञान होनेपर ही ज्ञाताकी सत्ता 
जानी जाती है, ज्ञानके अभावमें नर 
जानी जाती; ओर घुपुप्त पुरुपकरो 
ज्ञान होना देखा नहीं जाता । यतः 
तात्पयं यह है कि उप्त समय यह 
नष्ट-सा हो जाता दै । भृत भर 


खण्ड ११ ] श्ाङ्करभाष्याथं ९०३ 
~~~ ८ 8 ¬ ॐ ८ 9 9८ ८ 9८ 9 ८ < ८ अ ¬ ~ 


विनाशमेतार्मनो मन्यतेऽमर- । अमयवचनका प्रामाण्य चाहनेवाले 
दन्द्रदेव उस अवस्थामे भआत्मा- 
का साक्षात्‌ विनाश दही नहीं 
मानते ॥ १ ॥ 

स समित्पाणिः पुनरेयाय तश्ह प्रजापतिरुवाच 
मघवन्यच्छान्तहदयः प्रा्ाजीः किमिच्छन्पुनरागम 
इति स होवाच नाह खल्वयं भगव एवसम्प्रत्या- 
त्मानं जानाव्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि 
विनाशमेवापोतो भवति नाहमत्र भोग्यं पदयामति॥२॥ 


बे समिलाणि होकर पुनः प्रजापतिके पात आये । उनसे प्रनपतिने 
कहा- “इन्द्र | तुम तो शान्तचित्तसे गये थे, अव क्स इच्छासे तुम्हारा 
पुनः जागमन हुभा दै ।' इन्द्रे कदा--*भगवन्‌ | इस अवस्था तो 
निश्चय ही इसे यह भी ज्ञानं नदीं होता कि थह मेँ ओर न यह इन 
जन्य मूरतोको ही जानता दै, यह ॒विनाश्को प्रा्तसा हदो नता है। 
इसमे स्॒ञे इष्टफर दिायी नदीं देता! ॥ २ ॥ 

--: # :- 

पूववत्‌ -- । पहलेदीके समान-- 


एवमेवेष मघवन्निति होवाचेतं वेव ते भूयोऽ 
नुष्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रेतस्माद्वलापराणि पञ्च 
वर्षाणीति स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास तान्येकडात 
सम्पेदुरेतत्तद्यदाहुरेकशतःह वे वर्षाणि मघवान्धरजा- 
पतो बह्मचर्थसुवास तस्मे होवाच ॥ ३ ॥ 


तामयवचनस्य प्रामाण्यमि- 





च्छन्‌ ॥ १ ॥ 


९.०७ छाण्ेव्लोकनिचद्‌ [ अच्थाय 


मव 5-88-8 
हे इन्द्र | यह बात देसौ दी रेस भनापतिने कहा श 
तहरे मरति इसकी पुनः व्याल्या कग । जसा इससे भिर नही 
है। अभी पोच वषं घौर ब्रह्मचर्यवास्र करो । उन्होने पोच वषं घोर 
वहीं निवास क्रिया | ये सव मिराफ़र एक सौ एक वषै हो गये। हसीसे 
देता कहते दै कि इन्द्रे प्रनापतिके य्ह एकं सौ एक वष ब्रहमचर्थवास 


किया । तब उनसे प्रजापतिने कहा ॥ ३ ॥ 


एवमेवेत्युक्त्वा यो मयोक्त- 


स्िभिः पर्पायेस्तमेवेतं नो एवा- 


न्यत्रेतस्मादात्मनोऽन्यं कश्चन 
कि तर्घेतमेव व्याख्यास्यामि । 
स्वल्पस्तु दोपस्तवावशिष्टस्त- 
रक्षपणाय वसापराण्यन्यानि 
पश्च वर्षाणीत्युक्तः स॒ तथा 
चकार । तस्मे सदितकषायादि- 
दोषाय स्थानत्रयदोषसम्बन्ध- 
रहितमातमनः स्वरूपमपषत- 


पाप्मतवादिरक्षणं मघवते तस्ते 
होवाच । 

तान्येकशतं वर्षाणि सम्पेदुः 
सम्पन्नानि बभूवुः । यदाहुछो के 


यह बात एसीदीदै रेस 
कहकर श्वैने तीन पर्ययम जिसका 
वर्णेन करिया था उक्ती इस भासा- 
फी-इस अआत्मासे भिन्न किसी 
अन्यथ आत्माकी नही, तो किकी ! 
इसी आस्माकी भ व्याख्या कग । 
अभी तुम्हारा थोष्टासा दोष क्ष 
है । उद्धकी निवृक्तिके लिये भन्य 
पाच वर्षं जर रहो एसा फटे 
जानेपर इन्दरने वैसा ही क्किया। 
इस प्र्ठार जिनके कवायादि दोष 
नष्ट हो गये है उन ईन्द्रदेवके 
परति प्रनापतिने जाप्रदादि तीनों 
स्थानेकि दोषोकि सम्बन्धे रहित 
आत्माका अपहतपाणत्वादि रक्षण- 
वाख स्वप्‌ निरूपण किया । 

वे सन एक शोर सौ बर्हो गये । 
इसीसे लोकम शिष्टनन एेसा कहते 


शण्ड ११] शाङ्कर्वाप्यार्थं ९०५ ` 
9 25 = + + = ॐ 4) > = = ॐ =. ॐ = = = => => 4 


शिष्टा एकशतं ह वै वर्षाणि | हैकि इन्दने परनापतिके यहां 
एक सौ एक व॒र्षं ब्रहमचर्यवास 
क्रिया| यह बात द्रात 
सेति । तदेतदुदरात्रिशतमित्या- | इत्यादि वाक्योसे कदी गयी ै, 
खतः श्रुतिने भाख्यायिकासे कुछ 
हटकर इसे स्वयं भी कह दिया 
तोऽपदत्य॒भरुत्योच्यते । एवं | दै । इ प्रकार जो इन्द्रवसे भी 
गुरुतर दै पसे इस भआतमज्ञानफो 
इन्द्रने भी एकं सौ एक वर्तक 
्द्रेणापि महता यत्नेनैकोत्तरव- | करिये हए परिश्रमसे बढ़े यलपूर्वक 
पर्त किया था, अतः इससे बढ़कर 
ओर कोई पुरुषां नहीं है--इस 
मतो नातः परं पुरुपार्थान्तरम- । परकर श्रुति आस्ञा्ी स्वति 


स्तीरयात्मज्ञानं स्तौति ॥ ३ ॥ । करती है॥२॥ 


मघवान्‌ प्रजापतौ बरह्मचयंभुवा- 


दिना दरितमित्याख्यायिका- 


किटेतदिन्द्रत्वादपि गुरूतरमि- 


षरतकृतायासेन प्राप्तमासमहान- 


इतिछदोण्यो परिषयष्टमाध्याे पकादत्राखण्ड- ` 
भाष्यं सम्पणम्‌ ॥ ११॥ 


ददत इकर 


मर््य्॑ञरीर आदिकरा उपदेश्च 
मघवन्मर्स्य वा इद <दरीरमात्तं श्त्युना तदस्या- 
श्रतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानताच्तो वे स्षशरीरः प्रिया- 
प्रियाभ्यां न ह वै सशरीरस्थ सखतः भ्रियापिययोरपहति. 
रस्त्यशरीरं वाव सन्तं न भ्रियाभ्रिये स्वृद्ातः॥ १ ॥ 


हे इन्दर | यह शरीर मरणशीर ही है; य मृयुसे प्रस्त है । थह 
इस अमृत, अशरीरी आत्माका अधिष्ठान है । सशरीर आत्मां निरुचय ही 
प्रिय जीर अप्रियसे प्रस्त है; सशरीर रहते इए इसके प्रियापरियका नाच 
नहीं हो सकता ओर अशरीर होनेपर इसे प्रिय जौर अपिय स्पशं नही 


कर सकते ॥ १ ॥ 
मघवन्मत्यं बै मरणधमीदं 


शरीरम्‌ । यन्मन्यसेऽक्ष्याधारा- 
दिलक्षणः सम्परसादरक्षण आतमा 


मयोक्तो विनाशमेवापीतो मव- 
तीति । श्रृणु तत्र कारणम्‌ । 
यदिदं शरीरं वै यत्पयसि तदेत- 
न्मत्यं विनाशचि । तचत्तं मृत्युना 
ग्रस्तं सततमेव । कदाचिदेव 


प्रियत इति म्य॑मित्युक्ते न तथा 


दे इन्द्र | यह शरीर निश्वय 
ही मत्यं-मरणषमीं है । त॒म जो 
दसा समक्षते हो कि मेरा बतखया 
इञ नेत्रादिका आधारभूत सम्पसाद्‌- 
खूप आला] विनायको ही प्रघ हो 
जाता है, सो उसका कारण छुनो। 
त॒म जो यह शरीर देते ही 
वहं यह शरीर म्त्य--नाशवान्‌ 
है- यद मल्युसे आत्त भर््रत्‌ 
सर्वदा ही भ्रस्त दै । कभी-कभी ही 


मरता दै, इसट्यि .यह मत्यं है-- 
पसा कहनेपर इतना भय ॒नरदी 


खण्ड १९ ] 


शाद्करमाष्याथं 


९०७ 


9 9 क 9 क 9 5 3 > क. > > + + = ॐ 4 


संत्रासो भवति यथा 
सदा व्याप्नमेव मृत्यनेत्युक्त इति 
वैराभ्याथं विशेष इत्युज्यत आत्तं 
सल्युनेति । कथं नाम्‌ देहाभि- 
मानतो बिस्कः सन्निवतंत इति। 
शरीरमप्यत्र सदैन्द्रियमनोभिरु- 
च्यते । 

तच्छरीरमस्य सम्प्रसादस्य 
त्रिस्थानतया गम्यमानस्यागर 


मरणादिदेदेन्द्रियमनोधमेवनित- 
स्यत्येतत्‌ । अमूृतस्येत्यनेनेवाश्च- 
शीरत्वे सिद्धे पुनरञ्ररीरस्येति 


वचनं वाय्वादिवत्सावयवत्वमू- 


तिमस्वे मा भूतामिति । आत्मनो 


भोगाधिष्ठानम्‌ । आत्मनो वा सत 


इष्षितस्तजोऽबन्नाविक्रमेणात- 





होता जितना कि भ्ृद्युसे भ्रस्त 
अर्थात्‌ सवदा व्याघ्र ही दै एसा 
कहनेपर होता दै । अतः वेराग्यके 
सख्यि विरोषूपसे कहनेके स्यि यह्‌ 
कहा गया है कि यह मृदयुसे व्याप्त 
दै; जिससे कि किसी-न-किसी 
तरह यह ॒देहाभिमानसे विरक्त 
होकर निवृत्तिपरायण हो जाप । 
यहाँ शरीर भी इन्द्रिय ओर मनके 
सदित कदा गया है । 

वह शरीर जाग्रदादि तीन 
स्थानके सम्बन्धसे विदित होनेवारे 
इस अग्रत-देह, इन्द्रिय नौर 
मनके मरणादि-धमेसि रहित 
सम्प्रादका [ अषिष्ठन दहै] । 
आत्माका अशरीर तो अमृतस्य 
इस प्दसे ही सिद्ध होता है; कितु 
फिर भी अशरीरस्य रपेसा जो 
कहा गया है बह इसल्यि है फि 
वायु आदिके समान आत्माके 
सावयवत्व ओर अमूर्तिमत्वका 
प्रसंग न दहो जाय । उस आत्माका 
यह मोगाधिष्ठान दै । अथवा 
आत्मासे-- ईक्षण करनेवारे सत्‌- 
से तेन, अप्‌ भौर अन्नादि 
क्रमसे उत्पन्न हुआ “अधि- 
यान ८ उस अपने उत्पादक 


समयिषठानम्‌ । जीवस्पेणप्रिरय फी उपरन्पहा भविक ) है 


छन्दोश्योपनिषद्‌ 


[ सष्याथ ८ 


न 98 क्ट द श्ट "वद ~ ट 


९०८ 
सदेवाधितिष्ठत्यस्मिन्निति वाधि- 
हानम्‌ । 

यस्येदमीदृशं नित्यमेव 


मृतयुग्रस्तं धर्माधरमजनितत्वासि 
याप्रियवदधिष्ठानं तदधिष्ठितस्त- 
हान्‌ सशरीरो भवति । भक्नरीर- 
स्वभावस्यात्मनस्तदेवाहं शरीरं 
शरीरमेव चाहमित्यविवेकात्म- 
भावः सश्चरीरत्वमत एव 
सशरीरःसन्नात्तो ग्रस्तः प्रियाप्नि- 
याभ्यां प्रसिद्धमेतत्‌ । 
तस्यचन ह वै स्चरीरस्य 
सतः प्रियाप्रिययोर्बाश्षविषयसं- 


योगवियोगनिमित्तयोर्बा्यविष 
संयोगवियोगौ ममेति मन्य- 
मानस्यापहतिर्विनाश उच्छेद्‌ः 
संततिरूपयोनास्तीति । तं पुनं 

रस्वरूपविज्ञानेन 
निविताविबेकजानमश्नरोरं सन्तं 


प्रियाप्रिये न स्पृशतः । स्पृशः 


या [ यों समञ्ञो क्षि ] इसमे जीव- 
रूपमे प्रवेश करके सत्‌ ही णयिष्ठित 
है, इसल्यि यह मिष्ठान ष । 
जिसका यह इसत प्रकारका 
अधिष्ठान सदा ही परद्युप्रम्त भौर 
धर्माधमंजनित होनेके कारण 
प्रियाप्रियवान्‌ है उसमे अधिष्ठित 
हमा उससे युक्त यष्ट आत्मा 
'सञ्चरीर' है । अंशरीरस्वभाव जो 
आमा है उसका वह भ ही शरीर 
ओर शरीर हो दहै" पसा 
अविवेकातमभाव दी सश्चरीरत है । 
इसीसे सशरीर रहते हुए यह प्रि 
ओर भप्रियसे आत्त-- ग्रस्त रहता 
है--यह बात भ्सिद्ध है । 
बाह्य विषरयोके संयोग ओर 
वियोग मेरे है-- एसा माननेवलि 
उस सशरीर रषके बाह्य विष्योकि 
संयोग-वियोगसे होनेवाठे प्रवाहष्प 
परिय मौर अप्रियकी अपति नही 
होती अर्थात्‌ उनका विनाश धानी 
उच्छेद नहीं होता । देहाभिमाने 
उटकर अशरीरस्वरूप विज्ञानके द्वारा 
जिसका विवेकज्ञान निवृत्त हो 
गया है पसे उस अशरीरमूत 
भात्माको प्रिय जीर अप्रिय स्प 
नही करते । शशः इस घातुसे 
प्रिय ओर्‌ अप्रिय प्रतयेकका सम्बन्ध 


खण्ड १२ ] 


हाह्रथाष्याथं 


९.०९ 


39 9 9 2 59 अ >> > 5 5 ऊ 2 5 5 ॐ 9 > ॐ 4 


रत्येकं सम्बध्यत इति म्रियं 
म्‌ सषृशत्यप्नियं न स्पृशतीति 
वाक्यद्टयं मवति । न म्लच्छा- 
सुव्यधारभिकैः सद सम्भषितेवि 
यद्वत्‌ । धर्माधमेकाय हि ते, 
अशरीरता तु स्वरूपमिति तत्र 


धरमधि्मयोरसम्भवात्तत्काय॑भावो 
दूरत एवेत्यतो न प्रियाभ्रिे 


स्पृशतः । 
नलु यदि प्रियमप्यशरीरं न 


है; इसलिये प्रिय स्पशं नही करत, 
सप्रिय स्पशं नही करता ये दो 
वाक्य होते है, निस प्रकार कि 
'्टेच्छ, शपवित्र घौर भार्म 
परुषोसे सम्भाषण न करे" इस 
वाक्यम सम्भाषणः करियाक्षा 
गछेच्छादि प्रत्येक पदसे सम्बन्ध है । 
वे ८ प्रिय नौर भमिय ) पर्माषमेके 
हयै फायं है, कितु शदारीरता 
तो आतलाका स्वरूप है । शतः 
उसमे धर्माधर्मका जमाव होनेके 
कारण उनके कायं ( प्रियाप्रिय ) 
मीदृर्‌ ही रंगे; -इसीसे उसे 
परिय लर शप्रिय स्पशे नही 
रते । 

शङ्ञा--कितु यदि अशरीर 


परियस्यरंधति- स्पृशतीति यन्मघ | आात्माको प्रि भी स्पशं नहीं करता 


इन्द्रने जो कहाथा कि 


४ तो 
चेषे दूषणम्‌ वतोक्तं सुपुप्स्थो धुषुिमे स्थित हुमा परुष विनाशको 
विनाशमेवापीतो भवतीति तदेवे- | दी भा हो जाता दै" वही बात 


हाप्यापननम्‌ । “य 
रेष दोषः; धर्माधमंकाययोः 


उक्तदोषपरिः शररीरसम्बन्धिनोः 
क्षरः श्रिया्रिययोः भ्रति 
देधस्य विवक्षितत्वाद्‌ । अशरीरं 


यहाँ भी भप्त हो जाती दै । 
समाधान--यह दोष नही हो 

सकता, क्योकि यहं षर्माधमेके 

कार्यमूत शरीरसम्बन्धी प्रियाप्रियका 


परतिषेष निरूपण करना इष्ट है । 
अर्थात्‌ भदारीरको भ्रियापरिय स्पश 


९१० 


ऋर्दीग्योपनिषषू 


| ब्रध्याघ ८ 


= =< ~ ~~ = 28 96 ~ श ~ त ¬ श ऋ > 5 ड क 9 ~ ~ ($ 


न॒ प्रियाप्रिये स्प्र्नत इति। 
आगमापायिनो स्पशश्ब्दो 

^ ¢ ५ 
दृष्टो यथा शीतस्पकं उष्णस्परं 
इति । न॒ तग्नेरुष्णप्रकाश्योः 


स्वभावभूतयोरप्निना स्पशे इति 
मवति । तथाग्नेः सवितुर 


ष्णप्रकाशवरस्वरू पभूतस्यानन्दस्य 
प्रियस्यापि नेह प्रतिषेधः““वित्तान- 


मानन्दं ब्रहम" ( ब° उ० ३।९। 
२८ ) “आनन्दो ब्रह्म” ( तै 
उ०२।8। १) इत्यादिश्र- 
तिभ्यः । इहापि भूमेव सुखमि- 
त्युक्तसात्‌। 

नतु भूम्नः प्रियस्यैकत्वेऽसं- 
इन्रभिमतात्म वेद्यत्वात्‌ स्वरूपेणेव 


स्वल्पदशनम्‌ वा नित्यसंवेद्- 


सवान्निविशेपतेति नेन्द्रस्य तदिष्टम्‌ 


नाह खल्वयं सम्प्रत्यात्मानं 
आनात्ययमहमस्मीति नो एवे- 
मानि भूतानि विनाशमेवापीतो 
भवति । नाहमत्र मोग्यं पश्यामि 


, नदीं करते । स्प शब्दा 

प्र्ोग आगमापायी विषर्योके ल्यि 
| दी देखा गया है; जैते- शीतस्य. 
उष्णप्पशं दइयादि । अग्नि 
स्वभावभूत उष्ण ओर प्रकारका 
अग्निसि स्प्चं होता है- रेसा 
प्रयोग नहीं ह्येता । इसी प्रकार 
अग्नि या सूर्यंके उष्ण एवं प्रकाशकै 
समान आस्माके स्वरूपमत आनन्द्‌- 
प्रियका भी यहाँ प्रतिषेष नहीं है, 
वर्योकि न्न्म विज्ञान एवं भानन्द- 
स्वरूप है (आनन्द दी ब्रह दै' 
इत्यादि शरतिर्योसे यदी सिद्ध होता 
है ओर यँ भी “भूमा ही सुख दै" 
एसा दही कहा गया दै । 

राङ्का-- कितु भूमा जौर प्रिय 
की एकता होनेके कारण वह प्रिय 
भूमाका वेद्य नहीं हो सकता अथवा 
उसका स्वरूप होनेसे निव्यसंवेव 
होनेके कारण उसमे निर्विरोषता 
रहेगी; इसल्यि वह ८ निर्विशेषता) 
इन््रको इष्ट नदीं है; क्योकि उपने 
एेसा कहा है कि ईस अवस्था्मे 
तो चह में ह" इ प्रकार अपनेको 
भी नहीं जानता ओर न इन अन्य 
मूको ही जानता है । इस समय 
यह विनाश्य दी प्राप्त हो जाता 


खण्ड १२ ] 


शाङ्रमाध्या्थं 


९११ 


> 28८ 2 ८ ~: 9: -2 1 ८ -ड: 8: -6< ¬. 9 ¬ € 9८ - -2- 9८ 9८ ~: 9-9-98 


इत्युक्तत्वात्‌ । तद्वीनद्रस्येष्ं यद्धू- | दै । मै इसमे कोई फल नही 


तानि चात्मानं च जानातिन 
चाप्रियं किश्चिद्रेत्ति स सर्वाश्च 
लोकानाभ्नोति सर्वाश्च कामान्येन 


ज्ञानेन । 
सत्यमेतदिष्टमिन्द्रस्येमानि 
तत्र प्रजापते- भूतानि मत्तोऽन्या- 


रविवक्षा नि लोकाः कामाश्च 
सवं मत्तोऽन्येऽहमेषां स्वामीति; 
न त्वेतदिन्दरस्य हितम्‌ । हितं 
चन्द्रस्य प्रजापतिना वक्तव्यम्‌| 


व्योमवदशरीरात्मतया सवभूत- 
लोककामात्मत्वोपगमेन या 


प्राधषिस्तद्धितमिन्द्राय वक्तव्य 
मिति प्रजापतिनामिप्रतम्‌ । न 
तु राज्ञो राज्याध्चिवदन्यत्वेन । 
तत्रैवं सति कं केन विजानीया- 
दालक मानि भूतान्ययमह- 
मस्मि' इति । 


देखता । इन्द्रको तो वही ज्ञान 
इष्ट है निक्त ज्ञानसे कि आतमा 
सम्पूर्णं मूर्तोको जीर भनेको भी 
जानता है, किसी भी अप्रियका 
अनुभव नही करतां तथा सम्पूणं 
कोको भौर समस्प भोर्गोको प्रपत 
कररता है। 

समाधान--टीक दहै, यह 
इन्द्रो इष्ट तो भवस्य है किये 
मृत मेरेसे भिन्न दै तथा ये सम्पूणं 
लोक ओर भोग भी भेरेसे भिन्न है 
ओर र्मे इनका स्वामी है; तु 
यह इन्द्रक स्यि हितकर नही हे । 
ओर प्रजापक्कर तो इन्द्रा हित 
बतलाना चाहिये । आकाश्चके 
समान जशरीरखूपसे जो सम्पूणं 
भतलोक ओर कामके आत्मभाव 
को प्राप्त होकर उन्हं प्राप्त करना 
है उस हितकर विषयका इन्द्रके 
प्रति उपदेश करना चाहिये- 
फेस प्रजापतिको अभिमत दै। 
राजाकी राज्यप्राप्तिके समान 
अन्यभावसे रोकादिकौ प्राप्ति प्रजा- 
पतिको अभिमत नही दहै । तब 
एसी अवस्थे आमाका एकत 
हयेनेपर कोन किसके द्वारा यह 
बात नान स्ता है कि वे मूतदै 


| ओर यह मेहं ।' 


९१२ 


छाम्दोण्योपनिचल्‌ 


[ कच्याव ८ 


>^ 2 8 2 ~ 8 ~ ह 8, ~ ¬ 9-9-58 ~ -2- ~~ > 99 


नन्वस्मिन्पक्षे सीभिर्गा -याने- 
वाः ख यदि पितृलोककामः" 
“स॒ एकधा भवति' इत्याचैशय- 
भ्रुतयोऽनुपपन्नाः । 

न; सर्वात्मनः सर्वफलसम्ब- 
न्धोपपत्तरविरोधात्‌ । मृद्‌ हव 


© 
सवं घटकरफङुण्डाद्याधिः । 


ननु सर्वार्मसे दःखसम्बन्धो- 


ऽपि स्यादिति चेद्‌ ? 


न, दुःखस्याप्यात्मत्वोपग- 
मादविरोधः । आत्मन्यविद्या- 
कन्पनानिमित्तानि दुःखानि 
रज्ज्वामिव सपदिकन्पनानिमि- 
तानि । सा चाविदयाशरीरालेक- 


स्वस्वरूपदशनेन दुःखनिमिततो- 
च्छिनेति दुःखसम्बन्धाश्ङ्का न 
सम्भवति । 


शङ्क {-र्धितु एसा पक्ष होनेपर 
“सिर्योसे मथवा यनेँसे | क्रीडा 
करता है } वह यदि पितृलोक 
कामना करता है" वह एक खूप होता 
है" इत्यादि [ पूर्वोक्त ] रेरयसूच 
्रुतियोँ भनुपपन्न हो नजारयेगी । 

समाधान--यह वात नही है, 
वर्योकि सर्वा विद्रानक्षा किम्षीसे 
विरोध न होनेके कारण सम्पूणं 
फलोसे सम्बन्धं हो सकता है; 
जिस प्रकार सृत्तिकाकौी षट. 
कमण्डलु ओ दृडा आदि सम्पूणं 
विकार्ोमे प्राप्ति होती है । 

श॒ङ्धा-र्कितु सर्वामता होनेप 
तो उसे दुःखका भी प््बन्ध 
होगादही ? 

समाधान--नदी, क्योकि 
दुःखके भी आलखको प्राप हो 
जानेके कारण उससे भी उसका 
कोई विरोध नदी है। आत्ममं 
अविद्याके कारण होनेवाटी कल्पन- 
के निमित्से होनेवाले दुःख रज्ज 
सर्पादि कल्यनाके कारण होनेवार 
कृमपादिके समान है । दुःखकी 
निमित्तमूता वह॒ भवि्या आत्मकिं 
ङरीरत्व॒ ओर एकत्वदशते 
उच्छिन्न हो गयी दै; इसल्ि अव 
उसे दुःखके सम्बन्धकी आदरङा 
होना सम्भव नहीं दे । 


खण्ड १२ |] 


शाङ्करमाष्यारथं 


९१द्‌ 


 # कक क 9 9 8-8-99 9 9 9 8-9-96 < 98 


शु द्स्वसंकन्पनिमित्तानां तु | [ यहां शङक¡ हती दै कि जव 


कामानामीश्रदेदसम्बन्धः | 
तेषु मानसानाम्‌। पर एव सवै 


सत्वोपाधिद्रारेण मोक्तेति सर्वा- 


विद्याकृतसंव्यवहाराणां पर 


एवारमास्पदं नान्योऽस्तीति 


वेदान्तसिद्धान्तः । 
भ्य एषोऽक्षिणि पुरुषो दुर्यते' 


सयैकदेशि- इतिच्छायापुरुष एव 
मतम्‌ प्रजापतिनोक्तः । 


स्वप्नसुषुप्रयोश्वान्य एव, 
न परोऽपदतपाप्मत्वादिरक्षणः, 


विरोधादिति केचिन्मन्यन्ते । 
छायाद्यात्मनां चोपदेशे प्रयोजन- 
माचक्षते- आदावेवोच्यमाने 


वि्यासे अविद्या दग्ध हो जाती दै 
तो उसके द्रारा ईख्वरमे आरोपित 
करिया हुआ स्गुणविद्याश्ना फलमत 
पूर्वोक्त फेडवयं भी तो दग्ध दीहो 
जाता है, फिर विद्याकरी स्तुतिके 
स्मि उनका उपदेश केसे सिद्ध हो 
सकता है १? उत्त] शुद्ध 
सत््वनन्य संकल्पके कारण प्राप 
होनेवाङे मनोवान्छित मोगद्प 
दशर्गोक्षा सम्पूणं भृतो [ केव 
मनके द्वारा मायावस्थामे ] ईश्वरे 
सम्बन्ध सिद्ध होता है । समस्त 
परवमय उपाधिके द्वारा परमात्मा 
ही उन रेर्योका भोक्ता है, 
इसल्यि सम्पूणं अविधानजन्य 
व्यवहार्रोका थपिष्ठान प्रमाता ही 
दै, कोई दृषरा नदी है- पसा 
वेदान्त-शाछका सिद्धान्त है । 
यहाँ कोई-कोई सा मानते है 
क्रि य एषोऽक्षिणि पुष्षो दद्यते' 
इत्यादि वाक्यसे प्रजापतिने 
छायापुरूषका दौ वणन क्षिया है, 
तथा स्वप्र ओर सुपु्तावस्थामं भी 
अन्य पुरषका दी उल्रेल किया है, ` 
अपहतपाप्मखादिषरूप परमासमाका 
निदूपण नही शिया, क्योकि इन 
दोनोके रक्षणो परस्पर विरोध दै। 
छायात्मादिका उपदेश कनेमे वे 
ह॒ प्रयोजन बतलाते दै कि 
परासा अत्यन्त॒दुर्विक्ेय दै, 


९१७ 


छाम्बोग्योपनिषलू 


[ लध्याख ८ | 


= 8 > दढ = ~ 8 8 > ऋऋ 


किरु दुरविततेयत्वात्परस्यास्म- 
नोऽत्यन्तबाद्यविषयासक्तवेतसो- 
ऽ्यन्तघ्क्ष्मवस्तुभ्रवणे व्यामोहो 
मा भूदिति। 
यथा किङ द्वितीयायां ्मं 
चन्द्रं दिदशंयिषुकषं कशचितत्य- 
श्षमादौ दशयति परयापुमेष चन्दर 
इति। ततोऽयं ततोऽप्यन्यं गिरि. 
मूरधानं च चन्द्रसमीपस्थमेष चन्द्र 
इति । ततोऽसौ चन्द्रं परयति । 
एवमेतद्‌ 'यएयोऽकषिणिइत्यायुक्तं 
प्रजापतिना त्रिभिः पर्यायैनं षर 
इति । चतुर्थे त॒ पर्याये देदान्म- 
त्यात्सश्स्थायाररीरतामापन्नो 
ज्योतिःस्वरूपं यस्मिन्तुत्तमपुरषे 
रू्यादिमिजक्षत्करीडनूरममाणो 


अतः जिनका चित्त बाह्य विषयो 
अत्यन्त आसक्त है ेसे उन लोगो 
आरम्भमें ही उत्ता उपदेश इर 
देनेपर उक्त अल्यन्त सूक्ष्म व्स्तुका 
धवेण करनेसे कही व्यामोह न 
हो जाय । 


[ इसी बातको टष्टान्तसे स्पष्ट 
करते है-] निस प्रकार द्वितीयाके 
दिन सुक्ष्म चन्द्रभाको दिखने 
इच्छावाखा कोद पुरूष पदे 
साम्नेवाठे वृक्षो देख यद 
चन्दमा हे" एेा कह $र दिखाता 
है । फिर किसी जन्य शृक्षको 
जीर उसके पदचात्‌ चन्द्रमाके 
समीपएवतीं किसी पवंतशिखरको 
“यह चन्द्रमा दहै पेता कहकर 
दिखखता है । तदनन्तर बह 
चन्द्रमाको देख केता है । इसी 
भकार प्रजापतिने “य एषोऽक्षिणि 
इत्यादि तीन पर्यायोसे निकषका 
वर्णन किया है बह पर भाला 
नहीं है; (# चौथे पर्ययम 
इस मरणश्चीर देसे उत्थान कर 
जित उत्तम पुरषे वह ज्योति 
स्वरूप अ्यरीरताको प्राप देकर 
खी सादिके साथ वर्तमान रहता 
हुमा भक्षण, क्रोडा जर रमण 


लण्ड १९ ] शाङ्करभाश्याथ ९१५ 
~< 29८ < 20८8८ 9-9८-9: 296 > >9 < < ¬ >< 9: 9 9 -8- 8: 8 ह ऋ 


भवति स उत्तमः पुरुषः पर | फरता रहता है वही उत्तम पुरुष 
परात्मा कंहा गया है--पा मी 


उक्त इति चाहुः । 

सत्यं रमणीया तावदियं 
प्वमतनिरः व्याख्या भ्रोतुम्‌ 
खनपू॑कं सिद्धान्‌ तर्थोऽस्य ग्रन्थ- 

न्तिमतम्‌ स्यैवं सम्भवति । 
कथम्‌ १ अक्षिणि पूरुषो 
दृर्यते' इत्युपन्यस्य शिष्याभ्यां 
छायात्मनि गृदीते तयोस्त- 
दविपरीतग्रहणं मत्वा तदपनया- 
योदशरावोपन्यासः किं प्र्यथ 
हति च प्रः साष्वल्ड्कारो- 
पदेशश्वानर्थकः स्यात्‌, यदि- 
च्छायात्मैव प्रजापतिनाक्षिणि 
दृश्यत इस्युपदिष्टः । किच यदि 
स्वयगरुपदिष्ट इति ग्रहणस्याप्य- 
पनयनकारणं वक्तव्यं स्यात्‌ । 
स्वशनपुपु्ासग्रहणयोरपि तदप 


उनका कथन है । 


सिद्धन्ती-टीक दै, यह्‌ 
व्याख्यां घुनने्मे तो बद्री सुहावनी 
है, कितु इख प्रन्थश्ना अथं पसा 
नहीं हदो घरूता । कैसे नहीं 
हो सकता यदि प्रनापतिने 
अक्षिणि र्षो दयतेः रसा 
ककर छयातमाका ही उषदेश्च 
किया होता तो (अक्षिणि पृषो 
खदयतेः ए्ा उस्लेख करके, दोनां 
रिष्योद्वारा छायात्माका ही ब्रहण 
किये जानेपर शिरि उनका वह 
विपरीत अ्रहण मानकर उसकी 
निवृत्तिके लिये उदशरावका उपक्रम 
व्या देलते हो" एसा प्रभ गौर 
सुन्दर अरङ्कारारणका उपदेश 
यह्‌ सव व्य्थ॑दही सिद्ध होगा । 
इसके वा यदि उन्दने स्वयं दी 
उसा उपदेश क्रिया था तो 
उन्दै उती प्रकार श्ये इए 
ग्रहणकी निवृत्तिका भी कारण 
बतलाना चाहिये था 1 इसी प्रकार 
स्वप्रासा ओर सुषुप्तासाङृ। भरहण 
कृरनेपर उनकी निवृत्तिं कारण 


९१६ छान्दोस्योयनिषष्‌ [ अष्याय ८ 


नयकारणं च स्वयं ब्रूयात्‌ । न | भी उन्ं स्वयं बतलाना चाहिय,ा। 


चोक्तं (9 क्तु 
चोक्तं तेन मन्यामहे नाक्षिणि- ह । 


च्छायात्मा प्रजापतिनोपदिषटः | 


किं चान्यदक्षिणि द्रा 


यह उन्होने वतलया री 
इसल्यि हम रेस मानते 
दँ छि प्रनापतिने नेतरा 
खायालाका उपदेश नहीं करिया | 
इसके सिवा दूरी बात यह भी 
श्चि यदि ्छ्यते' इष क्रिथा- 


चैुदृक्यत इत्युपदिष्टःस्या चत हद्‌ पदसे नेत्ानतर्मत दरा ही उदेशं 


करिया गया हो तभी यह कथन 


युक्तम्‌ । एतं त्वेव त इत्यक्त्वा | यक्त हो सकता दै; “तंत ते 


स्नमेऽपि द्र ुरेबोपदेञरः। स्वप्ने 
न द्रष्टोपदिष्ट हति चेन्न; अपि 
रोदितीवाप्रयवेततेेयुपदेशात्‌ | 
न च द्र्ट्ुरन्य; कश्ित्स्वप्ने 
महीयमानशथरति । अत्रायं पुरुषः 
स्वयज्योतिः” ( ब्ू° उ० ४ । 
२।९ ) इति न्यायतः भ्रत्य- 
न्तरे सिद्धत्वात्‌ । 

यद्यपि सखप्ने सीर्मवति 
तथापिन धीः स्वप्नभोगोपल- 


स्थि प्रति करणत्वं मजते । 


एेसा कहकर स्वप्न भी द्र्टका ही 
उपदेश क्षिया गया ै | यदि कह 
कि स्वर्प््मे द्रष्टाका उपदेश न्ष 
क्षिया गया तो यह कथन दीक 
नही; क्योकि ह्दन-सा करता 
है, अप्रियवेतता-सा दै" रसा कहा 
गया है। द्र्टके सिवा भौर 
कोरे भी स्वप्न पूनित होता 
हुमा-सा नहीं विचरता; वयो 
“इस वत्या यह पुरूष स्वयप्रकशि 
होता है” ेसा एक अन्य (बृ 
दारण्यक ) श्रुतिमे युक्तिपूवक तिद्ध 
किया गया है । 

यथपि स्वप्नमे आसा सधीः" 
अन्तःकरणसहित रहता दै तो भी 
वह॒ अन्तःकरण स्वप्नो 
उपरुब्धिके प्रति करणस्वको प्रा 
नही होता । तो किर क्या रता 


व १२ ] 


शाह्करमान्यार्थः 


९१७ 


८ >8८ > >@< 8८ 9: >&- >8: -9: -< 9 8 8 8 व ऋ 9 9 


तहिं १ पटचित्रवजाग्रदासनाश्रया | दै !- वह प्टचित्रके समान 


दुक्षयैव धीर्भवतीति न द्रष्टुः ख- | 


यंज्योतिषटबाधः स्यात्‌ । 

किश्वान्यत्‌, जाग्रत्समयो- 
भूतानि चात्मानं च जानाती- 
मानि भूतान्ययमहमस्मीति प्राप्न 
सत्यां प्रतिषेधो युक्तः स्यानाह 
खल्वयमित्यादि। तथा चेतनस्य 
वावि्यानिभित्तयोः सशरीर 


सति प्रियाप्रिययोरपहतिरनास्ती- 
त्युक्त्वा तस्वैवाशरीरस्य सतो 
विचायं सत्यां स शरीरवे प्रायः 
प्रतिषेधो युक्तोऽशरीरं बव 
सन्तं न प्रियाभरिे स्पृशत इति । 


© 
एकशाला स्वप्नबुद्धान्तयोमश- 
मत्स्यवदसङ्गः सश्चरतीति शरुत्य- 


न्तरे सिद्धम्‌ । 


ाप्रत्‌-वासनार्भोका  भाश्रयम्‌त 
दरय दी रहव है--इसद्िे उध 
अवस्था द्रष्टके स्वयपकाश्खकफा 
बाध नहीं हो सक्ता । 


इसके सिवा दूषरा हेतु यह भी है 
कि जाग्रत्‌ जीर स्वप्न अकत्यारमोमिं 
यह्‌ ूरतको ओर भपनेको ध्ये 
भूत है जर ब मे द प्रषार 
जानता है--यह बात प्राप्त होनेपर 
ही [ सुषु ] यह अपनेको भौर 
मूतौको नदी जानतां एसा 
प्रतिषेष उचित हो सकता ्ै। 
तथा चेतनके ही सशरीरत्वकी 
पर्ति दोनेपर अवि्ानिमित्तक 
परियाप्रिक्रा नश्च नदीं होता 
एता कदकर विया प्राप्त होनेपर 
शरारीर हुए उसीके सशरीरावस्थामं 
पराप्त हुए भ्रियाभ्रिक्षा अशरीर 
होनेपर इसे प्रियाप्रिय स्पशं नक 
करते, इस प्रकार प्रतिषेध करना 
उचित्त होगा । स्वप्न भौर नाग्रतमँ 
एक ही आमा महामस्यके समान 
असंगद्पसे विचरता दै-- एषा 
एक अन्य ( बृहदारण्यक ) शरतिसे 
सिद्ध है। 


९१९८ 


छार्दोण्यो पनिषद 


[ नण्वाब ८ 


= >~. 3 + ५ 


ययोक्तं सम्प्रसादः शरीरा- 
त्सघुत्थाय यस्मिन्ख्यदिमी | 
रममाणो मवति सोऽन्यः सम्प्र 
सादाद्धिकरणनिर्दिष्ट उत्तमः 
पुरुष इति, तदप्यसत्‌; चतुर्थे 
ऽपि पर्याये एतं सेव ते' इति 
वचनात्‌ । यदि ततोन्योऽभित्रतः 
स्यातपूंवत्‌ “एतं त्वेव ते" इति 
न ब्रयान्मृषा प्रजापतिः । 
किञ्चान्यत्तेजोऽवन्ादीनां सटः 
सतः स्वविकारदेदशुङ्गे प्रवेशं 
द्शंयित्वा प्रिष्टाय पुनस्तच्च. 
मसीत्युपदेशो मृषा प्रसन्येत । 
तस्मिस्त्वंस्त्यादिमी रन्ता 
भविष्यसीति युक्त उपदेशोऽमवि- 
'्यद्यदि सम्प्रसादादन्य उत्तमः 
रमो भवेत्‌। तथा भूम्यदमेम 


जीर एसा नो का सपर्‌ 
( घु्वस्यापन जीव ) इस शरीरते 
सम्यक्‌ परफारसे उत्थान कर जिह 
जी भादि साथ रमण कृता 
रहता है वह भपिकरणहपते 
निरदिष्ट॒उत्तम्‌ . पुरुष उक्ते निन्न 
दै- सो मी ठक नही; कयो 
चौथे पर्यायमे "एते तेव ते' देषा 
[ पर्वोक्तं परामशं फटनेवाह ] 
निर्देश छया गया है । यदि 
परजापतिको उससे भिन्न ®ोई भौर 
पुरुष अभिमत होता तो वे पे. 
हीके समान (एवं तेव तेः एषा 
मिथ्या वचन न कहते । 


इतके िवा दृस्रा कारण यह 
भीहि [यदि उत्तम पुरषकरो 
पूर्वोक्त पुरुषोसे भिन्न मानेगे तो ] 
तेज, अप्‌ ओर अन्नादिकी रचना 
करमेवाठे सत्‌का अपने विश्रारमत 
देहम पवेश दिखल[कर इत परकर 
पविष्ट हुए उसको जो ^तु वह दै 
एसा उपदे क्रिया गया है वह 
मिथ्या तिद्ध होगा । यदि उक्त 
परप सम्पसादसे भिन्न होता गी 
“उसमे तु ल्ञी आदिके साथ मण 
करनेवाख होगा, एषा उपद 


खण्ड १२ | 


शाङ्करभाष्यं 


९१९ 


>9< 29८ >< < >9< 8 9८-2८-89: >> 9८ ८ ८ 8८ 8 9८ 8८ 9८ ¬ > <-> 


त्यादिक्यासवेदं सवैमिति नोप- | उचित होता घौर यदि मूमा नीवसे 


समहण्ष्यिद्यदि भूमा जीवाद्‌- 
न्योऽभविष्यत्‌ । “नान्योऽतो- 


ऽस्ति द्रष्टा" (बरृ° उ० २।७] 
२३ ) शत्यादिश्रुत्यन्तराच्च । 
सर्वश्रुतिषु च परसिमनरात्मशब्द- 
प्रयोगो नामविष्यस््रत्यगातमा 
चेत्सवैजन्तूनां पर आत्मा न 
मवेत्‌ । तस्मादेक एवात्मा 
व्रकरणी सिद्धः । 

न॒ चात्मनः संसारित्वम्‌; 
अविदयाष्यस्तत्वादात्मनि संसा- 
रस्य । न हि रण्लुशुक्तिकागगना- 
दिषु स्रजतमलादीनि मिथ्या- 
ज्ञानाध्यस्तानि तेषां मवन्तीति। 
एतेन सक्षरीरस्य प्रियाप्रिययोरः 


पहतिर्नास्तीति व्याख्यातम्‌ । 


यच्च स्थितमप्रि यवेत्तेवेति | 


वततेवेति सिद्धम्‌। एवं च सति 





| भिन्न होता तो मूमामे चह भ ही 


ह एसा आदेश्च करके “यह्‌ सब 
आला दही दै! रपा उपसंहार न 
क्रिया नाता। “इससे भिन्न कोई 
ओर द्रष्टा नही दै" इस्‌ शरुयन्तरसे 
भी यही सिद्धहोता है । यदि 
सम्पूणं जीरवोका प्रयगात्मा ही पर 
आत्मा न होता तो समस्त श्रतियोमे 
परमासाके श्यि आसा रखब्दका 
प्रयोग त क्रिया जाता । भतः एक 
ही भात्मा ईस प्रकरणक¡ विषय 
सिद्ध होता है । 


इसके पित्रा, आत्मको संसारित 
हे भी नही; क्योकि भात्मामें 
संसार अविद्याके कारण अध्यस्त 
ह । रज्जु, शक्ति ओर आकाशादि 
मिथ्याज्ञानके कारण अध्यस्त हुए 
सर्प, रनत ओर मलादि वन्तुतः 
उनके नहीं हो जते । इससे 
(सशरीर प्रियाप्रियका नाञ्च नदीं 
होता" इस वाक्यकी व्याल्या हो 
जाती है। [ इस प्रकार ] प्ले 
जोक्दा गया था कि स्वब्रद्रष्टा 
अप्रियतरेत्ता-सा होता दै । साक्षात्‌ 
अप्रियवेत्ता दी नदीं होता--सो 
सिद्ध हो गया । ओरं यह सिद्ध 


९२७ छान्दोग्योपनिषद्‌ [ ण्याय ८ 


9 < 8 < ¬ > < ~ 8 4 >< ऋ -2; ¬: ¬< > ~ ह ~: ~< ~ >8< > 
(९ ् ऋऋ 
सवेपयपिष्वेतद्मरतममयमेतद्‌- | दोनेपर समस्त प्य ह णमह 
ओर जभय है तथा यही व्ह 

फा प्रजापतिका वचन अथवा 
परजापतिच्छदूपरूपायाः शरुतर्व॑चनं| भनापतिच्छदमहपा शरुतिका वनं 
3 ४ भोस्य दही सिद्ध होता है। 

सत्यमेव मवेत्‌ । न च॑ वर्तक] उसे कुतबुद्धिसे मिथ्या प्रमाणित 
५ करना उचित न्दी दै, योक 

बद्धा मपा कतुं पुक्तम्‌ । ततो उस ( श्रुतिवाक्य ) से उ्कृष्टत 

= प्रमाण मिर्ना अलुम्भव दे | 

2 ट यदि कहो कि दुःखादि 
क ~ भक्ष अनुभव होर है तोप 
स्वमव्यभिचायनुभूयत इति वेन; | कहना ठीक नही, कोकरि कै 
त जरादिसे रहित द जराप्र्त 
जरादिरहितो जीर्णाऽं जातोऽह- | उलत्र हुभा ह, आयुप्मान्‌ दै 
माुष्मन्‌ गोरः इषणो मृत | रः खम म इना 
इ्यादि प्रत्यक्ष अनुभ्ोके समान 
इत्यादिग्रस्यक्षानुभववत्तदुषपत्तेः। | वड ( अप्त्य ) भी समभव 
ह हो सक्तादहै। यदि कोश 
सवेमप्येतःसत्यमिति चेदस्त्यवेत य सव तो सल दही है गे 


देषं वस्तुतः यद बात रे ही दुम 
नो ह, इ्तीसे आत्माके अविनाशके 
दशराबादिदरिताबिनाश्चयुक्ति- | सम्बन्धे उदकपात्ादि युक्ति 
३ दिखलानेपर भो देवराज्को यह 
रेषि-मुमोदैवात्र विनादमेवापीतो | रोह ही रहा मि इ अवाम 
द तो यह विनाशको ही प्रप्त हौ 
जाता है। 


| > 


ब्रह्मेति प्रजापतेवचनम्‌ । यदि वा 


भवतीति । `~ 


खण्डं १२] शाङ्कस्माष्याये ९२१ 
>9< >< >< < -9: -&८ < # > ¬: 8 9-8-9७ ~ ८ ८ 


तथा विरोचनो महाप्राज्ञः | तथा परम बुद्धिमान्‌ लौर परजा 
पतिक्रा पुत्र होनेषर भी विरोचन 
केवल देहमात्रमे जत्मबुद्धि करने- 
बभूव । तचैन्द्रस्यारमविनाश्मय-| वाला हमा । इसी पकार वैनारिक 
रोग इन्द्रके अत्मविनाञ्चूप भयकरे 
समुद्रम इव गये । तथा सघ्यि- 
तथा सांख्या द्रष्टारं देदादिव्य- | वादी द्र ( आत्मा ) दो देहादिसे 


तिरि भिन्न॒ जानकर भी शाख्लपमाणको 
मवगम्यापि स्यक्तागमप्र- 
प छोड़ देनेके कारण मृद्युके विषयमूत 


माणत्वानसुत्युविषय एवान्यतव- | मेदश्च दी पे रह गये । एवं 
देने तस्थुः । तथान्ये काणा- | अन्य काणादादि मतावल्बी 


दादिदर्शनाः कपायरक्तमिव | कषायते रगे इए वको कषारादिते 
्षारादिभिर्ं नवमिरात्मगुणै- | ४८ कनेक समान भाताके नौ 
५ +कः « | गुर्णोसे युक्त आसद्रव्यको शुद्ध 
यक्तमासमद्रव्यं विशोधयितु | केम छा गये । तथा द 
राः । तथान्ये कर्मिणो बाह काण्ड रोग बाह्य विषर्योम आसक्त- 
विषयापहृतवेतसो वेदप्रमाणा | चित्त होनेके करण वेदक प्रमाण 
माननेवलि होनेपर भी इन्द्रके 
समान परमार्थ्षय अलमकत्वको 
बिनारमिवेन्द्रबन्मन्यमाना घटी-| भपना विनाश-सा समज्ञकर षरी- 


यन्त्रवदारो्ावरोदशरकारैरनिशं | यन्ते समान उष्टं चे जति-भति 


बम्भ्रमति किमन्ये च्जन्तयो | रातःदिन भटे रहते है । किर 
क जो स्वभावसे ही बाह्य विषमं 
विवेकदीनाः स्वभावत एव  आपक्तवित है उन न्य वििकदीन 


वहिरविंषयापहूतचेतसः । द्र जीवी तो बाति दी क्या हे ? 


प्राजापत्योऽपि देदमात्रात्मदश्नो 


सागर एव बैनाशिष्छा न्यमजन्‌। 


¢ ० ह 
अपि परमाथंसत्यमात्मकस्व 


९२२ छन्दोग्योपनिषद्‌ [ णध्याव ९ 
८ 9 -9 >: ¬. 8८ 22८ ¬< -9< < 8-3८-8 9 >: 96-8८-68 8 
तस्मादिदं त्यक्तसवबायेष- | अतः जिन्हने समू बाह 
एषणा्ोका व्याग कर दिया है, 
जिनकी कोई थर गति नहँ है नौर 
कैरस्याभ्मिभिर्ेदान्तविक्ञानपरे- | नो भजापतिके सम््दाय्ा भतुसरण 
ृरनेवाटे ह उन वेदान्तविज्ञान- 
रेव वेदनीयं पूज्यतमेः प्राजापत्यं | परायण जत्याश्रमी पु्यतम परमहंस 
परित्राजकोके द्वारा ही यष चार्‌ 
प्रकरणोमे उपनिबद्ध (प्रतिपादित ) 
लात्मतच्व ज्ञातव्य है; तथा भाज 
भी वे ही उस्तका उपदेश्च कते है, 
दापि त एव नान्य हवि ॥१॥ ` भौर कोई नदीं ॥ १ ॥ 


~> रक क9-- 


[१ ् ० 
जरनन्यकशरणे परसदंखपरिवानज- 


चेमं सस्प्रदायमनुसरद्धिरुपनिबद्ध 


प्रकरणचतुष्टयेन । तथानुश्चासत्य- 


तत्रा्षरीरस्य सम्प्रसादस्या- | रेसी अवस्यामे, निस प्रक्र 
विद्यया श्षरीरेणाविरेषतां सश्च- | अविद्यावश शरीरके साथ भविरोषता 


रीरतामेव सम्प्ा्षस्य शरीरात्स- | अर्थाव॒सशरीरताको ही १ 


= अारीर सम्प्रददौ शरीरे 
मुत्थाय स्वेन रूपेण यथाभिनि- € 
उत्थान कर अपने स्वषटप्की प्रा 


ष्यत्तिस्तथा वक्तव्येति दृष्टान्त | होती है वह बतानी चा्िये-- 
उच्यते- इसीसे यह दृष्टान्त कद। जाता है-- 
अशरीरो वायुरभ्रं विघयुत्‌ स्तनयिस्नुरशरीराण्य 
तद्यथेतान्यसुष्मादाकाशत्समुत्थाय परं अयोति- 
रुपसम्पद्य स्वेन रुपेणाभिनिष्पयन्ते ॥ २ ॥ 


वायु अरारीर दे; अञ्न, विद्युत्‌ ओर भेषध्वनि ये सब्र अशरीर 
९ प्रकार ये सत॒ उस आकाशसे सपुर्थान कर सूर्॑की परम 
ज्ोतिको प्रात रे अपने स्वरूपम परिणत हो जति है ॥ २.॥ 







खण्ड १२] 


काङ्करधाष्याथं 


९२४ 


6८ 6 < >< <> ४८ >< 9 >< 4 8. 9८ ¬< ¬ 8 < < < < ऋ 


अश्षरीरो बायुरविद्यमानं शिरः- 
पाण्यादिमच्छरीरमस्येव्यशरीरः। 


किं चाग्रं विधुरस्तनयित्तुरितये- 
तानि चाशरीराणि । तत्त्रवं 
वति वर्षादिप्रयोजनावसाने तथा 
अष्मादिति भूमिष्ठ श्रतिचरो- 
कसस्बन्धिनमाकाशदेशं ब्यपदि- 


कषति । एतानि यथोक्तान्याकाक्च- 


समानरूपतामापन्नानि स्वेन 
वायवादिशूपेणागृद्यमाणान्याका- 


शाख्यतां गतानि । 
यथा सम्प्रसादोऽवियावस्थायां 
शरीरात्ममावमेवापन्नस्तानि च 


तथाभूतान्यदष्माद्ुरोकसम्ब- 
न्धिन आकाशदेशा र्सषुतिष्ठन्ति 


वर्पणादिप्रयोजनाभिनिश्रंतये 
कथम्‌ १ शिशिरापाये सावित्रं पर 
ज्योतिः प्रकृष्टं ग्रष्मकयुपसम्पद्य 


सापित्रमभितापं प्राप्येत्यथः। 


वायु अशरीर दै, इसके शिर 
एवं हाथ-पंववाख शरीर नदी 
है रसरियि" यह भशरीर है । 
तथा बादर, त्रिनी नौर्‌ 
मेघध्वनि-ये भी अररोर दै । 
दसा होनेपर भी, जित प्रकार 
वर्षादि प्रयोजनक्गी पूर्ति होनेपर 
ये उस [ आकाशसे समुत्थान कर ] 
हृष प्रकार भूमिम स्थित श्रुति 
दयोकम्षम्बन्धी भाकाशचका परोक्ष- 
रूपते निर्देश करती है । ये पूवाक्त 
वायु आदि आकाशो समान- 
खूपतारो प्रप्त हो अपने वायु 
आदि रूपसे गृहीत न होते हए 
अक्षाशसंजञाको प्राप्त हो जति दै । 

जिश्त प्रकार सम्परसाद्‌ अविधा 
वस्था देहालमावको ही प्राप 
रहता है उसी भन्नर तद्रुपताको 
प्रा हए वे सब वर्षा आदि 
परयोजनकी पूर्तिके ल्यि इस 
दलोकसम्बन्धी आकाशदेशसे 
समुत्थान करते दै कित 
प्रकार सपुर्थान करते दै १-- 
शिशिरका अन्त होनेषर सू्थके 
परम तेन ीष्मकालीन प्रहृष्ट ते- 
को उपसम्पन्न हो सर्थात्‌ सविताके 


आदित्याभितापेन पथगमाबमा- ' अभित।पको प्राप ही उस .आादियके ` 


९२४ ऊ्दोण्योपनिषब्‌ | अष्याष ८ 
हॐ 4 >< ~< 9 9 > >£ 9: 8 -9< 8 5 त 9 >< 8896-8 48 -9 
पादिताः सन्तः स्वेन स्वेन रूपेण | अभितापसे विमिन्नभावको प्रा 
होकर अपने-अपने स्वरूपसे समन 
हो जाते है । उनम वायु पूर्ववायु 
हिखाभ्रमपि भूमिपवैतदस्त्यादि- आदि जपने रूपोसे, बादल आद्रभाव- 
को यागकृर भूमि, पवेत एवं हाथी 
आदिके सदृश आकारोसे, विधुत्‌ 
तादिचपलसूपेण स्तनयित्सुरपि ज्योतिरंता आदि अपने चपर 


ह ति रूपसे खीर मेषध्वनि गर्जन तथा 
सेन गिताशनिरूपेणेत्येवं | वन्नपात सादि अपने पत स्थि 


क न्येलापि हो नति है। इस भकार र्न 
अनेपर ये सभी अपने-मपने दूपे 
निष्पद्यन्ते ॥ २॥ निष्पन्न हो नते दै ॥ २॥ 


-जप्टनक- ~ 


यथायं दृष्टान्तः - । जसा किं यह दष्टन्त दै- 


पुरोबातादिवायुरूपेण स्तिमितभावं 


रूपेण विचुदपि स्वेन ज्योतिल- 


एवमेवेष समभ्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्ससुस्थाय परं 
उयोतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पयते स उत्तमपुरुष 
स तत्र पर्येति जक्षव्कीडन्रममाणः खरीभिरवां यानवा 
ज्ञातिभिर्वा नोपजनरस्मरन्निद्‌ <शरोरश्स यथा प्रयोग्य 
आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिज्छरीरे प्राणो युक्तः॥२॥ 
उसी प्रकार यद सम्भसाद इस शरीरसे समुत्थान कर परम ज्योति- 

करो पराप हो अपने स्वषटपमे स्थित हो जाता है । वइ उत्तम पुष दै । 
उस अवस्थामे वह हसता, कीडा करता जर खी, यान अथवा ज्ञातिजनके 
पाथ रमण करता अपने साथ उदन्न हुए इस शरीरो स्मरण न करता 


हुआ। सव ओर विचरता है । जिस प्रकार घोड़ा या वैर गाड़ीमे जता 
रहता दै उसी प्रकार यह प्राण इस शरीरम जुता हुमा दै ॥ ३ ॥ 


च्छ १२] छाङ्करभाष्याथं ९२७५ 
वाष्वादीनामाकाशादिसाम्य- | [ उसी प्कार-- ] वायु भादि- 
, के आकाशादिक्ो घमताफो प्रप्त 

गसनददविद्यया संसाराव- 
मनषद्विद्यया ५९ होनेके प्रमान भबिघावश् ब्रधारिक 


स्था्यां शरीरसाभ्यमापननोऽदम- | यवस्था्मे शरीरकौ घमताको पराह 
हुभा, स्थात्‌ श इतका एत्र द, 
ष्य पुत्रो लतो जीणो मरिष्य- | उन्न हषा है, नरप्रल हू 


हत्येवं प्रकारं प्रजपतिनेव मघवान्‌ मर्गा इस प्रकार समक्ञनेवटि 
हन्द्रो निस प्रकार प्रजापठिने 


यथोक्तेन क्रमेण नासि चव है समञ्ञाया था उसी क्रमते (तु देह 
न्दरियादिधरमा त्वमसीति प्रति- | भोर इनदरोके पर्मबासा नही है, 
बल्कि वह सत्‌ हीत्‌ है" इस प्रकार 
बोधितः सन्स एष सम्भ्रसादो | समञचय। भा षड यह सममपाद- 
जीव आका्से वायु मादिके समान 
ॐ स शरीसे समुत्थान कर 
वाय्वादयः सुस्थाय देहादिबि- ददित विरछण॒ आलघ्वहपको 
लक्षणमात्मनो रूपमवगम्य | जानकर अर्थात्‌ देदासमावना्ो 
देहार्ममावनां दितेत्येतत्‌। स्वेन न) 6 ० ॥ 
स्पेण सदाटमनैवाभिनिष्पद्यत | इस प्रकार परे इसक्री व्याद्ा 
इवि व्यार्यातं पुरस्तात्‌ । | कौ ना चुर हे। 
स येन स्वेन सूपेण सम्प्रसा- वह सम्प्साद्‌ अपने नि 
स्वाभाविक रूपसे स्थित होता 
दोऽमिनिष्पद्यते-प्राक्परतिबोधा- १ 
तद्धान्तिनिमित्तात्स्पो भवति | आन्तिके कारण रज्जु सपं हो नाती 
यथा रज्जुः पाक्कृतप्रकाशा | हे भौर फिर रकश होनेपर वह 
रज््वात्मना स्वेन सूपेणामिनि- अपने स्वाभाविक रणज्जुख्ूपसे स्थित 


जीवो ऽस्माच्छरीरादाकाशादिव 


९.२६ छाग्दोष्योरनिषषट्‌ [ जण्याय < 
72: 2-9-४८ > 2 9 8 > ~ ऋः ~ ऋः ~ >< 8: < (~ल 45 4> 5 


ष्पद्यते । एवं च स उत्तमपुरुष | हो जाती है उसी प्रकार वह उत्तम 
पुरुष --जो उत्तम ॒हो शौर पुरुष 
हो उसे उत्तम पुष कहते ३ । 
अक्षिएुस्प जोर स्वप्नपुरष ये दोनों 
व्यक्त दै, रितु सधुपपुसष भवने 
व्यक्ताव्यक्त सुपु: समस्तः | स्वाभाविकं रूपमे स्थित होकर 
(१ य 
सम्प्रसन्नोऽशचरीरध स्वेन रूपेणेति । न # 
एषामेष स्वेन सूपेणावस्थितः | व्यक्त भौर भन्यक्त जो क्षर घौर 
अक्षर पुरुष दै उनकी अपेक्षा यह 
अपने स्वाभाविक रूपमे स्थित हभा 
ह्योत्तमपुरुपः कृतनिर्वचनो यं | एए उम दै । इसका निरूपण 
गीताम किया दै। 
वह सम्धरसाद्‌ भपने स्वाभाक्ि 
स सम्प्रसादः स्वेन रूपेण तत्र | रूपते - स्वयं स्वासा्े स्थित हा 
आसनिष्ठ होनेके कारण सवका 
स्वात्मनि स्वस्थता सर्बात्मभूतः | अन्तरात्म होकर सव जोर संच 


9 करता हे । कभी इन्द्रादि रप 
पर्येति कचिदिन्दरा्यास्मना जक्ष- | “जक्षत्‌, दता थवा मनोवान्कित 


द्रसन्‌ भक्षयन्‌ बा संक्ष्याञुच्चाव- | बद्धिया-घयिया भोजन-सामग्रियोक् 
भक्षण करता हुआ, फमो मनोमात्र 
अर्थात्‌ केवर संकट्पसे ही उखन हए 
अथवा ब्रह्मलोक-सम्बन्धी भोगोके साथ 
क्रीडा करता घौर स्मौ दिके सरथ 
मनके ही द्वारा रमण करता हभ उप 
जको-नो सी-पुरुषोके पारस्परिि 
मनसे, नोपजनम्‌, सी पुंसयोर- | शदगमनसे उतपन्न होता है अथवा 


उत्तमधासौ पुरुषश्वेसयुत्तमपुरुषः 


स॒ एवोत्तमपुरुषोऽक्षिस्वप्रुरुषौ 


क्षराक्षरौ व्याकृताव्याढृतावपे- 


गीतासु । 


चानीप्सितान्‌ क्वचिन्मनोमात्र; 


संकन्पादेव सधरस्थिते्बाह्मलोकि- 


कैरवा क्रीडन्‌ खयादिभी रममाण 


ण्ड १२] शाङ्करभाम्याथं ९२७ 
~8८ >< ¬: ह >8- 8 >< ~~ ड >~ 8 -9- 8: ड: 9 > 2: 8: -8: 5: ¬< ऋ 3: 


न्योन्योपगमेन जायत इस्यु पज- | भासरूपसे या शपनी समीपतासे 


जमात्म भावेन वात्मसामीप्येन 
जायत इत्यु पजनमिदं शरीरं तनन 
स्मरन्‌ । तत्स्मरणे हि दुःखमेव 
स्यात्‌; दुःखात्मकत्वात्तस्य । 


नन्वलुभूतं चे स्मरेदसवजञ- 
त्वं मुक्तस्य । 


नैष दोषः; येन मिथ्याज्ञा- 
नादिना जनितं तच्च मिथ्याज्ञा- 
नादि वि्ययोच्छेदितमतस्तन्ना- 
लुभूतमेबेठि न वदस्मरणे सवन्ञ- 
त्वदानिः । न शयुन्मततेन ग्रहग- 


हीतेन वा यदनुभूतं तद्न्मादा- 


दयपगमेऽपि स्मंव्यं | 


संसारिभिरविद्यादोषवद्धियंद- 


भूयते तस्सर्वात्मानमशरीरं न । 


उसत्न होता है एेसे इसत शरीरका 
नाम (उपनन' है- इसे स्मरण न 
कता हुभा सव सोर संचार 
करता दै ], क्योकि उसक्ना स्मरण 
करनेसे तो दुःख ही होगा, कारण 
वह्‌ दुःखासक टै । 

शङ्का-यदि वह॒ भनुभत्‌ शरीर- 
का स्मरण नहीं करता तव॒ तो 
क्त पुरुषो भसरवञता सिद्ध 
होती है । 

समाधान-य् यह दोष नही 
है| निस मिथ्याज्ञनाद्के द्वारा 
उस शरीरी उदत्ति हद थी वह 
मिथ्याज्ञानादि ज्ञाने उच्छिन्न हो 
गये; इसल्यि अब उस शरीरका 
अनुभव नदीं होता, अतः उसका 
स्मरण न करनेम सर्वता हानि 
नहीं हो सक्ती । जो वस्तु उन्पतत 
या प्रहस्त पुस्षछो भनुभव होती 
थी उसे उन्मादादिकी निवि 
होनेपर भी स्मरण करना चाहिये. - 
ठेसी बत नहीं दै । इसी भकार 
इस प्रसङ्खमे भी जो शरीर भवि 
खूप दोषवले संसारियोद्ारा अनुभव 
किया जाता है वह अशरीर 
सर्वात्मको स्पश नहीं करता, क्योकि 


९२८ छाम्कोग्यो पनिषद्‌ [ मण्या ८ 


स्पृशति; अविद्यानिमित्ताभा- | उस उसके भविद्यारूप निमिततक्षा 
वात्‌ । समाव है| 


ये तूच्छिनदोपैमदितकषाये- 
मानसाः सत्याः कामा अन- 


तापिधाना अनुभूयन्ते वि्या- 


[ध 


भिग्यङ्ग्यत्वात्‌, त॒ एव शुक्तन 
सर्वात्मभूतेन सम्बध्यन्त इत्या- 
त्मक्ञानस्तुतये नि्दिरयन्तेऽतः 
साध्वेतद्विरिनष्टि-- य 
ब्रह्मरोके' इति । यत्र कचन 
भवन्तोऽपि ब्रह्मण्येव हि ते 
लोके भवन्तीति सर्वात्मता- 


द्रह्मण उच्यन्ते । 
नयु कथमेकः सन्नान्यत्परयति 


नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति 


स भूमा[कामांश् व्राह्मलोकिकान्‌ 


परयन्रमत इति च विरुद्धम्‌ । 
यथेको यस्मिन्नेव 


एते | 


कितु जिनके दोपनष्ट हो गये 
है ओर राग्रषादि कषाध क्षीण 
हे गये दै उन स्पोद्रारा, मिष्या 
विषयामिनिषेशरूप भ्ृतके कारण 
धज्ञानिरयोके भनुभवे न भानेवाले 
जिन मानस सव्य भोर्गोका घनुभव 
क्रिया नाता ै बे विद्ाहमरा 


| भभिन्पक्त होनेवाठे होनेके कारण 


इस प्रकार उपर्युक्त सर्वाम्‌ 
विद्रानसे सम्बन्धित रै; सीसे 
आसङ्ञानकी स्त॒तिके स्थि उनका 
निर्दश्च किया जाता है । भतः च. 
एते ब्रहमरोकेः रसा नो निश 
कियागया है वह ठीक दी है, 
वयो कि ब्रहम सर्वासक द, धतः व 
कहीं भी रहं तथापि ब्रह्मो 
ही है- इस प्रकार कटे नते ह। 

शङ्का-- मतु वह एक दता 
हुजा-न तो अन्य कुच देवत £ 
न जन्य कुछ सुनता दै जौर्‌ न भन्य 
बु जानता ह" "वह मूमा द" भीर 
“वह्‌ ्रहमलोकसम्बन्धी भोगोको देखत 
हमा रमण करता दै ये दोनी 
कथन तो परस्परविर्द्ध दै, 


क्षणे । भकार यद कहा जाय कि एक ¶९ 


खण्ड १२ ] शाङराष्वाथं ९६९. 
> < < > < 8८-5८-29 9-८-93 ४ 9 9८ 9-8८-9 9 8 ~: 


परयति स॒ तस्मिनेव क्षणे न | निस क्षणमे देखत है उसी क्षणम 
नहीं भी देखता । 
समाधान- यह कोई दोष नरी 
है, क्योकि एक अन्य श्रुतम इसका 
निराकरण कर दिया गया है। 
लात्‌ । ब्रटेरविपरिलोपाल- | दको षक विषरलप न 
ह होनेके कारण वह देखता ही रहता 
दयन्नेव भवति; द्र्टरन्यस्वेन | है जर द्रे मिनन भोरगोका समाव 
होनेके कारण वह नहीं भी देखता 
यद्यपि पुषुषिमै वह ( द्वैतामाव ) 
यद्यपि सुपे तदक्तं शक्तस्यापि | बताया गया है तथापि सुक्तके 
सर्वैकसवात्समानो द्वितीयाभावः। १ 1 
इस विषयमे (किसके द्वारा क्या 
देखे, पेष कदा ही गया है । 
अश्तरीरस्वरूपोऽपहवपाप्मादि- | यह ॒पुह्म॒ अङशरीररूप ओर 
अपहतपाप्मादि रक्ष्णोवाखा हने- 
रक्षणः सन्‌ कथमेष पुरुपो- | पर मी ततर दिललबी देता है-- 
ऽक्षिणि दृश्यत इत्युक्तः प्रजाप देषा प्रनापतिने क्यो कहा १ एसी 
शङ्का होनेपर जिस प्रकार यह 
तिना १ तत्र यथासावक्षिणि | नतर साक्षत्‌ दिखलायी देता है 


मितीद्‌- | व बतलाना चाहिये--इसीसे यह 
साक्षादुदुश्यते तद्वक्तव्यमिती ( जगेका वक्तव्य ) भसम श 


जाता दै । नेत्रके भीतर उसके 
दविखलायी देनेमे कया कारण है, सो 
दशन इत्याद-- ` श्रुति बतसती दै 


परयति । 


नैष दोषः; भरत्यन्तरे परिहृत- 


कामानामथावान्न परयति चेति 


“कैन ठ पयेत्‌" इति चोक्तमेव । 


मारम्यते। तत्र को हेतुरक्षिणि 


९३० छन्दोग्योपनिषद्‌ [ अघ्याय ८ 


=== 
स दृष्टान्तो यथा श्रयोग्यः | वह दृष्टान्त यें है, जिस पर्न 
प्रयोग्य अथवा “स यथा प्रयोग्य? 
इस पदसमूह “सः, शाब्द प्रयोग- 
प्रक है । जो प्रयुक्त होता है वह 
अश्च या वृषभ प्रयोग्य कहलाता दै। 
वह जिस प्रकार रोके जिसके 
द्वारा सब ओर जाति है वह रथ 
या गाडी आचरण कहटाता दै उप 
आचरण उसे खोचनेके स्थि [अध 
या वृषभ ] जुता रहता है, इषौ 
प्रकार दस रथस्थानीय शरीरम पि 
वृिये।वाखा प्राण, इन्दिथ, मन ओर 
बद्धिसे संयुक्त हुआ परजञासा विकञन 
शक्ति ओर क्रियाशक्ति इन दो 
शक्तिमति संयुक्त है, अर्थात्‌ अपने 


फरक उपमोगके लिय नियुक्त 
है| “किसके उक्मण करनेष्‌ म 
उक्तमण क्गा ओर क्रिसके स्थित 
हानेपर म स्थित रगा इस श्ुतकै 
अनला, राना निस प्रकार सर्व 
धिक्तारीको नियुक्त करता दै उ 
प्रकार शरन दर्शन, श्रवण ओ 
चेटा आदि व्यापारमे प्रणो 
अधिकारी बनाया दै। रूपक 
उपरुल्िका द्वारभूत चश्च इन्दि 
उसीकी मात्रा अर्थात्‌ एक देश दै ।। 


-भष्ध्च््क्$-- + 










प्रयोग्यपरो वा सशब्दः । भ्रयु- 
ज्यत इति प्रयोग्योऽश्रो बलीवर्दो 
वा | यथां रोक आचरत्यनेने- 


त्याच्रणो रथोऽनो वा । 
चरणे युक्तस्तदाकपंणाय । एव- 
मस्मिञ्छरीरे रथस्थानीये प्राणः 


वृत्तिरिन्द्रियमनोबुद्धिसयुक्तः 
्रहञारमा विन्ञानक्रियाशक्तिदढय- 
 संमूच्छितारमा युक्तः स्वकमंफलो 
पमोगनिमित्तं नियुक्तः । 'कस्मि- 
नन्वहयुच्कान्त उन्क्रान्तो भवि- 
ष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रति- 
छ्रास्यामि। इतीश्वरेण राव सर्वा 
धिकारी दशंनश्रवणचेष्टाव्यापा- 
रेऽधिकृतः । तस्येव त॒ मत्रेक- 


देशधन्ञुरिन्दरियं रूपोपरन्धि- 
दारभूतम्‌ ॥ ३ ॥ 


खण्ड १९] शाङ्कर्माष्याथं ९६१ 
2 > 28८ 9८: ¬ 9८ 9 ८ > 9८ 9 ¬~ 9 -3८ 9: 9८ 9 9 ८ ~ 9८ अ ~ ~ 


अथ यत्रेतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः 
पुरषो ददौनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आसा 
गन्धाय घ्राणमथ यो बेदेदमभिग्याहराणीति स आल्मा- 
भिव्याहाराय वागथ यो वेदेद्श्र णवानोति स आस्मा 
श्रवणाय श्रोत्रम्‌ ॥ ४ ॥ 


जिसमे यह च्चुद्रारा उपलक्षित आकाश अनुगत दै वह चा्चुष 
पुरुष दै; उक्तकरे रूपग्रहणके लिये नेत्रन्दिय है । नो रसा अनुभव फरता 
है किमे इते वधूं वह मात्मा दै; उसके गन्धग्रहणकरे ल्यि नासिका 
& ओर जो देसा समक्षता दै क मे यह शब्द बो वही मासमा है; 
उस शब्दोचाशणक्रे स्थि वागिन्दिय दै तथा जो एसा जानता दै 
किमे यह श्रवण कृष्ट वह भी आत्मा है, श्रवण करनेके थि 
्रत्रन्दिय है ॥ ४॥ 


अथ यत्र डृष्णतारोपरुक्षित- | जँ ८ जिप्त॒नाग्दवस्थामे ) 
 देदच्छिःमलविषण्ण यह ्प्णतारोपलक्षिति आक 
माकाशं देदच्छिद्रमलुविषण्णम्‌- । देहान्तं दिद्रमे जनुविपण्ण-- 
अनुपक्त अर्थात्‌ भनुगत दै उस 
3 अवधानं यह प्रहत अशरीर आमा 
शरीर आत्मा चाज्चषश्वजघषि भव | चश्चुप--चक्चमे रहनेवाला दै 
(६ ९ इसल्यि चाक्षुष हे । उसके देखने- 
षस्तस्य दशनाय सूपो- 
1 थ _ | खपोपव्धि करनेके स्थि चक्षु 
पलग्धये चुः करणम्‌ यस्य तद्‌ करण दै । देहादिसे संहत होनेके 
४ ~. | करण जिसपर द्रष्टके ल्य 
हादिभिः संदतत्वा्परस्य द्रं | च्च बह करण दै वह पर शरीर 
सोऽत्र चपि दशनेन शिद्गेन | आतमा इस नेतरे धन्तर्गत दरशनरूप 
दृश्यते परोऽश्रीरोऽ्संहवः । रिङ्गसे उससे असंहत देखा जाता 


छा०उ० ३०-- 


नुषक्तमलुगतं तत्र स प्रकृतो- 


९३२ 


खन्दोश्योपनिषद्‌ 


[ ध्याय ८ 


~~ ~: 8 8 8 8 >8- -ड८ 9 > ~ 8 9: >2८ ¬ 2 ~: -3; ` 9; 25 >¬ >< 8 ~ः 


(अक्षिणि दश्यते, इति प्रजापति- | दै । नेतके अन्तगंत दिलसावी 


नोक्त सर्वेन्द्िद्रारोपलक्षणार्थम्‌; 
स्वविषयोपङब्धा हि स एवेति । 
स्फुटोपरन्िहेतुत्वात्तु अक्षिणि" 


इति विरोपवचनं सवशरुतिषु 
(अहमद शेमिति तत्सत्यं भवति"! 
इति च श्रुतेः । 

अथापि योऽस्मिन्देहै वेद 
कथम्‌ १ इदं सुगन्धि दुगंन्धि वा 
जिघ्राणीस्यस्य गन्धं विजानी- 
यामिति स आत्मा तस्य गन्धाय 
गन्धविह्तानाय घ्राणम्‌ । अथ यो 
वेदेदं वचनमभिन्यादराणीति 
वदिष्यामीति स आत्माभिव्या- 
हरणक्रियासिद्धये करणं वागि- 
न्द्रियम्‌। अथ यी वेदेदं शृणवा- 
नीति स आत्मा श्रवणाय 
श्रोत्रम्‌ ॥ ४ ॥ 


देत। हे यह बात प्रजापतिने 
सम्पूणं इन्द्ियरूप द्वारक उपरक्षण- 
के ल्यि कही हे । तासपयं यह दै 
छि सम्पूणं विषर्योको उपलन्ध करने- 
वाला वही है । चक्षु इन्दिय स्फुट 
उपरल्धिका कारण दहे, इसलिये 
समस्त ॒श्रुतिर्योमे (अक्षिणि यह 
विरोभ वचन है। भर्ेने देखा है, 
इसरिये यह सतय है” इ श्रुतिसे 
भी यदी" सिद्ध होता है । 

तथा इस शरीरम जो यहं जानता 
है-किस प्रकार जानता है (म 
यह्‌ सुगन्धि या दुगन्धि सुधर" अर्थ्‌ 
इसकी गन्ध॒नानू--एेसा जो 
जानता है वह आत्मा है । उसके 
गन्ध अर्थात्‌ गन्धज्ञानके स्यि प्राण 
है । ओर जो रेसा जानता दै कि 
मै यह वचन उच्चारण कं 
अर्थात्‌ बोट वह जातम है; 
उसकी शब्दोचरणक्रियाकी सिद्धि- 
के ल्थि वाक्‌ इन्द्रिय करण दै। 
तथाजो यह जानतादहै किम 
यह्‌ श्रवण कं वह भात्मा है; 
उसके शब्दश्रवणके लियि श्रोत्रन्िय 
दहे॥४॥ 


१०० १-- 





१, स्पष्टोपठग्धिमे चश्चुका देतुत्व । 


ध ¢ वि 
खण्ड १२] शाङ्कर्ाष्याथं ९३६ 
>< > 8 ~ ~ 09८ 9 9-9-96 | ~ 9 ~ 9-9-19 ८ -9----- 


अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा मनोऽश्य 
देवं चक्षुः स दा एष एतेन देवेन चक्षुषा मनसेतान्कामा- 
ल्पद्यन्रमते ॥ ५॥ 
जीर जो यह जानता दै कि मे मनन क्वह भत्मा है । मन 
उसका दिव्य नेत्र है; वह्‌ यह अस्मा इस दिव्य चक्षुके द्वारा ोर्गोको 
देखता हुआ रमण करता दै ॥ ५ ॥ 
अथ यो वेदेदं मन्वानीति| ओर जो यह जानता दहै किं 
म इसका मनन कँ अर्थात्‌ 
बाह्म इन्द्रिये अस्यष्ट केवल ` 
केवलं मन्वानीति वेद स आतमा | मनन व्यापार क वह आत्मा 
व दै; उसके मनन करनेके ल्य मन 
मननाय मनः। यो वेदस करण है । शो जानता है वह 
आत्मा है इस प्रकार दही सर्वत्र 
६३ प्रयोग होनेके कारण यह विदित 
देदनमस्य स्वरूपमित्यवगम्यते || होता है कि जान ही इसका स्वह 
यथा यः पुरस्तास्रकाशयति स | है; जिष प्रकार कि “जो पूरते 
, | परक्ा्ञ करता है वहसूरयं है तथां जो 
आदित्यो यो ्तिणतो यः | दिणस जो पश्वे, नो उरे 
पश्वा उत्तरतो य उध्वं प्रकाश- | ओर जो उपरकी ओर प्रकाश करता 
यति स आदित्यः इत्युक्त प्राग प १ श व 


स्वरूपः स इति गम्यते । स्वह्प दै । ह 
5 ५९ नेत्रादि जो इन्दि 
दशंनादिक्रियानिब्स्यर्थानि की = 


त॒च्ुरादिकरणानि । इं | ह_ गह बात इस आलाक्ष 
चास्यात्मनः सामर्ध्यादवगम्यते || सामथ्यंसे विदित होती ह । ाला- 


मनननव्यापारभिन्दरियासंस्पृष्ं 


आत्मा! इत्येवं सर्वत्र प्रयोगा- 


९.३७ 


छन्दोग्योपनिषद्‌ 


{ अष्याय ९ 


~ ~ ~ ८ > -8८ ७-8-8८ ६ 9८ -ढ८ >> >2८ >> < 5८ >< -2€ < < ऋ 8 ऋ 


आत्मनः सत्तामात्र एव ज्ञानक 
(२ 
त्रेत्वन तु व्याप्रततया । यथया 


सवितुः सत्तामात्रमेव प्रकाशन- 


एत्वं नतु व्याप्रततयेति,तदत्‌ 


मनोऽस्यात्मनो देवमप्राकृत- 
मितरेन्दरियेरसाधारणं चकु 


पदयत्यनेनेति चक्षुः । वत॑मान- 


(< 


कारविषयाणि चेन्द्रियाण्यतो- 
ऽदेवानि तानि । मनस्तु त्रिकाल- 


विषयोपरुष्धिकरणं मृदितदोपं 
च घछश्मग्यवदितादिसर्बोपरून्धि- 
करणं चेति देवं चज्ुरुच्यते । 
स वै युक्तः स्वरूपापन्नोऽविधा- 
कुतदेदेन्द्रियमनो वियुक्तः सर्वा- 
त्मभावमापन्नः सनेषः व्योमव- 
दविजुदधः स्वेशवरो मनउपाधिः 
सनेतनैवेश्वरेण मनसेतान्का- 
मान्सविवप्रकाशवननित्यप्रततेन 
द्थनेन पदयन्रमते ॥ ५ ॥ 





काजो ज्ञानकवत्व है वह केवर 
सत्तामात्रे है, उसकी व्याप्तताके 
कारण नहीं हे । जिस प्रकार सूथैका 


परकाशन-कर्वव उसकी सत्तामात्रम 
ही है किसी व्यापारप्रबणताके 
कारण नही दहै, इसी प्रकार इसे 
समक्चना चाद्ये । 

मन दस आसाका दैव-- 
अपात अर्थात्‌ अन्य इन्दि्योसि 
असाधारण च्च है; "चष्टे अनेन 
जिक्षसे देखता है उसे चक्षु कहते 
है । इन्द्रिया वत॑मानकार्विषयक 
है, इषस्यि वे अदेव है तु 
मन॒ तीना कारकि विपर्योकी 


उपरब्धिका करण, क्षीणदोष जर 


सूक्ष्म एवं व्यवहित सभी पदार्करी 
उपरब्धिका साधन दै, . इसलिये 
वह्‌ दैव चक्षु कहा जाता हे । तथा 
वह॒ आमा स्वरूपस्थित होने 
मक्त तथा अविद्याङृत देह, इन्दिय 
ओर्‌ मनसे विघुक्त है, सर्वासमभाव- 
को प्राप्त होनेपर वह आक्‌।शके 
समान विद्ुद्ध ओर स्वर दै तथा 
मनरूप उपाधिवाल दहोनेपर वही 
इस इन्द्र्योके स्वामी मनसे ही 
सूयक प्रकारके समान अपनी निलय 
प्रसत दृष्टिसे इन भोगो दता 
हुआ रमण करता है ॥ ५॥ 


५, 
गन 


शण्ड १२] श्ाङ्करमाष्याथं ९३५ 
प्ट >< 9 9 8८ 8: < -७८-9-9- -- -ः अः 


कान्कामानिति षिरिनषटि।; किन भो्गोको देखता ह 
इसपर श्रुति उनका विशेषण 
बतलाती है । 


य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते 
तस्मात्तेषा सर्वे च रोका आत्ताः सवे च कामाः स 
सर्वा<श्च छोकानाप्नोति सर्गा<श्च कामान्यस्तमात्मानम- 
नुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरूवाच 


॥ ६ ॥ 

लो ये मोग इस त्रहरोकम दै उन देवता हु रमण करता है । 
उत आमाकी देवगण उपासना करते है । इसीपे उन्हे सम्पूणं लोक 
जर समस्त भोग प्रात है । नो उप्त जसाक्रो शास्र ओर्‌ आचायंके 
उपदेशानुस्ार जानकर साक्षात्‌ रूपसे भनुभव करा दै बह समूणं 
लोक ओर समस्त भोगोको प्रप्त कर लेता है । देता प्रजापतिने कहा, 

प्रनापतिने कहा ॥ ६ ॥ 
य एते ब्रह्मणि लोके दिरण्य- | नोये भोग छुवणेकी निषिके 
निषिवद्बाहमविषयासङकारृतेनापि | ५१८ लोकम बाह्य विपर्ोकी 
आक्तिखप अनृतसे आच्छादित है 
हिताः संकल्यमात्ररम्पास्तानि- | अर्थात्‌ केवल संकल्पमात्रसे प्राप 
त्थः । यस्मादेष ह्राय प्रजाप दनो ह जनं देल दे। 
क्योकि इस आसाका प्रनापतिने 
तिनोक्त आतमा तस्मात्ततः | इन्द्रो उपदेश किया दै इखि 
शरुत्वा तमात्मानमदयत्वेऽपि देवा | उनसे श्रवण कर आन भी देवगण 
उपासते । तदुपासनाच्च तेषां | उको उपासना कते दँ । उसकी 
सै च रोका आत्ताः प्राठः | उपाषनासे उन्द सारे सो$ ओर 
खे च कामाः । यदथ दीन | समस्त मोग भरत ह । तसं यह 


29 ॐ 2: ~: ~: ~ 8 38 8८ ॐ >9< >< >~ > 8: ¬ 9 ~ आ -- -2. 
एकशतं वर्षाणि प्रजापतौ ब्रह्म- | दै क जिसके स्थि इन्दे प्रना- 


चर्यभ्वास॒ तत्फलं परां 
देवैरित्यभित्रायः । 
युक्तं देवानां महाभाग्य. 


त्वान्न त्विदानीं मरष्याणा- 


मल्पजीवितत्वान्मन्दतरग्रज्ञत्वाच 


सम्भवतीति प्राप्त इदयुच्यते-स 
सर्वाश्च लोकानाप्नोति सर्वा 
कामानिदानींतनोऽपि; कोऽसौ ! 
इन्द्रादिवद्यस्तमारमानमडविद्य 
विजानातीति ह सामान्येन फिर 
प्रजापतिरुवाच । अतः सर्वेषा- 
मातमन्ञानं तस्फलप्राशि्च तल्येव 
भततीत्यथः । दिवं चनं प्रकरण- 
समाप्त्यथम्‌ ॥ ६ ॥ 


पतिक यहोँ एक सौ एक वपे ब्रह्मचर्य 
वाप किया था वह्‌ फर देवतार्भ- 
को प्राप्त हौ गया । 
देवता महान्‌ भाग्यशारी रै, 
अतः उनके स्यि वह (सम्पूणं छेक 
जोर समस्त ोर्गोकी प्रापि होनी ) 
उचितहीदै, कितु इस समय 
| मनुरष्योको तो उनका मिना 
| सम्भव नदीं है; वर्योकि वे जद्पजीवी 
ओर मन्दतर बुद्धिवलि है पेषी 
राङ्क प्राप्त होनेपर यह कहा 
जाता दहै--वह वतंमानकारीन 
साधक भी सम्पूरणं रोक ओर समस्त 
भोरगोको प्राप्त कर लेता है । वह 
कौन १ जो इन्द्रादिके समन 
उक्त आत्मको जानकर सक्षात्‌ 
अनुभव कर ठेता दै--इस परकर 
सामान्यते ( सभीके स्थि ) 
प्रनापतिने कदा । अतः आली 
ओरं उसके फलकी प्रापि समीके 
स्यि स्मान दै-एेसा ईक 
ताद्य हे । श जापतिरुवाच' इरी 
द्िरक्ति प्रकरणकी समा्िके छि 
दै॥६॥ 


= 9 = 
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये उदर 
कण्डभाष्यं सम्पृणंम्‌ ॥ १२ ॥ 


-- :# :- 


| 


ज्र थीदक्त खण्ड 
= द 
श्यामाच्छवलम्‌" इत मन्त्रका उपदेश्च 
इयामाच्छबलं प्रपद्ये शवलाच्छयामं प्रपयेऽश्च 
इव रोमाणि विधूय पापं चन्दर इव राहोमुंखासप्रमुच्य 
भूत्वा शरीरमकृतं कृतास्मा बरह्मरोकमभिसम्भवामी- 
स्यभिसम्धवामीति ॥ १ ॥ 


षं सयाम ( हदयस्य ) ब्र्षसे रावल ब्रह्मोक परप होऊ ओर 
बते स्यामको पराप्त होञं । अश्च जिस प्रकार रोए ज्ञाहकर निर्मल दहो 
जाता है उसी प्रकार मँ पार्णोको ्ञाङ़कर तथा राहु सुखसे निक्ठे हए 
चन्द्रमाके समान शरीरको दयागङर्‌ इक हयो अक्त ( निलय ) 
्रह्मरोकको प्राप्त होता ह, ्रहरोकको भाप होता ह ॥ १॥ 
क्यामाच्छयलं प्रपद्य इत्यादि-, “इधामाच्छबलं भपय इत्यादि 
९ | मन्त्र पवित्र करनेवाला हे आर 
मन्त्राम्नायः पावनो जपाथश्च | यह्‌ जप्‌ अथवा ध्यानके स्मि दै । 
दयाम वह गम्भीर वणं दै । हृदयस्थ 
च्यानार्थो बा । श्यामो गम्भीरो न 
वर्म; इयाम हव श्यामो हारं इवान वरणके समान सथाम दै, उप 


जह्मातयन्तदुरगादयतातदवा्र हृदयस्थ ब्रह्मो जानकर ध्यानके 
द्वारा उप्त इयाम ब्रह्मते शबर 


९९५ ध्यानेन तस्माच्छ्या- | बरह्मको--जो शबलके समान शब 
माच्छबलं शवर इव शवरोऽर- | दे, केकि नहरोक  असण्यादि 
ण्याद्यनेककाममिश्रतवादघ्रह्मलो- । अनेक कुमनाओंसे युक्त दै इसघ्यि 


६३८ 


छान्दोग्योषनिषद्‌ 


[ ध्याय ८ 


8 3 ~ 


कस्य शाबल्यम्‌, तं ब्रह्मलोकं 
श्वल प्रप्य मनसा शरीरषाता- 
दोष्वं गच्छेयम्‌ । यस्मादहं 
शवलाद््रह्मलोका नामरूपव्या- 
करणाय रयामं प्रपर दादंभावं 
प्रपमरोऽस्मीत्यभिग्रायः । अत- 
स्तमेव प्रतिस्वरूपमात्मानं 
शवल प्रपद्य इव्यर्थः | 

कथं शवलं ब्रह्मरोकं प्रपद्ये ? 
इत्युच्यते-अश्च इव॒ स्वानि 
रोमानि विधूय कम्पनेन धमं 
पांसादि च रोमतोऽपनीय यथा 
निमंलो भवत्येवं हाद्र्म्ञानेन 
विधूय पापं धर्माधर्माख्यं चन्द्र 
इव च राहुग्रस्तस्तस्माद्राोधंखा- 
त््रुच्य भास्वरा भवति यथा-एव 
धृत्वा प्रहाय शरीरं सर्वानर्थाश्न- 
यमिहैव ध्यानेन कृतात्मा कृत- 
कृत्यः सननकृतं निस्य ब्रह्मरोक- 
ममिसम्भवामीति । द्विर्वचनं 
मन्त्रसमाप्त्यथंम्‌ ॥ १ ॥ 


उसको शवर्ता दहै, उस शबल 
्रह्मरोकको मनसे -- शरीरपाते 
पश्चात्‌ प्रात होऊ -- जाऊ, क्योकि 
मँ नाम-खूपक्री अभिग्यक्तिके स्मि 
शवल बह्मलोकसे इयाम-- हार्द. 
भावक प्राप्त हुभार्हू, रेता इष 
अमिपाय है । अतः ताप्यं यह है 
कनि मँ उस अपने प्रतिष्ठ 
शवरु आसक्रो प्राप होड | 

म शवल ब्रह्मलोकको कैे प्राप 
हो सक्ता? सो वतलया नता 
हे--जिष प्रकार अश्च अपने रोषं 
दिखाकर अर्धात्‌ रोम-कम्पनके 
हारा श्रम ओौर धूलि जादि द्र 
करके जैपे निर्मलो नाता है उषी 
प्रकार हार्दरहमके ज्ञानसे धर्माधर्म 
खूप पापकरो ञ्च इकर तथा राहुपरस्त 
चन्द्रमाके समान जिस्न प्रकार कि 
वड राहुके मुखसे निकृरकर प्रकशमात्‌ 
हो जाता दै उसी प्रकार सम्पूण 
अनर्थोकि आश्रयमूत शरीरके त्यि 
कर इस रोक्मे दी ध्यान 
कृतासमा- कृतकृत्य हो अशत 
नित्य ब्रहमलोक्को प्राप्त होत है । 
"तरहमलोकममिसम्भवामि'हसकी दविरकति 
मन्त्रकी समािके ल्यि दै ॥ १॥ 


-*- को$ -- 
इतिच्छान्दोग्यो पनिषयष्टमाध्याये चरयोदुश्च- 
खण्डमाष्यं सम्पूणेम्‌ ॥ १३॥ 

- शाक >~ 


----- न= == 


चतुदैकः खत 





कारणल्पसे जका तंज्ञक नद्या उपदे 


आकाशो वा इत्यादि ब्रह्मणो | “आश्नाशो वै" इत्यादि श्रुति उत्तम 
प्रकारसे ध्यान्‌ करनेके निमित्त ब्रह्मका 


लक्षणनिर्देशाथंम्‌ आध्यानाय । | रक्षण निर्देश कटनेके स्थि हे । 

आकारो वै नाम नामरूपयोनिंवंहिता ते यदन्तरा 
तद्ब्रह्म तदश्रत स आतमा प्रजापतेः सभां वेदम 
प्रपये योऽहं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यञ्ञो 
विशां यदोऽहमनुप्रापस्सि स हाहं यसां यशः 
इयेतमदत्कमदत्कश्ययेतं लिन्दु माभिगां छिन्द 
माभिगाम्‌ ॥ १॥ 

आ्श्च नामे प्रतिद्ध आत्मा नाम ओर रूपक। निर्वाहं करनेवाला 

है। वे ( नाम ओर १) जिसके अन्तगेत दै वह ब्रह्म है, बह 
अमूत दै, वही मास्म ह । मेँ परनापतिके समगृहको परा हो द्व म 
यशःसंज्ञक आत्मा टै; म बराक्षणोकि यश, क्षतरियोके यश ओर वर्योकि 
यश ( यःस्वरूप आत्मा ) को प्रा ह्यना चाहता है; बह नरै यका 
यशर; मे बिना दतिंके भक्षण करनेवाले रोहित वणं पिच्छिल कली- 
विहको प्राप्त न होऊ, भ्रा न होऊ ॥ १ ॥ 


आकाश्नो वै नाम भरुतिषु| “आश्नाश' इस नामे श्तियेमिं 
आला प्रसिद्ध है, क्थोक्षि वह 


प्रसिद्ध आत्मा; आका इवा" | माकाशंके समान मशरीर बर ` 
शरीरतारस्मसवाच्च । स | सूप दै । बह आकाश ( साका 


छा०उ- ३१ 


द७४० 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अध्याय ८ 


८४ ~: ~: 8८ 3585 ~ ~< 3: 9-3८-69 8. ~: ~: >9- ~ 3 -2- >3- 89 -~8- 


चाकारो नामरूपयोः स्वातमस्थ- 
योजंगद्धरीजभूतयोः सिरस्येव 
फेनस्थानीययोनिंवंहिता निरबोा 
व्पाकर्ता । ते नामरूपे यदन्तरा 
यस्य ब्रह्मणोऽन्तरा मध्ये वर्तेते 
तयो्वां नामरूपयोरन्तरा मध्ये 
यन्नामरूपाभ्यामस्पृष्टं यदित्ये- 
तत्तद्रह्म नामखूपविरक्षणं 
नामरूपाभ्यामस्पृष्टं तथापितयो. 
नि्ोदवंलक्षण ्रहमेस्यथः । इद्‌- 
मेव मेत्रेयीत्राहमणेनोक्तं चिन्मा- 
त्राजुगमास्सर्वत्र चिस्स्वहपतैवेति 
गम्यत एकवाक्यता । 

कथं तदवगम्यते १ हइस्याद-स 
आत्मा । आत्मा हि नाम सवं - 
जन्तूनां प्रत्यक्चेतनः स्वसंवेद्यः 
प्रसिद्धस्तेनैव स्वरूपेणाननीया- 
शरीरा व्योमबर्सवेगत आत्मा 


संज्ञक आत्मा ) जके फेनघ्थानीय 
अपनेर्मे स्थित नाम ओर रूपका 
निवहिता-- निर्वाह करनेवाला 
अर्थात्‌ उन्दँ व्यक्त करनेवाख है । 
वे नाम ओर रूप जि्तके अन्तर्गत 
है अर्थात्‌ निस ब्रह्के अन्तरा- 
मध्यमे वतमान है, अथवा जो उन 
नाम ओर पके अन्तरा- मध्ये 
है ओर उन नाम ओर प्ते 
असं्पष्ट है; तात्पयं यह दहै कि वह्‌ 
ब्रह्म नाम-खूपसे विर्क्षण ओर 
नामद्ूप्से अस्पष्ट हे, तो भी 
उनका निर्वाह करनेवाला दै; 
अर्थात्‌ ब्रह्म देसे रक्षर्णोवाल है । 
यही बात [ ब्रहदारण्यकान्तरगंत ] 
मत्रेयीब्राह्मणमे कदी गयी दहै किं 
सर्वत्र चिन्मात्रो अनुगति होनेके 
कारणं सबकी चिद्रूषता दै--इस 
प्रकार इन वाकर्योको एकवाक्यता 
ज्ञात होती है । 


यह बात कैसे ज्ञात होती 
हे श्य्सा प्रश्न होनेपर शति 
कहती दहै-स आत्ा- आत्मा 
सम्पूणं॒जीर्ोज्ञा परयक्वेतन ओर 


स्वसंवेद्य प्रसिद्ध॒दै; उसी रूपसे 
उन्नयन (अहा) करके वेह अशरीर 
ओर आकाके समान सर्वगत आत्मा 





खण्ड १४ 


शा रयाष्याथं 


९४१ 


> 7 + >> ~ > 7 = > > = ॐ 52 ॐ ॐ ^ + = ॐ < 
जह्मत्यवगन्तव्यम्‌ | | ही रह्म है- पा नानना चाहिये । वह 


ब्रह्मामृतममरणधर्मां | 
४.4 
अत उर्व मन्त्रः | भ्रजापति- 


शवतुेसस्तस्य समां वेदम प्रथ- 
विमितं वेदम प्रपदे गच्छेयम्‌ । 


किश्च यशोऽदं यशो नामात्माहं 
भवामि ब्राह्मणानाम्‌ । ब्राह्मणा 


एव हि विशेषतस्तभरुपासते तत- 


स्तेषां यशो भवामि। तथा राज्ञ 
विशां च । तेऽप्यधिहृता एवेति 
तेषामप्यारमा भवामि । तदयशो 
ऽहमनुश्रापत्स्युप्राप्ुमिच्छमि। 
स हाहं यश्सामात्मनां देदैन्द्रि- 
यमनोबुद्धिरक्षणानामास्मा । 


किमर्थमहमेवं प्रप ? इत्यु- 
च्यते-श्येतं वण॑तः पक्तबद्रसमं 
रोहितम्‌ । तथादत्कं दन्तरदित- 
मण्यदत्कं भक्षयिठ्‌ ब्ीव्यज्ञनं 


तृत्सेविनां तेजोबलबीय॑विज्ञान- 


आत्मप ब्रह्म अमृत-अमरणधर्माहै। 
इसके आगे मन्त्र है- प्रजापति 
चतरयुल ब्रकषाका नाम दै, उनको 
समा अर्थात्‌ प्रसुविमितनामक़ गृ्को 
मे प्राप्दोॐ--नाॐ। मे ब्रह्षणोका 
यश-यशचसंज्ञक आत्मा होऊं कर्कि 
ब्राह्मण ही विशेषरूपसे उसकी 
उपासना करते दै; अतः मेँ उनका 
यश होऊ । इसी प्रकार मँ क्षत्रिय 
ओर वैर्योका भी यश्च होऊ | वे 
मी अधिकारी हौ है, अतः मँ उनक्ञा 
भी आसा होऊ" । मँ उनका यश्च 
प्राप्त करना चाहता ्है। वहम 
यशःस्वषटप आसाओंक्ा अर्थात्‌ 
देह, इन्दि, मन ओर बुद्धिरूपः 
अमार्मक्रा जसार्ह । 


म इस प्रकार आत्माक्नो क्यों 
प्राप्त होता ह सो बतलाया नाता 
है- श्येत-जो रङ्गमे पके हए 
बेरके समान छल दै, यथा 
'अइकः- दन्तरहित होनेपर भी 
(अृदस' भक्षण करनेवाले सीचिह्‌- 
को; वृथोकि वह अपना सेवन 
कटनेवालेके तेन, बर, वीयं, विज्ञान 


९७२ छाम्दोग्योयनिवल्‌ [ लष्याय ८ 


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धर्मागामपहन्त्‌ विनाश्ञयित्रिस्य- | बोर घर्मश्च हनन अर्थात्‌ विना 
,_ | करनेवाला है। जो रसे रक्षणो- 
तत्‌ । यदेव॑लक्षणं इयेतं लिन्दु | वाला इयेत रिन्दु--पिच्छिर खी- 
चिह हे उसे प्राप्त न होऊ“ उसमे 
गमन न कृषं । भाभिगाम्‌ 
च्छेयम्‌ । द्िषैचनमत्यन्तानर्थ- | भामिगाम्‌, यह  दविरक्ति उसका 
भ अव्यन्त॒ अन्थेतुत प्रदर्धित 

हेतख प्रदशेना्थ॑म्‌ ॥ १॥ | केके स्थि है ॥ १॥ 


पिच्छलं तन्माभिगां माभिग- 


--ः ® :-- 


इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमघष्वाये चतुर्दश्स्लण्ड- 
साप्यं सम्पणेम्‌ ॥ १४ ॥ 





कञ्चद्क्ल कर्ड 


"> © °= 
अत्मन्नानकी परम्परा, नियम ओर एलक्ता कणन 


~ तद्धेतदूब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिमनवे मन 
प्रजाभ्य आचायकुखाद्रदमघोस्य यथाविधानं युरो 
कर्मातिरोषेणाभिसमात॒स्य टुम्बे शुचो देशो स्वाध्याय- 
मधीयानो धार्मिकान्विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्- 
तिष्टाप्याहिश्सन्सवंमूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खस्वेवं 
वतयन्यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पयते न च पुनरा- 
वतते न च पुनरावतंते ॥ १ ॥ 


उप्त इस आन्मज्ञानका दरहषाने भरजापतिके प्रति वर्णन किय, 
प्रनापतिने मनुसे कहा, मनुने 9जावग॑को सुनाया । नियमानुसार गुरुके 
कर्तन्यकरमोक्रो समाप्त करता हुआ वेदकरा अध्ययन कर आचार्यकुले 
समावत॑नक्रर॒कुटुम्बम स्थित हो पवित्र स्थानम स्वाध्याय करता हज 
[ पुत्र एवं शिप्यादिको ] धार्मिक कर सम्पूणं इन्द्रियोको अपने अन्तः- 
क्रणर्मे स्थापित कर शाक्षकौ ओआज्ञासे अन्यत्र प्राणिर्योक हिंसा न करता 
हभा वह निश्चय ही आयुकी समापतिपय॑न्त इस प्रकार बंता इजा 
[ अन्तम ] ब्रहमलोक्को प्राप्त होता है; ओर फिर नही कोटता, फिर 
नहीं रोटता ॥ १ ॥ 
तद्धेतदात्मन्ञानं सोपकरणम्‌ | [शमादि] उपकरणोके सहित उष 
इस आतमज्ञानका “ओमिव्येतदक्षरम्‌? 
“जोमित्येतदक्षरम्‌” इत्याद्यः सहो- | इ्यादि उपासनाके सहित उसका 


दले 


[ सध्या ८ 


ऋ 95 >: ¬9 9 29. ¬ > 3 96 6-2-८8 -2--8--ढ >8 9-9-86 9 ~ 


पासनैस्तद्ाचकेन ग्रनथेनाष्टाध्या- 
यीलक्षणेन सह बह्मा दिरण्य- 
षे 
गभः परमेश्वरो वा तद्दरिण 
प्रजापतये करयपायोवाच, 
असावपि मनवे स्वपुत्राय, . 
मुः प्रजाभ्यः, इत्येवं श्रुत्यथ- 
सम्प्रदायपरम्परयागतयुपनिष्‌- 
दविज्ञानमद्यापि वषिद्रत्स्ववग- 
म्यते | 
यथेह षष्ठा्ध्यायत्रये प्रका- 


शितात्मविद्या सफरूावगम्यते 
तथा कमणां न कथनाथं इति 
प्राप्ते तदानथंक्यप्राह्िपरिजि- 
हीषयेदं कमणो बिदद्धिरनुष्ठी- 
यमानस्य विचिष्टफलवच्वेना्थ- 
व्वयुच्यते- 
आचा्य॑डलादवेदमधीत्य सदहा- 
थंतोऽ्ययनं कृत्वा यथावि 
धानं यथास्मृरसयक्तेनियमेयुंक्तः 
सन्नित्यर्थः । स्वस्यापि विधेः 


वणेन कटनेवाटे इस आड अध्याय- 
वलि प्रन्थके साथ ब्रह्मा- हिरण्यगर्भ 
अथवा परमेधरने प्रनापति- 
करयपकरे प्रति वणेन क्रिया था। 
उन्होने अपने पुत्र मनुसे का भौर 
मनुने प्रजावर्गको सुनाया | इष 
प्रकार श्रव्यथसम्पदायपरम्परासे 
आया हुआ वह विज्ञान आजभी 
विद्वानोमे देखा नाता है । 

जिप्त प्रकार छठे आदि इन तीन 
अध्यर््म वर्णन की हुई आस- 
विद्या सफ़र समक्षी जाती है उस 
प्रकार कर्मो को प्रयोजन नहीं 
हे--यह वात प्राप्त होनेपर कर्मोकी 
ग्यथंता प्राप्च होती दै; अतः उत्क 
निवृक्तिको इच्छसे विद्ानोद्राय 
अनुष्ठित होनेवले करमोकि विरिष्ट-- 
फरयुक्त होनेसे उनकी सार्थकताका 
निरूपण क्रिया नाता है-- 

आचाय॑कुल्से वेदाध्ययन कर 
अर्थात्‌ यथाविधान- जैसे किं 
समृति्ोने नियम बताये दै उनसे 
यक्त हो अर्थके सहित वेदका 
स्वाध्याय कर- क्योकि उपकुर्वाण 
रहमचारीके स्यि स्मृुक्त सम्पूणं 


स्मत्युक्तस्योपडवाणकर प्रति कर्-| विधि कलनय दै, यतः उम 


खण्ड १५ | 


शाङरभाव्याथ 


--2 


९४५ 


> 83-83-33 क~ 


व्यत्वे गुरलुशरषायाः । 
(५ _ ५ ४५ 
दशेनाथमाह- गुरोः कमे यत्क- 
तभयं तत्कृत्वा कम॑शुन्यो योऽति- 
शिष्टः कालस्तेन कालेन वेदम- 


धीत्येत्यथंः। एवं हि नियमव- 
ताधीतो वेदः करमज्ञानफलप्रा- 


प्रये मवति नान्यथेत्य- 
भिप्रायः । 

अभिसमाबृत्य धर्मजिज्ञासा 
समापयित्वा गुस्करानिवृत्य 
न्यायतो दारानाहृत्य इटुम्बे 
स्थित्वा गाहर्थ्ये विहिते कमणि 
तिष्ठनित्यथः । तत्रापि गाहंस्थ्य- 
विहितानां कर्मणां स्वाध्यायस्य 
प्राधान्यप्रदशंनाथच्यते-शुचो 
विविक्तऽमेष्यादिरहिते देशे यथा- 
वदासीनः सखाध्यायमधीयानो 
नैत्यकमधिकं च यथाशक्ति 
ऋगाधस्यासं च डुबन्धाभकान्पु 
त्राञ्किष्यांश्च धमयुक्तान्िदध- 


गुयुश्रूषाकी प्रधानता प्रदर्चित 
करनेके स्यि श्रुति कहती दै- 
गुरुका जो क्रनेयोग्य कमं हो उसे 
करके जो कर्मद्य समय शोष रदे 
उस समयमे वेदका अध्ययन कर- 
सा इसका तात्य ॒दहै। अतः 
अभिप्राय यह दहै कि इस प्रकार 
नियमवान्‌ विद्या्थीका अध्ययन 
क्रिया हुजा वेद ही कमं भौर 
जञानकी फलप्राधिका देतु होता दै 
लोर किसी प्रकार नहीं । 
“अभिसमाबरत्यः अर्थात्‌ ध्म- 
निज्ञासाको समाप्त कर गुरुकुरसे 
निदत्त हो नियमपूव॑क सीपरिग्रह कर 
कुटुम्बे स्थित हो अर्थात्‌ गृहस्था- 
भरमम विहित कर्म तत्पर हो; वहाँ 
भी गृहस्थाश्रमके लियि विहित कर्मा 
म स्वाध्यायकी प्रधानता प्रदर्चित 
करनेके ल्यि एेसा कहा जाता हे- 
्यचि- विविक्त अर्थात्‌ अपवित्र 
पदार्थोसे रहित स्थानम यथावत्‌ 
बैठकर स्वाध्याय करता हुआ अर्थात्‌ 
प्रतिदिनका नियमित पाठ ओर यथा- 
शक्ति उससे अधिक भी छगादिका 
अभ्यास करता हुआ पुत्र एवं शिर्यो- 
को घार्भिक-षमवान्‌ बनाता हमा 
अर्थात्‌ ार्मिकतद्वारा उनका नियमन 


द्वार्भिकत्वेन तानियमयन्नात्मनि करता हुभा “आत्मनि'_ भपने 


शधद 


छान्दोग्योपनिषद्‌ 


[ अन्याय ८ 


> 9 9 >8८ ¬< 9 ~क 6 > ¬< ~56 < ~ ~ ¬ ~ ~ >> 89 -ट 


स्वहृदये हाद ब्रह्मणि | 
सम्प्रतिष्ठाप्योपसंहृत्येन्द्रियग्रद- 
णात्कर्माणि च संन्यस्या 
सन्‌ हिंसां परपीडामङुव॑न्‌ सवं- 
भूतानि स्थावरजङ्गमानि भूतान्य 
पीडयनित्यथंः । 
भिक्षानिमित्तमटनादिनापि 


परपीडा स्यादित्यत आदह- 


अन्यत्र तीर्थेम्यः । तीथं नाम 


श्ाख्रानुज्ञाविषयस्ततोऽन्यत्रेस्यथः। 


सर्वाश्रमिणां चैतत्समानम्‌ । 
तीर्थेभ्योऽन्यत्राहिसैवेत्यन्ये बणे 
यन्ति । इुटुम्ब एवैतत्सवं कुव 
` न्स खन्वधिकृतो यावदायुषं 


यावज्ञीवमेवं यथोक्तेन प्रकारेणेव 


वतंयन्‌ ब्रह्मलोकमभि सम्पद्यते 


दान्ते । न च पुनरावतंते श्रीर- 









हृदयम यानी हद्यस्थ ब्रहम सम्पू 
इन्दर्यको स्थापित--उपसं हत कर 
जीर इन्दियनिग्रहद्रारा कर्मोका 
संन्यास कर “अहिसन्‌ः-हिसा 
अर्थात्‌ परपीडा न करता हभ 
यानी स्थावर्‌-लंगम समस्त प्राणिर्यो- 
को पीडित न करता हुभा । 


भिक्षाके लिय किये इए भम- 
णादिसे भी परपीडा ( हिसा) हो 
सकती है, इसर्यि श्रुति कहती 
है- “अन्यत्र तीर्थभ्यःः । नो 
शाखाज्ञाका विषय दै उसे तीथ 


कहते है, अतः तासपयं यह्‌ है कि 


उसके सिवा अन्यत्र हिसान करता 
हुआ । यह नियम सभी जाश्र्मोके 
स्यि समान दहै । कुछ अन्य 
विद्वान्‌ ोग तो एेसा कहते दै कि 
ती्थेकि सिवा भौर सब जगह 
अिसाका दही विधान दहै । 
अपने कुटुम्बे ही यह सब 
करता हुम वह अधिकारी पुरूष 
आयुपर्यन्त अर्थात्‌ यावल्नीवन 
उपर्युक्त प्रकारसे ही बतेता हआ 
देहान्त होनेपर ब्रहमरोकको भर्त 
होता दै, जर फिर शरीर अहण 
छरनेके स्यि नहीं लोटत; क्योदि 


लज्ड १५] शाङ्करभाष्याथ ९१७ 
>9 8-9-9८ 8-8-8८ >9८ 8 -8- -- 9-8-89 9: + 


ग्रहणाय; पुनरावृत्तः प्राप्ताया; । पुनर वृको प्रापिका परतिपेष धिया 

त गया है । तायं यह दै कि अर्बि- 
प्रतिषेधात्‌ । अ मागण | रादि मार्गते कार्थत्रहमके लोको 
प्राप्त हो नवतक त्रह्मरोककी स्थिति 
रहतो दै तवत वह वहीं रहता दै, 
ह्ललोकस्थितिस्वावक्ततरैव तिष्ठति | उसका नाश होनेसे पूवं वह वदसे 

९ ८ 4 

प्राक्ततो नावर्दव इत्यर्थः । | नही रोता ।# न च पनराव॑ते, 


न च पुनरावर्तते यह द्विरुक्ति 
उपनिषद्विद्यापरिस- = 
दविरम्या्च उपनिषदि उपनिषदुविद्याकी समाति सूचित 


कायंत्रह्मलोकममि सम्पद्य यावद्र- 


माप्त्यथः ॥ १ ॥ करेके ल्यि दै ॥ १॥ 
मअ 
दतिच्छान्दोम्योपनिषदैष्टमाभ्याये पन्चद्श- 
खण्डीभ्यं सञ्पूषणम्‌ ॥ १५॥ 
क्म 
इति भीगोविन्दभगवत्पूग्यपादशिष्यस्य परमहंसपसि्रा जकाचायस्य 


भीशङ्करमगबतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्धाष्येऽटमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ 
॥ छान्दोग्योपनिप्रद्धाष्यं समाप्तम्‌ ॥ 
॥ ॐ तत्सत्‌ ॥ 





@ यह यह शंका होती है कि क्या ब्रह्मछोकके नाश होनेके द्‌ व 
रता है ? तो इसका उत्तर रै नहीं, बह दर्ये विलीन दौ जाता रै, श्योंकि 
ब्रह्रोकके नाश होनेके बाद तो कोई ोक दी नीं रह जाता है । 





भीहरिः 


\4 
भन्त्राणां वणानुकरमणिका 
ष 

सन्त्रप्रतीकानि अण खं* मं पृष्ठ 
अभिहारो वायुः र २० १ २०२ 
अग्िष्टे पादं वक्तेति ४ ६ श" ` 
अजा हिङ्कारोऽवयः र १८ १ १९९ 
अतो यान्यन्यानि १ ३ ५ ६९ 
अत्र यजमानः परस्तादायुषः र र & २१७ 
2) 99 ~ र र १० २३९ 
अत्स्यन्नं पद्यसि प्रियम्‌ = १२ २ ५४७ 

3 9 ५ १४ र्‌ ५५२ 

39 3१ ५ १५ र्‌ ५५३ 

9 2 ५ १६ र्‌ ५५५५ 

क 9) ५ १७ र्‌ ८५५७ 
अय खलु य उद्गीयः १ ५ १ ८१ 

1 १ ५ ५ ८७ 
अथ खलु व्यानमेवोद्गीथम्‌ १ ३ ३ ६७ 
अथ खटूदूगीयाश्चराणि ~ ५९ ३ ६ ७० 
अथ खत्वमुमादित्यम्‌ २ ९ १ १७३ 
अथ खल्वात्मसंमितमति° र १० ¶ १८१ 
अथ खल्वाशीः १ | ८ ७४ 
अथ खह्वेतयचां पच्छः षु २ ७ ४६८ 
अथ जुहोति नमः र २४ १४ २४० 
अय जुहोति नमो वायवे २ २४ ९ २१८ 
अय जुहोति नमोऽग्नये २ २४ ५ २३६ 
अथ तत ऊर्वः ३ ११ १ २७२ 
अथ प्रतिसुप्याज्ञढौ ५ र ६ ४६७ 
अथ य आत्मा स सेवः ८ 1 १ ८३६ 
अथय इमे प्रामे ५ १९ ३ ५०९ 


( ९५० ) 


५ 
9 


मन्त्रप्रतीकानि 


अथ य एतदेवम्‌ 
अयय एतदेवं व्रिद्रान्‌ 
अथय एत्र सम्प्रत्नाद्‌; 
अथ य एषोऽन्तरक्षिणि 
अय यच्चतुममृतम्‌ 
थ यत्तदजायत 
अय यत्तपो दानम्‌ 
ख्य यत्ततीयममृतम्‌ 
श्य यत्पञ्मममृतम्‌ 
भथ यत्प्रथमास्तमिते 
अय यत्प्रथमोदिते 
सुय यत्रतत्पुरषः 
सय यत्रेतदबलिमानम्‌, 
अय यत्रतदस्माच्छरीराद्‌ 
अथ यत्रेतदाकाराम्‌ 
अथ यत्रोपाकृते 
अय यत्सङ्गववेलायाम्‌ क 
अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स 
अथ यत्सत्त्रायणमित्याचश्चते 
श्य यदत परो दिव 
अय यदनांशकायन्नित्याचश्चते 

. अय यदवोचं भुवः 
अथ यदवोचं भूः 
अथ यदवोचं स्वः 
अथ यदश्नाति 
अथ यदास्य वाङ्मनधि त 
अथ यदि गन्धमात्यलेककामः 


अथ यदि गीतवादित्रखोककामः 
अथ यदि तस्याकर्ता 

अथ यदिद्मस्मिन्तरह्पुरे 

अथ यदि ्रावरलोककामः 

अथ यदि महजिगमिषेद्‌ 


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१७६ 
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२९८ 
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३२१ 
१२० 
३२१ 
१३० 
६९५ 
८२३ 
८२३ 


७०० 
८०५ 
८२२ 
४६४ 


मन्त्रप्रतीकानि अ० खं मं, ५ 
अय यदि मातृखोककामः ८ २ २ ८२२ 
अय यदि यजुष्टो रिष्येत्‌ 1 १७ ५ ४३६ 
अथय यदि खखिटोककामः ८ २८ वकु 
सथ यदि सामतो रिष्येत्‌ ४ १" 
अय यदि ल्ीलोककामः ८ २ ९ रथ 
अथ यदि स्वसुलोककामः ८ २ ४ ८२२ 
अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यम्‌ क 1 ^ 
अथ यदृध्वं मध्यन्दिनात्‌ २ ९ "+ 
अय यदध्वंमपराह्वात्‌ १.४२ ९ १७१९ 
अथ यदेतदक्ष्णः शुक्टम्‌ > ॐ व ९९ 
अय यदेतदादित्यस्य १ ©. ५) ९२ 
अथ यदेवैतदादित्यस्य १ 1. € ९३ 
अथ यदुद्धितीयमगतम्‌ ३ ७ १ २६२ 
अथ यद्धसति र १७ र ३३१ 
अथ यद्यज्ञ इत्या चक्षते "र. ५, १ ८४२ 
अथ यय्न्नपानटोककामः ८ र्‌ ७ ८२३ 
अथ य्रप्येनानुक्रान्त° © % ३ ७७१ 
अथ ययेनमूष्मसूपाठमेत २ ` २२. + २१६ 
अथ या एता हृदयस्य ८ # १ ८५४ 
अथ यां चतुर्थीम्‌ ९ २२ १ ५६७ 

अथ यां तृतीयाम्‌ ५ २१ १ ५५६६ 
अथ यां द्वितीयाम्‌ ५ २० १ ५९६५ 
अथ यां पञ्चमीम्‌ ५ २३ १ ५६८ 
अथ यानि चतुश्चत्वारिंशत्‌ ~ ३ दश 
अथ यान्यष्टा चत्वारि शत्‌ र १६ ५ ३२७ 

अथ ये चास्येह ८ ३ र ८२७ 

अय येऽस्य दक्षिणा रश्मयः ३ २ १ २४९ 

अथ येऽध्य प्रत्यखः ३ ३ १ २८५१ 

अथ येऽश्योद्ः डे ४ १ २५२ 

अथ येऽध्योध्वां रमयः ३ 2 

अय यो वेदेदं मन्वानीति ८. १ 

। १३ र्‌ २९१ 


अथ योऽघ् दक्षिणः 


( ९५२ } 


भन्तरप्रतीकानि 


अथ योऽस्य प्रत्यङ्‌ सुषिः 
अथ योऽस्योदङ्‌ सुषिः 
अथ योऽस्योध्वंः सुषिः 
अय सप्तविधस्य वाचि 
अथ ह हसा निशायाम्‌ 
अथ ह चक्षुरुद्गीथम्‌ 
अय ह प्राण उच्चिक्रमिषन्‌ 
अथ ह प्राणां अहे भेयसि 
अथ ह मन उद्गीथम्‌ 
अथ ह य एतानेवम्‌ 

अथ हय एवायं मुख्यः 
अथ ह वाचमुदुगौथम्‌ 
अथ ह शौनकं च 

अथ ह श्रोत्रमुद्गीथम्‌ 
अथ हाभ्रयः समूदिरे 
अय देन्द्रोऽप्राप्यैव 

अथ हैनं गाहंपत्यः 

अथ हैनं प्रतिहतोंपखसाद 
अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद 
अथ हैनं यजमान उवाच 
अथ हैनं वागुवाच 

अथ हैन भोतरमुवाच 

अथ हैनमन्वाहाय॑पचनः 
अथ हैनमाहवनीयः 

अथ हिनमद्गातोपखसाद्‌ 
अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद 
अय होवाच जनशा~ क॑राक्ष्य 


अय होवाच बुडिकमारवतराधिम्‌ 
अथ होवाच सत्ययज्ञम्‌ 

अथ होवाचेन्रयुम्नम्‌ 

अथ होवाचोदाल्कम्‌ 

अथात आत्मादेश्च एव 


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५५५७ 
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मन्त्रप्रतीकानि 


अथातः शौव उदूगीयः 
अथाधिदैवतं य एवासी 
अथाध्यात्मं प्राणो वाव 
अथाध्यात्मं य एवायम्‌ 
अथाध्यात्मं वागेवकर्प्राणः 
अथानु किमनुरिष्टः 
अथानेनैव ये चैतस्मात्‌ 
अथावृत्तेषु यौर्दिङ्कारः 
अथैतयोः पथोन॑ कतरेण 
अथोताप्याहुः 

अधीहि भगव इति 
अनिरुक्तछ्योदशः 
अन्तरि्षमेवग्वायुः 
अन्तरिक्चोदरः कोशः 
अन्तं वाव बलाद्भूयः 
अन्नमय_ हि सोभ्य 


११ ११ 
अन्नमशितं त्रेधा विधीयते 
अन्नमिति होवाच 
अन्यतरामेव व्त॑नीम्‌ 
अपां का गतिरित्यसौ 
अपा_ सोम्य पीयमानानाम्‌ 
अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति 
अभिमन्थति स हिङ्कारः 
अभ्रं भूत्वा मेधो भवति 
अभ्राणि संप्लवन्ते 
अमृतत्वं देवेभ्यः 
अयं वाव छोकः 
अयं वाव स योऽयमन्तः 
अयं वाव स योऽयमन्तहंदये 


अरिष्टे कोशम्‌ 
अश्यनापिपासे मे सोम्य 


( ९५६ ) 


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९१ 
२१७ 
७४९ 
६२६ 
६२१ 
६२९२ 
१३६ 
४३० 
१११ 
६३० 
५५६६ 
१८९ 
५२१ 
५९४ 
२१० 
४४ 
२८५ 
२८५ 


२२० 
६४८ 


मन्त्रप्रतीकानि 


अशरीरो वायुरभ्रं बिदयुत्‌ 
असौ वा आदित्यः 
असौ वाव लोकः 
अस्य यदेका शाखाम्‌ 
अस्य लोकस्य का गतिः 
अस्य सोम्य महतो बृश्चस्य 
आकारो वाव तेजसः 
आकाशो वे नाम 
आगाता-इ वै कामानाम्‌ 
आत्मानमन्तत उपसृत्य 
आदित्परतस्य रेतखः 
आदित्य इति होवाच 
आदित्य ऊकारः 
आदित्यमथ वैश्वदेवम्‌ 
आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः 
आदिरिति द्वश्चरम्‌ 
आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते 
आपयिता इ वै कामानाम्‌ 
आपो वावान्नादूभूयस्यः 
आप्नोति दादित्यस्य 
आशा बाव स्मराद्भूयसी 
इति तु पञ्चम्यामाहूतावापः 
इदं वाव तज्ज्येष्ठाय 
इदमिति ह प्रतिजज्ञे 
इमाः सोम्य नयः 
इयमेवग॑चिः 
उदशराव आत्मानमवेक्ष्य 
उदाने तप्यति स्वक्तृप्यति 
उद्गीय इति च्यक्षरम्‌ 
उदुगरह्वाति तन्निधनम्‌ 
उद्दाक्को हारुणिः 
उद्यन्हिङ्कार उदितः 


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मच्प्रतीकानि 

उपकोसठो ह वे 

उपमन्त्रयते स हिङ्कारः 

श्रुग्वेदं भगवोऽध्येमि 

श्रतषु पञ्चविधम्‌ 

्कवि -शत्यादित्यम्‌ 

एत संयद्वाम इत्याचक्षते 

एतद्ध स्म वे तद्विदा -खः 

एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह 

प्तमर एवादममभ्यगासिषम्‌ 
3 १३ 

प्तमृर्वेद्‌मभ्यतप .स्तस्यामि° 

एतेषां मे देदीति 

एवं यथादमानमाखणमृत्वा 

एव_ सोम्य ते षोडानाम्‌ 

एवमेव खलु सोम्य 


9१ ११ 
एवमेव खटु सोम्येमाः 
एवमेव प्रतिहतारवाच 
एवमेवैष मघवन्निति 


9) 3 
एवमेवेष सम्प्रसाद्‌ः 
एवमेवोद्गातारमुवाच 
एवमेषां ोकानामासाम्‌ 
एष उ एव भामनीरेष हि 
प्एष उ एव वामनीरेष हि 
एष तु वा अतिवदति 
एष म आत्मान्तद्दये 
एष वै यजमानस्य 
एष ह वा उद्कप्रवणः 
एष ह वै यज्ञो योऽयम्‌ 
एषां भूतानां एथिवी रसः प 
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३२ 
४२ 





मन्त्रप्रतीकानिं 

ओमित्येतदद्षरमद्गीथमुपासीत 
११ १३ 

ओपमन्यव कं त्वम्‌ 

कं ते काममागायानीत्येषः 

कतमा कतमक्कंतमत्‌ 

कल्पन्ते हास्मा ऋतवः 

कतपन्ते हास्मै 

का साम्नो गतिरिति 

कुतस्तु ललु 

क्व तदं यजमानस्य 

गायत्री वा इद “सवम्‌ 

गोजश्वमिह महिमेत्याचक्षते 

चक्षुरेव बह्मणश्चतु्थः 

चक्षुरेवगात्मा 

चक्ु्होज्चकाम 

चित्तं वाव सङ्कल्पाद्‌मूयः 

जानभूतिहं पौत्रायणः 

तं चेदेतस्मिन्वयसि 


2) | 


११ ११ 

तं चेदृशरूयुरस्मिश्चेदिदम्‌ 
त चेद्न्रयुयंदिदमस्मिन्‌ 
तं जायोवाच तसः 
तं जायोवाच इन्त 
तं मद्‌ गुरुपनिपत्याभ्युवाद 
त_ह_ स उपनिपत्याभ्युवाद 
त_ इ चिरं वसेत्याश्चा० 

, त. ह प्रवाहणः 
त_ह शिलकः 
त_ हाङ्गिरा उद्गीयम्‌ 
त हाभ्युवाद्‌ रैक्वेद्म्‌ 
त हेतमतिषन्वा 


( ९६ ) 


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( ९५७ ) 
मन्त्रप्रतीकानि अ० 
त“ होवाच किंगो्रः 
त होवाच मैतदत्राह्णः 
तोवाच यं वे 


तदोवाच यथा सोम्य 

त होवाच यथा सोम्य 

त इमे सत्याः कामाः 

त दृह व्याघ्रो वासिशोवा 
त पतदेव रूपमभि° 


त्दुातृाततवि 


तथामुर्िरलोके 
तथेति ह समुपविविशुः 
तदुताप्याहुः साम्नैनमुपा० 
तदु ह जानश्रुतिः 

१३ 


१8 
तदुह श्षौनकः कापेयः 


तदेतच्चतुष्पाद्बह्म 
तदेतन्मिथुनमोमिति 
तदेष इलोकः 

तदेष श्टोको न पश्यः 
तदेष श्लोको यदा 
तदेष शोको यानि 
तदैश्चत बहु स्याम्‌ 
तदधैतत्सत्यकामः. 


तद्धैतद्धोर ाज्गिरखः 


तद्धैतदूब्ह्मा प्रजापतये 
तदोमये देवाञुराः 
तृ इत्य विद्धः = 


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३८२ 


मन्त्र प्रतीकानि 


तद्य इह रमणीयचरणाः 
तद्य एवैतं ब्रह्मटोकम्‌ 
तय पएवैतावरं च 
तदत्प्रथमममृतम्‌ 
तयगैतत्सुसः 

9१ 1 
तद्यथा महापथ आततः 
तद्यथा छ्वणेन 
तययेषीकातृलमग्नौ 
तययेह करमम॑जितो टोकः 
तययुक्तो रिष्येद्‌ मूः 
तययद्ध क्त प्रथममागच्छेत्‌ 
तद्यद्रजत सेयं प्रथिवी 
तथा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि 
तद्वयश्चरतदादित्यम्‌ 

9 33 

११ 9१ 

११ 9) 

११ ११ 
तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम 
तमु ह परः प्रस्युवाच 

› तमु ह परः प्रत्युवाचाह 
तयोरन्यतरां मनसा 
त्मा आदित्याश्च 
तस्मा उ ह ददुस्ते 
तस्मादप्यवेहाददान० 
तष्मादाहुः सोष्यति 
तस्मादु हैवंविद्यद्यपि 
तस्माद्वा एत सेत॒म्‌ 
तस्मिनिमानि सर्वाणि 
तस्मिन्नेतस्मिनग्नौ 


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मन्त्रप्रतीकानि 
तस्मिन्नेतस्मिनभौ 


9 33 

११ ११ 
तस्मिन्यावत्संपातम्‌ 
तस्मै श्वा श्वेतः 
तस्य क्व मूलं स्याद्‌ 


११ 3 
तस्य प्राची दिग्नुहूनाम 
तस्य यथा कप्यासम्‌ 
तस्य यथामिनहनम्‌ 
तस्य ये प्राञ्च रमयः 
तस्यक््चं साम च गेष्णौ 
तस्य ह वा एतस्य ~ 
तस्य ह वा एतस्यात्मनः 
तस्य ह वा प्तस्यैवम्‌ 
तस्या ह म्ुखमुपोद्‌ग्कन्‌ 
तस्यैषा षट त्ेतत्‌ 
च्रयी विदा हिङ्कारखरयः न 
त्रयोः घरम॑स्कन्धा यज्ञः -“ 
ज्रयो होद्गीये 
ता आप रेशखन्त 
तानि बा एतानि यजू ष्येतम्‌ 
तानि वा एतानि सामानि 
तानि ्टवा एतानि 

39 2 


93 39 


तानु तत्र मृ्युय॑या 


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तान्होवाच प्रातः 


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मन्त्प्रतीकानि 


तावानस्य महिमा 
तासां त्रिढृतं तरि्तमेकेकाम्‌ 
११ 9 

तेजसः सोम्याश्यमानस्य 

तेजो वाबाद्धधो भूयः 

तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते 

तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः 

तेनतंह बकः 

तेन तं ह बृहस्पतिः 

तेन तें हायास्य 

तेनेयं चयी विन्या 

तेनोमो कुरुतो यश्चैतत्‌ 

ते यथा तत्र न विवेकम्‌ 
वा एते गुह्याः 

तेवा एतेऽथवोङ्किरसः 

तेवा एते पञ्च 

तेवाएते रसानां रसाः 

तेषां लल्वेषां भूतानाम्‌ 

ते ह प्राणाः प्रजापतिम्‌ 

ते ह नासिक्यम्‌ 

ते ह यथेवेह 

ते ह सम्पादयाञ्चकररुदाखकः 

ते दोचुरूपकोखटेषा 

ते होचुर्येन दैवा्थेन 

तोवाणतोद्वौ 

तोह द्वात्रिं शतं वर्षाणि 
ह प्रजापतिरुवाच 


39 3३ 
तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिः 
तौ होचतुर्यथेवेद्‌० 
दध्नः सोम्य मथ्यमानस्य 
इग्बेऽस्मे वाग्दोदम्‌ 


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९१०९ 


देवा वै मूत्योर्विभ्यतः 


देवासुरा ह वै यत्र 
द्रेवगौदित्यः 
चरेबोदन्तरिष्च गीः 
ध्यानं वाव चित्ताद्भूयः 
नक्षत्ाण्येवक्चन््रमाः 

न वयेनास्य हन्यते 


११ ११ 
नत तत्र न निम्कोच 
न वै नूं भगवन्तस्त 
नवेवाचोन चक्षुषि 
न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति 
नह वा अस्मा उदेति 
न दाप्य परेत्यप्युमान्‌ 
नान्यस्मै कस्मैचन 
नाम बा ऋम्बेदो यजवदः 
नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति 
निधनमिति च्यक्चरम्‌ 
नेवेतेन सुरभि न 
न्यग्रोधफलमत आहरेतीदम्‌ 
पञ्च मा राजन्यबन्धुः 
परोवरीयो हास्य भवति 
पर्जन्यो वाव गौतमाग्निः 
पपु पञ्चविधम्‌ 
पुरा तृतीय सवनस्योपा० 
पुरा प्रातरनुवाकस्योपा° 
पुरा माध्यन्दिनस्य 
पुरषं सोम्योत 
पुरुषं सोभ्योतोपतापिनम्‌ 
पुरुषो वाव गौतमाग्निः 
पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य 
परथिवी वाव गौतमाग्निः 


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मन्त्रप्रतीकानि 
प्रथिवी दिङ्कारोऽन्तरिक्षम्‌ 
प्रजापति कानमभ्यतपत्‌ 
११ ११ 
प्रवृत्तो ऽश्वतरीरथः 
प्रस्तोतर्या देवता 
प्राचीनशाल ओपमन्यवः 
प्राण इति होवाच 
प्राण एव ब्रह्मणश्चतुथः 
प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति 
प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः 
प्राणो वा आशायाः 
प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि 
पाप हाचायकुलम्‌ 
बरु वाव विज्ञानाद्भूय 
अ्रह्मणः सोम्य ते पादम्‌ 


ब्र्मणश्च ते पादं वाणीति 
ब्रह्मवादिनो वदन्ति 
ब्रह्मविदिव वै सोम्य 
भगव इति ह प्रतिशुश्राव 
भगवां स्त्वेव मे 

भवन्ति हास्य पडावः 
मघबन्मत्यं वा इदम्‌ 
मय्चीहतेषु कुरुष्वाटिक्या 
मद्गुष्टे पादं वक्तेति 
मनो ब्रहम त्युपासीत 
मनोमयः प्राणदारीरः 

मनो वाव वाचो भूयः 
मनो दिङ्कारो वाक्‌ 

मनो होच्चक्राम 

मानवो बद्धे वैक ऋछूलिक्‌. 


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सन्त्रप्रतीकानि 


मासेभ्यः पितृलोकम्‌ 
मासेभ्यः संवत्सरम्‌ 

यं यमन्तमभिकामः 

ख आत्मापहतपाप्मा 

य एते ब्रह्मलोके 

य एष स्वप्ते महीयमानः 

य एषोऽक्षिणि पुरूषः 
यचन्द्रमसो रोहितं रूपम्‌ 
यत्न नान्यत्पश्यति 

यथा कतायविजितायाघरेयाः 


११ ११ 
यथा वि्टीनमेवाङ्ग 
यथा सोम्य पुरूषम्‌ 
यथा सोम्य मधु मधुकृतः 
यथा सोम्यकेन 
यथा सोम्यैकेन नख० 
यथा सोम्यैकेन टोह० 
यथेह क्षुधिता बाला मातरम्‌ 
यदग्ने रोहित रूपम्‌ 
यदादित्यस्य रोहितम्‌ 
यदप उच्छुष्यन्ति 
यदा वा ज्रुचमाप्माति 
तदा वै करोत्यथ 
यदा वै निस्तिष्ठत्यथ 
यदा वै मनुतेऽथ 
यदा वै विजानात्यथ 
यद्‌ वै श्रदधात्यथ 
यदा वै सुखं कभतेऽथ 
यदुदिति स उद्गीथः 
यदु रोहितमिवाभूदिति 
यदूविज्ञातमिवाभूत्‌ 
यद्वियुतो रोहितं सपम्‌ 


( ९६३ ) 


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१७१ 


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६२१ 
६१8 


( २६७ ) 


मन्त्रप्रतीकानि 


८ अ० खं मश प 
यद्धे तत्पुरुषे शरीरमिदम्‌ १ १ 
यदे तद्रो तीदम्‌ ३ १२ 
यस्तद्‌ स वद्‌ ५ ४ २०६ 
यस्यामृचि तामचम्‌ ०६ ३ ९ 
यां दिदामभिषष्यन्‌ १ ३ ११ ५५ 
या वाक्सक्तंस्मात्‌ १ ३ ~ 4 
यावान्वा अयमाकाराः > १ २ ८०९ 
या वै सा गायत्रीयम्‌ ३ .१२*+ 
यावै सा प्रथिवीयम्‌ ३ - १२.२२ 
येनच्छन्दसा १ ३ १० 
येनाश्रुत रुतम्‌ ६ १ ९ 
यो वे भूमा तत्युखम्‌ + ७ २३२ > त 
योषा वाव गौतमाग्निः . "५ न च 
यो ह वा आयतनम्‌ ५४ १, „५, 
यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च - ५. १. 
योह वै प्रतिष्ठां वेद „ ५ 9 २. + 
योह वै वसिष्ठं वेद ५ १ २ ४४४ 

यो ह वै सम्पदं वेद ५, १... 
रैक्वेमानि षटद्ातानि ४ २. 

छ्वणमेतदुदकेऽवधायाथ ६ - १३. 27. 

लो २ कद्वारमपावारणू „२ २४ > 

9 9 १. २ र € +~ 
११ ११ र र 9 र ५ 
लोके पञ्चविध सामोपासीत २ - 
लोम हिङ्कारस्त्वक्प्रस्तावः 2 ५ 9 ^ 

वसन्तो दिङ्कारः २ 9६ 9 

वसिष्ठाय स्वाहित्यग्नावाज्यस्य . ५. "र च 

वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः "न ३ = ` "पथन्न य) 

वागेवक्‌ प्राणः १ ० ५ 

वाग्वाव नाम्नो भूयसी ७ निरो 

वायुर्वाव संवर्गो यदा = "४ ` 3 

विन वाच ध्यानादूमूयः ~^ "७ = 


( ९६५ ) 


मन्त्प्रतीकानि अ० खं मं 
विनि साम्नो इणे २ र 
ब्रां पञ्च विधम्‌ र ३ १ १५९ 
वेत्थ यथासौ लोको न ५ ३. ह 
वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः ५ ३ ९ 1; 
व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति ५ २० र 
श्यामाच्छबलं प्रपर ८ २ १ ९३७ 
श्रुत ह्येव मे भगवदूददोभ्यः ४ ९ ३ ३९८ 
श्रोत्र होच्चक्राम ५ १ १० ५४९ 
श्रत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः ३ १८ ६ ३४२ 
श्रोत्रमेवडमंनः १ ७ ३ ९९ 
इवेतकेतु्हाख्णेयः ८ ३ १ ५७२ 
9 3 ६ १ १ 4७४ 
धोडशाकलः सोम्य & ७ (तल 
संकल्पो वाव मनसः ७ ४ 9. ७२७ 
स एतां जयी विदाम्‌ ४ १७ ३ ४२५ 
ख एतास्तिखो देवताः ध 9 २ ५३५ 
स एवाधस्तात्स उपरि° 3) २५ १ ७९३ 
स एष परोवरीयानुद्गीथः १ ९ स. 
ख एष ये चेतस्मात्‌ १ ७ & ` १०३ 
स एष रसाना रसतमः १ १ ३ २३४ 
स जातो यावदायुषम्‌ 8 ९ २ ५९८ 
सत्यकामो ह जाबालः ४ ४ श ३८० 
सदेव सोम्येदमग्ने ६ २ १ ५८२ 
स ब्रयान्नास्य जरथैतत्‌ ८ १ ॥ 
समस्तस्य खटु र १ १ १४९ 
समान उ एवायं चासौ १ ३ र ६६ 
समाने तृप्यति मनस्तृप्यति ५ त्‌ २ ५६७ 
स य आकारं ब्रह्म व्युपास्त ७ २ ५७६० 
स य आशां बरद त्युपास्ते ७ २. ९ 
स य इदमविद्रानगनिहोत्रम्‌ ५ २४ ९ _ ऋ 
स य एतदेवं विद्वानक्षरम्‌ १ ४ ५ ८९ 
(4 १ 1 १५२ 


स य एतदेवं विद्वान्‌ 


मन्त्रप्रतीकानि 


सय एतदेवममृतं वेद्‌ 


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स य एतमेवं विद्वा -श्वतुष्कलम्‌ 


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ख य एतमेवं विद्वानादित्यम्‌ 


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स य एतमेवं विद्वानुपास्ते 


११ 9 


9 


११ ११ 


स य एवमेतत्साम 
सख य एवमेतदब्हदादित्ये 


` स य एवमेतयज्ञायज्ञीयमङ्खेषु 


स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ 
स य एलमेतद्गायत्रम्‌ 


स य एवमेतद्राजनं देवतासु 


स य एवमेतद्वामदेव्यम्‌ 
स य एवमेतदवैराजम्‌तुषु 
स य एवमेतद्रैरूपम्‌ 


स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु 


स य एवमेता 


रेवत्यः 


स य एषोऽणिमैतदात्म्यम्‌ 


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स यः संकल्पं 


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ब्दो स्युपास्ते 


( ९६६ ) 


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२६२ 
२६४ 


२७० 
३८८ 
२३९१ 
२९२ 
२३९५ 
२५० 
४९० 
४१२९ 
४१४ 
२०५ 
१९३ 


१९० 
१८८ 
२०२९ 
१९१ 
१९६. 
१९५ 
६९८ 
१९९ 
६६१ 
६६६ 
६६९ 
६५९ 
६८४ 
६९२ 
६९६ 
७२९ 


मन्त्रप्रतीकानि 
त -गः स्मरं ब्रह्म त्युपास्ते 
स यथाततव्र 
स यथा शकुनिः सूत्रेण 
ख यथोभयपादूत्रजन्नः 
स मद्वोचं प्राणम्‌ 
स यद रिरिषति 
स यदि पितरं वा मातरम्‌ 
स यदि पिव्रलोककामः 
स यश्चित्तं ब्रह्म त्युपास्ते 
स यस्तेजो ब्रह्म तयुपास्ते 
स ग्राब्दादित्य उत्तरतः 
श यावदादित्यः 
स यावदादित्यः पश्चात्‌ 
स यावदादित्यः पुरस्तात्‌ 
स यावदादित्यो दक्षिणतः 
स यो ध्यानं नह त्युपास्ते 
स यो नाम त्रदे वयुपास्ते 
स योऽन ब्रह्म त्युपास्ते 
स योऽपो ब्रह्म त्युपास्ते 
स यौ बूल ब्रहम लयुपास्ते 
स यो मनो ब्द द्युपास्ते 
स यो वाचं बर्म ्युपास्ते 
स यो विज्ञानं ब्रम त्युपास्ते 
सवं खल्विदं ब्रह्म 
सव॑कर्मा सवकामः 
सर्वास्वप्सु पञ्चविधम्‌ 
स्वँ स्वरा इन्द्रस्यासमानः 
सर्वे स्वया घोषवन्तः 
खवा एष आत्मा हृदि 
स समिसाणिः पुनरेयाय 


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२७१ 
२६० 
२६९ 
२६२ 
२६४ 
७४१ 
७१९ 
७५१ 
७५२ 
७४७ 
७२६ 
७२३ 
७४२ 
२०३ 
२१२ 
१६१ 
२१५ 
२१९ 


` ८२९ 


८९५ 
९०३ 


मन्त्र प्रतीकानि 


स ह क्षत्तान्विष्य 
स ह खादित्वातिरोषान्‌ 
सह गौतमो राज्ञः 
स ह द्वादरावं उपेत्य 
स ह पञ्चदशाहानि 
स ह प्रातः संजिहानः 
स ह व्याधिनानरितुम्‌ 
सह शिकः 
स ह सम्पादयाञ्चकार 
स ह हारिद्रुमतं गौतमम्‌ 
स हाशाथ हैनमुपससाद 
स हेभ्यं कुल्माषान्ादन्तम्‌ 
स होवाच किं मेऽन्नम्‌ 
स होवाच किंमे वासः 
स होवाच भगवन्तं वा 
स होवाच महात्मनः 
सु होवाच विजानाम्यहम्‌ 
सा ह वागुच्चक्राम 
सा हैनमुवाच नाहम्‌ 
सेयं देवतेक्षत 
सैषा चतुष्पदा षड्विधा 
सोऽधस्ताच्छकटस्य 
सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि 
स्तेनो दिरण्यस्य सुराम्‌ 
स्मरो बावाकाादूमूयः 
ह-सस्ते पादं वक्तेति 
हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति 


( ९४८ ) 


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पृण 
२६१ 
१२६ 
४७७ 
५७५ 
६२३४ 
१२६ 
४०२ 
१०९ 
५२९ 
३८२ 
६३६ 
१२२ 
४५८ 
४६० 
१२९१ 
२७३ 
४०४ 
४४८ 
३८१ 
६०६ 
२८२ 
३६१ 
७१४ 
५३४. 
७६१ 
३९२, 
११४ 


॥ श्रीहरिः ॥ 


गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकारित विभिन्न गीतार्णँ 
श्रीमद्धगवद्रीता-ततत्वविवेचनी- 
(टीकाकार-श्रीजयदयालजी गोयन्दका) 
श्रीमद्धगवदरीता साधक संजीवनी टीका-- 

(टीकाकार-स्वामी रामसुखदासजी महाराज) 
गीता-दर्पण- (स्वामी रामसुखदासजी महाराज) 
गीता-दर्पण-- (पाकेट साड़ज) 
गीता-पाधुर्य । 
गीता-शाकरभाष्य 
गीता-चिन्तन-- (ले श्रीहनुमानप्रसादजी पोदार) 
श्रीमद्धगवदरीता- मू, पदच्छेद, अन्वय, साधारण भाषाटीका 
श्रीमद्धगवदरीता--माहात्मयसहित, सटीक मोटे अक्षरेमिं 
श्रीमद्धगवद्रीता--उटोक, साधारण भाषाटीका, टिप्पणी-प्रधान 

विषय, मोटा टाइप, अजिल्द 
श्रीमद्धगवदरीता-- केवर भाषा 
श्रीमद्धगवद्रीता- साधारण भाषाटीका, पाकेट साइज 
श्रीमद्धगवद्रीता- मूर मोटे अक्षरेमिं 
श्रीपञ्चरत्रगीता-- (श्रीमद्धगवद्रीता, विष्णुसहस्रनाम, 
श्रीभीष्मस्तवराज, श्रीअनुस्मृति, श्रीगजेन्द्रमोक्षके 
मूल-पाठ) छ 
श्रीमद्धगवद्वीता--श्रीविष्णुसहस्ननामसहित छोटा साइज 
गीताताबीजी-- मूर 








= नौ उपनिषद्‌ .. ..  . अन्वय, हिंदी व्याख्यासहित 
|| ईशावास्योपनिषद्‌ हिंदी अनुवाद शंकरभाष्यसहित || 
|| केनोपनिषद्‌ ` | 
| कतलपलिषद्‌ 


माण्डूक्योपनिषद्‌ 
मुण्डकोपनिषद्‌ 





हि 

तैत्तिरीयोपनिषद्‌ 

|| एेतरेयोपनिषद्‌ १.९ ह ^ 
श्ैताश्चतरोपनिषद्‌ ` 
छान्दोग्योपनिषद्‌ 
बृहदारण्यकोपनिषद्‌ 


(= ~ ~